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ब्राह्मण पुत्र मेधावी


पूज्यपाद संत श्री आसारामजी बापू

मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी।

विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि।।

ʹमुझ परमेश्वर में अनन्य योग के द्वारा अव्यभिचारिणी भक्ति करके एकांत देश में रहने का स्वभाव और विषयासक्त मनुष्य के समुदाय में प्रेम का न होना….(यह ज्ञान है, मोक्ष का मार्ग है।) भगवदगीताः 13.10)

इन्द्रियों एवं मन को तुच्छ वृत्तियों को संतुष्ट करने में लगना, आत्मानंद को पाने के बजाय अपने को विषय विकारों के कीचड़ में गिराना-इसे व्यभिचार कहते हैं। मनुष्य जन्म के मुख्य लक्ष्य परमतत्त्व को पाने के लिए कोशिश न करके संसार में आसक्त होकर जन्म गँवा देना ही व्यभिचार कहा गया है।

प्रतिकूलता में ईश्वर को याद किया, साधन-भजन के मार्ग पर थोड़ी यात्रा की, परंतु जैसे ही प्रतिकूलता कम हुई कि फिर से भोगों में लंपट हो गये… या फिर, संसार में अनुकूलता है, सुख सुविधाएँ हैं तो ईश्वर को पाने के लिए तत्परता दिखाई परंतु जैसे ही अनुकूलता कम हुई, असुविधाएँ आयीं तो ईश्वर को भुला दिया और संसार को ठीक करने में लग गये। इसे व्यभिचारिणी भक्ति कहा गया है। अनुकूलता आये चाहे प्रतिकूलता आये-दोनों ही अवस्था में जो परमतत्त्व को पाने के लिए तत्पर रहता है, संसार में चाहे सुख-सुविधा मिले चाहे दुःख मिले, साधन-भजन के मार्ग पर जो यात्रा जारी रखता है ऐसा भक्त अव्यभिचारिणी भक्ति करता है।

व्यभिचारिणी भक्ति करने वाला साधक थोड़ी-सी अनुकूलता या प्रतिकूलता आने पर साधन छोड़कर संसार में गिर जाता है या तो साधन के प्रकार बदलता रहता है। किन्तु अव्यभिचारिणी भक्ति करने वाला साधक बाह्य परिस्थिति से, सुख-दुःख के प्रसंग से चलायमान नहीं होता। व्यभिचारिणी भक्ति से थोड़ी पुण्याई बढ़ती है, थोड़ा सुख मिलता है परंतु मनुष्य को परम सुख की प्राप्ति तो अव्यभिचारिणी भक्ति से ही होती है। भगवान कहते हैं-

मयि चानन्ययोगेन….

भगवान के साथ अनन्य योग करें, अन्य-अन्य योग नहीं। कई लोग ईश्वर की भक्ति तो करते हैं लेकिन चिंता करते रहते हैं कि ʹमेरा क्या होगा ? मेरे परिवार का क्या होगा ?ʹ इसका नाम अनन्य भक्ति नहीं है, भगवान को संपूर्णरूप से समर्पित हो जाना अनन्य भक्ति है। भगवान में अनन्य भाव है तो फिर यह सोचना शेष नहीं रहता कि ʹमेरा क्या होगा ?ʹ जब सब कुछ उसी को सौंप दिया फिर चिंता कैसी ? अतः अनन्य भाव से अव्यभिचारिणी भक्ति करते हुए विविक्त देश का सेवन करें अर्थात् विषयी-विकारी पुरुषों के संग से किनारा कर लें और जहाँ साधन-भजन हो ऐसी जगह पर रहें। भगवद् ध्यान में, भगवद् ज्ञान में रमण करने वाले महापुरुषों के सान्निध्य में रहें। शंकराचार्यजी ने कहाः

एकांतवासो लघुभोजनादौ….

एकांतवास, लघुभोजन अर्थात् इऩ्द्रियों का अल्प भोजन यानी देखना, सुनना, सूँघना, चखना, स्पर्श करना आदि के नियंत्रण से मन की चंचलता का नाश होकर बुद्धि में आत्मप्रकाश होता है। फिर मन की वृत्तियाँ सूक्ष्म होती हैं, वृत्तियाँ सूक्ष्म होने से हम परमतत्त्व के करीब पहुँचते हैं।

साधन ऐसा होना चाहिए कि शीघ्र ही भगवान का साक्षात्कार हो जाय। विषय़ी-विकारी लोगों के प्रभाव में आये बिना भक्ति में तदाकार होने से मनुष्य निष्पाप होता जाता है। निष्पाप होने से विवेक जागता है, संसार से वैराग्य आता है। निर्दोष होने से उसे संसार की असारता, परमात्मा की महत्ता का पता चलता है।

संसार पहले नहीं था, बाद में नहीं रहेगा और अभी भी नहीं की तरफ, विनाश की तरफ जा रहा है। ऐसे परिवर्तनशील संसार में, नश्वर-भोग पदार्थों में आसक्ति का अभाव तथा भोगसामग्री का औषधिवत् उपयोग ही बुद्धिमानी है।

नाशवान संसार से विरक्त होकर एक बार युधिष्ठिर ने भीष्म पितामह के आगे अपनी मनोदशा का वर्णन कियाः

“पितामह ! काल के चक्र में हमें कभी सुख मिला तो कभी दुःख मिला। हम कभी वन में भटके तो कभी सिंहासन पर बैठे। काल अपनी गति से चल रहा है और आयुष्य क्षीण होता जा रहा है। कभी शत्रुओं के तो कभी मित्रों के, कभी भोग-पदार्थ के चिंतन में तो कभी आलस्य-प्रमाद में जीवन पानी की तरह बह रहा है। हे पितामह ! दिन प्रतिदिन मौत नजदीक आती जा रही है। मौत हमें मार दे उसके पहले अमर आत्मा में विश्रांति कैसे पायें ?”

वक्ताओं में श्रेष्ठ, व्रतधारियों में दृढ़ ऐसे भीष्म पितामह युधिष्ठिर को उपदेश देते हैं- “हे य़ुधिष्ठिर ! तुमने अपने विवेक को जागृत करके उत्तम प्रश्न पूछा है। तुम्हारे प्रश्न से बंगदेश के ब्राह्मण की कथा स्मरण में आती है।

बंगदेश में एक ब्राह्मण जप-तप, होम-हवन, व्रत-उपवास आदि कर्मकांड करते हुए ईश्वर के मार्ग पर चल रहा था। तपोनिधि ब्राह्मण की पुण्याई से उसके घर एक मेधावी बालक का जन्म हुआ। ʹमेधाʹ अर्थात् प्रज्ञा। बालक जन्म से ही अत्यधिक प्रज्ञावान, बुद्धिमान होने के कारण उसका नाम भी ʹमेधावीʹ रखा गया।

मेधावी 5 साल का हुआ तब अपने तपोनिधि पिता से उसने प्रश्न कियाः “पिताजी ! मनुष्य का कर्त्तव्य क्या है ?”

पिता ने उत्तर देते हुए कहाः “मनुष्य का कर्तव्य है कि 25 वर्ष की आयु तक ब्रह्मचर्य का पालन करके गुरुद्वार पर रहे, विद्याभ्यास करे, तत्पश्चात दूसरे 25 साल अर्थात् 50 वर्ष की आयु तक गृहस्थाश्रम में रहकर संसार निर्वाह करे। तदनन्तर 25 साल तक अर्थात् गृहस्थाश्रम से निवृत्त होकर वानप्रस्थ जीवन गुजारे और आखिर मोक्षप्राप्ति हेतु संन्यास ले ले।”

आत्मज्ञान में तपोधन ब्राह्मण की गति नहीं थी इसलिए मनुष्य जीवन के सर्वसाधारण शास्त्रोक्त नियम बता दिये लेकिन 5 साल के मेधावी को पिता जी की ये बातें जचीं नहीं। उसने पूछाः

“मनुष्य 25 साल ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करके गुरुद्वार पर रहकर विद्याभ्यास करे, फिर 25 से 50 वर्ष की उम्र तक संसारी विषयों में, विकारों में रहे, उसके बाद मुनि-तपस्वी का जीवन बिताने से क्या लाभ होगा ? पिता जी ! भोगवासना के दलदल में फँसा मनुष्य फिर उससे बाहर नहीं निकल पाता है। समझने पर भी वह फिसलता ही जाता है। शपथ भी खाता है फिर भी फिसल जाता है। इसलिए भोग-सामग्री का अनुभव करके फिर मुक्ति के लिए पुरुषार्थ करना उचित नहीं लगता। भोग तो सूअर और कुत्ते की योनि में भी मिलते हैं। मनुष्य शरीर मिला है तो उसकी उपयोगिता क्या ? पशु योनि की तरह इसे भी व्यर्थ गँवा देना चाहिए क्या ? इससे अच्छा  तो यह होगा कि आरंभ से ही संसार में फँसे बिना ईश्वर के मार्ग पर चल दें।”

ब्राह्मणः “संसार में प्रवेश करने से, पुत्रप्राप्ति होने से पितृओं का ऋण चुकाया जाता है। पुत्र पितृओं का कल्याण करता है।”

ब्राह्मण पुत्र मेधावी की बुद्धि सूक्ष्म थी। छोटे बच्चे को चॉकलेट देकर पटाया जाता है इस तरह पिताजी ने अपनी बातों से उसे समझाना चाहा, परन्तु इन बातों से समझ जाए ऐसा वह नहीं था। उसने तर्क करते हुए कहाः “पुत्र से ही यदि कल्याण हो जाता हो तो कई ऐसे पुत्र होते हैं जो पिता के नाम को तो क्या पूरे कुल-खानदान को भी बदनाम और बरबाद करने वाले कर्म करते हैं। ऐसे पुत्रों से पितृओं का क्या कल्याण हो सकता है ? संसार में कितने ही लोगों को पुत्रप्राप्ति हुई है फिर भी उनका अकल्याण होना क्यों दिखाई दे रहा है ?”

मनुष्य पुत्र के सहारे, पत्नी के सहारे, धन या सत्ता के सहारे अपना कल्याण चाहता है तो यह उसकी बुद्धि का दोष है।

प्रज्ञापराधो मूलं सर्वरोगाणाम्।

प्रज्ञापराधो मूलं सर्वदुःखानाम्।।

सारे रोगों का मूल, सारे दुःखों का मूल है प्रज्ञा का अपराध। मंद बुद्धि के कारण ही मनुष्य सौन्दर्य, सत्ता धन आदि का सहारा लेकर सुख पाने की इच्छा रखता है। वह यहाँ है तो सुख पाने की अंधी दौड़ में मर जाता है, जीवनभर झूठ-कपट, बेईमानी, धोखेबाजी करता रहता है तो मरने के बाद भी नरकों में जाकर पचता है।

भीष्म पितामह युधिष्ठिर से कहते हैं-

“हे य़ुधिष्ठिर ! बालक मेधावी अपने ब्राह्मण पिता से कहता हैः “पिता जी ! मुझे यह बात समझ में नहीं आती है कि भोग भोगकर, संसार के अनुभव से गुजरकर फिर मोक्षमार्ग पर चलें उसके बदले पहले से ही विवेक जागृत करके, दूसरों के अनुभव से सावधान होकर हम आरंभ से ही संसार में न फँसें और मोक्षमार्ग की ओर अग्रसर हो जाएँ  कितना अच्छा ! पिता जी ! आप ही मुझे बताइये कि ऐसा कौन सा मार्ग है जिससे शीघ्र मोक्षप्राप्ति हो। पिता जी ! मुझे लग रहा है कि कोई दिन-रात मेरे पीछे पड़ा है और मुझे मार रहा है।”

पिताः “तू ऐसी बातें क्यों करता है ? तू खुद डरा हुआ है और मुझे भी डरा रहा है।”

मेधावीः “पिताजी ! मैं डरा हुआ नहीं हूँ। मैं सच कहता हूँ। आप होम-हवन, जप-तप आदि करके स्वर्ग का सुख पाना चाहते हैं लेकिन मैंने तो सुना है कि वह सुख सच्चा सुख नहीं है, सदा टिकने वाला नहीं है। काल डंडा लेकर सबके पीछे पड़ा है, सबको मार रहा है। ऐसी दशा में 25 साल निर्वाह में गँवा देने की बात अनुचित समझता हूँ। कौन कब मृत्यु की झपेट में आ जाए, कोई पता नहीं है। जीवन का कोई भरोसा नहीं है अतः भोगों का अनुभव लेने के बजाये अपने कल्याण की बात सोचनी चाहिए। ऐसा कौन सा भोग है कि जिसे भोगने के बाद रोग न मिला हो ? सांसारिक भोग से या स्वर्गादि के सुखों के भोग से शक्तिहीनता, जड़ता, पराधीनता ही मिलती है। इसलिए मैं सोचता हूँ कि भोग की अपेक्षा योग का मार्ग लेना ही कल्याणकारी साबित होगा।”

तपोधन ब्राह्मण सोचता है कि आज तक जिंदगी के कई साल व्यर्थ भोग-पदार्थों की प्राप्ति की दौड़ में गँवा दिये लेकिन इस बच्चे ने तो मेरी आँखें खोल दीं। वे बोलेः “मेधावी ! तू सच कहता है। मैंने कर्मकांड करके अपनी वासनाओं को तृप्त करना चाहा मगर उससे शांति नहीं मिली, अंतर में तृप्ति नहीं मिली। वरन् कामनाएँ गहरी उतरती गई। मृत्यु कब आकर गला दबोच ले, कोई पता नहीं है। जैसे चूहे को कहीं से मिठाई मिले और वह आराम से खाने लगा हो और अचानक बिल्ली आकर उसे झपेट ले…… ऐसी हालत संसार के भोगों में रत मनुष्य की होती है। मुझे भी कब मृत्यु आकर झपेट लेगी, कोई पता नहीं है।

जिस शरीर को खिलाया-पिलाया, घुमाया-फिराया, आखिर में वह अग्नि में जलकर खाक हो जायेगा। वह खाक हो जाये उससे पहले अपने शिवस्वरूप को, आत्मा को जानने का उपाय खोजना चाहिए।”

भीष्म पितामह अपनी बात को आगे चलाते हुए कहते हैं- “हे बुद्धिमान युधिष्ठिर ! मनुष्य के जीवन के चार पुरुषार्थ हैं- धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। इन चारों पुरुषार्थ में से बुद्धिमान मनुष्य को चौथा पुरुषार्थ मोक्ष पाने में ही सार लगता है। जिनके चित्त में मोक्षप्राप्ति की इच्छा है वे धर्म के अनुकूल रहकर अर्थ और काम भोगते हैं। वे सजाग रहकर संसार के व्यवहार को चलाते हैं। इससे विवेक-वैराग्य की प्राप्ति होती है और वे परम पुरुषार्थ मोक्ष के मार्ग पर चल पड़ते हैं।

जिन्हें अपने कल्याण के लिए पुरुषार्थ करना हो उन्हें अपने स्थूल शरीर को परहित के कार्य में और सूक्ष्म शरीर यानी मन को भगवन्नाम के जप, ध्यान, आत्मचिंतन में लगाना चाहिए। निष्काम कर्म से अंतःकरण की शुद्धि होती है और भोग-वासनाएँ क्षीण होती हैं। योग से सामर्थ्य आता है। परमात्मा की अव्यभिचारिणी भक्ति करने से अंतःकरण दिव्य होता है और दिव्य रस की प्राप्ति होती है। जीवन के चार पुरुषार्थ में से अर्थ और काम तो शरीर के लिए हैं। धर्म के आचरण से मन ईश्वर की ओर चलता है जबकि मोक्ष परम पद को दिलाने वाला है। हे कुरुनंदन युधिष्ठिर ! यदि किसी बुद्धिमान के मन में प्रतिशोध की आग भड़कती रहती है तो वह धर्म का सहारा लेकर अपने मन को समझाता है, शांत रखता है। जो धर्म के अनुकूल व्यवहार करता है, वह अंत में भगवान की शरण जाता है लेकिन जो अधर्म का सहारा लेता है वह दुर्बुद्धि दुर्योधन की नाईं अपने को और अपने साथवालों को दुर्गति की खाई में डालता है।

ऐसे लोगों को चाहिए कि निष्काम भाव से कर्म करें जिससे अंतःकरण शुद्ध हो। शुद्ध अंतःकरण वाले मनुष्य को ही परमात्म-ध्यान, परमात्म-प्रेम के दिव्य प्रसाद की प्राप्ति होती है। ऐसा मानव उस ब्राह्मणपुत्र मेधावी की तरह अपना विवेक जगाकर परम पुरुषार्थ मोक्ष की प्राप्ति कर सकता है।”

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अप्रैल 1997, पृष्ठ संख्या 20,21,22,23 अंक 52

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वास्तविक सुख किस में ?


पूज्यपाद संत श्री आसारामजी बापू

मच्चित्ता गद् गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम्।

कथयन्तश्च मां नित्यं तुषयन्ति च रमन्ति च।।

ʹनिरन्तर मुझमें मन लगाने वाले और मुझमें ही प्राणों को अर्पण करने वाले भक्तजन, सदा ही मेरी भक्ति की चर्चा के द्वारा, आपस में मेरे प्रभाव सहित मेरा कथन करते हुए संतुष्ट होते हैं और मुझ वासुदेव में ही निरंतर रमण करते हैं।ʹ (भगवद् गीताः 10.9)

भोगी को विषय-भोगों में वह सुख नहीं मिलता जो भक्त को भगवद् प्रभाव के चिंतन एवं परस्पर कथन में मिलता है।

वस्तु-व्यक्तियों से क्रिया करके जो सुख मिलता है उसे क्रियाजन्य सुख कहते हैं। सूँघने, चखने, स्पर्श करने आदि क्रियाजन्य सुख में ही मनुष्य अटका रहा तो मनुष्य रूपेण मृगाश्चरन्ति। वह मनुष्य के रूप में पशु माना गया है। क्रियाजन्य सुख तो कुत्ते-कुत्ती भी भोगते हैं, जिसमें क्रिया, परिश्रम तो ज्यादा होते हैं और सुख घड़ीभर का मिलता है। ऐसे ही खाने पीने, सूँघने-सुनने आदि से मिलने वाला सुख क्रियाजन्य सुख है।

दूसरा सुख है भावजन्य सुख। क्रियाजन्य सुख की अपेक्षा भावजन्य सुख में मेहनत कम है और सुख ज्यादा है। भगवान या गुरु की मूर्ति को निहारने से या मन में भावना करने से हृदय में सुख मिलता है। भावजन्य सुख में परिश्रम कम है और सुख क्रियाजन्य सुख से ज्यादा है।

भावजन्य सुख हृदय को शुद्ध करता है स्वतंत्रता की ओर ले जाता है। क्रियाजन्य सुख में बल-बुद्धि तेज-तन्दुरुस्ती का नाश होता है और भावजन्य सुख हृदय को भगवदभाव से भरता है।

भावजन्य सुख से भी बढ़कर है ध्यानजन्य सुख। भाव ज्यादा देर नहीं टिकता लेकिन ध्यान उससे ज्यादा देर टिकता है। हालाँकि ध्यान भी निरन्तर नहीं होता है और समाधि भी सतत नहीं होती है। अतः उससे भी आगे है विचारजन्य सुख।

विचारजन्य सुख अर्थात् भगवदविचार करना, भगवदज्ञान की, आत्मज्ञान की बातें करना। जब दो दीवानें मिल जाते हैं तो वहाँ ईश्वर विषयक चर्चा की मेहफिल शुरु हो जाती है जिससे मन भगवदाकार, ब्रह्माकार होने लगता है। ऐसा करते-करते मनुष्य तात्त्विक सुख का अधिकारी होने लगता है। आत्म-साक्षात्कारी महापुरुष तात्त्विक सुख को पाते हैं।

सदा समाधि संत की आठों प्रहर आनंद।

अकलमता कोई ऊपजा गिने इन्द्र को रंक।।

ऐसा माधुर्य, संतोष और ऐसा रस उन महापुरुष को मिलने लगता है जहाँ इन्द्र का सुख भी तुच्छ हो जाता है।

मनुष्य जन्म का लक्ष्य उसी रस को, उसी तात्त्विक सुख को पाना है। क्रियाजन्य सुख तो पशु भी ले रहे हैं, मूर्ख भी ले रहे हैं। भावजन्य सुख भक्त लेते हैं और विचारजन्य सुख भक्त और ज्ञानी लेते हैं। तत्त्व का सुख पाने के लिए परस्पर परमात्मतत्त्व का कथन-चिंतन-मनन करना चाहिए।

बुद्धिमान मनुष्य तो वह है जो भगवदचिंतन, भगवदस्वरूप का श्रवण करे कि ʹभगवान क्या हैं ? जीवात्मा क्या है ? परमात्मा क्या है ? सुख-दुःख आते हैं, चले जाते हैं लेकिन उनको भी जो देखने वाला है उस साक्षीस्वरूप में मैं कैसे टिकूँ ? इससे भी आगे चलकर साक्षी और साक्ष्य के पार परमात्मपद में पूर्णता कैसे पाऊँ ?ʹ ऐसा विचार करने वाला व्यक्ति उस परम सुख को पाता है, तात्त्विक सुख को पाता है।

छः व्यक्तियों से हमें कभी हानि नहीं होती, लाभ ही लाभ होता हैः

सात्त्विक एवं बुद्धिमान मित्र, विद्वान पुत्र, पतिव्रता स्त्री, दयालु मालिक, सोच-समझकर बोलने वाला, सोच-समझकर काम करने वाला। इनसे कभी हानि नहीं होती है।

श्रीकृष्ण अथवा श्रीकृष्णतत्त्व को पाये हुए महापुरुषों को हम ʹसाधुʹ कहते हैं। गुरुवाणी में आता हैः

साधु ते होवहि न कारज हानि।

ब्रह्मज्ञानी ते कछु बुरा न भया।।

जिन्होंने तात्त्विक सुख पा लिया है, परम सुख पा लिया है, आत्मा का सुख पा लिया है उनसे कभी हमारा बुरा नहीं होता है। ऐसे तत्त्ववेत्ता होने के लिए जो दीवाने चल पड़ते हैं, उनकी ही बात भगवान यहाँ कर रहे हैः मच्चिता मद् गतप्राणाः।

परमेश्वर की ही बातों के परस्पर कथन से ज्ञान पुष्ट होता है, तात्त्विक सुख दृढ़ होता है। जिज्ञासु द्वारा ईश्वर विषयक ज्ञान सुनने से जिज्ञासा की पूर्ति तो होती है, आत्मज्ञान सुनकर कुछ संतोष तो होता है किन्तु उससे सब दुःख नहीं मिटते। सत्संग से कुछ दुःखों की निवृति अवश्य होती है किन्तु बाकी के दुःख मिटाने के लिए उस सत्संग से जो ज्ञान मिला, उस ज्ञान का परस्पर कथन करके उस ज्ञान में टिकने का प्रयास करना चाहिए।

जब तक गुरु का ज्ञान नहीं मिला था, गुरूदीक्षा नहीं मिली थी तब तक संसार की छोटी-छोटी बातें भी बड़ा प्रभाव डालती थीं लेकिन गुरुदीक्षा मिलने के बाद, सत्संग सुनने के बाद उनका पहले जैसा प्रभाव तो नहीं पड़ता किन्तु दुःख बना रहता है, विक्षेप बना रहता है। निगुरे को ज्यादा तो सगुरे को कम। ….और यह विक्षेप तब तक बना रहता है जब तक आत्मनिष्ठा दृढ़ नहीं हुई। इसलिए निष्ठा को दृढ़ करने के लिए भी आत्मा की बातें, सत्संग की बातें करनी चाहिए और उसी में संतुष्ट होना चाहिए। इधर उधर की बातें करके अपने चित्त से सत्संग की बातों का प्रभाव घटने नहीं देना चाहिए अपितु सत्संग की बातों से इधर-उधर की बातों के प्रभाव को हटा देना चाहिए।

अगर चारों तरफ से मुसीबतें आ जायें, चारों ओर अंधेरा ही अंधेरा दिखने लगे, तब भी यह चिंतन करना चाहिए किः ʹदुःख आये हैं तो जाएँगे, सदा नहीं रहेंगे। जब सृष्टि पहले नहीं थी, बाद में भी नहीं रहेगी और अभी भी ʹनहींʹ की ओर ही जा रही है तो दुःख भी पहले नहीं था, बाद में नहीं रहेगा और अभी भी ʹनहींʹ की ओर ही जा रही है तो दुःख भी पहले नहीं था, बाद में नहीं रहेगा और अभी भी नहीं की ओर ही जा रहा है। परमात्मा  तो पहले भी था, अब भी है और बाद में भी रहेगा। वही परमात्मा मेरा आत्मा है, वही श्रीराम है, वही यशोदानन्दन श्रीकृष्ण है और वही गुरु है।ʹ ऐसा चिंतन करके दुःख के बीच भी आप दो मिनट के लिए पूरे सुख में आ सकते हैं।

बाहर से तो दुःख, दुःख ही दिखता है लेकिन दुःख दिखता है दुःखाकार वृत्ति से। उस दुःखाकार वृत्ति को यदि दो मिनट के लिए भी भगवदाकार वृत्ति बना दें तो आप दो मिनट के लिए निर्दुःख हो सकते हैं तो दस मिनट भी हो सकते हैं। हृदय में जब दुःखाकार वृत्ति होती है तब दुःख होता है। अनुकूलवेदनीयं सुखं प्रतिकूलवेदनीयं दुःखं। जो अनुकूल लगता है उसे हम सुख मानते हैं और प्रतिकूल लगता है उसे दुःख मानते हैं। जैसे बेटे की शादी में माँ को गालियाँ मिलती हैं तो उसे दुःख नहीं होता है। दुश्मन का आशीर्वाद भी खटकता है और सज्जन की गाली भी अच्छी लगती है। गाली तो गाली होती है लेकिन वहाँ दुःखाकार वृत्ति उत्पन्न नहीं होती वरन् ʹमित्र की गाली हैʹ ऐसा सोचकर सुखाकार वृत्ति बनने के कारण सुख होता है।

धन चले जाने से सबको दुःख होता है लेकिन वही धन जब सत्कर्म में लगाते हैं तो अंदर से औदार्य की वृत्ति उत्पन्न होती है। अतः धन देते समय भी सुख होता है। नहीं तो धन देना अच्छा लगता है क्या ? कुछ भी न मिले और धन देना पड़े तो…..? फिर भी सत्कर्म में धन देने पर सुख होता है क्योंकि वहाँ धन का महत्त्व नहीं है वरन् आपकी वृत्ति सुखाकार होती है इसीलिए आप मठ-मंदिर, आश्रम आदि में धन अर्पण करते हो। वही पचास रूपये हैं – यदि सत्कर्म में लगाते हो तो सुख होता है और दण्ड के रूप में भरना पड़े तो दुःख होता है।

मदालसा जब अपने बेटों को दूध पिलाती, तब ब्रह्मज्ञान की बातें करती थी। मच्चित्ता मद् गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम्। मानो, गीता का यह वचन चरिथार्थ कर रही हो। इस प्रकार शैशव से ही भगवदभाव के विचारों से ओतप्रोत बातें करके उसने अपने बच्चों को ब्रह्मज्ञानी बना दिया।

बाल्यकाल में ही एक के बाद एक बालक ब्रह्मज्ञानी होकर विरक्त होने लगा। तब मदालसा के पति ने कहाः “यदि सभी बच्चों को तुम इस प्रकार विरक्त बना दोगी तो मेरी गादी कौन संभालेगा ? राजगादी संभालने के लिए कुछ तो आसक्ति चाहिए, कुछ तो अज्ञान चाहिए… तभी वह संभाली जा सकेगी। विरक्त क्या संभालेगा ? अतः एक बालक को तो अज्ञानी रखो।

अलर्क नामक छोटे बेटे को ब्रह्मज्ञान देने से राजा ने मदालसा को इन्कार कर दिया। मदालसा ने सोचा किः ʹचलो, भले यह अलर्क राज्य संभाले लेकिन मेरा बेटा राज्य करके अंत में मरे और फिर दुबारा जन्म ले तो मेरा जन्म देना व्यर्थ है।ʹ अतः उसे ब्रह्मज्ञान के थोड़े संस्कार तो दिये ही, जाते-जाते एक ताबीज भी दे गयी और बोलीः

“बेटा ! यह ताबीज कभी खोलना मत। जब चारों तरफ से अंधेरा नजर आने लगे, चारों ओर से मुसीबतों के पहाड़ टूटने लगें, तभी इस ताबीज को खोलना।”

समय पाकर मदालसा और उसके पति का देहान्त हो गया और अलर्क राज-काज संभालने लगा। ऐसा कोई राजा नहीं, जिसके जीवन में कभी कोई दुःख न आया हो। ज्यों ही राज्य को ʹमेराʹ माना, आसक्ति हुई त्यों ही दुःख आना शुरु हो जाता है। यह ईश्वर की नियति है।

जहाँ तुमने वस्तुओं में, व्यक्ति में, परिस्थिति में आसक्ति की कि ʹहाश ! अब मजे से जियेंगेʹ तभी कोई-न-कोई दुःख आना शुरु हो जायेगा क्योंकि परमात्मा तुम्हें सदैव इस मिथ्या मजे में ही नहीं रखना चाहते हैं। इसीलिए दुःखहारी श्रीहरि दुःख देकर भी तुम्हें परिपक्व करना चाहते हैं। यदि आप ʹवेलसेटʹ हो गये हो तो समझ लो कि ʹअपसेटʹ होने का सामान भी तैयार हो रहा है और यह कहानी केवल एक-दो की ही हो ऐसी बात नहीं है, सबकी यही कहानी है।

अलर्क भी राज-काज संभालते-संभालते उसमें ही गरकाव होने लगा तब उसके भाइयो को हुआ कि ʹहमारा भाई अज्ञानी क्यों रह जाए ? अब वह राज्य में आसक्त होता जा रहा है अतः उसकी आसक्ति छुड़ाने का उपाय भी करना होगा।ʹ

वे जीवन्मुक्त भाई गये अलर्क के पास और बोलेः “हमें हमारे राज्य का हिस्सा दे दो।”

अलर्कः “राज्य मुझे मिला है, आप लोगों को कैसे दे दूँ ?”

भाईः “हम तुम्हारे भाई लगते हैं, अपना हक क्यों छोड़ें ?”

जितना संसार से सुख मिलता है उतनी ही उससे आसक्ति भी होती है। अलर्क ने राज्य देने से इन्कार कर दिया। तब उसके भाइयों ने काशीनरेश से विचारविमर्श किया कि ʹहमें अपने भाई को जगाना है, उसे मुसीबत में डालकर सदा के लिए जन्म-मरणरूपी मुसीबत से छुटकारा दिलवाना है। अतः आप हमारी सहायता करें।ʹ काशीनरेश ने अपना सैन्य भेज दिया।

अलर्क का राज्य तो छोटा-सा था और काशीनरेश की विशाल सेना। अलर्क को हुआ कि ʹइतनी बड़ी सेना लेकर आये हुए अपने संत भाइयों से मैं कैसे लड़ूँगा ? वह बड़ा दुःखी और चिंतित हो उठा और ऐसी मुसीबत के समय में उसने माँ का दिया हुआ ताबीज खोला जिसमें एक छोटी चिट्ठी थी। उस चिट्ठी में लिखा थाः

दुःख पड़े तो संतशरण जाइये।

उस समय नगर के बाहर जोगी गोरखनाथ ठहरे हुए थे। अलर्क पहुँचा जोगी गोरखना के श्रीचरणों में और बोलाः “महाराज ! मैं बड़ा दुःखी हूँ।”

गोरखनाथः “तू मदालसा का बेटा होकर दुःखी है ? मैं अभी तेरा दुःख निकाल देता हूँ। बता, कहाँ है दुःख ?”

अलर्कः “महाराज ! हृदय में बड़ा दुःख है।”

जोगी गोरखनाथ ने तपाया चिमटा और बोलेः “बता, कहाँ है दुःख ? अभी उसे यह चिमटा लगाता हूँ।”

अलर्कः “महाराज ! आप चिमटा मेरे दुःख को कैसे लगाओगे ?”

गोरखनाथः “दुःख है कहाँ ?

अलर्कः “भीतर है।”

गोरखनाथः “चल, अभी लगाता हूँ।”

अलर्कः “महाराज ! यह क्या ? चिमटे से दुःख दूर कैसे होगा ?”

गोरखनाथः “तू केवल बता कि दुःख भीतर कहाँ पर है और कैसे है ? दुःख है कि दुःख का भाव है ?”

अलर्कः “महाराज ! भाई लोग काशीनरेश की सेना लेकर राज्य पर चढ़ाई करने आये हैं, इसलिए मन में दुःख का भाव है।”

गोरखनाथः “यह दुःख नहीं है, वरन् ʹयह राज्य जाये नहींʹ इस आसक्ति के कारण दुःखाकार वृत्ति है। इस दुःखाकार वृत्ति को तू बदलना चाहे तो बदल सकता है। यह केवल एक वृत्ति है और वृत्ति जहाँ से उत्पन्न होती है वह उत्पन्न करने वाला पूर्ण स्वतन्त्र है। उसे जान ले तो सब दुःखों से सदा के लिए मुक्त हो जायेगा।”

“महाराज ! उसे कैसे जानूँ ?”

“अलर्क ! संसार तू लाया नहीं था, राज्य तू लाया नहीं था, ले भी नहीं जायेगा और अभी भी नहीं के तरफ ही जा रहा है। उसमें आसक्ति मत कर।”

इस प्रकार परस्पर आत्मबोध की बात सुनते-सुनते अलर्क को अनुभव होने लगा।

मच्चित्ता मद् गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम्।

कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च।।

अलर्क को उस तात्त्विक सुख का अनुभव हुआ जो उसे राज्य-भोग में कभी नहीं मिला था। राज्य सुख तो क्रियाजन्य सुख था, कभी-कभार पूजा में भावजन्य सुख मिला था किन्तु यह सुख तात्त्विक सुख था। तात्त्विक सुख ही सब सुखों का मूल है।

कृतकृत्य होकर अलर्क ने गुरु गोरखनाथ के चरणों में प्रणाम करके विदा माँगी और राज्य में जाकर अपने भाइयों को संदेश भिजवायाः “आज तक मैंने यह राज्यरूपी बैलगाड़ी खूब खींची। आप लोग मेरे बड़े भाई हैं अतः इस झंझट को अब आप ही संभाल लें। अब मैं राज्य से निवृत्त हो जाना चाहता हूँ।”

तब भाइयों ने कहाः “पागल ! इस झंझट को झंझट समझकर निवृत्ति का सुख तुझे मिल जाये इसीलिए हमने यह आयोजन किया था। बस, अब तू ही इसे संभाल। हमें इसकी जरूरत नहीं है। राज्य के प्रति तेरी आसक्ति एवं तेरी नासमझी को मिटाने के लिए ही हमने यह सारा स्वांग रचा था।”

ऐसे ही परमात्मा तुम्हारे साथ स्वाँग रचता है। परमात्मा परम सुहृद है। वह जो भी करता है हमारे मंगल के लिए ही करता है। हम हार न जाएँ, घबरा न जाएँ, थक न जायें और तुच्छ सुख-दुःख में बह न जाएँ – केवल इतनी ही सावधानी रखें और यह सावधानी तब आयेगी जब भगवान के प्यारों के बीच जायेंगे, उनसे भगवदसंबंधी वार्तालाप सुनेंगे, भगवदविचार का मनन-चिंतन करेंगे एवं बार-बार भगवदाकार वृत्ति उत्पन्न करेंगे…. ऐसा करने से उन परम सुहृद परमात्मा में रमण करने की योग्यता अपने आप विकसित हो उठेगी। इसलिए भगवान ने कहा हैः मच्चित्ता मद् गतप्राणा….

ʹनिरन्तर मुझमें मन लगाने वाले और मुझमें ही प्राणों को अर्पण करने वाले भक्तजन, सदा ही मेरी भक्ति की चर्चा के द्वारा, आपस में मेरे प्रभाव सहित मेरा कथन करते हुए संतुष्ट होते हैं और मुझ वासुदेव में ही निरंतर रमण करते हैं।ʹ

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मार्च 1997, पृष्ठ संख्या 2,3,4,5,6 अंक 51

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श्रद्धा सब धर्मों में जरूरी


पूज्यपाद संत श्री आसारामजी बापू

ʹनारद पुराणʹ में आता है कि श्रद्धा से ही भगवान संतुष्ट होते हैं।

श्रद्धापूर्णाः सर्वधर्मा मनोरथफलप्रदाः।

श्रद्धया साध्यते सर्वं श्रद्धया तुष्यते हरिः।।

ʹनारद ! श्रद्धापूर्वक आचरण में लाये हुए ही सब धर्म मनोवांछित फल देने वाले होते हैं। श्रद्धा से ही सब कुछ सिद्ध होता है और श्रद्धा से भगवान श्रीहरि संतुष्ट होते हैं।ʹ

नेता को भी ʹमैं जीत जाऊँगा…ʹ यह श्रद्धा होती है तभी वह चुनाव में तत्पर होता है और सफल होता है। दुकानदार को भी श्रद्धा होती है कि ʹदुकान चलाने में लाभ होगा…. धंधा चलेगा…..ʹ भी वह पगड़ी देकर दुकान खरीदता है और सफल होता है। विद्यार्थी को भी श्रद्धा होती है कि ʹमैं पढ़ूँगा और पास होऊँगा….।ʹ हालाँकि सब विद्यार्थी पास नहीं होते हैं – 100 प्रतिशत विद्यार्थी पास नहीं होते हैं। कहीं 70 तो कहीं 80 प्रतिशत पास होते हैं तो 20 या 30 प्रतिशत फेल भी होते हैं। अगर हजार विद्यार्थी परीक्षा में बैठें तो आठसौ पास होंगे लेकिन अगर आठसौ बैठें तो आठसौ पास नहीं होंगे। किन्तु हजार के हजार विद्यार्थी सोचते हैं कि ʹहम तो पास हो जायेंगेʹ तभी 700-800 पास हो पायेंगे।

परीक्षा में भी जो फेल होते हैं उन्हें कुछ  तो ज्ञान मिलता ही है। ऐसे ही जो श्रद्धा से ईश्वर के रास्ते पर चल पड़ता है उसे पूर्णता की प्राप्ति होती है किन्तु कभी-कभार अगर इस जन्म में न भी हुई फिर भी उस साधक की साधना व्यर्थ नहीं जाती। स्वर्ग या ब्रह्मलोक का सुख-वैभव  उसे मुफ्त में मिल ही जाता है और वह उस सुख का उपभोग करके पुनः किसी श्रीमान के घर, किसी योगी के घर जन्म लेता है। बचपन से ही भोग-सामग्री के बीच होते हुए भी, पूर्वकाल की श्रद्धा के बल से किया हुआ भजन, दान-पुण्य एवं सत्कर्म उसके हृदय को उठाता जाता है और वह परम पद की, पूर्णता की प्राप्ति कर लेता है।

जिसके जीवन में श्रद्धा नहीं है, उसका जीवन रसहीन हो जायेगा। फिर वह इन्जेक्शनों एवं गोलियों से तन्दुरुस्ती माँगता फिरेगा, डिस्को और वाइन, सिगरेट, पान-मसाले (गुटखा) से प्रसन्नता माँगता फिरेगा और इधर-उधर के छोटे-मोटे अखबारों, नॉवेल-उपन्यास आदि में ज्ञान खोजता फिरेगा लेकिन जिसके जीवन में श्रद्धा है उसके अंतर में आत्मज्ञान प्रगटेगा, उसकी अंतरात्मा से आत्मसुख प्रगटेगा, उसकी अंतरात्मा से आरोग्यता के कण प्रगटेंगे और देर-सबेर अंतरात्मा की यात्रा करके वह परमात्म पथ की यात्रा में भी सफल हो जायेगा।

जिसके जीवन में श्रद्धा नहीं होती वह तत्पर नहीं होगा, संयमी भी नहीं होगा, स्नेहवान भी नहीं होगा। जिसके जीवन में श्रद्धा है उसके जीवन में तत्परता होगी, संयम होगा, रस होगा। जो लोग श्रद्धावान का मजाक उड़ाते हैं, उनके लिए आचार्य विनोबा भावे कहते हैं “श्रद्धावान को अंधश्रद्धालु कहना यह भी  अंधश्रद्धा है।”

अपने बाप पर भी तो श्रद्धा रखनी पड़ती है। जो श्रद्धावान का मजाक उड़ाते हैं वे भी तो श्रद्धावान हैं। ʹयह मेरा बाप…. यह मेरी जाति….ʹ यह श्रद्धा से ही तो मानते हैं। पायलट पर, बसड्राईवर पर भी तो श्रद्धा रखनी पड़ती है। हालाँकि कई बार दुर्घटना भी हो जाती है।

यहाँ भगवान कहते हैं- श्रद्धापूर्णाः सर्वधर्मा… सब धर्मों को श्रद्धा पूर्ण करती है, चाहे स्त्रीधर्म हो – जो स्त्री, पुरुष में साक्षात नारायण का वास समझकर उसकी सेवा करती है, अपनी इच्छा-वासनाओं को महत्त्व न देते हुए पति के संतोष में अपना संतोष मान लेती है, उस स्त्री के पातिव्रत्य धर्म में इतना सामर्थ्य आ जाता है जितना उसके पति में भी शायद न हो और यह सामर्थ्य आता है उसकी श्रद्धा से। विद्यार्थी का धर्म भी श्रद्धा से संपन्न होता है और चिकित्सक आदि का धर्म भी श्रद्धा से संपन्न होता है। यदि नकारात्मक विचार रखकर चिकित्सक इलाज करे या मरीज करवाये तो दोनों को हानि होगी। अतः श्रद्धा, तत्परता सब धर्मों में चाहिए, सब कर्मों में चाहिए।

श्रद्धापूर्णाः सर्वधर्मा मनोरथफलप्रदाः।

श्रद्धया साध्यते सर्वं श्रद्धया तुष्यते हरिः।।

ʹनारद ! श्रद्धापूर्वक आचरण में लाये हुए ही सब धर्म मनोवांछित फल देने वाले होते हैं। श्रद्धा से सब कुछ सिद्ध होता है और श्रद्धा से ही भगवान श्रीहरि संतुष्ट होते हैं।ʹ

श्रद्धा से साधक में तत्परता आती है, श्रद्धा से ही मन-इन्द्रियों पर संयम किया जाता है और श्रद्धा से ही परमात्मस्वरूप की प्राप्ति होती है। श्रद्धा से उत्तम गुण उत्पन्न होते हैं और श्रद्धा से ही उत्तम रस की प्राप्ति होती है।

राजा द्रुपद ने संतान-प्राप्ति के लिए श्रद्धा से भगवान शिव की आराधना की। शिव की आराधना का फल हुआ कि राजा द्रुपद को संतान तो प्राप्त हुई किन्त कन्या के रूप में।

तब राजा द्रुपद ने पुनः आराधना की जिससे प्रसन्न होकर भगवान शिव प्रगट हुए। तब राजा ने प्रार्थना कीः “भगवन्, ! मैंने तो संतान अर्थात् पुत्र की प्राप्ति के लिए आराधना की थी लेकिन यह तो कन्या है।”

शिवजीः “हमारी दी हुई वस्तु को तुम प्रसाद समझकर स्वीकार करो। यह दिखती तो कन्या है लेकिन तुम इसे पुत्र ही समझो।”

राजा द्रुपद ने भगवान के वचनों पर श्रद्धा की। उस कन्या का कन्यापरक नाम नहीं रखा परंतु पुत्रपरक नाम-शिखण्डी रखा। उसके संस्कार भी पुत्र के अऩुसार एत। जब वह युवती हुई तब उसे युवक मानकर किसी कन्या से उसकी शादी करवा दी। श्रद्धा के बल से वह कन्या पुत्र के रूप में बदल गयी, शिखण्डी पुरुष हो गया। आज भी कभी-कभी आप सुनते हैं कि लड़की में से लड़का हो गया।

यह सब परिणाम है दृढ़ श्रद्धा का। दृढ़ श्रद्धा असंभव को भी संभव करने में सक्षम है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मार्च 1997, पृष्ठ संख्या 24,25 अंक 51

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