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शरीर स्वास्थ्य


दही

दही की प्रकृति (तासीर) गर्म होती है। इसमें प्रोटीन की मात्रा अधिक होती है। दही जमने की प्रक्रिया में ʹबीʹ विटामिन विशेषकर थायमिन, रिबोफ्लेबीन और निकोटेमाइड की मात्रा दुगुनी हो जाती है। विशेषतः दूध की अपेक्षा दही सरलता से पच जाता है।

उच्च रक्तदाब, मोटापा तथा गुर्दे (किडनी) की बीमारियों में दही अत्यधिक लाभप्रद बताया गया है।

अमेरिका के प्रो. जार्ज शीमान के अनुसार दही हृदयरोग की रोक-थाम के लिए उत्तम वस्तु है।

कोलेस्ट्रॉल नामक हानिकारक पदार्थ रक्तवाहिनियों में जमकर रक्त के प्रवाह को रोकता है। परिणामतः हृदय रोगों की उत्पत्ति होती है। दही कोलेस्ट्रॉल की अधिक मात्रा को नियंत्रित करता है।

विभिन्न रोगों में उपचार

केन्सरः करनाल, 24 जुलाई 1973 में राष्ट्रीय डेयरी संस्थान के वैज्ञानिकों ने काफी परीक्षणों के बाद बताया कि दही कई प्रकार के केंसर की संभावना को समाप्त करता है। दही का सेवन स्वास्थ्य के लिए उपयोगी है।

वैज्ञानिकों के अनुसार दहीसेवन के एक घंटे के अंदर ही उसके लगभग 80 प्रतिशत अंश को शरीर आत्मसात कर लेता है जबकि दूध का सिर्फ 32 प्रतिशत अंश ही शरीर आत्मसात कर पाता है। दही से शरीर की फालतू चर्बी कम होती है अतः मोटापा कम करने के लिए भी दही या मट्ठे का सेवन लाभदायक है।

बाल गिरनाः आवश्यकता से अधिक भावनात्मक दबाव के कारण बाल अधिक गिरते हैं। महिलाओं में एस्ट्रोजन हारमोन की कमी के कारण बाल अधिक गिरते हैं। भोजन में लौह तत्त्व व आयोडीन की कमी से भी बाल असमय गिरते हैं।

दही में वे सभी तत्त्व होते हैं जिनकी बालों को आवश्यकता रहती है।

एक कप दही में पिसी हुई 8-10 काली मिर्च मिलाकर सिर धोने से सफाई अच्छी होती है। बाल मुलायम व काले रहते हैं एवं गिरना बन्द हो जाते हैं। कम से कम सप्ताह में एक बार इसी तरह बाल धोयें।

अपचः सेंका व पिसा हुआ जीरा, काली मिर्च व सेंधा नमक दही में डालकर नित्य खाने से अपच ठीक हो जाता है। भोजन शीघ्र पचता है।

सिरदर्द (आधे सिर में)

दही, चावल व मिश्री मिलाकर सूर्य़ोदय से पहले खाने से  सूर्योदय के साथ बढ़ने घटने वाला सिरदर्द ठीक हो जाता है। यह प्रयोग कम से कम छः दिन करें।

आँतें- वैज्ञानिकों के अऩुसार एऩ्टीबायटिक्स देने के पश्चात आँतों के बेक्टीरियल फ्लोरा पर पड़े कुप्रभाव को दही के सेवन से हटाया जा सकता है।

भाँग के नशे में- ताजा दही खिलाने से भाँग का नशा उतर जाता है।

गंजापनः प्याज का रस सिर में लगायें। एक घंटे बाद खट्टा दही लगायें। पाँच-दस मिनट बाद सिर धो लें। इस प्रयोग से गंजे को भी बाल होने लगेंगे।

विशेषः दही में मिश्री या शहद डालकर खाने से इसके गुणों में वृद्धि होती है।

सावधानीः दमा, श्वास, खांसी, कफ, शोथ, पित्त, ज्वर में दही का सेवन हानिप्रद है।

ईख (गन्ना)

आजकल अधिकांशतः लोग मशीन, ज्यूसर आदि से निकाला हुआ रस पीते हैं। ʹसुश्रुत संहिताʹ के अनुसार यंत्र (मशीन, ज्यूसर आदि) से निकाला हुआ रस भारी, दाहकारी, कब्जकारक होने के साथ ही संक्रामक कीटाणुओं से युक्त भी हो सकता है।

अविदाही कफकरो वातपित्त निवारणः।

वक्त्र प्रहलादनो वृष्यो दन्तनिष्पीडितो रसः।।

ʹसुश्रुत संहिताʹ के अनुसार दाँतों से चबाकर रस चूसने पर गन्ना दाहकारी नहीं होता और इससे दाँत मजबूत होते हैं। अतः गन्ना चूसकर खाना चाहिए।

ʹभावप्रकाश निघण्टुʹ के अनुसार गन्ना रक्तपित्त नामक व्याधि को नष्ट करने वाला, बलवर्धक, वीर्यवर्धक, कफकारक, पाक तथा रस में मधुर, स्निग्ध, भारी मूत्रवर्धक व शीतल होता है। ये सब पके हुए गन्ने के गुण हैं।

उपयोगः गन्ना नित्य प्रायः चूसते रहने से पथरी टुकड़े-टुकड़े होकर निकल जाती है।

पित्त की उल्टी होने पर एक गिलास गन्ने के रस में दो चम्मच शहद मिलाकर पिलाने से लाभ होता है।

एक कप गन्ने के रस में आधा कप अनार का रस मिलाकर सुबह-शाम पिलाने से रक्तातिसार मिटता है।

विशेषः लिवर की कमजोरी वाले, हिचकी, रक्तविकार, नेत्ररोग,  पीलिया, पित्तप्रकोप व जलीय अंश की कमी के रोगी को गन्ना चूसकर ही सेवन करना चाहिए। इसके नियमित सेवन से दुबलापन दूर होता है और पेट की गर्मी पर हृदय की जलन दूर होती है। शरीर में थकावट दूर होकर तरावट आती है। पेशाब की रूकावट में जलन भी दूर होती है।

निषेधः मधुमेह (डायबिटीज), पाचनशक्ति की मंदता, कफ व कृमि के रोगवालों को गन्ने के रस का सेवन नहीं करना चाहिए। कमजोर मसूढ़े वाले, पायरिया व दाँतों के रोगियों को गन्ना चूसकर नहीं करना चाहिए। मुख्य बातः बाजारू मशीनों द्वारा निकाले गये रस से (यदि शुद्धतापूर्वक नहीं निकाला गया है तो) संक्रामक रोग होने की संभावना रहती है। अतः गन्ने का रस निकलवाते समय शुद्धता का विशेष ध्य़ान रखें।

पायरिया

दाँतों का एक बहुत ही प्रचलित रोग है पायरिया ! यह रोग आज की सभ्यता की देन है। डब्बों में बंद खाद्य पदार्थ, शक्कर, मैदा, पालिश वाले चावलों की ओर ज्यों-ज्यों हमारा आकर्षण बढ़ रहा है त्यों-त्यों इस रोग से आक्रांत लोगों की भी संख्या बढ़ती जा रही है।

निवारणः भोजन में क्षार की मात्रा भी होनी चाहिए जो कि चोकरदार आटा, दूध, ताजे पके पल व हरी कच्ची तरकारियों में अधिक मात्रा में होता है। यदि इसका ध्यान रखा जाये तो यह रोग कभी भी होगा नहीं।

कैल्शियम की कमीः अक्सर लोग कहा करते हैं कि चीनी खाने से दाँत खराब होते हैं। यह काफी अंशों में सही बात है। गन्ने के रस से जब चीनी बनती है, तो उसमें कैल्शियम (चूने) का अंश नहीं रह जाता और चीनी कैल्शियम के साथ बिना पचती नहीं। अतः चीनी के पाचन के लिए कैल्शियम हड्डियों से खिंचकर आता है। फलतः हड्डियाँ कमजोर हो जाती है। प्रभाव तो इसका शरीर के अऩ्दर हड्डियों के सारे ढाँचे पर पड़ता है किन्तु दाँत बाहर होने के कारण उसका प्रभाव उऩ पर प्रत्यक्ष दिखायी देता है। अतः दाँत के रोग समाप्त करने हैं तो भोजन में कैल्शियम की समुचित मात्रा होनी चाहिए जो कि हरी तरकारियों जैसे की फूलगोभी, टमाटर, लौकी, गाजर, खीरा, पालक, नारंगी, तिल व दूध में अधिक मात्रा में पाया जाता है।

दाँतों की कसरतः और अँगों की तरह दाँतों की कसरत भी आवश्यक है जो कि हलवा पूरी खाने से नहीं, अपितु कच्ची तरकारियाँ खाने से अथवा दोपहर शाम मुट्ठीभर भिगोये हुए गेहूँ चबा लिया जाये तो दाँतों की पूरी कसरत हो जाये। अंकुरित गेहूँ और भी लाभप्रद हैं। अंकुरित गेहूँ में विटामिन ई भी पैदा हो जाता है कि बाँझपन, नपुँसकता, गर्भपात हो जाना, जख्म जल्दी न भरना आदि रोगों में बहुत ही लाभप्रद है। यह प्रयोग कब्ज का भी नाश करता है।

दाँतों की बीमारी के साथ-साथ जिन्हें मसूढ़ों में भी तकलीफ रहती है वे विटामिन सी प्रधान संतरा, नींबू, टमाटर, पत्तागोभी, अनानास, अंगूर आदि का भी सेवन करें।

दाँत के लिए विशेष प्रयोग

जिनका रोग बढ़ गया है उन्हें अपने मसूढ़ों पर नित्य कुछ दिन दस-पन्द्रह मिनट तक भाप लगानी चाहिए। एक लोटे में थोड़ा पानी डालकर आग पर चढ़ा दीजिये। भाप निकलने लगे तो लोटे के मुँह पर एक चिल्म उल्टी रख दीजिये। चिलम की नली से भाप निकलने पर इच्छित स्थान पर आप भाप ले सकते हैं। भाप लेने के बीच दो-तीन बार ताजा जल से एक दो कुल्ला करें। यदि चेहरे पर भाप लगे तो चिन्ता की कोई बात नहीं है।

सुबह उठते समय व रात को सोने से पहले दाँत अवश्य साफ करें।

बाजारू दवाएँ लगाकर दाँतों को निकम्मा न बनायें अपितु सेंधा नमक मिला सरसों का तेल अथवा नींबू का रस लगाना काफी होगा।

भोजन के बाद मूली, गाजर, ककड़ी, सेव, अमरूद जैसी कोई कड़ी चीज का अवश्य सेवन करें। फल व तरकारियों का क्षार दाँतों को साफ करता है। इनका कोई अंश दाँतों में रह भी जाये तो इतना जल्दी नहीं सड़ता, जितना जल्दी पकी चीज का अंश सड़ता है। इस तरह यह प्रयोग करने से पायरिया की बीमारी तो समाप्त होगी ही, साथ ही दाँतों की पीड़ा, दाँतों का हिलना, मसूढ़ों की खराबी आदि भी समाप्त हो जायेगी।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मार्च 1997, पृष्ठ संख्या 28,29,30 अंक 51

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सेवा कर निर्बन्ध की…..


पूज्यपाद संत श्री आसारामजी बापू

परब्रह्म परमात्मा को न जानना उसका नाम है अविद्या। उसे कारण शरीर भी कहते हैं। कारण शरीर से सूक्ष्म शरीर बनता है। सूक्ष्म शरीर की माँग होती है देखने की, सुनने की, चखने की। सूक्ष्म शरीर की इच्छा होती है तो फिर स्थूल शरीर धारण होता है। स्थूल शरीर के द्वारा जीव भोग की इच्छाओं को पूर्ण करना चाहता है। स्थूल शरीर से भोग भोगते-भोगते सूक्ष्म शरीर को लगता है कि इसी में सुख है और अपना जो सुखस्वरूप है उसे भूल जाता है। अविद्या के कारण ही व्यक्ति अपने असली स्वरूप को जान नहीं पाता है।

यह बहुत सूक्ष्म बात है। यह ब्रह्मविद्या है। इसको सुनने मात्र से जो पुण्य होता है, उसका बयान करने के लिए घंटों का समय चाहिए। इसे सुनकर थोड़ा-बहुत मनन करे उसका तो कल्याण होता ही है लेकिन मनन के पश्चात निदिध्यासन करके फिर उस परमात्मा में डूब जाये, परमात्मामय हो जाये तो उसके दर्शन मात्र से औरों का भी कल्याण हो जाता है। नानक जी कहते हैं-

ब्रह्मज्ञानी का दर्शन बड़भागी पावै।

भाग्यवान व्यक्ति ही ब्रह्मज्ञानी महापुरुष के दर्शन कर सकता है। अभागे को ब्रह्मज्ञानी के दर्शन भी नहीं होते हैं। थोड़े भाग्य होते हैं तो धन मिल जाता है। थोड़े ज्यादा भाग्यवान को सत्ता-पद-प्रतिष्ठा मिलती है लेकिन महाभाग्यवान को संत मिलते हैं। ʹसंतʹ का मतलब है जिनके जन्म-मरण का अंत हो गया है, जिनकी अविद्या का अंत हो गया है, जिनकी आत्मा-परमात्मा की दूरी का अंत हो गया है। ऐसे संतों के लिए तुलसी दास जी ने कहा हैः

पुण्य पुंज बिनु मिलहिं न संता।

जब व्यक्ति के पुण्यों का पुंज, पुण्यों का खजाना भर जाता है तब उसे संत मिलते हैं और जब संत मिलते हैं तब भगवान मिलते हैं। भगवान की कृपा से, पुण्यों के प्रभाव के कारण संत मिलते हैं और संतों की कृपा से भगवान मिलते हैं। जब दोनों की कृपा होती है तब आत्म-साक्षात्कार होता है।

ईश कृपा बिन गुरु नहीं, गुरु बिना नहीं ज्ञान।

ज्ञान बिना आत्मा नहीं, गावहिं वेद पुरान।।

ईश्वर की कृपा के बिना गुरु नहीं मिलते और गुरु की कृपा के बिना ज्ञान नहीं मिलता।

गुरु का मतलब यह नहीं कि थोड़ा त्राटक आदि कर लिया, थोड़ी बहु बोलने की कला सीख ली, थोड़े बहुत भजन-कीर्तन, किस्से-कहानियाँ, कथा-प्रसंगों से लोगों को प्रभावित कर दिया और बन गये गुरु।

गोपो वीज्जी टोपो घिस्की वेठो गादीय ते।

गोपा टोपा पहन कर गादी पर बैठ गया और गुरु बनकर कान में फूँक मार दिया, मंत्र दे दिया, माला पकड़ा दी। आज कल तो ऐसे गुरुओं का बाहुल्य है।

विवेकानंद कहते थेः “गुरु बनना माने शिष्यों के कर्मों के सिर पर लेना, शिष्यों की  जिम्मेदारी लेना। यह कोई बच्चों का खेल नहीं है। आजकल जो गुरु बनने के चक्कर में पड़ गये हैं वे लोग ऐसे हैं जैसे कंगला आदमी प्रत्येक  व्यक्ति को हजार सुवर्णमुद्रा दान करने का दावा करता है। ऐसे लेभागु गुरुओं के लिए कबीर जी ने कहा हैः

गुरु लोभी शिष्य लालची, दोनों खेले दाँव।

दोनों डूबे बाँवरे चढ़ी पत्थर की नाव।।

एक राजा था। उसका कुछ विवेक जगा था तो वह अपने कल्याण के लिए कथा-वार्ताएँ सुनता रहता था पर उसके गुरु ऐसे ही थे। राजा को उनकी कथाओं में कोई तसल्ली नहीं मिली, चित्त को शांति नहीं मिली।

आखिर वह राजा कबीर जी के पास आया। उसने कहाः “महाराज ! मैंने बहुत कथाएँ सुनी हैं लेकिन आज तक मेरे चित्त को चैन नहीं मिला है।”

कबीरजी ने कहाः “अच्छा ! मैं कल राज-दरबार में आऊँगा। तुम अठारह साल से कथा सुनते हो और शांति नहीं मिली ? कौन तुम्हें कथा सुनाते हैं वह मैं देखूँगा।”

दूसरे दिन कबीर जी राज-दरबार में गये। उन्होंने राजा से कहाः “जिनसे ज्ञान लेना होता है, जिनसे शांति की अपेक्षा रखते हो उनके कहने में चलना पड़ता है।”

राजा ने कहाः “महाराज ! मैं आपके चरणों का दास हूँ। आपके कहने में चलूँगा। आप मुझे शांतिदान दें।”

कबीर जी ने कहाः “मेरे कहने में चलते हो तो वजीरों से कह दो कि कबीर जी कहें वैसा ही करना।”

राजा ने वजीरों से कहाः “अब मैं राजा नहीं हूँ, ये कबीर जी महाराज ही राजा हैं। उन्हें सिंहासन पर बिठा दो।”

कबीर जी राजा के सिंहासन पर विराजमान हो गये। फिर कबीर जी ने कहाः “अच्छा, वजीरों को मैं हुक्म करता हूँ कि जो पंडित तुम्हें कथा सुनाते हैं, उनको एक खम्भे से बाँध दो।”

राजा ने कहाः “भाई ! उनको महाराज जी के आगे खम्भे के साथ बाँध दो।”

पंडित जी को एक खम्भे के साथ बाँध दिया गया। फिर कबीर जी ने कहाः “राजा को भी दूसरे खम्भे से बाँध दो।” वजीर थोड़ा हिचकिचाए किन्तु राजा का संकेत पाकर उन्हें भी बाँध दिया। इस तरह पंडित जी और राजा दोनों बँध गये। अब कबीर जी ने पंडित से कहाः “देखो पंडित जी ! राजा कई वर्षों से तुम्हारी सेवा करता है, तुम्हें प्रणाम करता है, तुम्हारा शिष्य है, वह बँधा हुआ है उसे छुड़ाओ।”

पंडित ने कहाः “मैं राजा को कैसे छुड़ाऊँ ? मैं खुद बँधा हुआ हूँ।”

तब कबीर जी ने कहाः

बन्धे को बन्धा मिले छूटे कौन उपाय।

सेवा कर निर्बन्ध की जो पल में देत छुड़ाय।।

जो खुद स्थूल शरीर में बँधा है, विचारों में बँधा है, कल्पनाओं में बँधा है ऐसे कथाकारों को, पंडितों को हजारों वर्ष सुनते रहो फिर भी कुछ काम नहीं होगा। उससे चित्त को शांति, चैन, आनंद, आत्मिक सुख नहीं मिलेगा।

सेवा कर निर्बन्ध की जो पल में देत छुड़ाय।

निर्बन्ध की सेवा से, निर्बन्ध की कृपा से अज्ञान मिटता है और आत्मज्ञान का प्रकाश मिलता है। सच्ची शांति और आत्मिक सुख का अनुभव होता है।

मनुष्य अविद्या के कारण किसी कल्पना में, किसी मान्यता में, किसी धारणा में बँधा हुआ होता है। पहले वह तमस में, आसुरी भाव में बँध जाता है। आसुरी भाव निकलता है तो राजस भाव में बँध जाता है। धन तो बैंक में होता है और मनुष्य मानता है ʹमैं धनवान।ʹ पुत्र तो कहीं घूम रहे हैं और मानता है ʹमैं पुत्रवान।ʹ फिर ʹमैं त्यागी…. मैं तपस्वी… मैं भोगी…. मैं रोगी… मैं सिंधी… मैं गुजराती…ʹ इससे मनुष्य बँध जाता है। उससे थोड़ा आगे निकलता है तो ʹमैं कुछ नहीं मानता… जात पाँत में नहीं मानता…. मैं किसी पंथ में नहीं मानता।ʹ इस तरह ʹन मानने वालेʹ में बँध जाता है।

ऐसा जीव न जाने किस गली से निकलकर किस गली में फँस जाता है ! किस भाव से छूटकर किस भाव में बँध जाता है ! लेकिन जब जीव को, मनुष्य को निर्बन्ध पुरुष, सदगुरु मिल जाते हैं तो वह उनकी कृपा से सब बँधनों से मुक्त हो जाता है, उसकी अविद्या दूर हो जाती है और वह ज्ञानस्वरूप परमात्मा में प्रतिष्ठित हो जाता है। वह ब्रह्मवेत्ता हो जाता है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मार्च 1997, पृष्ठ संख्या 15,16,23 अंक 51

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नियम में निष्ठा


पूज्यपाद संत श्री आसारामजी बापू

केवल मनुष्य ही एक ऐसा प्राणी है जो उन्नति कर सकता है। मगर सावधान नहीं रहा तो अवनत भी हो सकता है। या तो उसका उत्थान होता है या पतन होता है, वहीं का वहीं नहीं रहता। अगर मनुष्य उन्नति के कुछ नियम जान ले और निष्ठापूर्वक उसमें लगा रहे तो पतन से बच जायेगा और अपने कल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ता जायेगा। आध्यात्मिक पतन न हो, इसलिए हर रोज कम-से-कम भगवन्नाम जप की दस माला करनी ही चाहिए।

दूसरी बात त्रिबन्ध प्राणायाम करने चाहिए। इससे माला में एकाग्रता बढ़ेगी और जप करने में भी आनंद आयेगा।

माला आसन पर बैठकर ही करनी चाहिए जिससे मंत्रजाप से उत्पन्न होने वाली विद्युतशक्ति जमीन में न चली जाये। अर्थिंग मिलने से तुम्हारी साधना का प्रभाव वहीं क्षीण हो जाता है।

यदि आसन पर बैठकर जप करते हो और अर्थिंग नहीं होने देते हो तो भजन के बल से एक आध्यात्मिक विद्युत के कण पैदा होते हैं जो तुम्हारे शरीर के वात, पित्त और कफ के दोषों को क्षीण करके स्वास्थ्य की रक्षा करते हैं। यही कारण है कि हमारे ऋषि मुनि प्रायः ज्यादा बीमार नहीं पड़ते थे।

नियम में अडिग रहने से अपना बल बढ़ता है जिससे हम अपने जीवन की बुरी आदतों को मिटा सकते हैं। जैसे, कइयों को आदत होती है ज्यादा बोलने की। उस बेचारे को पता ही नहीं होता है कि ज्यादा बोलने से उसकी कितनी शक्ति नष्ट होती है। वाणी का व्यय नहीं करना चाहिए। गुजराती में कहा गया है कि न बोलने में नौ गुण होते हैं। ʹन बोलवामां नव गुण।ʹ कम बोलने से या नहीं बोलने से ये लाभ हैं- झूठ बोलने से बचेंगे, निंदा करने से बचेंगे, राग-द्वेष से बचेंगे, ईर्ष्या से बचेंगे, क्रोध और अशांति से बचेंगे, कलह से बचेंगे और वाणीक्षय के दोष से बचेंगे। इस प्रकार छोटे-मोटे नौ लाभ होते हैं।

अधिक बोलने की आदत साधक को बहुत हानि पहुँचाती है। साधक से बड़े-में-बड़ी गलती यह होती है कि यदि कुछ शक्ति आ जाती है या कुछ अनुभव होते हैं तो उसका उपयोग करने लगता है, दूसरों को बता देता है। उससे वह  एकदम गिर जाता है। फिर वह अवस्था लाने में बहुत मेहनत करनी पड़ती है। इसलिए साधकों को अपना अनुभव किसी को नहीं कहना चाहिए। अगर साधक किसी को ईश्वर की ओर मोड़ने में सहयोगी होता हो, अपने अनुभव से उसकी श्रद्धा में असर होता हो तो फिर थोड़ा-बहुत ऊपर-ऊपर से बता देना चाहिए किन्तु पूरा नहीं बताना चाहिए।

जिस तरह वाणी पर संयम लाया जा सकता है और बुरी आदतें भी मिटायी जा सकती हैं उसी तरह यदि ज्यादा खाने का, काम विकार का या शराब आदि का दोष है तो उसे भी दूर किया जा सकता है।

जब कामुकता जग रही हो तो उससे होने वाली हानियों पर नजर डालनी चाहिए व संयम से होने वाले लाभ पर दृष्टि डालनी चाहिए। मन को समझाना चाहिए किः ʹशरीर में है क्या ? दो आड़ी हड्डियाँ और दो खड़ी हड्डियाँ, मांस, मल-मूत्र, रक्त और ऊपर से चमड़े का कवर। फइर यह हाड़-मांस का शरीर उस परम सुंदर चैतन्य के कारण सुंदर लगता है। तू उसी चैतन्य से प्रेम कर, अपने आत्मा में आ। हे मेरे प्रभु ! अब मैं विकारों में नहीं गिरूँगा, काम में नहीं गिरूँगा वरन् मैं तो तेरे शुद्ध चैतन्यस्वरूप में, राम में रहूँगा….. ૐ…. ૐ…..ૐ…..

इस तरह एक सप्ताह तक का नियम ले लिया काम-विकार में न गिरने का और सप्ताह पूरा होने के पहले ही दूसरा सप्ताह बढ़ा दिया।

अपने मस्तिष्क में दिव्य विचार भरना और पोसना नितांत आवश्यक है। डण्डे के बल से या पुचकार से बन्दर, शेर आदि पशुओं को भी वश किया जा सकता है। इसी तरह अपने मन को कभी कठोर प्रतिज्ञा तो कभी पुचकार से वश में करने के संस्कार रोज डालते रहो।

लोभ के विचार आने पर विचारों किः ʹआखिर में कौन अपने साथ क्या ले गया ?ʹ

क्या करिये क्या जोड़िये थोड़े जीवन काज। छोड़ि छोड़ि सब जात है, देह गेह धन राज।।

जो लोभ के दलदल में फँसे, उन्होंने आनंद, शांति, माधुर्य खोया। अतः लोभ से बचने के लिए दान-पुण्य आदि सत्कर्म करो। औदार्य-सुख पाने में मन को लगाओ।

छोटी-छोटी बातों में भय सताता हो तो प्रातःकाल सूर्योदय से पूर्व उठकर शान्त मन से चिन्तन करो कि ʹनिर्भय नारायण मेरे साथ हैं। अब मैं जरा-जरा बात में भयभीत न होऊँगा। पाप से दुश्चारित्र्य से भय कर, लेकिन हे मेरे मन ! अच्छे रास्ते पर चलने में भय किस बात का ? ૐ….. ૐ…… ૐ…. मैं निर्भय हूँ। ૐ……ૐ……ૐ….. मैं निर्भय नारायण का अंग हूँ।ʹ ये विचार बार-बार मन में भरो।

ʹचटोरेपन, स्वादलोलुपता की आदत अकारण रोग लाती है, स्वास्थ्य बिगाड़ती है और आयुष्य क्षीण करती है। जो जिह्वा एक दिन जल जाने वाली है, उसके पीछे में अपना जीवन क्यों नष्ट करूँ ? अब मैं स्वादलोलुपता से बचूँगा। अब मैं कम नमक-मिर्च-मसालेवाला सादा सात्त्विक भोजन ही करूँगा। स्वस्थ रहूँगा व दीर्घजीवी होऊँगा। चटोरेपन का शिकार होकर अकाल नहीं मरूँगा।ʹ

ऐसे दिव्य विचार भरने के लिए थोड़ा समय अवश्य निकालना चाहिए, अन्यथा पुरानी आदतें साधन-भजन में बरकत नहीं आने देंगी और अपने को असमर्थ समझकर हम दैवी लाभ से वंचित होते रहेंगे।

बीड़ी-सिगरेट, गाँजा, शराब आदि के सेवन की बुरी आदतें एक दिन में नहीं आती अपितु बार-बार ऐसे प्रयोग से बुराइयाँ जीवन का अंग बन जाती हैं। ऐसे ही बुराइयों को निकालते हुए अच्छाइयों को अपनाओ तो अच्छाइयाँ भी जीवन का अंग हो जायेंगी। जो भी दुर्गुण हों, उनसे होने वाली हानियों पर नजर डालो और सदगुण के महान फायदों पर नजर डालो। केवल मंदिरों में जाने से या माला घुमाने से ही काम नहीं चलता अपितु रोज थोड़े दुर्गुण हटाते जाओ और थोड़े सदगुण भरते जाओ। इससे आप शान्ति, प्रसन्नता, संतोष, आरोग्यता, उत्साह आदि सदगुणों के धनी बन जाओगे।

जैसे खेत में निंदाई-गुड़ाई करते हैं, वैसे ही मन रूपी खेत में हल्के विचार निकाल कर दिव्य विचार भरने का रोज  अभ्यास करो। मस्तिष्क की तिजौरी में जितने दिव्य विचार भरते जाओगे, दृढ़, बनाते जाओगे, उतने ही सच्चे अर्थों में आप धनवान बनते जाओगे। वास्तव में तुम ईश्वर की सनातन संतान हो। बुरी आदतों में फँस मरने के लिए तुम्हारा जन्म नहीं हुआ है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मार्च 1997, पृष्ठ संख्या 13,14, 25 अंक 51

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