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पूर्ण जीवन के तीन सूत्र


प्रशान्ति-निर्भयता-ब्रह्मचर्यव्रत

पूज्यपाद संत श्री आसारामजी बापू

नानक जी ने कहा हैः

पूरा प्रभु आराधिया पूरा जा का नाँव।

नानक पूरा पाइया, पूरे के गुन गाँव।।

जब तक पूरे प्रभु का ज्ञान नहीं मिलता, पूरे प्रभु की आराधना नहीं होती, ʹपूरे प्रभु के साथ अपना नित्य संबंध हैʹ ऐसा अनुभव नहीं होता तब तक अपूर्ण प्रकृति में, अपूर्ण परिस्थिति में, अपूर्ण वस्तुओं में, अपूर्ण देश में, अपूर्ण काल में जीव बेचारा अपूर्ण-सा ही रह जाता है।

कितनी ऊँची बात कह दी है नानक जी ने !

पूरा प्रभु आराधिया……

कोई मुहल्ले का नेता होता है तो कोई गाँव का होता है, कोई तहसील का नेता होता है तो कोई जिले का नेता होता है, कोई प्रांत का नेता होता है तो कोई देश भर का नेता होता है लेकिन जो अनंत ब्रह्माण्डों का आधार है उसको आराधें तो अनंत ब्रह्माण्डनायक का सुख मिल जायेगा, कल्याण हो जायेगा। यह सत्य है कि आप यदि पूरे के गुण गायेंगे तो पूरे का ज्ञान पायेंगे। पूरे का चिन्तन करेंगे तो हमारा मन भी पूर्ण सुखी, आनंदित होगा और पूर्ण उपलब्धि करेगा।

आप ध्यान रखें कि जब प्रकृति पूर्ण नहीं है तो प्रकृति की चीजें पूर्ण सुख कैसे दे सकती हैं ? प्रकृति में जो प्राप्त किया है वह पूर्ण कैसे हो सकता है ? प्रधानमंत्री का पद मिल जाये चाहे राष्ट्रपति हो जायें फिर भी भय तो बना ही रहता है। अरे ! चाहे इन्द्र का पद मिल जाये फिर भी खटका तो बना ही रहेगा क्योंकि ये सब छूटने वाले हैं, अपूर्ण हैं।

पूरे की आराधना करनी हो तो क्या करना चाहिए ? किस तरीके से आम आदमी उस पूरे प्रभु की आराधना करे ? इसके लिए भगवान कहते हैं-

प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थितः।

मनः संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्परः।।

ʹजिसका अन्तःकरण शांत है, जो भयरहित है और जो ब्रह्मचर्यव्रत में स्थित है, ऐसा सावधान योगी मन का संयम करके, मुझमें चित्त लगाता हुआ, मेरे परायण होकर स्थित होवे।ʹ (गीताः 6.14)

भगवान जब ʹमेरे परायण होʹ या ʹमुझे पा लेʹ – ऐसा बोलते हैं तब यह नहीं समझना चाहिए कि अर्जन के रथ पर बैठे हुए श्रीकृष्ण को पा लें। उन श्रीकृष्ण को तो शकुनि और दुर्योधन ने कई बार देखा था  लेकिन इससे क्या ? ʹमुझको पा लेʹ का तात्पर्य यह समझना चाहिए कि जहाँ से तुम्हारा ʹमैंʹ उठता है उसमें विश्रान्ति पाने का, उसको अपना स्वरूप जानने का इशारा भगवान कर रहे हैं। वही पूर्ण है।

जैसे घटाकाश महाकाश से अभिन्न है, बिन्दु सिन्धु से अभिन्न है, लहर सागर से अभिन्न है ऐसे ही जीवात्मा परब्रह्म परमात्मा से अभिन्न है। उस परब्रह्म परमात्मा की जो आराधना करता है, ज्ञान पाकर चिंतन मनन करता है, वह उसीमय हो जाता है। उसी पूर्ण में पूर्णाकार हो जाता है।

यहाँ पर तीन बातें आयी हैं- प्रशान्तात्मा। विगत भीः। ब्रह्मचारिव्रते स्थितः। अर्थात् प्रशान्ति, निर्भयता और ब्रह्मचर्यव्रत। इस प्रकार बुद्धि, मन और शरीर को ध्यान के योग्य, पूरे प्रभु को पाने के योग्य बनाने की व्यवस्था का वर्णन किया है भगवान ने।

अशान्ति क्यों होती है ? राग-द्वेष से। राग-द्वेष मिटने पर शांति स्वतः प्रगट होने लगती है। अरे ! प्रकट क्या होगी ? आपका मूल स्वरूप शांति ही तो है। राग-द्वेष होता क्यों है ? जगत की वस्तुओं से सुख लेने की बेवकूफी से। राग-द्वेष से अन्तःकरण मलिन होता है और मलिन अन्तःकरण में अशान्ति होती है। राग-द्वेष जितना कम होता जायेगा, उतना अंतःकरण शुद्ध होता जायेगा और जितनी राग-द्वेष कम, जितना अंतःकरण शुद्ध, उतना वह प्रशान्तचित्त होता जायेगा और जितनी शांति उतना सामर्थ्य, उतनी योग्यताएँ निखरती जायेंगी।

दूसरी बात है ब्रह्मचर्यव्रत में स्थिति। ब्रह्मचारी का अर्थ यह नहीं कि जो लंगोटी लगाकर बैठा है या जिसने शादी नहीं की है। ऐसे अविवाहित तो कई होते हैं किन्तु सच्चा ब्रह्मचारी तो कोई विरला ही होता है। ब्रह्मचारी का व्रत क्या है ? पाँच विषयों से आकर्षित न होकर, अपने गुरुकुल में विद्याध्ययन करने के लिए तीन गुण और भी ले आता है, मान, बड़ाई और शरीर के आराम से अपने को बचाना।

ब्रह्मचारी देखता तो है लेकिन फिल्म आदि देखकर विषयों का मजा नहीं लेता बल्कि अपनी पुस्तकों को पढ़ता है, अपने सेवाकार्य को देखता है। सुनता है तो ज्ञान पाने के विषयों को ही सुनता है, फालतू का नहीं सुनता। खाता है तो शरीर को क्रियाशील रखने के लिए, ऐश करने के लिए गुरुकुल में नहीं खाता। सूँघता है तो भगवान का प्रसाद-फूल सूँघता है, परफ्यूम आदि के चक्कर में नहीं पड़ता।

शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध – ये पाँच विषय हैं। इनमें ब्रह्मचारी फँसता नहीं है अपितु पाँचों इन्द्रियों को संयत करके अपने को विद्याध्ययन के योग्य बनाता है। गुरुकुल में वह मान की इच्छा भी नहीं रखता, बड़ाई की इच्छा भी नहीं रखता और आराम-पसंदगी भी नहीं रखता तभी वह ब्रह्मचारी कहलाता है। जो पूरे प्रभु को पाना चाहता है उसे भी ब्रह्मचर्य के व्रत में स्थित होना चाहिए।

ब्रह्मचर्य व्रत में स्थित होने वाले व्यक्ति को पूरे प्रभु को पाने में सुगमता होती है और पूरे प्रभु को पाने के बाद अपूर्ण वस्तु का कोई आकर्षण या कोई भय नहीं रहता है।

कभी न छूटे पिण्ड दुःखों से।

जिसे ब्रह्म का ज्ञान नहीं।।

जब तक पूरे की आराधना नहीं की तब तक चाहे कैसा भी शरीर बन जाये लेकिन कोई-न-कोई दुःख, मुसीबत और मौत तो पीछे लगी ही रहेगी। साधक को चाहिए कि प्रभु की आराधना करते वक्त, ध्यान, भजन करते मन इधर-उधर चला जाये, भूतकाल की घटना या भविष्य की कल्पना में चला जाये तो उस समय ऊँचे स्वर से भगवान का नामोच्चारण शुरु कर दे अथवा गहरे श्वासोच्छवास ले और मन से कहेः “ऐ मेरे मन ! भूतकाल तो बीत गया, अब वह वापस आने वाला नहीं है। उसका क्या चिंतन करता है ? भविष्य भी अपने सामने नहीं है तो भविष्य की कल्पना क्या करना ? अभी तो वर्त्तमान में अपना काम कर। जैसे –विद्यार्थी वर्त्तमान की (जिसकी परीक्षा देनी है उसकी) पुस्तकें पढ़ता है ऐसे ही अभी तो हमें परमात्मा को पाने के लिए ध्यान करना है, परमात्मशांति में शांत होना है। परमात्मा के माधुर्य में मधुर होना है। क्यों तू इधर-उधर जाता है ? रे मन !”

थोड़ी देर मन शांत हो न हो, फिर इधर-उधर भटकेगा। पुनः उसे नाम जप में लगाने का प्रयास करें। जैसे विद्यार्थी का मन इधर-उधर जाता है फिर भी वह उसे प्रयत्नपूर्वक पाठ्य-पुस्तकों में लगाता है वैसे ही भगवद्-ध्यान, भगवद्-भजन के समय मन इधर-उधर जाये तो उसे भी प्रयत्नपूर्वक परमात्मा में लगाना चाहिए। बार-बार अनात्मा से हटाकर मन को आत्मा में लगाना चाहिए। यदि मन भूत-भविष्य में जाता हो तो ध्यान-योग का अभ्यास करने वाले साधकों को सावधान रहना चाहिए।

मन पर निगरानी रखने के साथ ही साथ व्यवहार पर नियंत्रण होना भी अति आवश्यक है। कई लोग ध्यान-भजन तो करते हैं किन्तु जो आया सो खा लिया, जो आया सो बोल दिया, जैसा जी में आया वैसा कर लिया…. नहीं, अपने ध्यान-भजन क समय का ख्याल करके व्यवहार करके व्यवहार करना चाहिए और व्यवहार काल में भी चित्त अशुद्ध न हो इसका ध्यान रखना चाहिए। जो इस प्रकार व्यवहार काल में भी अपने चित्त की शुद्धि का ख्याल रखता है उसका चित्त भगवान में जल्दी लगता है। शरीर एवं वस्तुओं को ʹमैं-मेराʹ मानने से भय होता है कि ʹवस्तुएँ चली न जाये….ʹ लेकिन ये शरीररूपी बुलबुले तो हजारों-लाखों बार मिले और मिट गये। इनका भय न रखें। ʹजो हो गया देख लिया, जो हो रहा है देख रहे हैं और जो होगा देखा जायेगा…. ऐ मेरे मन ! अभी तो तू भगवान के चिंतन में लग।ʹ इस प्रकार भगवान के चिंतन में लगने से अंतःकरण चैतन्य के आनंद से, चैतन्य के माधुर्य से, चैतन्य के ज्ञान से और चैतन्य की शांति से सराबोर हो उठेगा।

दो प्रकार की माताएँ होती हैं- एक निषेधायुक्ति से समझाती हैं और दूसरी विधियुक्ति से समझाती है। बालक खिलौने का आम चूसता है तो एक माँ उस खिलौने का आम छुड़ाने के लिए डाँटती है। डाँट से डरकर बालक आम तो छोड़ देता है लेकिन मन से आम का आकर्षण नहीं छूटता। जैसे ही माँ चली जाती है, बालक धीरे-से खिलौने का आम चूसने लग जाता है। दूसरी माँ असली आम को धोकर उसका थोड़ा सा रस उसे चटा देती है, आम चूसने के लिए दे देती है। जब बालक को असली आम का स्वाद आ जाता है तो वह खिलौने का आम अपने-आप छोड़ देता है।

ʹयह नहीं करो… वह नहीं करो…. ऐसा करोगे तो पाप होगा… नरकों में जाओगे…ʹ ऐसा करके समझाने… की रीति है निषेध युक्ति। कोई महापुरुष मिल जायें और ध्यान-भजन कराते-कराते, भगवदरस का स्वाद चखा दें तो हमारा मनरूपी बच्चा भगवान के स्वाद में लग जाता है। यह है विधि युक्ति। जब असली आम का स्वाद आ जाये तो खिलौने के आम को कोई कब तक चाटेगा ? ऐसे ही जब ध्यान-भजन करके असली भक्ति का सुख मिल गया तो फिर विकारी सुखों में मन जायेगा नहीं…. और कभी –कभार पुरानी आदत से गया भी तो सावधान हो जायेगा।

सुन्दर सदगुरु है सही, सुंदर शिक्षा दीन्ह।

सुंदर वचन सुनाय के, सुंदर सुंदर कीन्ह।।

सदगुरु का जो अनुभव है वह सुन्दर है। सत्य स्वरूप ईश्वर का अनुभव करने वाले जो महापुरुष हैं, उनके वचन सुन्दर हैं।

अतः अपने परम सौंदर्य परमात्मस्वरूप को पाने के लिए शांत बनो। ब्रह्मचर्य का आश्रय लेकर परम निर्भय बनो परमात्म-प्राप्ति की बाजी तुम्हारे हाथ में है।

दृढ़ता से चलो। लड़खड़ाते दीन-हीन होकर मजदूर की नाईं संसार का बोझा नहीं उठाओ वरन् अपने आत्मवैभव को पाओ।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, दिसम्बर 2012, पृष्ठ संख्या 11,12,13 अंक 48

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मौत के मुख से सकुशल वापसी


आज तक तो साधकों के मुख से सुना ही था कि श्रीआसारामायण का पाठ करने वाले साधकों की रक्षा स्वयं पूज्य श्री ही करते हैं परन्तु गत दिनों मेरे जीवन में भी ऐसा प्रसंग आया कि उन अनुभवसंपन्न साधकों में मैं भी शरीक हो गया। घटना 17 सितम्बर 1996 की है। मैं दिल्ली से करीब 1.30 बजे दिन को हरियाणा रोडवेज की बस से जयपुर के लिए रवाना हुआ। जैसे ही बस दिल्ली से बाहर निकली, मैंने श्री आसारामायण का पाठ आरंभ किया लेकिन कितनी ही बार पाठ बीच-बीच में खण्डित होने लगा। एक ओर जैसे कोई मुझे पाठ करने में विघ्न पैदा कर रहा था तो मानों दूसरी और कोई मुझसे पाठ सतत कराने की प्रेरणाशक्ति का संचार कर रहा था। यह सब क्या हो रहा था ? मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा था। जैसे ही पाठ पूर्ण हुआ, मैं निश्चिन्त हो खिड़की के सहारे टिककर सोने की कोशिश कर रहा था कि यकायक मैं जिस ओर बैठा था उस ओर की सभी खिड़कियों के शीशे टूटने शुरु हो गये और बस जो कि 60-70 कि.मी. की गति से भाग रही थी, संतुलन बिगड़ जाने से सड़क के नीचे उतर गई और लगा कि बस अब पलटने वाली ही है। बस में कोहराम मच गया। सभी यात्रियों ने अपनी जान बचाने के लिए अगली सीट के पाईप पकड़ रखे थे। बस के असंतुलन की दशा को देख ऐसा लग रहा था, जैसे सभी मौत के मुख में प्रवेश कर चुके हैं।

यद्यपि बस में सर्वत्र जोर-जोर से चीखें आ रही थीं, किन्तु मेरे मुख से स्वाभाविक ही ʹगुरुदेव… गुरुदेव….ʹ निकलने लग गया। मानो मेरे भीतर से कोई इस संकट की घड़ी से उबारने के लिए गुरुदेव को पुकार रहा था। मैंने देखा कि सामने एक बबूल का बड़ा पेड़ है और बस उससे टकराकर चकनाचूर होने ही वाली है। मैंने आँखें बन्द कर लीं और हृदयपूर्वक पूज्यश्री को पुनः पुकारा। बस, फिर तो मानो चमत्कार हो गया ! श्री आसारामायण की इन पावन पंक्तियों का प्रत्यक्ष अनुभव हो गया।

सभी शिष्य रक्षा पाते हैं।

सूक्ष्म शरीर गुरु आते हैं।।

धर्म कामार्थ मोक्ष वे पाते।

आपद रोगों से बच जाते।।

मैं क्या देखता हूँ कि बस उसी क्षण बबूल के पेड़ के पास खड्डे में धंस जाने से रुक गई और मुझे तो क्या, बस में सवार किसी भी यात्री का बाल भी बाँका नहीं हुआ। सभी यात्रियों को पूज्यश्री की असीम अनुकंपा से एक नया जीवन मिल गया। मुझे आज पता चला कि किस तरह हृदयपूर्वक पुकारने से गुरुदेव सूक्ष्म शरीर से आकर शिष्यों की तो क्या, सभी की रक्षा करते हैं। हम भले ही गुरुदेव को शिष्य-अशिष्य की परिधि में अपनी मानवीय बुद्धि से बाँधें लेकिन वे तो पूरे विश्व के गुरु हैं। सचमुच, पूरी मानव जाति पूज्यश्री को पाकर कृतार्थ हो चुकी है।

महेन्द्रपाल गौरी, डिप्टी मैनेजर एच.एम.टी.लि. अजमेर (राजस्थान)

स्रोतः ऋषि प्रसाद, दिसम्बर 1996, पृष्ठ संख्या 20, अंक 48

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भगवत्प्राप्ति की लालसा और व्यवहार में असंगता


पूज्यपाद संत श्री आसारामजी बापू

भगवत्प्राप्ति के बिना जीवन व्यर्थ है क्योंकि जिस शरीर को खिलाया-पिलाया, जिन इन्द्रियों को चखाया, सुँघाया, सुनाया-वे सब एक दिन जल जाने वाली हैं। शरीर एवं इन्द्रियों के भोगों को भोगते-भोगते तो कई भोगी मर गये, कई जिन्दगियाँ  पूरी हो गयीं, कई सदियाँ बीत गयीं किन्तु भोगों से पूर्ण तृप्ति किसी को भी कहाँ मिली ?

आरंभ में तो भोग अमृत जैसे सुखदायी लगते हैं किन्तु अन्त में उनका परिणाम विष से भी बदतर होता है। विष तो केवल एक बार मारता है लेकिन विकारों का, भोगों का विष तो चौरासी लाख जन्मों तक मारता रहता है। शरीर जरूर बूढ़ा हो जाता है किन्तु वासना कभी बूढ़ी नहीं होती।

विवेक के बिना वासना निवृत्त नहीं होती और बिना सत्संग के विवेक नहीं आता और बिना भगवत्कृपा के सत्संग नहीं मिलता। इसलिए जीवन में भगवत्प्राप्ति की दिशा में प्रथम सोपान है विवेक। किस्से कहानियाँ तो मिल जाती हैं लेकिन सत्य का संग कराने वाला, सत्यस्वरूप ईश्वर में विश्रान्ति दिलाने वाला सत्संग नहीं मिलता।

सब दुःखों की निवृत्ति और परम शान्ति की प्राप्ति-इसी का नाम है मुक्ति। सभी मुक्ति चाहते हैं, बँधन कोई नहीं चाहता। जैसे – चिड़िया व तोता बँधन नहीं चाहते वैसे ही तुम भी बँधन नहीं चाहते क्योंकि तुम्हारा मूल स्वभाव ही निर्बंध है। स्वभाव तो निर्बंध है लेकिन अविद्या के संस्कार से हम बँधन की आदत में पड़ जाते हैं।

तोते को प्रारम्भ में जब कैद किया जाता है तो उसे अच्छा नहीं लगता। किन्तु पिंजरे में रहते-रहते उसे कैद में रहने की आदत पड़ जाती है। जब एक बार उसे पिंजरे से मुक्त कर दिया जाये और वह उड़कर गगनगामी हो जाये तो फिर वह पुनः पिंजरे में नहीं आता।

जब तक तोता पिंजरे में है तब तक तो बँधन है ही, फिर पिंजरा चाहे लोहे का हो चाहे सोने का। लोहे का पिंजरे में पड़े तोते को देखकर सोने के पिंजरे वाला तोता भले अपने को भाग्यशाली मान ले, लेकिन है तो वह बँधन में ही। इसी प्रकार गरीब लेकिन अमीर भी बेचारा न जाने कितने-कितने बँधनों से बँधा है ! बँधन कैसा भी हो, आखिरकार वह तो पीड़ादायी ही।

पूर्ण सुख है तो केवल निर्बंधता में ही और निर्बंध होने के लिए दो बातों को समझना जरूरी हैः

निर्बंध होने की लालसा तीव्र कर लें, मुक्त होने की, शाश्वत सुखी होने की लालसा तीव्र कर लें।

व्यवहार में असंग होते जायें। असंगता का अभ्यास बढ़ाते जायें।

शाश्वत सुख हमारा स्वभाव है। क्षणिक सुख इन्द्रियों एवं विषयों की भ्रान्ति है। तुलसीदासजी ने कहाः

बिनु रघुवीर पद जिय की जरनि न जाई।

रघुवीर पद कहो या आत्मपद कह दो – उसे पाये बिना जिय की जलन नहीं जाती है। उस रघुवीर पद को पाने के लिए लालसा बढ़ाते जायें।

दूसरी बात यह है कि व्यवहार का संग अपने में थोपे नहीं। ज्यों-ज्यों व्यवहार में असंग होते जायेंगे, त्यों-त्यों भगवत्प्राप्ति में सफल होते जायेंगे। व्यवहार में असंगता आत्मविश्रान्ति देगी। व्यवहार में असंगता से विकारों एवं परिस्थितियों का प्रभाव नहीं पड़ेगा, मन और बुद्धि स्वच्छ और शांत रहेंगे। स्वच्छ और शांत मन-बुद्धि परमात्मा में विश्रान्ति पाने की सुविधा रहेगी। व्यवहार की असंता से जो चित्त की शांति मिलती है वह प्रसाद की जननी है, सच्चे सुख की जननी है, मुक्ति की जननी है।

जैसे नाविक नाव को ले जाता है और नाव नाविक को ले भागती है ऐसे ही असंगता से मन-बुद्धि को शांत होने का अवसर मिलेगा और मन-बुद्धि के शांत होने पर उनके दोष दूर होने लगेंगे। इन्द्रियगत आकर्षण, विकारों के आकर्षण दूर होने लगेंगे। यदि इऩ्द्रिय-आकर्षणों से दूर होने लगें तो फिर शांति सहज ही मिलने लगेंगी क्योंकि शांति तो हमारा स्वभाव है, मुक्ति निर्बंधता तो हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है।

भगवत्प्राप्ति की लालसा बढ़ा दें। भगवत्प्राप्ति की लालसा से की गयी भक्ति ईमानदारी की भक्ति होती है और संसार-प्राप्ति के लिए की गयी भक्ति बेईमानी की भक्ति होती है। भगवत्प्राप्ति की श्रद्धा सात्त्विक श्रद्धा होती है। भगवत्प्राप्ति के बिना की जो श्रद्धा होती है वह श्रद्धा  राजसी और तामसी श्रद्धा होती है।

तामसी श्रद्धावाला ʹअपना बिगड़े तो बिगड़े किन्तु दूसरे का भी थोड़ा बिगाड़ करो… अभिचार मंत्र से मरवाओ दूसरे को…..ʹ ऐसा सोचता है। अगर ऐसा ही होता तो जिन गुण्डों ने दूसरों की हत्या कर दी वे सुखी होने चाहिए लेकिन उनके दुःख नहीं मिटते वरन् और बढ़ जाते हैं। जैसे – शराबी लोग शराब पीते हैं दुःख मिटाने के लिए। शराब पीने से थोड़ी देर ज्ञानतंतु निस्तेज हो जाते हैं और व्यक्ति चेतना शून्य हो जाता है लेकिन बाद में उसका दुःख और दुगुना हो जाता है। इसी प्रकार सांसारिक वासनापूर्ति से तृप्ति नहीं होती। क्षणिक तृप्ति होती हुई दिखती है किन्तु फिर ज्यादा बढ़ जाती है। आत्मपद पाये बिना सदा के लिए सारे दुःख किसी के भी नहीं मिटते, सारी वासनाएँ नहीं मिटतीं।

…..और आत्मपद पाने के लिए इन दोनों बातों को ठीक से व्यवहार में ले आना चाहिएः एक तो भगवत्प्राप्ति की तीव्र लालसा और दूसरी व्यवहार में असंगता। कश्मीर में ललिता नाम की लड़की की शादी बचपन में ही हो गयी। एक दिन वह ससुराल में नदी के किनारे पर पानी भरने के लिए घड़ा माँज रही थी, तब उसकी सखियों ने कहाः

“कल तो ललिता के घर श्राद्ध है इसीलिए आज वह बात नहीं कर रही है कि कहीं खीर न खिलानी पड़े….”

ललिताः “अरे ! मैं तुम्हें क्या खीर खिलाऊँगी ? मुझे भी नहीं मिलेगी।”

सखीः “क्यों ? तुझे क्यों नहीं मिलेगी ?”

ललिताः “मेरी सासुजी जब मुझे भोजन देती है न, तब कटोरे में पत्थर रखकर फिर ऊपर भात रखकर देती है ताकि मेरे ससुर को लगे कि बहुत भात देती है। जब वह भरपेट खाना ही नहीं देती तो खीर क्या देगी ? जब मुझे ही नहीं मिलेगी तो तुम्हें कैसे खिला पाऊँगी ?”

पास में ही ललिता के ससुर जी नहा रहे थे। उन्होंने सारी बात सुन ली। ललिता घूँघट डाले थी अतः उसे अपने ससुरजी की उपस्थिति का जरा भी ख्याल नहीं था। ससुर को हुआ कि यह तो जुल्म है। नहाने के बाद जैसे ही वे घर पहुँचे, उन्होंने अपनी पत्नी को डाँटा। पत्नी ने समझा कि बहुरानी ने ससुर से मेरी शिकायत कर दी है। वह और ज्यादा चिढ़ गयी। फिर तो उसने अपने बेटे के कान भरने भी शुरु कर दिये किः ʹयह तो डायन है… ऐसी है… वैसी है….ʹ माँ की बात सुनकर अब तो ललिता का पति भी उससे डरने लगा। धीरे-धीरे ससुर भी अपनी पत्नी की बातों में ही आ गये और पहले तो केवल सास जुल्म करती थी किन्तु अब तो जुल्म करने वाले तीन हो गये। ललिता एकदम अकेली पड़ गयी। माता-पिता की ओर से भी कोई सहयोग नहीं था। किन्तु ललिता भगवान शिव एवं माँ पार्वती को अपने माता-पिता मानती थी।

जब उस पर जुल्म बढ़ते गये तो वह भगवान शिव एवं पार्वती के आगे आँसू बहाकर, अपनी व्यथा सुनाकर अपने दिल को कुछ हल्का कर लिया करती थीः “प्रभु ! मैं जैसी-तैसी हूँ किन्तु तुम्हारी हूँ। तुम्हीं मेरे माता-पिता, सास-ससुर, बंध-सखा सभी हो….ʹ वास्तव में तो सभी के सब रिश्ते नाते वे ही हैं किन्तु जो इस बात को मान लेते हैं उनका काम बन जाता है। फिर चाहे विवेक से मान लें या ललिता की तरह ठोकर खाकर मान लें लेकिन मानने में कल्याण निहित है।

धीरे-धीरे भगवान गौरीशंकर में ललिता की प्रीति बढ़ती गयी। जब वह प्रीतिपूर्वक भजने लगी तो उसे शांति एवं आनंद भी मिलने लगा और ʹजिय जरनिʹ चली जाने लगी। सासु का जुल्म अब उसके लिए वरदान बन गया। कभी-कभी कुटुंबियों की रोक-टोक भक्त के लिए वरदान का रूप भी ले लेती है। दुःख ही परम सुख के द्वार तक पहुँचने की सीढ़ी बन जाता है। इसलिए व्यवहार में चित्त की समता बनाये रखना बड़ा हितकर होता है।

अब तो ललिता को भगवान के ध्यान-भजन एवं उनसे मन ही मन बात करने का चस्का-सा लग गया। ज्यों-ज्यों भगवद-भजन में उसकी प्रीती बढ़ती गयी त्यों-त्यों उसकी सास का क्रोध भी बढ़ता गया। वह जमाना नहीं था तलाक लेने का… मैं तो कहता हूँ कि दुःख पड़ने पर तलाक लेने की जगह दुःखहारी श्रीहरि की शरण ले लेना हजारगुना अच्छा है। तलाक लेने के बाद दूसरा पति किया तो पता नहीं वह कैसा निकले ? फिर उसे भी तलाक दो, तीसरा करो…. इससे तो अच्छा है विघ्न-बाधा आयें तो भगवान की शरण चले जायें और सुख-सुविधाएँ मिलें तो उसे भी भगवान की कृपा मानकर, भगवान को धन्यवाद देते हुए भगवान की शरण स्वीकार लें।

तमेव शरणं गच्छ सर्वभावने भारत।

तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्।।

ʹहे भारत ! सब प्रकार से उस परमेश्वर की ही अनन्य शरण की प्राप्ति हो। उस परमात्मा की कृपा से ही परम शान्ति को और सनातन परम धाम को प्राप्त होगा।ʹ (श्रीमद् भगवद् गीताः 18.62)

भोग में शाश्वत सुख, शाश्वत आनंद, शाश्वत मुक्ति और शाश्वत जीवन नहीं है। भोगी का तो नश्वर जीवन है। देख देखकर या तो आँख थक जायेगी या देखने की चीज बदल जायेगी या तो देखने वाला थक जायेगा। चख चखकर या तो जीभ थक जायेगी या तो वस्तु खत्म हो जायेगी या खाने की रूचि टूट जायेगी। इसी प्रकार अन्य इन्द्रियों का भी समझना चाहिए। त्रिपुटी के मेल से, वस्तु, इन्द्रिय और मन की तदाकारता से जो सुख मिलता है वह सुखाभास है, हर्ष है। वह मनुष्य को बँधन में डालने वाला है और परमात्मा का जो सुख है, वह स्वतः सिद्ध है और नित्य स्वभाव में जगाने वाला, मुक्त करने वाला है।

इधर सास की प्रताड़ना बढ़ती गयी और उधर ललिता का भगवदभाव। एक दिन सास खूब क्रोधित हो गयी और ललिता के साथ बुरी तरह व्यवहार हुआ। अक्सर जितनी विघ्न-बाधाएँ आती हैं उतनी ही अधिक ईमानदारी से मनुष्य परमात्मा की शरण में जाता है। क्योंकि उस समय परमात्मा के प्रति सर्वस्व समर्पण होता है, उस पर पूर्णतः श्रद्धा होती है। ललिता पहुँच गयी अपने माता-पिता के पास अर्थात् भगवान शिव और माता पार्वत के चरणों में और आँसूओं की धारा बहाते हुए प्रार्थना करने लगीः “हे मेरे प्रभु ! मेरा तो कोई नहीं है। पिता तो बचपन में ही गुजर गये। माँ गरीब है और सास भी ऐसी… बिल्कुल अनाथ हूँ।

इतने में अंदर से आवाज आयीः ʹʹविश्व का नाथ जीवित है पगली ! तो तू अनाथ कैसे ?ʹʹ

“हे नाथ ! मैं तुझसे कैसे मिलूँ ?”

“मैं तेरे से दूर नहीं हूँ तो फिर तू क्या मिलेगी ? केवल जगत की लालसा छोड़ दे और मुझे पाने की लालसा बढ़ा दे। व्यवहार के संग का आग्रह छोड़ दे। तू जब पैदा हुई थी तब अकेली थी, जब मरेगी तब भी अकेली रहेगी और अभी भी अकेली बैठी है। तू अकेली होकर शांत होती जा तो मैं तुझसे दूर नहीं और तू मुझसे दूर नहीं।” इस प्रकार अन्तर्यामी की प्रेरणा से उसके दुःखी जीवन को सहारा मिल गया।

भक्तों के जीवन में कई बार इस प्रकार अन्तःप्रेरणा के अनेक शुद्ध भाव उत्पन्न होते हैं। ललिता को भी उसके अन्तर्यामी शिव प्रेरणा कर रहे थे किः “तू डर मत। चिन्ता मत कर। तू अनाथ नहीं है…”

एक रात्रि को उसी भाव में ललिता टाट का लिबास पहनकर घर से निकल पड़ी। स्त्री शरीर है अतः शरीर को देखकर किसी के मन में विकार न उठे इसलिए टाट का लिबास। चलती-चलती जहाँ सुबह में बाजार आया, वहीं एक कोने में ललिता बैठ गयी। ध्यान करते-करते कुछ योग्यता विकसित हो चुकी थी। दो ठीकरे लेकर वह भजन गाने लगी और उसकी आवाज में ऐसा माधुर्य और आकर्षण आ गया था कि भजन सुनकर लोग उसके आगे कुछ डाल जाते और उसी से वह अपना पेट भर लेती। वह गाती थी आत्मसंतोष के लिए लेकिन लोगों को संतोष मिलने लगा। ऐसा करते-करते ललिता में से लल्लेश्वरी देवी होकर भक्तों के हृदय में छा गयी। कहते हैं कि एक बार संत कबीर भी उसके दर्शन के लिए गये थे। यह आत्मदेव है ही ऐसा कि आप किसी भी भाव से उसके निकट जाओ, आपकी योग्यताओं को निखार देता है, महानता की यात्रा करा देता है।

कहाँ तो एक अनाथ कन्या ललिता, जिसे खाने के लिए भरपेट चावल भी नहीं मिलते थे और अब उसके द्वारा सैंकड़ों के पेट भरने लगे। आज भी उसके नाम की अनेक संस्थाएँ चल रही हैं।

…..तो ये दो बातें- एक तो भगवत्प्राप्ति की लालसा और दूसरी व्यवहार में असंगता। इन दोनों बातों को बढ़ाते जायें। यदि एक भी बढ़ायें तो दूसरी अपने-आप बढ़ेगी। यदि भगवत्प्राप्ति की लालसा को बढ़ायें तो व्यवहार में असंगता अपने-आप बढ़ने लगेगी और यदि व्यवहार में असंगता बढ़ाते जायेंगे तो भगवत्प्राप्ति की लालसा अपने-आप बढ़ने लगेगी। भगवान में, भगवत्प्राप्त महापुरुषों में श्रद्धा, भक्ति और प्रीति भगवत्प्राप्ति की लालसा और व्यवहार की असंगता को बढ़ाने में मदद करती है। अतः खोज लें किसी ऐसे महापुरुष को और आप भी लग जायें इन दोनों बातों में…. भगवत्प्राप्ति की लालसा और व्यवहार में असंगता बढ़ाने में….

हरि ૐ…. ૐ…. शान्ति… शान्ति…. शान्ति….

स्रोतः ऋषि प्रसाद, दिसम्बर 2012, पृष्ठ संख्या 3,4,5,6 अंक 48

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