ऋषि प्रसाद

सांसारिक, आध्यात्मिक उन्नति, उत्तम स्वास्थ्य, साँस्कृतिक शिक्षा, मोक्ष के सोपान – ऋषि प्रसाद। हरि ओम्।

क्या है यज्ञार्थ कर्म ? – पूज्य बापू जी


गीता (3.9) में भगवान कहते है- यज्ञार्थत्कर्मणओऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः। तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसङ्गः समाचर।। ‘यज्ञ (परमेश्वर, कर्तव्य-पालन) के निमित्त किये जाने वाले कर्मों से अन्यत्र कर्मों में (अर्थात् उनके अतिरिक्त दूसरे कर्मों में) लगा हुआ ही यह मनुष्य-समुदाय कर्मों से बँधता है। इसलिए हे अर्जुन ! तू आसक्ति से रहित होकर उस यज्ञ के निमित्त …

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इससे बड़ा सौभाग्य क्या हो सकता है !


भगवान ने अपना दैवी कार्य करने के लिए हम लोगों के तन को, मन  को पसंद किया यह कितना सौभाग्य है ! और ईश्वर की यह सेवा ईश्वर ने हमें सौंपीं यह कितना बड़ा भाग्य है ! समाज और ईश्वर के बीच सेतु बनने का अवसर दिया प्रभु ने, यह उसकी कितनी कृपा है ! …

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किन लोगों को शनि नहीं सताता ? – पूज्य बापू जी


पुराणों की प्रचलित कथा है। किसी को पाँच वर्ष की, किसी को साढ़े सात वर्ष की शनैश्चर की पनोती (ग्रहबाधा) लगती है। यह शनीचरी किसको लगती है और किसको नहीं लगती है यह जरा समझ लेना। एक बार शनीचरी आयी भगवान राम के पास और बोलीः “हे रघुवर ! आप मेरे से लड़िये। मैंने कइयों …

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