बस, यही समझ की भूल है
दूसरे के विषय में कोई बात जाननी हो तो जैसा लिखा होगा या जैसा कोई कहेगा वैसा मानना पड़ेगा किंतु अपने विषय में जानना हो तो स्वानुभव ही प्रमाण होगा। अतः अब सोचो कि कहीं लिखा है कि तुम दुःखी हो इसलिए अपने को दुःखी मानते हो या अपने दुःखीपने के तुम स्वयं साक्षी हो …