आत्मतेज ही सबसे बड़ा ऐश्वर्य
(पूज्य बापू जी की ज्ञानमयी अमृतवाणी) सं वर्चसा पयसा सं तनूभिरगन्महि मनसा सँ शिवेन। त्वष्टा सुदत्रो विदधातु रायोઽनुमार्ष्टु तन्वो यद्विलिष्टम्।। ʹहे त्वष्टादेव ! हम दुग्धादि (गायों का), पुत्रादि और कल्याणप्रयुक्त मन एवं तेजस्विता से संगत हों। उत्तम प्रदाता त्वष्टादेव हमें धन दें और हमारे शरीर में जो कमी हो उसे पूरी करें।ʹ (यजुर्वेदः 2.24) हमें …