ऋषि प्रसाद

सांसारिक, आध्यात्मिक उन्नति, उत्तम स्वास्थ्य, साँस्कृतिक शिक्षा, मोक्ष के सोपान – ऋषि प्रसाद। हरि ओम्।

जितनी जिम्मेदारी और तत्परता, उतना विकास – पूज्य बापू जी


सत्संग को पाने और समझने के लिए तो राजे-महाराजे राजपाट छोड़कर सिर में खाक डाल के, हाथ में झाड़ू ले के सफाई करने या बर्तन माँजने की सेवा हो तो वह भी स्वीकार करके ब्रह्मवेत्ता गुरुओं को रिझाते थे तब उनको ज्ञान मिलता था । हम भी गुरुद्वार पर बर्तन माँजने की सेवा करते थे …

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यह संस्कृति मनुष्य को कितना ऊँचा उठा सकती है !


वेद-वेदांगादि शास्त्रविद्याओं एवं 64 कलाओं का ज्ञान प्राप्त करने के बाद भगवान श्रीकृष्ण ने अपने गुरुदेव सांदीपन जी से निवेदन कियाः “गुरुदक्षिणा लीजिये ।” गुरुदेव ने मना किया तो श्रीकृष्ण ने विनम्र निवेदन करते हुए कहा कि “आप गुरुमाता से भी पूछ लीजिये ।” तब पत्नी से सलाह करके आचार्य ने कहाः “हमारा पुत्र प्रभास …

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तो तेरा जीवन रथ ठीक चलेगा – पूज्य बापू जी


एक नया-नया चेला शास्त्र पढ़ रहा था, गुरु लेटे-लेटे सुन रहे थे । गुरु गुरु थे (ब्रह्मवेत्ता सद्गुरु थे) । तन तस्बीह मन मणियों, दिल दंबूरो जिन से सुता ई सूंहनि, निंड इबादत जिन जी, तंदूं जे तलब जूं, से दहदत सुर वजनि जिनका तन माला हो गया, मन मनका हो गया और जिनका हृदय …

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