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दूध नहीं अपमान के घुंट पीकर बड़े हुए थे वे योगी (भाग-२)


कल हमने सुना था कि महाराष्ट्र के प्रसिद्ध चार आत्मज्ञानी, ब्रम्हवेत्ता नन्हे भाई बहन श्री निवृत्तिनाथ, श्री ज्ञानदेव, श्री सोपान और मुक्ता बाई। बचपन में ही अनाथ हो गए थे और गांव आलंदी से बाहर निर्जन सिद्ध दीप मे रहते थे, श्री निवृत्तिनाथ आध्यात्मिक गुरु भी थे श्री ज्ञानेश्वर महाराज के।

एक दिन उन्होंने माढ़े खाने की दिव्य इच्छा प्रकट की। दिव्य कैसे? यह आज हम जानेंगे अपने गुरु व बड़े भ्राता की प्रसन्नता के लिए ज्ञानदेव व सोपान दोनों भाई आलंदी गए, वहा मधुकरी मे भरपूर आटा मिल गया, कुम्हारिन कमला माढ़े सेकने हेतु खपरा भी देने वाली थी तभी विसोबचाट्टी विध्वंसक भूचाल बनकर आया। आटा, खपरा आदिक सब कुछ छीनकर मिट्टी मे मिला गया ऐसा विनाशकारी तांडव देखकर दोनों बालक प्रबल मानसिक संताप लिए खाली हाथ वापस सिद्ध दीप आ गए। दोनों अपने आंगन तक पहुंच गए, निवृत्ति और मुक्ता उत्सुक क़दमों से उनकी तरफ बढ़े।

ज्ञानेशा कुछ नहीं बोला, कुटिया मे प्रवेश कर उसने किवाड़ बंद कर दी भीतर से सांकल भी जड़ दी, बाहर आंगन मे सोपान ने रोते रोते सारा प्रसंग कह सुनाया। अब हम जरा साधारण स्तर पर विचार करे, सामान्यतः ऐसी स्थिति मे क्या प्रतिक्रिया होती है? भयंकर विलाप, तीव्र उफान, प्रचंड प्रतिशोध का धधकना, मुख से अपशब्दों के अंगारे उगलना और यदि ये सब ना भी हो तो घोर मानसिक हिंसा होना।

अक्सर हम और आप अपमानित होने पर ऐसी ही प्रतिक्रिया करते है लेकिन इन प्रगतिशील साधकों का क्या व्यवहार रहा? वैसे तो शस्त्रमत है श्री ज्ञानदेव जी महाराज साक्षात भगवान विष्णु के ही अवतार थे परन्तु यहां इस प्रसंग मे उन्होंने अपने भाई बहनों के संघर्ष शील साधक कैसे होते है? उसकी अभिव्यक्ति की है, सारी बात सुनते ही श्री निवृत्ति तुरंत सक्रिय हुए सोपान के मस्तक पर हाथ रखा और कहा धैर्य… धैर्य धरो सोपान, मुक्ता जा इसके लिए शीतल जल ले आ, मुक्ता मिट्टी के कुल्हड़ मे से जल ले आयी, सोपान गटागट पी गए परन्तु तब भी उसकी हिचकियां बंद नहीं हुई, आवाज़ सूबकियो के फंदे मे अब भी फंसी थी सोपान ने अपनी विवशता व्यक्त की। निवृत्ति दादा, धैर्य नहीं बंध रहा क्या करू? श्री निवृत्ति तुरंत बोले ध्यान करो, परम चेतना का चिंतन करो, साधना मे लीन हो जाओ।

सोपान ने एक पल का भी विलंब नहीं किया, वह एक कदम उठा और श्री निवृत्ति को प्रणाम कर बरगद पर बनी छांव शीला पर जा बैठा और पद्मासन लगाया और उच्च स्वर मे उच्चारण करने लगा ॐॐॐॐ……… ॐ धुन धीरे धीरे मध्यम हुई और फिर मौन हो गई, सोपान अन्तर्जगत की गहराइयों मे पेठता चला गया ॐॐॐ……. ऐसी गहराई जहां परम चेतन्यमई माँ का ममतामई प्यार भी था। परम पिता का सांत्वना भरा दुलार भी था, इधर बाहर मुक्ता ने धीमे से स्वर मे लगभग फुस फुसाते हुए श्री निवृत्ति से कहा दादा क्या हमें सोपान को तनिक समझाना नहीं चाहिए था? उसे सांत्वना भरे दो शब्द ही कह देते तो उसे सहारा मिल जाता।

श्री निवृत्ति ने गहरी सांस भरी मानो आत्मज्ञान के सागर मे डुबकी लगाकर अमूल्य मोती निकाला हो, नही मुक्ता अभी कोई भी बात करना उचित नहीं था, सोपान से कुछ भी कहते तो वह व्यावहारिकता से ओतप्रोत होता, व्यावहारिक गणित के पास इस स्थति का कोई हल ही नही है, साधक के साधन मे कुछ भी गड़बड़ होती है तो साधक उसका चिंतन करने लगता है तभी फंस जाता है इसलिए बातचीत करने से अगर कुछ हाथ आता तो सिर्फ नकारात्मकता हाथ लगती, हम अपने मन पर द्वेष का बोझ चढा लेते मुक्ता।

मस्तिष्क की गलियों मे उस दृश्य को और गहरा रमा लेते। अपना आत्मपतन कर डालते परन्तु अब ऐसा नही होगा, पतन नही उत्थान होगा, सोपान की ओर देखते हुए वह देख मुक्ता सोपान सीढ़ियां चढ़ रहा है वह मन, बुद्धि और व्यावहारिकता के गणित के पार जा रहा है, मुक्ता एक टक सोपान को देखती रही, उसकी सुबकिया गुम हो गई थी।

वह आत्मलीन था, उसके चेहरे पर सौम्यता बिखर आई थी, माथे की सिलवटें भी गायब हो चुकी थी, वह ठहर गया था, ठीक जैसे किसी घड़ी की चलायमान सुईया प्रगाढ़ चुम्बकिया क्षेत्र मे पहुंचकर थम जाती है। वह समर्पित सा ही दिख रहा था, जैसे कोई उत्पाती बालक थक हारकर अपनी माँ के सामने आत्मसमर्पण कर देता हैं तू जो करे जैसा करे तेरी इच्छा मैं समर्पित हूं।

हे सतगुरु के प्यारों यह तर्को से परे की स्थति होती है यहां पहुंचकर साधक का मस्तिष्क जमा घटा करना छोड़ देता है उस परम सत्ता को अर्पित हो जाता है गुरु सत्ता को अर्पित हो जाता है सोपान इसी अवस्था मे स्थित हो गया था, उसकी इस सूक्ष्म अवस्था को मुक्ता देख रही थी, समझ पा रही थी क्यों कि उसके पास भी आत्मज्ञान की दृष्टि थी वह खुश हो गई, श्री निवृत्ति उसके पास आए और कान मे धीरे से बोले क्या तेरे और मेरे असहाय शब्दों से उसे इतनी सहायता मिल पाती मुक्ता? देख उसे अब हमारी जरूरत ही नही उसे जो चाहिए था वह भीतर मिल रहा है।

मुक्ता ने झूमते हुए हल्की सी ताली बजाई सच आप ठीक कह रहे हैं। सोपान भैया तो ब्रह्मलोक की सैर पर निकल गए है, अब उनकी कोई चिंता नहीं पर भैया मुक्ता के चेहरे पर काली घटाएं घिर आई, वह बरबस इस कुटिया की ओर घूम गई, द्वार अब भी बंद था मुक्ता ने निरही नजर से ही श्री निवृत्ति की ओर देखा उसकी आंखों मे बड़ा सा प्रश्न चिन्ह था, जो उनसे मार्ग दर्शन मांग रहा था, श्री निवृत्ति गंभीर वाणी मे बोले मुक्ता यह जो हमारा ज्ञानदेव है यह संसार मे रहकर भी संसार मे बहुत उपर रहता है, शायद विसोबाचाट्टी के व्यवहार से थोड़ा क्षुब्ध हो गया है, ऐसे मे हमें उसकी आत्मस्थती का उसे फिर से बोध कराना होगा और वह तुम ही कर सकती हो मुक्ता जाओ, मुक्ता की पीठ थपथपाकर श्री निवृत्ति स्वयं ध्यानस्त हो गए, मुक्ता आगे बढ़ी द्वार खटखटाया बोली ज्ञानेशा भैया किसी से रूठे हो क्या?

दरवाजा खोलो ना मुक्ता के स्वर मे मनुहार थी, परन्तु फ़िर भी दूसरी ओर से कोई उत्तर ना मिला, सन्नाटा छाया हुआ था ऐसा लगता था मानो ज्ञानदेव गुमसुम हो गए है, मुक्ता ने पुनः सरस पुकार लगाई ज्ञानू भैया एक बार बाहर तो आओ देखो ना आपकी छोटी सी प्यारी सी बहन आपसे कुछ कहना चाहती है, प्रतिउत्तर अब भी मौन ही थी इतिहास बताता है कि यह नन्ही सी साधिका मुक्ता ज्ञान वृद्धा थी

जब उसने अपने बड़े भाई ज्ञानदेव को मुक पाया तो उसकी साधक्ता प्रखर हो उठी,उसके अन्तःकरण से ऐसे अभंग प्रकट हुए, जिनमें गीता जैसा भाव था आत्मज्ञान था, इनका लक्ष्य था ज्ञानदेव आनंदकंद होकर दरवाजा खोल दे और कुटिया के बाहर आ जाए इन अभंगो की हर अन्तिम पंक्ति मे मुक्ता कहती है कि ताटी उघड़ा ज्ञानेश्वरा। द्वार खोलो भैया ज्ञानेश्वरा। मराठी मे द्वार को ताटी कहते है इसलिए मुक्ता के ये जागृति अभंग मराठी इतिहास मे “ताटी के अभंग” नाम से प्रसिद्ध हुए हैं, मुक्ता ने तीसरी बार

दरवाजा खटखटाया और गा उठी।

चिंता, क्रोध मागे सारा,

ताटी उघड़ा ज्ञानेश्वरा।

ताटी उघड़ा ज्ञानेश्वरा।।

योगी पावन मनाचा,

साही अपराध जनाचा,

शब्द शस्त्र झाले क्लेष,

सन्ती मानवा उपदेश

विश्वपटृ ब्रम्हद्ररा..

विश्वपटृ बृहमधारा,ताटी उघड़ा ज्ञानेश्वरा,

ताटी उघड़ा ज्ञानेश्वरा।।

हे ज्ञानेशा भैया आप तो महान योगी है, आपका मन परम पावन है, जन साधारण के अपराधों पर मन मैंला मत करो, जब विश्व मे कभी भी आग लगती है तो संत ज्ञानी बनकर अग्नि को बुझाते हैं, मैं जानती हूं भैया आप पर विसोबचाटी ने बड़ी निरदयता से शब्दों के शस्त्र चलाए है उनसे आपके अंतर्मन मे बहुत क्लेश हुआ है पर भैया इन शब्द शस्त्र के आगे आप ज्ञान शस्त्र छोड़ दो संतो के उपदेशों को याद करो सब संतो ने कहा है यह संपूर्ण विश्व एक विराट वस्त्र है जो एक ही धागे से बना हुआ हैं वह धागा है परब्रह्म परमेश्वर वहीं एक वास्तविकता है अन्य कुछ नहीं।

इसलिए भैया उस परब्रह्म पर चित लगाओ, आनंदित होकर किवाड़ खोलो और अपनी छोटी बहन के लिए बाहर आओ। अब मुक्ता ने चौथी बार द्वार खटखटाया।

*ब्रह्म जैसी तेशापरी, वड़ीलभुते सारी,*

*अहो क्रोधे आवा कोठे,* *अवधि आपणी घोठे, जीभदाता नी चावली,कौड़े बत्ती शितोड़ली,*

*मन मारो नी उन मन करा,ताटी उघड़ा ज्ञानेश्वरा,*

*ताटी उघड़ा ज्ञानेश्वरा।।*

सोचो भैया जब कभी अपने ही हाथों से हमें चोट लग जाती है तब क्या हम उस हाथ को काट डालते है? जब अपने ही दांत जीभ को आहत करते है तो क्या हम अपने ही दांत पंक्ति तोड़ देते है क्या ? नहीं न इसीतरह हम उस पर ब्रह्म पिता की विराट देह के अंग है, कोई अपना कोई पराया नही… हम सभी उसी की अभिव्यक्ति है ऐसे में अगर एक अंग अज्ञानता के कारण दूसरे अंग को कष्ट दे बैठता है तो आहत हुए अंग को कभी रोष नहीं करना चाहिए क्यों कि इससे अंततः दुख तो परम पिता को ही होगा । भैया ! हम याद रखे चाहे सुख है या दुख सब परमपिता के ही प्रसाद है। हमारे निर्माण के लिए ही वह इन्हे हम तक भेज रहा है इसलिए जब जो आये जैसा आए सब सहते जाए यही सोचकर कि हमारा लक्ष्य तो परमपिता को प्रसन्न करना है प्रभु को पाना है इसलिए आनंदित होकर किवाड़ खोलो और अपनी छोटी बहन के लिए बाहर आओ।

शुद्ध जाचा भाव झाला,

दुरी नाही देव त्याला,

तुम्ही तरुण विश्व तारा,

ताटी उघड़ा ज्ञानेश्वरा,

ताटी उघड़ा ज्ञानेश्वरा।।

जिसका भाव अशुद्ध नहीं है ईश्वर उसके पास वहीं है स्वयं शुभ में रमिये, सबका शुद्ध करते रहिए, मुझ बच्ची में क्या शक्ति है आपको क्या समझा सकती है आपमें सतगुरु की दृढ़ भक्ति है वहीं आपका संरक्षण करती है, आपकी लाडली मुक्ताई बुला रही है सब छोड़ भव तरने का यत्न करो खोलो किवाड़ भैया मेरे मुझ पर थोड़ी कृपा करो ।

ज्ञानेश्वर भैया इस साधना पथ पर हमारा एक ही तो संघर्ष है अपने मनोभाव को शुद्ध और पावन रखनें के लिए ही तो हम जुझते रहते हैं क्योंकि हम जानतें हैं कि यदि मन सुन्दर है तो हरि दूर नहीं। इसलिए भैया अपने मन को शुभ और सकारात्मक विचारों मे ही रमाइए और दूसरो को भी रमना सिखाइए वैसे मै तो एक नादान बच्ची हूं मैं आपको क्या समझाऊं आपकी तो सतगुरु मे निरंतर भक्ति है वे ही आपको सूक्ष्म रूप से हर पल समझाते रहते है आपकी प्यारी और लाड़ली मुक्ताई।

(वैसे महाराष्ट्र मे बड़ी बहन को ताई कहते है लेकिन ज्ञानेश्वर जी प्यार से मुक्ता को ताई कहते थे)

आपकी प्यारी और लाड़ली ताई तो बस इतना चाहती है कि आप तो बस छोटे मोटे चिंतन छोड़िए केवल आत्मकल्याण पर चित लगाइए भैया ! आनंदित होकर किवाड़ खोलिए और अपनी छोटी

बहन के लिए बाहर आइए, अब की बार मुक्ता को द्वार नहीं खटखटाना पड़ा वह स्वयं ही खुल गया ज्ञानेशा आनंदित होकर ही बाहर निकल आया उसके नेत्रों मे झमझम आंसू बरस रहे थे भावातिरेक मे उसने छोटी बहन मुक्ता को ताई कहकर कंठ से लगा लिया, मुक्ता के भी आंखो से अश्रु मोती ढुलक आए, ज्ञानेशा ने उन्हे पोछा और कहा नही ताई नहीं.. रो मत बहन, तू तो साक्षात परब्रह्म की चित्तकला है, तू ब्रह्मवादिनी है ताई तेरे मुख मे वाग देवी का वास है, मैं धन्य हुआ ऐसी बहन को पाकर, ताई आज तक तो मैं तुम्हे अन्नपूर्णा कहता था जो हमारे उदर को पोषित करती थी, मुझे भोजन कराती थी परन्तु आज से ताई तुम्हे आत्मपुर्णा भी कहूंगा जो हमारी आत्मा को भी अपने ब्रह्मविचारो से पोषित कर सकती है, हां आज तो हमारी मुक्ताई ने ताटी के अभंगो का महाभोज कराया है, श्री निवृत्तिनाथ कह उठे सोपान भी नेत्र खोल चुका था।

उसने भी अपने स्वर जोड़े सच अब अगली बार ताटी के अभंग कब सुनाओगी? ताई, चारो भाई बहन खिलखिलाकर हंस दिए, सिद्ध दीप पर छाए उदासी के काले बादल छट गए, इतने में ही साधो साधो पर केवल अभंगो और आत्मविचारो से उदर की अग्नि तो शांत नहीं होती बालको, आंगन के बाहर से स्वर उभरा । चारो ओर दृष्टि घुमाई और श्रोत की ओर लगाई सामने सोमेश्वर शास्त्री खड़े थे, उनके हाथ मे आटे की पोटली थी, वे यह कहकर भीतर प्रवेश कर रहे थे, मुझे थोड़ी देर पहले ही पता चला कि विसोबाचाटी का दुर्व्यवहार कैसा रहा इसलिए यहा आटा लाया हूं, भोजन पकाओ और फिर हरी के गुण भी गाओ,

श्री निवृत्ति ने आगे बढ़कर फिर सोमेश्वर शास्त्री को प्रणाम किया, आप धन्य है शास्त्री जी ! आप हरी के ही दूत है, ज्ञानेशा का अंतःकरण आंदोलित सा हो उठा कुछ सोचते हुए उसने कहा दादा ! ऐसा क्यों होता है कि जैसे ही हम अशुभ विचारों से संघर्ष करके शुभ्रता की ओर बढ़ने लगते है तो कोई शक्ति झट से आकर हमें थाम लेती है, हमारी हर जरूरत पूरी कर देती है, पराजय को जय मे बदल डालती है मानो उस शक्ति ने ही पहले दूर बैठकर हमारी परीक्षा के लिए सारा खेल रचा हो और हमे उसे परीक्षा मे उतीर्ण हुआ देख फिर वही शक्ति पुरस्कार स्वरूप अपनी प्रसन्नता का प्रसाद भेज देती है सब कुछ अच्छा और बढ़िया कर देती है, बताओ भैया ? श्री निवृत्तिनाथ पुनः रहस्यमई रूप से मुस्करा दिए, हरी ॐ……….

तुम दिव्य बालको की दिव्य बाते तुम्हीं जानो मे तो चला इतना कहकर सोमेश्वर शास्त्री जी वहा से चले गए, उनके जाते ही सोपान बोला।

अब हमारे पास दो विकल्प है कि हम इस आटे की सीधी सादी रोटी बनाकर खाले या फिर मुक्ता की बनाई हुई कंदमूल की सब्जी और चटनी से माड़े खाए, वैसे मेरी दृष्टि मे दूसरा विकल्प श्रेयस्कर है और प्रियस्कर भी, मुक्ता हसते हुए बोली पर सोपान भैया आपका श्रेय-प्रेय का मार्ग खपरेले के बिना बड़ा दुर्गम है दोनों भाई बहन हसने लगे परन्तु निवृत्ति ने ज्ञानदेव कि ओर देखा, ज्ञानदेव आत्मलिन था, कुछ सोचकर वह बोला कोई बात नहीं मुक्ता तुम आटा गुथो। आज हम माड़े ही खाएंगे, पराजय को पूर्ण विजय बनाएंगे पर कैसे भैया? ज्ञानेशा ने कहा साधक की योग साधना के बल पर। जाओ तुम सारी तैयारी करके आटा मेरे पास ले आओ, गुरु ने आज्ञा की है तो माड़े खुद ब

खुद बनेंगे। गुरु की कृपा से मुक्ता ने वैसा ही किया अब ज्ञानेशा पालथी मारकर बैठ गया थोड़ा सा झुककर ओंधा हुआ और योगबल से गुरुदेव को प्रणाम किया और योगबल से उसने देह मे उष्णता पैदा की। देखते ही देखते उसकी पीठ तप्त हो गई ज्ञानेशा ने आव्हान किया मुक्ता त्वरित कर सारे माड़े सेंक लो,माड़े बनाने का क्रम आरंभ हुआ मुक्ता बेल बेल कर माड़े ज्ञानेशा की पीठ पर डाल देती है तुरंत ही योगाग्नि से सिक कर करारे हो जाते फिर मुक्ता उन्हें गुरुदेव को श्री निवृत्ति और सोपान की थाली मे परोस देती।

यह दृश्य आलौकिक था और साथ ही सांकेतिक भी। की साधक चाहे गुरु आज्ञा को पूर्ण करना तो प्रकती पूर्ण सहायता मे लग जाती है सब कुछ संभव हो सकता है यदि शिष्य गुरु आज्ञा की तत्परता मे लग जाय, अब तक विसोबाचाटी के गुप्तचर ने उन तक सूचना पहुंचा दी थी

विसोबाचाटी सिद्ध दीप की एक झाड़ी के पीछे बैठकर सारा दृश्य देख रहा था बालको को रोते बिलखते देखने का उनका अरमान धूमिल हो गया था पहले तो उनकी आंखे आश्चर्य से विस्वरित हुई फिर घोर पश्चाताप से नम। जो बात उन्हें बड़े बड़े शास्त्र नहीं समझा सकते थे वह इन साधकों की साधना ने समझा दिया, कुछ पलो बाद विसोबाचाटी

धराशाई थे, इन बालको की चरणधूलि मे लोट रहे थे यह साधकों की विजय दशमी थी जिसमे अहम, ईर्ष्या, द्वेष, भेदभाव आदि शत्रु पराजित हो गए थे उसे भी इन साधकों ने जीत लिया था यह होती है गुरु की कृपा और यह होती है साधक की साधना।

दूध नही अपमान के घूंट पी कर बड़े हुए वे योगी (प्रेरक कथा) भाग- १


गुरुभक्ति योग जीवन के अनिष्टों का एक ही उपाय है, गुरुभक्ति योग के अभ्यास से सर्व सुखमय अविनाशी आत्मा को भीतर ही खोजो। गुरुभक्ति योग को जीवन का एकमात्र हेतु ध्येय एवं वास्तविक रस का विषय बनाओ। आप सर्वोच्च सुख प्राप्त करोगे। साधना पथ तो है ही युद्ध का पथ। युद्ध भी किसी अन्य से नही स्वयं अपने आप से। अस्त्र शस्त्रों से लैस सैनिकों से नही। विकारों से लैस मन के विचारों से। इन्हीं शत्रु विचारों मे से एक है कि मेरे साथ ऐसा क्यों हुआ? यह तो अन्याय है, मेरा अपमान है, उसने मुझसे कटु लहजे मे बात क्यों की?, उसने मेरी ओर हीन दृष्टि से क्यों देखा? उसने आंखे क्यों तरेरी?, क्या मेरी कोई इज्जत नही, कोई सम्मान नही। ये शत्रु विचार है मन के। अक्सर इन विचारों के प्रबल शस्त्र साधक के मन को विदीर्ण कर डालते हैं, उसके भीतर कोहराम मचा देते है, मान सम्मान का मोर्चा संभालता हुआ साधक थक हार जाता है, इस परिस्थिति मे विजय श्री का बिगुल कैसे बजाया जाए? अन्याय और अपमान की स्थतियो मे एक साधक का क्या कर्म है क्या अधर्म है। उसकी प्रतिक्रिया कैसी होनी चाहिए हम इस कथा के माध्यम से जान सकते है।

महाराष्ट्र के प्रसिद्ध चार आत्मज्ञानी भाई और बहनों में सबसे बड़े थे श्री निवृत्ति नाथ फिर श्री ज्ञानदेव, श्री सोपान और बहन मुक्ता। ये बचपन से ही दूध नही अपमान के घूंट पीकर बड़े हुए, इन्हे मुख्य गांव आलंदी से बाहर सिद्ध दीप मे निष्कासित कर दिया। इनके माता पिता को देह त्याग करने के लिए विवश किया गया, माता पिता ने ग्राम सभा के इस अन्याय कारी बर्बरता को भी शिरोधार्य कर लिया। अपनी जीवन लीला समाप्त कर डाली सिर्फ इसलिए कि उनके बच्चो को गांव वाले स्वीकार कर लें। परन्तु तब भी न्याय का प्रकाश नही हुआ ये छोटे छोटे अनाथ भाई बहन को बाहर एक निर्जन कुटिया मे जैसे तैसे पलते बढ़ते रहे, अपमान कारी ताने और अन्याय कारी व्यवहार यही उनकी खुराक थी परन्तु इतिहास साक्षी है इन्होंने अपमान को भी अपने आत्मनिर्माण का साधन बना लिया। कैसे बनाया आइए जाने……

इंद्रायणी नदी का तट है, बालक ज्ञानेश, श्री ज्ञानदेव जी। बालक ज्ञानेश पसीने से लथपथ था, सूर्य का भीषण ताप उसके अंगों को झुलसा रहा था, ज्ञानेश स्नान करने आया था, इंद्रायणी के शीतल जल को अपलक दृष्टि से देखता हुआ वह सीढ़ियां उतरने लगा तभी भीषण गर्जना हुई यह एक कट्टर पंथी ब्राह्मण का स्वर था। ओ लड़के भाग यहां से। इस सरिता मे ब्रह्मण स्नान करते है इसे अपनी काया तो क्या छाया से भी मैली मत कर। ज्ञानेश के कदम ठिठक गए उसने धीरे से कहा बाबा नदी के इस ओर गाय, बैल, भैंसे और कई पशु नहाते है। में भी इस कोने मे डुबकी लगाऊंगा और चला जाऊंगा। नहाने दो ना मुझे। तूने अपनी बराबरी ब्रह्मणो की गाय से की। तेरी इतनी हिम्मत। तू तो पशुओं से भी हीन है जा तू तो नाली और नाला ढूंढ़ ले नहाने के लिए। चल भाग यहां से। ब्रह्मण मुख से आग उगलता रहा पास ही कुछ ब्रह्मण कुमार खेल रहे थे, अवसर भांपते ही उन्हें तो खेल सूझ गया, उन्होंने तो तटवर्ती कंकड़, पत्थर उठाए और ज्ञानेश को निशाना बना बना कर फेकने लगे। ज्ञानेश की कोमल देह जगह जगह से छील गई, बड़ी मुश्किल से बचता बचाता कंकरीले तट पर रास्ता बनाता ज्ञानेश वहा से बच निकला, अपनी कुटिया की ओर जाने लगा, रास्ते मे ज्ञानदेव की देह घायल थी परन्तु उससे अधिक मन आहत था, ज्ञानेश का हृदय चीख उठा की हे विठोबा ! हमारा क्या अपराध है उन ब्रह्मनो द्वारा खोदे गए कुओ पर तो हम जाते ही नहीं परन्तु अब क्या तो तेरी नदियों पर भी हमारा अधिकार नहीं, पशुओं तक का है, हमारा नहीं है, क्यो है ऐसा देव? वो ऊंचे और हम नीचे कैसे? पग पग पर ये अपमान की चोटे क्यो? हमारे माता पिता ने अपने जीवन तक का त्याग कर दिया फिर भी

इनकी घृणा का विष दूर नही हुआ अन्याय की भी एक सीमा होती है केशवा। कैसे है ये लोग?

ज्ञानदेव के मन मे तो प्रश्नों का झंझावात उमड़ने घुमड़ने लगा किसी प्रकार का तर्क या तथ्य उसे उत्तर नही दे पा रहा था कोई गणित इस स्थति मे सटीक नही बैठता था, ऐसे मे कैसी मन, बुद्धि को समझाया जाए ऐसे मे एक पंथ ही शेष था, मन बुद्धि से परे का पंथ वो है आत्मा की राह। ज्ञानेश की आत्मा मे गीता का एक श्लोक गूंज उठा जिसका एक भावार्थ था। कि..

शीत,उष्ण सुख, दुख तथा शत्रु, मित्र समान बन निसंग विचरे।

सदा सहे मान अपमान निंदा स्तुति सम जानता।

दोष भरा मन मे स्थति मति प्रिय वह भक्त है सर्वोपरि जग मे।।

यह था एक साधक का अपना सनातन तर्क। अपना अलौकिक गणित मुझे कुछ नही होना चाहिए यह तो एक दिव्य परिस्थती है जो मेरे लिए निर्मित की गई है ताकि मेरा निर्माण हो सके। मुझमें संयम पैदा हो सके। मुझमें सहन शक्ति, क्षमा जैसी सदव्रतिया जाग पाए, मुझमें सम भाव विकसित हो जाए, अच्छा है अच्छा है। ऐसी स्थति मे तो स्थिर मती बनाई जाती है इसलिए क्षुब्ध क्यों होना भला एक अनघड़ पत्थर छैनी, हथौड़ा से कोई गिला शिकवा करता है क्या? नहीं ना तो तू क्यो करता है ज्ञानेश?

इन्हे धेर्य से सहन कर ज्ञानेश। इस महा तर्क की औषधि पिलाते हुए वापस लौटने लगा इसलिए घर पहुंचने तक उसके आहत मन के सारे घाव सुख गए। निर्जन स्थान मे बनी अपनी कुटिया के आंगन मे भाई निवृत्ति। निव्रतीनाथ सबसे बड़े भाई थे, भाई निवृति, सोपान और छोटी बहन मुक्ता तीनों किसी गहन मंत्रणा मे व्यस्त थे, ज्ञानेश ने एक मृदु सी मुस्कान लिए आंगन मे प्रवेश किया बड़े भाई निवृत्ति जिनको ज्ञानेश्वर जी अपने अध्यात्म गुरु मानते थे, बड़े भाई निवृत्ति को झुककर ज्ञानेश ने प्रणाम किया फिर छोटी बहन मुक्ता से पूछा क्यों मूक्ताई क्या मंत्रना चल रही है? किसी गहन विषय पर सोच विचार करते लग रहे है, सभी मुक्ता और सोपान खी खी करते हस दिए, मुक्ता बोली हा ज्ञानू भैया बहुत ही गहन और गंभीर विषय पर हम गोष्ठी कर रहे हैं।

ज्ञानेश ने कहा बताओ ना किस विषय पर? छोटा भाई सोपान ने कहा आज माड़े कैसे पकाएं जाए?माड़े आटे के बनते हैं मोटी रोटी के समान। आज माड़े कैसे पकाएं जाए? गरमा गरम पतले पतले मृदु माड़े। चारो भाई बहन हस दिए मुक्ता ने बात आगे बढ़ाई कि ज्ञानू भैया हमारे निवृत्ति दादा बड़े भैया ने आज इच्छा की है कि‌ माड़े खाने है ज्ञानदेव ने कहा निवृत्ति दादा की इच्छा है माने गुरु की आज्ञा।

मुक्ता अब तो हर परिस्थिति मे उसे पूरा करना ही करना है छोटे भाई सोपान ने कहा आप ठीक कहते हो ज्ञानू भैया। आप और में मधुकरी मे आटा मांगकर लाते है, रास्ते मे कुम्हारिन कमला मौसी के घर से खपरेला भी उठा ले आएंगे। मुक्ता उसे उल्टा करके सेंक लेगी उस पर। मुक्ता ने कहा हा हा भैया मुझे सुबह वन मे कुछ कंदमूल मिले तब तक में उससे सब्ज़ी और चटनी बना लेटी हूं वाह आज तो दावत ही हो जाएगी। दादा निवृत्ति ने बड़ी अर्थ

भरी मुस्कान दी।ज्ञानदेव ने झोला टांग लिया और छोटे भाई सोपान के संग गांव आलंदी की ओर बढ़ गया जिस गांव से उन्हें निष्कासित किया गया था ये दोनों भाई उसी गांव की ओर बढ़ चले। गुरु की इच्छा पूरी करने के लिए। गांव पहुंचकर पहला द्वार खटखटाया।

भिक्षाम देही, मधुकरी दे दो बाबा, भिक्षाम देही।

झटके से द्वार खुला सामने से एक बड़ी चोटी वाला रूढ़िवादी, नकचड़ा पोंगा शास्त्री आ खड़ा हुआ उसका नाम था विसोबाचाटी। उसकी भृकुटियां चड़ी हुई थी, मुखाकृतियां वक्र थी नेत्र द्वेष से तप्त थे, दोनों बालको को देखते ही उसने धावा बोल दिया अरे आे पाखंडी सन्यासी की औलादों दूर भागो यहां से। मेरे आंगन मे अपनी पापी छाया मत डालो तुम वो जंगल छोड़कर इधर गांव मे कैसे आ गए, नास पीटो, भूखे प्यासे रहकर मर खप क्यो नही जाते? बार बार अपनी मनहूस सूरत क्यो दिखाने चले आते हो? क्या आलंदी मे छूत की बीमारी फैलाओगे? तलवार से भी अधिक धारदार ताने सुनने वाले को काट काटकर टुकड़े कर डाले परन्तु हमारे इन ज्ञानी साधकों की क्या प्रतिक्रिया थी जानते है। संयम, संयम और संयम। ज्ञानेश्वर ज्ञानेश ने मुस्कराते हुए मीठा सा उत्तर दिया विसोबा काका दूर भगाना है तो क्रोध और द्वेष को भगाओ, देखो यह आपका कितना अहित करेगी, अभी ज्ञानेश की पंक्ति पूरी ही नहीं हुई थी विसोबाचाटी बोल उठा ओ भिख मंगो मुझ पर उपदेश झाड़ने आए हो ठहरो तुम्हारी तो…. विसोबा ने द्वार पर रखा हुआ मोटा डंडा उठा लिया और द्वार पर लपका। ज्ञानेश और सोपान ने आंव देखा ना ताव सिर पर पैर रखकर वहा से भाग गए। आटा तो मिला नहीं चाटा जरूर मिल जाता आज। सोपान ने कहा सोपान हांफते हुए कहे जा रहा था, ज्ञानेश ने भी लंबी गहरी सांस भरी कोई बात नहीं, कोई बात नहीं। सोपान विसोबा काका को मन ही मन क्षमा कर दो, नही तो बैर जन्म ले लेगा नही तो आगे चलकर मानसिक क्लेश मचाएगा। इससे हमारी ही हानि होगी परन्तु सोपान तनिक विद्रोही हो चला था दांत पीसता हुआ बोला मेरा बस चले तो इन ढापोल शंखी, धूर्त मार्तंडो की चोटी पकड़कर गोल गोल घुमाकर इनको जमीन पर पटक दू। ज्ञानेश ने तुरंत अपनी बाह छोटे भाई कंधे पर रख दी।

समझाया नही नही सोपान इतना उबाल अच्छा नही, निवृत्ति दादा कहते है ना आनंद मनाना है तो परमानंद को ध्याओ, इन छोटी मोटी बातो पर क्या विचार करना? देखो जरा संयम धरकर देखो तुम स्वयं को कितना ऊंचा, कितना विराट अनुभव करोगे में भी ऐसा ही करता हूं सोपान ने कहा आप ठीक कहते है भैया वैसे ही हमे अपने लक्ष्य से नही भटकना चाहिए। आज हमारा लक्ष्य है गुरुदेव को माड़े खिलाने का। दोनों भाई हस्ते हुए अगले द्वार पर बढ़ चले। द्वार खटखटाया पुकारा भिक्षाम देही, मधूकरी दे दो।

माई स्त्री ने द्वार खोला तनिक ठहरो कहकर भीतर जाने ही लगी थी कि ज्ञानेश ने विनय की माई आज मधूकरी मे आटा ही दे दो। स्त्री उदार थी बर्तन भरकर आटा लाई और ज्ञानेश का पूरा झोला ही भर दिया दोनों बालक प्रसन्न हो उठे,कुम्हारिन कमला के घर की और बढ़ गए अब तो सोपान चल नही फुदक रहा था अत्यंत उमंगित था अब तो सोपान बार बार झोले का भार अपने हाथो मे ले लेता था भार अनुभव करते ही तालियां बजाता और खिलखिलाता था। ज्ञानेश ने फिर से सोपान को सावधान किया सोपान अधिक हर्ष मत मनाओ गुरुदेव दादा निवृत्ति कहते है ना हर्ष कब संघर्ष में बदल जाए कुछ पता नहीं दोनों कुम्हारिन कमला के आंगन मे पहुंच गए तरह तरह के मटकों की कतारें सुशोभित थी, ज्ञानेश ने पुकारा कमला मौसी, कमला मौसी एक खपरा दे दोगी क्या? कमला का चारो बालको के प्रति स्नेह अपार था ज्ञानेश का स्वर सुनते ही वह दौड़कर बाहर आ गई, सोपान ने निजी इच्छा रखी मौसी आज हमने माड़े खाने की योजना बनाई है। निवृत्ति दादा की यही इच्छा है इसलिए माड़े सेंकने के लिए एक खपरा चाहिए।

हा हा क्यो नहीं बहुत बढ़िया अभी देती हूं। एक चपटा सा खपरा देते हुए कहा मुक्ता को कहना चूल्हे पर इसे उल्टा रख दे। कमला पंक्ति मे से एक उपयुक्त खपरा उठाने लगी तभी एक प्रचंड भूचाल का नाम था विसोबाचाटी। अपने सेवकों से कहकर उसने बालको पर नजर रखवायी हुई थी।

उनके खबर देने पर वह कमला के आंगन पहुंचा उसकी कुटिल दृष्टि सीधी ज्ञानेशा की लदी फदी झोली पर गई। फिर कमला के हाथो पर टिकी खपरा पर। उस धूर्त को समझते देर न लगी और उसने कुत्सित स्वर मे कहा। आहा ये कंगाल भीखमंगे मांग मांगकर माड़े उड़ाने की सोच रहे है, दो दो गज लंबी जीभ हो गई है तुम दुष्टों की। पूरी आलंदी को मूर्ख बनाते हो, पेट की आग बुझाने का बहाना बनाते हो और माड़ो की ललक रखते हो। थोड़ी भी लज्जा है या सारी हया घोलकर पी गए हो पाखंडियों। टुकड खोर चोर कहीं के।

कमला भी सहम गई परन्तु फिर भी हिम्मत बटोर कर वह बोली साहब बालक ही तो है सालो मे एक बार माड़े पकाकर

खा भी लिए तो क्या हुआ और वो माड़े भी तो आटे से बनते है।

चुप कर कुम्हारिन। अपनी आौकत मे रह। विसोबाचाटी पहले से भी ऊंचे और उग्र स्वर मे चीखे तूने ही इन ठिकरो को सिर चड़ा रखा है इतना कहते कहते विसोबाचाटी क्रोध से पागल हो गया। ताव मे आकर पांव चलाने लगा, कुम्हारिन के मटके एक एक करते चूर चूर करते गए, कमला के हाथ से भी खपरा छीनकर चकना चूर कर डाला। दोनों बालक टुकुर टुकुर पलके झपका कर अपनी आंखो के सामने विनाशकारी तांडव देख रहे थे। कमला के नेत्र भी डबडबा आए, सोपान मे रोष का उफान उठ गया था, वह प्रबल प्रतिक्रिया करने ही वाला था तभी ज्ञानेश ने उसका हाथ दबाया और आंखो ही आंखो मे शांत रहने को कहा बालको की यह शांति देखकर विसोबाचाटी और ज्यादा जल भून गया मुख से अंगारे उगलता हुआ आगे बढ़ा और ज्ञानेश का झोला छीनकर पटक दिया, सारा आटा टूटे मटको और मिट्टी मे जा मिला, विसोबाचाटी ने अंतिम धमकी दी, नरक के कीड़ों में टुकड़ा भर भी माड़े तुम्हे खाने नहीं दूंगा, तुम्हारी तो ऐसी की तैसी फिर विसोबाचाटी ने अकड़ में अपना अंगोछा झाड़ा और तमतमाता हुआ आंगन मे चला गया आंगन मे चारो ओर विध्वंस ही विध्वंस मचा डाला, प्रलयकारी तूफान आया था और सब कुछ रील कर चला गया था।

दोनों बालक थर थर कांप रहे थे सोपान के कंठ मे हिचकियां भर गई, घोर संताप दोनों के मन मे उबल रहा था, ज्ञानेश ने एक नजर उठाकर कमला मौसी की ओर देखा उसकी भी कुछ ऐसी दशा थी, दोनों भाई लूट पिटे क़दमों से कुटीर की ओर चल पड़े अब तो ज्ञानेश का संयमचारी मन भी सिसकने लगा था कि इतना तिरस्कार, इतना अनादर, इतनी उपेक्षा। हे ईश्वर हमारा अस्तित्व ही तूने क्यों गड़ा? दोनों अपने आंगन तक पहुंच गए निवृत्ति और मुक्ता दोनों उत्सुक क़दमों से उनकी तरफ बढ़ ज्ञानेश कुछ नहीं बोला कुटिया मे अकेले प्रवेश कर उसने किवाड़ बन्द कर दिया भीतर से सांकल भी जड़ दी, बाहर आंगन मे छोटा भाई सोपान ने रोते रोते सारा प्रसंग कह सुनाया।

अब आगे इन बालको की क्या प्रतिक्रिया रहेगी इस घोर अपमान को कैसे आत्मनिर्माण की सीढ़ी बनाएंगे? ऐसी कौन सी योजना होगी यही देखना है।

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आगे की कहानी कल के पोस्ट में दिया जायेगा

जिसमें संयम है सिखने की तड़प है और गुरुमंत्र पर विश्वास है उसे सफलता जरूर मिलती है।


द्रोणाचार्य के कुछ शिष्य सोचते थे कि अर्जुन पर गुरूजी की विशेष कृपा है। उन सभी को अर्जुन खटकता था।

एक बार गुरू द्रोणाचार्य अर्जुन सहित अपने शिष्यों को लेकर नदी किनारे गये और एक वटवृक्ष के नीचे खड़े होकर बोले- बेटा अर्जुन! मैं आश्रम में अपनी धोती भूल आया हूँ जा! जरा ले आ। अर्जुन चला गया।

गुरू द्रोणाचार्य ने दूसरे शिष्यों से कहा कि- बाहर के धनुष और गदा में तो शक्ति है लेकिन मंत्र में इनसे अनंत गुना शक्तियाँ होती है। मंत्र जापक उसका महात्म्य और विधि समझ ले तो मंत्रों में बहुत ताकत है। मैं मंत्र से अभिमंत्रित एक ही बाण से इस वटवृक्ष के सारे पत्तों को छेद सकता हूँ। ऐसा कहकर द्रोणाचार्य ने धरती पर एक मंत्र लिखा। एक तीर को इस मंत्र से अभिमंत्रित किया और छोड़ दिया। बाण एक-एक पत्ते को छेद करता हुआ गया। सभी शिष्य आश्चर्य चकित हो गये।

बाद में गुरू द्रोणाचार्य और सभी शिष्य नहाने चले गये। इतने में अर्जुन लौट आया। उसकी दृष्टि पेड़ के पत्तों की ओर गई। वह सोचने लगा कि इस वटवृक्ष के पत्तों में पहले तो छेद नहीं था। मैं सेवा के लिए गया तब गुरूजी ने इन शिष्यों को कोई रहस्य बताया है।

रहस्य बताया है तो उसका कोई सूत्र भी होगा। शुरूआत भी होगी और कोई चिन्ह भी होगा। अर्जुन ने इधर-उधर देखा तो धरती पर एक मंत्र के साथ लिखा था- वृक्ष छेदन के साम्थर्य वाला यह मंत्र अद्भुत है। उसने वह मंत्र पढ़ा, धारणा की और दृढ़ निश्चय किया की मेरा यह मंत्र अवश्य सफल होगा। अर्जुन ने तीर उठाया और मंत्र पढ़कर छोड़ दिया। वटवृक्ष के पत्तों में एक-एक छेद तो था ही दूसरा छेद भी हो गया।

अर्जुन को प्रसन्नता हुई की गुरूदेव ने उन सब को जो विद्या सिखाई वह मैंने भी पा ली। नहाकर आने पर सबने देखा कि पहले तो वृक्ष के पत्तों में एक ही छेद था अब दूसरा किसने किया ? द्रोणाचार्य ने पूछा दूसरा छेद तुम लोगों में से किसी ने किया है ?

सभी ने कहा- नहीं गुरूदेव! द्रोणाचार्य ने अर्जुन से पूछा क्या तुमने किया है ? अर्जुन थोड़ा डर गया किंतु झूठ कैसे बोलता। उसने कहा- मैंने आपकी आज्ञा के बिना आपके मंत्र का प्रयोग इसलिए किया कि आपने इन सब को तो यह विद्या सिखा ही दी थी फिर आपसे पूछकर मैं अकेला आपका समय खराब न करूँ! इतना खुद ही सीख लूँ। गुरूदेव! गलती हो गई हो तो माफ करना।द्रोणाचार्य ने कहा- नहीं अर्जुन! तुममे जिज्ञासा है, संयम है, सिखने की तड़प है और मंत्र पर तुम्हें विश्वास है।

मंत्रशक्ति का प्रभाव देखकर ये सब तो केवल आश्चर्य करके नहाने चले। इनमे से किसी ने भी दूसरा छेद करने का सोचा ही नहीं। तुमने हिम्मत की , प्रयत्न किया और सफल भी हुए। तुम मेरे सत्पात्र शिष्य हो। अर्जुन! तुमसे बढ़कर दूसरा धनुर्धर होना मुश्किल है। शिष्य ऐसा जिज्ञासु हो कि गुरू का हृदय छलक पड़े।

जिसके जीवन में जिज्ञासा है, तड़प है और पुरूषार्थ है वह जिस क्षेत्र में चाहे सफल हो सकता है। सफलता उद्यमियों का ही वरण करती है। स्वामी शिवानंद जी कहते हैं कि शिष्य जब गुरु के पास रहकर अभ्यास करता हो तब उसके कान श्रवण के लिए तत्पर होने चाहिए। वह जब गुरू की सेवा करता हो तब उसकी दृष्टि सावधान होनी चाहिए।