एक बार भगवान श्री रामचन्द्र जी अपने अंतःपुर में रत्नसिंहासन पर बैठे हुए थे । इसी समय देवर्षि नारद जी आकाश से उतरे । उनको देखकर रामचन्द्र जी झट हाथ जोड़कर बड़े प्रेम से खड़े हो गये ।
महात्मा लोग यदि न हों तो भगवान को कोई पूछे ही नहीं बस यही समझ लो, इसलिए भगवान भी महात्माओं का आदर करके, बनाकर रखते हैं । श्रीमद्भागवत (3.16.6) में भगवान सनकादि मुनियों से कहते हैं
सोऽहं भवद्भ्य
उपलब्धसुतीर्थकीर्तिश्छिन्द्यां
स्वबाहुमपि वः प्रतिकूलवृत्तिम् ।।
यह पवित्र कीर्ति मुझे आप लोगों से ही प्राप्त हुई है । इसलिए जो कोई आपके विरुद्ध आचरण करेगा, वह मेरी भुजा ही क्यों न हो, मैं उसे तुरंत काट डालूँगा । क्योंकि हमें जो कीर्ति मिली है – लोगों को तारने वाली हमारी जिस कीर्ति के श्रवण-स्मरण से लोग भवसागर से पार हो जाते हैं, वह कीर्ति हमारे पास नहीं थी, यह तो आपकी ही दी हुई है ।
नारद जी को देखते ही श्रीराम उठ खड़े हुए और सीता जी के सहित सिर धरती पर रखकर प्रणाम किया । श्रीराम जी ने कहाः “हे मुनिश्रेष्ठ ! आपका दर्शन तो संसारी पुरुषों के लिए दुर्लभ है । जो संसारी सुख भोग रहा है उसको आपका दर्शन हो वह भी महल के भीतर आकर, तो ये अवश्य हमारे पूर्वजन्म के कोई पुण्य होंगे और उनका उदय हुआ तभी तो आपका दर्शन हुआ है ।”
नारद जी ने कहाः “राम ! तुम लोगों के समान बातचीत करके मुझे क्यों मोह में डाल रहे हो ? तुम अपने को संसारी कहते हो ! पुण्यों के उदय से हमारा दर्शन बताते हो तो आपका कहना बिल्कुल ठीक है । आप जरूर संसारी हैं क्योंकि जो सारे संसार की माता है – महामाया, वह आपकी गृहिणी है तो संसारी आप हुए ही । आप जैसा संसारी और कौन होगा ? आपके ही सान्निध्य् से ब्रह्मा आदि संतान की उत्पत्ति होती है, आपके आश्रय से त्रिगुणात्मिका माया भासती है और तमोगुणी, रजोगुणी, सत्त्वगुणी प्रजा की सृष्टि करती है । स्त्री-वाचक जितने भी शब्द हैं, वे सब शुभ जानकी हैं और पुरुष-वाचक जितने भी शब्द हैं, वे सब-के-सब राम हैं ।”
वेद में आता हैः
त्वं स्त्री त्वं पुमानसि त्वं कुमार उत वा कुमारी ।
….जातो भवसि विश्वतोमुखः ।।
तुम स्त्री हो, तुम पुरुष हो, तुम कुमार या कुमारी हो, सर्वरूप में तुम्हीं प्रकट होते हो ।
(अथर्ववेदः कांड 10 सूक्त 8, मंत्र 27, श्वेताश्वतर उपनिषदः 4.3)
अब तो नारदजी की आँखों से आँसुओं की धारा गिरने लगी, वे बोलेः “मैं अपने पिता ब्रह्मा जी की आज्ञा से आपके पास आया हूँ । उन्होंने आपके लिए कहा है कि हे रामचन्द्र ! आप रावण वध के लिए पैदा हुए हैं । अभी पिता दशरथ तुम्हारा राज्याभिषेक कर देंगे । जब राज्याभिषेक के झगड़े में पड़ जाओगे तो रावण को मारोगे नहीं । आपने पृथ्वी का भार उतारने की प्रतिज्ञा की है । उस प्रतिज्ञा को सत्य करो क्योंकि आप सत्यप्रतिज्ञ ही हो !”
भगवान रामचन्द्र जी मुस्कराकर बोलेः “नारदजी मैं सब समझता हूँ, सब जानता हूँ, मेरे लिए अज्ञात कुछ नहीं है । मैंने जो प्रतिज्ञा की है, उसको मैं पूरा करूँगा इसमें किसी प्रकार का संदेह नहीं है किंतु समय के अनुसार । इन रावणादि ने जो तपस्या, उपासना करके शक्ति संचित की है, उन्हें जो प्रारब्ध प्राप्त हुआ है वह जब धीरे-धीरे क्षीण होगा तब उनको मारूँगा । मैं रावण के विनाश के लिए ही दण्डकारण्य जाने वाला हूँ । चौदह वर्ष वहाँ मुनि वेष में रहूँगा । सीता के बहाने उनके कुल का नाश करूँगा ।”
इसमें भी बहुत विलक्षण बात है । भगवान सीता जी के हरण का निमित्त बनाकर माने अपनी पत्नी तक को रावण के द्वारा हरवा कर उस रावण का उद्धार करते हैं, सो भक्तों के उद्धार के लिए भी कोई-न-कोई बहाना चाहते हैं ।
ऐसा नहीं कि अजामिल माला लेकर बैठे और ‘हरे राम ! हरे राम ‘ का इतना करोड़ जप करे, ऐसा नहीं । वह तो उसके मुँह से बेटे के बहाने ‘नारायण’ नाम निकला और नामाभास से ही उसकी रक्षा करने के लिए – जैसे रावण के वध का बहाना बनाते हैं – वैसे पापियों के उद्धार का भी बहाना चाहिए । कोई कारण चाहिए । ये तो अकारण करूणा-वरूणालय हैं ।
जब राम जी ने ऐसी प्रतिज्ञा की तब नारदजी को बड़ा आनंद हुआ । उन्होंने तीन प्रदक्षिणा कीं, प्रणाम किया, राम जी से अनुमति लेकर जहाँ से आये थे वहाँ चले गये । यह नारद जी और राम जी का संवाद है । जो भक्ति के साथ इसका स्मरण-वर्णन करता है वह वैराग्यपूर्वक सुर-दुर्लभ गति को, मोक्ष-कैवल्य को प्राप्त करता है ।
स्रोतः ऋषि प्रसाद, नवम्बर 2019, पृष्ठ संख्या 11,12 अंक 323
नियमः आप अपने जीवन में कोई नियम धारण करेंगे तो आपका मनोबल बढ़ेगा । यह नियम लीजिये कि इतना जप, पाठ, स्वाध्याय, इतनी पूजा किये बिना हम भोजन नहीं करेंगे । जिस दिन नियम करने में देर हो जाय उस दिन थोड़ा कष्ट सहिये, आपका मनोबल बढ़ेगा । जो तकलीफ सहने को तैयार नहीं है उसका मन कमजोर हो जाता है ।
श्रद्धाः आप ब्रह्मवेत्ता सदगुरु, परमात्मा और वेद-शास्त्रों पर श्रद्धा कीजिये कि वे हमारी रक्षा करेंगे । युद्धभूमि में एक सैनिक लड़ता है तो उसे यह विश्वास होता है कि ‘हमारे पीछे सेनापति है, राष्ट्रपति है, सारा राष्ट्र है, हमको सहायता मिलेगी और हम युद्ध में विजयी होंगे ।’ इसी तरह आप भी जो काम करें, इस विश्वास के साथ करें कि आपके पीछे आपके शास्त्र (जीवन का संविधान ) हैं, आपके सदगुरुदेव हैं, प्रभु हैं । आपके जीवन में श्रद्धा बनी रहेगी तो आपको मनोबल भी बना रहेगा ।
समीक्षाः आपके जीवन में जब कुछ खट्टे-मीठे अनुभव आयें तब समीक्षा कीजिये कि ‘ये कटु अनुभव दिख रहे हैं लेकिन इनके पीछे परमात्मा की कितनी कृपा है, करुणा है !’ समीक्षा के अभाव में आप ईश्वर को, भाग्य को, समाज को, अपने पुण्यों को और कर्मों को कोसने लगेंगे । उस समय शायद पता न चले पर आप फरियाद की खाई में गिरकर और दुःख बढ़ा लेंगे । उससे आपकी शक्ति क्षीण होगी परंतु समीक्षा करने पर आप बिना धन्यवाद दिये नहीं रह सकते । प्रतीक्षा उसकी होती है जो अप्राप्त हो और समीक्षा प्राप्त वस्तु-परिस्थिति की की जाती है । हर अवस्था में परमात्मा की कृपा निहारने से, कृपा की समीक्षा करने से शांति स्वाभाविक आयेगी, आपका परमात्म-चिंतन व मनोबल बढ़ेगा ।
भगवन्नाम उच्चारणः इससे भी मनोबल में वृद्धि होती है । जब आप भगवान के नाम का संकीर्तन करते हैं, तब आपके अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनंदमय – सभी कोशों के एक-एक अंश आपस में मिल जाते हैं । भगवन्नाम-उच्चारण में आपके पाँचों कोश एक साथ मिलकर ऐसी क्रिया को पूर्ण करने में लगते हैं जो आपके मानसिक बल को बढ़ाने वाली है ।
स्रोतः ऋषि प्रसाद, नवम्बर 2019, पृष्ठ संख्या 2 अंक 323
◆जो अपने आपको विषय विकारों में, चिंताओं में, दुःखों में धकेलता है, वह अंधकूप में गिरता
है और जो अपने आपको भगवत्प्रकाश में,
भगवद्ज्ञान में, भगवत्शांति में, भगवन्माधुर्य में, भगवत्प्रेम में
पहुँचाता है, वह
वास्तव में मनुष्य जीवन का फल पाता है। मनुष्य जीवन में दो चीजें नितांत आवश्यक
हैं – बुद्धि और श्रद्धा। बिना श्रद्धा के बुद्धि शुष्क, उद्दंड हो जायेगी, बम बनायेगी, लोगों का शोषण करके
बड़ा बनने के रास्ते जायेगी।
बिंदुसार
का पुत्र था सम्राट अशोक। उसको राज्य मिला तो राज्य का विस्तार, विस्तार, और विस्तार करते-करते
उसने कलिंग देश, जिसको
आज कालाहांडी (ओडिशा) बोलते हैं, उस पर चढ़ाई कर दी। लड़ाई करते-करते महीना-दो-महीना, एक वर्ष-दो वर्ष करते
चार वर्ष बीत गये। दोनों पक्षों के लाखों-लाखों सैनिक मरे पर कोई नतीजा नहीं आ रहा
था। अशोक चिंतित था, इतने
में सेनापति दौड़ा-दौड़ा आया, बोलाः “महाराज की जय हो ! खुशखबर है, कलिंग देश का सम्राट
युद्ध में मारा गया। अब हमारी जीत हुई है।”
जीत
क्या हुई है, सदा
के लिए हार हो गई। क्या यह खुशखबर है कि कोई मारा गया और हमें सम्पदा मिलेगी ! यह
बुद्धिमानों का बुद्धिवाद है। जिनको जीवन का मूल्य पता नहीं वे वासनावान, अहंकारी इसे खुशखबरी
मानते हैं। लोगों की हत्या करके, लोगों से कर (टैक्स) लेकर देश परदेश में खूब धन जमा करने का
अवसर मिलेगा-यह खुशखबरी है ? दूसरों के बच्चे बिना दूध के,
बिना आहार के, बिना पढ़ाई के बिना
वस्त्रों के नंगे-भूखे घूम रहे हैं और आप बेईमानी करके, देश को शोषित करके
देश-परदेश में पैसा जमा कर रहे हैं-यह बुद्धिमत्ता है ?
अन्धं तमः प्रविशन्ति…(ईशावास्योपनिषद्-12)
उपनिषद
कहती है वे अंधकार में फँस जाते हैं।
इस
कथा के साथ सम्राट अशोक को सबके मंगल में लगाने वाली एक कन्या का इतिहास जुड़ा है।
सेनापति बोलाः “परंतु चिंता की बात है कि अभी तक दुर्ग का द्वार खोलने में हम सफल
नहीं हो पाये।”
अशोकः
“कोई बात नहीं, कल
सुबह हम स्वयं सेना की आगेवानी करेंगे और दुर्ग का द्वार खुलवा देंगे।”
सुबह
अशोक और उसकी सेना दुर्ग के द्वार के पास पहुँची। सम्राट ने अपनी सेना को सम्बोधित
कियाः “मगध के बहादुरो ! तुम्हारे अथक प्रयास से कलिंग देश का राजा मारा गया है।
अब दुर्ग का द्वार खोलना है। आज मेरी आगेवानी में दुर्ग का द्वार खोला जायेगा।
अन्धं तमः प्रविशन्ति…
बाहर
की सम्पदावाले का द्वार खोलना यह अंधकूप में गिरना है किंतु अपने हृदय का द्वार
खोलकर हृदयेश्वर का ज्ञान पाना यह प्रकाशपुंज प्रकटाना है। जीवन में ज्ञान का, सजगता का, विवेक का प्रकाश हो
और श्रद्धा हो। बिना विवेक की श्रद्धावाले को कोई भी फँसा देता है। ऐसे श्रद्धालुओं
का शोषण होता रहता है। यह विवेक तुम्हें जगाता है। विवेक के बिना श्रद्धा अंधी
होती है, कहीं-न-कहीं
अनुचित स्थान पर फँसी रहती है और श्रद्धा के बिना विवेक उद्दंड होता है। मनमाना
सफलता का मापदंड लेकर चल पड़ता है। उसी रास्ते था अशोक।
दुर्ग
का द्वार खोलने के लिए सैनिकों को उत्साहित किया,
रणभेरी,
विजय का बिगुल बजवाया। अपने बल से द्वार
खोलें उसके पहले अचानक द्वार खुल गया। अंदर से पद्मा नाम की राजकन्या घोड़े पर
सवार होकर अपनी कई महिला सैनिकों के साथ गर्जना करती हुई निकली।
पद्मा
बोलीः “सम्राट अशोक ! दुर्ग में प्रवेश करने का दुस्साहस न करो। जब तक हमारे शरीर
में प्राण हैं, तब
तक तुम दुर्ग में प्रवेश नहीं कर सकते। मेरे पिता के हत्यारे !
अपने लाखों-लाखों सैनिकों को कुर्बान करके अहं पोसने वाले और हमारे लाखों सैनिकों
की जान लेकर अपनी वासना की तृप्ति में लगे हुए अंधकूप में जाने वाले सम्राट !
सावधान !!”
धन
कमा के, सत्ता
कमा के, चीजें
कमा के बड़ा बनने की जो अंध-परम्परा है,
उसको कलिंग देश की एक कन्या ने ललकार
दिया । सत्संगी कन्या ने कहाः “तुम्हारे पिता बिंदुसार का राज्य भी तुम नहीं ले
जाओगे तो दूसरों का राज्य छीनकर क्या करोगे ?
कई राजाओं को तुमने मौत के घाट उतारा।
लाखों आदमी मारे गये। कितने सैनिकों के मासूम बच्चे रोते होंगे, कितने सैनिकों की
माताएँ रोती होंगी, कितने
सैनिकों की पत्नियाँ रोती होंगी…. तुमने कइयों को अनाथ बना दिया। यह राज्यसत्ता है
कि अंधसत्ता है ? राजा
तो प्रजा का पालक, मानवता
का पालक होना चाहिए। राजा ही मानवता का विनाशी हो गया !”
अभी 700
करोड़ लोग हैं। हम मर-मर के सात बार
मरें इतने बम तो तैयार है लेकिन फिर भी रात-दिन बम बनाये जा रहे हैं। दूसरों को
मारकर, लूट-खसोटकर
बड़ा बनना यह अंधकूप में गिरना है।
सासु
! बहू को तुम मत दबोचो। बहू ! तुम सासु को मत नीचा दिखाओ। जेठानी, देवरानी की निंदा
करके अंधकूप में मत गिरो बेटी ! देवरानी ! जेठानी में दोष देखकर अंधकूप में मत
गिरो। पड़ोसी-पड़ोसी एक दूसरे को नीचा दिखाकर अपना मन, जीवन कूप में मत
गिराओ। नित्य प्रकाश में रहो। वेद कहता है।
असतो मा सदगमय।
हम
असत्य से बचकर सत्य की तरफ जायें। तो सत् क्या है,
असत् क्या है-यह अंधकार में नहीं
दिखेगा। इसीलिए वेद भगवान की प्रार्थना हैः तमसो मा ज्योतिर्गमय।
अंधकार
से निकलकर हम प्रकाश में जियें।
“सम्राट ! तुम अंधकूप
में स्वयं परेशान हो और अपनी प्रजा को भी परेशान कर रहे हो। प्रजा से कर नोचकर
लोगों को मरवा रहे हो। तुम्हें शांति नहीं है। तुम अपने दिल पर हाथ रखो, क्या तुम्हारे जीवन
में बरकत है ? है
प्रसन्नता ? है
शांति ? नाच-गान, ऐश आराम और मारकाट, लूट-खसोट, अधिकार-लोलुपता के
अलावा तुम्हारी जिंदगी में कोई और चीज है ?
तुम्हें द्वार में प्रवेश करने के पहले
हमसे युद्ध करना होगा। तुमने मेरे पिता की हत्या की है, हमारे देशवासियों की
हत्या की है। मैं तुमको नहीं छोड़ूँगी ! जब तक मैं जिंदा हूँ, तुम इस द्वार के अंदर
नहीं जा सकते।”
अशोक
बोलाः “तुम तो स्त्री जाति हो, स्त्री के ऊपर हथियार उठाना अधर्म है।”
“आज तक तुमने क्या
धर्म किया है ? निर्दोष
प्रजा को अपना अहं पोसने के लिए मरवाया। तुम क्या ले जाओगे साथ में ? राज्य में संतोष नहीं
है। इनको मारा, उनको
मारा…. अपनी लोभ-वासना को तो मारा नहीं,
अपने अहंकार को, अपनी पाप की इच्छा को
तो मारा नहीं, दूसरों
को मारकर तुमने क्या किया ? तुम
धर्म की बात करते हो ? तुमने
क्या धर्म किया है ?”
सम्राट
अशोक निरूत्तर हो गया। पद्मा का सारगर्भित सत्संग सुनकर अशोक ने सोचा कि “आज से
मैं यह हिंसा का रास्ता, शोषण
का रास्ता, अहं
पोसने का रास्ता, विषय
विकारों का रास्ता त्यागता हूँ और सत्संग की शरण जाऊँगा।”
अशोक
ने हाथ में पकड़ी हुई तलवार फैंक दी और सिर नीचे करते हुए कहता हैः “कलिंगनरेश की
कन्या ! मैं तुम्हारे पिता का हत्यारा हूँ और तुम्हारे कलिंग देश के लाखों लोगों
का हत्यारा हूँ। मैं गुनहगार हूँ। यह सिर झुकाकर रखता हूँ तुम्हारे सामने, तुम अपनी चमचमाती
तलवार से बदला ले सकती हो।”
तब
भारत की कन्या कहती हैः “सम्राट ! निहत्थे पर वार करना हमारे धर्म में नहीं है। आप
तलवार उठाइये और युद्ध करिये।”
अशोकः
“नहीं, अब
युद्ध नहीं होगा। तुमने मेरी आँखें खोल दीं। यह वासना है, अहंकार है कि मेरा
राज्य और….. और बढ़े।”
पद्माः
“तो हमने तुमको हृदयपूर्वक माफ किया,
तुम्हारा मंगल हो।”
क्या
एक प्रकाश में जीने वाली कन्या, सत्संग मे जीने वाली कन्या अशोक का हृदय बदलने में सफल नहीं
हुई ?
अशोकः
“अभी भी मुझे अशांति है। मुझे शांति कैसे मिली ?”
पद्माः
“सम्राट ! युद्ध करने से, सत्ता
बढ़ाने से शांति नहीं मिलती। निरपराध लोगों की हत्या करके अहं पोसने से भी कदापि
शांति नहीं मिलती।”
“ठीक
कहती हो राजकन्या !”
“अब अपने आत्मा की
अशांति को, भीतर
की लानत को मिटाना हो तो जाओ, जो सैनिक कराह रहे हैं उन्हें देखो।”
उधर
रणभूमि में गये तो क्या देखते हैं कि हजारों-हजारों लाखें पड़ी हैं। हजारों-हजारों
अधमरे होकर कराह-कराह रहे हैं…. किसी की भुजा कटी है तो किसी का पैर कटा है तो
किसी को पेट में बाण लगे हैं। किसी की आँखें गयी हैं तो किसी का कुछ…. उस दृश्य को
निहारता है अशोक। हृदय पानी-पानी हो गया कि ʹहे अज्ञान ! हे नासमझी !! तुझे धिक्कार है ! कितने लोगों की
जानें, कितने
लोगों का धन लेकर तू बड़ा बनना चाहता है !ʹ
साधु
लोग घायलों की मरहमपट्टी कर रहे हैं,
किसी को पानी पिला रहे हैं। ʹओ….हो ! मेरे एक
अज्ञान के कारण कि मैं सम्राट अशोक हूँ और बड़ा बनूँ…… बड़ा बनने वाला शरीर तो मर
जायेगा और मैंने इतने लोगों की जानें लीं ! ओ बाप रे ! मुझे शांति कौन देगा ?ʹ
अशोकः
“हे साधु ! मेरे कर्मों ने मुझे अशांत किया है,
मुझे शांति कैसे मिलेगी ?”
जो
साधु-संत सेवा कर रहे ते वे बोलेः “अरे,
शांति मिलेगी। निर्णय करो कि दूसरों को
सताकर मैं सुखी होने की गलती
नहीं करूँगा।
अपने दुःख में रोने वाले….
काम आना सीख ले।।
किसी
की जान लेना मत सीखो, किसी
के काम आना सीखो। जो दूसरों के दुःख नहीं हरता,
उसका दुःख मिटता नहीं और जो दूसरों को
दुःखी करके सुखी होता है, उसका
दुःख बढ़ जाता है। तुम्हारी वही दशा है।”
अशोकः “तो मैं क्या करूँ ?”
“सत्यं शरणं गच्छामि।
आत्मा सत्य है, परमात्मा
सत्य है, उसकी
शरण आओ। शरीर मिथ्या है, अहंकार
मिथ्या है, वासना
मिथ्या है। बच्चे की बचपन की वासना अलग होती है। युवक को जवानी की वासना अलग होती
है और अलग-अलग युवकों की अलग-अलग वासना होती है। वासना सत्य नहीं है। वासना के
पहले जो वासना को जानता है, वासना
पूर्ति के बाद जो वासना की पोल जानता है वह परमात्मा सत्य है। तुम परमात्मा की शरण
क्यों नहीं जाते हो ? तुमसे
वह दूर नहीं, दुर्लभ
नहीं है, परे
नहीं है, पराया
नहीं है। दूर देशों पर हावी होकर, कत्लेआम करवाकर मैं बड़ा राजा हूँ…. लंकापति रावण की लंका नहीं
बची तो सम्राट अशोक यह नगर बचेगा क्या ?
तुम्हारा शरीर बचेगा क्या ?”
“नहीं, अब मैं क्या करूँ ?”
“क्या करूँ ? अब सत्य की शरण चलो।
किसी को दुःख न दो। किसी को बुरा न मानो,
किसी का बुरा न चाहो, किसी का बुरा कर करो, सबकी भलाई सोचो।
सम्राट अशोक ! तुम ऐतिहासिक पुरुष हो जाओगे।”
“जो
आज्ञा महाराज !”
दूसरों
को सताकर बड़ा बनने वाला अशोक पहले अहंकार की शरण था, सत्संग के दो वचन
सुनकर कि ʹदूसरों
में भी अपना आत्मा-परमात्मा हैʹ, सत्य की शरण गया। सम्राट अशोक ने प्रण कर लिया कि ʹअब मैं हथियार नहीं
उठाऊँगा।ʹ फिर
राज्य तो किया पर हथियार नहीं उठाया। आज भी सम्राट अशोक का अशोकचिह्न भारत सरकार
के रूपयों पर है।
सत्संग
ने क्या कमाल कर दिया ! कितना हत्यारा व्यक्ति और पद्मा के मुँह से सत्संग के दो
वचन मिले, साधु
के मुँह से सत्संग के दो वचन मिले तो लाखों लोगों की जान लेने वाला मानवीय
संवेदनाविहीन अशोक लाखों के आँसू पोंछने वाला सम्राट अशोक हो गया, क्रूर सम्राट में से
सज्जन सम्राट हो गया।