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सेवा में सावधानी


 

सेवा वाला जो अधिकार चाहता है , सेवा में जो अधिकार के लोलुप होते है .. जो शुरू में अधिकार चाहता है ..मैं ये करूँगा,ये नहीं  करूँगा..वो सेवक होने में नालायक होता है!

सेवक तो हनुमानजी है ! कोई अधिकार की ख्वाहिश नहीं ! और ये करूँगा… ये नहीं  करूँगा….. नहीं, जिस समय जो सेवा मिल जाती है, लग जाते हैं वो उत्तम सेवक होता है! जो अधिकार लेकर सेवा करना चाहता है वह बाद में वासनावान होकर भोगी बनकर संसार के जन्म मरण में फिरता है।

जो सेवा के सद्गुण से सम्पन्न होकर सेवा करता है तो उसमें विवेक वैराग्य जगता है और अंत में भगवान का प्रेमी और ज्ञानी भक्त बन जाता है। जो सेवक है और प्रेम नहीं  है तो समझो सेवा रॉंग साइड पर है।

सेवा, सब ते सेवा धर्म कठोरा …

क्योंकि मान, बड़ाई और भोग का त्याग करनेवाला ही सच्चा सेवक हो सकता है और जो सेवक को मिलता है वो बड़े बड़े तपस्वियों को भी नहीं  मिलता !

हिरण्यकश्यपु तपस्वी था । सोने की हिरणपूर मिली लेकिन शबरी सेवक को जो सुख मिला वो हिरण्यकश्यपु ने कहाँ देखा ? रावण ने कहाँ देखा ? मुझे मेरे गुरुदेव की सेवा और दैवी कार्य की सेवा से जो मिला है वो बेचारे रावण को कहाँ था!

सेवक को जो मिलता है उसका कोई बयान नहीं कर सकता लेकिन सेवक ईमानदारी से सेवा करे । दिखावटी सेवक कई आए कई गए, जरा-सा टाईट किया अथवा हेरा-फेरी करनेवाले फिर कई दिनेश जैसे सेवक भाग गए । ये सेवा के बहानेवाले सेवक घुस जाते है न तो गड़बड़ी करते है।

ऋषिप्रसाद में जो सच्चे हृदय से सेवा करेगा तो उसका उद्देश्य होगा । हम क्या चाहते हैं वो नहीं ..वो क्या चाहते हैं और उनका कैसे मंगल हो, सेवक का ये उद्देश्य होता है । आप क्या चाहते है और आपका कैसे मंगल हो ये  मेरी सेवा का उद्देश्य होना चाहिए ।

आपको पटा के दान दक्षिणा ले लूँ तो सेवा के बहाने मैं जन्म-मरण के चक्कर में जा रहा हूँ । सेवा में बड़ी सावधानी चाहिए! जो प्रेमी होता है, सद्गुरुओं का सत्संग होता है जिसके जीवन में, मंत्र दीक्षा होती है, भगवान का महत्व समझता है और मनुष्य जीवन का महत्व समझता है, वही सेवा से लाभ उठाता है, बाकी के सेवा से लाभ क्या उठाते है, सेवा से मुसीबत मोल लेते है । “मैं फलाना हूँ, मैं फलाना हूँ!…वासना बढ़ाते है और संसार में डूब मरते है !

जो संसार में डुबा दे सेवा, वो सेवा नहीं  है, वो तो मुसीबत बुलानेवाली चालाकी है । जो संसार की आसक्ति मिटाकर अपने लिए कुछ नहीं  चाहिए, अपना शरीर भी नहीं रहेगा… हम दूसरों के काम आएंगे तो अपने आप केबिन बनती है, अपने आप रेल गाड़ियाँ बनती है..

अपनी चाह छोड़ दे, दूसरे की भलाई में ईमानदारी से लग जाए उसके दोनों हाथ में लड्डू! यहाँ भी मौज वहाँ भी मौज !

पूरे है वो मर्द जो हर हाल में खुश है…

तो माँ की सेवा करे,पति की सेवा करे,पत्नी की, समाज की लेकिन बदला न चाहे वो उसका कर्मयोग हो जाएगा,उसके भक्ति में योग आ जाएगा, उसके ज्ञान में भगवान का योग आ जाएगा । आपके जीवन में सभी क्षेत्र में आनंद है।

..क्या करें, मुझे सफलता नहीं  मिलती.. तो टट्टू तू सफलता के लिए ही करता है, वाहवाही के लिए! जितना वाहवाही का स्वार्थ  होता है उतना ही विफल होता है और जितना दूसरे की  भलाई का उद्देश्य होता है उतना ही सफल होता है । मैं सफल नहीं  होता हूँ , मैं सफल नहीं  होता हूँ..होगा भी नहीं  !स्वार्थी आदमी क्या सफल होंगे? स्वार्थ में आदमी कितने भी सफल दिखे फिर भी अंदर से अशान्त होंगे, वाईन पीकर  सुख ढूँढेंगे और क्लबों में जाके सुख ढूँढेंगे । क्या खाक तुमने !

अब वो मुबारक राष्ट्रपति बन गए, सेवा का बहाना हुआ लेकिन अभी पुलिस की हिरासत में है। क्या झक मारा सेवा ने! सेवा तो शबरी की है,सेवा तो रामजी की है,सेवा तो कृष्ण की है, सेवा तो कबीर की है और सेवा तो ऋषिप्रसाद वालों की है! सेवा ओर सेवकों की है।  बड़े पद पर बैठ गए, बड़ी सेवा करे, ये बेईमानी है! सेवक को कोई पद की जरूरत नहीं  है । सच्चे सेवक के आगे सारे पद आगे पीछे घूमते है। कोई बड़ा पद लेकर सेवा करना चाहता है बिल्कुल झूठी बात है। सेवा में जो अधिकार चाहता है वो वासनावान होकर जगत का मोही हो जाएगा लेकिन सेवा में जो अपना अहं मिटाकर दूसरे की भलाई तन से, मन से, विचारों से दूसरे का मंगल हो और मान मिले चाहे अपमान मिले उसकी परवाह नहीं…  ऐसे हनुमानजी जैसे सेवक का.. ये पूर्णिमा हनुमान जयंती की है…

हनुमानजी देखो  तो..जहाँ छोटा बनना है  छोटे और जहाँ बड़ा बनना है तो बड़े बन जाते है, जहाँ पूछ लंबी करनी है तो लंबी करते है और फिर लंबी पूँछ कैसे ढकीं जाएगी…  चिंता में पड़ गए सारे तो हनुमानजी ने पूँछ को सिकोड़ भी लिया!लेकिन अपना पिता है वायुदेव.. बोले पिताश्री आपका और अग्नि का तो सजातीय सबंध है.. हे वायुदेव अग्नि ना लगे ऐसी कृपा करना ।

हओ…………… राक्षस फूँकते फूँकते ..चामते चामते…. अग्नि लग नहीं  रही !

रावण ने कहा देखो, अग्नि क्यों नहीं  लग रही?हनुमान तुम बताओ।

बोले,हम क्या बताएं ? यजमान जबतक शुद्ध होकर अग्निदेवता को नहीं  बुलाता तबतक अग्नि कैसे लगेगी?ये तो तुम्हारे दूतों के द्वारा लगवा रहे है! ब्राम्हण को जब बुलाते है,आमंत्रित करते है तभी ब्राम्हण भोजन करते है । तो अग्निदेव तो ब्राम्हणों का ब्राम्हण है । आप खुद अग्निदेव को बुलाओ । वो तो एक एक मुख से फूँकते है,आपके तो दस मुख है! ”

देखो अब हनुमानजी !सेवक स्वामी का यश बढ़ाता है! हनुमानजी ने…आज हनुमान जयंती की पूर्णिमा चालू हो रही है।

रावण को लगा कि हनुमान की युक्ति तो ठीक है, चलो अब हम स्वयं अग्नि लगाएँगे! उसने बराबर कुल्ला वुल्ला किया। अग्निदेवता का आह्वान किया ..और बोले  दस-दस मुख तो मैं तो फूँकूँगा तो होगा !

वो लोग फूँकते है तो अग्नि जलती नहीं , धुँआ ..नाक में आँखों मे जलन होती है । परेशान परेशान हो गए थे । अब पूरा घी छटवां दिया और अग्निदेव को आवाहन किया । मन में बेईमानी थी कि ऐसी दस मुखों से ऐसी फूँक मारूँगा कि पूँछ के साथ हनुमानजी भी जल जाए। अब मन में बेईमानी है और अग्निदेवता का सेवक बन रहा है! फूँक तो मारी लेकिन फूँक ऐसी मारी कि हनुमानजी तो क्या जले ,वो आग में उसकी दाढ़ी और मूंछे जल गई! नकट्टा हो गया ! ये सेवा का बहाना करके सेवा कर रहा है !  हनुमानजी ने चपट मार दी कि रावण का नाक काट दिया ।

बोला कि ये हनुमानजी मर जाएँगे तो मेरा बड़ा यश होगा..ऐसी फूँक मारूँ कि फूँक उभरे!…फूँक मारी ..सीधे अपने मुँह पे ! एकदम न्यू बुलेटिन है कि नहीं  है हनुमान जयंती की!

ॐ     नारायण नारायण…

हमको दस बजे का जहाज पकड़ना था,वो जहाज पकड़ो न पकड़ो बारह बजे जाएँगे, सवा बारह बजे  जाएँगे…  क्या घाटा पड़ता है! वहाँ सुरेश संभाल लेंगे मोर्चा और यहाँ बहादुरगढ़ के कई बहादुर… जो कल नहीं  आए थे, परसो नहीं आए आज ही आए हैं हाथ ऊपर करो..

बापरे…  बाप.. अब इनको छोड़के कैसे जाऊँ? दस बजे के जहाज की ऐसी-तैसी ! ग्यारह बजे के जहाज में भी नहीं जाएँगे, जाएँगे तो बारह बजे के बाद ही जाएँगे ! यहाँ से तो ग्यारह बजे जाऊँगा लेकिन बारह बजके कुछ मिनट के बाद का जहाज पकडूँगा। भले वलसाड लेट पहुँचेंगे तो क्या बात है? ये नये ग्राहक छोड़ के चले जाएं?..

नए ग्राहक सुन लेना.. कल हमने हरड़ रसायन बाँटी थी । वो दो गोली रोज  चूसने से स्वास्‍थ्य बढ़िया होता है, टॉनिक का काम करती है । जिसको हरड़ रसायन प्रसाद मिली कल वे हाथ ऊपर करो.. ठीक है.. आप आए थे..

जिसको नहीं मिली वे हाथ ऊपर करो.. आप आए नहीं थे तो आपको आज मिले, ऐसी कोशिश करेंगे । अरे बोलते नहीं…  वाह बापू वाह ! वाह गुरु वाह ! वाह गुरु वाह !

अब दीक्षावाले सुन लो …गंजे आदमी को भी कंघी बेचो.. तेरा काला मुँह हो जाएगा । दुसरे को ठग के आप अपना काम सीधा बनाते है आपका भविष्य उज्जवल नहीं  है । अपनेको थोड़ा नुकसान सहके भी दूसरे का भला करते है आपका भविष्य भले में ही भले में ,भले में ही भले में है।

कबीरा आप ठगाइयेऔर न ठगिये कोई

आप ठगायै सुख उपजे,और ठगे दुःख होई….

जो अपने सुख के लिए दूसरे को कष्ट देता है उसको बड़े दुःख के लिए तैयार रहना पड़ेगा लेकिन दूसरे के सुख के लिए अपने को दौड़-धाम में या कष्ट में रख देता है, परवाह नहीं  करता उसके लिए परम-सुख परमात्मा हाजिर हो जाता है, ऐसा है सिद्धांत !

वे लोग धनभागी है जो सत्संग में आते है, सत्संग सुनते है तभी कर्म कर्मयोग होता है, भक्ति भक्तियोग होता है, ज्ञान ज्ञानयोग होता है नहीं  तो रूखा मन… फिर सेक्सी बनता है, शराबी बनता है, पान मसालेवाला बनता है,जिसके जीवन में कर्मयोग का महत्व नहीं वो शुष्क प्राणी चोरी छुपे काला मुँह करता है।

कर्मयोग का आनंद है तो उसके लिए मौज है, अंतरात्मा का रस है फिर काहे को बेईमानी से क्रूर कपट करेगा, गिरेगा ? सेवा का महत्व नहीं जानते है वे ही बदमाशी करते है । तो आप माता की, पिता की, भगवान की…

बोले-माता पिता की सेवा पहले करनी चाहिए कि देश की सेवा पहले करनी चाहिए ? अरे बुद्धू ये पूछने का सवाल है क्या? माता पिता ने जन्म दिया है, उनका आप ऋण लेकर आए हैं, उनकी सेवा करना और उनकी सेवा है तो भगवान को पाया ! तो उनकी 21 पीढ़ी तार लिया! तो वही पहली सेवा है ,देश की भी हो जाएगी ! हम देश की भी सेवा कर रहे है ! लेकिन पहले माता पिता की, संस्कृति की, भगवान की प्राप्ति का इरादा बनाया तो सब सेवाएँ हो जाती है ।

किसकी सेवा करूँ? किसकी सेवा करूँ? तू इरादा बना ले ऊँचा, सब ठीक हो जाएगा ! दीक्षा ले रहे हैं तो ऊँचा इरादा है न? फिर?

बिस्तर से उठे, थोड़ी कसरत कर लो।

 

आदित्यहृदय स्तोत्र


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‘आदित्यहृदय स्तोत्र’

विनियोग

ॐ अस्य आदित्य हृदयस्तोत्रस्यागस्त्यऋषिरनुष्टुपछन्दः, आदित्यहृदयभूतो

भगवान ब्रह्मा देवता निरस्ताशेषविघ्नतया ब्रह्मविद्यासिद्धौ सर्वत्र जयसिद्धौ च विनियोगः।

ऋष्यादिन्यास

ॐ अगस्त्यऋषये नमः, शिरसि। अनुष्टुपछन्दसे नमः, मुखे। आदित्यहृदयभूतब्रह्मदेवतायै नमः हृदि।

ॐ बीजाय नमः, गुह्ये। रश्मिमते शक्तये नमः, पादयो:। ॐ तत्सवितुरित्यादिगायत्रीकीलकाय नमः नाभौ।

करन्यास

ॐ रश्मिमते अंगुष्ठाभ्यां नमः। ॐ समुद्यते तर्जनीभ्यां नमः।

ॐ देवासुरनमस्कृताय मध्यमाभ्यां नमः। ॐ विवस्‍वते अनामिकाभ्यां नमः।

ॐ भास्कराय कनिष्ठिकाभ्यां नमः। ॐ भुवनेश्वराय करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः।

हृदयादि अंगन्यास

ॐ रश्मिमते हृदयाय नमः। ॐ समुद्यते शिरसे स्वाहा। ॐ देवासुरनमस्कृताय शिखायै वषट्।

ॐ विवस्वते कवचाय हुम्। ॐ भास्कराय नेत्रत्रयाय वौषट्। ॐ भुवनेश्वराय अस्त्राय फट्।

 

इस प्रकार न्यास करके निम्नांकित मंत्र से भगवान सूर्य का ध्यान एवं नमस्कार करना चाहिए-

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।

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आदित्यहृदय स्तोत्र

ततो युद्धपरिश्रान्तं समरे चिन्तया स्थितम्‌ ।

रावणं चाग्रतो दृष्ट्वा युद्धाय समुपस्थितम्‌ ॥1॥

दैवतैश्च समागम्य द्रष्टुमभ्यागतो रणम्‌ ।

उपगम्याब्रवीद् राममगस्त्यो भगवांस्तदा ॥2॥

उधर श्री रामचन्द्रजी युद्ध से थककर चिन्ता करते हुए रणभूमि में खड़े थे। इतने में रावण भी युद्ध के लिए उनके सामने उपस्थित हो गया। यह देख भगवान अगस्त्य मुनि, जो देवताओं के साथ युद्ध देखने के लिए आये थे, श्रीराम के पास जाकर बोले।

राम राम महाबाहो श्रृणु गुह्मं सनातनम्‌ ।

येन सर्वानरीन्‌ वत्स समरे विजयिष्यसे ॥3॥

‘सबके हृदय में रमण करने वाले महाबाहो राम ! यह सनातन गोपनीय स्तोत्र सुनो। वत्स ! इसके जप से तुम युद्ध में अपने समस्त शत्रुओं पर विजय पा जाओगे।’

आदित्यहृदयं पुण्यं सर्वशत्रुविनाशनम्‌ ।

जयावहं जपं नित्यमक्षयं परमं शिवम्‌ ॥4॥

सर्वमंगलमागल्यं सर्वपापप्रणाशनम्‌ ।

चिन्ताशोकप्रशमनमायुर्वर्धनमुत्तमम्‌ ॥5॥

‘इस गोपनीय स्तोत्र का नाम है ‘आदित्यहृदय’। यह परम पवित्र और सम्पूर्ण शत्रुओं का नाश करने वाला है। इसके जप से सदा विजय की प्राप्ति होती है। यह नित्य अक्ष्य और परम कल्याणमय स्तोत्र है। सम्पूर्ण मंगलों का भी मंगल है। इससे सब पापों का नाश हो जाता है। यह चिन्ता और शोक को मिटाने तथा आयु को बढ़ाने वाला उत्तम साधन है।’

रश्मिमन्तं समुद्यन्तं देवासुरनमस्कृतम्‌ ।

पुजयस्व विवस्वन्तं भास्करं भुवनेश्वरम्‌ ॥6॥

‘भगवान सूर्य अपनी अनन्त किरणों से सुशोभित (रश्मिमान्) हैं। ये नित्य उदय होने वाले (समुद्यन्), देवता और असुरों से नमस्कृत, विवस्वान् नाम से प्रसिद्ध, प्रभा का विस्तार करने वाले (भास्कर) और संसार के स्वामी (भुवनेश्वर) हैं। तुम इनका (रश्मिमते नमः, समुद्यते नमः, देवासुरनमस्कताय नमः, विवस्वते नमः, भास्कराय नमः, भुवनेश्वराय नमः इन नाम मंत्रों के द्वारा) पूजन करो।’

सर्वदेवात्मको ह्येष तेजस्वी रश्मिभावन: ।

एष देवासुरगणांल्लोकान्‌ पाति गभस्तिभि: ॥7॥

‘सम्पूर्ण देवता इन्हीं के स्वरूप हैं। ये तेज की राशि तथा अपनी किरणों से जगत को सत्ता एवं स्फूर्ति प्रदान करने वाले हैं। ये ही अपनी रश्मियों का प्रसार करके देवता और असुरों सहित सम्पूर्ण लोकों का पालन करते हैं।’

एष ब्रह्मा च विष्णुश्च शिव: स्कन्द: प्रजापति: । महेन्द्रो धनद: कालो यम: सोमो ह्यापां पतिः ॥8॥

पितरो वसव: साध्या अश्विनौ मरुतो मनु: । वायुर्वहिन: प्रजा प्राण ऋतुकर्ता प्रभाकर: ॥9॥

‘ये ही ब्रह्मा, विष्णु, शिव, स्कन्द, प्रजापति, इन्द्र, कुबेर, काल, यम, चन्द्रमा, वरूण, पितर, वसु, साध्य, अश्विनीकुमार, मरुदगण, मनु, वायु, अग्नि, प्रजा, प्राण, ऋतुओं को प्रकट करने वाले तथा प्रभा के पुंज हैं।’

आदित्य: सविता सूर्य: खग: पूषा गभस्तिमान्‌ ।

सुवर्णसदृशो भानुर्हिरण्यरेता दिवाकर: ॥10॥

हरिदश्व: सहस्त्रार्चि: सप्तसप्तिर्मरीचिमान्‌ ।

तिमिरोन्मथन: शम्भुस्त्वष्टा मार्तण्डकोंऽशुमान्‌ ॥11॥

हिरण्यगर्भ: शिशिरस्तपनोऽहस्करो रवि: ।

अग्निगर्भोऽदिते: पुत्रः शंखः शिशिरनाशन: ॥12॥

व्योमनाथस्तमोभेदी ऋग्यजु:सामपारग: ।

घनवृष्टिरपां मित्रो विन्ध्यवीथीप्लवंगमः ॥13॥

आतपी मण्डली मृत्यु: पिगंल: सर्वतापन:।

कविर्विश्वो महातेजा: रक्त:सर्वभवोद् भव: ॥14॥

नक्षत्रग्रहताराणामधिपो विश्वभावन: ।

तेजसामपि तेजस्वी द्वादशात्मन्‌ नमोऽस्तु ते ॥15॥

‘इन्हीं के नाम आदित्य (अदितिपुत्र), सविता (जगत को उत्पन्न करने वाले), सूर्य (सर्वव्यापक), खग (आकाश में विचरने वाले), पूषा (पोषण करने वाले), गभस्तिमान् (प्रकाशमान), सुर्वणसदृश, भानु (प्रकाशक), हिरण्यरेता (ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति के बीज), दिवाकर (रात्रि का अन्धकार दूर करके दिन का प्रकाश फैलाने वाले), हरिदश्व (दिशाओं में व्यापक अथवा हरे रंग के घोड़े वाले), सहस्रार्चि (हजारों किरणों से सुशोभित), तिमिरोन्मथन (अन्धकार का नाश करने वाले), शम्भू (कल्याण के उदगमस्थान), त्वष्टा (भक्तों का दुःख दूर करने अथवा जगत का संहार करने वाले), अंशुमान (किरण धारण करने वाले), हिरण्यगर्भ (ब्रह्मा), शिशिर (स्वभाव से ही सुख देने वाले), तपन (गर्मी पैदा करने वाले), अहरकर (दिनकर), रवि (सबकी स्तुति के पात्र), अग्निगर्भ (अग्नि को गर्भ में धारण करने वाले), अदितिपुत्र, शंख (आनन्दस्वरूप एवं व्यापक), शिशिरनाशन (शीत का नाश करने वाले), व्योमनाथ (आकाश के स्वामी), तमोभेदी (अन्धकार को नष्ट करने वाले), ऋग, यजुः और सामवेद के पारगामी, घनवृष्टि (घनी वृष्टि के कारण), अपां मित्र (जल को उत्पन्न करने वाले), विन्ध्यीथीप्लवंगम (आकाश में तीव्रवेग से चलने वाले), आतपी (घाम उत्पन्न करने वाले), मण्डली (किरणसमूह को धारण करने वाले), मृत्यु (मौत के कारण), पिंगल (भूरे रंग वाले), सर्वतापन (सबको ताप देने वाले), कवि (त्रिकालदर्शी), विश्व (सर्वस्वरूप), महातेजस्वी, रक्त (लाल रंगवाले), सर्वभवोदभव (सबकी उत्पत्ति के कारण), नक्षत्र, ग्रह और तारों के स्वामी, विश्वभावन (जगत की रक्षा करने वाले), तेजस्वियों में भी अति तेजस्वी तथा द्वादशात्मा (बारह स्वरूपों में अभिव्यक्त) हैं। (इन सभी नामों से प्रसिद्ध सूर्यदेव !) आपको नमस्कार है।’

नम: पूर्वाय गिरये पश्चिमायाद्रये नम: ।

ज्योतिर्गणानां पतये दिनाधिपतये नम: ॥16॥

‘पूर्वगिरी उदयाचल तथा पश्चिमगिरि अस्ताचल के रूप में आपको नमस्कार है। ज्योतिर्गणों (ग्रहों और तारों) के स्वामी तथा दिन के अधिपति आपको प्रणाम है।’

जयाय जयभद्राय हर्यश्वाय नमो नम: ।

नमो नम: सहस्त्रांशो आदित्याय नमो नम: ॥17॥

‘आप जय स्वरूप तथा विजय और कल्याण के दाता है। आपके रथ में हरे रंग के घोड़े जुते रहते हैं। आपको बारंबार नमस्कार है। सहस्रों किरणों से सुशोभित भगवान सूर्य ! आपको बारंबार प्रणाम है। आप अदिति के पुत्र होने  के कारण आदित्य नाम से प्रसिद्ध है, आपको नमस्कार है।’

नम उग्राय वीराय सारंगाय नमो नम: ।

नम: पद्मप्रबोधाय प्रचण्डाय नमोऽस्तु ते ॥18॥

ब्रह्मेशानाच्युतेशाय सुरायादित्यवर्चसे ।

भास्वते सर्वभक्षाय रौद्राय वपुषे नम: ॥19॥

‘(परात्पर रूप में) आप ब्रह्मा, शिव और विष्णु के भी स्वामी हैं। सूर आपकी संज्ञा हैं, यह सूर्यमण्डल आपका ही तेज है, आप प्रकाश से परिपूर्ण हैं, सबको स्वाहा कर देने वाला अग्नि आपका ही स्वरूप है, आप रौद्ररूप धारण करने वाले हैं, आपको नमस्कार है।’

तमोघ्नाय हिमघ्नाय शत्रुघ्नायामितात्मने ।

कृतघ्नघ्नाय देवाय ज्योतिषां पतये नम: ॥20॥

‘आप अज्ञान और अन्धकार के नाशक, जड़ता एवं शीत के निवारक तथा शत्रु का नाश करने वाले हैं, आपका स्वरूप अप्रमेय है। आप कृतघ्नों का नाश करने वाले, सम्पूर्ण ज्योतियों के स्वामी और देवस्वरूप हैं, आपको नमस्कार है।’

तप्तचामीकराभाय हरये विश्वकर्मणे ।

नमस्तमोऽभिनिघ्नाय रुचये लोकसाक्षिणे ॥21॥

 

‘आपकी प्रभा तपाये हुए सुवर्ण के समान है, आप हरि (अज्ञान का हरण करने वाले) और विश्वकर्मा (संसार की सृष्टि करने वाले) हैं, तम के नाशक, प्रकाशस्वरूप और जगत के साक्षी हैं, आपको नमस्कार है।’

नाशयत्येष वै भूतं तमेष सृजति प्रभु: ।

पायत्येष तपत्येष वर्षत्येष गभस्तिभि: ॥22॥

‘रघुनन्दन ! ये भगवान सूर्य ही सम्पूर्ण भूतों का संहार, सृष्टि और पालन करते हैं। ये ही अपनी किरणों से गर्मी पहुँचाते और वर्षा करते हैं।’

एष सुप्तेषु जागर्ति भूतेषु परिनिष्ठित: ।

एष चैवाग्निहोत्रं च फलं चैवाग्निहोत्रिणाम्‌ ॥23॥

‘ये सब भूतों में अन्तर्यामीरूप से स्थित होकर उनके सो जाने पर भी जागते रहते हैं। ये ही अग्निहोत्र तथा अग्निहोत्री पुरुषों को मिलने वाले फल हैं।’

देवाश्च क्रतवश्चैव क्रतुनां फलमेव च ।

यानि कृत्यानि लोकेषु सर्वेषु परमं प्रभु: ॥24॥

‘(यज्ञ में भाग ग्रहण करने वाले) देवता, यज्ञ और यज्ञों के फल भी ये ही हैं। सम्पूर्ण लोकों में जितनी क्रियाएँ होती हैं, उन सबका फल देने में ये ही पूर्ण समर्थ हैं।’

एनमापत्सु कृच्छ्रेषु कान्तारेषु भयेषु च ।

कीर्तयन्‌ पुरुष: कश्चिन्नावसीदति राघव ॥25॥

‘राघव ! विपत्ति में, कष्ट में, दुर्गम मार्ग में तथा और किसी भय के अवसर पर जो कोई पुरुष इन सूर्यदेव का कीर्तन करता है, उसे दुःख नहीं भोगना पड़ता।’

पूजयस्वैनमेकाग्रो देवदेवं जगप्ततिम्‌ ।

एतत्त्रिगुणितं जप्त्वा युद्धेषु विजयिष्यसि ॥26॥

‘इसलिए तुम एकाग्रचित होकर इन देवाधिदेव जगदीश्वर की पूजा करो। इस आदित्य हृदय का तीन बार जप करने से तुम युद्ध में विजय पाओगे।’

अस्मिन्‌ क्षणे महाबाहो रावणं त्वं जहिष्यसि ।

एवमुक्ता ततोऽगस्त्यो जगाम स यथागतम्‌ ॥27॥

‘महाबाहो ! तुम इसी क्षण रावण का वध कर सकोगे।’ यह कहकर अगस्त्य जी जैसे आये थे, उसी प्रकार चले गये।

एतच्छ्रुत्वा महातेजा नष्टशोकोऽभवत्‌ तदा ॥

धारयामास सुप्रीतो राघव प्रयतात्मवान्‌ ॥28॥

आदित्यं प्रेक्ष्य जप्त्वेदं परं हर्षमवाप्तवान्‌ ।

त्रिराचम्य शूचिर्भूत्वा धनुरादाय वीर्यवान्‌ ॥29॥

रावणं प्रेक्ष्य हृष्टात्मा जयार्थं समुपागतम्‌ ।

सर्वयत्नेन महता वृतस्तस्य वधेऽभवत्‌ ॥30॥

उनका उपदेश सुनकर महातेजस्वी श्रीरामचन्द्रजी का शोक दूर हो गया। उन्होंने प्रसन्न होकर शुद्धचित्त से आदित्यहृदय को धारण किया और तीन बार आचमन करके शुद्ध हो भगवान सूर्य की ओर देखते हुए इसका तीन बार जप किया। इससे उन्हें बड़ा हर्ष हुआ। फिर परम पराक्रमी रघुनाथजी ने धनुष उठाकर रावण की ओर देखा और उत्साहपूर्वक विजय पाने के लिए वे आगे बढ़े। उन्होंने पूरा प्रयत्न करके रावण के वध का निश्चय किया।

अथ रविरवदन्निरीक्ष्य रामं मुदितमना: परमं प्रहृष्यमाण: ।

निशिचरपतिसंक्षयं विदित्वा सुरगणमध्यगतो वचस्त्वरेति ॥31॥

उस समय देवताओं के मध्य में खड़े हुए भगवान सूर्य ने प्रसन्न होकर श्रीरामचन्द्रजी की ओर देखा और निशाचराज रावण के विनाश का समय निकट जानकर हर्षपूर्वक कहा ‘रघुनन्दन ! अब जल्दी करो’।

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इति श्रीवाल्मीकीये रामायणे युद्धकाण्डे अगस्‍त्‍यप्रोक्‍तमादित्‍यहृदयस्‍तोत्रं सम्‍पूर्णम् ।

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कब्ज से राहत देने वाली अनमोल कुंजियाँ – पूज्य बापू जी


प्रातः पेट साफ नहीं होता हो तो गुनगुना पानी पी के खड़े हो जायें और ठुड्डी को गले के बीचवाले खड्डे में दबायें व हाथ ऊपर करके शरीर को ऊपर खींचें । पंजों के बल कूदें । फिर सीधे लेट जायें, श्वास बाहर छोड़ दें व रोके रखें और गुदाद्वार को 30-32 बार अंदर खींचें, ढीला छोड़ें, फिर श्वास लें । इसको स्थलबस्ती बोलते हैं । ऐसा तीन बार करोगे तो लगभग सौ बार गुदा का संकुचन-प्रसरण हो जायेगा । इससे अपने-आप पेट साफ होगा । और कब्ज के कारण होने वाली असंख्य बीमारियों में से कोई भी बीमारी छुपी होगी तो वह बाहर हो जायेगी ।

सैंकड़ों पाचन-संबंधी रोगों को मिटाना हो तो सुबह 5 से 7 बजे के बीच सूर्योदय से पहले-पहले पेट साफ हो जाय… नहीं तो सूर्य की पहली किरणें शरीर पर लगें, सूर्यस्नान करने से भी पेट साफ होने में मदद मिलती है ।

कई लोग जैसे कुर्सी पर बैठा जाता है, ऐसे ही कमोड (पाश्चात्य पद्धति का शौचालय) पर बैठकर पेट साफ करते हैं । उनका पेट साफ नहीं होता, इससे नुकसान होता है । शौचालय सादा अर्थात् जमीन पर पायदान वाला होना चाहिए । शौच के समय आँतों पर दबाव पड़ना चाहिए, तभी पेट अच्छी तरह से साफ होगा । पहले शरीर का वज़न बायें पैर पर पड़े फिर दायें पैर पर पड़े । इस प्रकार दोनों पैरों पर दबाव पड़ने से उसका छोटी व बड़ी – दोनों आँतों पर प्रभाव होता है, जिससे पेट साफ होने में मदद मिलती है । तो पैरों पर वज़न हो इसी ढंग से शौचालय में बैठें ।

दायाँ स्वर चलते समय मल-त्याग करने से एवं बायाँ स्वर चलते समय मूत्र-त्याग करने से स्वास्थ्य सुदृढ़ होता है ।

सर्दियों में पुष्टि के विशेष प्रयोग

सर्दियों में सुबह 4 से 5 खजूर को घी में सेंककर खा लें । ऊपर से इलायची, मिश्री व 2 ग्राम अश्वगंधा चूर्ण डालकर उबाला हुआ दूध पियें । इससे रक्त, मांस व शुक्र धातु की वृद्धि होती है ।

2 से 3 बादाम रात को पानी में भिगो दें । सुबह छिलके निकाल के बारीक पीस लें व दूध में मिला के उबालें । इसमें मिश्री और 5-10 ग्राम घी मिला के लेने से बल-वीर्य की वृद्धि होती है एवं मस्तिष्क की शक्ति बढ़ती है ।

कृश एवं दुर्बल व्यक्ति बीज निकले 5 खजूर घी में सेंककर सुबह चावल के साथ खाये । इससे वज़न एवं बल में वृद्धि होती है ।

कैसे रखें सर्दी को दूर ?

कुछ लोगों को सर्दी सहन नहीं होती, थरथराते हैं, दाँत से दाँत बजते हैं, हाथ काँपते हैं । वे कड़ाही में थोड़ा सा घी डाल दें और फिर उसमें गुड़ गला दें । जितना गुड़ डालें उतनी सोंठ डाल दें । समझो 25 ग्राम सोंठ डाल दी । उसे घी में गला के सेंक दें । 1-1 चम्मच सुबह-शाम चाटने से सर्दी झेलने की ताकत आ जायेगी ।

राई पीस के शहद के साथ पैरों के तलवे में लगा दें तो सर्दी में ठिठुरना बंद हो जायेगा ।

उत्तम स्वास्थ्य हेतु जानिये शीत ऋतु के अपने आहार-विहार में….

क्या करें क्या न करें
हरड़ चूर्ण घी में भूनकर  नियमित रूप से लेने तथा भोजन  में घी का उपयोग करने से शरीर बलवान होकर दीर्घायुष्य की प्राप्ति होती है । अति श्रम करने वाले, दुर्बल, उष्ण प्रकृतिवाले एवं गर्भिणी को तथा रक्त व पित्त दोष में हरड़ का सेवन नहीं करना चाहिए ।
सर्दियों में प्रतिदिन सुबह खाली पेट 15 से 25 ग्राम काले तिल चबाकर खाने व ऊपर से पानी पीने से शरीर पुष्ट होता है व दाँत मृत्युपर्यंत दृढ़ रहते हैं । तिल और दूध का सेवन एक साथ नहीं करना चाहिए और रात्रि को तिल व तिल के तेल से बनी वस्तुएँ खाना वर्जित है ।
सूर्य किरणें सर्वरोगनाशक व स्वास्थ्यप्रदायक हैं । रोज़ सुबह सिर को ढककर 8 मिनट सूर्य की ओर मुख व 10 मिनट पीठ करकें बैठें । सूर्यकिरणों में अधिक समय तक सिर को ढके बिना रहना व तेज धूप में बैठना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है ।
शीतकाल में व्यायाम व योगासन विशेष जरूरी हैं । इन दिनों जठराग्नि बहुत प्रबल रहने से समय पर पाचन-क्षमता अनुरूप उचित मात्रा में आहार लें अन्यथा शरीर को हानि होगी । दिन में सोना, देर रात तक जागना, अति ठंड सहन करना, अति उपवास आदि शीत ऋतु में वर्जित है । बहुत ठंडे जल से स्नान नहीं करना चाहिए ।

 

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जनवरी 2109, पृष्ठ संख्या 32, 33 अंक 313

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