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13 प्रबल शत्रुओं की उत्पत्ति और विनाश कैसे ?


एक बार युधिष्ठिर ने भीष्म पितामह से पूछाः “पितामह ! क्रोध, काम, शोक, मोह, विधित्सा (शास्त्र विरुद्ध काम करने की इच्छा), परासुता (दूसरों को मारने की इच्छा), मद, लोभ, मात्सर्य, ईर्ष्या, निंदा, दोषदृष्टि और कंजूसी (दैन्य भाव) – ये दोष किससे उत्पन्न होते हैं ?”
भीष्म जी बोलेः “महाराज युधिष्ठिर ! ये तेरह दोष प्राणियों के अत्यंत प्रबल शत्रु हैं, जो मनुष्यों को सब ओर से घेरे रहते हैं। प्रमाद में पड़े हुए पुरुषों को ये अत्यंत पीड़ा देते हैं। मनुष्यों को देखते ही भेड़ियों की तरह बलपूर्वक उन पर टूट पड़ते हैं। इन्हीं से सबको दुःख को प्राप्त होता है, इन्हीं की प्रेरणा से मनुष्य की पापकर्मों में प्रवृत्ति होती है। प्रत्येक पुरुष को सदा इस बात की जानकारी रखनी चाहिए।
अब यह सुनो कि इनकी उत्पत्ति किससे होती है, ये किस तरह स्थिर रहते हैं तथा कैसे इनका विनाश होता है। राजन् ! सबसे पहले क्रोध की उत्पत्ति का यथार्थ रूप से वर्णन करता हूँ। क्रोध लोभ से उत्पन्न होता है, दूसरों के दोष देखने से बढ़ता है, क्षमा करने से थम जाता है और क्षमा से ही निवृत्त हो जाता है।
काम संकल्प से उत्पन्न होता है। उसका सेवन किया जाय तो बढ़ता है और जब बुद्धिमान पुरुष उससे विरक्त हो जाता है, तब वह तत्काल नष्ट हो जाता है।
मोह अज्ञान से उत्पन्न होता है और पाप की आवृत्ति से बढ़ता है। जब मनुष्य तत्त्वज्ञ महापुरुषों एवं विद्वज्जनों में अनुराग करता है, तब उसका मोह तत्काल नष्ट हो जाता है।
जो लोग धर्म के विरोधी ग्रंथों एवं पुस्तकों का ( जैसे – चार्वाक मत के ग्रंथ एवं कामुकता बढ़ाने वाली पुस्तकें, आजकल के गंदी पटकथाओं वाले चलचित्र) अवलोकन कर्म करने की इच्छारूपी विधित्सा उत्पन्न होती है। यह तत्त्वज्ञान से निवृत्त होती है।
जिस पर प्रेम हो, उस प्राणी के वियोग से शोक प्रकट होता है। परंतु जब मनुष्य यह समझ ले कि ‘शोक व्यर्थ है, इससे कोई लाभ नहीं है’ तो तुरंत ही उस शोक की शांति हो जाती है।
क्रोध, लोभ और अभ्यास (दोहराना, आदत बना लेना) के कारण से परासुता प्रकट होती है। सम्पूर्ण प्राणियों के प्रति दया और वैराग्य से वह निवृत्त होती है। परदोष दर्शन से इसकी उत्पत्ति होती है और बुद्धिमानों के तत्त्वज्ञान से वह नष्ट हो जाती है।
सत्य का त्याग और दुष्टों का साथ करने से मात्सर्य दोष की उत्पत्ति होती है। तात ! श्रेष्ठ पुरुषों की सेवा और संगति करने से उसका नाश हो जाता है।
अपने उत्तम कुल, उत्कृष्ट ज्ञान तथा ऐश्वर्य का अभिमान होने से देहाभिमानी मनुष्यों पर मद सवार हो जाता है परंतु इनके यथार्थ स्वरूप का ज्ञान हो जाने पर वह तत्काल उतर जाता है।
मन में कामना होने से तथा दूसरे प्राणियों की हँसी-खुशी देखने से ईर्ष्या की उत्पत्ति होती है तथा विवेकशील बुद्धि के द्वारा उसका नाश होता है।
राजन् ! समाज से बहिष्कृत हुए नीच मनुष्यों के द्वेषपूर्ण तथा अप्रामाणिक वचनों को सुनकर भ्रम में पड़ जाने से निंदा करने की आदत हो जाती है परंतु श्रेष्ठ पुरुषों को देखने से वह शांत हो जाती है।
जो लोग अपनी बुराई करने वाले बलवान मनुष्य से बदला लेने में असमर्थ होते हैं उनके हृदय में असूया (दोष-दर्शन की प्रवृत्ति) पैदा होती है परंतु दया का भाव जाग्रत होने से उनकी निवृत्ति हो जाती है।
सदा कृपण मनुष्यों को देखने से अपने में भी दैन्य भाव – कंजूसी का भाव पैदा होता है, धर्मनिष्ठ पुरुषों के उदार भाव को जान लेने पर वह कंजूसी का भाव नष्ट हो जाता है।
प्राणियों का भोगों के प्रति जो लोभ देखा जाता है, वह अज्ञान के ही कारण है। भोगों की क्षणभंगुरता को देखने और जानने से उसकी निवृत्ति हो जाती है।
ये सभी दोष शांति धारण करने से जीत लिये जाते हैं। (यहाँ ‘शांति’ से तात्पर्य ‘कायरता’ नहीं है।)”
भीष्म पितामह धर्मराज युधिष्ठिर से आगे कहते हैं- “तात ! धृतराष्ट्र के पुत्रों में ये सभी दोष मौजूद थे और तुम सत्य को ग्रहण करना चाहते हो इसलिए तुमने श्रेष्ठ पुरुषों की सेवा तथा सत्संग-सान्निध्य से इन सब पर विजय प्राप्त कर ली है।”
स्रोतः ऋषि प्रसाद, जनवरी 2016, पृष्ठ संख्या 14,15 अंक 277
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स्वास्थ्यरक्षक मट्ठा


यथा सुराणाममृतं सुखाय तथा नराणां भुवि तक्रमाहुः।

‘जिस प्रकार स्वर्ग में देवों को सुख देने वाला अमृत  है, उसी प्रकार पृथ्वी पर मनुष्यों को सुख देने वाला तक्र है।’ (भावप्रकाश)

दही में चौथाई भाग पानी मिलाकर मथने से तक्र तैयार होता है। इसे मट्ठा भी कहते हैं। ताजा मट्ठा सात्त्विक आहार की दृष्टि से श्रेष्ठ द्रव्य है। यह जठराग्नि प्रदीप्त कर पाचन-तंत्र कार्यक्षम बनाता है। अतः भोजन के साथ तथा पश्चात् मट्ठा पीने से आहार का ठीक से पाचन हो जाता है। जिन्हें भूख न लगती हो, ठीक से पाचन न होता हो, खट्टी डकारें आती हों और पेट फूलने – अफरा चढ़ने से छाती में घबराहट होती हो, उनके लिए मट्ठा अमृत के समान है।

मट्ठे के सेवन से हृदय को बल मिलता है, रक्त शुद्ध होता है और विशेषतः ग्रहणी (duodenum) की क्रिया अधिक व्यवस्थित होती है। कई लोगों को दूध रुचता या पचता नहीं है। उनके लिए मट्ठा अत्यंत गुणकारी है।

मक्खन निकाला हुआ तक्र पथ्य अर्थात् रोगियों के लिए हितकर तथा पचने में हलका होता है। मक्खन नहीं निकला हुआ तक्र भारी, पुष्टिकारक एवं कफजन्य होता है।

वातदोष की अधिकता में सोंठ वे सेंधा नमक मिला के, कफ की अधिकता में सोंठ, काली मिर्च व पीपर मिलाकर तथा पित्तजन्य विकारों में मिश्री मिला के तक्र का सेवन करना लाभदायी है।

शीतकाल में तथा भूख की कमी, वातरोग, अरुचि एवं नाड़ियों के अवरोध में तक्र अमृत के समान गुणकारी होता है। यह संग्रहणी, बवासीर, चिकने दस्त, अतिसार (दस्त), उलटी, रक्ताल्पता, मोटापा, मूत्र का अवरोध, भगंदर, प्रमेह, प्लीहावृद्धि, कृमि रोग तथा प्यास को नष्ट करने वाला होता है।

दही को मथकर मक्खन निकाल लिया जाय और अधिक मात्रा में पानी मिला के उसे पुनः मथा जाय तो छाछ बनती है। यह शीतल, हलकी, पित्तनाशक, प्यास, वात को नष्ट करने वाली और कफ बढ़ाने वाली होती है।

मट्ठे के औषधीय प्रयोग

मट्ठे में जीरा, सौंफ का चूर्ण व सेंधा नमक मिलाकर पीने से खट्टी डकारें बंद होती हैं।

गाय का ताजा, फीका मट्ठा पीने से रक्त शुद्ध होता है और रस, बल तथा पुष्टि बढ़ती है। शरीर-वर्ण निखरता है, चित्त प्रसन्न होता, वात-संबंधी अनेक रोगों का नाश होता है।

ताजे मट्ठे में चुटकी भर सोंठ, सें                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                    धा नमक व काली मिर्च मिलाकर पीने से आँव, मरोड़ तथा दस्त दूर हो के भोजन में रूचि बढ़ती है।

मट्ठे में अजवायन और काला नमक मिलाकर पीने से कब्ज मिटता है

उपरोक्त सभी गुण गाय के ताजे व मधुर मट्ठे में ही होते हैं। ताजे दही को मथकर उसी समय मट्ठे का सेवन करें। ऐसा मट्ठा दही से कई गुना अधिक गुणकारी होता है। देर तक रखा हुआ खट्टा या बासी मट्ठा हितकर नहीं है।

केवल ताजे दही को मथकर हींग, जीरा तथा सेंधा नमक डाल के पीने से अतिसार, बवासीर और पेडू का शूल मिटता है।

ताजे दही का अर्थ है, रात को जमाया हुआ दही जिसका उपयोग सुबह किया जाय एवं सुबह जमाया हुआ दही जिसका सेवन मध्याह्नकाल में अथवा सूर्यास्त के पहले किया जाय। सायंकाल के बाद दही अथवा छाछ का सेवन नहीं करना चाहिए।

सावधानीः दही एवं मट्ठा ताँबे, काँसे, पीतल एवं एल्यूमीनियम के बर्तन में न रखें। दही बनाने के लिए मिट्टी अथवा चाँदी के बर्तन विशेष उपयुक्त हैं, स्टील के बर्तन भी चल सकते हैं।

अति दुर्बल व्यक्तियों को तथा क्षयरोग, मूर्च्छा, भ्रम, दाह व रक्तपित्त में तक्र का उपयोग नहीं करना चाहिए। उष्णकाल अर्थात् शरद और ग्रीष्म ऋतुओं में तक्र का सेवन निषिद्ध है। इन दिनों में यदि तक्र पीना हो तो जीरा व मिश्री मिला के ताजा व कम मात्रा में लें।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जनवरी 2016, पृष्ठ संख्या 28,29 अंक 277

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राष्ट्रीय स्तर पर लहराया संत श्री आशाराम जी गुरुकुल का परचम


 

विद्यार्थियों की प्रतिभा विकसित करने के लिए शासन द्वारा देशभर में प्रतिवर्ष ‘गणित विज्ञान प्रदर्शनी’ का आयोजन होता है। इस प्रदर्शनी में पिछले 5 सालों से संत श्री आशाराम जी गुरुकुल, अहमदाबाद ने श्रेष्ठतम प्रदर्शन करते हुए पूरे भारत में गुरुकुल का परचम लहराया है। एक संक्षिप्त जानकारीः

सत्र 2010-11 में गुरुकुल के विद्यार्थियों का ‘एयरपोर्ट गणित’ प्रकल्प राज्यस्तरीय प्रदर्शनी में सराहा गया था। इसमें एयरपोर्ट की ऐसी आकृति दी गयी थी कि कम क्षेत्रफल में अधिक हवाई जहाज उतर सकें।

सत्र 2011-12 में ‘पानी से ईंधन’ बनाने वाला प्रकल्प बनाया गया था। यह सभी स्तरों का पार कर राष्ट्रीय स्तर पर एन सी ई आर टी द्वारा आयोजित प्रदर्शनी में भी छाया रहा। राष्ट्रीय स्तर पर ‘विज्ञान एवं तकनीकी विभाग’ द्वारा आयोजित विज्ञान प्रदर्शनी में भी इसे भरपूर सराहना मिली। इस कृति (मॉडल) के द्वारा पानी से हाईड्रॉक्सी गैस उत्पन्न करके गाड़ी चलाने की एवं भोजन बनाने की तकनीक दर्शायी गयी थी। सत्र 2012-13 में ‘ब्रेन कम्पयूटर इंटरफेस टेक्नोलॉजी’ यह कृति राज्य स्तर तक पहुँची और सराही गयी। इसमें विकलांग व्यक्ति के सोचने पर उसके मस्तिष्क की तरंग से व्हील चेयर का चलना दिखाया गया था।

सत्र 2013-14 में गुरुकुल का खोजा हुआ ‘होम मेड ब्लड टॉनिक’ प्रदर्शन हेतु राज्य स्तर पर पहुँचा। इस आयुर्वेदिक टॉनिक के उपयोग से हीमोग्लोबिन में अभूतपूर्व वृद्धि होती है एवं प्लेटलेट्स व श्वेत रक्तकणों की मात्रा भी आवश्यकतानुसार हो जाती है।

सत्र 2013-14 में ही ‘आयनोक्राफ्ट’ कृति को राष्ट्रीय स्तर पर NCERT द्वारा आयोजित विज्ञान मेले में प्रदर्शन हेतु चुना गया। इसके द्वारा हवाई जहाज केवल विद्युत ऊर्जा से उड़ सकता है। इसमें इंजन, ईंधन तथा मोटर की आवश्यकता नहीं होती है। अंतरिक्ष यान केवल विद्युत वे झेनॉन गैस की सहायता से उड़ सकता है। इस कृति को इतनी प्रशंसा मिली की ‘आर्यन्स ग्रुप ऑफ कॉलेजस’ के इंजीनियरिंग विभाग ने इसे अपने यहाँ प्रदर्शन हेतु आमंत्रित किया। वहाँ भी इसे विद्यार्थियों व प्राध्यापकों ने बहुत सराहा और गुरुकुल के छात्रों को ‘युवा वैज्ञानिक’ कह के उनका सम्मान किया।

बताया जाता है कि तहसील स्तर पर अलग-अलग विद्यालयों से आयी 700 कृतियों में से 65 से 70 कृतियों का चयन जला स्तर के लिए होता है। ऐसी 2 से 3 हजार कृतियों में से लगभग 350 कृतियाँ राज्य स्तर पर व हर राज्य से प्रायः औसतन 9-10 कृतियाँ ही राष्ट्रीय स्तर पर पहुँचती हैं। ऐसी करीब 180 कृतियों का प्रदर्शन राष्ट्रीय स्तर पर होता है। उनमें से केवल 21 कृतियों का चयन ‘इंडियन साइंस काँग्रेस’ के ‘राष्ट्रीय किशोर वैज्ञानिक सम्मेलन’ के लिए किया जाता है। इन सभी पड़ावों को पार करते हुए इस बहुप्रतिष्ठित राष्ट्रीय सम्मेलन में पहुँचने का सम्मान प्राप्त किया है संत श्री आशाराम जी गुरुकुल, अहमदाबाद ने। वहाँ आयनोक्रॉफ्ट कृति प्रदर्शित की जायेगी। आपको बता दें कि पूरे गुजरात से चयनित यह एकमात्र कृति है।

सत्र 2014-15 में गुरुकुल के ‘थर्मो-इलेक्ट्रिक लैम्प’ को राज्य स्तर के लिए चुना जा चुका है। इस तकनीक के द्वारा एक दीपक की ऊष्मा को विद्युत शक्ति में रूपांतरित करके लैम्प जला सकते हैं। इसके द्वारा गाँव में बिजली की समस्या का आसानी से हल निकाला जा सकता है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जनवरी 2015, पृष्ठ संख्या 27, अंक 265
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