Articles

जल है औषध समान


अजीर्णे भेषजं वारि जीर्णे वारि बलप्रदम्।

भोजने चामृतं वारि भोजनान्ते विषप्रदम।।

‘अजीर्ण होने पर जल पान औषधवत् है। भोजन पच जाने पर अर्थात् भोजन के डेढ़ दो घंटे बाद पानी पीना बलदायक है। भोजन के मध्य में पानी पीना अमृत के समान है और भोजन के अंत में विष के समान अर्थात् पाचनक्रिया के लिए हानिकारक है।’ (चाणक्य नीतिः 8.7)

विविध व्याधियों में जल-पान

अल्प जल-पानः उबला हुआ पानी ठंडा करके थोड़ी-थोड़ी मात्रा में पीने से अरूचि, जुकाम, मंदाग्नि, सूजन, खट्टी डकारें, पेट के रोग, तीव्र नेत्र रोग, नया बुखार और मधुमेह में लाभ होता है।

उष्ण जल-पानः सुबह उबाला हुआ पानी गुनगुना करके दिन भर पीने से प्रमेह, मधुमेह, मोटापा, बवासीर, खाँसी-जुकाम, नया ज्वर, कब्ज, गठिया, जोड़ों का दर्द, मंदाग्नि, अरूचि, वात व कफ जन्य रोग, अफरा, संग्रहणी, श्वास की तकलीफ, पीलिया, गुल्म, पार्श्व शूल आदि में पथ्य का काम करता है।

प्रातः उषापानः सूर्योदय से 2 घंटा पूर्व, शौच क्रिया से पहले रात का रखा हुआ पाव से आधा लिटर पानी पीना असंख्य रोगों से रक्षा करने वाला है। शौच के बाद पानी न पीयें।

औषधिसिद्ध जल

सोंठ जलः दो लिटर पानी में 2 ग्राम सोंठ का चूर्ण या 1 साबूत टुकड़ा डालकर पानी आधा होने तक उबालें। ठंडा करके छान लें। यह जल गठिया, जोड़ों का दर्द, मधुमेह, दमा, क्षयरोग (टी.बी.), पुरानी सर्दी, बुखार, हिचकी, अजीर्ण, कृमि, दस्त, आमदोष, बहुमूत्रता तथा कफजन्य रोगों में बहुत लाभदायी है।

अजवायन जलः एक लिटर पानी में एक चम्मच (करीब 8.5 ग्राम) अजवायन डालकर उबालें। पानी आधा रह जाय तो ठंडा करके छान लें। उष्ण प्रकृति का यह जल हृदय-शूल, गैस, कृमि, हिचकी, अरूचि, मंदाग्नि, पीठ व कमर का दर्द, अजीर्ण, दस्त, सर्दी व बहुमूत्रता में लाभदायी है।

जीरा-जलः एक लिटर पानी में एक से डेढ़ चम्मच जीरा डालकर उबालें। पौना लिटर पानी बचने पर ठंडा कर छान लें। शीतल गुणवाला यह जल गर्भवती एवं प्रसूता स्त्रियों के लिए तथा रक्तप्रदर, श्वेतप्रदर, अनियमित मासिकस्राव, गर्भाशय की सूजन, गर्मी के कारण बार-बार होने वाला गर्भपात व अल्पमूत्रता में आशातीत लाभदायी है।

ध्यान दें भूखे पेट, भोजन की शुरुआत व अंत में, धूप से आकर, शौच, व्यायाम या अधिक परिश्रम व फल खाने के तुरंत बाद पानी पीना निषिद्ध है।

अत्यम्बुपानान्न विपच्यतेsन्नम् अर्थात् बहुत अधिक या एक साथ पानी पीने से पाचन बिगड़ता है। इसीलिए मुहुर्मुहुवारि पिबेदभूरि। बार-बार थोड़ा-थोड़ा पानी पीना चाहिए।

(भाव प्रकाश, पूर्व खण्डः 5.157)

लेटकर, खड़े होकर पानी पीना तथा पानी पीकर तुरंत दौड़ना या परिश्रम करना हानिकारक है। बैठकर धीरे-धीरे चुस्की लेते हुए बायाँ स्वर सक्रिय हो तब पानी पीना चाहिए।

प्लास्टिक की बोतल में रखा हुआ, फ्रिज का या बर्फ मिलाया हुआ पानी हानिकारक है।

सामान्यतः 1 व्यक्ति के लिए एक दिन में डेढ़ से 2 लिटर पानी पर्याप्त है। देश ऋतु प्रकृति आदि के अनुसार यह मात्रा बदलती है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जून 2014, पृष्ठ संख्या 30, अंक 258

ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ

जैसी होवे पात्रता वैसी होवे गुरुकृपा – पूज्य बापू जी


बारिश वही की वही लेकिन सीपी में बूँद पड़ती है तो मोती हो जाती है और खेत में पड़ती है तो भिन्न-भिन्न अन्न, रस हो जाती है और वही पानी गंगा में पड़ता है तो गंगा माता होकर पूजा जाता है, वही पानी नाली में पड़ता है तो उसकी कद्र नहीं, बेचारा कहीं का कहीं धक्के खाता है। ऐसे ही गुरुओं का ज्ञान यदि नाली जैसे अपवित्र हृदय में, अपवित्र वातावरण में निकल आये तो उसका फिर वही हाल हो जाता है। अर्जुन जैसे पवित्र व्यक्ति के आगे ‘गीता’ निकली है तो आज तक पूजी जाती है। शिशुपाल के सामने ‘गीता’ नहीं निकल सकती, ‘गीता’ निकलने के लिए अर्जुन चाहिए। ‘श्रीयोगवाशिष्ठ महारामायण’ बनने के लिए रामजी चाहिए। कबीरजी का ग्रंथ ‘बीजक’ बनने के लिए शिष्य सलूका और मलूका चाहिए। तो सामने जैसे पात्र होते हैं, जैसी उनकी योग्यता होती है, गुरुओं के दिल से भी उसी प्रकार का ज्ञानोपदेश निकलता है।

कैसी हो हमारी पात्रता ॐ

अपनी श्रद्धा, अपना आचरण ऐसा होना चाहिए कि भगवान भी हम पर भरोसा करें कि यहाँ कुछ देने जैसा है, गुरु को भी भरोसा हो कि यहाँ कुछ देंगे तो टिकेगा। गुरु और भगवान तो देने के लिए उत्सुक हैं, लालायित हैं लेकिन लेनेवाली की तैयारी चाहिए। ईश्वर को भरोसा हो जाये इस उद्देश्य से ऐसा कोई बाह्य व्यवहार नहीं करना है क्योंकि ईश्वर तो हमारा बाहर का व्यवहार नहीं देखते, हमारी गहराई जानते हैं।

ईश्वर तो हम पर बड़े करूणाशील हैं, ईश्वर तो अंतर्यामी हैं। दूसरे को तो हम धोखा दे सकते हैं कि ‘हमारी तुम पर श्रद्धा है, हम तो तुम्हारे बिना मर रहे हैं, हम तो जन्म-जन्म के साथी होंगे….’ ऐसे पति-पत्नी को धोखा दे सकते हैं लेकिन ईश्वर को तो धोखा नहीं दे सकते।

जिनको लगन होती है ईश्वर के लिए वे प्रतिकूल परिस्थितियों को भी सहकर ईश्वर के रास्ते चलते हैं और विपरीत परिस्थिति में भी यदि ईश्वर के लिए धन्यवाद निकले तो ईश्वर और खुश होते हैं, और दे देते हैं।

श्रीकृष्ण के अतिथि बने सुदामा का लौटते समय जब श्रीकृष्ण ने दुशाला भी ले लिया तो सुदामा जी सोचते हैं कि ‘भगवान कितने दयालु हैं ! मैं धन दौलत में, माया में कहीं फँस न जाऊँ, भगवान ने मुझे कुछ नहीं दिया। दुशाला उढ़ाया था, वह भी वापस ले लिया। वाह ! वाह ! कितने दयालु हैं !’ और जब घर पहुँचकर देखते हैं कि धन-धान्य, ऐश्वर्य से सम्पन्न हुई अपनी पत्नी सुशीला महारानी बन गयी है तो कहते हैं कि “वाह भगवान ! तू कितना दयालु है ! मेरा कहीं भजन न छूट जाये, खान-खुराक, रहन-सहन की तकलीफों के कारण शायद मेरा मन उन चीजों के चिंतन में न चला जाय इसलिए तूने रातों-रात इतना सारा दे दिया !” ये भक्त हैं ! विश्वास सम्पादन कर लिया ईश्वर का। उस वक्त तो वे सुख-सम्पत्ति से जिये ही, साथ ही वैष्णव जनों के लिए सदा के लिए दृष्टांत बन गये।

केवल पात्र बनो, गुरुकृपा में देरी नहीं

तुम केवल विश्वासपात्र बनो तो ऐसे ही कृपा, प्रेम, ज्ञान – सब चीजें तुम्हारे पास खिंच के चली आयेंगी। तुम उसके योग्य बनो तो वस्तुओं को खोजना नहीं पड़ेगा, वस्तु माँगनी नहीं पड़ेगी, वह वस्तु तुम्हारे पास आ ही जानी चाहिए। तुम ईश्वर के दर्शन के योग्य बनते हो तो फिर तुमको ईश्वर का दर्शन हो ऐसी इच्छा करने की भी जरूरत नहीं है, ऊपर से डाँट दो कि ‘तेरे दर्शन की कोई जरूरत नहीं है, वही बैठा रह…..’ तो भी तुम्हारी योग्यता होगी तो वह आ ही जायेगा।

दीया जलता है, अपनी बत्ती और तेल खपाता है तो ऑक्सीजन वाली हवाएँ भागकर उसके करीब आ जाती हैं। ऑक्सीजन के लिए दीये को कोई चिल्लाना नहीं पड़ता, वह अपना काम किये जा रहा है। उसको जो चाहिए वे चीजें आ जाती हैं। जब ऐसे जड़ दीये की उस परमात्मा ने व्यवस्था कर रखी है, उसे सुयोग्य व्यवस्था मिल जाती है तो आपको नहीं देगा क्या ! बच्चा माँ के गर्भ में होता है, ज्यों जन्म लेता है त्यों दूध मिल ही जाता है और जब बच्चा अन्न खाने के काबिल हो जाता है तो वह दूध बन्द हो जाता है। प्रकृति में स्वचालित व्यवस्था है। ईश्वर और सदगुरु कोई शिष्टाचार में जरा पीछे पड़े हैं, ऐसे नहीं हैं। देने वाला देने को बैठता है न, तो लेने वाला थकता है, देने वाला नहीं थकता आध्यात्मिक जगत में।

ऐसा जरूरी नहीं है कि जिसके साथ आप अच्छा व्यवहार करते हो, बदले में वह आपका भला करे। भगवान के वे ही दो हाथ नहीं हैं, हजारों-हजारों हाथों से वे लौटा सकते हैं। जिनसे तुमने भलाई की है, उऩ सबने भी भले तुमसे बुराई कर दी फिर तुम खिन्न मत हो, उद्विग्न मत हो, निराश मत हो क्योंकि इतने ही भगवान के हाथ नहीं हैं। मेरे भगवान के तो अनंत हाथ हैं, न जाने किसके द्वारा दे, किसी बाहर के हाथ से नहीं दे तो भीतर से शांति तो मिलती है, भीतर से धन्यवाद तो मिलता है कि ‘हमने भलाई की है, चाहे वह बुराई कर दे तो कोई हरकत नहीं।’

पात्रता का मापदंड रखते हैं सदगुरुदेव

कच्चे घड़े में पानी ठहरता नहीं, कच्चा घड़ा पानी डालने के पात्र नहीं होता है। अब पानी डालना है तो उसे आँवें में (कुम्हार की भट्टी में) डालना पड़ता है। कुम्हार रखता है दुकान पर तो वह भी टकोर करता है, उसका नौकर भी टकोर करता है, ग्राहक लेता है तो वह भी टकोर करता है, घर ले जाता है तो घरवाली भी टकोर करती है।

बह जाने और सूख जाने वाला पानी जिस घड़े में डालते हो, उसको कितना कसौटी पर कसते हो ! तो जो कभी न बहे और कभी न सूखे, ऐसे ब्रह्मज्ञान का अमृत किसी में कोई डालना चाहे तो वह भी तो अपने ढंग की थापी तो रखता ही होगा, सीधी बात है ! हमें दिखें चाहे न दिखें, उनके पास होती हैं वे कसौटियाँ।

माँ बाप बच्चे को डाँटते या मारते हैं तो उनकी डाँट, मार या प्यार के पीछे बच्चे का हित और करूणा ही तो होती है, और क्या होता है ! ऐसे ही परमात्मा हमको किसी भी परिस्थिति से गुजारता है तो उसकी बड़ी करूणा है, कृपा है। लेकिन यदि हमारे भीतर से धन्यवाद नहीं निकलता और कुछ प्रतिक्रिया निकलती है तो हमारे कषाय अपरिपक्व हैं। सुदामा की नाईं जब धन्यवाद निकलने लगे तो समझो कि कषाय परिपक्व हो रहे हैं।

साधक जब ध्यान भजन में होता है, परमात्मा के चिंतन में होता है तो उसे देखकर सदगुरु के चित्त से कृपा बहती है, आशीर्वाद निकलता है। और जब गपशप में, इधर उधर में होता है और गुरु देखते हैं तो गुरु के दिल से निकलता है कि ‘ये क्या करेंगे !….’ तो बहुत आदमी फिर नीची अवस्था में हो जाते हैं। लगन व उत्साह से पढ़ने वाले विद्यार्थी को देखकर शिक्षक का उत्साह बढ़ता है और लापरवाह व टालमटोल करने वाले विद्यार्थी को देखकर शिक्षक का उत्साह भंग हो जाता है। अपने ही आचरण का फल विद्यार्थी को प्राप्त होता है। इससे भी बहुत ज्यादा असर सदगुरुओं के चित्त का पड़ता है शिष्य के ऊपर।

गुरु का हृदय तो शुद्ध होता है न, इसीलिए हमारा व्यवहार, हमारी भक्ति सब बढ़िया-बढ़िया देखते-देखते वे हमारे लिए बढ़िया बोलने लगते हैं, बढ़िया सोचने भी लगते हैं तो हम बढ़िया हो भी जाते हैं। और हमारा घटिया आचरण देखकर, बेवफाई का आचरण देखकर वे विश्वास खोते जाते हैं तो हम भी ऐसे ही होते जाते हैं। और सदगुरु को तो केवल तुम्हारे बाहर के व्यवहार से भरोस नहीं होगा, वे तो तुम्हारे भीतर की सोच को भी जान लेंगे। इसीलिए हमारी निष्ठा व प्रीति ऐसी हो कि भगवान और गुरु को हमारे प्रति भरोसा हो जाय बस, कि ‘ये  मेरा सत्पात्र है।’ भगवान शिव माता पार्वती जी से कहते हैं-

आकल्पजन्मकोटिनां यज्ञव्रततपः क्रियाः।

ताः सर्वाः सफला देवि गुरुसंतोषमात्रतः।।

हमारे करोड़ों जन्मों के यज्ञ, व्रत, जप-तप आदि उसी दिन सफल हो गये जिस दिन गुरुजी हमारे आचरण से, हमारी ईमानदारी से, हमारी वफादारी से संतुष्ट हो गये। गुरु को लगे कि पात्र है, तब गुरु के हृदय से कृपा छलकती है और शिष्य को हजम होती है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जून 2014, पृष्ठ संख्या 16-18, अंक 258

ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ

 

यातनाएँ सहकर भी जिन्होंने किया समाज का मंगलः संत तुकाराम जी


महाराष्ट्र के प्रसिद्ध संत तुकारामजी शरीर की सुधबुध भूलकर भगवान विट्ठल के भजन-कीर्तन में डूबे रहते। भगवान की भक्ति में प्रगाढ़ता आयी और उनके श्रीमुख से अभंगों के रूप में शास्त्रों का गूढ़ ज्ञान प्रकट होने लगा। तुकाराम जी भगवद् रस से सम्पन्न वाणी से लोगों के रोग-शोक दूर होने लगे, समाज उन्नत होने लगा पर तुकाराम जी की फैलती हुई यश-कीर्ति कुछ लोगों को खटकने लगी। उन्होंने अनेक प्रकार के तर्क-कुतर्क करके शंका-कुशंका उठाकर उन्हें तंग करना तथा समाज में बदनाम करना शुरु कर दिया। तब तुकाराम जी अपने एक अभंग के माध्यम से कहते हैं-

कलियुगीं बहु कुशल हे जन।

छळितील गुण तुझे गाता।।

मज हा संदेह झाला दोहींसवा।

भजन करूँ देवा किंवा नको।।

“कलियुग में लोग बड़े कुशल हैं। तुम्हारे गुण जो गायेगा उसे ये सतायेंगे। इसलिए मुझे यह संदेह हो गया है कि अब तुम्हारा भजन करूँ या न करूँ ?’ हे नारायण ! अब यह बाकी रह गया है कि इन लोगों को छोड़ दूँ या मर जाऊँ !

दुष्टों के अत्याचार से तंग आकर वे कहते हैं- किसी के घर मैं तो भीख माँगने नहीं जाता, फिर भी ये काँटे जबरदस्ती मुझे देने आ ही जाते हैं। मैं न किसी का कुछ खाता हूँ, न किसी का कुछ लगता हूँ। जैसा समझ पड़ता है भगवन् ! तुम्हारी सेवा करता हूँ।”

नाना प्रकार के शुष्कवाद करने वाले अहमन्य विद्वान और भगवद भजन का विरोध करने वाले मानो हाथ धोकर तुकाराम जी के पीछे पड़े थे। अनेक प्रयास करने पर भी जब लोगों ने तुकाराम जी के कीर्तन में जाना बंद नहीं किया तो उन्होंने तुकाराम जी को देहू गाँव से निकालने का षड्यंत्र रचा। ‘तुका ने हरि-कीर्तन करके भोले-भाले श्रद्धालु लोगों पर जादू कर दिया, वह भक्ति नहीं पाखंड करता है।’ इस प्रकार की और भी कई बेबुनियाद बातों से हाकिम (गाँव के मुखिया) के कान भरने शुरु कर दिये।

उधर दूसरी ओर वाघोली में रहने वाले एक विद्वान रामेश्वर भट्ट को भी तुकारामजी के विरुद्ध भड़काया गया। ग्रामाधिकारी को रामेश्वर भट्ट ने चिट्ठी लिखी कि ‘तुकाराम को देहू से निकाल दो।’ ग्रामाधिकारी ने यह चिट्ठी तुकारामजी के पढ़ सुनायी तब वे बड़ी मुसीबत में पड़ गये। उस समय के उनके उदगार हैं-

“अब कहाँ जाऊँ ? गाँव में रहूँ किसके बल-भरोसे ? पाटील नाराज, गाँव के लोग भी नाराज ! कहते हैं अब यह उच्छृंखल हो गया है, मनमानी करता है। हाकिम ने भी फैसला कर डाला। भले आदमी ने जाकर शिकायत की, आखिर मुझ दुर्बल को ही मार डाला। तुका कहता है ऐसों का संग अच्छा नहीं, अब विट्ठल को ढूँढते चल चलें।”

इसे कलियुग का ही प्रभाव कहना चाहिए कि राजसत्ता भी संतों द्वारा हो रही समाज की उन्नति को दरकिनार करके धर्म के भक्षक ऐसे दुष्टों की हाँ-में-हाँ मिला देती है।

तुकारामजी को इतना मजबूर किया गया कि भगवान के विरह और प्रेम में निकले अभंगों की बही उऩ्हें दह नदी में डालनी पड़ी। आखिर तुकाराम जी पर देशनिकाले की नौबत आ गयी, अपने श्री विट्ठल मूर्ति से बिछुड़ने का समय आ गया। भक्तजनों को इससे बड़ा दुःख हुआ और कुटिल-खल-निंदक इससे बड़े सुखी हुए, मानो उन्हें कोई बड़ी सम्पत्ति मिल गयी हो। दूसरों का कुछ भी हीनत्व देखकर जिनकी जीभ निंदा करने के जोश में आ जाती है। ऐसे लोग तुकारामजी के पास आकर उनका तरह-तरह से उपहास करने लगे।

संत तुकाराम जी ने देखा कि अपने ईश्वरीय समाधि सुख का त्याग करके जिस समाज की भलाई के लिए अभंगों को लिपिबद्ध किया गया, उस समाज को ज्ञान के उस खजाने की जरा भी कद्र नहीं है। इस बात से तुकाराम जी समाज से उपराम हो गये। वे श्री विट्ठल-मंदिल के सामने तुलसी के पौधे के समीप एक शिला पर तेरह दिन अन्न जल त्याग के भगवत्-चिंतन में पड़े रहे। अंत में भगवत्कृपा से उनकी बहियाँ उन्हें पुनः प्राप्त हुईं, जो आज भी समाज को सही दिशा देने का कार्य कर रही हैं। उन निंदकों का क्या हाल हुआ होगा जिन्होंने ऐसे संत को 13-13 दिनों तक अन्न-जल त्यागने पर मजबूर कर दिया !

वास्तव में समाज की उन्नति या अवनति से नीच बुद्धि के संस्कृतिद्रोहियों को कोई लेना-देना नहीं होता। वे तो अपने स्वभाववश द्वेषबुद्धि से प्रेरित होकर स्वार्थसिद्धि के लिए उचित-अनुचित कुछ भी कर डालते हैं।

नीच लोगों की टोली में मम्बाजी नाम का एक व्यक्ति था। जिसने अपने शिष्यों द्वारा तुकारामजी के विरोध में बहुत कुप्रचार करवाया परंतु उसका कोई भी परिणाम नहीं हुआ। तब उसने तुकारामजी के आँगन और विट्ठल-मंदिर के परिसर में काँटें बिखेरना प्रारम्भ कर दिया ताकि तुकारामजी को कष्ट हो और उनके कीर्तन में आने वाले भक्तों को भी पीड़ा का सामना करना पड़े। जब इस पर भी उनके भक्तों की संख्या कम नहीं हुई तो मम्बाजी और बौखला गया। खूब सताकर भी उस दुष्ट का मन नहीं भरा तो एक दिन उसने मौका पाकर मंदिर परिसर में खूब गाली गलौज करना शुरु कर दिया। हद तो तब हो गयी जब उस क्रूर ने काँटें लगी बबूल की टहनी से तुकाराम जी को पीट-पीटकर कपड़े फाड़ दिये और शरीर लहू-लुहान कर दिया।  वहाँ खड़े लोग चुपचाप सब देखते रहे।

आश्चर्य की बात यह है कि जिस समाज को भक्ति, ज्ञान, कीर्तन, ध्यान के द्वारा सुखी बनाने के लिए संत समाजद्रोहियों के निशाने पर आ जाते हैं, वही समाज संत पर हो रहे अत्याचारों का मूक दर्शक बनकर रह जाता है। तुकारामजी के साथ भी यही हुआ।

मम्बाजी तुकारामजी के शिष्यों को भी उनके विरुद्ध भड़काने का कार्य करता था। वह बहिणाबाई (तुकारामजी का अनन्य भक्त) को तुकारामजी के कीर्तन में जाने से मना करता। जब बहिणाबाई ने तुकाराम जी की निंदा का विरोध किया तो मम्बाजी के क्रोध की आग भड़क उठी। उसने बहिणाबाई की गाय को बाँधकर बड़ी क्रूरता से उस पर डंडे चलाये। जब सीधी लड़ाई से मम्बाजी और उनके दुष्ट साथी अपने मंसूबों में कामयाब नहीं हुए तो उन्होंने कूटनीति का सहारा लिया। हर संत के खिलाफ ऐसे ही हथकंडे अपनाये जाते हैं। साजिश-पर-साजिश, षड्यंत्र-पर-षड्यंत्र…. संतों को सताने की यह परम्परा कब समाप्त होगी ?

एक वेश्या को तैयार करके तुकाराम जी को बदनाम कर लोगों की श्रद्धा तोड़ने की साजिश रची गयी पर मम्बाजी का यह वार भी खाली गया। इस प्रकार दुष्टों ने अनेक प्रकार से पवित्र, निष्कलंक संत तुकाराम जी को सताया। समता के धनी तुकाराम जी तो सब सहते गये परंतु सबसे बड़ा नुकसान तो समाज का ही हुआ जिसे उनके सुखप्रद ज्ञान से, भक्ति के अमृत से वंचित होना पड़ा।

आज लोग भारत के इन महान संत की महिमा गाते हैं, उनके अभंगों पर पी.एच.डी. करते हैं, उनकी तस्वीरें लगाकर दीप-अगरबत्ती करते हैं लेकिन हयातीकाल में उनके कितना सताया गया ! संतों के साथ ऐसा आखिर कब तक होता रहेगा ?

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मई 2014, पृष्ठ  संख्या 22,23 अंक 257

ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ