Articles

साधना का खजाना बढ़ाने का सुवर्ण अवसरः चतुर्मास


(8 जुलाई से 4 नवम्बर 2014)

पूज्य बापू जी

चतुर्मास में भगवान नारायण शेषशैया पर योगनिद्रा में विश्रांतियोग करते हैं। इन दिनों में मकान-दुकान बनाना, शादी-विवाह और सकाम मांगलिक कार्य करना वर्जित है। चतुर्मास में पति-पत्नि का सांसारिक व्यवहार न करने का व्रत लें तो आपका बल, बुद्धि, ओज और तबीयत अच्छी रहेगी। ब्रह्मचर्य व संयम से आपकी कांति बढ़ेगी। चरित्र की साधना-सत्य बोलना, हिंसा से बचना, मन और वचन से नीच कर्मों का त्याग करना – इससे आपके चतुर्मास में साधन-भजन में खूब बढ़ोतरी होगी।

संकल्प लें कि मौन रखेंगे, जप करेंगे, ध्यान करेंगे, नीच कर्मों का त्याग करेंगे। छल-कपट, झूठ आदि जिससे भी अंतरात्मा की अधोगति हो, उससे बचेंगे और जिससे भी आत्मोन्नति हो वह करेंगे।

चतुर्मास में बेईमानी के कामों से बचें और क्षमा के सदगुण का विकास करें। इन्द्रियशक्ति बढ़ाने के लिए मन का संयम, कुसंग का त्याग करना और ॐकार की उपासना करके शांतमना होना। गुरुमूर्ति के सामने 15 से 25 मिनट रोज एकटक देखकर ॐ का दीर्घ गुंजन करना। इससे गुरुमूर्ति से गुरु प्रकट हो जायेंगे, बातचीत करेंगे, चाहोगे तो गुरुजी के साथ भगवान भी प्रगट हो जायेंगे।

हृदय को पवित्र करने के लिए परोपकार, दान, नम्रता, श्रद्धा, सर्वात्मभाव और भगवन्नाम सुमिरन है और मानसिक साधना है गीता का स्वाध्याय, रामायण का पाठ, सत्संग, आध्यात्मिक स्थान पर जाना आदि। गुरु से मानसिक वार्तालाप करने से, मानसिक जप करने से, श्वासोच्छवास के साथ जप और आत्मज्ञान का विचार करना। इन सरल साधनों से मन इतनी आसानी से पवित्र होता है कि और बड़ी-बड़ी तपस्याएँ भी इतनी तेजी से मन को पवित्र नहीं कर सकती हैं।

चतुर्मास में अपना दिल दिलबर की भक्ति से भरना यही मुख्य काम है। गाय की सेवा करना, उपयोग करना चतुर्मास में हितकारी है। सत्संग का आश्रय लेना, गुरु, देवता एवं अग्नि का का तर्पण करना तथा दीपदान आदि करना चाहिए। ‘स्कन्द पुराण’ में आता है कि ‘पुण्यात्माओं के लिए गोभक्ति, गोदान, गौसेवा हितकारी हैं, सत्पुरुषों की सेवा हितकारी है।’ चतुर्मास में पलाश की पत्तल में भोजन करना चान्द्रायण व्रत करने से बराबर है।

व्रत और उपवास अपने जीवन में छुपी हुई सुषुप्त शक्तियों को विकसित करते हैं। आरोग्य की साधना के लिए एक तो खानपान सात्त्विक और सुपाच्य हो, रजोतमोगुण वाले पदार्थों का त्याग हो, दूसरा व्रत उपवास, तीसरा आसन व प्राणायाम करे तो चतुर्मास की साधना का लाभ मिलेगा। प्राणशक्ति की साधना करनी हो तो श्वासोच्छवास की गिनती अथवा श्वास भीतर रोककर सवा या डेढ़ मिनट जप करे फिर बाहर रोक के 40-50 सैकेण्ड जप करे। इससे आपकी आरोग्य शक्ति, मानसिक शक्ति व बौद्धिक शक्ति विकसित होगी।

आध्यात्मिक साधना में आगे बढ़ना है तो सूर्योदय से दो घंटे पहले ब्रह्ममुहूर्त शुरु होता है तब उठो या फिर चाहे एक घंटा पहले उठो। उठने के समय भगवान का ध्यान करो कि ‘प्रातःकाल हम उस परमात्मा का ध्यान करते हैं जो अंतरात्मा में, आत्मा से स्फुरित होता है और मन, बुद्धि को चेतना देता है।’ सुबह नींद में से चटाक से मत उठो, पटाक से घड़ी मत देखो। नींद खुल गयी, आँख न खुले, थोड़ी देर पड़े रहो, ‘ॐ शांति….. प्रभु की गोद से बाहर आ रहा हूँ। मेरा मन बाहर आये उससे पहले मैं फिर से मनसहित प्रभु के चरणों में जा रहा हूँ, ॐ शांति, ॐ आनंद….’ ऐसा मन से दोहराओ। आपका हृदय बहुत पवित्र होगा। साधन बहुत सुंदर होगा। दिन में समय मिले तो कीर्तन करो। दैनंदिनी लिखो। जिससे गल्ती और पतन होता है उस बात को काटो और जिससे उन्नति होती है उधर ध्यान दो। इन्द्रियों को वश में करो, बुरी चीज को, बुरे कर्मों को करने से अपने को रोको। मन में दया, स्वभाव में मधुरता, वचनों में नम्रता-ये आपको जगत में प्रिय बना देंगे और यह संसार में जीने की कला है।

धर्म का पालन करें। ‘स्व’ है मेरा आत्मा-सच्चिदानंद, उसमें विश्रांति पायें और दूसरों के हित का काम करें। अपने धर्म के अनुरूप, अपने अधिकार के अनुरूप सेवा कर लें, झूठे झाँसे न आने दें और झूठी अपनी शेखी न बघारें। प्रसन्न रहें। नाक से लम्बा श्वास लें, भगवन्नाम जपें और मुँह से फूँक मारकर श्वास बाहर छोड़ दें, प्रसन्न रहने में सफल हो जाओगे।

भगवत्प्राप्ति जल्दी हो इसके लिए अध्यात्म-शास्त्रों का पठन और अध्यात्म चिन्तन करें, दुःख-सुख में सम रहें। दुःख आये तो ‘मैं दुःखी हूँ’ ऐसा न सोचें। ‘दुःख होता है मन को, बीमारी होती है शरीर को, चिंता होती है चित्त को, मैं तो भगवान का हूँ और भगवान मेरे हैं। ॐ…..ॐ…. इस प्रकार की समझ बढ़ायें।

जिसने चतुर्मास में कोई व्रत-नियम नहीं किया, मानो उसने हाथ में आया हुआ अमृत-कलश ढोलने की बेवकूफी की। जैसे किसान चतुर्मास में खेती से धन लाभ करता है, ऐसे ही आप इस चतुर्मास में भगवत्साधना करके आध्यात्मिक सुख, आध्यात्मिक ज्ञान व आध्यात्मिक सामर्थ्य का लाभ प्राप्त करो।

चतुर्मास में पुण्यदायी स्नान

एक बाल्टी में 2-3 बिल्वपत्र डालकर ‘ॐ नमः शिवाय’ जप करते हुए स्नान करें तो तीर्थों में स्नान करने का फल हो जाता है। इससे वायु प्रकोप दूर होता है, स्वास्थ्य की रक्षा होती है और आदमी दोषमुक्त, पापमुक्त होता है। थोड़े जौ और तिल मिक्सर से पीस के रख दें। इस मिश्रण से शरीर को रगड़कर स्नान करें तो यह पुण्यदायी स्नान माना जाता है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जून 2014, पृष्ठ संख्या 14,15 अंक 258

ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ

नौ लक्षण बनाते हैं गुरु कृपा का अधिकारी


सदगुरु की कृपा पाने के लिए शिष्य में जिन लक्षणों का होना आवश्यक है, उनका वर्णन करते हुए भगवान श्रीकृष्ण उद्धवजी से कहते हैं- “हे उद्धव ! सभी प्रकार के अभिमानों में ज्ञान का अभिमान छोड़ना बहुत कठिन है। जो उस अभिमान को छोड़ने के लिए तैयार हो जाता है, वह मान-सम्मान की ओर नहीं देखता। सम्मान की इच्छा न रखना ही शिष्य का पहला लक्षण है।

‘समस्त प्राणियों में ईश्वर का वास है’ ऐसी भावना होने के कारण शिष्य के मन में द्वेष आ ही नहीं सकता। जिसने उसकी निंदा की है उसे वह हित चाहने वाली माँ के समान समझता है। यह ‘मत्सररहितता’ ही शिष्य का दूसरा लक्षण है। तीसरा लक्षण है ‘दक्षता’। आलस्य या विलम्ब मन को स्पर्श न करे इसी का नाम है दक्षता। ‘सोsहम’ भावना को दृढ़ बनाकर अहंभाव तथा ममता का त्याग ‘निर्ममता’ ही शिष्य का चौथा लक्षण है।

हे उद्धव ! शिष्य का हित साधने में गुरु ही माता है, गुरु ही पिता हैं। सगे-सम्बन्धी, बंधु और सुहृद भी गुरु ही हैं। गुरु की सेवा ही उसका नित्यकर्म है, सच्चा धर्म है, गुरु ही आत्माराम हैं। सदगुरु को ही अपना हितैषी मानना सत्शिष्य का पाँचवाँ लक्षण है।

शरीर भले ही चंचल हो जाये लेकिन उसका चित्त गुरुचरणों में ही अटल रहता है। गुरु चरणों में जो ऐसी निश्चलात रखता है, वही सच्चा परमार्थी शिष्य है। वही गुरु उपदेश से एक क्षण में परमार्थ का पात्र हो जाता है। जिस प्रकार एक दीपक से दूसरा दीपक जलाने पर वह भी उसी की तरह हो जाता है, उसी प्रकार निश्चल वृत्ति के साधक को गुरु प्राप्त होते ही वह तत्काल तद्रूप हो जाता है। अंतःकरण की ऐसी निश्चलता ही शिष्य का छठा लक्षण है। इसी से षट्विकारों का  विनाश होता है।

विषय का स्वार्थ छोड़कर पूर्ण तत्त्वार्थ जानने के लिए जो भजन करता है, उसी का नाम है ‘जिज्ञासा’। परमार्थ के प्रति नितांत प्रेम तथा बढ़ती हुई आस्था शिष्य का सातवाँ लक्षण है।

हे उद्धव ! सदगुरु अनेक जनों के लिए शीतल छाँव हैं, शिष्यों की तो माँ ही हैं। उनके प्रति जो ईर्ष्या करेगा उसकी आत्मप्राप्ति तो दूर हुई समझिये। सत्शिष्य का आचरम इस सम्बन्ध में बिल्कुल शुद्ध रहता है। वह अपने को ईर्ष्या का स्पर्श नहीं होने देता। गुरु ने उसे सर्वत्र ब्रह्मभावना करने का जो पाठ पढ़ाया होता है, उस पर सदा ध्यान देते हुए वह सबको समभाव से वंदन करता है। किसी भी प्राणी से छल न करना – ‘अनसूया’ यही शिष्य का आठवाँ लक्षण है। इन आठ महामनकों की माला जिसके हृदयकमल में निरंतर वास करती है, वही सदगुरु का अऩुभव प्राप्त करता है।

सत्य व पवित्र बोलना शिष्य का नौवाँ उत्तम लक्षण है। सदगुरु से वह विनीत भाव और मृदु वाणी से प्रश्न करता है। गुरुवचन सत्य से भी सत्य है इसे वह भक्तिपूर्वक स्वीकार करता है। सदगुरु के सामने व्यर्थ की बातें करना महान पाप है यह जानकर वह व्यर्थ की बकवास और मिथ्यावाद नहीं करता। निंदा के प्रति तो वह मूक ही रहता है। उसकी भाषा में कभी छल-कपट और झूठ नहीं होता। वह सदैव सदगुरु का स्मरण करता रहता है।

शिष्य के ये नौ लक्षण हैं। यह नवरत्नों की सुंदर माला जो सदगुरु के कंठ में पहनायेगा, वह देखते-देखते सायुज्य मुक्ति (परमात्म-स्वरूप से एकाकारता) के सिंहासन पर आसीन होगा। इन नवरत्नों का अभिनव गुलदस्ता जो सदगुरु को भेंटस्वरूप देगा, वह स्वराज्य के मुकुट का महामणि बनकर सुशोभित होगा।”

(श्री एकनाथी भागवत, अध्यायः 10)

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जून 2014, पृष्ठ संख्या 25,26 अंक 258

ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ

महापुरुषों का भारत को विश्वगुरु बनाने का सत्यसंकल्प श्री नरेन्द्र मोदी जैसे कर्मयोगी द्वारा शीघ्र साकार होगा


हमारी भारतीय संस्कृति में माता-पिता और गुरुजनों को प्रणाम करके उनका आशीर्वाद लेना यह जीवन में सफलता की चाबी कही गयी है। भगवान श्रीराम, भगवान श्री कृष्ण, भक्त पुंडलिक, श्रवण कुमार, छत्रपति, शिवाजी, महात्मा गांधी, सरदार वल्लभभाई पटेल, लाल बहादुर शास्त्री, संत श्री आशाराम जी बापू… ऐसे अनेक संत, महापुरुष, भक्त एवं राजनेता हुए हैं जिन्होंने माता-पिता और गुरुजनों के आदर, वंदन एवं सेवा की पावन मिसाल कायम की।

वर्तमान में भी कुछ ऐसे व्यक्तित्व हैं जिनका जीवन उपरोक्त संस्कारों से परिपूर्ण है। इनमें से एक हैं भारत के प्रधानंत्री श्री नरेन्द्रभाई मोदी। वर्ष 2014 के चुनावों में हासिल हुई जीत के बाद श्री नरेन्द्रभाई मोदी ने सबसे पहले अपनी 96 वर्षीया माँ ‘हीरा बा’ के पास जाकर उनके पैर छुए और आशीर्वाद लिया।

ऐसे संस्कृतिप्रेमी राजनेता भगवान व संतों महापुरुषों की कृपा और करोड़ो-करोड़ों भक्तों साधकों की शुभ-भावना एवं स्नेह प्राप्त कर लेते हैं।

श्री नरेन्द्र मोदी एक जिज्ञासु साधक हैं। उन्होंने अनेक बार पूज्य बापू जी के दर्शन, सत्संग व सान्निध्य का लाभ लिया है। उनके वचनों में- “मैंने तो पूज्य बापू जी को हरियाणा में बैठकर सुना है, पंजाब में भी सुना है, राजस्थान में भी सुना है, उत्तर प्रदेश के गलियारों में सुना है। समग्र राष्ट्र में सामूहिक सत्संग के द्वारा एक नयी चेतना जगी है और उसका एक नया प्रभाव शुरु हुआ है।”

“मेरा ऐसा सौभाग्य रहा है कि जीवन में जब कोई नहीं जानता था, उस समय से बापू जी के आशीर्वाद मुझे मिलते रहे हैं, स्नेह मिलता रहा है। मैं मानता हूँ कि बापू के शब्दों में एक यौगिक शक्ति रहती है। उस यौगिक शक्ति के भरोसे हम करोड़ो गुजरातवासियों के सपने साकार होंगे।”

कुछ वर्ष पूर्व श्री नरेन्द्र मोदी ने उत्तरायण शिविर के अवसर पर पूज्य बापू जी के दर्शन सत्संग का लाभ लिया तथा शुभाशीष पाये थे। उन्होंने कहा थाः “मैं पूज्य बापू जी के श्रीचरणों में प्रणाम करने आया हूँ। मैं मानता हूँ कि भक्ति से बड़ी दुनिया में कोई ताकत नहीं होती और भक्त हर कोई बन सकता है। हम सबको भक्त बनने की ताकत मिले, आशीर्वाद मिले। मैं समझता हूँ कि संतों के आशीर्वाद ही हम सबकी बड़ी पूँजी होती है।

देशभर से आये हुए आप सबको (सत्संगियों को), एक लघु भारत के रूप में मैं अपने सामने देख रहा हूँ। इस पवित्र धरती पर आये हुए आप सभी को मैं नमन करता हूँ।”

बड़ौदा के सत्संग समारोह में पधारे श्री नरेन्द्रभाई मोदी ने कहा थाः “पूज्य बापू जी ! आप देश और दुनिया – सर्वत्र ऋषि-परम्परा की संस्कार धरोहर को पहुँचाने के लिए अथक तपश्चर्या कर रहे हैं। अनेक युगों से चलते आये मानव कल्याण के इस तपश्चर्या-य5 में आप अपने पल-पल की आहुति देते रहे हैं। उसमें से जो संस्कार की दिव्य ज्योति प्रकट हुई है, उसके प्रकाश में मैं और जनता-सब चलते रहें। मैं संतों के आशीर्वाद से ही जी रहा हूँ। मैं यहाँ इसलिए आया हूँ कि लाइसैंस रिन्यू हो जाये। पूज्य बापू जी ने आशीर्वाद दिया और आप सबको वंदन करने का मौका दिया, इसलिए मैं बापू जी का ऋणी हूँ।”

कुछ साल पहले बापू जी ने श्री नरेन्द्रभाई मोदी को शुभाशीष प्रदान करते हुए कहा था कि “हम आपको देश के प्रधानमंत्री के रूप में देखना चाहते हैं।” बापू जी के संकल्प में करोड़ों साधकों भक्तों का संकल्प भी जुड़ गया और आज वह साकार हो चुका है।

संकल्पमूर्ति के लिए इस वर्ष चुनाव के दौरान साधकों ने अनेक स्थानों पर मतदाता जागृति रैलियाँ भी निकालीं एवं देश में परिवर्तन लाकर एक मजबूत, सक्षम सरकार प्रदान कराने में अपना बहुमूल्य योगदान दिया।

भाजवा एवं सहयोगी दलों के वरिष्ठ राजनेताओं ने समय-समय पर पूज्य बापू जी के सत्संग-दर्शन का लाभ लिया है तथा सुशासन की प्रेरणा प्राप्त की है। बापू जी के प्रति आपके उदगार हैं- “मैं यहाँ पर पूज्य बापू जी का अभिनंदन करने आया हूँ, उऩका आशीर्वचन सुनने आया हूँ….. पूज्य बापू जी सारे देश में भ्रमण करके जागरण का शंखनाद कर रहे हैं, सर्वधर्म-समभाव की शिक्षा दे रहे हैं, संस्कार दे रहे हैं तथा अच्छे और बुरे में भेद करना सिखा रहे हैं। हमारी जो प्राचीन धरोहर थी और जिसे हम लगभग भूलने का पाप कर बैठे थे, बापू जी हमारी आँखों में ज्ञान का अंजन लगाकर उसको फिर से हमारे सामने रख रहे हैं।

बापू जी का प्रवचन सुनकर बड़ा बल मिला है। उनका आशीर्वाद हमें मिलता रहे, उनके आशीर्वाद से प्रेरणा पाकर बल प्राप्त करके हम कर्तव्य के पथ पर निरन्तर चलते हुए परम वैभव को प्राप्त करें, यही प्रभु से प्रार्थना है।

13 दिन के शासनकाल के बाद मैंने कहाः ‘मेरा जो कुछ है, तेरा है।’ यह तो बापू जी की कृपा है कि श्रोता को वक्ता बना दिया और वक्ता को नीचे से ऊपर चढ़ा दिया। जहाँ तक ऊपर चढ़ाया है वहाँ तक ऊपर बना रहूँ, इसकी चिंता भी बापू जी को करनी पड़ेगी।” श्री अटल बिहारी वाजपेयी, पूर्व प्रधानमंत्री।

यह बात जगजाहिर है कि इसके बाद श्री अटल बिहारी वाजपेयी पहले 13 महीने और फिर 4.5 साल तक प्रधानमंत्री पर रहे।

“मैं जानता हूँ इस सच्चाई को, चाहे इस भारत का कोई मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री क्यों न हो, पूरी पार्टी के द्वारा यदि कोई सार्वजनिक सभा आयोजित करनी हो, तब भी इतनी बड़ा जनसमूह इकट्ठा नहीं किया जा सकता जितना बड़ा जनसमूह आज परम पूज्य बापू जी के दर्शन के लिए यहाँ पर अपनी आँखों के सामने देख रहा हूँ। सुबह 7 बजे से दोपहर 12.30 बजे तक इतनी भीड़ जुटी रहे ऐसा किसी भी मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री की सभा में नहीं हो सकता, जो मैं यहाँ देख रहा हूँ।

हमारे सबके आस्था व विश्वास के केन्द्र परम पूज्य बापू जी के देशभर में तथा दुनिया के दूसरे देशों में जो प्रवचन चलते हैं, उनके द्वारा अध्यात्म की प्रेरणा हम सबको मिलती रहती है। मैं पुनः उनके चरणों में शीश झुकाकर उन्हें हृदय की गहराइयों से प्रणाम करता हूँ।”

श्री राजनाथ सिंह, राष्ट्रीय अध्यक्ष भाजपा, वर्तमान केन्द्रीय गृहमंत्री

“पूज्य बापू जी द्वारा दिया जाने वाला नैतिकता का संदेश देश के कोने-कोने में जितना अधिक प्रसारित होगा, जितना अधिक बढ़ेगा, उतनी ही मात्रा में राष्ट्रसुख संवर्धन होगा, राष्ट्र की प्रगति होगी। जीवन के हर क्षेत्र में इस प्रकार के संदेश की जरूरत  है।”

श्री लाल कृष्ण आडवाणी, पूर्व केन्द्रीय गृहमंत्री एवं उपप्रधानमंत्री

“जगत के हित और प्यारों के कल्याण के लिए जिन्होंने यह देह धारण की है, ऐसे पूज्य बापू जी के चरणों में मैं प्रणाम करता हूँ। आपने जो कुछ बातें कही हैं, हम उनका पालन करेंगे।”

श्री शिवराज सिंह चौहान, मुख्यमंत्री, मध्य प्रदेश

“महाराज पूज्य बापू जी ! आपका आशीर्वाद बना रहे क्योंकि मैं राज करने नहीं आयी, धर्म और कर्म को एक साथ जोड़कर मैं सेवा करने के लिए आयी हूँ और वह मैं करती रहूँगी। आप रास्ता बताते रहो और इस राज्यरूपी परिवार की सेवा करने की शक्ति देते रहो।

मैं मानती हूँ कि जब गुरु के साक्षात् दर्शन हो गये हैं तो कुछ बदलाव जरूर आयेगा, राज्य की समस्याएँ हल होंगी व हम लोग जनसेवा के काम कर सकेंगे।” वसुन्धरा राजे सिंधिया, मुख्यमंत्री, राजस्थान।

“बापू जी कितने प्रेमदाता हैं कि कोई भी व्यक्ति समाज में दुःखी न रहे इसलिए सतत प्रयत्न करते रहते हैं। जीवन की सच्ची शिक्षा तो हम भी नहीं दे पा रहे हैं, ऐसी शिक्षा तो पूज्य संत श्री आशाराम जी बापू जैसे संतशिरोमणि ही दे सकते हैं।” श्रीमती आनंदीबेन पटेल, तत्कालीन शिक्षामंत्री, वर्तमान मुख्यमंत्री।

“हम सबका परम सौभाग्य है कि बापू जी के दर्शन हुए। आपसे आशीर्वाद मिला, मार्गदर्शन भी मिला। आपके आशीर्वाद व कृपादृष्टि से छत्तीसगढ़ में सुख-शांति व समृद्धि रहे। यहाँ के एक-एक व्यक्ति के घर में विकास की किरण आये।”

डॉ.रमन सिंह, मुख्यमंत्री, छत्तीसगढ़

“श्रद्धेय पूज्य बापू जी ने मुझे आशीर्वाद दिया है। उनके आशीर्वाद से मुझे समाज में अच्छा कार्य करने की प्रेरणा मिलेगी।

करोड़ों लोगों को जीवन जीने का मार्ग आपके विचारों से मिलता है। संस्कार और शिक्षा के माध्यम से आपने यह जो लोक-प्रबोधन किया है, इससे हमारे देश में और समाज में अच्छे नागरिक तैयार होंगे जो देश और समाज का गौरव बढ़ाते जायेंगे।” श्री नितिन गडकरी, तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष, भाजपा, वर्तमान केन्द्रीय सड़क परिवहन राजमार्ग एवं जहाजरानी मंत्री

“परम पूज्य संत श्री आशाराम जी बापू विद्यार्थियों के लिए देश के कोने कोने में आयोजित होने वाले विद्यार्थी तेजस्वी तालीम शिविरों में दुर्लभ एवं विस्मृत यौगिक क्रियाओं एवं अपने शुभ संकल्पों तथा प्रेरणादायी अनुभवसम्पन्न वचनों द्वारा उनमें आध्यात्मिक चेतना का संचार कर भारतीय संस्कृति से अनुप्रमाणित सुसंस्कारों का सिंचन करते हैं।”

डॉ. मुरली मनोहर जोशी, तत्कालीन केन्द्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री

“बापू जी की अमृतवाणी का विशेषकर मुझ पर तो बहुत प्रभाव पड़ता है। आपके दर्शनमात्र से ही मुझे एक अदभुत शक्ति मिलती है। इस हिन्दुस्तान में अमन, शांति, एकता एवं भाईचारा बना रहे इसलिए पूज्य बापू जी से आशीर्वाद लेने आया हूँ।” श्री प्रकाश सिंह बादल, मुख्यमंत्री, पंजाब

“हमें आपके मार्गदर्शन की जरूरत है, वह सतत् मिलता रहे। आपने हमारे कंधों पर जो जवाबदारी दी है, उसे हम भलीप्रकार निभायें। लोगों की, संस्कृति की अच्छे ढंग से सेवा करें। सत्य का मार्ग कभी न छूटे, ऐसा आशीर्वाद दो।”

श्री उद्धव ठाकरे, अध्यक्ष, शिवसेना

श्री नरेन्द्र भाई मोदी और इनके सभी साथी देश का नाम बुलंदियों पर ले जायें, भारत में वैदिक संस्कृति का प्रकाश फैलायें। पूज्य बापू जी एवं महापुरुषों का भारत को विश्वगुरु बनाने का सत्यसंकल्प शीघ्र साकार हो। (श्री आर सी मिश्र)

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जून 2014, पृष्ठ संख्या 7-9, अंक 258

ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ