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आत्ममहिमा में जगाने वाला पर्वःगुरूपूनम – पूज्य बापू जी


जन्म-जन्मांतर तक भटकाने वाली बुद्धि को बदलकर ऋतम्भरा प्रज्ञा बना दें, रागवाली बुद्धि को हटाकर आत्मरति वाली बुद्धि पैदा कर दें, ऐसे कोई सदगुरु मिल जायें तो वे अज्ञान का हरण करके, जन्म-मरण के बंधनों को काटकर तुम्हें स्वरूप में स्थापित कर देते हैं। आज तक तुमने दुनिया का जो कुछ भी जाना है, वह आत्मा-परमात्मा के ज्ञान के आगे दो कौड़ी का भी नहीं है। वह सब मृत्यु के एक झटके में अनजाना हो जायेगा लेकिन सदगुरु तो दिल में छुपे हुए दिलबर का ही दीदार करा देते हैं। ऐसे समर्थ सदगुरुओं की दीक्षा जब हमें मिल जाती है तो जीवन की आधी साधना तो ऐसे ही पूरी हो जाती है।

यदि तुम अज्ञान में ही मंत्र जपते जाओगे तो मंत्रजप का फल होगा तुम्हारी वासनापूर्ति और वासनापूर्ति हुई तो तुम भोग भोगोगे। समाधि से उठे तो योग कम्पित हो जाता है, भोगों में भी योग कम्पित हो जाता है लेकिन एक ऐसी अवस्था है कि भोग और योग दोनों बौने हो जाते हैं। ब्रह्मज्ञानी भोगते हुए भी अभोक्ता हैं, करते हुए भी अकर्ता हैं, खिन्न होते हुए भी खिन्न नहीं हैं, ऐसे अपने पद में पूर्ण हैं। उसी को बोलते हैं-

पूरा प्रभु आराधिया, पूरा जा का नाउ।

नानक पूरा पाइया, पूरे के गुन गाउ।।

पूरा पाइये। इन्द्र पद पूरा नहीं है, प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति पद पूरा नहीं है। राष्ट्रपति पद से उतरे हुए लोगों को देखो, इन्द्र पद से उतरे हुए लोगों को भी कैसी-कैसी योनियों में भटकना पड़ता है ! ब्रह्मपद ही पूरा है !

ब्राह्मी स्थिति प्राप्त कर, कार्य रहे न शेष।

मोह कभी न ठग सके, इच्छा नहीं लवलेश।।

पूर्ण गुरु किरपा मिली, पूर्ण गुरु का ज्ञान।…..

ऐसे आत्मानुभव से तृप्त महापुरुषों की, ब्रह्मवेत्ता सदगुरुओं की पूजा का जो पावन दिन है, वही गुरुपूनम है।

गुरूपूनम का संदेश

ʹव्यासपूर्णिमाʹ का उद्देश्य है कि आपके जीवन की शैली सुव्यवस्थित हो जाय। सुख आपको गुलाम न बनाये, दुःख आपको दबोचे नहीं। मृत्यु का भय आपको सताये नहीं क्योंकि आपकी कभी मौत हो नहीं सकती। जब भी मरेगा तो मरने वाला शरीर मरेगा। तुमको मौत का बाप भी नहीं मार सकता और भगवान भी नहीं मार सकता और भगवान भी नहीं मार सकते क्योंकि भगवान का आत्मा और तुम्हारा आत्मा एक ही है। घड़े का आकाश और महाकाश एक ही है।

जो गुरु से वफादार है वह मृत्यु के समय मौत के सिर पर पैर रखकर अमरता की तरफ चला जाता है। सत्संग हमें अमर कर देता है, अमर ज्ञान देता है, अमर जीवन की खबर देता है।

गुरूपूनम का पावन संदेश

आप नहा धोकर तिलक लगा के फिर ठाकुरजी को नहलाओ, तिलक लगाओ – ऐसी व्यवस्था है, ऐसी परम्परा है ताकि आपको पता चले कि ʹजो ठाकुर जी हैं, वे मेरे आत्म-ठाकुरजी के बल से सुन्दर बनते हैं। मैं ही सौंदर्य का विधाता हूँ। देवमूर्ति, गुरुमूर्ति, गुरु-भगवान, ये भगवान…. इस मुझ भगवान से ही  उनकी सिद्धि होती है।ʹ कब तक नाक रगड़ते रहोगे ? मरने वाला शरीर आप नहीं हो, दुःखी होने वाला मन आप नहीं हो, चिंतित होने वाला चित्त आप नहीं हो। आप इन सबको जानते हो। आप जानने वाले को जान लो तो आपका दीदार करने वाला निहाल हो जायेगा। आपकी नूरानी निगाहें जिन पर पड़ेंगी, वे खुशहाल होने लगेंगे। आपको छूकर जो हवाएँ जायेंगी, वे भी लोगों को पाप-ताप से मुक्त करके सत्संगी बना देंगी। जिसको आत्मप्रीति मिलती है, वृक्षादि का भी कल्याण करने की आध्यात्मिक आभा उसके पास होती है। आप कितने महान हैं, आपको पता नहीं। आप कितने सुखस्वरूप हैं, आपको पता नहीं।

आज पक्का कर लो कि यह गुरुपूर्णिमा हमें गुरु बनाने के लिए है। विषय विकार हमें लघु बनाते हैं। ज्ञान-वैराग्य, विवेक और भगवत्प्राप्ति की ख्वाहिश हमें गुरु बना देती है। गुरु माना ऊँचे सुख का धनी, ऊँचे ज्ञान का धनी, ऊँचे-में-ऊँचे रब का धनी। ईश्वर ने आपको दास बनाने के लिए सृष्टि नहीं बनायी है। आप ईश्वर के हो, ईश्वर आपके हैं। सिकुड़-सिकुड़कर भीख मत माँगो। देवो भूत्वा देवं यजेत्। ʹदेव होकर देव का पूजन करें।ʹ

जो नानक जी के समय में नानक जी को देखते होंगे, उनको कितनी आसानी  हुई होगी ! हयात महापुरुष को देखने सुनने से आत्मज्ञान में बड़ी आसानी हो जाती है। कबीर जी, नानक जी हो गये, तब हो गये लेकिन अभी भी तो कोई हैं, हमारी आँखों के सामने हैं। उनसे कितना उत्साह मिलता है, कितना विश्वास अडिग होता है ! हमें भी हयात महापुरुष लीलाशाहजी प्रभु मिले तो हमें बड़ी आसानी हो गयी और तुम्हें भी आसानी है। फिर काहे को ढीलापन, काहे को लिहाज रखते हो ? परिस्थितियों का ज्यादा लिहाज न रखो, ज्यादा इंतजार मत करे। चल पड़ो जहाँ सदगुरु तुम्हें ले जाना चाहते हैं।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जुलाई 2013, पृष्ठ संख्या 4,5 अंक 247

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सृष्टियों का कोई पार नहीं – पूज्य बापू जी


शास्त्रों में इस जगत की पोल खोलने की बात आती है। ʹगर्ग संहिताʹ में आता है कि एक बार इन्द्र, ब्रह्माजी और शंकर जी गोलोक चले गये। गोलोक में राधाजी का ही राज्य है और सब महिलाओं के हाथ में ही सत्ता है। वहाँ की मुखिया भी महिला, मंत्री और चपरासी भी महिला, जासूसी विभाग में भी महिला…. तो इन तीन पुरुषों को देखकर चन्द्रानना सखी ने पूछाः “तुम तीन लोग कौन हो ? कहाँ से आये हो ?”

शिवजी तो शांत रहे। इन्द्र ने कहाः “ये ब्रह्माजी हैं।”

ब्रह्माजी ने कहाः “ये इन्द्रजी हैं और ये शिवजी हैं।”

“कहाँ से आये हो ? कौन सी सृष्टि के ब्रह्माजी हो ? कौन-से स्वर्ग के इन्द्र हो ?”

“जिस सृष्टि में राजा बलि हुए थे, भगवान वामन का अवतार हुआ था, उस पृथ्वी और उस समय के हम ब्रह्माजी हैं।”

तो तुम्हारे इस आत्मदेव की सृष्टियों का भी कोई पार नहीं है। ʹश्री योगवासिष्ठ महारामायणʹ में आता है कि लाखों वर्ष पहले जिनको अभी तुम ʹपुरुषʹ बोलते हो वे स्त्री हो के गृहिणी का काम करते थे। जैसे घर सँभालना, गर्भधारण करना आदि । उनकी दाढ़ी-मूँछ भी होती थी। और जिनको अभी ʹमहिलाएँʹ बोलते हैं वे पुरुषों का काम करती थीं, वे कारोबार सँभालती थीं। तो इन सृष्टियों का कोई पार नहीं, परिवर्तनों का भी कोई पार नहीं लेकिन जो उस अनंत को अपना मानकर उसमें शांति पाता है और उसकी प्रीति, उसका ज्ञान और उसी में अपने ʹमैंʹ को मिलाता है, वह धन्य-धन्य हो जाता है, उसके माता-पिता को धन्यवाद है। बाकी तो एक-से-एक मकान, एक-से-एक सौंदर्य, एक-से-एक चीजें सब नाश को प्राप्त हो रही हैं। ʹगुरुवाणीʹ ने कहाः

किआ मागउ किछु चिरु न रहाई।

देखत नैन चलिओ जगु जाई।।

जब यह ऊँचा ज्ञान मिलता ह तो किसी से विरोध, किसी से द्वेष, किसी से ईर्ष्या….. – यह सारी मन की तुच्छ दौड़-धूप शांत हो जाती है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जून 2013, पृष्ठ संख्या 4, अंक 246

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सर्व धर्म समान ?


सनातन धर्म के प्रति हिन्दुओं की आस्था नष्ट करने के लिए ब्रिटिश शासन द्वारा परतंत्र भारत में मैकाले की शिक्षा प्रणाली शुरु की गयी थी, उसके प्रभाव से आज भी शिक्षित समाज में प्रतिष्ठित लोग सनातन धर्म की महिमा से अनभिज्ञ हैं तथा इसका गौरव भूलकर पाश्चात्य काल्पनिक कल्चर से प्रभावित हो रहे हैं। क्योंकि आज भी भारत के विद्यालयों-महाविद्यालयों में वही झूठा इतिहास पढ़ाया जा रहा है, जो अंग्रेज कूटनीतिज्ञों ने लिखा था। भारत को स्वतंत्रता मिलने के बाद राजनैतिक पार्टियों ने अपना वोट-बैंक बनाने के उद्देश्य से ʹसब धर्म समान हैंʹ – ऐसा प्रचार शुरु किया। उनका उद्देश्य केवल सत्ता प्राप्त करना ही था।

बाजार में मिलने वाला सब उपकरण समान नहीं होते, सब वस्त्र समान नहीं होते। उनका मूल्य उनके गुण दोष के आधार पर भिन्न-भिन्न निर्धारित किया जाता है। ʹसब राजनैतिक पार्टियाँ समान हैंʹ – ऐसा कोई कहे तो राजनेता नाराज हो जायेंगे। सब अपनी पार्टी को श्रेष्ठ और अन्य पार्टियों को कनिष्ठ बताते हैं, पर धर्म के विषय में ʹसर्व धर्म समानʹ कहने में उनको लज्जा नहीं आती।

सनातन धर्म के अतिरिक्त अन्य धर्म अपने धर्म को ही सच्चा मानते हैं और दूसरे धर्मों की निंदा करते हैं। केवल सनातन धर्म ने ही अन्य धर्मों के प्रति उदारता और सहिष्णुता का भाव सिखाया है। इसका मतलब यह नहीं कि सब धर्म समान हैं। गंगा का जल और तालाब, कुएँ या नाली का पानी समान कैसे हो सकता है ? यदि समस्त विश्व के सभी धर्मों का अध्ययन करके तटस्थ अभिप्राय बताने वाले विद्वानों ने किसी एक धर्म को तर्कसंगत और श्रेष्ठ घोषित किया हो तो उसकी महानता सबको स्वीकार करनी पड़ेगी।

सम्पूर्ण विश्व में यदि किसी धर्म को ऐसी व्यापक प्रशस्ति प्राप्त हुई है तो वह है ʹसनातन धर्म।ʹ जितनी व्यापक प्रशस्ति सनातन धर्म को मिली है, उतनी ही व्यापक आलोचना ईसाइयत की अंतर्राष्ट्रीय विद्वानों और फिलॉसफरों (दार्शनिकों) ने की है। सनातन धर्म की महिमा एवं सच्चाई को भारत के संत और महापुरुष तो सदियों से सैद्धांतिक व प्रायोगिक प्रमाणों के द्वारा प्रकट करते आये हैं। फिर भी पाश्चात्य विद्वानों से प्रमाणित होने पर ही किसी बात को स्वीकार करने वाले, पाश्चात्य बौद्धिकों के गुलाम – ऐसे भारतीय बुद्धिजीवी लोग इस श्रृंखला को पढ़कर भी सनातन धर्म की श्रेष्ठता को स्वीकार करेंगे तो हमें प्रसन्नता होगी और यदि वे सनातन धर्म के महान ग्रंथों का अध्ययन करें तो उनको इसकी श्रेष्ठता के अनेक सैद्धांतिक प्रमाण मिलेंगे। इसके अलावा यदि वे किसी आत्मानुभवी महापुरुष के मार्गदर्शन में सत्संग-साधना करें तो चिंता, दुःख, बंधन से छूटकर जीवन हरिमय हो जायेगा।

निम्नलिखित विश्वप्रसिद्ध विद्वानों के वचन सनातन धर्म की महत्ता प्रतिपादित करते हैं और ʹसर्व धर्म समानʹ कहने वाले लोगों के मुँह पर करारा तमाचा लगाते हैं-

“मैंन  यूरोप और एशिया के सभी धर्मों का अध्ययन किया है परंतु मुझे उन सबमें हिन्दू धर्म ही सर्वश्रेष्ठ दिखायी देता है। मेरा विश्वास है कि इसके सामने एक दिन समस्त जगत को सिर झुकाना पड़ेगा। मानव-जाति के अस्तित्व के प्रारम्भ के दिनों से लेकर अब तक पृथ्वी पर जहाँ जिंदे मनुष्यों के सब स्वप्न साकार हुए हैं, वह एकमात्र स्थान है – भारत।”

रोमा रोलां (फ्रेंच विद्वान)

मैंने 40 वर्षों तक विश्व के सभी बड़े धर्मों का अध्ययन करके पाया कि हिन्दू धर्म के समान पूर्ण, महान और वैज्ञानिक धर्म कोई नहीं है। डॉ. एनी बेसेंट (ब्रिटिश लेखिका, थियोसॉफिस्ट, समाजसेविका)

मैं ईसाई धर्म को एक अभिशाप मानता हूँ। इसमें आंतरिक विकृति की  पराकाष्ठा है। वह द्वेषभाव से भरपूर वृत्ति है। इस भयंकर विष का कोई मारण नहीं। फिलास्फर नित्शे (जर्मन दार्शनिक)

जीवन को ऊँचा उठाने वाला उपनिषदों के समान दूसरा कोई अध्ययन का विषय सम्पूर्ण विश्व में नहीं है। इनसे मेरे जीवन को शांति मिली है, इन्हीं से मुझे मृत्यु के समय भी शांति मिलेगी।” शॉपनहार (जर्मन दार्शनिक)

प्राचीन युग की सभी स्मरणीय वस्तुओं में भगवदगीता से श्रेष्ठ कोई भी वस्तु नहीं है। गीता के साथ तुलना करने पर जगत का समस्त आधुनिक ज्ञान मुझे तुच्छ लगता है। मैं नित्य प्रातःकाल अपने हृदय और बुद्धि को गीतारूपी पवित्र जल में स्नान कराता हूँ।

हेनरी डेविड थोरो (अमेरिकन लेखक व दार्शनिक)

धर्म के क्षेत्र में सब राष्ट दरिद्र हैं लेकिन भारत इस क्षेत्र में अरबोंपति है। – मार्क टवेन (अमेरिकन विद्वान)

विश्व के किसी भी धर्म ने इतनी वाहियात, अवैज्ञानिक, आपस में विरोधी और अनैतिक बातों का उपदेश नहीं दिया, जितना चर्च ने दिया है। – टॉलस्टॉय (रूसी नैतिक विचारक)

गीता का उपदेश इतना अलौकिक, दिव्य और ऐसा विलक्षण है कि जीवन-पथ पर चलते-चलते अऩेक निराश एवं श्रांत पथिकों को इसने शांति, आशा व आश्वासन दिया है और उऩ्हें सदा के लिए चूर-चूर होकर मिट जाने से बचा लिया है। ठीक उसी प्रकार जैसे इसने अर्जुन को बचाया। – के ब्राउनिंग

बाईबिल पुराने और दकियानूसी अंधविश्वासों का एक बंडल है। – जार्ज बर्नाड शा (सुप्रसिद्ध आइरिश विद्वान)

भारत में पादरियों का धर्म-प्रचार हिन्दू धर्म को मिटाने का खुला षडयंत्र है, जो कि एक लम्बे अरसे से चला आ रहा है। हिन्दुओं का तो यह धार्मिक कर्तव्य है कि वे ईसाइयों के षडयंत्र से आत्मरक्षा में अपना तन-मन-धन लगा दें और आज जो हिन्दुओं को लपेटती हुई ईसाइयत की लपट परोक्ष रूप से उनकी ओर बढ़ रही है, उसे यहीं पर बुझा दें। ऐसा करने से ही भारत में धर्म-निरपेक्षता, धार्मिक बंधुत्व तथा सच्चे लोकतंत्र की रक्षा हो सकेगी अन्यथा आजादी को पुनः खतरे की सम्भावना हो सकती है। – पं. श्रीराम शर्मा।

हमें गोमांस-भक्षण और शराब पीने की छूट देने वाला ईसाई धर्म नहीं चाहिए। धर्म  परिवर्तन वह जहर है, जो सत्य और व्यक्ति की जड़ों को खोखला कर देता है। मिशनरियों के प्रभाव से हिन्दू परिवार का विदेशी भाषा, वेशभूषा, रीति-रिवाज के द्वारा विघटन हुआ है। यदि मुझे कानून बनाने का अधिकार होता तो मैं धर्म-परिवर्तन बंद करवा देता। इसे तो मिशनरियों ने एक व्यापार बना लिया है, पर धर्म आत्मा की उन्नति का विषय है। इसे रोटी, कपड़ा या दवाई के बदले में बेचा या बदला नहीं जा सकता। – महात्मा गांधी

हिन्दू समाज में से एक मुस्लिम या ईसाई बने, इसका मतलब यह नहीं कि एक हिन्दू कम हुआ बल्कि हिन्दू समाज का एक दुश्मन और बढ़ा। – स्वामी विवेकानंद

तटस्थ एवं निष्पक्ष विद्वानों व विचराकों द्वारा सनातन धर्म एवं अन्य धर्मों के विषय में प्रकट किये गयेच इऩ विचारों के अध्ययन के पश्चात आशा है कि सनातन धर्मावलम्बी स्वयं को हिन्दू कहलाने में गर्व का अनुभव करेंगे।

सबके प्रति स्नेह व सदभाव रखना भारतवर्ष की विशेषता है लेकिन ʹसर्व धर्म समानʹ का भाषण देने वाले लोग भोले-भाले भारतवासियों के दिलोदिमाग में मैकाले की कूटनीतिक शिक्षा नीति और पाश्चात्य गुलामी के संस्कार भरते हैं। जैसे-चपरासी, सचिव, जिलाधीश आदि सब अधिकारी समान नहीं होते, गंगा, यमुना, गोदावरी आदि नदियों का जल और कुएँ, बावली नाली का जल समान नहीं होता, ऐसे ही सब धर्म समान नहीं होते। (सर्व धर्म समान ? पुस्तक से क्रमशः)

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जून 2013, पृष्ठ संख्या 13,15 अंक 246

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