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बढ़ते दुष्कर्म के लिए जवाबदार अश्लीलता


15 अप्रैल 2013 को गांधीनगर, दिल्ली में पाँच साल की बच्ची के साथ हुए बलात्कार के मामले में गुनहगार ने बयान दिया कि ʹमैंने मोबाइल पर अश्लील फिल्म देखकर वासना के नशे में यह दुष्कर्म किया था।ʹ

आजकल महिला वर्ग के ऊपर बढ़ते अत्याचारों का सीधा संबंध इंटरनेट, टीवी चैनलों तथा सिनेमा हॉलों आदि माध्यमों से परोसी जाने वाली अश्लील व नग्नता भरी फिल्मों से है। अनैतिक सामग्रियों से भरी वेबसाइटों तथा अश्लील विज्ञापन व फूहड़ कार्यक्रम दिखाने वाले टी.वी. चैनल लोगों की मानसिकता पर हमला करते हैं।

लेखक संजय वोरा लिखते हैं कि ʹइंटरनेट पर करोड़ों की संख्या में पोर्नोग्राफिक (अश्लील सामग्री से भरी) वेबसाइटे हैं, जिन पर कामोत्तेजक अश्लील वीडियो देखे व अपलोड किये जाते हैं। इन्हें देखने से लोगों की कामवासना भड़कती है और वे अपना होश खो बैठते हैं।

प्रशासन को ऐसी वेबसाइटें व फिल्में तुरंत बंद कर देनी चाहिए। परंतु भारत में जब-जब पोर्नोग्राफी पर प्रतिबंध लगाने की माँग की गई है तब-तब सरकार ने यही दलील दी है कि ʹऐसी वेबसाइटों का संचालन विदेशों से होने के कारण उनके ऊपर प्रतिबंध लगाना व्यावहारिक रूप में सम्भव नहीं है।ʹ लेकिन यह दलील आधारहीन है। चीन, पाकिस्तान, दक्षिण अमेरिका के गुयाना और इजिप्त – इन देशों में अधिकांश पोर्नोग्राफिक वेबसाइटों पर प्रतिबंध है। दक्षिण कोरिया में तो 81.1 प्रतिशत लोग इंटरनेट के धारक हैं फिर भी वहाँ की सरकार ने पोर्नोग्राफिक वेबसाइटों पर सख्त प्रतिबंध लगाया है। तो फिर भारत में प्रतिबंध क्यों नहीं लगाया जा सकता ?

(संदर्भ- दिव्य भास्कर, दैनिक जागरण)

नैतिक पतन की इस आँधी को रोकने के लिए प्रतिबंध के साथ ही समाज में संयम-शिक्षा के प्रबंध की भी नितांत आवश्यकता है। ʹइन्नोसेंटी रिपोर्ट कार्डʹ के अनुसार अमेरिका में प्रतिवर्ष 30 लाख किशोर-किशोरियाँ यौन रोगों के शिकार होते हैं। गोनोरिया, जैनिटल हर्पीस और एड्स जैसे यौन रोगों एवं कलह, असंतोष, अशांति, उच्छ्रंखलता, उद्दंडता, मानसिक तनाव (डिप्रेशन), आत्महत्या आदि से त्रस्त हो के अमेरिका ने अब ʹसंयम शिक्षा अभियानʹ चलाया है, जिसके लिए प्रतिवर्ष करोड़ों डॉलर खर्च होते हैं। हालाँकि संतों के मार्गदर्शन, सत्शास्त्रों के ज्ञान के अभाव में वे पूर्ण सफल नहीं हो पा रहे हैं। जबकि भारत तो अध्यात्म का केन्द्र है, भगवद-अवतारों, संतों महापुरुषों की अवतरण भूमि है। यहाँ संतों का मार्गदर्शन एवं प्रत्यक्ष सान्निध्य सुलभ है, जिससे संयम की शिक्षा यहाँ शीघ्र फलित होती है। अब देखने की बात यह है कि क्या भारत सरकार देशवासियों को शारीरिक, मानसिक एवं सामाजिक पतन से बचाने के लिए भारत की इस विशेषता का लाभ उठा पायेगी ?

राष्ट्रहितैषी, विश्व-समुदाय के हितचिंतक, दूरदृष्टा पूज्य बापू जी ने पिछले 49 वर्षों से ʹयुवाधन सुरक्षा अभियानʹ चला रखा है। आश्रम के इस मुख्य अभियान के अंतर्गत संयम सदाचार के प्रेरणास्रोत एवं जीवन का सर्वांगीण विकास करने वाले छोटे से सदग्रंथ ʹदिव्य प्रेरणा-प्रकाशʹ का 2 करोड़ से भी ज्यादा की संख्या में वितरण हो चुका है और प्रतियोगिता द्वारा देश के 55 हजार से अधिक विद्यालयों-महाविद्यालयों में 49,13,068 विद्यार्थियों को संयम-शिक्षा प्रदान की गयी है। यही नहीं, पूज्य बापू जी की प्रेरणा से देश-विदेश में चलाये जा रहे 17,000 से अधिक बाल संस्कार केन्द्रों, सैंकड़ों युवा सेवा संघों एवं महिला उत्थान मंडलों द्वारा लाखों-लाखों किशोर-किशोरियों का सर्वांगीण विकास हो रहा है। पूज्य बापू जी द्वारा दिये गये संयम-शिक्षा के पाठ से अनगिनत लोगों का जीवन पतन की खाई में जाने से बचकर बलवान, तेजस्वी एवं प्रतिभावान बनने के रास्ते चल पड़ा है।

संतों-महापुरुषों के वचनों को तोड़-मरोड़कर लोगों को गुमराह करने का जघन्य अपराध तो कइयों द्वारा किया जाता है  परंतु उनके संयम-सुशिक्षा के अभियानों को समाज के सामने रखने के अपने नैतिक दायित्व को निभाने वाले तो कोई विरले ही होते हैं। समाज को ग्रस रहे दुराचार के इस दानव के दमन का उपाय संतों द्वारा बतायी गयी संयम-शिक्षा ही है। तभी नारियों का शील सुरक्षित होगा और वे सम्मान के साथ जी सकेंगी।

जब भी कोई महिला से दुष्कर्म की घटना होती है तब ऐसे लोग विरोध करते हैं जो मनोरंजन के नाम पर अश्लीलता का पोषण करते हैं। पेशे से तो वे अनैतिक समाज का निर्माण करते हैं और दिखावा करते हैं यौन-अपराधों को रोकने के लिए उत्सुक समाज-सुधारक का। ऐसे अपराधियों को पैदा करने वाले लोगों की मानसिक गुलामी छोड़कर समाज अपराधों को रोकने का मार्गदर्शन देने वाले धर्मों और संतों की सीख मान के उनके उपदेशों का पालन करेगा तो अपराध निर्मूल हो सकते हैं। धर्म-निरपेक्षता के नाम पर अधर्म का और अनैतिकता का समर्थन करने वाले किसी भी देश में अपराध कम नहीं हो सकते। सिर्फ कानून बनाने में अपराध बंद हो जाते तो किसी भी देश में कोई भी अपराध नहीं होता। सब देशों में कानूब बने हैं फिर भी बड़े-बड़े अपराध बड़ी संख्या में हो रहे हैं, कानून बनाने वाले नेता भी अपराध कर रहे हैं। क्योंकि समाज ने धर्म-निरपेक्षता के नाम पर धर्म का पालन करना त्याग दिया है और आर्थिक लाभ के लिए अधर्म और अनैतिकता को बढ़ाने वाली अश्लीलता को फिल्मों, विज्ञापनों, अखबारों, पत्रिकाओं, चैनलों, पुस्तकों और वेबसाइटों पर स्वीकृति प्रदान की गयी है। एक ओर समाज के अपराधीकरण की प्रवृत्तियाँ तो बढ़ा रहे हैं और दूसरी ओर अपराधों को रोकने की बातें कर रहे हैं। समाज ऐसे दम्भी सुधारकों से सावधान होकर समाज के सच्चे हितैषी संतों के उपदेशों का पालन करेगा तभी समाज का सच्चा सुधार हो सकेगा।

पाश्चात्य दार्शनिक प्लेटो ने उनकी प्रसिद्ध पुस्तक रिपब्लिक में लिखा है, ʹप्रपंची, रागद्वेष और कामवासना से जलता हुआ, सत्ता का प्यासा इस पृथ्वी का अहंकारी मनुष्य सामाजिक नियमों से नहीं सुधरेगा, राज्य तंत्र की शिक्षा-प्रणाली से नहीं सुधरेगा परंतु यदि उसमें परलोक का भय जागृत होगा और मनुष्य-जीवन की क्षुद्र मर्यादा से उस पार गूढ़ रहने वाले अनंत अवतारों में विस्तृत जीवन को वह समझेगा और उसकी दृष्टि विशाल बनेगी तभी मानव-सुधार सम्भव होगा और समाज में नैतिक जीवन का गौरव बढ़ेगा। – श्री केशव सेन

मुख्य सम्पादक, न्यूज पोस्ट समाचार पत्र।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जून 2013, पृष्ठ संख्या 22,23 अंक 246

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छिपा परमेश्वर


गुरु सत्य है। गुरु पूर्ण हैं। गुरु की महिमा रहस्यमय और अति दिव्य है। वे मानव को नया जन्म देते हैं। उनके बारे  में कहा गया हैः

मनुष्यदेहमास्थाय छन्नास्ते परमेश्वरः।

ʹखुद परमेश्वर ही गुरुरूप मनुष्य देह धारण करके छिपकर रहता है।ʹ

गुरु की यह व्याख्या है – ʹजो शक्तिपात द्वारा अंतर्शक्ति को जगाते हैं, मनुष्य शरीर में परमेश्वरीय शक्ति को संचारित कर देते हैं, जो योग की शिक्षा, ज्ञान की मस्ती, भक्ति का प्रेम, कर्म में निष्कामता और जीते-जी मोक्ष देते हैं, वे परम गुरु शिव से अभिन्नरूप हैं। वे ही राम, शक्ति, गणपति और वे गुरु ही माता-पिता हैं।ʹ

ऐसे गुरु का कितना उपकार, कितना अनुग्रह, कितनी दया है ! ऐसे गुरु समान कौन मित्र, कौन प्रेमी, कौन माँ और कौन देवता है ? जिन गुरु ने आपके कुल, जाति, कर्म-अकर्म, गुण-दोष आदि देखे बगैर आपको अपना लिया, उन गुरु की महिमा कौन गा सकता है ! श्रीगुरु में जिसकी प्रह्लाद जैसी दृढ़ आस्तिक बुद्धि होती है, उसके अंदर परमेश्वर का प्रकट होना कोई आश्चर्य की बात नहीं है।

तुम डरो मत ! निर्भय होकर गुरु का आश्रय हो। गुरु पर भरोसा रखो। एक आशा, एक विश्वास, एक बल श्रीगुरु का लेकर रहो। गुरु में पूर्ण आत्मसमर्पण करके गुरुभाव को अपनाओ।

स्वामी श्री मुक्तानंदजी (ʹचित्तशक्ति विलासʹ से साभार)

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जून 2013, पृष्ठ संख्या 29, अंक 246

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चिदानंदमय देह तुम्हारी… – पूज्य बापू जी


एक भोला-भाला आदमी संत-महापुरुष के पास जाकर बोलाः “मुझे गुरु बना दो।”

गुरुजीः “बेटा ! पहले शिष्य तो बन !”

“शिष्य-विष्य नहीं बनना, मुझे गुरु बनाओ। तुम जो भी कहोगे, वह सब करूँगा।”

गुरुजी ने देखा कि यह आज्ञा पालने की तो बात करता है। बोलेः “बेटा ! मैं तेरे को कैसा लगता हूँ ?”

वह लड़का गाय-भैंस चराता था, गडरिया था। बोलाः “बापजी ! आपके तो बड़े-बड़े बाल हैं, बड़ी-बड़ी जटाएँ हैं। आप तो मुझे ढोर (पशु) जैसे लगते हो।”

बाबा ने देखा, निर्दोष-हृदय तो हैं पर ढोर चराते-चराते इसकी ढोर बुद्धि हो गयी है। बोलेः “जाओ, तीर्थयात्रा करो, भिक्षा माँग के खाओ। कहीं तीन दिन से ज्यादा नहीं रहना।”

ऐसा करते-करते सालभर के बाद गुरुपूनम को आया। गुरु जीः “बेटा ! कैसा लगता हूँ ?”

बोलेः “आप तो बहुत अच्छे आदमी लग रहे हो।”

बाबा समझ गये कि अभी यह अच्छा आदमी हुआ है इसीलिए मैं इसे अच्छा आदमी दिख रहा हूँ। सालभर का और नियम दे दिया। फिर आया।

गुरुजीः “अब कैसा लगता हूँ ?”

“बाबाजी ! आप ढोर जैसे लगते हो, आप अच्छे आदमी हो, यह मेरी बेवकूफी थी। आप तो देवपुरुष हो, देवपुरुष !”

बाबा ने देखा, इसमें सात्त्विकता आयी है, देवत्त्व आया है। बाबा ने अब मंत्र दिया। बोलेः “इतना जप करना।”

जप करते-करते उसका अंतःकरण और शुद्ध हुआ, और एकाग्रता हुई। कुछ शास्त्र पढ़ने को गुरु जी ने आदेश दिया। घूमता-घामता, तपस्या, साधन-भजन करता-करता सालभर के बाद आया।

गुरु जी ने पूछाः “बेटा ! अब मैं कैसा लग रहा हूँ ?”

“गुरु जी ! आप ढोर जैसे लगते हैं – यह मेरी नालायकी थी। आप अच्छे इन्सान हैं – यह भी मेरी मंद मति थी। आप देवता हैं – यह भी मेरी अल्प बुद्धि थी। देवता तो पुण्य का फल भोगकर नीचे आ रहे हैं और आप तो दूसरों के भी पाप-ताप काटकर उनको भगवान से मिला रहे हैं। आप तो भगवान जैसे हैं।”

गुरु ने देखा, अभी इसका भाव भगवदाकार हुआ है। बोलेः “ठीक है। बेटा ! ले, यह वेदान्त का शास्त्र। भगवान किसे कहते हैं और जीव किसको कहते हैं, यह पढ़ो। जहाँ ऐसा ज्ञान मिले वहीं रहना और इस ज्ञान का अनुसंधान करना।”

वह उसी ज्ञान का अनुसंधान करता लेकिन ज्ञान का अनुसंधान करते-करते आँखें, मन इधर-उधर जाते तो गुरुमूर्ति को याद करता। गुरुमूर्ति को याद करते-करते गुरु तत्त्व के साथ तादात्म्य होता और गुरु-तत्त्व के साथ तादात्म्य करते-करते सारे देवी-देवताओं का जो सारस्वरूप है – गुरु तत्त्व, उसमें उसकी स्थिति होने लगी। आया गुरुपूनम को।

गुरु ने कहाः “बेटा ! मैं कैसा लगता हूँ ?”

अब उसकी आँखें बोल रही हैं, वाणी उठती नहीं। पर गुरु जी को जवाब तो देना है, बोलाः “गुरु जी ! आप पशु लग रहे थे, यह मेरी दुष्ट दृष्टि थी। अच्छे मनुष्य, देवता या भगवान लग रहे थे, यह सारी मेरी अल्प मति थी। आप तो साक्षात् परब्रह्म हैं। भगवान तो कर्मबंधन से भेजते हैं और आप कर्मबंधन को काटते हैं। देवता राजी हो जाता है तो स्वर्ग देता है, भगवान प्रसन्न हो जायें तो वैकुंठ देते हैं लेकिन आप प्रसन्न हो जाते हैं तो अपने आत्मस्वरूप का दान करते हैं। जीव जिससे जीव है, ईश्वर जिससे ईश्वर है, उस परब्रह्म-परमात्मा का स्पर्श और अनुभव कराने वाले आप तो साक्षात् परब्रह्म-परमात्मा हैं।”

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।

साक्षात् अठखेलियाँ करता जो निर्गुण-निराकार परब्रह्म है, वही तुम सगुण-साकार रूप लेकर आये हो मेरे कल्याण के लिए।

इसी प्रकार भागवत में आता है कि जब रहूगण राजा से जड़भरत की भेंट हुई तो उसने जड़भरत को पहले डाँटा, अपमानित किया पर बाद में जब पता चला कि ये कोई महापुरुष हैं तो रहूगण राजा उनको प्रणाम करता है। तब जड़भरत ने बतायाः अहं पुरा भरतो नाम राजा….अजनाभ खंड का नाम जिसके नाम से ʹभारतवर्षʹ पड़ा, वह मैं भरत था। मैं तपस्या करके तपस्वी तो हो गया लेकिन तत्त्वज्ञानी सदगुरु का सान्निध्य और आत्मज्ञआन न होने से हिरण के चिंतन में फँसकर हिरण बन गया और हिरण में से अभी ब्राह्मण-पुत्र जड़भरत हुआ हूँ।” इतना सुनने के बाद भी रहूगण कहता हैः “महाराज ! आप तो साक्षात् परब्रह्म हैं। मेरे कल्याण के लिए ही आपने लीला की है।” वह यह नहीं कहता कि ʹहिरण में से अभी साधु बने हो। मैं आपको प्रणाम करता हूँ।ʹ नहीं, आप साक्षात परब्रह्म हैं। मेरे कल्याण के लिए ही हिरण बनने की और ये जड़भरत बनने की आपकी लीला है।ʹ ऐसी दृढ़ श्रद्धा हुई तब उसको ज्ञान भी तो हो गया !

गुरु को पाना यह तो सौभाग्य है लेकिन उनमें श्रद्धा टिकी रहना यह परम सौभाग्य है। कभी-कभी तो नजदीक रहने से उनमें देहाध्यास दिखेगा। उड़िया बाबा कहते हैं- “गुरु को शरीर मानना श्रद्धा डगमग कर देगा।” गुरु का शरीर तो दिखेगा लेकिन ʹशरीर होते हुए भी वे अशरीरी आत्मा हैंʹ – इस प्रकार का भाव दृढ़ होगा तभी श्रद्धा टिकेगी व ज्ञान की प्राप्ति होगी।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जून 2013, पृष्ठ संख्या 14,15 अंक 246

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