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भक्त तुलाधार


संत श्री आसाराम जी बापू के सत्संग-प्रवचन से

श्री रामचरितमानस में आया हैः

गौधन गजधन बाजिधन, और रतन धन खान।

जब आवे संतोष धन, सब धन धूरि समान।।

भक्त तुलाधार इसी संतोषरूपी धन के धनी थे। उन्होंने अयाचक व्रत ( न माँगने का  व्रत) धारण किया था। वे खेत में फसल कटने पर अन्न के गिरे हुए दाने बीनकर एकत्र कर लेते थे एवं उन्हीं से अपनी क्षुधा शांत कर लेते थे। शरीर पर वस्त्र के नाम पर एक ही फटी धोती एवं फटा गमछा था।

पत्नी भी ऐसी ही पवित्र थी। वह पति के व्रत में सहयोगी थी। दोनों भगवद भजन में मस्त रहते थे। इच्छाएँ छोड़कर भगवान के रस में इतने तृप्त हो गये थे कि बड़े-बड़े राजाओं का सुख भी उनको आत्मसुख के आगे तुच्छ दिखता था। जो निष्कामी होते हैं, निःस्पृहि होते हैं, आत्मारामी होते हैं, ऐसे पवित्र संतों को प्रसिद्ध करने के लिए भगवान भी कभी कुछ-न-कुछ लीला कर लिया करते हैं !

तुलाधार स्वयं तो कुछ नहीं चाहते थे लेकिन उनकी महिमा बढ़ाने के लिए भगवान ने उनकी परीक्षा की। एक दिन जब तुलाधार स्नान करने के लिए नदी पर गये तो देखा कि चार-पाँच नये वस्त्र पड़े हैं। तुलाधार ने देखा लेकिन मन-ही-मन विचार करने लगे कि मेरा गुजारा तो इस फटी धोती से ही हो जाता है। जिस शरीर को ढँकता हूँ, वह शरीर भी एक दिन न रहेगा तो ढँकने का साधन ये वस्त्र कितने दिन तक ? किसी के पड़े हुए वस्त्र मैं क्यों लूँ ? जिस शरीर को एक दिन जला देना है उसके लिए चिंता क्यों करूँ ? मुझे तो भगवान का चिंतन करना चाहिए।

तुलाधार ने वस्त्र न उठाये, स्नान करके अपने घर चले गये। भगवान ने देखा कि है तो पक्का। दूसरे दिन भगवान ने मार्ग में तुलाधार को दिखे इस प्रकार अशर्फियों से भरा घड़ा रख दिया।

तुलाधार स्नान करने के लिए गये तो देखा कि अशर्फियों से भरा घड़ा ! सोने की मोहरें देखकर उन्हें अपनी दरिद्रता का ख्याल भी आया। परंतु उनके हृदय ने कहाः ‘मैंने तो अयाचक व्रत लिया है। मेरा सोना तो मेरा आत्मा, मेरा राम है। मेरा सोना तो पवित्र आचार है। फिर भी मैं अगर यह धन ले लूँ तो धन तो अनर्थों की जड़ है। धन आते ही भोग की इच्छा बढ़ने लगती है। धन आते ही अहंकार बढ़ने लगता है। धन आते ही कुटुंबी और स्वजनों में राग-द्वेष बढ़ने लगता है।

तुलाधार सोने की अशर्फियों को वहीं छोड़कर स्नान करके चले गये।

भगवान ने देखाः तुलाधार बड़ा पक्का है। इतनी स्वर्णमुहरें भी उसके चित्त को चलित न कर पायीं ! अब भगवान से रहा न गया… परीक्षा का पेपर जितना बढ़िया होता है उतनी कड़क जाँच होती है, वैसे ही भक्त जितना बढ़िया होता है उतनी कसौटी भी ज्यादा होती है।

भगवान एक ज्योतिषी का रूप लेकर भक्त के नगर में प्रविष्ट हुए। किसी का हाथ देखते थे, किसी का ललाट देखते थे और उसका भविष्य बता देते थे। देखते-देखते वे तुलाधार के पड़ोस में पहुँचे। तुलाधार की पत्नी ने देखाः कोई बड़े ज्योतिषी आये हैं और सब सच-सच बता देते हैं’ वह भी गयी ज्योतिषी के पास ?

उसे देखते ही ज्योतिषी ने कहाः

“आपके पति का नाम तुलाधार है।”

पत्नीः “आप धन्य हैं महाराज ! धन्य हैं।”

ज्योतिषीः “आपके पति अयाचक व्रत में दृढ़ नहीं हैं। आप गरीबी नहीं चाहती हो लेकिन पतिव्रता होने के कारण आपने पति की इच्छा को में मिला दिया है।”

पत्नीः “महाराज ! आप बिल्कुल सच कहते हैं।”

ज्योतिषीः “आपके पास ही एक ही साड़ी है। उसी को स्नान के पश्चात गीली होने पर रसोईघर में वहाँ की गरमी से अपने तन पर सुखाती हो। आप लोग खेत में अन्न के दाने चुनकर लाते हो और उन्हीं से सत्तू बनाकर भगवान को भोग लगाकर खा लेते हो। आज तक भगवान ने आपको कुछ न दिया, फिर भी उसी भगवान का आप भजन करते हो?”

पत्नीः “महाराज ! ऐसा न कहें। आपकी बात तो सच है, लेकिन हम धन या अन्न वस्त्र पाने के लिए उन्हें नहीं रिझाते।”

ज्योतिषीः दो दिन पहले ही आपके पति जब नदीं में नहाने के लिए गये थे, तब उन्हें रास्ते में पाँच-छः सुंदर धोती और साड़ियाँ पड़ी मिली थीं। आपके पति ने उन्हें छुआ तक नहीं और नहाकर वापस चले आये।”

पत्नीः “महाराज ! आप सच कहते हैं ?”

ज्योतिषी तो भगवान का स्वरूप थे। वे सच न बोलेंगे तो कौन बोलेगा ?

पत्नी भागी-भागी गयी अपने पति के पास और बोलीः “एक अंतर्यामी महाराज आये हैं, वे पूरे अंतर्यामी हैं। आप भी चलकर उनका दर्शन करें।”

तुलाधार ने आकर ज्योतिषी को प्रणाम किया और कहाः

“महाराज ! जरा आप हमारा भी ललाट देखें परंतु हमारे पास देने के लिए दक्षिणा नहीं है।”

ज्योतिषी ने कहाः “हम दक्षिणा लेते ही नहीं हैं। हम लेने को नहीं देने को निकले हैं।”

फिर तुलाधार का हाथ देखते हुए बोलेः “आपको दो दिन पहले धोती और साड़ियाँ मिली थीं, परन्तु आपने उन्हें नहीं लिया। धन की रेखा तो है लेकिन ‘ना-ना’ करके यह चौकड़ी आ गयी हैं। आज सुबह भी आपको स्वर्णमुद्राओ से भरा कलश  मिला था….”

यह सुनकर तुलाधार को बड़ा आश्चर्य हुआः “महाराज ! ये बातें तो मैंने किसी को नहीं बतायीं, आपको कैसे पता चल गयी ?

ज्योतिषीः “किसी को नहीं बतायीं  लेकिन रेखाएँ साफ—साफ बोल रही हैं। आपने उन स्वर्णमुहरों को देखा, आपको अपनी गरीबी भी याद आयी। फिर भी आपने नहीं ली।”

तुलाधारः “महाराज ! आपकी बात सही है।”

ज्योतिषीः “तुलाधार ! आप अपने भाग्य को स्वयं ठोकर मारते हो। हम ज्योतिषी हैं इसलिए सच्ची बात बताते हैं। सब गुण धन में आश्रित होते हैं। धनवान के अवगुण दब जाते हैं। धन से आदमी होम-हवन, यज्ञ-याग कर सकता है। धन से आदमी माता-पिता और गुरुजनों की सेवा करके आशीर्वाद पा सकता है। धन से क्या नहीं हो सकता है ?”

तुलाधारः “महाराज ! धन से सब कुछ होता है। धन से स्वर्ग का सुख मिलता है और स्वर्ग का सुख भोगकर फिर नरक में जाना पड़ता है। धन से अभिमान बढ़ता है, धन से भोग-वासना बढ़ती है, धन से लोभ बढ़ता है और धन की रक्षा-रक्षा में आदमी की आयुष्य पूरी हो जाती है।”

ज्योतिषी महाराज कहते हैं कि धन से सब कुछ होता है और तुलाधार भी कहते हैं कि धन से सब कुछ होता है, लेकिन जहाँ ज्योतिषी धन का प्रलोभन दिखा रहे हैं, वही तुलाधार धन के दोष बता रहे हैं। जिनको आत्मधन मिल गया वे नश्वर धन की कामना क्यों करेंगे ? जिनको आत्मसुख मिल गया वे संसार के नश्वर सुख की इच्छा क्यों करेंगे ? जिनको आत्मजीवन मिल गया वे देह की आसक्ति क्यों करेंगे ?

आखिरी ज्योतिषी चुप हो गये क्योंकि सत्य के आगे तो न्यायाधीशों को भी चुप रहना पड़ता है। तुलाधार धन के पूरे दोष बताने में सफल हो गये तो भगवान मौन हो गये। भगवान भीतर से बड़े प्रसन्न हो गये और अपनी प्रसन्नता की जरा-सी निगाह तुलाधार पर डाल दी।

अब तुलाधार को हुआः ‘हमारा हित चाहने के लिए इन्होंने इतनी बातें बतायीं और मैंने इनकी सब बातें काट दीं, फिर भी ये क्रोधित न हुए। जिसको कामना होती है, उसी को क्रोध आता है। मालूम होता है कि ये कोई महात्मा हैं या फिर स्वयं परमात्मा हैं क्योंकि इन्हें तनिक भी क्रोध नहीं आया।’

तुलाधार ने गहराई से देखा तो उसके चित्त में शांति और प्रसन्नता का साम्राज्य बढ़ा। उन्होंने ज्योतिषी के चरण पकड़ लिये और बोलेः

“भगवान ! आप और इस वेश में ! आप यह छलिया-वेश धारण करके आये ! अब आप अपने असली वेश में प्रगट हो जायें कृपा करें…. प्रभु !”

भगवान नारायण अपने असली रूप में प्रगट हो गये और तुलाधार को गले से लगा लिया।

जिनको कोई कामना नहीं है उन्हीं को भगवान अपने गले से लगाते हैं। कामना घटाने दो तरीके हैं-

ईश्वर से प्रीति इतनी हो जाये कि उनके सिवाय कोई कामना उठे ही नहीं।

अगर कामना उठे भी तो खुद सुख लेने की नहीं, वरन् दूसरों को सुख देने की कामना उठे। जो दूसरों को सुख देता है, वह स्वयं सुख का दाता हो जाता है। राजवैभव से युक्त जनक, श्रीकृष्ण, श्रीराम तथा विरक्त प्रारब्धप्रधान शुकदेव और तुलाधार ये सभी अनासक्ति एवं आत्मसुख की तृप्ति के अनुभव में एक ही थे।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, दिसम्बर 2001, पृष्ठ संख्या 18-20, अंक 108

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चरित्र की पवित्रता


चरित्र की पवित्रता हर कार्य में सफल बनाती है। जिसका जीवन संयमी है, सच्चचरित्रता से परिपूर्ण है उसकी गाथा इतिहास के पन्नों पर गायी जाती है। हरि सिंह नलवा का व्यक्तित्व ऐसा ही था।

पंजाब के पड़ोसी काबुल द्वारा बार-बार पंजाब के सीमावर्ती इलाकों पर आक्रमण हो रहा था। उसका सामना करने के लिए प्रधान सेनापति हरिसिंह नलवा के नेतृत्व में सेना ने काबुल की ओर प्रस्थान किया।

हरिसिंह के शौर्य के आगे काबुली सेना ज्यादा देर न टिक सकी। उनका सरदार हरिसिंह के हाथों मारा गया।

काबुली सरदार की पुत्री मेहर खूबसूरत भी थी और वीरांगना भी। उसने अपने पिता की मृत्यु का बदला लेना चाहा। उसने सोचाः ‘यदि आमने सामने प्रतिशोध पूरा न कर सकी तो रूप जाल में फँसाकर हरिसिंह को खत्म कर दूँगी। आखिर वह अभी युवा है और बहादुर होने का साथ मोहक भी है। उसका प्रचंड पौरूष मेरे रूप लावण्य के आगे न टिक सकेगा।’

एक दिन उसे हरिसिंह के तंबू का सुराग मिल ही गया। वह रात्रि के अँधेरे में अकेली ही तलवार लेकर निकल पड़ी। रात्रि का दूसरा पहर बीत रहा था, किंतु हरिसिंह के सैनिक पूरी तरह सजाग थे। उन्होंने मेहर को रोक दिया और पूछाः

“इस मध्य रात्रि में इस तरह अकेली क्यों आयी हो ?”

मेहरः “तुम्हारे सेनापति से मिलना है।”

प्रहरी चौंका कि इतनी रात में ! उसने कहाः “तुम सुबह आओ। वैसे भी हमारे सेनापति स्त्रियों से दूर रहते हैं। तुम यहाँ से चली जाओ।”

मेहरः “असंभव ! मैं हरि सिंह से मिले बिना नहीं जाऊँगी। तुम उनसे जाकर कह दो कि काबुल के सरदार की बेटी मेहर आयी है।”

हरिसिंह ने सुना तो उसे सादर बुला लिया।

मध्य रात्रि थी, पूर्ण एकांत था और मेहर की वेशभूषा एवं श्रृंगार उसे और अधिक मादक बना रहा था, लेकिन हरि सिंह किसी और ही धातु के बने थे। उन्होंने मेहर की ओर एक नजर डालकर मुस्कुराते हुए कहाः “बैठो, बहन  !”

हरिसिंह की निश्छल मुस्कान और ‘बहन’ के संबोधन को सुनकर मेहर के हृदय का सारा प्रतिशोध ठंडा हो गया। वह आश्चर्यचकित होकर बोल उठीः

“आपने मुझे ‘बहन’ कहा ?”

हरिसिंहः “हाँ। तुम उम्र में मुझसे कुछ छोटी ही होगी। इसलिए मेरी छोटी बहन के समान हो। हमें तुम्हारे पिता के मारे जाने का बेहद अफसोस है। पर, तुम हमारी मजबूरी समझने की कोशिश करो। क्या तुम अपने यहाँ के लोगों के आतंक से परिचित नहीं हो ? हमारी लगातार चेतावनी से भी जब वे बाज नहीं आये, तब हमें सैनिक अभियान के लिए विवश होना पड़ा।”

मेहर इस सत्य से अवगत थी, लेकिन अबी तक उसे विश्वास नहीं हो रहा था कि कोई व्यक्ति इतना संवेदनशील और उज्जवल चरित्रवाला भी हो सकता है, क्योंकि उसके देश में यह असंभव सा था। उसने नतमस्तक होते हुए कहाः

“भाईजान ! हमने आपकी बहादुरी के बहुत किस्से सुने थे। पर आज जान लिया कि उसका वास्तविक रहस्य क्या है।”

तब हरिसिंह ने कहाः “मेरे ही नहीं, किसी के भी शौर्य का रहस्य उसके उज्जवल चरित्र में निहित होता है।”

वस्तुतः, मनुष्य की सर्वश्रेष्ठ संपत्ति उसका उज्जवल चरित्र ही है। जिसके जीवन में चरित्र की पवित्रता है उसका जीवन सदैव सफलताओं से भरपूर रहता है। वह साहसी, निडर, बुद्धिमान एवं धैर्यवान होता है। क्षमा, दया आदि सदगुण उसके जीवन सहज ही खिलने लगते हैं।

हे भारत के नौजवानों ! तुम भी इस रहस्य को जान लो। पाश्चात्य भोगवाद के अंधानुकरण से बचो। अपने देश भारत के वीर, साहसी एवं ऐतिहासिक पुरुषों के जीवन से प्रेरणा लेकर अपने जीवन को भी चरित्र की पवित्रता से सुरभित होने दो…..युवाधन सुरक्षा के उपायों को अपनाकर, संतों-महापुरुषों का सान्निध्य एवं मार्गदर्शन पाकर अपने जीवन को तो उन्नत करो ही, साथ ही, दूसरों को भी उन्नति की ओर चलने के लिए प्रेरित करो। सबकी उन्नति में ही देश की  उन्नति निहित है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, दिसम्बर 2001, पृष्ठ संख्या 20,21 अंक 108

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कर्म के प्रकार


(पुण्यतोया साबरमती के तट पर स्थित आश्रम में अपने एकांत निवास के दौरान कर्म के प्रकार का वर्णन करते हुए पूज्य श्री ने बतायाः)

कर्म तीन प्रकार के होते हैं- प्रारब्ध कर्म, संचित कर्म और क्रियमाण कर्म।

मान लो हजारों मन अनाज का ढेर पड़ा है, उसमें से आपने दस किलो अनाज पीसकर आटा बना लिया, तो जितने समय तक आप अनाज को सँम्भालकर रख सकते हैं, उतने समय तक आटे को सँभालकर नहीं रख सकते हैं। आटा जल्दी बिगड़ जाता है। अतः उसका सदुपयोग कर लेना पड़ता है। उस आटे को खाकर आप में शक्ति आयेगी, उससे आप काम करेंगे।

तो अनाज का जो ढेर है – वह है संचित कर्म। आटा है प्रारब्ध कर्म और वर्तमान में जो कर रहे हैं वह है क्रियमाण कर्म। आपके कर्मों के बड़े संचय में से अपने जरा-से कर्मों को लेकर आपने इस देह को धारण किया है। बाकी के संचित कर्म संस्कार के रूप में पड़े हैं।

किसके घर में जन्म, किसके साथ विवाह और कब मृत्यु – यह आप प्रारब्ध से ही लेकर आये हैं। जन्म प्रारब्ध के अनुसार हुआ है, शादी भी जिसके साथ होनी होगी, हो जायेगी और मृत्यु भी जब आने वाली होगी, आ ही जायेगी। संचित कर्म संस्कार के रूप में पड़े हैं, प्रारब्ध लेकर जन्मे और वर्तमान में जो कर रहे हैं – वे हैं आपके क्रियमाण कर्म।

ज्ञानी हो या अज्ञानी, भक्त हो या अभक्त, योगी हो या भोगी… प्रारब्ध का प्रभाव सबके जीवन पर पड़ता है। जैसे किसी का प्रारब्ध बढ़िया है, फिर वह भले ही दसवीं पढ़ा हुआ क्यों न हो ? महीने में वह हजारों लाखों कमा लेता है और कई होशियार हैं, पढ़े लिखे भी हैं, परन्तु प्रारब्ध साथ नही देता है तो सर्टीफिकेट लेकर घूमते हैं फिर भी नौकरी नहीं मिलती है।

किन्तु केवल प्रारब्ध का ही प्रभाव नहीं होता है, प्रारब्ध के साथ वातावरण का भी असर होता है, समाज का भी असर होता है और राजनीति का भी असर होता है। यह सब मिश्रित होता है। अतः केवल प्रारब्ध के भरोसे नहीं बैठे रहना चाहिए।

जैसे क्रियमाण कर्म करते हो, उसके हिसाब से प्रारब्ध बनता है। यदि आपने अच्छे कर्म किये तो उसके फलस्वरूप स्वर्ग मिलेगा, लेकिन पुण्य का प्रभाव क्षीण होते ही स्वर्ग से गिराये जा सकते हो। पुनः संचित कर्म के प्रभाव से धरती पर आना पड़ेगा और यदि पाप कर्म किये तो आपको नरक का दुःख भोगना पड़ता है।

इस प्रकार जब तक ज्ञानाग्नि से इस जीव के सब कर्म जल नहीं जाते, तब तक जन्म मरण होता ही रहता है। जीव बेचारा सुख-दुःख के थपेड़े खाता ही रहता है। गीताकार श्रीकृष्ण ने कहा हैः

यथैधांसि समिद्धोsग्निर्भस्मसात्कुरुतेsर्जुन।

ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा।।

‘हे अर्जुन ! जैसे प्रज्वलित अग्नि ईँधनोंको को भस्ममय कर देती है वैसे ही ज्ञानरूप अग्नि संपूर्ण कर्मों को भस्ममय कर देती है।’ (गीताः 4.37)

ईश्वर ही सृष्टिकर्ता है, ईश्वर ही सर्जनहार है और कर्मों का नियामक, निर्वाहक एवं कर्मों का फल देने वाला वह ईश्वर आत्मरूप से साक्षीरूप में सभी के अंतःकरण में विराजमान है। हम कर्ताभाव से जैसे कर्म करते हैं उसी के अनुसार हमें अच्छा या बुरा फल मिलता है।

धर्मात्मा धर्म करके हर्षित होता है लेकिन अपने को धर्म करने वाला मानता है। अधार्मिक अधर्म की बातों से सुखी होता है लेकिन वह भी अपने को अधर्म करने वाला मानता है। दोनों ही अपने को कर्म का कर्ता मानते हैं, अतः, कर्म करके सभी सुखी होते हैं तो कभी दुःखी होते हैं क्योंकि,

जँह लगी है कर्तव्यता तँह लगी है अज्ञान।

‘कर्त्तव्यता अज्ञान से ही सिद्ध होती है।’

जबकि ज्ञानवान को न हर्ष होता है न शोक क्योंकि ज्ञान के द्वारा उसका कर्ताभाव समाप्त हो चुका है। ज्ञानी के द्वारा कितने भी अच्छे कर्म हो जायें उन्हें कभी नहीं होताः ‘मैंने इतने अच्छे कर्म किये…..’ अथवा वे किसी को डाँट भी देते हैं तो उन्हें ऐसा नहीं होताः ‘मुझसे बुरा कर्म हो गया…..’ क्योंकि ज्ञानी को पता है कि कर्म प्रकृति में हो रहे हैं।

प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः।

अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते।।

‘वस्तुतः, सम्पूर्ण कर्म सब प्रकार से प्रकृति के गुणों द्वारा किये जाते हैं तो भी जिसका अंतःकरण अहंकार से मोहित हो रहा है, ऐसा अज्ञानी ‘मैं कर्ता हूँ’ ऐसा मानता है। (गीताः 3.27)

होता है कार्य प्रकृति में लेकिन अहंकार से जो विमूढ हो गया है वह अपने को कर्ता मानता है।

शरीर है प्रकृति का, चमड़ा अगर काला है तो वह अपने को काला मानता है। मन है प्रकृति का, लेकिन मन में अगर काम आ गया तो वह अपने को कामी मानता है। मन में क्रोध आ गया तो वह अपने को क्रोधी मानता है। मन में अगर चिंता आ गयी तो वह अपने को चिंतित मानता है। मन में अगर भय आ गया तो वह अपने को भयभीत मानता है।

वस्तुतः, काम, क्रोध, लोभ, मोह, भय, चिंता आदि सब आते जाते हैं। हम तो उनको देखऩे वाले हैं किंतु इसका हमें ज्ञान नहीं है इसीलिए उनसे प्रभावित हो जाते हैं, परंतु जिनको सत्कर्म, सदबुद्धि एवं सदगुरु की कृपा से ज्ञान हो गया है, वे महापुरुष इन सारी भ्रमणाओं से, सारी परिच्छिन्नताओं से पार हो जाते हैं।

भगवान कहते हैं-

यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन।

ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा।।

जैसे, लकड़ी के ढेर को आग जलाकर भस्म कर देती है, वैसे ही ज्ञान की अग्नि से जीव के सारे कर्म-बंधन, संस्कार भस्मीभूत हो जाते हैं। जो संचित कर्म हैं वे भी भस्म हो जाते हैं। क्रियमाण कर्म भी वह कर्ताभाव से नहीं करता इसलिए उसे कर्म का फल नहीं भोगना पड़ता है और प्रारब्ध कर्म भी बीत जाते हैं।

अज्ञानी अपना प्रतिकूल प्रारब्ध रो-रोकर भोगता हैः ‘हाय ! मुझे इतना दुःख है…. ऐसा है… वैसा है….’ और अनुकूल प्रारब्ध को खुश होकर भोगता हैः ‘मैं बड़ा भाग्यशाली हूँ…. मैं बड़ा सुखी हूँ….।’ लेकिन ज्ञानी को प्रारब्ध कर्म होते हुए दिखते हैं। ज्ञानी अपने को सुविधा में सुखी नहीं मानता और असुविधा में दुःखी नहीं मानता। ज्ञानवान समझता है कि ‘प्रारब्ध शरीर का है, शरीर से गुजर रहा है…।’

अज्ञानी भोगे रोकर या आसक्त होकर, ज्ञानी भोगे साक्षी-सम होकर। अज्ञानी दुःख के दिन रोकर भोगता है और सुख के दिन आसक्त होकर भोगता है। ज्ञानी सुख के दिन भी विनोदमात्र में भोगते हैं और दुःख के दिन भी।

एक महात्मा से पूछा गयाः

“महाराज ! जब देखो, आप शांत और सुखी नजर आते हैं। क्या आपको दुःख नहीं होता है ?”

महात्मा बोलेः “दुःख आता है।”

“महाराज ! आपको दुःख नहीं होता है ?”

“नहीं, दुःख आता है। मैं दुःखी क्यों होऊँ ? मैं उससे मिलता नहीं हूँ। दुःख आता है, मैं उसे देखता हूँ।”

ऐसे ही आप भी दुःख से मिलो नहीं उसे देखो तो वह गुजर जायेगा। दुःख होता है मन में और हम मन से जुड़ जाते हैं इसीलिए दुःखी हो जाते हैं।

श्रीमद् आद्यशंकराचार्य जी ने कहा हैः

‘मनोबुद्धि अहंकारचित्तानि नाहं…. अर्थात् मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार हम नहीं हैं…’

इस बात का ज्ञान महापुरुषों से पाकर फिर इसका अभ्यास करें, पवित्र आहार-विहार करें तो परमात्मा का अनुभव भी कर सकते हैं और एक बार अनुभव हो गया तो समझो, काम बन गया।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, दिसम्बर 2001, पृष्ठ संख्या 14,15 अंक 108

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