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शब्द की चोट


शब्दों का बड़ा भारी असर होता है। दिन रात अज्ञानता के शब्द सुनते रहने से अज्ञान दृढ़ हो जाता है, विकारों के शब्द सुनते रहने से मन विकारी बन जाता है, निंदा के शब्द सुनते रहने से चित्त संशयवाला बन जाता है, प्रशंसा के शब्द सुनते रहने से चित्त में अहंभाव आ जाता है। परमात्मस्वरूप के शब्द सुनकर चित्त देर सबेर आत्मा-परमात्मा में भी जाग जाता है।

‘अंधे की औलाद अंधी….’ द्रौपदी के इन शब्दों ने ही महाभारत का युद्ध करवा दिया।  ये शब्द ही दुर्योधन को चुभ गये और समय पाकर भरी सभा में द्रौपदी को निर्वस्त्र करने का प्रयास इन्हीं शब्दों ने करवाया।

हाड़  मांस की देह मम, वा में इतनी प्रीति।

या ते आधी जो राम प्रति, अवश मिटे भव भीति।।

रत्नावली के इन्ही शब्दों ने अपने पति को संत तुलसीदास बना दिया।

ध्रुव को अपनी सौतेली माँ के शब्द लग गये और वह चल पड़ा तो अटल पदवी पाने में समर्थ हो गया, महान हो गया।

ऋषभदेव मुनि के शब्दों ने सम्राट भरत को योगी भरत बना दियाः

गुरुर्न स स्यात्स्वजनो न स स्यात् पिता न स स्याज्जननी न सा स्यात्।

दैवं न तत्स्यान्न पतिश्च स स्यान्न मोचयेद्यः समुपेतमृत्युम्।।

‘जो अपने प्रिय संबंधी को भगवदभक्ति का उपदेश देकर मृत्यु की फाँसी से नहीं छुड़ाता, वह गुरु गुरु नहीं है, स्वजन स्वजन नहीं है, पिता पिता नहीं है, माता माता नहीं, इष्टदेव इष्टदेव नहीं है और पति पति नहीं है।’ (श्रीमद् भागवत 5.518)

अजनाबखण्ड के एकछत्र सम्राट भरत जिनके नाम से हमारे देश का नाम ‘भारत’ पड़ा, अपने पिता के इन दो शब्दों को याद रखते हुए चल पड़े तो वे योगी भरत बन गये।

एक बार ऋषभदेव मुनि यात्रा करते-करते अयोध्या पहुँचे। वहाँ पंडितों-साधुओं ने उनका खूब सम्मान किया क्योंकि वे राजा होने के साथ-साथ महाराज भी थे। भोग के सम्राट अब योग के सम्राट थे। किसी ने कहा किः “जैसे, ऋषभदेव मुक्तात्मा हैं वैसे ही उनके सपूत भी मुक्तात्मा बनेंगे।”

तब दूसरे ने कहाः “यह कैसे हो सकता है ? वे तो पूरे अजनाबखण्ड के राजा बन बैठे हैं। उनके जीवन में त्याग, तपस्या, एकांत, मौन, ध्यान-साधना आदि कहाँ हैं ? तुम कैसी बातें कर रहे हो ?”

अयोध्या के पंडितों में वाद-विवाद चल पड़ा। दो पक्ष हो गये। एक पक्ष कहने लगा किः “हाँ, वे योग के सम्राट बन सकते हैं क्योंकि विचारवान हैं।” जबकि दूसरा दल कहने लगा किः “यह कैसे हो सकता है ? वे तो राज्य के दलदल में पड़े हैं।”

बात ऋषभदेव जी के पास पहुँची, तब उन्होंने कहाः “हाँ, भरत मुक्तात्मा होगा। मेरा पुत्र है इसलिए नहीं कहता हूँ।”

तब पंडितों ने निवेदन किया किः “आपके पुत्र हैं इसलिए नहीं, फिर भी वे मुक्तात्मा होंगे, इसका क्या कारण है ?”

तब ऋषभदेव जी बोलेः “भरत के अन्दर विवेक है। उसने पुरोहितों से कह रखा है कि ‘तुम लोग राजाधिराज महाराज ! आपकी जय हो….’ ऐसा मत बोला करो। आप मेरा हित चाहते हो तो केवल इन्हीं दो शब्दों से मेरा अभिवादन करोः ‘वर्धते भयं….. वर्धते भयं…. भय बढ़ रहा है… भय बढ़ रहा है…..’ यही मुझे सुनाया करो। अर्थात् ज्यों-ज्यों दिन बीत रहे हैं, त्यों-त्यों के दिन नजदीक आ रहे हैं। इतना आप कहा करो।

इस प्रकार का  विवेक है भरत के पास, इसलिए वह संसार के दलदल में नहीं फँसेगा। मौत आकर गला दबोचे उसके पहले भरत अमरता की तरफ चल पड़ेगा।”

हुआ भी ऐसा ही। सम्राट आगे चलकर योगी भरत हो गये।

आप भी अपने घर की दीवार पर ये शब्द लिख दोः ‘आखिर कब तक ?’

‘इतना मिला…. इतना पाया…. फिर क्या ? आखिर कब तक ?’

पंडित जवाहर लाल नेहरू और उनकी बेटी श्रीमती इंदिरा गाँधी जिनके चरणों में मस्तक नवाते थे, उन आनंदमयी माँ को सत्संग सुनाने की योग्यता खेत की रखवाली करने वाले शांतनु में कैसे आ गयी ?

शांतनु के पिता पुरोहिती का कार्य करते थे और थोड़ी बहुत खेतीबाड़ी भी करते थे। दिन में उनके पिता और दादा खेत की रखवाली करते और शाम को वे स्वयं चक्कर लगाते।

खेत में रोज एक बकरा घुस जाता। वह मजबूत और कुशल था कि खेत बिगाड़ कर चला जाता और हाथ में नहीं आता था। एक दिन सात साल का शांतनु सुबह-सुबह हाथ में चाकू लेकर यह सोचकर खेत में कहीं छुप गया किः ‘यह बकरे का बच्चा मेरा खेत खा जाता है। आज इसका पेट फाड़ डालूँगा।’

इतने में उसी गाँव का एक पंडित वहाँ से गुजरा। उसकी नजर शांतनु पर पड़ी तो पूछाः “हे ब्राह्मणपुत्र शांतनु ! इस प्रकार छुपकर क्यों बैठे हो ? क्या बात है ?”

पहली बार पूछने पर उसने जवाब नहीं दिया। तब उस पंडित ने आग्रहपूर्वक दो तीन बार यही बात पूछी। शांतनु के हाथ से चाकू गिर पड़ा और उसने सारी बात सच-सच बता दी।

पंडितः “शांतनु ! यह काम तुम्हारे योग्य नहीं है, तुम्हारे लायक नहीं है। तुम ब्राह्मण हो। बकरे को चाकू मारना तो कसाई का काम है।”

‘यह तुम्हारे योग्य नहीं है….’ ये शब्द सुनकर शांतनु के जीवन ने करवट बदली और वही शांतनु ‘स्वामी अखण्डानन्द सरस्वती’ के नाम से प्रसिद्ध हुए।

कितना सामर्थ्य छुपा है शब्दों में ! किताबें पढ़कर, लकीर के फकीर होकर अथवा अनपढ़ होकर भी क्या करोगे ? न अधिक ऐहिक पढ़ाई अच्छी है न अनपढ़ रहना अच्छा है। अच्छे में अच्छा तो परमात्मदेव का ज्ञान है, परमात्मप्रीति है, परमात्मरस है, वही सार है।

न निर्धन होने में सार है, न धनवान होने में सार है। महिला होने में भी सार नहीं। मूर्ख होने में भी सार नहीं, विद्वान होने में भी सार नहीं। बहुत जीने में भी सार नहीं, जल्दी मरने में भी सार नहीं। यक्ष-गंधर्व होने में भी सार नहीं और देवता होने में भी सार नहीं। वशिष्ठजी महाराज कहते हैं किः “हे राम जी ! मैं चौदह भुवनों में घूमा। अतल, वितल, तलातल, रसातल, पाताल एव भूर्लोक, भुवर्लोक, जनलोक आदि में भी घूम आया किन्तु कहीं भी सार नहीं। केवल एक जगह पर ही सार दिखा। जहाँ संत का मन ठहरता है उस आत्मा में सार है, उस परमात्मा में सार है।”

अतः उसी का नाम-स्मरण करो, उसी के शब्द सुनो, उसी की ओर ले जाने वाले शब्द बोलो-सोचो और उसी की शांति, आनंद पाने का पुनः पुनः अभ्यास करो।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जून 2001, पृष्ठ संख्या 15-16, अंक 102

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सत्यस्वरूप की जिज्ञासा


संत श्री आशारामजी बापू के सत्संग-प्रवचन से

जब बुद्धि सात्त्विक होती है तब बुद्धि में बुद्धि के प्रकाशक के विषय़ में जानने की जिज्ञासा होती है।

कईयों की तर्कप्रधान बुद्धि होती है तो कईयों की स्वीकृतप्रधान बुद्धि होती है। जिसकी बुद्धि तर्कप्रधान होगी उसे प्रश्न उठेगा कि जगत का रचयिता कौन है ? जिसकी बुद्धि स्वीकृतिप्रधान होगी वह स्वीकार करेगा कि जगत है तो उसका रचयिता भी है। रचयिता को मानने लग जाये- वह है भक्त और रचयिता को जानने की जिज्ञासा करे वह है जिज्ञासु। जिज्ञासु जानकर फिर मानता है और भक्त मानकर फिर परमेश्वर के स्वरूप को जान लेता है।

जब वह परमेश्वर के स्वरूप को जान लेता है तब उसकी सारी हृदय-ग्रंथियाँ खुल जाती हैं। सृष्टि के सारे रहस्य उसके आगे प्रगट हो जाते हैं। फिर उसे संसार की विचित्रता देखकर दुःख नहीं होता। हाँ, दुःखियों को देखकर करूणा होती है। दुःखियों को भी वह सुखी होने के रास्ते पर ले चलता है। साधारण लोग जिस प्रकार जगत को सच्चा मानकर जरा-जरा बात में सुखी-दुःखी होते हैं, वैसे पूर्ण भक्त या ज्ञानी सुखी-दुःखी नहीं होते हैं। उसे सुख-दुःख मन का खिलवाड़ मात्र लगता है। उसके लिए सुख भी मिथ्या है, दुःख भी मिथ्या है। खाना भी मिथ्या है, सोना भी मिथ्या है। जीवन भी मिथ्या है, मृत्यु भी मिथ्या है। सत्यस्वरूप एक परमात्मा है। वही ज्ञानस्वरूप एवं अनंत ब्रह्म है। सत्यं ज्ञानं अनंतं ब्रह्म..… ऐसे सत्यस्वरूप, ज्ञानस्वरूप अनंतस्वरूप ब्रह्म में वह जाग जाता है।

इस सत्य को जानने की जिज्ञासा बहुत पुण्य से उत्पन्न होती है और बहुत पुण्य उत्पन्न भी करती है। एक बार साधक के हृदय में अपने स्वरूप को पाने की जिज्ञासा उत्पन्न हो जाये तो फिर सदगुरु उसे हँसते-खेलते, विनोद करते हुए उस दरबार में ले जाते हैं, जहाँ पहुँचने के बाद फिर पतन नहीं होता है। ….लेकिन हमारी जिज्ञासा तीव्र होनी चाहिए।

सत्यस्वरूप को पाने की जिज्ञासा तीव्र हो गयी तो समझो, आपके भाग्य में चार चाँद लग गये। जिनके कल्मष क्षीण हो जाते हैं, दूर हो जाते हैं उन्हीं को अपने राम में आराम पाने की इच्छा होती है।

हम लोग अपने को धार्मिक मानते हैं लेकिन धर्म का उदघाटन हृदय में नहीं होता है। धर्मानुष्ठान करने से हृदय में वैराग्य होना चाहिए। धर्म ते विरति, योग ते ज्ञाना। वैराग्य उत्पन्न हो गया तो वह भी पर्याप्त नहीं है, फिर योग की आवश्यकता होती है। इन्द्रिय संयम करके, अपने उदगम स्थान परमात्मा में  विश्रांति पाना-यह योग है। यह योग ही सत्यस्वरूप के ज्ञान को प्रगट कर देता है।

केवल वेदान्त के विचार शुष्कता ले आयेंगे। अकेला योग लय ले लायेगा। अकेला त्याग अभिमान ले आयेगा। अगर ज्ञान होगा तो अहंकार का विलय होगा।

बाबा काली कमलीवाले द्वारा रचित ‘पक्षपात रहित अनुभवप्रकाश’ में आता हैः

वशिष्ठजी के पौत्र और शक्ति के पुत्र पाराशरजी मित्रा के पुत्र मैत्रेय से कहते हैं-

“पहले तो यह अभिमान था कि मैं देह हूँ। अगर आत्मविचार करके देहाध्यास नहीं मिटाया तो वेष बनाने का दूसरा अभिमान आ जायेगा कि ‘मैं साधू हूँ…. मेरा बड़ा आश्रम है।’ इस अभिमान को निकालने के लिए बड़ा परिश्रम करना पड़ता है। यह जीव कोई न कोई अभिमान पकड़ लेता है और अभिमान ही बंधन का कारण बन जाता है।

एक बार उस परब्रह्म परमात्मा को पाने की तीव्र जिज्ञासा हो जाये और कलुषित संस्कारों को छोड़ने की इच्छा हो जाये तो ब्रह्मवेत्ता महापुरुष तुमको भगवदस्वरूप में हँसते-खेलते पहुँचा देंगे, तुमको पता भी न चलेगा।

ब्रह्मविद्या, सत्यस्वरूप का ज्ञान कोई मजबूरी करके पाने की चीज नहीं है। यह तो शहंशाहों का मार्ग है। इस ब्रह्मविद्या के द्वारा जिनके संशय क्षीण हो गये हैं, वे यह नहीं सोचते किः ‘यह उपासना ठीक है या वह उपासना ठीक है ? श्रीराम की भक्ति बड़ी है कि श्रीकृष्ण की भक्ति बड़ी है ? योग बड़ा है कि ज्ञान बड़ा है ? सत्संग बड़ा है कि कीर्तन बड़ा है ?’ ऐसी दुविधाएँ जिनकी शांत हो गयी हैं उनके प्रत्येक कार्य सहज-स्वाभाविक होते हैं, उन्हें करने नहीं पड़ते।

वे ज्ञानवान महापुरुष स्वर्ग की लालच से अथवा नर्क के भय से सत्कर्म नहीं करते हैं, वाहवाही की लालच से लोककल्याण के कार्य नहीं करते हैं और निंदा के भय से विशुद्ध कार्य नहीं छोड़ते हैं। उनका तो सहज स्वभाव होता है- सर्वभूतहिते रताः। फिर उन कल्याण के कार्यों के लिए चाहे उऩ्हें कष्ट सहना पड़े तो भी उनके लिए विनोद है और यश-अपयश मिल जाये तो भी उनके लिए विनोद है।

वे महापुरुष अपना कोई प्रयोजन लेकर नहीं चलते हैं, वे अपना स्वार्थ लेकर नहीं चलते हैं, वे अपना स्वार्थ लेकर नहीं चलते हैं, उनका सहज स्वभाव होता है। हम लोग कोई न कोई स्वार्थ प्रयोजन लेकर चलते हैं।

प्रयोजन तीन प्रकार के होते हैं- सामाजिक, धार्मिक, आध्यात्मिक। ज्ञानवान महापुरुषों का न धार्मिक प्रयोजन होता है, न सामाजिक प्रयोजन होता है और न ही आध्यात्मिक प्रयोजन होता है। उनकी प्रवृत्ति निष्प्रयोजन भी नहीं होती है वरन् निष्काम प्रवृत्ति होती है। उनका सहज स्वभाव होता है-जगाना, उनका सहज स्वभाव होता है-शीतल। ज्ञानवान को पहचानने के लिए शास्त्रों ने कई शुभ लक्षण बतलाये हैं। उनमें प्रमुख लक्षण यह है कि उनके श्रीचरणों में आदरसहित चुपचाप बैठने से हृदय में शांति आने लग जाये। यदि ऐसा होता है तो समझ लो कि विश्वनियंता के साथ उनका संबंध जुड़ा है। ऐसे महापुरुषों के मार्गदर्शन से हमारा जीवन भी समुन्नत हो सकता है और हमें उन्नत करने का उन पर कोई बोझा नहीं होता, उनकी स्वाभाविक स्थिति होती है।

किसी ने उन पर बोझ नहीं डाला है किः ‘आपका यह कर्त्तव्य है कि उपदेश दें, सत्संग करें, आश्रम सँभालें, लोगों से मिलें…..’ नहीं, उनके ऊपर कोई बोझ नहीं है। जब साधक को बोध हो जाता है तो गुरुदेव भी ऐसा नहीं कहते कि तुम ऐसा करना।’ गुरु भी स्वाभाविक कहते हैं किः ‘बेटा ! हो सके तो ऐसा जीना।’ वह भी यदि शिष्य पूछता है तो…… नहीं तो गुरु बोलते हैं किः ‘हम भी मुक्त तुम भी मुक्त।’

भावनगर में एक संत पधारे। वहाँ कोई साधक गायत्री पुरश्चरण कर रहा था। उसने संत के पैर पकड़े और कहाः “गुरु महाराज ! आप मुझे एक बार साक्षात्कार करा दीजिये। फिर आप जो कहेंगे  वही करूँगा।”

संतः “अरे ! यदि साक्षात्कार हो जाये तो आज्ञा करने की क्या जरूरत है ? फिर तो तेरे द्वारा जो भी होगा उससे लोगों का कल्याण होने लगेगा।”

शिष्य को बोध होने के बाद, सत्यस्वरूप का ज्ञान होने के बाद, सदगुरु आज्ञा नहीं करते किः ‘तुम यह करना,।’ यदि शिष्य पूछता है किः ‘क्या आज्ञा है गुरुदेव ?’ फिर गुरुदेव जो कह दें। बोलना पड़ता है तो बोल देते हैं बाकी उनको ऐसा नहीं होता किः ‘शिष्य ऐसा करे, वैसा करे….. मेरा नाम उज्जवल करे…. मेरे सिद्धान्त को फैलाये…..’ ऐसी इच्छाएँ ज्ञानवान को नहीं होती हैं।

वे अपने जागे हुए शिष्य को आज्ञा नहीं देते। हाँ, अगर जागे हुए में थोड़ी कमी है, थोड़ा कच्चापन है तो आदेश देंगे किः ‘ऐसा ऐसा करो…..’ ताकि कहीं गिर न जाए। आदेश भई उसके कल्याण के लिए देंगे। ऐसे ज्ञानवान महापुरुषों के लिए अष्टावक्र महाराज जी कहते हैं- ‘तस्य तुलना केन जायते ?’ उसकी तुलना किससे करें ? ऐसे ज्ञानवान महापुरुषों के संकेत के अनुसार चलने से प्रत्येक जीव शिवपद को प्राप्त कर सकता है। शर्त इतनी ही है कि उसमें सत्यस्वरूप के ज्ञान को पाने की तीव्र जिज्ञासा हो।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जून 2001, पृष्ठ संख्या 3,4 अंक 102

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सफलता का विज्ञान


संत श्री आशाराम जी बापू के सत्संग-प्रवचन से

विदेश में किसी व्यक्ति ने सुना कि फलानी जगह पर खोदने से सोना निकलेगा। उसने वह जमीन खरीद ली और खुदवाना शुरु किया। खोदने के कार्य में उसके लाखों रूपये खर्च हो गये किन्तु कुछ मिला नहीं। वह अत्यंत निराश हो गया, तब उसके किसी मित्र ने कहाः “इतना तो खुदवा ही दिया है। अब हो सकता है कि दो-पाँच फुट और खोदने पर सोना मिल जाये।”

वह व्यक्ति बोलाः “जब इतना-इतना खोदा फिर भी सोना नहीं मिला तो पाँच फुट और खुदवाने पर कैसे मिलेगा ? मेरा भाग्य ही ऐसा है।”

अपने भाग्य को दोष देते हुए उसने खदान को अत्यंत कम मूल्य पर बेच दिया। दूसरे व्यक्ति ने खरीद कर उसे फिर से खुदवाना शुरु किया। पाँच-छः फुट और खुदवाने पर ही उसे खूब सोना मिला। तब बेचने वाले ने कहाः “क्या करें ? उसका भाग्य अच्छा था इसलिए उसे मिल गया। मेरा तो भाग्य ही फूटा हुआ है।”

वास्तव में पहले का भाग्य फूटा हुआ और दूसरे का अच्छा था, ऐसी बात नहीं है। पहले वाले ने धैर्य और श्रद्धा खो दी जबकि दूसरे का धैर्य और श्रद्धा ज्यादा थी इसलिए उसे सोना मिल गया।

विफल वे ही लोग होते हैं जो लापरवाह होते हैं, निराशावादी होते हैं। जिस कार्य के लिए जितना धैर्य, जितनी तत्परता व समझ होनी चाहिए उसकी कमी के कारण लोग निराश होते हैं और असफल हो जाते हैं। उसी काम को दूसरा व्यक्ति उत्साह, धैर्य और तत्परता से करता है तो सफल हो जाता है।

परिस्थितियाँ मनुष्य को गुलाम नहीं बनातीं, मनुष्य परिस्थितियों को बनाता है। बाग्य मनुष्य को नहीं बनाता, मनुष्य अपने भाग्य को बनाता है।

एक बार तक्षशिला को शत्रुओं ने घेर लिया। सेनापति ने आकर राजा से कहाः “शत्रु का सैन्यबल, राज्यबल हमसे अधिक है। युद्ध में हम हार जायेंगे। अतः अच्छा यही है कि हम शरणागत हो जायें। दूसरा कोई उपाय नहीं है।”

तक्षशिला के नरेश को वह बात ठीक भी लग रही थी। इतने में एक महात्मा आ गये और बोलेः “तुम्हारा सेनापति तुम्हारी श्रद्धा और मनोबल तोड़ रहा है। इसे अभी-अभी सेनापति के पद से हटा दो और सेनापति का पद मुझे दे दो। मैं तुम्हारी सेना लेकर जाऊँगा और जरूर विजयी होकर आऊँगा।”

पहले तो राजा हिचकिचाया लेकिन बाद में उसे हुआ कि इन महात्मा की वाणी में विश्वास और गहराई है। अतः उसने निराशाजनक विचार करने वाले सेनापति की बात को ठुकराकर महात्मा को सेनापति का पद प्रदान कर दिया।

महात्मा सेना को लेकर आगे बढ़े। शत्रुपक्ष की सेना और तक्षशिला की सेना के बीच देवी का एक मंदिर था। महात्मा ने सेना को वहीं रोककर सैनिकों से कहाः “देखो, अगर देवी माँ ‘हाँ’ कहेंगी तो हमारी विजय निश्चित है। मैं यह सिक्का उछालता हूँ। अगर सीधा पड़ा तो विजय हमारी होगी और अगर उल्टा पड़ा तो हम उल्टे पैर वापिस लौट चलेंगे।”

यह कहकर महात्मा ने अपनी जेब से सिक्का निकाला और आसमान में उछाला। सिक्का धरती पर सीधा गिरा। महात्मा ने पुनः कहाः “देखो, देखो, सिक्का सीधा पड़ा है। हमारी विजय निश्चित है। भले ही शत्रु संख्या में ज्यादा है लेकिन माँ ने स्वीकृति प्रदान कर दी है। अतः विजय हमारी ही होगी।”

इस प्रकार महात्मा ने तीन बार सिक्का उछाला और तीनों बार सिक्का सीधा पड़ा। इससे सैनिकों के मनोबल में दृढ़ता व श्रद्धा का संचार हो गया और वे पूरे जोश के साथ युद्ध में कूद पड़े। देखते ही देखते वे शत्रुपक्ष की विशाल सेना पर इस तरह हावी हो गये मानों, हाथियों के झुंड पर सिंह। थोड़े ही समय में शत्रु सेना के पैर उखड़ने लगे एवं तक्षशिला की जीत हो गयी।

प्रसन्नता से सैनिक कह उठेः “देवी माँ की जय…… देवी माता ने ही हमें विजय दिलायी है।”

महात्मा ने रहस्योदघाटन करते हुए कहाः “विजय देवी माता ने तो क्या, तुम्हारे विश्वास और उत्साह ने ही दिलवायी है। तुममें विश्वास जगाने के लिए ही  मैंने यह प्रयोग किया था कि सिक्का सीधा पड़ेगा तो विजय हमारी होगी। वास्तव में सिक्का दोनों तरफ से सीधा ही सीधा था। ऐसा सिक्का तुम्हारे श्रद्धा विश्वास को बढ़ाने के लिए मैंने बनवाया था। यह देखो वही सिक्का दोनों तरफ से सीधा है। विजय तो तुम्हारे विश्वास की हुई है।”

जिसका उत्साह और विश्वास मरता है वही मरता है। जिसमें विश्वास और उत्साह तीव्र होता है वह विलक्षण सफलता प्रदान करता है। अतः कैसी भी विकट परिस्थिति हो, अपना धैर्य, श्रद्धा, विश्वास एवं उत्साह नहीं खोना चाहिए वरन् बुद्धिपूर्वक विश्लेषण करके लगे रहना चाहिए, डटे रहना चाहिए। मुसीबतों का सामना अटल एवं अडिग होकर करो। विजय तुम्हारी ही प्रतीक्षा कर रही है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जून 2001, पृष्ठ संख्या 13-14, अंक 102

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