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सदगुरु महिमा


मैं उन गुरुदेव को नमस्कार करता हूँ जो संसाररूप हाथी के लिए सिंह के समान हैं, जो संसार में तथा एकांत में समदृष्टि से सदा-सर्वदा पूर्ण बने रहने वाले हैं, जिनकी कृपा से साधकों को देह में रहते हुए भी देह दिखाई नहीं पड़ती तथा संसाररूप अन्धड़ देखते-देखते समाप्त हो जाता है, जिनके कृपाकटाक्ष से अलक्ष वस्तु बिना लक्ष्य के लक्षित हो जाती है तथा साक्षीभाव विस्मरण हो जाता है।

उन्होंने बिना प्राणों के ही जीवनदान दिया, बिना मारे ही मृत्यु को मार दिया, मेरी चर्मदृष्टि को लेकर अदृश्य दिखा दिया तथा मेरे सारे शरीर में ही दर्शन करने की क्षमता उत्पन्न कर दी। मेरे देह में रहते हुए मुझे विदेही कर दिया और अन्त में वह विदेहीपन भी समाप्त कर दिया और फिर विदेही होना ना होना दोनों ही समाप्त होकर जो था वही शेष बच गया। भाव के साथ अभाव नष्ट हो गया, निःसन्देहता के साथ सन्देह भी निकल गया, विस्मय विस्मय में ही डूब गया तथा स्वानन्द  भी पागलपन की अवस्था प्राप्त हो गयी। मैं वहाँ प्रेम के कारण ही भक्त बना था लेकिन उस भक्ति में ही मुझे देव की उपस्थिति दिखलाई पड़ी। अतः भज्य, भजक और भजन इनका अन्त मुझे दिखाई पड़ने लगा। नमन में ही नमस्कार किया तथा नमस्कार करने वाला कहाँ गया, यह भी समझ में नहीं आया। जिसे नमस्कार करना चाहिए वह वस्तु भी अदृश्य हो जाने पर मैं स्वतः तद्रूप बन गया। दृश्य और द्रष्टा इन दोनों को समाप्त करके दर्शन भी समाप्त हो गया। अब इधर-उधर केवल देव ही देव व्याप्त हो गये। अतः भक्त भाव को भूल गया और देव भी देव स्वभाव भूलकर देवत्व को छोड़ बैठे। सर्वत्र देवस्वरूप भरा होने के कारण भक्तस्वरूप देव में ही मिल गया तथा देव व भक्त दोनों के बीच में अभेदभाव स्थापित होकर एकमात्र अनन्त स्वरूप ही शेष बच गया।

त्याग के सहित अत्याग लय हो गया, भोग के साथ अभोग उड़ गया, योग के साथ अयोग डूब गया तथा योग्यता का अहंभाव भी समाप्त हो गया। ऐसा होते हुए भी एक विशेष बात यह है कि सायुज्य स्थिति में जो दासभाव बनाए रखता है उसका आनन्द-रस अतर्क्य और अविनाशी होता है। शिवो भूत्वा शिवं यजेत्…. इसी अवस्था का द्योतक है। इस अवस्था को प्राप्त हुए बिना केवल बोलना ही रहता है। ऐसे बोलने से स्वरूप का भजन प्राप्त होने वाला नहीं है। इस अभेदभाव के सुख में नारद भी आनंद से गाते व नाचते हैं। शुक-सनकादि जो सभी स्वस्वरूप के भक्त हुए हैं वे इसी सुख के कारण हुए हैं।

जिस प्रकार सागर में ज्वार आने पर सागर का जल खाड़ियों में भर जाता है, उसी प्रकारर देव ने मुझे निजभक्त बना डाला है। समुद्र व नदी इन दोनों का जल एक ही होता है लेकिन जिस स्थान पर इनका संगम होता है उस स्थान की शोभा कुछ विशेष ही होती है। इसलिए ऐक्यरूप से परमेश्वर के भजन का सुख दुगुना हो जाता है। शरीर के दायें और बायें अंग अलग-अलग कहे जाते हैं, पर इन दोनों से बोध एक ही शरीर का होता है, उसी प्रकार देव और भक्त में ऐसा भेद दिखाई पड़ने पर भी देवपन में दोनों को ऐक्य ही स्पष्ट अनुभव में आता है। मेरे गुरुदेव जनार्दन स्वामी ने मुझे अपनेपन का मान देकर अद्वैतभक्त बना डाला तथापि काया, वाचा और मन से सर्व प्रकार से प्रेरणा करके वे ही मुझसे सब व्यवहार करवाते हैं। वे ही जनार्दन मेरे मुख के मुख बन गये हैं। मेरी दृष्टि के सम्मुख मूर्तिमन्त होकर वे ही खड़े रहते हैं। उनका कौतुक बड़ा विलक्षण है।

श्री एकनाथ जी महाराज सदगुरुकृपा से कृतकृत्य हुए। अपने हृदय की कृतकृत्यता का वर्णन गुरु-स्तुति के रूप में करते हुए वे कहते हैं-

“हे चित्स्वरूप सदगुरुराज ! आपको नमस्कार है…. ‘ऐसा कहकर जैसे ही मैंने सदभाव से आपके श्रीचरणों में नमस्कार किया वैसे ही आपने ‘तू’ पन निकालकर मेरा ‘मैं’ पन नष्ट कर दिया। आपके श्रीचरणों की कठोरता कितनी अपूर्व है कि जीव का जो लिंगदेह वज्र से भी नहीं टूट सकता, उसी को आपने अपने चरणस्पर्श मात्र से विदीर्ण कर डाला। बलि ने आपके केवल श्रीचरणों का स्पर्श किया था, उसको भी आपने पाताल में पहुँचा दिया। महाबली लवणासुर को भी अपने श्रीचरणों से नष्ट कर दिया। आपके श्रीचरण वास्तव में अत्यन्त तीखे हैं। आपके श्रीचरणों का स्पर्श कालियनाग को होते ही उसके सारे विष का शोषण हो गया और वह पूर्ण रूप से निर्दोष बन गया। आपके कठिन श्रीचरणों का स्पर्श शकटासुर को मिलते ही  उसके सारे पाप-बन्ध टूट गये और उसका जन्म मरण ही छूट गया। बड़े-बड़े बलवान भी आपके श्रीचरणों की धाक मानते हैं। शिला बनकर पड़ी हुई अहिल्या का उद्धार आपने अपने श्रीचरणों से ही किया। दानशूर नृग राजा गिरगिट बनकर पड़े हुए थे। कृष्णावतार में आपके श्रीचरणों का दर्शन होते ही वे नृगराज भी मिथ्या संसार के जन्म-मरण से छूट गये। जो दास प्रेम से आपके श्रीचरणों का चिन्तन करते हैं, उनका मनुष्य धर्म ही समाप्त हो जाता है। यमलोक उजाड़ हो जाता है तथा उन्हीं श्रीचरणों से जीव का जीवपन समाप्त हो जाता है। आपके श्रीचरणों का तीर्थ शंकरजी ने अपने मस्तक पर धारण किया तो वे जगत के प्राणहरण करने वाले बन गये तथा उसकी राख को बड़े भक्तिभाव से अपने अंगों में लगाकर नग्न हो शमशान में विचरण करने लगे। आपके श्रीचरणों की करनी ही ऐसी है। वह जब शिव का शिवपना ही नहीं रहने देती तो जीव का जीवपना रह ही कैसे सकता है  ?

(श्री एकनाथी भागवत के 11वे स्कन्ध से)

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मार्चच 2001, पृष्ठ संख्या 25,26 अंक 99

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परम मंगल किसमें है ?


संत श्री आसाराम जी बापू के सत्संग-प्रवचन से

तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु….हमारा संकल्प शिव संकल्प हो अर्थात् मंगलकारी संकल्प हो।

मंगलकारी संकल्प क्या है ? परम मंगलकारी परमात्मा को पाना। मनुष्य को विचार करना चाहिए किः ʹमेरे ऐसे दिन कब आयेंगे जब मैं संसार को मिथ्या समझकर अपने शाश्वत् तत्त्व आत्मा में आराम पाऊँगा… हर्ष और शोक से पार रहूँगा ?ʹ

मुस्कराकर गम का जहर, जिनको पीना आ गया।

ये हकीकत है कि जहाँ में, उनको जीना आ गया।।

आप सदैव प्रसन्न रहो। आपके हृदय में अनंत अनंत ब्रह्माण्डों का नायक परमात्मा मौजूद है और आप जरा जरा सी बात में परेशान हो रहे हो ? जगन्नियन्ता आपके साथ है और आप चुल्लु भर पानी के लिए चिल्ला रहे हो ? आपके भीतर अमृत का दरिया लहरा रहा है और आप नाली के पानी के लिए मनौतियाँ मान रहे हो ?

उठो….जागो अपनी महिमा में। कोई जीता है दुनिया के लिए तो कोई भोगों के लिए, कोई आता है आने के लिए तो कोई जाता है जाने के लिए… लेकिन भगवान का प्यारा आता भी भगवान के लिए है और जाता भी भगवान के लिए है, हँसता भी भगवान के लिए है और रोता भी भगवान के लिए है, खाता भी भगवान के लिए है और पीता भी भगवान के लिए है। जिसका लक्ष्य परमात्म-प्राप्ति हो, उसकी हर चेष्टा प्रभु के लिए हो जाती है।

संत कँवरराम जी कहते हैं-

तू ही थम्भो तू ही थूणी। तू ही छपर तू ही छाँव।।

ʹहे प्रभु ! तू ही मेरे जीवन का खंभा है, तू ही छप्पर है और तू ही मेरे जीवन की छाया है। तू मेरे जीवन का सर्वस्व है।ʹ

आज से आप भी अपने आत्मदेव को जीवन का सर्वस्व समझकर, संसार-स्वप्न से जागकर अपना तो कल्याण करें, अपने कुल का भी उद्धार कर लें।

जिनको आत्मदृष्टि नहीं मिली है उऩके लिए आकारवाले देव की भावना की गयी है और हम जैसी भावना करते हैं वैसा ही फल भी मिलता है। आत्मज्ञान भावना का फल नहीं है, वह तो बहुत ऊँची अवस्था है। जिन्होंने उस अवस्था का अनुभव किया है, उनके नाम से मानी हुई मनौतियाँ प्रकृति पूरी करती है। उनके नाम से भक्त कुछ करते हैं तो वह फलीभूत हो जाता है। उनका नाम लेने से मन पवित्र होने लगता है।

आत्मज्ञान ऐसा पवित्र में पवित्र है, उत्तम में उत्तम है, पाने में सुगम है, धर्मयुक्त है एवं प्रत्यक्ष फल देने वाला है। शांति प्रत्यक्ष है, आनंद प्रत्यक्ष है, माधुर्य प्रत्यक्ष है। ऐसे आत्मज्ञान को प्राप्त ब्रह्मवेत्ता महापुरुष की कृपा से ही परम मंगल होता है।

गुरुकृपा ही केवलं शिष्यस्यं परं मंगलम्।

जप-तप, व्रत-अनुष्ठान एवं देवताओं के वरदान से मंगल हो सकता है लेकिन परम मंगल तो ब्रह्मवेत्ता सदगुरु की कृपा पचाने से ही संभव है।

ब्रह्म ज्ञान का मार्ग बड़ा न्यारा है। आपका चित्त अपरिपक्व है तो उसमें राग-द्वेष आदि की खटाई पड़ी रहती है लेकिन गुरुकृपा से जब वह परिपक्व होता है तो उसमें मधुरता आती है। जब तक चित्त की परिपक्व अवस्था नहीं आये, तब तक आदर से साधन करना चाहिए। गुरु का दामन नहीं छोड़ना चाहिए। आत्मज्ञान के बाद भी शिष्य को गुरुदेव की शरण नहीं छोड़नी चाहिए।

श्रीगुरुगीता में आया हैः

यावत्कल्पान्तको देहस्तावद्देवि गुरु स्मरेत्।

गुरलोपो न कर्त्तव्यः स्वच्छन्दो यदि वा भवेत्।।

ʹहे देवी ! देह कल्प के अन्त तक रहे तब तक श्री गुरुदेव का स्मरण करना चाहिए और आत्मज्ञानी होने के बाद भी (स्वच्छन्द अर्थात् स्वरूप का छन्द मिलने पर भी) शिष्य को ब्रह्मज्ञानी गुरुदेव की शरण नहीं छोड़नी चाहिए।ʹ

बुद्धिमान्, पवित्रात्मा वही है जो आत्मज्ञान के लिए यत्न करता है। आत्मा परमात्मा हमसे दूर नहीं है, उसकी प्राप्ति कठिन नहीं है। उसके लिए कहीं जाना नहीं है और कुछ पाना भी नहीं है। वह तो नित्य प्राप्त है, केवल उस आनंदस्वरूप का अनुभव करना है। वह सत् चित् आनन्द स्वरूप है। सत्स्वरूप है कि देहादि में परिवर्तन होता है और वे नष्ट भी होते हैं लेकिन उस परमात्मा का अस्तित्त्व सदा रहता है। चित्स्वरूप है कि अंतःकरण में उस चेतन की अनुभूति होती है। जो सत् है, वह चेतन है और जो चेतन है वह ज्ञान स्वरूप है। बिना ज्ञान के चेतन जड़ हो जायेगा और बिना चेतन के ज्ञान शून्य हो जायेगा। अतः जो चेतन है वही ज्ञान है, चेतन के बिना ज्ञान नहीं होता। आत्मा आनन्दस्वरूप है इसीलिए थोड़ी-थोड़ी सुख की झलकें आती हैं। उस सच्चिदानंद आत्मस्वरूप में जाग जाओ तो बस, हो गया काम पूरा।

मेहनत तो आप लो भी करते हैं और ज्ञानी भी करते हैं लेकिन ज्ञानी की मेहनत ठीक निशाने पर है इसलिए उनको शाश्वत फल मिलता है। आपकी मेहनत ठीक निशाने पर नहीं है इसलिए वह मजदूरी हो जाती है और आपको उसका नश्वर फल मिलता है। एक गाड़ी की जगह दो गाड़ी आ गयी…. एक करोड़ की जगह दो करोड़ हो गये… एक की जगह दो बेटे हो गये… आखिर क्या  ? जब तक परमात्मा का ज्ञान नहीं हुआ, तब तक सब कुछ मिल जाये फिर भी क्या फायदा ?

जेकर मिले त राम मिले, ब्यो सब मिल्यो त छा थ्यो?

दुनिया में दिल जो मतलब, पूरी थियो त छा थ्यो ?

ʹअगर मिले तो उस आत्माराम का सुख मिले, आत्मदेव का ज्ञान मिले, आत्मदेव की स्मृति आ जाये। दूसरा भी जो मिलेगा वह कब तक टिकेगा ?ʹ

दुःख आये तो उसको देखे, उससे दुःखी न हों और सुख आये तो उसको देखे, उससे दुःखी न हों और सुख आये तो उसको देखे, उसमें फँसे नहीं तो समझो आत्मदेव की स्मृति है। ऐसे ही मान मिले और उसका अहंकार न हो तथा अपमान मिले और उसका विषाद न हो तो समझो आत्मदेव की स्मृति है।

आत्मज्ञान अपना आपा है अतः उसकी स्मृति तो आसान है। रोज उसकी स्मृति आती है। सुबह उठते हैं तो सबसे पहले मन में यही भाव उठता है किः ʹमैं हूँ।ʹ ʹमैं फलाना हूँ… मैं बी.ए. हूँ….ʹ यह सब बाद में आता है। ʹमैं हूँʹ वही तो आत्मा है, परमात्मा है। ʹभगवान है कि नहीं?ʹ इसमें संशय हो सकता है… ʹस्वर्ग है कि नहीं?ʹ इसमें संशय हो सकता है लेकिन ʹमैं हूँ कि नहीं?ʹ इसमें कोई संशय नहीं है।

जगत की वस्तुओं का ज्ञान पाना कठिन है क्योंकि हम उन्हें भूल भी जाते हैं लेकिन अपने-आपको कहाँ भूलते हैं ? गहरी नींद में कुछ नहीं रहता। फिर भी जब उठते हैं तब बोलते हैं कि बड़ी गहरी नींद आयी।ʹ लेकिन गहरी नींद को देखने वाला, उसका आनंद लेने वाला तो था। आनंद की झलक उसी आत्मा से मिलती है। मन बदल जाता है तो फिर आनंद की वह झलक नहीं मिलती लेकिन आत्मा तो ज्यों-का-त्यों रहता है। झलक लेने के बजाय झलक के मूल उस आनन्दस्वरूप को पहचानकर उसमें टिक जायें तो आपका तो कल्याण हो ही जायेगा, जो आपके दर्शन करेगा उसका भी मंगल हो जायेगा।

परमात्मा का वह नित्य नवीन आनंद, रस एवं माधुर्य घट-घट में है। ऐसा परमात्मा जो सत् , चित् एवं आनंदस्वरूप है, वही हमारी आत्मा होकर बैठा है और आज तक हमने उसे जानने का प्रयास नहीं किया तो हम बुद्धिमान होते हुए भी बुद्धू हैं।

भाषा, कला आदि का ज्ञान अंत में व्यर्थ हो जाता है लेकिन परमात्मा का ज्ञान एक बार भी हो जाये तो फिर सदा-सदा के लिए सब दुःखों से मुक्ति दिला देता है।

श्री रामकृष्ण परमहंस कहते थेः “पहले सत्स्वरूप ईश्वर को जान लो फिर दुनिया का ज्ञान जानना। पहले सत्स्वरूप ईश्वर को पा लो फिर दुनिया का जो पाना है, पा लेना।”

फिर जानना क्या और पाना क्या ? प्रकृति तो आपकी दासी होकर रहेगी। सब वस्तुएँ आपके चरणों में न्यौछावर हो जायेंगी…. परम मांगल्य के द्वार खुल जायेंगे।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मार्च 2001, पृष्ठ संख्या 3,4 अंक 99

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निद्रा और स्वास्थ्य


जब आँख, कान आदि ज्ञानेन्द्रियाँ और हाथ पैर आदि कर्मेन्द्रियाँ तथा मन अपने-अपने कार्यों में रत रहने के कारण थक जाते हैं तब नींद स्वाभाविक हो आ जाती है।  जो लोग नियत समय पर सोते और उठते हैं, उनकी शारीरिक शक्ति में ठीक से वृद्धि होती है। पाचकाग्नि प्रदीप्त होती है जिससे शरीर की धातुओं का निर्माण उचित ढंग से होता रहता है। उनका मन दिन भर उत्साह से भरा रहता है जिससे वे अपने सभी कार्य तत्परता से कर सकते हैं।

रात्रि के प्रथम प्रहर में सो जाना और ब्राह्ममुहूर्त में उठना स्वास्थ्य के लिए अत्यन्त हितकर है।

अच्छी नींद के लिए रात्रि का भोजन अल्प तथा सुपाच्य होना चाहिए। सोने से दो घंटे पहले भोजन कर लेना चाहिए। भोजन के बाद स्वच्छ, पवित्र तथा विस्तृत स्थान में अच्छे, अविषम एवं घुटनों तक के ऊँचाई वाले शयनासन पर पूर्व या दक्षिण की ओर सिर करके प्रसन्न मन से ईश्वरचिंतन करते-करते सो जाना चाहिए। शयन से पूर्व प्रार्थना करने मानसिक शांति मिलती है। एवं नसों में शिथिलता उत्पन्न होती है। इससे स्नायविक तथा मानसिक रोगों से बचाव व छुटकारा मिलता है। यह नियम अनिद्रा रोग एवं दुःस्वप्नों से भी बचाता है। यथाकाल निद्रा के सेवन से शरीर पुष्टि होती है तथा बल और उत्साह-चैतन्य की प्राप्ति होती है।

निद्रानाश के कारणः

कुछ कारणों से हमें रात्रि में नींद नहीं आती। कभी-कभी थोड़ी बहुत नींद आ भी गयी तो आँख तुरन्त खुल जाती है। वात-पित्त की वृद्धि होने पर अथवा फेफड़े, सिर, जठर आदि शरीरांगों से कफ का अंश क्षीण होने के कारण वायु की वृद्धि होने पर अथवा अति परिश्रम के कारण थक जाने से अथवा क्रोध, शोक भय से मन व्यथित होने पर नींद नहीं आती या कम आती है।

निद्रानाश के परिणामः

निद्रानाश से बदनदर्द, सिर में भारीपन, जड़ता ग्लानि, भ्रम, अन्न का न पचना एवं वातजन्य रोग पैदा होते हैं।

शंखपुष्पी और जटामांसी का 1 चम्मच सम्मिश्रित चूर्ण सोने से पहले दूध के साथ लेना।

अपने शारीरिक बल से अधिक परिश्रम न करना।

ब्राह्मी, आँवला, भांगरा आदि शीत द्रव्यों से सिद्ध तेल सिर पर लगाना।

शुद्धे शुद्धे महायोगिनी महानिद्रे स्वाहा। इस मंत्र का जप 10 मिनट या अधिक करने स अनिद्रा निवृत्त होगी व नींद अच्छी आयेगी।

रात्रि का जागरण रूक्षताकारक एवं वायुवर्धक होता है। दिन में सोने से कफ बढ़ता है और पाचकाग्नि मंद हो जाती है जिससे अन्न का पाचन ठीक से नहीं होता। इससे पेट की अनेक प्रकार की बीमारियाँ होती हैं तथा त्वचा विकार, मधुमेह, दमा, संधिवात आदि अनेक विकार होने की संभावना होती है। बहुत से व्यक्ति दिन और रात दोनों काल में खूब सोते हैं। इससे शरीर में शिथिलता आ जाती है। शरीर में सूजन, मलावरोध, आलस्य तथा कार्य में निरुत्साह आदि लक्षण उत्पन्न होते हैं।

अतः दिन में सोने वाले सावधान ! मंदाग्नि और कफवृद्धि करके कफजनित रोगों को न बुलाओ। रात की नींद ठीक से लो। दिन मे सोकर स्वास्थ्य बिगाड़ने की आदत बन्द करो-कराओ। नन्हें मासूमों को, रात्रि में जागने वालों को, कमजोर व बिमारों को और जिनको वैद्य बताते हैं उनको दिन में सोने की आवश्यकता हो तो उचित है।

अति निद्रा की चिकित्सा

उपवास अथवा हल्का, सुपाच्य एवं अल्प आहार से नींद अधिक नहीं आती।

सुबह शाम 10-10 प्राणायाम करना भी हितकारी है।

नेत्रों में अंजन करने से तथा आधी चुटकी वचा चूर्ण (घोड़ावज) का नस्य लेने से नींद का आवेग कम होता है। इस प्रयोग से मस्तिष्क में कफ और बुद्धि पर जो तमोगुण का आवरण होता है, वह दूर हो जाता है।

स्वास्थ्य पर विचारों का प्रभाव

विचारों की उत्पत्ति में हमारी दिनचर्या, वातावरण, सामाजिक स्थिति आदि विभिन्न तथ्यों का असर पड़ता है। अतः दैनिक जीवन में विचारों का बड़ा ही महत्त्व होता है। कई बार हम केवल अपने दुर्बल विचारों के कारण रोगग्रस्त हो जाते हैं और कई बार साधारण से रोगी की स्थिति भयंकर रोग की कल्पना से अधिक बिगड़ जाती है और कई बार डाक्टर डरा देते है। कमीशन की लालच व अंधे स्वार्थ में आकर वे बिन जरूरी मशीनों से चेकअप व आपरेशन इंजेक्शनों के घाट उतार देते हैं। यदि हमारे विचार अच्छे हैं, दृढ़ हैं तो हम स्वास्थ्य-संबंधी नियमों का पालन करेंगे और साधारण रोग होने पर योग्य विचारों से ही हम उससे मुक्ति पाने मे समर्थ हो सकेंगे।

सात्त्विक विचारों की उत्पत्ति में सात्त्विक आहार, सत्शास्त्रों का पठन, महात्माओं के जीवन चरित्र का अध्ययन, ईश्वरचिन्तन, भगवन्नाम-स्मरण, योगासन और ब्रह्मचर्य-पालन बड़ी सहायता करते हैं।

श्रीरामचरितमानस में आता हैः

सदगुरु बैद वचन बिस्वासा। संयम यह न विषय के आसा।।

रघुपति भगति सजीवन मूरी। अनूपान श्रद्धा मति पूरी।।

एहि बिधि भलेहिं सो रोग नसाहीं। नाहिं त जतन कोटि नहीं जाहीं।।

सदगुरु रूपी वैद्य के वचन में विश्वास हो। विषयों की आशा न करे, यही संयम (परहेज) हो। श्रीरघुनाथजी की भक्ति संजीवनी जड़ी है। श्रद्धा से पूर्ण बुद्धि ही अनुपान (दवा के साथ लिया जाने वाला मधु आदि) है। इस प्रकार का संयोग हो तो वे रोग भले ही नष्ट हो जायें, नहीं तो करोड़ों प्रयत्नों से भी नहीं जाते। (श्रीरामचरितमानस. उ.कां. 121.3-4)

वसंत ऋतुचर्या

वसंत ऋतु संधिकाल की ऋतु है। इन दिनों में चर्मरोग, सर्दी, जुकाम, खाँसी, बुखार, सिरदर्द, कृमि आदि रोग होते हैं। इस ऋतु में शीत ऋतु की तरह भारी, खट्टे, ठंडे व मधुर रसवाले पदार्थों का सेवन न करें। आइसक्रीम, ठंडे पेय पदार्थ, मावे से बनी मिठाइयाँ, केले, संतरा आदि कफवर्धक फल न खायें। आँवला, शहद, मूंग, अदरक, परवल, दालचीनी, धानी, चना, मुरमुरा आदि कफनिवारक पदार्थों का सेवन करना चाहिए।

चैत्र मास में नीम के नये पत्ते खाने की बड़ी महिमा है। 14 दिन सुबह 10-15 कोमल पत्ते खूब चबा-चबाकर खाने से या उसका रस निकाल कर पीने से शरीर में रोग प्रतिकारक शक्ति बढ़ती है तथा चर्मरोग, रक्तविकार, ज्वर और अन्य कफ व पित्तदोष के रोग नहीं होते।

शरीर से जहरीले हानिकारक द्रव्यों को निकालने के लिए इस ऋतु में 2 से 5 ग्राम हरड़ व शहद सममात्रा में नित्य प्रातः लेना चाहिए। इस ऋतु में सूर्योदय से पहले उठना, व्यायाम, दौड़, तेज चलना, रस्सीकूद, प्राणायाम, आसन अधिक हितकारी हैं।

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उपवासः विषय-वासना निवृत्ति का अचूक साधन

अन्न में मादकता होती है। इसमें भी एक प्रकार का नशा होता है। भोजन करने के तत्काल बाद आलस्य के रूप में इस नशे का प्रायः सभी लोग अनुभव करते हैं। पके हुए अन्न के नशे में एक प्रकार की पार्थिव शक्ति निहित होती है, जो पार्थिव शरीर का संयोग पाकर दुगनी हो जाती है। इस शक्ति को शास्त्रकारों ने ‘आधिभौतिक शक्ति’ कहा जाता है।

इस शक्ति की प्रबलता में वह आध्यात्मिक शक्ति जो हम पूजा-उपासना के माध्यम से एकत्र करना चाहते हैं, नष्ट हो जाती है। अतः भारतीय महर्षियों ने सम्पूर्ण आध्यात्मिक अनुष्ठानों में उपवास का प्रथम स्थान रखा है।

विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः।

गीता के अनुसार उपवास, विषय-वासना से निवृत्ति का अचूक साधन है। खाली पेट को फालतू की ‘मटरगस्ती’ नहीं सूझती। अतः शरीर, इन्द्रियों और मन पर विजय पाने के लिए जितासन और जिताहार होने की परम आवश्यकता है।

आयुर्वेद तथा आज का विज्ञान दोनों का एक ही निष्कर्ष है कि व्रत और उपवासों से जहाँ अनेक शारीरिक व्याधियाँ समूल नष्ट हो जाती हैं, वहाँ मानसिक व्याधियों के शमन का भी यह एक अमोघ उपाय है।

वैज्ञानिक कहते हैं कि सप्ताह में एक दिन तो व्रत रखना ही चाहिए। इससे आमाशय, यकृत एवं पाचनतंत्र को विश्राम मिलता है तथा उनकी स्वतः ही सफाई हो जाती है। इस रासायनिक प्रक्रिया से पाचनतंत्र मजबूत हो जाता है तथा व्यक्ति की आन्तरिक शक्ति के साथ-साथ उसकी आयु भी बढ़ती है।

धन्यवन्तरी आरोग्य केन्द्र, साबरमती, अमदावाद

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गोदुग्ध पृथ्वी का अमृत क्यों ?

भारतीय नस्ल की गाय की रीढ़ में सूर्यकेतु नामक एक विशेष नाड़ी होती है। जब इस नाड़ी पर सूर्य की किरणें पड़ती हैं तब यह नाड़ी किरणों से सुवर्ण के सूक्ष्म कणों का निर्माण करती है। इसीलिए गाय के दूध, मक्खन तथा घी में पीलापन रहता है। यह पीलापन शरीर में उपस्थित विष को समाप्त अथवा बेअसर करने में लाभदायी सिद्ध होता है। गोदुग्ध का नित्य सेवन दवाओं के दुष्प्रभाव (साइड इफेक्ट) से उत्पन्न विष का भी शमन करता है।

गोदुग्ध में प्रोटीन की इकाई ‘अमीनो एसिड’ की प्रचुर मात्रा होने से यह सुपाच्य तथा चर्बी की मात्रा कम होने से ‘कोलेस्ट्रोल’ रहित होता है।

गाय के दूध में उपस्थित ‘सेरीब्रोसाइडस’ मस्तिष्क को ताजा रखने एवं बौद्धिक क्षमता बढ़ाने के लिए उत्तम टानिक का निर्माण करते हैं।

रूस के वैज्ञानिक गाय के दूध को आण्विक विस्फोट से उत्पन्न विष को शमन करने वाला मानते हैं।

कारनेल विश्विद्यालय में पशुविज्ञान विशेषज्ञ प्रोफेसर रोनाल्ड गोरायटे के अनुसार गाय के दूध में MDGI प्रोटीन होने से शरीर की कोशिकाएँ कैंसरयुक्त होने से बचती हैं।

गोदुग्ध पर अनेक देशों में और भी नये-नये परीक्षण हो रहे हैं तथा सभी परीक्षणों से इसकी नवीन विशेषताएँ प्रगट हो रही हैं। धीरे-धीरे वैज्ञानिकों की समझ में आ रहा है कि भारतीय ऋषियों ने गाय को माता, अवध्य तथा पूजनीय क्यों कहा है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मार्च 2001, पृष्ठ संख्या 28-30, अंक 99

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