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अपनी योग्यता बढ़ाओ


संत श्री आसाराम जी बापू के सत्संग-प्रवचन से

जीवन जीने के दो मार्ग हैं। श्रेय मार्ग और प्रेय मार्ग। श्रेयस बोलता हैः ʹदे दो…. दे दो…. अपने पास जो कुछ भी उसे दूसरों की सेवा में लगा दो, दूसरों की आवश्यकतापूर्ति में लगा दो।ʹ प्रेयस बोलता हैः ʹले लो… ले लो…. अपने पास बहुत कम है, जितना मिले उतना ले लो। उसे सँभालकर रखो।ʹ

प्रेय मार्ग पर चलने से लेते-लेते आप इतने दब जाते हो कि जड़ी भाव को प्राप्त होते हो और श्रेय मार्ग पर चलने से देते-देते आप इतने विशाल हो जाते हो कि आखिर में सिर्फ आप ही रहते हो, और कुछ नहीं रहता।

सदगुरु हमेशा श्रेयस् देते हैं। वे हम पर अपना आध्यात्मिक खजाना लुटा देते हैं लेकिन कोई-कोई ही विरले होते हैं जो इस अमूल्य रत्न को झेल पाते हैं। जिसकी जितनी योग्यता, उतना ही लाभ वह उठा सकता है। सदगुरुओं का जीवन कृत्कृत्यता से भरा होता है, कल्याणपूर्ण होता है। जब कोई योग्य अधिकारी ही न मिले तो वे क्या करें ?

संत ज्ञानेश्वर महाराज से किसी एक भोली माई ने पूछाः “जब भगवान सबके हैं, तो वे सबको आत्मप्रसाद क्यों नहीं देते ?”

संत ज्ञानेश्वरः “भगवान तो सबके लिए एक सरीखे दाता हैं लेकिन सबको एक सरीखा लेने की अटकल नहीं है तो उसमें भगवान या संत या गुरु क्या करें ? योग्यता के अनुरूप व्यवहार होता है।”

उस नासमझ माई ने इतना सुनने पर भी फिर से कहाः “योग्यता, अधिकार यह सब संतों को क्या देखना ? उन्हें तो आत्मरस सबको दे देना चाहिए।”

संत ज्ञानेश्वर महाराज ने सोचा किः “यह माई ऐसे समझने वाली नहीं है। इसको तो प्रत्यक्ष प्रमाणित करके समझाना पड़ेगा।ʹ वे पहुँचे हुए संत थे। उन्होंने अपने संकल्प से एक लीला रची।

जहाँ ज्ञानेश्वर महाराज और वह माई बातचीत कर रहे थे वहाँ एक भिखारी आया और भिखारी ने उस माई से एक रूपया माँगा।

माई ने क्रोधित होकर कहाः “चल भाग यहाँ से। बड़ा आया एक रूपया माँगने !”

इस प्रकार भिखारी को उस माई ने भगा दिया।

अब संत ज्ञानेश्वर ने अपनी ओर से लीला शुरु की। उन्होंने माई को उसके हाथ के सोने के कंगन की ओर इशारा करके कहाः “माई ! इसमें से एक कंगन मुझे दे दो न ! पास के गाँव में भण्डारा करना है।”

माई ने तुरंत अपने सारे के सारे कंगन उतारकर कहाः “एक दो क्यों ? आप इन चारों कंगनों को रख लीजिये, काम आयेंगे।”

संत ज्ञानेश्वरः “आश्चर्य है ! अभी-अभी तुमने ही उस भिखारी को एक रूपया तक देने से इन्कार कर दिया और मेरे एक कंगन माँगने पर अपने चारों कंगन देने को राजी हो गई !

माईः “भिखारी को मैं एक रूपया भी कैसे देती ? वह तो एकदम गिरा हुआ इन्सान था फिर आप तो संत हैं, महापुरुष हैं। आपको देकर मेरा दिल खुश होता है।”

तब संत ज्ञानेश्वर महाराज ने कहाः

“देखो, नश्वर चीज देने में भी योग्यता देखनी पड़ती है तो संतजन, गुरुजन जब आध्यात्मिक खजाना बाँट रहे हों तब उन्हें भी अधिकारी तो चुनने ही पड़ते हैं। फिर भी वे इतने दयालु हृदय होते हैं कि योग्यता से ज्यादा ही सबको देते आये हैं। इसके बावजूद सबको उनकी कद्र नहीं होती।”

भगवान के प्यारे संतों में, सदगुरुओं में हम सबकी अटूट श्रद्धा बन जाये, आत्मरस पाने की तत्परता अंत तक बनी रहे तो बेशक हम पर बरसी कृपा पचेगी।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, फरवरी 2001, पृष्ठ संख्या 20, अंक 98

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अगर है शौक मिलने का तो कर खिदमत फकीरों की


संत श्री रैदास जी महाराज जयंतीः 8 फरवरी 2001

काशीनरेश अपने मंत्री से कहते हैं-

“बाहर से तो मैं बड़ा सुखी हूँ क्योंकि मेरे पास यौवन, आरोग्यता और संपत्ति है, लेकिन भीतर से दुःखी भी बहुत हूँ क्योंकि हृदय में शांति नहीं है। अभी मैंने परम शांति नहीं पाई है, अपनी अंतरात्मा के सुख का स्वाद नहीं पाया है।

काशीनरेश का मंत्री बुद्धिमान था। उसने कहाः “अगर परम शांति चाहिए तो जिन्होंने परम शांति पाई, उनकी संगति में जाना पड़ेगा। जिन्होंने परम शांति पायी है ऐसे ब्रह्मवेत्ता महापुरुष की निगाहें आप पर पड़ें, उनके हाथ का प्रसाद मिल जाये, उनकी करुणा-कृपा से हृदय की ज्योति जग जाये तभी शांति मिल सकती है, राजन् !”

काशीनरेशः “मैं कथा तो रोज सुनता हूँ।”

मंत्रीः “राजन् ! कथा तो आप पंडियों से सुनते हैं, कथाकारों से सुनते हैं। किन्हीं आत्मारामी संत का सत्संग सुनिये तो शांति मिलेगी। यदि ऐसे महापुरुष के बारे में आप मुझसे पूछें तो इस वक्त काशी में ब्राह्मण, पंडित, साधु तो बहुत हैं लेकिन आत्मपद को पाये हुए जिन महापुरुष को मैं जानता हूँ वे हैं संत श्री रैदासजी महाराज।”

काशीनरेशः “जूते सीने वाले रैदास ! एक उच्च कोटि के संत !!”

मंत्रीः “हाँ, राजन् ! उनका व्यवसाय भले मोची का है लेकिन वे परमपद को पाये हुए महापुरुष हैं। यदि वे आप पर कृपा कर दें तो आपको हृदय की शांति मिल सकती है।”

काशीनरेशः “मैं उन रैदासजी के पास कैसे जा सकता हूँ ? मैं काशी का राजा और वे जूते सीने वाले एक मोची…”

मंत्रीः “राजन् ! उन महापुरुष का व्यवसाय न देखिये। मैं उनके दर्शन करके आया हूँ, उनके श्रीचरणों में बैठकर आया हूँ। आप भी एक बार अवश्य उनके दर्शन करें।”

मंत्री की बात सुनकर राजा को थोड़ा भरोसा हुआ किन्तु अभी-भी मन में थोड़ी खटक थी कि ʹराजा होकर एक मोची के पास जाना !ʹ उन्होंने मंत्री से कहाः “मैं उन रैदासजी महाराज के पास कैसे जाऊँ ? लोग कहेंगे कि राजा होकर मोची के पास गये थे….”

उस जमाने में नात-जात का बड़ा बोलबाला था।

मंत्रीः “राजन् ! फिर भी आपको उन महापुरुष के पास अवश्य जाना चाहिए। जिन मीराबाई के श्रीचरणों में भारत के बादशाह अकबर ने सिजदा करके अपना भाग्य बनाया, उन मीराबाई ने भी रैदासजी महाराज का मार्गदर्शन पाया है। रैदास जी के कृपा-प्रसाद को विकसित करके मीराबाई ने मेवाड़ को पावन कर दिया।”

काशीनरेशः “ठीक है…. मैं भी मौका देखकर उनके पास जाऊँगा लेकिन ऐसे ढंग से जाऊँगा कि किसी को पता न चले।”

अवसर पाकर राजा सेठ के वेष में रैदासजी के पास पहुँचे।

उस वक्त रैदास जी महाराज जूते सी रहे थे। जूते सीने के ले चमड़े को भिगोना पड़ता है। जिस लकड़ी के बर्तन में पानी रखा जाता है उसे कठौती बोलते हैं। कठौती में चमड़ा भिगोने से पानी रंगीन हो जाता है। रैदासजी महाराज अपने काम में लगे हुए थे। राजा ने कहाः “महाराज ! मैं काशीनरेश हूँ। आपके यहाँ वेष बदलकर आया हूँ। मुझे पता चला है कि आप कृपा करते हैं। मुझे भी शांति का प्रसाद दीजिये।”

संत रैदासजी ने सोचा किः “राजा बनकर आया है, वह भी ईमानदारी से नहीं। बेईमानी से सेठ जैसा कोट पहनकर आया है। इसका अहं भी तो थोड़ा पिघलना चाहिए।ʹ अगर इसमें योग्यता है, अधिकारिता है और थोड़ा मिटेगा तो कुछ पा लेगा।ʹ रैदासजी ने युक्ति की। उन्होंने कठौती में से आधी कटोरी पानी राजा को दिया एवं कहाः “यह पानी पी लो। इससे शांति मिल जायेगी।”

राजा अहं लेकर आया है लेकिन कैसे होते हैं वे करुणामय संत ! कठौती के पानी के रूप में कृपा बरसाने को तैयार हो जाते हैं कि ʹअगर थोड़ा अहं पिघलेगा तो शांति पा लेगा।ʹ लेकिन राजा तो राजा था ! एक तो राजा… फिर मुश्किल से वेष बदलकर आया…. ऊपर से प्रसाद में चमड़े का पानी ! राजा ने सोचाः “अररर… नहीं पीते हैं तो देने वाले का अपमान होता है और पीते हैं तो कै (उल्टी) होती है। अब क्या करें ?ʹ

आखिर राजा था… राजवी आदमी को किस समय क्या करना चाहिए उसकी थोड़ी बहुत सूझ-बूझ तो होती ही है। रैदासजी को बुरा भी न लगे और पानी भी न पीना पड़े, इसलिए राजा ने मुँह घुमा लिया और पीने की अदा करके कटोरी का पानी कोट के अंदर कमीज पर गिरा दिया ताकि बाहर भी न ढुले। राजा ने वहाँ से विदा ली।

महल में आकर काशीनरेश ने अपने खास धोबी को बुलवाया और कहाः “इस कमीज को चुपचाव धुलवा देना। किसी को पता न चले।”

धोबीः “क्या हुआ, राजन् !”

राजाः “यह मत पूछो। बस, इसको जल्दी से धुलवाकर भिजवा देना।”

धोबी ने अपनी बेटी सुजलु को वह कमीज धोने के लिए दे दी। राजा साहब की कमीज धोते समय उस रंग का उसे स्पर्श हुआ। स्पर्श होते ही सुजलु भीतर से ईश्वरीय रंग में रंगती गयी। कमीज का बाहर का रंग धुलता गया और सुजलु के हृदय में प्रेमरस उभरने लगा, ईश्वरीय मस्ती उभरने लगी।

प्रेम न खेतों ऊपजे, प्रेम न हाट बिकाय।

राजा चहो प्रजा चहो, शीश दिये ले जाय।।

रैदासजी ने उस चमड़े के पानी के रूप में आत्मशांति का, भक्ति का प्रेम-प्रसाद दिया था। राजा को तो अपने राजापने का अहं था अतः उसने तो पानी गिरा दिया लेकिन धोबी की वह बच्ची निर्दोष थी, अहंकाररहित थी अतः उस पानी के स्पर्श से ही उसे भक्ति का, ईश्वरीय मस्ती का प्रसाद मिल गया।

संत-महापुरुष कब, कैसे, किस पर कृपा कर दें कहना कठिन है लेकिन उनकी कृपा पचाने का अधिकारी वही होता है जो छल-कपट एवं अहंकार रहित होता है। ʹश्रीरामचरितमानसʹ में भी आता हैः

निर्मल मन जन सो मोहि पावा।

मोहि कपट छल छिद्र न भावा।।

रैदास जी के उस कृपा-प्रसाद युक्त जल के स्पर्श से धोबी की बच्ची सुजलु की सुषुप्त शक्ति जाग्रत हो उठी। वह शांत भाव से बैठती तो उसे अंदर से आनंद आने लगता। कभी हँसने लगती तो कभी आँसू बहने लगते, कभी-कभी प्रेमविभोर होकर नृत्य करने लगती…. ऐसा करते-करते उसकी आंतरिक योग्यता विकसित होती गयी। उसकी निष्कामता एवं ईश्वरीय मस्ती बढ़ती गयी। उसकी वाणी सुनकर लोग प्रभावित होने लगे। दो, पाँच, पंद्रह, पचीस…. करते-करते कई लोग उसके दर्शन-सत्संग के लिए आने लगे।

धीरे-धीरे उसकी ख्याति उस पुण्यात्मा मंत्री तक पहुँची जिसने काशीनरेश को संत रैदास जी से मिलवाया था। सुजलु का दर्शन-सत्संग करने वह उसके घर गया। वह स्वयं भी रँगा  हुआ तो था ही, समझदार भी था। सुजलु के वचन सुनकर बड़ा प्रभावित हुआ एवं राजा से कहाः

“राजन् ! आप रैदासजी के पास गये तो सही लेकिन वे मोची हैंʹ ऐसा सोचकर उनके सत्संग का लाभ नहीं ले पाये। खैर, सुजलु तो आपके धोबी की पुत्री है। अपने धोबी की पुत्री के पास जाने में क्या हर्ज है ? राजन् ! आप उससे तो सत्संग-लाभ उठा ही सकते हैं।”

मंत्री के आग्रह से राजा सुजलु के पास गये और बोलेः “सुजलु मुझे शांति चाहिए।”

जिन्हें परमात्म-तत्त्व का साक्षात्कार हो गया है ऐसे महापुरुष जो वस्त्र पहनते हैं उसमें भी उनके आध्यात्मिक आन्दोलन (वायब्रेशन) होते हैं। वे जिस वस्तु को छू देते हैं वह भी प्रसाद हो जाती है। जिस पर उनकी निगाहें पड़ती हैं वह भी निहाल हो जाता है।

यद् यद् स्पृश्यति पाणिभ्यां यद् यद् पश्यति चक्षुषा।

स्थावरणापि मुच्यन्ते किं पुनः प्राकृताः जनाः।।

ʹब्रह्मज्ञानी महापुरुष ब्रह्मभाव से जिन जड़ पदार्थों को अपने हाथों से स्पर्श करते हैं, आँखों के द्वारा देखते हैं वे भी कालांतर में जीवत्व पाकर मोक्ष प्राप्त कर लेते हैं, तो फिर उनकी दृष्टि में आये हुए व्यक्तियों के देर-सबेर होने वाले मोक्ष के बारे में तो शंका ही कैसी ?ʹ

भले ही वह कठौती का पानी था, चमड़े का रंग से रँगा हुआ पानी था लेकिन रैदासजी के करकमलों के स्पर्श को प्राप्त हुआ था, उनकी कृपादृष्टिवाला पानी था एवं उसमें उनका सत्य संकल्प भी था तो उसका प्रभाव पड़ा।

सुजलु ने कहाः “आप मेरे पास शांति लेने आये हैं ? आपकी कमीज धोकर तो मैं इतनी महान हुई हूँ और आप मुझसे शांति पाना चाहते हैं ?”

राजा की बुद्धि में प्रकाश हुआ किः ʹअरे ! मैंने मिला हुआ मौका खो दिया…. मैं रैदासजी को नहीं पहचान पाया….ʹ

अगर है शौक मिलने का, तो कर खिदमत फकीरों की।

ये जौहर नहीं मिलता, अमीरों के खजाने में।।

संत-महापुरुष का बाह्य वेष या व्यवहार देखकर ही उनके बारे में अनुमान लगा लेने वाले, निंदकों के चक्कर में आने वाले यूँ ही कोरे-के-कोरे रह जाते हैं। उनके कृपा-प्रसाद को तो वे ही पचा पाते हैं जो निरभिमानी होकर उनके श्रीचरणों में नतमस्तक होते हैं।

मीरा ने पहचाना था रैदासजी को। उन्होंने सच्ची श्रद्धा से रैदासजी के श्रीचरणों में सिर झुकाया था और उनकी कृपा-प्रसाद को पचायी थी। उनका मार्गदर्शन पाकर मीरा लाखों विघ्न-बाधाओं के बीच भी मेवाड़ में, प्रभु-प्रेम में मग्न होकर नाचती रहीं, गुनगुनाती रहीं, मुस्कराती रहीं।

छोटी जाति में जन्म लेकर भी रैदास जी ने उन ऊँचाइयों को छुआ था, जहाँ विरले ही पहुँचते हैं। वे स्वयं कहते हैं-

जाति भी ओछि, करम भी ओछा, ओछा किसब हमारा।

नीचे से प्रभु ऊँच कियो है, कह ʹरैदासʹ चमारा।।

उनके ईश्वर प्रेम से परिपूर्ण इस भजन को तो आज भी भारतवासी बड़े प्रेम से गाते हैं-

प्रभु जी ! तुम चंदन हम पानी। जाकी अँग अँग वास समानी।।

प्रभु जी ! तुम घन बन हम मोरा। जैसे चितवत चंद चकोरा।।

प्रभु जी ! तुम दीपक हम बाती। जाकि जोति बरै दिन राती।।

प्रभु जी ! तुम मोती हम धागा। जैसे सोनहिं मिलत सुहागा।।

प्रभु जी ! तुम स्वामी हम दासा। ऐसी भक्ति करै रैदासा।।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, फरवरी 2001, पृष्ठ संख्या 17-19, अंक 98

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तीन तत्त्वों का मिश्रणः मनुष्य


संत श्री आसारामजी बापू के सत्संग-प्रवचन से

मनुष्य का शरीर इन तीन तत्त्वों का मिश्रण हैः पाशवीय तत्त्व, मानवीय तत्त्व और ईश्वरीय तत्त्व।

पाशवीय तत्त्व अर्थात् पशु जैसा आचरण। चाहे जैसा खाना-पीना, माता-पिता की बात को ठुकरा देना, समाज को ठुकरा देना। जैसे, ढोर चलता है ऐसे ही मन के अनुसार चलना। ये पाशवीय तत्त्व हैं।

मानवीय तत्त्व अर्थात् मानवोचित आचरण। यथायोग्य आहार-विहार, अच्छे संस्कार, अच्छा संग, माता-पिता एवं गुरु का आदर करना – ये मानवीय तत्त्व हैं।

ईश्वरीय तत्त्व। जब संत सदगुरु मिलते हैं एवं मानव साधन-भजन करता है, जप-ध्यान करता है, व्रत-उपवास करता है तब ईश्वरीय तत्त्व विकसित होता है।

जो मनमुख होता है, उसमें पाशवीय अंश जोरदार होता है। फिर वह चाहे अपना बेटा हो या भाई हो लेकिन पाशवीय अंश ज्यादा है इसीलिए हैरान करता है। जैसे पशु जरा-जरा बात में भौंकता है ऐसे ही पाशवीय अंशवाला मनुष्य जरा-जरा बात में अशांत हो जायेगा, जरा-जरा बात में राग-द्वेष की गाँठ बाँध लेगा। वह अपनी पाशवीय वासनापूर्ति में लगा रहता है। ये वासनाएँ जहाँ पूर्ण होती हैं वहाँ राग  करने लगेगा और जहाँ वासनापूर्ति में विघ्न आयेगा वहाँ द्वेष करने लगेगा। वासनापूर्ति में कोई अपने से बड़ा व्यक्ति विघ्न डालेगा तो भयभीत होगा, बराबरी का विघ्न डालेगा तो स्पर्धा करेगा और छोटा विघ्न डालेगा तो क्रोधित होगा। इस प्रकार राग-द्वेष, भय-क्रोध, संघर्ष, स्पर्धा आदि में मनुष्य की ईश्वरीय चेतना खर्च होती रहती है।

इससे कुछ ऊँचे लोग होते हैं, जो अपने कर्त्तव्य पालन में तत्पर होते हैं और मानवीय अंश विकसित किये हुए होते हैं। वे राग-द्वेष को कम महत्त्व देते हैं और अगर हो भी जाता है तो थोड़ा बहुत सँभल जाते हैं। मानवीय अंश विकसित होने के बावजूद भी यदि किसी में पाशवीय अंश का जोर रहा तो वह पशुयोनि में जाता है। जैसे, राजा नृग। उन्होंने मानवीय अंश तो विकसित कर लिया था फिर भी पाशवीय अंश का जोर था तो गिरगिट बनकर कुएँ में पड़े रहे। यदि किसी में मानवीय अंश का जोर रहा तो मरने के बाद वह पुनः मनुष्य शरीर में आता है और यदि मानवीय अंश के साथ ईश्वरीय अंश के विकास में भी लगा रहा तो वह यहाँ भी सुखी एवं शांतिप्रिय जीवन व्यतीत करेगा और मरने के बाद भी भगवान के धाम में जायेगा। लेकिन जो अपने में पूरा ईश्वरीय अंश विकसित कर लेगा, वह यहीं ईश्वरतुल्य होकर पूजा जायेगा।

कई ऐसे बुद्धिमान लोग भी हैं जो ईश्वर को नहीं मानते और उनकी सारी बुद्धि शरीर की सुख-सुविधा इकट्ठी करने में ही खर्च हो जाती है। ऐसे बुद्धिजीवी अपने को श्रेष्ठ एवं दूसरों को तुच्छ मानते हैं जबकि वे स्वयं भी तुच्छता से घिरे हुए ही हैं क्योंकि जो शरीर क्षण-प्रतिक्षण में मौत की तरफ गति कर रहा है उसी को ʹमैंʹ मानते हैं और उससे संबंधित पद-प्रतिष्ठा एवं अधिकारों को ʹमेराʹ मानते हैं। लेकिन उन भोले मूर्खों को पता नहीं होता कि जैसे बिल्ली चूहे को सँभलने नहीं देती, वैसे ही मृत्यु भी किसी को सँभलने नहीं देती। कब मृत्यु आकर झपेट ले इसका कोई पता नहीं।

अमेरिका की अखबारें बताती हैं कि अब्राहम् लिंकन का प्रेतशरीर ʹव्हाइट हाउसʹ में दिखता है। अब्राहम लिंकन मानवतावादी तो थे किन्तु यदि साथ ही साथ उनका ईश्वरीय अंश विकसित होता तो मरने के बाद प्रेतयोनि में नहीं जाते बल्कि आध्यात्मिक यात्रा कर लेते।

कुछ लोग मरने के बाद प्रेत होते हैं। मृत्यु के समय पाशवीय वृत्तिवाले मनुष्य सुन्न हो जाते हैं। मृत्यु आती है तो सवा मुहूर्त तक उनका अंतःकरणयुक्त सूक्ष्म शरीर वातावरण में सुन्न सा मूर्च्छित-सा हो जाता है। वासना जगी रहती है अतः शरीर में घुसना चाहता है लेकिन नहीं घुस सकता। फिर मरने के बाद वासना के अनुसार उसकी गति होती है। जैसे, अभी प्यास लगी है, भूख लगी है, नींद आती है… इनमें से जिसका जोर ज्यादा होगा, वही काम आप पहले करेंगे। ऐसे ही मरने के बाद जो पाशवीय अथवा मानवीय वासना प्रबल होती है, उसी के अनुसार जीव की गति होती है।

जैसे, किसी भीड़ से छूटने के बाद कोई शराबी है तो शराब के अड्डे पर जायेगा, जुआरी है तो जुए के अड्डे पर जायेगा, सदगृहस्थ है तो अपनी प्रवृत्ति की ओर जायेगा, साधक है तो अपनी साधना में लगेगा या किसी आश्रम की ओर जायेगा। ऐसे ही मरने के बाद जीव भी अपनी-अपनी वासना एवं कर्म संस्कार के अनुसार विभिन्न योनियों में गति करते हैं।

मानों, इच्छा है कोई भोग भोगने की और शरीर छूट गया तो फिर अपने कर्मों की तारतम्यता से वह जीव चन्द्रमा की किरणों के द्वारा अथवा वृष्टि के द्वारा अन्न-फल इत्यादि में पड़ता है और उसको मनुष्यादि प्राणी खाते हैं। अगर उसका तारतम्य ठीक है तो उसकी वासना के अनुरूप उसे माता का गर्भ मिलता है और यदि ठीक नहीं है तो वह बेचारा पेशाब आदि के द्वारा नाली में बह जाता है। कहाँ तो बड़ा तीसमार खाँ था और कहाँ दुर्गति को प्राप्त हो गया ! ऐसे कई बार यात्राएँ करते-करते ठीक संयोग बनता है और उसे गर्भ में टिकने का अवसर मिलता है और वह जन्म लेता है। फिर वह अपनी वासना के अनुसार कर्म करता रहता है और नयी-नयी वासनाएँ बनती रहती हैं। ….तो पशुता और मानवता के संस्कार सबमें हैं। जीव को सत्ता तो ईश्वरीय तत्त्व देता है लेकिन वह ईश्वरीय तत्त्व का अनुसंधान नहीं करता तो कभी पशुयोनि में तो कभी मानवयोनि में जाता है तो कभी सज्जनता का पवित्र व्यवहार करके देवयोनि में जाता है और पुण्य भोगकर पुनः नीच योनि में आ जाता है।

बड़भागी तो वह है जो अपना ईश्वरीय अंश विकसित करने के लिए ईश्वरीय नाम का आश्रय लेता है, ईश्वर की प्राप्ति के लिए साधना करता है और मानवीयता के सुंदर सेवाकार्य करता है। सेवाकार्य भी वाहवाही के लिए नहीं, स्वर्गप्राप्ति के लिए नहीं, वरन् ईश्वरप्रीति के लिए ही करता है। भलाई के कार्य करने से अंतरात्मा विकसित होती है और आत्मबल बढ़ता है। ईश्वरीय अंश हमारी सहायता करता है और हमें सत्प्रेरणा देता है। इस प्रकार जो ईश्वरीय अंश को जगाने में लगता है और सतर्क रहता है वही मनुष्यलोक में बुद्धिमान है। वह सचमुच में भाग्यशाली है जो अपने हृदय में ईश्वरीय अंश को विकसित करके ईश्वरीय सत्प्रेरणा, ईश्वरीय ज्ञान, ईश्वरीय ध्यान और ईश्वरीय शांति पाने के लिए सत्कर्म करता है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जनवरी 2001, पृष्ठ संख्या 12,13 अंक 97

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