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भगवान के अवतार भारत में ही क्यों ?


संत श्री आसारामजी बापू के सत्संग-प्रवचन से

यह प्रकृति का विधान है कि जिसे जिस समय जिस वस्तु की अत्यन्त आवश्कता होती है उसे पूरी करने वाला उसके पास पहुँच जाता है या तो मनुष्य स्वयं ही वहाँ पहुँच जाता है जहाँ उसकी आवश्यकता पूरी होने वाली है।

मुझसे ʹविश्व धर्म संसदʹ में पत्रकारों ने पूछाः

“भारत मे ही भगवान के अवतार क्यों होते है ? हिन्दुस्तान में ही भगवान क्यों जन्म लेते हैं ? जब सारी सृष्टि भगवान की ही है तो आपके भगवान ने यूरोप या अमेरिका में अवतार क्यों नहीं लिया ? नानकजी या कबीरजी जैसे महापुरुष इन देशों में क्यों नहीं होते ?”

मैंने उनसे पूछाः “जहाँ हरियाली होती है वहाँ बादल क्यों आते हैं और जहाँ बादल होते हैं वहाँ हरियाली क्यों होती है ?”

उन्होंने जवाब दियाः “बापू जी ! यह तो प्राकृतिक विधान है।”

तब मैंने कहाः “हमारे देश में अनादि काल से ही ब्रह्मविद्या और भक्ति का प्रचार हुआ है। इससे वहाँ भक्त पैदा होते रहे। जहाँ भक्त हुए वहाँ भगवान की माँग हुई तो भगवान आये और जहाँ भगवान आये वहाँ भक्तों की भक्ति और भी पुष्ट हुई । अतः जैसे जहाँ हरियाली वहाँ बादल और जहाँ बादल वहाँ हरियाली होती है वैसे ही हमारे देश में भक्तिरूपी हरियाली है इसलिए भगवान भी बरसने के लिए बार-बार आते हैं।”

मैं दुनियाँ के बहुत देशों में घूमा, कई जगह प्रवचन भी किये परन्तु भारत जितनी तादाद में तथा शांति से किसी दूसरे देश के लोग सत्संग सुन पाये हों ऐसा आज तक मैंने किसी भी देश में नहीं देखा। फिर चाहे ʹविश्व धर्म संसदʹ ही क्यों न हो। जिसमें विश्वभर के वक्ता आये वहाँ बोलने वाले 600 और सुनने वाले 1500 ! भारत में तो हररोज सत्संग के महाकुंभ लगते रहते हैं। भारत में आज भी लाखों की संख्या में हरिकथा के रसिक हैं। घरों में ʹगीताʹ एवं ʹरामायणʹ का पाठ होता है। भगवत्प्रेमी संतों के सत्संग में जाकर, उनसे ज्ञान-ध्यान प्राप्त कर श्रद्धालु अपना जीवन धन्य कर लेते हैं। अतः जहाँ-जहाँ भक्त और भगवत्कथा-प्रेमी होते हैं वहाँ-वहाँ भगवान और संतों का प्रागट्य भी होता ही रहता है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अप्रैल 2000, पृष्ठ संख्या 7, अंक 88

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द्रव्यशक्ति एवं भावशक्ति


संत श्री आसाराम जी बापू के सत्संग प्रवचन से

दो प्रकार की शक्तियाँ होती हैं- द्रव्यशक्ति और भावशक्ति। द्रव्यशक्ति और भावशक्ति से ही संस्कार बनते हैं… द्रव्य संस्कार और भावसंस्कार। इन दो शक्तियों के आधार पर ही सबका जीवन चलता है।

अन्न, जल, फल आदि जो द्रव्य हम खाते हैं, उनसे हमारे शरीर को पुष्टि मिलती है। ऋतु के अनुसार हम कोई चीज खाते हैं तो स्वस्थ रहते हैं और ऋतु के विपरीत कुछ खाते हैं तो बीमार होते हैं। स्वास्थ्य के अनुकूल हम कोई चीज खाते हैं तो स्वस्थ रहते हैं, स्वास्थ्य के प्रतिकूल कुछ खाते हैं तो बीमार पड़ते हैं। इसी प्रकार समय के अनुकूल हम कोई चीज खाते हैं तो स्वस्थ रहते हैं किन्तु समय के प्रतिकूल, देर रात्रि से या प्रदोषकाल में कुछ खाते हैं तो बीमार होते हैं। इस द्रव्य शक्ति का प्राकृतिक संबंध हमारे शरीर के साथ है। द्रव्य-शक्ति का सदुपयोग करने से हमारा स्वास्थ्य अच्छा रहता है।

द्रव्य शक्ति से ऊँची है भाव शक्ति। भाव के द्वारा जो अपने को जैसा मानता है वैसा ही बन जाता है। भावशक्ति बड़ी गजब की है। भावशक्ति से ही स्त्री-पुरुष बनते हैं, भावशक्ति से ही पापी-पुण्यात्मा बनते हैं। इसी शक्ति से हम अपने को सुखी-दुःखी मानते हैं। भावशक्ति से ही हम अपने को तुच्छ या महान मानते हैं। इसीलिए भावशक्ति का ठीक-ठीक विकास करना चाहिए। सदैव उत्तम भाव करें, मन में कभी हीन या दुःखद भाव न आने दें।

द्रव्यशक्ति की तो कहीं कमी नहीं, खान-पान की चीजें तो सभी देशों में उपलब्ध हैं लेकिन आज विश्व में भावशक्ति की बहुत कमी पड़ रही है। एक आदमी दूसरे आदमी का शोषण करके सुखी होना चाहता है, एक गाँव दूसरे गाँव का गला घोंटकर सुखी होना चाहता है, एक प्रांत दूसरे प्रांत का शोषण करके सुखी होना चाहता है, एक राष्ट्र दूसरे राष्ट्र को गुलाम बनाकर सुखी होना चाहता है। यह सब आत्मीयतापूर्ण भावशक्ति के अभाव का ही परिणाम है।

शेर ने हाथी के मस्तक का खून पिया है फिर भी जब जंगल में जाता है तो पीछे मुड़-मुड़ कर देखता है कि ʹकोई मुझे खा न जाये ! कोई मुझे मार न डाले !ʹ अरे कमबख्त ! तूने तो हाथियों को मारा है, तुझे कौन मारने को आ सकता है ? ….लेकिन उसकी हिंसा-प्रवृत्ति ही उसको डराती है। ऐसे ही शोषण करने वाले व्यक्ति अपने-आपको ही शोषित करते रहते हैं।

हराम की कमाई करने वालों के बेटे-बेटियाँ एवं परिवारवालों की मति भी वैसी ही हो जाती है। नाहक का धन बहुत-बहुत तो दस साल तक टिकता है, फिर तो उसी प्रकार स्वाहा हो जाता है जैसे रुई के गोदाम में आग लगने पर पूरी रूई स्वाहा हो जाती है। इसीलिए शोषण करके, दगाबाजी-धोखाधड़ी करके धन का ढेर करने वाले लोग जीवन में दुःखी पाये जाते हैं और जीवन के अंत में देखो तो ठनठनपाल… जबकि हक की कमाई करने वालों के बेटे बेटियाँ और परिवारवाले भी सुखी रहते हैं। सबकी भलाई सोचकर आजीविका कमाने वाले एवं आत्मा-परमात्मा की ओर चलनेवाले आप भी सुखी होते हैं और उनके सम्पर्क में आने वाले भी खुशहाल होने लगते हैं।

भोग-वासना और बाह्य आडम्बर इन्सान को भीतर से खोखला कर देते हैं। आप मन-इन्द्रियों को जैसा पोषण देंगे वैसे ही वे बन जायेंगे। आप इन्द्रियों को जैसा बनाना चाहते हैं, वैसा ही उन्हें पोषण दीजिये। यह है द्रव्यसंस्कार।

अगर आप इन्द्रियों को हल्का दृश्य दिखाओगे तो इन्द्रियाँ उऩ्हीं के अधीन हो जायेंगी। मन को अगर नशीली चीजों की आदत डालोगे तो उसी तरफ उसका झुकाव हो जायेगा। यह है द्रव्य संस्कार।

भावसंस्कार कैसे डालना ? इसका ज्ञान सत्संग और सत्शास्त्र से मिलता है। इसलिए रोटी नहीं मिले तो चिंता की बात नहीं लेकिन सत्संग रोज मिलना चाहिए। सत्यस्वरूप ईश्वर का जप और ध्यान रोज होना चाहिए। साधना के अनुकूल रोज पवित्र आहार लेना चाहिए। यह है भावसंस्कार।

आप जो द्रव्य खाते हैं एवं जो भाव करते हैं उनमें भी आत्मज्ञान के संस्कार भरे दें। द्रव्य संस्कार और भावसंस्कार दोनों में आत्मज्ञान का सिंचन, सत्य का सिंचन कर दें तो अंत में दोनों का फल सत्यस्वरूप ईश्वर की प्राप्ति हो जायेगी।

द्रव्य संस्कार और भावसंस्कार दोनों पवित्र होंगे तो पवित्र सुख मिलेगा। यह पवित्र सुख परम पवित्र परमात्मा से मिला देगा। यदि ऐसा नहीं करेंगे तो अपवित्र सुखाभास मिलेगा और देर-सबेर नरकों के स्वरूप में वह चैतन्य प्रगट होगा।

ʹʹबाबाजी ! सर्वत्र एवं सब में भगवान हैं तो फिर ʹयह पवित्र यह अपवित्र… यह करो यह न करो….ʹ ऐसा क्यों ?

जो आया सो खा लिया, जैसा मन में आया वैसा कर लिया तो फिर जैसा होगा वैसा ही परिणाम आयेगा। यदि आप वास्तविक सुख, पवित्र सुख चाहते हो तो सिद्धान्त के अनुसार वहीं चलना पड़ेगा जहाँ वास्तविक सुख होगा।

ʹजो आये सो करो….ʹ तो पाप करो, कोई बात नहीं। फिर भगवान नरक के रूप में, परेशानी के रूप में मिलेंगे। जब परेशानी आ जाये तो बोलना किः ʹभगवान परेशानी के रूप में आये हैं।ʹ संतोष मान लेना। पुण्य करोगे तो भगवान सुख के रूप में मिलेंगे, स्वर्ग के रूप में मिलेंगे। आप किसी को सतायेंगे तो भगवान दुश्मन के रूप में प्रगट होंगे और आप किसी को ईमानदारी से स्नेह करोगे तो भगवान मित्र के रूप में प्रगट होंगे। लेकिन अगर ऐसी  नजर बनी रही कि ʹदुश्मन के रूप में भी मेरा भगवान हैʹ तो दुश्मन हट जायेगा और भगवान रह जायेंगे। आपका भावसंस्कार बन जायेगा, कल्याण हो जायेगा। अन्यथा, दुश्मन के प्रति द्वेष होगा और मित्र के प्रति राग होगा तो फँसोगे।

करणी आपो आपनी के नेड़े के दूर।

अपनी ही करनी से इन्सान सुख के निकट या दूर होता है। अतः बुरे संस्कारों, बुरे कर्मों से बचो। भारत की दिव्य संस्कृति के दिव्य संस्कारों से आप भी सम्पन्न बनो और दूसरों को भी सम्पन्न करो। द्रव्यशक्ति के साथ-साथ अपनी भावशक्ति को इतना ऊँचा बना लो कि इस जगत के भोग तो क्या, स्वर्ग के सुखभोग भी आपको आकर्षित न कर सकें। स्वर्ग की अप्सरा का भोग भी भारत के अर्जुन के आगे तुच्छ था तो इस जगत की प्लास्टिक की पट्टियाँ (फिल्मों) का भोग क्या चीज है ?

इस लोक और परलोक के सुख से भी बढ़कर जो आत्मसुख है, उसको पाने में ही जो अपनी द्रव्यशक्ति एवं भावशक्ति का उपयोग करता है उसी का जीवन धन्य है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अप्रैल 2000, पृष्ठ संख्या 17-19 अंक 88

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तरबूज


ग्रीष्म ऋतु का फल तरबूज प्रायः पूरे भारत में पाया जाता है। पका हुआ फल लाल गूदेवाला तरबूज स्वाद में मधुर, गुण में शीतल, पित्त एवं गर्मी का शमन करने वाला, पौष्टिकता एवं तृप्ति देने वाला, पेट साफ करने वाला, मूत्रल एवं कफकारक है।

कच्चा तरबूज गुण में ठंडा, दस्त को रोकने वाला, कफकारक, पचने में भारी एवं पित्त नाशक है।

तरबूज के बीज शीतवीर्य, शरीर में स्निग्धता बढ़ाने वाले, पौष्टिक, मूत्रल गर्मी का शमन करने वाले, कृमिनाशक, दिमागी शक्ति बढ़ाने वाले, दुर्बलता मिटाने वाले, किडनी को कमजोर करने वाले, गर्मी की खाँसी एवं ज्वर को मिटाने वाले, क्षय एवं मूत्ररोगों को दूर करने वाले हैं। बीज के सेवन की मात्रा हररोज 10 से 20 ग्राम है। ज्यादा बीज खाने से तिल्ली की हानि होती है।

विशेषः गर्म तासीर वालों के लिए तरबूज एक उत्तम फल है लेकिन कफ प्रकृतिवालों के लिए हानिकारक है। अतः सर्दी-खाँसी, श्वास, मधुप्रमेह, कोढ़, रक्तविकार के रोगियों को उसका सेवन नहीं करना चाहिए।

ग्रीष्म ऋतु में दोपहर को भोजन के 2-3 घंटे बाद तरबूज खाना लाभदायक है। यदि तरबूज खाने के बाद कोई तकलीफ हो तो शहद अथवा गुलकंद का सेवन करें।

औषधि प्रयोगः

पित्त विकारः खून की उल्टी, अत्यंत जलन एवं दाह होने पर, एसिडिटी, अत्यंत प्यास लगने पर, गर्मी के ज्वर में, टायफायड में प्रतिदिन तरबूज के रस में मिश्री डालकर लेने से लाभ होता है।

मूत्रदाहः पके हुए तरबूज की एक फाँक बीच से निकालकर उसके अंदर पिसी हुई मिश्री बुरबुरा दें और वह निकली हुई फाँक फिर से कटे हुए भाग पर रख दें। उसे रात्रि में खुली छत पर रखें। सुबह उसके लाल गूदे का रस निकालें। यह रस सुबह-शाम पीने से मूत्रदाह, रूक-रुककर मूत्र आना, मूत्रेन्द्रिय पर गर्मी के कारण फुंसी का होना आदि मूत्रजन्य रोगों में लाभ होता है।

गोनोरिया (सुजाक) तरबूज के 100 ग्राम रस में पिसा हुआ जीरा एवं मिश्री डालकर सुबह शाम पीने से लाभ होता है।

गर्मी का सिरदर्दः तरबूज के रस में मिश्री तथा इलायची अथवा गुलाबजल मिलाकर दोपहर एवं शाम को पीने से पित्त, गरमी अथवा लू के कारण होने वाले सिरदर्द में लाभ होता है। हृदय की बढ़ी हुई धड़कनें सामान्य होती हैं एवं दुर्बलता अथवा तीव्र ज्वर के कारण आयी हुई मूर्च्छा में भी लाभ होता है।

पागलपनः यहाँ मूत्रदाह में दिया गया प्रयोग अपनायें। उस रस में ब्राह्मी के ताजे पत्तों का रस अथवा चूर्ण एवं दूध मिलायें। आवश्यकतानुसार मिश्री मिलाकर एक से तीन महीने तक रोगी को पिलायें। साथ ही तरबूज के बीज का गर्भ 10 ग्राम की मात्रा में रात्रि में पानी में भिगोयें। सुबह पीसकर उसमें मिश्री, इलायची मिला लें और मक्खन के साथ दें। इससे पागलपन अथवा गर्मी के कारण होने वाली दिमागी कमजोरी में लाभ होगा।

भूख बढ़ाने हेतुः तरबूज के लाल गूदे में कालीमिर्च, जीरा एवं नमक का चूर्ण बुरबुराकर खाने से भूख खुलती है एवं पाचनशक्ति बढ़ती है।

पौष्टिकता के लिएः तरबूज के बीज के गर्भ का चूर्ण बना लें। गर्म दूध में शक्कर तथा 1 चम्मच यह चूर्ण डालकर उबाल लें। इसके प्रतिदिन सेवन से देह पुष्ट होती है।

साँईं श्री लीलाशाहजी उपचार केन्द्र,

संत श्री आसारामजी आश्रम, जहाँगीरपुरा

वरियाव रोड, सूरत

स्रोतः ऋषि  प्रसाद, अप्रैल 2000, पृष्ठ संख्या 29, अंक 88

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