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संतकृपा से चित्रकेतु का मोहभंग


संत श्री आसारामजी बापू के सत्संग-प्रवचन से

सदगुरु मेरा शूरमा, करे शब्द की चोट।

मारे गोला प्रेम का, हरे भरम की कोट।।

ʹमैं शरीर हूँ… यह मेरा नाम है… यह मेरी नात-जात है…. यह मेरी पत्नी है… यह मेरा पुत्र-परिवार है…. यह मेरा कर्त्तव्य है….ʹ ये सब भरम हमारे अंदर घुस गये हैं। ʹहम जी रहे हैं…ʹ यह भी भरम है और ʹहम मर जायेंगे….ʹ यह भी भरम है। ʹहम माई हैं…. हम भाई हैं…. हम निर्धन हैं… हम पापी है… हम पुण्यात्मा हैं….. हम अच्छे हैं.. हम बुरे हैं…ʹ इस प्रकार न जाने कितने-कितने भरमों में हम उलझे रहते हैं और वास्तव में हम क्या हैं इसका हमें पता ही नहीं है।

जिनको वेदों, शास्त्रों और परमात्मा का ज्ञान नहीं है – ऐसे लोगों से जो हम सुनते हैं, वही अपने को मान लेते हैं। भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं।

ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः।

ʹइस देह में यह जीवात्मा मेरा ही सनातन अंश है।ʹ

आप सनातन हो, जन्मने-मरने वाले नहीं हो। व्यवहार में जो दिखता है कि ʹयह माई है… यह भाई है….ʹ यह सब कल्पित है और कल्पनाएँ बदलती रहती हैं जबकि आप तो अबदल, एकरस आत्मा हो।

न मे मृत्युशंका न मे जातिभेदः।

पिता नैव मे नैव माता न जन्म।

न बन्धुनः मित्रं गुरुर्नैव शिष्य।

चिदानन्दरूपः शिवोहं शिवोहम्।।

जहाँ न कोई पिता है, न माता है, न बन्धु है, न मित्र है – ऐसी अवस्था में आप पहुँच जाओ तो अपने चिदानंदस्वरूप का ज्ञान हो जाये। वही आपका वास्तविक स्वरूप है। अगर आप अपने उस शिवस्वरूप में तीन मिनट के लिए भी विश्रांति पा लो तो फिर देवता लोग भी आपका दीदार करके अपना भाग्य बना लेंगे। आप वह चिदघन चैतन्य आत्मा हो।

कहाँ तो आकाश से भी सूक्ष्म और व्यापक आपका चैतन्यस्वरूप और कहाँ अपने को शरीर मानकर उसके सुख-दुःख, मान-अपमान, हानि-लाभ आदि में उलझी रहने वाली आपकी स्थूल बुद्धि। कई जन्मों से अपने को माई-भाई, अच्छा-बुरा, पापी-धर्मात्मा, सुखी-दुःखी आदि मानकर स्वयं को ही सताते आये हो। ʹयह चाहिए….. वह चाहिए… यह समस्या है अतः इसको रिझाऊँ… इसको ठीक करूँ…. डॉक्टर बन जाऊँ…. इंजीनियर बन जाऊँ….ʹ लेकिन ये सब हो भी गये तो आखिर क्या ? अंत में जब मौत आएगी तब ये सब एक झटके में ही छूट जायेंगे।

ʹमैं गरीब हूँ…. धनवान हो जाऊँ…ʹ चलो, बन गये करोड़पति। अरे! हो गये भूपति, तो क्या हो गया काम पूरा ? ʹअब हम करोड़पति हैं… पाँच-पचीस आदमी हमारी इज्जत करते हैं…ʹ यदि ऐसा करके सुखी होना चाहते हो तो यह अहंकार का सुख है। इज्जत देने वाले भी मरने वाले हैं और जिस शरीर को इज्जत मिल रही है वह भी मरने वाला है। इससे आपको क्या मिला ? आपकी तो भ्रांति दृढ़ हुई कि ʹये मेरी इज्जत करते हैं।ʹ शरीर तो जड़ है। शरीर को तो पता ही नहीं है कि क्या इज्जत और क्या बेइज्जती ? आप इज्जत-बेइज्जत से परे हो किन्तु भ्रान्ति से मान लेते हो कि ʹमेरी इज्जत हुई या मेरी बेइज्जती हुई।ʹ जब तक अपने शुद्ध स्वरूप को नहीं जान  पाये, तब तक ʹमैं-मेरे की भ्रान्ति नहीं मिटती।ʹ

श्रीमद् भागवत के छठवें स्कन्ध के 14वें अध्याय में एक प्रसंग आता हैः

शूरसेन देश के चक्रवर्ती सम्राट चित्रकेतु अनेक सुख-सुविधाओं, साधन-सम्पत्तियों, दास-दासियों से सम्पन्न थे एवं उनकी बहुत सी सुन्दर रानियाँ थीं। पृथ्वी का सारा सुख-वैभव उनके अधिकार में था। इतना सब होने पर भी वे भीतर से सुखी एवं शांत न थे।

सुविधा होना अलग बात है, सुख होना अलग बात है। धन होना अलग बात है और तृप्ति होना अलग बात है। किसी के पास धन हो सकता है, सुविधाएं हो सकती हैं लेकिन वह भीतर से सुखी भी हो, यह जरूरी नहीं है।

चित्रकेतु के पास भी बहुत सारी सम्पदा और सुविधाएँ थीं, अनेको रानियाँ थीं फिर भी सदैव चिंतित रहते थे क्योंकि उन्हें कोई पुत्र न था। पुत्र के अभाव में सारी सुविधाएँ उन्हें बेकार लग रही थीं।

एक दिन शाप और वरदान देने में समर्थ अंगिरा ऋषि स्वच्छन्दरूप से विभिन्न लोकों में विचरते हुए राजा चित्रकेतु के महल में पहुँच गये। राजा द्वारा आतिथ्य सत्कार किये जाने के बाद ऋषि अंगिरा ने पूछाः “राजन् ! तुम्हारे मुँह पर किसी आंतरिक चिन्ता के लक्षण दृष्टिगोचर हो रहे हैं। तुम्हारी उदासी का क्या कारण है ?”

चित्रकेतु ने कहाः “भगवन् ! मुझे पृथ्वी का साम्राज्य, ऐश्वर्य और सम्पत्तियाँ, जिनके लिए लोकपाल भी लालायित रहते हैं, प्राप्त हैं। परन्तु सन्तान न होने के कारण मुझे इन सुख-भोगों से तनिक भी शांति नहीं मिल रही है। अब आप ही कृपा करें। मुझे संतान देकर मेरा दुःख दूर करें।”

चित्रकेतु की  प्रार्थना से संतुष्ट होकर सर्वसमर्थ अंगिरा ऋषि ने ʹत्वष्टाʹ देवता के योग्य चरू का निर्माण करके उससे देवता का यजन किया एवं चित्रकेतु से यज्ञ करवाया। यज्ञ का अवशेष प्रसाद चित्रकेतु की सबसे बड़ी रानी कृतद्युति को दिया। महारानी कृतद्युति को गर्भ रह गया। समय पाकर उनके गर्भ से एक सुन्दर पुत्र का जन्म हुआ। पूरे राजमहल में आनंदोत्सव मनाया गया। राजकुमार के जन्म का समाचार पाकर शूरसेन देश की प्रजा भी अत्यन्त आनंदित हो उठी।

संसार का ऐसा कोई सुख नहीं, जिसके पीछे दुःख न लगा हुआ हो। संसार का ऐसा कोई लाभ नहीं, जिसके पीछे हानि न लगी हुई हो। संसार का ऐसा कोई संयोग नहीं, जिसके पीछे वियोग न जुड़ा हुआ हो। एकमात्र भगवान ही ऐसे सुखस्वरूप हैं कि जिनको प्राप्त करके सदा के लिए दु-खों का अंत हो जाता है। बाकी तो प्रत्येक सुख के पीछे दुःख लगा ही रहता है।

यह संसार का अटल नियम है कि जिससे आप अत्यंत प्रीति करोगे, वही आपको आखिर में रूलायेगा। आप यदि चाहो कि ʹजैसा प्रेमभरा व्यवहार पत्नी आज करती है, वैसा ही सदा करती रहे….ʹ तो यह असंभव है। ऐसे ही पत्नी यदि पति से चाहे तो यह भी असंभव है। कोई व्यक्ति, कोई वस्तु, कोई परिस्थिति, कोई भाव और गुण सदा एक जैसे नहीं रह सकते – यह संसार का नियम है।

परिवर्तन प्रकृति का अटल नियम है। सागर से लहरें उठती हैं और समाप्त हो जाती है। यदि आप लहरों को सदा बनाये रखना चाहो या सदा उनका एक-सा प्रवाह चाहो तो यह असंभव है। हवा का रुख यदि पूर्व की ओर होगा तो लहरें पूर्व की ओर चलेंगी और यदि पश्चिम की ओर होगा तो पश्चिम की ओर दौड़ती दिखेंगी। जिस ओर भी हवा का रुख होगा, उसी ओर लहरें दौड़ेंगी। ऐसे ही व्यक्ति का जैसा स्वभाव और उसके गुण रहेंगे, वैसा ही उसका धर्म रहेगा।

न कोई किसी को सुख देता है, न कोई किसी को दुःख देता है। मनुष्य अपनी ही कल्पना से सुखी-दुःखी होता रहता है।

काहू न कोउ सुख दुःख कर दाता। निज कृत करम भोग सबु भ्राता।।

मनुष्य अपने कर्मों का फल ही सुख-दुःख के रूप में भोगता है। अतः उसे चाहिए कि वह कर्म करने में सावधान और भोगने में प्रसन्न रहे। कर्मों के फलस्वरूप सुख-दुःख तो मिलेगा ही, लेकिन उसमें सुखी-दुःखी होना-न-होना यह हमारे हाथ की बात है।

सुख-दुः की चोटें जीवन में, आती हैं, आकर जाती हैं।

ज्ञानी के हृदय में क्षोभ नहीं, मूरख को नाच नचाती हैं।।

सुख भी आया, दुःख भी आया। लाभ भी आया, हानि भी आयी। जीवन आया तो मरण भी आया। ज्ञानी वही है, बुद्धिमान वही है, गुरुभक्त वही है, जो सुख-दुःख, लाभ-हानि, मान-अपमान, निंदा-प्रशंसा आदि सब प्रसंगों में समभाव रहता है क्योंकि संसार में तो ये आते और जाते ही रहेंगे।

जहाँ बजती है शहनाई, वहाँ मातम भी होते हैं…..

ऐसा ही हुआ चित्रकेतु के राजमहल में। जिस रानी से पुत्र उत्पन्न हुआ, उस रानी के प्रति राजा का मोह बढ़ गया। बड़ी उम्र में बेटा हुआ तो बेटे में भी आसक्ति बढ़ गयी।

अन्य रानियों को महसूस हुआ किः ʹराजा अब बड़ी रानी से ज्यादा प्रेम करने लगे हैं और हमारे प्रति राजा का प्रेम कम हो गया है।ʹ अतः उनमें बड़ी रानी के प्रति बहुत द्वेष उत्पन्न हो गया। द्वेष के कारण उनकी बुद्धि मारी गयी और उनके चित्त में क्रूरता छा गयी। अतः उन्होंने द्वेषवश नन्हें से राजकुमार को विष दे दिया।

सगे-सम्बन्धी स्वार्थ के हैं। स्वार्थ का संसार है।।

तुच्छ स्वार्थ के लिए रानियों ने राजा की परवाह न की, बड़ी रानी की चिंता न की, यहाँ तक कि उस नन्हें निर्दोष राजकुमार की भी परवाह न की और उसे जहर देकर मार डाला।

राजकुमार को मरा हुआ देखकर पूरा राजमहल शोक में डूब गया। राजा चित्रकेतु मूर्च्छित हो गये। लोग प्रयत्न करके राजा को ज्यों-ही होश में लाते, त्यों ही वे ʹहाय… मेरा इकलौता बेटा !ʹ कहकर फिर से बेहोश हो जाते।

महर्षि अंगिरा और देवर्षि नारद ने देखा कि राजा चित्रकेतु पुत्रशोक के कारण चेतनाहीन हो रहे हैं। तब वे दोनों वहाँ आये एवं चित्रकेतु को समझाने लगेः “राजन् ! जिसके लिए तुम इतना शोक कर रहे हो, वह बालक इस जन्म औऱ पहले के जन्मों में तुम्हारा कौन था ? तुम उसके कौन थे ? फिर अगले जन्मों में भी उसके साथ तुम्हारे क्या संबंध रहेंगे ?

इस पर जरा विचार करो।

राजन् ! हम तुम और हम लोगों के साथ इस नश्वर जगत में जितने भी प्राणी विद्यमान हैं, वे सब अपने जन्म के पहले नहीं थे और मृत्यु के पश्चात नहीं रहेंगे। इससे सिद्ध है कि इस समय भी उऩका वास्तविक अस्तित्व नहीं है क्योंकि सत्य वस्तु तो सब समय एक-सी रहती है।

वयं च त्वं च ये चेमे तुल्यकालाश्चराचराः।

जन्ममृत्योर्यथा पश्चात प्राङनैवमधुनापि भोः।।

(श्रीमद् भागवतः 6.15.5)

इस प्रकार महर्षि अंगिरा एवं देवर्षि नारद ने अनेक युक्तियों से राजा को समझाया एवं कहाः “राजन् ! तुम मोह के वशीभूत न होओ क्योंकि मोह ही सर्व व्याधियों का मूल है। तुम स्वयं अनुभव कर रही हो कि पुत्रवानों को कितना दुःख होता है। अतः अब तुम अपने मन को विषयों में भटकने से रोककर शांत करो, स्वस्थ करो और उस मन के द्वारा अपने वास्तविक स्वरूप का विचार करके परम शांतिस्वरूप परमात्मा में स्थिर हो जाओ।”

उसके बाद देवर्षि ने मृत राजकुमार के जीवात्मा को शोकाकुल स्वजनों के समक्ष प्रत्यक्ष बुलाकर कहाः “जीवात्मन् ! तुम्हारा कल्याण हो। तुम्हारे माता-पिता एवं स्वजन तुम्हारे वियोग से अत्यंत दुःखी हो रहे हैं, अतः तुम अपने मृत शरीर में वापस आ जाओ और शेष आयु अपने स्वजनों के साथ ही रहकर व्यतीत करो। अपने पिता के दिये हुए भोगों को भोगो और राजसिंहासन पर बैठो।”

जीवात्मा ने कहाः “देवर्षि। मैं अपने कर्मों के अनुसार देवता, मनुष्य, पशु-पक्षी आदि योनियों में न जाने कितने जन्मों से भटक रहा हूँ। कौन किसका बेटा और कौन किसका पिता ? जब तक जिसका जिस वस्तु से संबंध रहता है, तभी तक उसको उस वस्तु से ममता रहती है। जीव नित्य और अहंकाररहित है। वह गर्भ में आकर जब तक जिस शरीर में रहता है, तभी तक उस शरीर को अपना समझता है। उसका न तो कोई अत्यन्त प्रिय है न अप्रिय, न कोई अपना है न पराया।”

यह कहकर जीवात्मा पुनः चला गया।

जीवात्मा की ये बातें सुनकर सभी स्वजन विस्मित हो उठे एवं उनका रहा-सहा मोह भी जाता रहा। राजा चित्रकेतु की बुद्धि में वैराग्य जाग उठा। उन्होंने सोचा कि ʹमेरा बेटा…. मेरा बेटा…ʹ करके मैं अकारण ही मोह कर रहा था। ʹमेरा महल… मेरी रानियाँ… मेरा राज्य….ʹ तो कहता हूँ लेकिन ये सब कब तक मेरे रहेंगे ? जिस चैतन्य परमात्मा की सत्ता से ʹमेरा-मेराʹ कह रहा हूँ, वह परमात्मा ही वास्तव में मेरा है, वही सदा मेरे साथ रहता है। बाकी के ये सब तो दो दिन के रैन बसेरे हैं।

अंगिरा ऋषि और नारदजी के उपदेश से राजा का मोह भंग हो गया। देवर्षि नारद ने राजा चित्रकेतु को सात दिन के अनुष्ठान की विधि बतायी। चित्रकेतु के सत्कर्मों के फलस्वरूप एवं संत-दर्शन के पुण्य के कारण उनका विवेक जाग उठा। उन्होंने देवर्षि नारद के द्वारा बतायी गयी विधि से सात दिन तक केवल जल पीकर बड़ी एकाग्रता से अनुष्ठान किया। उस अनुष्ठान के फलस्वरूप उन्हें विद्याधरों का अखंड आधिपत्य प्राप्त हो गये एवं कुछ ही दिनों में भगवद् दर्शन भी हो गये। अनेक स्तुतियों से राजा ने भगवान की प्रार्थना की। भगवान प्रसन्न हो गये। उन्होंने चित्रकेतु को आशीर्वाद तो दिया ही, साथ ही एक दिव्य विमान भी दिया जो सर्वत्र गति कर सकता था।

विचरण करते-करते राजा एक बार शिवलोक में गये। वहाँ भगवान शिव, पार्वती जी को गोद में बिठाकर ऋषियों को तत्त्वज्ञान का उपदेश दे रहे थे किः “वास्तविक तत्त्व आत्मा है, ब्रह्म है। हम सब उसी में रमण करते हैं। प्राणिमात्र का स्वरूप वही है लेकिन जो उसे नहीं जानते हैं वे इन्द्रियों में, मन में, मिथ्या संसार में रमण करते हैं। हालाँकि रमण करने की सत्ता भी तो उसी चैतन्यस्वरूप की है और वही शुद्ध ब्रह्म है। उसी को साक्षी, द्रष्टा, चिदघन चैतन्य आदि जो कहते है, बाकी तो अपना-आपा है। अपना जो नित्य अनुभव है, जो अपरोक्ष अनुभव है, बस वही वह सत्ता है। यह ʹमैं-मेरा… तू-तेरा…ʹ आदि प्रत्यक्ष है, स्वर्गादि परोक्ष हैं परन्तु अपना जो आत्मस्वरूप है वह अपरोक्ष है। उसे जानने के लिए आँख, कान आदि इन्द्रियों की जरूरत नहीं पड़ती है। वह स्वयंप्रकाश, स्वसंवेद्य है। ऐसा जो जानता है वही मुझ शिव को ठीक से जानता है।”

इस प्रकार शिवजी अति गूढ़ ज्ञान का वर्णन कर रहे थे। राजा होने के कारण चित्रकेतु के मन में निर्णय करने की आदत गहरी घुसी थी कि ʹयह ठीक है और वह ठीक नहीं है…. यह अच्छा है और वह बुरा है… ऐसा होना चाहिए और वैसा नहीं होना चाहिए…ʹ आदत तो सदैव साथ रहती है। राजा यदि बुद्धि को ब्रह्म-परमात्मा में लगाते तो बुद्धि शुद्ध हो जाती, परन्तु उन्होंने ऐसा नहीं किया था इसलिए वे सोचने लगेः ʹशिवजी होकर भी अपनी स्त्री में इतनी आसक्ति रखते हैं ! बातें तो ब्रह्मज्ञान की सुनाते हैं लेकिन स्त्री का आसक्ति नहीं छोड़ पाते हैं। शिवजी को ऐसा रहना ठीक नहीं हैʹ यह सोचकर उन्होंने शिवजी को कुछ भला-बुरा सुना दिया।

भगवान सांबसदाशिव तो गुणातीत, देशातीत, कालातीत, आकाशस्वरूप चैतन्य पद में स्थित थे, परन्तु राजा के द्वारा किया गया शिवजी का यह अपमान माता पार्वती जी से सहन नहीं हुआ। पार्वती जी ने उनकी यह धृष्टता देखकर क्रोध से कहाः “जान पड़ता है कि ब्रह्माजी, भृगु, नारद आदि, उनके पुत्र सनकादि, महर्षि कपिलदेव और मनु आदि बड़े-बड़े महापुरुष धर्म का रहस्य नहीं जानते, तभी वे धर्म-मर्यादा का  उल्लंघन करने वाले भगवान शिव को इस काम से नहीं रोकते।”

माता पार्वती ने सोचाः ʹब्रह्मा आदि समस्त महापुरुष जिनके चरणकमलों का ध्यान करते हैं, उन्हीं मंगलों को मंगल बनाने वाले साक्षात् जगदगुरु भगवान का और उनके अऩुयायी महात्माओं का इस अधम क्षत्रिय ने तिरस्कार किया है और शासन करने की चेष्टा की है। इसलिए यह ढीठ सर्वथा दण्ड का घमण्ड है। जिनकी उपासना बड़े-बड़े सत्पुरुष किया करते हैं, भगवान श्रीहरि के उन चरणकमलों में यह मूर्ख रहने योग्य नहीं है।ʹ

उन्होंने चित्रकेतु को संबोधन कर कहाः “हे दुर्मते ! तुम पापमय असुर योनि में जाओ। ऐसा होन से बेटा ! तुम फिर कभी किसी महापुरुष का अपमान नहीं कर सकोगे।”

जब पार्वती जी ने इस प्रकार चित्रकेतु को शाप दिया तब वे विमान से उतर पड़े और सिर झुकाकर उन्हें प्रसन्न करने लगेः “चित्रकेतु ने कहाः “माता-पार्वती जी ! मैं बड़ी प्रसन्नता से दोनों हाथ जोड़कर आपका शाप स्वीकार करता हूँ, क्योंकि देवता लोग मनुष्यों को जो कुछ कह देते हैं, वह उनके प्रारब्धानुसार मिलने वाले फल की पूर्व सूचनामात्र होती है।

देवी ! यह जीव अज्ञान से मोहित हो रहा है और इसी कारण इस संसार चक्र में भटकता रहता है तथा सदा-सर्वदा एवं  सर्वत्र सुख-दुःख भोगता रहता है।

माता जी ! सुख और दुःख को देने वाली न तो अपनी आत्मा है और न कोई अन्य। जो अज्ञानी हैं, वे ही अपने को अथवा दूसरों को सुख-दुःख का कर्त्ता मानते हैं।

यह जगत सत्त्व-रज-तम आदि गुणों का स्वाभाविक प्रवाह है। इसमें क्या शाप क्या अनुग्रह ? क्या स्वर्ग क्या नरक ? क्या सुख क्या दुःख ? एकमात्र परिपूर्णतम भगवन ही बिना किसी की सहायता के अपनी आत्मस्वरूपिणी माया के द्वारा समस्त प्राणियों की तथा उनके बन्धन मोक्ष और सुख-दुःख की रचना करते हैं। माता जी ! भगवान श्रीहरि सबमें सम और माया आदि मल से रहित हैं। उनका कोई प्रिय-अप्रिय, जाति-बन्धु, अपना-पराया नहीं है। जब सुख में उनका राग नहीं है, तब उनमें राग जन्य क्रोध हो ही कैसे सकता है ? तथापि उनकी माया-शक्ति के कार्य पाप और पुण्य ही प्राणियों के सुख-दुःख, हित-अहित, बन्धन-मोक्ष, जन्म-मरण और आवागमन के कारण बनते हैं। मैं शाप से मुक्त होने के लिए आपको प्रसन्न नहीं कर रहा हूँ। मैं तो यह चाहता हूँ कि आपको मेरी जो बात अनुचित प्रतीत हुई हो, उसके लिए क्षमा करें।

तब भगवान शंकर ने देवता, ऋषि, दैत्य, सिद्ध और पार्षदों के सामने ही भगवती पार्वती जी से यह बात कही।

भगवान शंकर ने कहाः “सुन्दरी ! दिव्यलीलाविहारी भगवान के निःस्पृह और उदारहृदय दासानुदासों की महिमा तुमने अपनी आँखों देख ली।

जो लोग भगवान के शरणागत होते हैं, वे किसी से भी नहीं डरते क्योंकि उऩ्हें स्वर्ग, मोक्ष और नरकों में भी एक वस्तु के केवल भगवान के ही दर्शन होते हैं।

जीवों को भगवान की लीला से ही देह का संयोग होने के कारण सुख-दुःख, जन्म-मरण और शाप-अनुग्रह आदि द्वन्द्व प्राप्त होते हैं। जैसे स्वप्न में भेद-भ्रम, सुख-दुःख आदि की प्रतीति होती है और जाग्रत अवस्था में भ्रमवश रस्सी में ही सर्पबुद्धि होती है, वैसे ही मनुष्य अज्ञानवश आत्मा में देवता, मनुष्य आदि भेद तथा गुण-दोष आदि की कल्पना कर लेता है।

जिनके पास ज्ञान और वैराग्य बल है और जो भगवान वासुदेव के चरणों में भक्तिभाव रखते हैं उनके लिए इस जगत में ऐसी कोई वस्तु नहीं है जिसे वे हेय या उपादेय समझकर राग-द्वेष करें।

भगवान को न कोई प्रिय है और न अप्रिय। उनका न कोई अपना है न पराया। वे सभी प्राणियों की आत्मा हैं, इसलिए सभी प्राणियों के प्रियतम हैं। प्रिये ! यह परम भाग्यवान चित्रकेतु उन्हीं का प्रिय अनुचर, शांत एवं समदर्शी है और मैं भी भगवान श्रीहरि का ही प्रिय हूँ।

इसलिए तुम भगवान के प्यारे भक्त, शान्त, समदर्शी, महात्मा पुरुषों के सम्बन्ध में किसी प्रकार का आश्चर्य नहीं करना चाहिए।”

ये ही विद्याधर चित्रकेतु दानव योनि का आश्रय लेकर त्वष्टा के दक्षिणाग्नि से पैदा हुए, वहाँ इनका नाम वृत्रासुर हुआ और वहाँ भी वे भगवद् स्वरूप के ज्ञान एवं भक्ति से परिपूर्ण ही रहे।

शरीर चाहे पशु का मिले या असुर का, चाहे किसी भी योनि में जन्म लेना पड़े लेकिन हमारे मन से भगवद् भक्ति नहीं जानी चाहिए। भगवान की भक्ति ही सर्वश्रेष्ठ एवं सदा सुखदायी है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, फरवरी 2000, पृष्ठ संख्या 9-14, अंक 86

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शिवजी का अनोखा वेशः देता है दिव्य संदेश


महाशिवरात्रि दिनांक 4 मार्च 2000

संत श्री आसारामजी बापू के सत्संग-प्रवचन से

यस्यांकि य विभाति भूधरसुता देवापगा मस्तके।

भाले बालविधुर्गले च गरलं यस्योरसि व्यालराट्।

सोयं भूतिविभूषणः सुरवरः सर्वाधिपः सर्वदा।

शर्वः सर्वगतः शिवः शशिनिभः श्रीशंकरः पातु माम्।।

ʹजिनकी गोद में हिमाचलसुता पार्वतीजी, मस्तक पर गंगाजी, ललाट पर द्वितीया का चंद्रमा, कंठ में हलाहल विष और वक्षःस्थल पर सर्पराज शेषजी सुशोभित हैं, वे भस्म से विभूषित, देवताओं में श्रेष्ठ सर्वेश्वर, संहारकर्ता (या भक्तों के पापनाशक), सर्वव्यापक, कल्याणस्वरूप, चन्द्रमा के समान शुभ्रवर्ण श्रीशंकरजी सदा मेरी रक्षा करें।ʹ

ʹशिवʹ अर्थात् कल्याण-स्वरूप। भगवान शिव तो हैं ही प्राणिमात्र के परम हितैषी, परम कल्याणकारक लेकिन उनका बाह्य रूप भी मानवमात्र को एक मार्गदर्शन प्रदान करने वाला है।

शिवजी का निवास-स्थान है कैलास शिखर। ज्ञान हमेशा धवल शिखर पर रहता है अर्थात् ऊँचे केन्द्रों में रहता है जबकि अज्ञान नीचे के केन्द्रों में रहता है। काम, क्रोध, भय आदि के समय मन-प्राण नीचे के केन्द्र में, मूलाधार केन्द्र में रहते हैं। मन और प्राण अगर ऊपर के केन्द्रों में हो तो वहाँ काम टिक नहीं सकता।

शिवजी को काम ने बाण मारा लेकिन शिवजी की निगाहमात्र से ही काम जलकर भस्म हो गया। आपके चित्त में भी यदि कभी काम आ जाये तो आप भी ऊँचे केन्द्रों में आ जाओ ताकि वहाँ काम की दाल न गल सके।

कैलास शिखर धवल है, हिमशिखर धवल है और वहाँ शिवजी निवास करते हैं। ऐसे ही जहाँ सत्त्वगुण की प्रधानता होती है, वहीं आत्मशिव रहता है।

शिवजी की जटाओं से गंगा जी निकलती है अर्थात् ज्ञानी के मस्तिष्क में से ज्ञानगंगा बहती है। उनमें तमाम प्रकार की ऐसी योग्यताएँ होती हैं कि जिनसे जटिल-से-जटिल समस्याओं का समाधान भी अत्यंत सरलता से हँसते-हँसते हो जाता है।

शिवजी के मस्तक पर द्वितीया का चाँद सुशोभित होता है अर्थात् जो ज्ञानी हैं वे दूसरों का नन्हा सा प्रकाश, छोटा सा गुण भी शिरोधार्य करते हैं। शिवजी ज्ञान के निधि हैं, भण्डार हैं, इसीलिए तो किसी के भी ज्ञान का अनादर नहीं करते हैं वरन् आदर ही करते हैं।

शिवजी ने गले में मुण्डों की माला धारण की है। कुछ विद्वानों का मत है कि ये मुण्ड किसी साधारण व्यक्ति के मुण्ड नहीं, वरन् ज्ञानवानों के मुण्ड हैं।

जिनके मस्तिष्क में जीवनभर ज्ञान के विचार ही रहे हैं, ऐसे ज्ञानवानों की स्मृति ताजी करने के लिए उन्होंने मुण्डमाला धारण की है। कुछ अन्य विद्वानों के मतानुसार शिवजी ने गले में मुण्डों की माला धारण करके हमें बताया है कि गरीब हो चाहे धनवान्, पठित हो चाहे अपठित, माई हो या भाई लेकिन अंत समय में सब खोपड़ी छोड़कर जाते हैं। आप अपनी खोपड़ी में चाहे कुछ भी भरो, आखिर वह यहीं रह जाती है।

भगवान शंकर देह पर भभूत रमाये हुए हैं क्योंकि वे शिव हैं, कल्याणस्वरूप हैं। लोगों को याद दिलाते हैं कि चाहे तुमने कितना ही पद-प्रतिष्ठावाला, गर्व भरा जीवन बिताया हो, अंत में तुम्हारी देह का क्या होने वाला है, वह मेरी देह पर लगायी हुई भभूत बताती है। अतः इस चिताभस्म को याद करके आप भी मोह-ममता और गर्व को छोड़कर अंतर्मुख हो जाया करो।

शिवजी के अन्य आभूषण हैं बड़े विकराल सर्प। अकेला सर्प होता है तो मारा जाता है लेकिन यदि वह सर्प शिवजी के गले में, उनके हाथ पर होता है तो पूजा जाता है। ऐसे ही आप संसार का व्यवहार केवल अकेले करोगे तो मारे जाओगे लेकिन शिवतत्त्व में डुबकी मारकर संसार का व्यवहार करोगे तो आपका व्यवहार भी आदर्श व्यवहार बन जायेगा।

शिवजी के हाथों में त्रिशूल एवं डमरू सुशोभित हैं। इसका तात्पर्य यह है कि वे सत्त्व, रज एवं तम – इन तीन गुणों के आधीन नहीं होते, वरन् उन्हें अपने आधीन रखते हैं और जब प्रसन्न होते हैं तब डमरू लेकर नाचते हैं।

कई लोग कहते हैं कि शिवजी को भाँग का व्यसन है। वास्तव में तो उऩ्हें भुवन भंग करने का यानी सृष्टि का संहार करने का व्यसन है, भाँग पीने का नहीं। किन्तु भंगेड़ियों ने ʹभुवन भंगʹ में से अकेले ʹभंगʹ शब्द का अर्थ ʹभाँगʹ लगा लिया और भाँग पीने की छूट ले ली।

उत्तम माली वही है जो आवश्यकता के अनुसार बगीचे के काँट-छाँट करता रहता है, तभी बगीचा सजा-धजा रहता है। अगर वह बगीचे में काट-छाँट न करे तो बगीचा जंगल में बदल जाये। ऐसे ही भगवान शिव इस संसार के उत्तम माली हैं, जिन्हें भुवनों को भंग करने का व्यसन है।

शिवजी के यहाँ बैल-सिंह, मोर-साँप-चूहा आदि परस्पर विपरीत स्वभाव के प्राणी भी मजे एक साथ निर्विघ्न रह लेते हैं। क्यों ? शिवजी की समता के प्रभाव से। ऐसे ही जिसके जीवन में समता है वह विरोधी वातावरण में, विरोधी विचारों मे भी बड़े मजे से जी लेता है।

जैसे, आपने देखा होगा की गुलाब के फूल को देखकर बुद्धिमान व्यक्ति प्रसन्न होता है किः ʹकाँटों के बीच भी वह कैसे महक रहा है ! जबकि फरियादी व्यक्ति बोलता है किः ʹएक फूल और इतने सारे काँटे ! क्या यही है संसार, कि जिसमें जरा सा सुख और कितने सारे दुःख !ʹ

जो बुद्धिमान है, शिवतत्त्व का जानकार है, जिसके जीवन में समता है, वह सोचता है कि जिस सत्ता से फूल खिला है, उसी सत्ता ने काँटों को भी जन्म दिया है। जिस सत्ता ने सुख दिया है, उसी सत्ता ने दुःख को भी जन्म दिया है। सुख-दुःख को देखकर जो उसके मूल में पहुँचता है, वह मूलों के मूल महादेव को भी पा लेता है।

इस प्रकार शिवतत्त्व में जो जगे हुए हैं उन महापुरुषों की तो बात ही निराली है लेकिन जो शिवजी के बाह्य रूप को ही निहारते हैं वे भी अपने जीवन में उपरोक्त दृष्टि ले आयें तो उनकी भी असली शिवरात्रि, कल्याणमयी रात्रि हो जाये….

महाशिवरात्रि का पूजन

फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी अर्थात् महाशिवरात्रि। पृथ्वी पर शिवलिंग के स्थापन का जो दिवस है, भगवान शिव के विवाह का जो दिवस है और प्राकृतिक नियम के अनुसार जीव शिव के एकत्व में मदद करने वाले ग्रह-नक्षत्रों के योग का जो दिवस है – वही है महाशिवरात्रि का पावन दिवस। यह रात्रि-जागरण करने की रात्रि, आराधना-उपासना करने की रात्रि है।

शिवजी की आराधना निष्काम भाव से कहीं भी की जा सकती है किन्तु सकाम भाव से आराधना विधि-विधानपूर्वक की जाती है। जिन्हें संसार से सुख-वैभव लेने की इच्छा होती है वे भी शिवजी की आराधना करते हैं और जिन्हें सदगति प्राप्त करनी होती है, वे भी शिवजी की आराधना करते हैं।

शिवजी की पूजा का विधान यह है कि पहले जहाँ शिवजी की स्थापना की जाती है वहाँ से फिर उनका स्थानांतर नहीं होता, उनकी जगह नहीं  बदली जाती। शिवजी की पूजा के निर्माल्य (पत्र-पुष्प, पंचामृतादि) का उल्लंघन नहीं किया जाता। इसीलिए शिवजी के मंदिर की पूरी प्रदक्षिणा नहीं होती क्योंकि पूरी  प्रदक्षिणा करने से निर्माल्य उल्लंघित हो जाता है।

शिवलिंग विविध द्रव्यों से बनाये जाते हैं। अलग-अलग द्रव्यों से बने शिवलिंगों के पूजन के फल भी अलग-अलग प्रकार के होते हैं। जैसे, ताँबे के शिवलिंग के पूजन से आरोग्य-प्राप्ति होती है। पीतल के शिवलिंग के पूजन से यश, आरोग्य-प्राप्ति एवं शत्रुनाश होता है। चाँदी के शिवजी बनाकर पूजा करने से पितरों का कल्याण होता है। सुवर्ण के शिवजी बनाकर पूजा करने से तीन पीढ़ियों तक घर में धन-धान्य बना रहता है। मणि-माणेक का शिवलिंग बनाकर उसकी पूजा करने से बुद्धि, आयुष्य, धन, ओज-तेज बढ़ता है लेकिन ब्रह्मचिंतन करने से ये चीजें स्वाभाविक ही प्रगट होने लगती हैं। परमात्मतत्त्व में, शिवतत्त्व में डुबकी मारने से बुद्धि का प्रकाश बढ़ने लगता है, पितरों का उद्धार होने लगता है, चित्त की चंचलता मिटने लगती है, दिल की दरिद्रता दूर होने लगती है एवं मन में शांति आने लगती है। शिवपूजन का महाफल यही है कि मनुष्य शिवतत्त्व को प्राप्त हो जाये।

शिवरात्रि को भक्ति भाव से रात्रि-जागरण किया जाता है। जल, पंचामृत, फल-फूल एवं बिल्वपत्र से शिवजी का पूजन करते हैं। बिल्वपत्र में तीन पत्ते होते हैं जो सत्त्व, रज एवं तमोगुण के प्रतीक हैं। हम अपने ये तीनों गुण शिवार्पण करके गुणों से पार हो जायें, यही इसका हेतु है। पंचामृत पूजा क्या है ? पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश इन पंचमहाभूतों का ही सारा भौतिक विलास  है। इन पंचमहाभूतों का विलास जिस चैतन्य की सत्ता से हो रहा है उस चैतन्यस्वरूप शिव में अपने अहं को अर्पित कर देना, यही पंचामृत-पूजा है। धूप और दीप द्वारा पूजा माने क्या ? धूप का तात्पर्य है अपने ʹशिवोઽहमʹ की सुवास, ʹआनन्दोઽहम्ʹ की सुवास और दीप का तात्पर्य है आत्मज्ञान का प्रकाश।

चाहे जंगल या मरुभूमि में क्यों न हो, रेती या मिट्टी के शिवजी बना लिये, पानी के छींटे मार दिये, जंगली फूल तोड़कर धर दिय और मुँह से ही नाद बजा दिया तो शिवजी प्रसन्न हो जाते हैं एवं भावना शुद्ध होने लगती है।

आशुतोष जो ठहरे ! जंगली फूल भी शुद्ध भाव से तोड़कर शिवलिंग पर चढ़ाओगे तो शिवजी प्रसन्न हो जाते हैं और यही फूल कामदेव ने शिवजी को मारे तो शिवजी नाराज हो गये। क्यों ? क्योंकि फूल फेंकने के पीछे कामदेव का भाव शुद्ध नहीं था, इसीलिए शिवजी ने तीसरा नेत्र खोलकर उसे भस्म कर दिया। शिवपूजा में वस्तु का मूल्य नहीं, भाव का मूल्य है।

भावो हि विद्यते देवा….

आराधना का एक तरीका यह है कि पत्र, पुष्प, पंचामृत, बिल्वपत्रादि से चार प्रहर पूजा की जाये। दूसरा तरीका यह है कि मानसिक पूजा की जाये।

कभी-कभी योगी लोग इस रात्रि का सदुपयोग करने का आदेश देते हुए कहते हैः “आज की रात्रि तुम ऐसी जगह पसंद कर लो कि जहाँ तुम अकेले बैठ सको, अकेले टहल सको, अकेले घूम सको, अकेले जी सको। फिर तुम शिवजी की मानसिक पूजा करो और उसके बाद अपनी वृत्तियों को निहारो, अपने चित्त की दशा को निहारो। चित्त मे जो-जो आ रहा है और जो-जो जा रहा है उस आऩे जाने को निहारते-निहारते आने जाने की मध्यावस्था को जान लो।

दूसरा तरीका यह है कि चित्त का एक संकल्प उठा और दूसरा उठने को है, उस शिवस्वरूप व आत्मस्वरूप मध्यावस्था को तुम मैं रूप में स्वीकार कर लो, उसमें टिक जाओ।

तीसरा तरीक यह भी है कि किसी नदी या जलाशय के किनारे बैठकर जल की लहरों को एकटक देखते जाओ अथवा तारों को निहारते-निहारते अपनी दृष्टि को उन पर केन्द्रित कर दो। दृष्टि बाहर की लहरों पर केन्द्रित है औऱ वह दृष्टि केन्द्रित है कि नहीं, उसकी निगरानी मन करता है और मन निगरानी करता है कि नहीं करता है, उसको निहारने वाला मैं कौन हूँ ? गहराई से इसका चिंतन करते-करते आप परम शांति में भी विश्रांति कर सकते हो।

चौथा तरीका यह है कि जीभ न ऊपर हो न नीचे हो बल्कि तालू के मध्य में हो और जिह्वा पर ही आपकी चित्तवृत्ति स्थिर हो। इससे भी मन शांत हो जायेगा और शांत मन में शांत शिवतत्त्व का साक्षात्कार करने की क्षमता प्रगट होने लगेगी।

साधक चाहे तो कोई भी तरीका अपना कर शिवतत्त्व में जगने का यत्न कर सकता है। महाशिवरात्रि का यही उत्तम पूजन है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, फरवरी 2000, पृष्ठ संख्या 15-18, अंक 86

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मन एक कल्पवृक्ष


मन के साथ यदि मित्रता की जाये, विवेक से उसे उच्च लक्ष्य की ओर मोड़ा जाये तो वह बड़ा लाभ दे सकता है और यदि उसकी अधीनता स्वीकार करके, उसके कहे में आकर बह गये तो वह वह मन बड़ी हानि भी पहुँचा सकता है। इसीलिए शास्त्रों ने कहा हैः

मनः एव मनुष्याणां कारणं बंधमोक्षयोः।

ʹमन ही मनुष्य के बंधन और मुक्ति का कारण है।ʹ

यदि मन अनात्म देह में, अनात्म भोगों में, अनात्म जगत में आकर स्थित होता है तो वह मनुष्य का शत्रु हो जाता है और वही मन अगर आत्मा-परमात्मा की ओर आकर्षित होता है, परमात्म-संबंधी बातों का श्रवण, मनन और निदिध्यासन करता है तो वह मन मित्र का काम करता है और सूक्ष्मता को पाकर परम सूक्ष्म परमात्मतत्त्व का साक्षात्कार भी कर लेता है।

मन जितना-जितना सूक्ष्म होता जायेगा, उतनी-उतनी विश्रांति अच्छी लगेगी और जितनी-जितनी विश्रांति लेंगे, उतना-उतना मन सूक्ष्म होगा।

मनुष्य का मन जितना स्थूल होगा, उसे जगत उतना सच्चा लगेगा, भोगों के प्रति आकर्षण होगा और वह तुच्छ होता जायेगा। जितना-जितना उसे जगत स्वप्न जैसा लगेगा, भोगों से उपरामता होगी और उसका मन सूक्ष्म होता जायेगा एवं विश्रांति लेता जायेगा, उतना-उतना वह व्यक्ति महान होता जायेगा।

चित्त की विश्रांति क्यों नहीं होती ? ध्यान क्यों नहीं लगता ?

हम बदलने वाले संसार को, बदलने वाली परिस्थितियों को हृदय में इतनी जगह दे बैठे हैं कि चित्त की विश्रांति नहीं हो पाती है। अगर अपने स्वरूप को पाने की इच्छा उत्पन्न हो जाये और तत्संबंधी प्रयास करें तो विश्रांति पाना आसान हो जाये। तेरह निमेष तक परब्रह्म परमात्मा में विश्रांति पाने से जगतदान करने का फल प्राप्त होता है। सत्रह निमेष तक उस सच्चिदानंद परमात्मा में डूबने से अश्वमेध यज्ञ करने का फल मिलता है और यदि कोई आधा घण्टा तक उस परमात्मस्वरूप में विश्रांति पा ले तो वह यक्ष, गंधर्व, किन्नरों और देवताओं से भी पूजे जाने योग्य हो जाता है।

यदि कोई प्रारंभिक जिज्ञासु है, ईश्वर की ओर चल रहा है, उसके सामने दो-चार कर्त्तव्य एक साथ आ जाते हैं और वह व्यावहारिक कर्त्तव्यों को मूल्य देता है, स्थूल जगत को सत्य मानकर जीनेवालों की बातों को मूल्य देता है तो बेचारा उलझ जाता है और उसका समय उसी में नष्ट हो जाता है। अगर वह विवेकशील है तो कर्त्तव्य उसे व्यवहार में तो खींचेंगे जैसे, पत्नी के प्रति कर्त्तव्य, पति के प्रति कर्त्तव्य, समाज के प्रति कर्त्तव्य और देह के प्रति कर्त्तव्य… फिर भी वह इन कर्त्तव्यों में उलझेगा नहीं और उसका अपना जो वास्तविक कर्त्तव्य है – अपने आत्मस्वरूप को जानने का,  उसी को महत्त्व देगा।

व्यक्ति की जैसी मति और जैसा उसका संग होगा वैसे ही कर्त्तव्यों को वह मूल्य देगा। अगर उसकी मति श्रेष्ठ है, उसका संग ऊँचा है तो वह ऊँचे कर्त्तव्यों को मूल्य देगा। यदि उसकी मति मध्यम है तो वह मध्यम कर्त्तव्यों को मूल्य देगा और यदि उसकी मति हल्की है तथा उसका संग भी हल्का है तो फिर वह निम्न कर्त्तव्यों को मूल्य देगा।

स्वामी रामतीर्थ कहा करते थेः “कर्ज लेकर, उधार लेकर बेटे बेटियों की शादी की खुशी मनाना-हाय रे तेरा फर्ज ! … घूस लेकर, रिश्वत लेकर भी ठाठ-बाट करना – हाय रे तेरा फर्ज !…. छल-कपट करके भी देह-वस्त्र-घर को सजाना-हाय रे तेरा फर्ज !…. हे मानव ! क्या तेरा यही फर्ज है ? जिंदगी भर चिन्ताओं की गठरियाँ उठाते रहना, अन्तःकरण को मलिन करते रहना-क्या यही तेरा फर्ज है ? नहीं, तेरा मुख्य फर्ज है आत्मसिंहासन पर आने का, अपने आत्मराज्य में आने का, अपने असंग स्वभाव में नहीं आयेगा और प्रकृति के स्वभाव में बहता रहेगा तो फिर कौन से शरीर में तू अपना वास्तविक फर्ज निभायेगा ?”

जब मानव का विवेक सजाग हो उठता है तब उसे ये विचार सहज ही आने लगते हैं किः ʹमैं कब तक सामान्यजों की नाईं राग-द्वेष, अस्मिता और अभिनिवेश में आकर अपना जीवन बरबाद करता रहूँगा ? एक दिन…. दो दिन… सप्ताह… मास… वर्ष…. ऐसा करते-करते समय बीतता चला जा रहा है और जो करने जैसा कार्य है – आत्मस्वरूप में विश्रांति पाने का – उसकी मुझे सुधि तक नहीं है ! मैं कब तक ऐसी माया में फँसा रहूँगा ?…ʹ इस प्रकार का जगा हुआ विवेक मनुष्य को सहज ही में परमात्मप्राप्ति के लक्ष्य की ओर प्रेरित करने लगता है, संसार के भोगों से वैराग्य बढ़ाने लगता है और वह पहुँच जाता है किसी संत-महापुरुष के सान्निध्य में।

भोगी पुरुष की अधिक सेवा करने से बुद्धि मंद हो जाती है, नीच प्रकृति के व्यक्तियों की सेवा करने से लाभ नहीं, वरन् हानि ज्यादा होती है जबकि उच्च प्रकृति के व्यक्तियों की सेवा करने और उनके सान्निध्य़ से परम लाभ होता है। इसीलिए तुलसीदास जी ने कहा हैः

एक घड़ी आधी घड़ी, आधी में पुनि आध।

तुलसी संगत साध की, हरे कोटि अपराध।

साधु कौन है ? साध्यते परम कार्यं येन सः साधुः।

जिसने अपना परम कार्य साध लिया है, उसे ʹसाधुʹ कहते हैं। मनुष्य को चाहिए कि वह प्रयत्नपूर्वक साधु पुरुषों की संगति करे एवं उनके मार्गदर्शन के अनुसार साधना करके लक्ष्य-प्राप्ति के पथ पर अग्रसर होता रहे।

तुलसीदास जी ने कहा हैः

यह तन करू फल विषय न भाई।

इस शरीर का फल यह नहीं है कि विषय-भोग मिलें। इस मानवशरीर का फल तो है अपने स्वामी को, परम प्यारे को, परम हितैषी परमात्मा को जानना। गीता में भगवान ने कहा भी हैः

सुहृदं सर्वभूतानां….. ʹमैं प्राणिमात्र का सुहृद हूँ।ʹ वास्तव में केवल वही परमात्मा सबका सुहृद है। संसार के जो लोग बाहर से सुहृद दिखते हैं वे तो चार छः दिन के या केवल शमशान तक के सुहृद हैं, जबकि वह परम सुहृद परमात्मा तो सदियों से हमारे साथ था, है और रहेगा। हम उस परम सुहृद से जुड़ जायें तो हमारा बेड़ा पार हो जाये।

यह हम जानते हैं फिर भी उससे जुड़ नहीं पाते। क्यों ? क्योंकि हम मन-इन्द्रियों से जुड़ जाते हैं, जगत को सच्चा मानकर उससे जुड़ जाते हैं और उसी में इतने उलझे जाते हैं कि उस परम सुहृद से, उस अपने आत्मस्वरूप से जुड़ने का समय ही नहीं मिलता। हालाँकि हम सभी यह जानते हैं कि जगत के ये संबंध सदैव रहने वाले नहीं हैं फिर भी हम उसी के पीछे लगे रहते हैं।

भोले बाबा ने बड़ी सुंदर बात कही हैः

मानव ! तुझे नहीं याद क्या, तू ब्रह्म का ही अंश है ?

कुलगोत्र तेरा ब्रह्म है, सदब्रह्म का तू वंश है।।

संसार तेरा घर नहीं, दो चार दिन रहना यहाँ।

कर याद अपने राज्य की, स्वराज्य निष्कंटक जहाँ।।

जो बदलती हुई चीजों को ʹमेराʹ मान लेता है और साधन को ʹमैंʹ मान लेता है तथा वास्तविक साध्य का जिसको पता नहीं है, जिसके लिए साधन मिला है उस उद्देश्य का जिसको पता नहीं है – वह संसारी है। आँख देखने का साधन है, कान सुनने का साधन है, मन सोचने का साधन है, बुद्धि निर्णय करने का साधन है। इन साधनों का उपयोग करके  हम चाहें तो अपने परम लक्ष्य परमात्मतत्त्व को पा सकते हैं लेकिन इन साधनों को ही ʹमैंʹ मानने की गलती कर बैठते हैं इसीलिए बार-बार जन्मते-मरते रहते हैं।

यह जरूरी नहीं कि हर जन्म में ये ही साधन और ऐसी ही बुद्धि मिले। यदि पशु-योनि मिलती है तो बुद्धि बहुत घट जाती है, मन की योग्यताएँ कम हो जाती हैं, शरीर की योग्यताएँ भी बदल जाती हैं। अरे, मनुष्य जन्म में ही बाल्यावस्था, युवावस्था और वृद्धावस्था में मन-बुद्धि-इन्द्रियों की क्षमता में अंतर आ जाता है, इतर योनियों की तो बात ही क्या ? बचपन का मन बेवकूफी से भरा हुआ होता है, जवानी का मन विषय-विकारों से भरा हुआ होता है और बुढ़ापे का मन फरियाद से भरा हुआ होता है। लेकिन बचपन, जवानी और बुढ़ापा तो देह की अवस्थाएँ हैं, आपकी नहीं। आप न बालक हो न जवान हो  न बूढ़े हो। वास्तव में जो आप हो उसमें न फरियाद है, न  विकार है और न ही बेवकूफी है। आप तो सबमें व्याप्त, सदा एकरस आत्मा हो। अपने उस वास्तविक स्वरूप को जान लो तो हो जाये बेड़ा पार…

इसके लिए श्रवण, मनन और निदिध्यासन का सहयोग लो। जिसका अंतःकरण अत्यंत शुद्ध है वह तो श्रवणमात्र से ज्ञान पा सकता है। जिसके कुछ कल्मष शेष हैं वह पहले जप-ध्यानादि करके अंतःकरण को शुद्ध करे, यत्नपूर्वक श्रवण, मनन एवं निदिध्यासन करे, तब उसे बोध होगा जो उससे भी ज्यादा बहिर्मुख है उसका मन तो जप-ध्यानादि में भी शीघ्र नहीं लगेगा। अतः वह पहले निष्काम सेवा के द्वारा अंतःकरण को शुद्ध करे। ज्यों-ज्यों अंतःकरण शुद्ध होता जायेगा, त्यों-त्यों जप ध्यान में मन लगता जायेगा। फिर वह सत्शास्त्र एवं सदगुरु के वचनों का श्रवण करे, मनन एवं निदिध्यासन करे तो ज्ञान को पा लेगा।

साधक को चाहिए कि वह सजातीय वृत्तियों का आदर करे और विजातीय वृत्तियों का त्याग कर दे। सजातीय वृत्ति क्या है ? जो आत्मज्ञान के मार्ग पर हैं उनसे आत्मज्ञान संबंधी शास्त्रों का श्रवण, मनन एवं आत्मवेत्ता महापुरुषों के सान्निध्य में रहने का भाव ʹसजातीय वृत्तिʹ है।

आत्मज्ञान के पथिक को संसारी सुख के प्रसंगों से तो बचना ही चाहिए, संसारी सुख में जो उलझे हुए हैं ऐसे संसारियों से भी बचना चाहिए।

इस प्रकार सावधानी, सतर्कता, विवेक एवं वैराग्य को अपनाकर आप भी उसी तत्त्व को पा सकते हो, जिसमें भगवान श्रीराम, भगवान श्रीकृष्ण, ब्रह्माजी, भगवान शिव एवं अन्य अनेकों नामी अनामी महापुरुष रमण कर रहे हैं।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, फरवरी 2000, पृष्ठ संख्या 19-22, अंक 86

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