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Brahmcharya

शरीर का तीसरा उपस्तंभः ब्रह्मचर्य


ब्रह्मचर्य शरीर का तीसरा उपस्तंभ है । (पहला उपस्तंभ आहार व दूसरा निद्रा है, जिनका वर्णन पिछले अंकों में किया गया है । ) शरीर, मन, बुद्धि व इन्द्रियो को आहार से पुष्टि, निद्रा, मन, बुद्धि व इऩ्द्रियों को आहार से पुष्टि, निद्रा से विश्रांति व ब्रह्मचर्य से बल की प्राप्ति होती है ।

ब्रह्मचर्य परं बलम् ।

ब्रह्मचर्य का अर्थः

कर्मणा मनसा वाचा सर्वावस्थासु सर्वदा ।

सर्वत्र मैथुनत्यागो ब्रह्मचर्यं प्रचक्षते ।।

‘सर्व अवस्थाओं में मन, वचन और कर्म तीनों से मैथुन का सदैव त्याग हो, उसे ब्रह्मचर्य कहते हैं ।’ (याज्ञवल्क्य संहिता)

ब्रह्मचर्य से शरीर को धारण करने वाली सप्तम धातु शुक्र की रक्षा करती है । शुक्र सम्पन्न व्यक्ति स्वस्थ, बलवान, बुद्धिमान व दीर्घायुषी होते हैं । वे कुशाग्र व निर्मल बुद्धि, तीव्र स्मरणशक्ति, दृढ़ निश्चय, धैर्य, समझ व सद्विचारों से सम्पन्न तथा आनंदवान होते हैं । वृद्धावस्था तक उनकी सभी इन्द्रियाँ, दाँत, केश व दृष्टि सुदृढ़ रहती है । रोग सहसा उनके पास नहीं आते । क्वचित् आ भी जायें तो अल्प उपचारों से शीघ्र ही ठीक हो जाते हैं ।

भगवान धन्वंतरि ने ब्रह्मचर्य की महिमा का वर्णन करते हुए कहा हैः

मृत्युव्याधिजरानाशि पीयूषं परमौषधम् ।

सौख्यमूलं ब्रह्मचर्यं सत्यमेव वदाम्यहम् ।।

‘अकाल मृत्यु, अकाल वृद्धत्व, दुःख, रोग आदि का नाश करने के सभी उपायों में ब्रह्मचर्य का पालन सर्वश्रेष्ठ उपाय है । यह अमृत के समान सभी सुखों का मूल है यह मैं सत्य कहता हूँ ।’

जैसे दही में समाविष्ट मक्खन का अंश मंथन प्रक्रिया से दही से अलग हो जाता है, वैसे ही शरीर के प्रत्येक कण में समाहित सप्त धातुओं का सारस्वरूप परमोत्कृष्ट ओज मैथुन प्रक्रिया से शरीर से अलग हो जाता है । ओजक्षय से व्यक्ति असार, दुर्बल, रोगग्रस्त, दुःखी, भयभीत, क्रोधी व चिंतित होता है ।

शुक्रक्षय के लक्षण (चरक संहिता) शुक्र के क्षय होने पर व्यक्ति में दुर्बलता, मुख का सूखना, शरीर में पीलापन, शरीर व इन्द्रियों में शिथिलता (अकार्यक्षमता), अल्प श्रम से थकावट व नपुंसकता ये लक्षण उत्पन्न होते हैं ।

अति मैथुन से होने वाली व्याधियाँ- ज्वर (बुखार), श्वास, खाँसी, क्षयरोग, पाण्डू, दुर्बलता, उदरशूल व आक्षेपक (Convulsions- मस्तिष्क के असंतुलन से आनेवाली खेंच) आदि ।

ब्रह्मचर्य रक्षा के उपायः

ब्रह्मचर्य-पालन का दृढ़ शुभसंकल्प, पवित्र, सादा रहन-सहन, सात्त्विक, ताजा अल्पाहार, शुद्ध वायु-सेवन, सूर्यस्नान, व्रत-उपवास, योगासन, प्राणायाम, ॐकार का दीर्घ उच्चारण, ‘ॐ अर्यामायै नमः’ मंत्र का पावन जप, शास्त्राध्ययन, सतत श्रेष्ठ कार्यों में रत रहना, सयंमी व सदाचारी व्यक्तियों का संग, रात को जल्दी सोकर ब्राह्ममुहूर्त में उठना, प्रातः शीतल जल से स्नान, प्रातः-सांय शीतल जल से जननेन्द्रिय-स्नान, कौपीन धारण, निर्व्यसनता, कुदृश्य-कुश्रवण-कुसंगति का त्याग, पुरुषों के लिए परस्त्री के प्रति मातृभाव, स्त्रियों के लिए परपुरुष के प्रति पितृ या भ्रातृ भाव – इन उपायों से ब्रह्मचर्य की रक्षा होती है । स्त्रियों के लिए परपुरुष के साथ एकांत में बैठना, गुप्त वार्तालाप करना, स्वच्छंदता से घूमना, भड़कीले वस्त्र पहनना, कामोद्दीपक श्रृंगार करके घूमना – ये ब्रह्मचर्य पालन में बाधक हैं । जितना धर्ममय, परोपकार-परायण व साधनामय जीवन, उतनी ही देहासक्ति क्षीण होने से ब्रह्मचर्य का पालन सहज-स्वाभाविक रूप से हो जाता है । नैष्ठिक ब्रह्मचर्य आत्मानुभूति में परम आवश्यक है ।

गार्हस्थ्य ब्रह्मचर्यः

श्री मनु महाराज ने गृहस्थाश्रम में ब्रह्मचर्य की व्याख्या इस प्रकार की हैः

ऋतुः स्वाभाविकः स्त्रीणां रात्रयः षोडश स्मृताः ।

चतुर्भिरितरैः सार्द्धं अहोभिः सद्विगर्हिते ।।

अपनी धर्मपत्नी के साथ केवल ऋतुकाल में समागम करना, इसे गार्हस्थ्य ब्रह्मचर्य कहते हैं ।

रजोदर्शन के प्रथम दिन से सोलहवें दिन तक ऋतुकाल माना जाता है । इसमें मासिक धर्म की चार रात्रियाँ तथा ग्यारहवीं व तेरहवीं रात्रि निषिद्ध है । शेष दस रात्रियों से दो सुयोग्य रात्रियों में स्वस्त्री-गमन करने वाला व्यक्ति गृहस्थ ब्रह्मचारी है ।

श्री सुश्रुताचार्य जी ने इस गार्हस्थ्य ब्रह्मचर्य की प्रशंसा करते हुए कहा हैः

आयुष्मन्तो मन्दजरा वपुर्वर्णबलान्विताः ।

स्थिरोपचितमासाश्च भवन्ति स्त्रीषु संयता  ।।

‘स्त्रीप्रसंग में संयमी पुरुष आयुष्मान व देर से वृद्ध होने वाले होते हैं । उनका शरीर शोभायमान, वर्ण और बल से युक्त तथा स्थिर व मजबूत मांसपेशियों वाला होता है ।’

(सुश्रुत संहिताः चिकित्सास्थानम् 24.112)

इस प्रकार आहार, निद्रा व ब्रह्मचर्य का युक्तिपूर्वक सेवन व्यक्ति को स्वस्थ, सुखी व सम्मानित जीवन की प्राप्ति में सहायक होता है ।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, फरवरी 2009, पृष्ठ संख्या 27,28 अंक 194

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चरित्र की पवित्रता


चरित्र की पवित्रता हर कार्य में सफल बनाती है। जिसका जीवन संयमी है, सच्चचरित्रता से परिपूर्ण है उसकी गाथा इतिहास के पन्नों पर गायी जाती है। हरि सिंह नलवा का व्यक्तित्व ऐसा ही था।

पंजाब के पड़ोसी काबुल द्वारा बार-बार पंजाब के सीमावर्ती इलाकों पर आक्रमण हो रहा था। उसका सामना करने के लिए प्रधान सेनापति हरिसिंह नलवा के नेतृत्व में सेना ने काबुल की ओर प्रस्थान किया।

हरिसिंह के शौर्य के आगे काबुली सेना ज्यादा देर न टिक सकी। उनका सरदार हरिसिंह के हाथों मारा गया।

काबुली सरदार की पुत्री मेहर खूबसूरत भी थी और वीरांगना भी। उसने अपने पिता की मृत्यु का बदला लेना चाहा। उसने सोचाः ‘यदि आमने सामने प्रतिशोध पूरा न कर सकी तो रूप जाल में फँसाकर हरिसिंह को खत्म कर दूँगी। आखिर वह अभी युवा है और बहादुर होने का साथ मोहक भी है। उसका प्रचंड पौरूष मेरे रूप लावण्य के आगे न टिक सकेगा।’

एक दिन उसे हरिसिंह के तंबू का सुराग मिल ही गया। वह रात्रि के अँधेरे में अकेली ही तलवार लेकर निकल पड़ी। रात्रि का दूसरा पहर बीत रहा था, किंतु हरिसिंह के सैनिक पूरी तरह सजाग थे। उन्होंने मेहर को रोक दिया और पूछाः

“इस मध्य रात्रि में इस तरह अकेली क्यों आयी हो ?”

मेहरः “तुम्हारे सेनापति से मिलना है।”

प्रहरी चौंका कि इतनी रात में ! उसने कहाः “तुम सुबह आओ। वैसे भी हमारे सेनापति स्त्रियों से दूर रहते हैं। तुम यहाँ से चली जाओ।”

मेहरः “असंभव ! मैं हरि सिंह से मिले बिना नहीं जाऊँगी। तुम उनसे जाकर कह दो कि काबुल के सरदार की बेटी मेहर आयी है।”

हरिसिंह ने सुना तो उसे सादर बुला लिया।

मध्य रात्रि थी, पूर्ण एकांत था और मेहर की वेशभूषा एवं श्रृंगार उसे और अधिक मादक बना रहा था, लेकिन हरि सिंह किसी और ही धातु के बने थे। उन्होंने मेहर की ओर एक नजर डालकर मुस्कुराते हुए कहाः “बैठो, बहन  !”

हरिसिंह की निश्छल मुस्कान और ‘बहन’ के संबोधन को सुनकर मेहर के हृदय का सारा प्रतिशोध ठंडा हो गया। वह आश्चर्यचकित होकर बोल उठीः

“आपने मुझे ‘बहन’ कहा ?”

हरिसिंहः “हाँ। तुम उम्र में मुझसे कुछ छोटी ही होगी। इसलिए मेरी छोटी बहन के समान हो। हमें तुम्हारे पिता के मारे जाने का बेहद अफसोस है। पर, तुम हमारी मजबूरी समझने की कोशिश करो। क्या तुम अपने यहाँ के लोगों के आतंक से परिचित नहीं हो ? हमारी लगातार चेतावनी से भी जब वे बाज नहीं आये, तब हमें सैनिक अभियान के लिए विवश होना पड़ा।”

मेहर इस सत्य से अवगत थी, लेकिन अबी तक उसे विश्वास नहीं हो रहा था कि कोई व्यक्ति इतना संवेदनशील और उज्जवल चरित्रवाला भी हो सकता है, क्योंकि उसके देश में यह असंभव सा था। उसने नतमस्तक होते हुए कहाः

“भाईजान ! हमने आपकी बहादुरी के बहुत किस्से सुने थे। पर आज जान लिया कि उसका वास्तविक रहस्य क्या है।”

तब हरिसिंह ने कहाः “मेरे ही नहीं, किसी के भी शौर्य का रहस्य उसके उज्जवल चरित्र में निहित होता है।”

वस्तुतः, मनुष्य की सर्वश्रेष्ठ संपत्ति उसका उज्जवल चरित्र ही है। जिसके जीवन में चरित्र की पवित्रता है उसका जीवन सदैव सफलताओं से भरपूर रहता है। वह साहसी, निडर, बुद्धिमान एवं धैर्यवान होता है। क्षमा, दया आदि सदगुण उसके जीवन सहज ही खिलने लगते हैं।

हे भारत के नौजवानों ! तुम भी इस रहस्य को जान लो। पाश्चात्य भोगवाद के अंधानुकरण से बचो। अपने देश भारत के वीर, साहसी एवं ऐतिहासिक पुरुषों के जीवन से प्रेरणा लेकर अपने जीवन को भी चरित्र की पवित्रता से सुरभित होने दो…..युवाधन सुरक्षा के उपायों को अपनाकर, संतों-महापुरुषों का सान्निध्य एवं मार्गदर्शन पाकर अपने जीवन को तो उन्नत करो ही, साथ ही, दूसरों को भी उन्नति की ओर चलने के लिए प्रेरित करो। सबकी उन्नति में ही देश की  उन्नति निहित है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, दिसम्बर 2001, पृष्ठ संख्या 20,21 अंक 108

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उचित और सुख को एक कर दें


संत श्री आशारामजी बापू के सत्संग-प्रवचन से

ज्यों-ज्यों भगवद् ज्ञान और भगवद् सुख मिलता है त्यों-त्यों संसार से वैराग्य होता है और ज्यों-ज्यों संसार से वैराग्य होता है त्यों-त्यों भगवदरज्ञान और भगवदसुख में स्थिति होती है।

एक होता है उचित, दूसरा होता है सुख। उचित और सुख को एक कर दो तो जीवन परम सुख परमात्मा से सराबोर हो जायेगा और आप जीवन्मुक्त हो जायेंगे।

उचित और सुख को जब अलग कर देते हैं तो जीवन विक्षिप्त हो जाता है, दुःखी हो जाता है, अनुचित हो जाता है। जैसे संयम करना, ब्रह्मचर्य पालना उचित है लेकिन देखा किसी युवती को, उसके हाव-भाव को अथवा युवती ने देखा युवक को, उसके हाव-भाव को किः ‘बड़ा अच्छा लड़का है, सुदृढ़ है, मेरी तरफ देखता भी है….’ तो यह उचित नहीं है। अनुचित करने में सुख की लालच हो जाती है। जब सुख की लालच को महत्त्व देते हैं तो अनुचित करने लगते हैं और अनुचित का फल भी अनुचित होता है।

सत्य बोलना उचित है, धोखा करना अऩुचित है लेकिन देखते हैं किः ‘झूठ बोलने से लाभ हो रहा है…. धोखा करने से इतना मिल रहा है….’ तो उचित को छोड़ देते हैं और अनुचित करने लगते हैं। फिर अनुचित का परिणाम भी देर-सवेर अनुचित ही आयेगा।

नौकरी करते थे एक सज्जन। रिश्वत का पैसा उचित नहीं है-ऐसा सोचकर नहीं लिया। दूसरे ऑफिसरों की नजरों में वे मूर्ख साबित हो रहे थे। लेकिन उनका विचार उचित था तो निर्भीकता थी और मितव्ययी बनकर जीते थे।

फिर अनुचित करने वालों के सम्पर्क में आये और थोड़ा सा ले लिया…. अनुचित हो गया। अनुचित ढंग से आया वह दस साल रहा फिर ऐसे गया जैसे रूई के गोदाम में आग लगी हो। सब धन चला गया। कोर्ट खा गया, कुछ इधर उधर हो गया। अनुचित करने का फल उन्हें भोगना पड़ा।

अतः सुख और उचित-इन दोनों को अलग न किया जाये। जो उचित है वही सुखस्वरूप है, भले अभी वह दुःखरूप दिखता हो। जो उचित है वही सत्य है। सत्य ही उचित है, असत्य उचित नहीं है। जो सत्य है वह शाश्वत है। जो सत्य है वह चेतन है। जो सत्य है वह आनन्दस्वरूप है।

आप होशियार बनो। अपना ज्ञान बढ़ाओ। अपना ज्ञान….. नश्वर का ज्ञान नहीं। ‘मैं कौन हूँ ? जीव किसको बोलते हैं ? ईश्वर किसको बोलते हैं ? माया किसको बोलते हैं ?’ इसी प्रकार अपना ज्ञान बढ़ाओ, दूसरों का ज्ञान  बढ़ाओ।

सत्+चित्+आनंद = सच्चिदानंद परमेश्वर की शरण जायें। शरीर की शरण न जायें। अनुचित की शरण न जायें। उचित की शरण जायें।

जब उचित और सुख एक होता है तो आपके कदम ठीक जगह पर पड़ते हैं, ठीक निर्णय होते हैं, ठीक प्रयत्न होते हैं, ठीक परिणाम आते हैं। यदि दैवयोग से, प्रारब्ध से, वातावरण से, राजनीति से कहीं आपका शोषण अथवा अन्याय होता है फिर भी आप उचित ढंग से सह लेते हैं तो भीतर से आप बलवान रहेंगे।

अनुचित ढंग से राजनीति से, इधर से, उधर से कहीं पोषण भी होता हो, थोड़ा सुख भी मिलता हो लेकिन अंदर से आप खोखले हो जायेंगे। बिल्कुल पक्की बात है।

उचित और सुख का पार्थक्य कर देंगे तो उचित छोड़ देंगे और अनुचित करके सुखी होने की बेवकूफी करेंगे। अनुचित ढंग से खाकर मजा लिया फिर बीमार हुए। अनुचित ढंग से व्यवहार किया, उस समय मजा आया लेकिन बाद में भुगतना पड़ता है।

कहावत है न, दूध का दूध और पानी का पानी।

आज उचित का महत्त्व नहीं रहा…. धर्म का, शास्त्र का, नियम का, सदाचार का, दूसरे की भलाई का महत्त्व नहीं रहा। अपने को मजा आ जाये, अपनी भलाई हो जाये…… फिर अनुचित ढंग से हो जाये तो हो जाये।

ऐसा करने लगे हैं तो सभी दुःखी हैं। दुःख बढ़ गया है। सेठ भी दुःखी है तो नौकर भी दुःखी है। माई भी दुःखी है, भाई भी दुःखी है। पठित भी दुःखी है, अनपढ़ भई दुःखी है। अधिकारी भी दुःखी है, कर्मचारी भी दुःखी है।

अनुचित करके सुखी होने की गलती मिटाने को कटिबद्ध हो जायें। इसमें सहायता मिलती है भगवन्नाम से, शास्त्र-पठन से, अपने जीवन में कुछ व्रत-नियम के पालन से। अपने जीवन में कोई न कोई बढ़िया व्रत-नियम ले लें। व्रत –नियम को ध्यान के समय भी दुहरायें। इससे उस व्रत-नियम का पालन करने में मदद मिलती है।

जो उचित नहीं है वह भविष्य में सुखकारक नहीं है, भले अभी लगे। अतः उचित करेंगे। संयम उचित है, विकार अनुचित है। मौन उचित है, अति बोलना अनुचित है। नियम से खाना-पीना उचित है, अनियमित रूप से खाना-पीना अनुचित है। गृहस्थी है तो संयम से संसार-व्यवहार करना उचित है लेकिन अमावस्या, पूनम, एकादशी, जन्मदिवस अथवा महीने में एक से अधिक बार पति-पत्नी का व्यवहार अनुचित है। आज से अनुचित बंद। ऐसे ही प्रदोष काल में भोजन और मैथुन अनुचित है तो बंद।

जप करना, ध्यान करना, दान करना, पुण्य करना, सत्संग करना, स्वाध्याय करना, सेवा करना, नम्र बनना, आप अमानी रहना दूसरों को मान देना, अभय रहना, सत्त्वसंशुद्धि रखना, अहिंसक रहना, चोरी न करना, ब्रह्मचर्य का पालन करना यह उचित है। उचित का वरण…. इससे सुख की, सफलता की प्राप्ति होगी और मुक्ति की यात्रा अवश्य पूर्ण होगी।

रहते हैं मंदिर में, मस्जिद में, चर्च में, लेकिन अनुचित करेंगे तो चर्च क्या करें ? मस्जिद क्या करे ? मंदिर क्या करे ? रहते हैं मंदिर-मस्जिद में और उचित करते हैं तो मंदिर-मस्जिद का विशेष लाभ मिलेगा। जरा-जरा बात में झूठ बोलेंगे, आलसी बन जायेंगे, चोरी करेंगे तो फिर अनुचित करने पर उचित जगह का लाभ विशेष नहीं मिलता। इसलिए अनुचित न करें। अगर हो गया है तो व्यक्त करके दुबारा न करने का दृढ़ संकल्प कर लें। जो अनुचित करके भी सुखी होना चाहते हैं वे ज्यादा बीमार होते हैं, ज्यादा दुःखी होते हैं। इसलिए उचित और सुख को अलग न करें। जो उचित है, वही सुखकर है। अतः सदैव उचित का ही वरण करें और अनुचित का त्याग करें।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मई 2001, पृष्ठ संख्या 4-6, अंक 101

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