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Brahmcharya

आत्मसंयम


जिसने जीभ को नहीं जीता वह विषय वासना को नहीं जीत सकता।

मन में सदा यह भाव रखें कि हम केवल शरीर के पोषण के लिए ही खाते हैं, स्वाद के लिए नहीं। जैसे पानी प्यास बुझाने के लिए पीते हैं वैसे ही अन्न केवल भूख मिटाने के लिए ही खाना चाहिए। हमारे माँ बाप बचपन से ही हमें इसकी उलटी आदत डालते हैं। हमारे पोषण के लिए नहीं बल्कि अपना प्यार दिखाने के लिए हमें तरह-तरह के स्वाद चखाकर हमें बिगाड़ते हैं।

विषय वासना को जीतने का रामबाण उपाय रामनाम या ऐसा कोई और मंत्र। मुझे बचपन से रामनाम जपना सिखाया गया था, उसका सहारा मुझे मिलता ही रहता है। जप करते समय भले ही हमारे मन में दूसरे विचार आया करते हैं फिर भी जो श्रद्धा रखकर मंत्र का जप करता ही जायेगा उसे अतं में विघ्नों पर विजय अवश्य मिलेगी। इसमें मुझे तनिक भी सन्देह नहीं है कि यह मंत्र उसके जीवन की डोर बनेगा और उसे सभी संकटों से उबारेगा। इन मंत्रों का चमत्कार हमारी नीति की रक्षा करने में है और ऐसा अनुभव हर एक प्रयत्न करने वाले को थोड़े ही दिनों में हो जायेगा। इतना याद रहे कि मंत्र तोते की तरह न रटा जाये। उसे ज्ञानपूर्वक जपना चाहिए। अवांछित विचारों के निवारण की भावना और मंत्र शक्ति में विश्वास रखकर जो जीभ को वश में रखेगा, ब्रह्मचर्य उसके लिए आसान से आसान चीज हो जायेगा। प्राणीशास्त्र का अध्ययन करने वाले कहते हैं कि पशु ब्रह्मचर्य का जितना पालन करता है मनुष्य उतना नहीं करता। हम इसके कारण की खोज करें तो देखेंगे कि पशु अपनी जीभ पर काबू रखता है, इरादा और कोशिश करके नहीं बल्कि स्वभाव से ही। वह जीने के लिए खाता है, खाने के लिए नहीं जीता पर हमारा रास्ता तो इसका उलटा ही है। माँ बच्चे को तरह तरह के स्वाद चखाती है, वह  मानती है कि अधिक से अधिक चीजें खिलाना ही उसे प्यार करने का तरीका है। माँ बाप हमारे शरीर को ढकते हैं। अगर हम समझें की कपड़ों से हमें लाद देते हैं, हमें सजाते सँवारते हैं, पर हम इससे कहीं अधिक सुंदर बन सकते हैं। कपड़े बदन को ढकने के लिए हैं, उसे सर्दी गर्मी से बचाने के लिए हैं, सजाने के लिए नहीं।

स्वाद भूख में रहता है। भूखे को सूखी रोटी में जो स्वाद मिलता है वह तृप्त को लड्डू में नहीं मिलता। हम तो पेट में ठूँस-ठूँसकर भरने के लिए तरह-तरह के मसाले काम में लाते हैं और विविध व्यंजन बनाते हैं फिर कहते हैं कि ब्रह्मचर्य टिकता नहीं। जो आँखें ईश्वर ने हमें अपना स्वरूप देखने के लिए दी हैं उन्हें हम मलीन करते हैं। अश्लील उपन्यास, कुसाहित्य, अश्लील दृश्य, सिनेमा आदि देखने में लगाते हैं। जो देखने की चीजें हैं उन्हें देखने की रूचि नहीं है। शबरी भीलन ने जो देखा, मीरा ने जो देखा, ध्रुव-प्रह्लाद, सुलभा ने जो देखा, महारानी मदालसा ने जो देखा और अपनी संतानों को दिखाया वह यदि आज का मानव देख ले तो स्वर्ग, वैकुण्ठ आदि कल्पना का विषय नहीं रहेगा बल्कि यहीं अभी स्वर्गीय सुख का उपभोग कर सकता है।

ईश्वर जैसा कुशल सूत्रधार दूसरा कोई नहीं मिल सकता और न आकाश से अच्छी दूसरी रंगशाला मिल सकती है, पर कौन माता बच्चे की आँखें धोकर उसे आकाश के दर्शन कराती है ? बच्चे की प्रथम पाठाशाला घर ही है। आजकल घरों में बच्चों को जाने-अनजाने जो शिक्षा मिल रही है वह उसके तथा माता-पिता के भविष्य व राष्ट्र के लिए कितना घातक है। यह विचारणीय है। देश के बुद्धिजीवियों व कर्णधारों को गंभीरतापूर्वक इस विषय पर विचार करना चाहिए। महात्मा गाँधी।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अप्रैल 2001, पृष्ठ संख्या 24, अंक 100

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सेहत और सावधानियाँ


आयुर्वेद के तीन उपस्तम्भ हैं- आहार निद्रा और ब्रह्मचर्य।

जीवन में सुख-शांति व समृद्धि प्राप्त करने के लिए स्वस्थ शरीर की नितान्त आवश्यकता है क्योंकि स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन और विवेकवती कुशाग्र बुद्धि प्राप्त हो सकती है। मनुष्य को स्वस्थ रहने के लिए उचित निद्रा, श्रम, व्यायाम और संतुलित आहार अति आवश्यक है। पाँचों इन्द्रियों के विषयों के सेवन की गलतियों के कारण ही मनुष्य रोगी होता है। इसमें भोजन की गलतियों का सबसे अधिक महत्त्व है।

गलत विधि से गलत मात्रा में अर्थात आवश्यकता से अधिक या बहुत कम भोजन करने से, या अहितकर भोजन के सेवन से मन्दाग्नि और मन्दाग्नि से कब्ज रहने लगता है। तब आँतों में रुका हुआ मल सड़कर आम व दूषित रस बनाने लगता है। यह दूषित रस ही सारे शरीर में फैलकर विविध प्रकार के रोग उत्पन्न करता है। उपनिषदों में भी कहा गया हैः आहारशुद्धो सत्त्वशुद्धिः। शुद्ध आहार से मन शुद्ध रहता है। साधारणतः सभी व्यक्तियों के लिए आहार के कुछ नियमों को जानना अत्यन्त आवश्यक है। जैसेः

प्रातःकाल 10 से 12 और सायंकाल 6 से 8 बजे का समय भोजन के लिए श्रेष्ठ माना जाता है। एक बार आहार ग्रहण करने के बाद दूसरी बार आहार ग्रहण करने के बीच कम से कम तीन घण्टों का अन्तर अवश्य होना चाहिए क्योंकि इन तीन घण्टों की अवधि में आहार की पाचन-क्रिया संपन्न होती है। यदि दूसरा आहार इसी बीच ग्रहण करें तो पूर्वकृत आहार का कच्चा रस इसके साथ मिलकर दोष उत्पन्न कर देगा।

रात्रि में आहार के पाचन में समय अधिक लगता है इसीलिये रात्रि को प्रथम प्रहर में ही भोजन कर लेना चाहिए। शीत ऋतु में रात बड़ी होने के कारण सुबह जल्दी भोजन कर लेना चाहिए और गर्मियों में दिन बड़े होने के कारण सायंकाल का भोजन जल्दी कर लेना उचित है।

अपनी प्रकृति के अनुसार यथावश्यक मात्रा में भोजन करना चाहिए। आहार की मात्रा व्यक्ति की पाचकाग्नि और शारीरिक बल के अनुसार निर्धारित होती है। स्वभाव से हल्के पदार्थ जैसे कि चावल, मूँग, दूध, अधिक मात्रा में ग्रहण करना सम्भव है परन्तु उड़द, चना तथा पिट्ठी के पदार्थ स्वभावतः भारी होते हैं, जिन्हें कम मात्रा में लेना ही उपयुक्त रहता है।

आहार ग्रहण करते समय सर्वप्रथम मधुर, बीचे में खट्टे और नमकीन तथा अन्त में तीखे, कड़वे व कसैले पदार्थों का सेवन करना उचित है।

भोजन के पहले अदरक और सेंधा नमक का सेवन  सदा हितकारी होता है। वह जठराग्नि को प्रदीप्त करता है और भोजन के प्रति रूचि पैदा करता है तथा जीभ एवं कण्ठ की शुद्धि करता है।

भोजन गर्म और स्निग्ध होना चाहिए। गरम भोजन स्वादिष्ट लगता है, पाचकाग्नि को तेज करता है और भोजन शीघ्र पच जाता है। यह वायु को निकाल देता है और कफ को सुखा देता है। स्निग्ध भोजन शरीर को मजबूत बनाता है, उसका बल बढ़ाता है और वर्ण में भी निखार लाता है।

बहुत जल्दी जल्दी अथवा बहुत देर तक, बोलते हुए अथवा हँसते हुए भोजन नहीं करना चाहिए।

भोजन के बीच-बीच में प्यास लगने पर थोड़ा-थोड़ा पानी पीना चाहिए परन्तु बाद में पीना हानिकारक है। भोजन के बाद तक्र (छाछ) का सेवन हितकर है और अनेक रोगों से बचाने वाला है।

अच्छी तरह भूख एवं प्यास लगना, शरीर में उत्साह उत्पन्न होना एवं हल्कापन महसूस होना, शुद्ध डकार आना और दस्त साफ आना-ये आहार के ठीक प्रकार से पाचन होने के लक्षण हैं।

धन्वन्तरि आरोग्य केन्द्र, साबरमती, अमदावाद।

दालचीनी

भारत में दालचीनी के वृक्ष हिमालय तथा पश्चिमी तट पर पाये जाते हैं। इस वृक्ष की छाल ʹदालचीनीʹ के नाम से प्रसिद्ध है।

यह रस में तीखी, कड़वी तथा मधुर होती है। उष्ण-तीक्ष्ण होने के कारण दीपन, पाचन और विशेष रूप से कफ का नाश करने वाली है। यह अपने मधुर रस से पित्त का शमन और उष्ण वीर्य़ होने से वात का शमन करती है। अतः त्रिदोषशामक है।

औषध-प्रयोग

मुँह के रोगः यह मुख की शुद्धि तथा उसके दुर्गन्ध का नाश करने वाली है। अजीर्ण अथवा ज्वर के कारण गला सूख गया हो तो इसका एक टुकड़ा मुँह में रखने से प्यास बुझती है तथा उत्तम स्वाद उत्पन्न होता है। इससे मसूढ़ भी मजबूत होते हैं।

दंतशूल व दंतकृमिः इसके तेल में भिगोया हुआ रुई का फाहा दाँत के मूल में रखने से दंतशूल तथा दंतकृमियों का नाश होता है। 5 भाग शहद में इसका एक भाग चूर्ण मिलाकर दाँत पर लगाने से भी दंतशूल में राहत मिलती है।

पेट के रोगः 1 चम्मच शहद के साथ इसका 1.5 ग्राम (एक चने जितनी मात्रा) चूर्ण लेने से पेट का अल्सर नष्ट हो जाता है।

दालचीनी, इलायची और तेजपत्र का समभाग मिश्रण करें। इसका 1 ग्राम चूर्ण 1 चम्मच शहद के साथ लेने से पेट के अनेक विकार जैसे मंदाग्नि, अजीर्ण, उदरशूल आदि में राहत मिलती है।

सर्दी, खाँसी, जुकामः इसका 1 ग्राम चूर्ण एवं 1 ग्राम सितोपलादि चूर्ण 1 चम्मच शहद के साथ लेने से सर्दी, खाँसी में तुरन्त राहत मिलती है।

क्षयरोग (टी.बी.)- इसका 1 ग्राम चूर्ण 1 चम्मच शहद में सेवन करने से कफ आसानी से  छँटने लगता है एवं खाँसी से राहत मिलती है। दालचीनी का यह सबसे महत्त्वपूर्ण उपयोग है।

रक्तविकार एवं हृदयरोगः दालचीनी रक्त की शुद्धि करने वाली है। इसका 1 ग्राम चूर्ण 1 ग्राम शहद में मिलाकर सेवन करने से अथवा दूध में मिलाकर पीने से रक्त में उपस्थित कोलेस्ट्रोल की अतिरिक्त मात्रा घटने लगती है। अथवा इसका आधा से एक ग्राम चूर्ण 200 मि.ली. पानी में धीमी आँच पर उबालें। 100 मि.ली. पानी शेष रहने पर उसे छानकर पी लें। इससे भी कोलेस्ट्रोल की अतिरिक्त मात्रा घटती है।

गरम प्रकृति वाले लोग पानी में दूध मिश्रित कर इसका उपयोग कर सकते हैं। इस प्रयोग से रक्त की शुद्धि होती है एवं हृदय को बल प्राप्त होता है।

सामान्य वेदनाः इसका एक चम्मच (छोटा) चूर्ण 20 ग्राम शहद एवं 40 ग्राम पानी में मिलाकर स्थानिक मालिश करने से कुछ ही मिनटों में वात के कारण होने वाले दर्द से छुटकारा मिलता है।

इसका एक ग्राम चूर्ण और दो चम्मच शहद 1 कप गुनगुने पानी में मिलाकर नित्य सुबह-शाम पीने से संधिशूल में राहत मिलती है।

वेदनायुक्त सूजन तथा सिरदर्द में इसका चूर्ण गरम पानी में मिलाकर लेप करें।

बिच्छू के दंशवाली जगह पर इसका तेल लगाने से दर्द कम होता है।

वृद्धावस्थाः बुढ़ापे में रक्तवाहिनियाँ कड़क और रूक्ष होने लगता है। एक चने जितना दालचीनी का चूर्ण शहद में मिलाकर नियमित सेवन करने से इन लक्षणों से राहत मिलती हैं। इस प्रयोग से त्वचा पर झुर्रियाँ नहीं पड़तीं, शरीर में स्फूर्ति बढ़ती है और श्रम से जल्दी थकान नहीं आती।

मोटापाः इसके 1.5 ग्राम चूर्ण का काढ़ा बना लें। उसमें 1 चम्मच शहद मिलाकर सुबह खाली पेट तथा सोने से पहले पियें। इससे मेद कम होता है।

त्वचा विकारः दालचीनी का चूर्ण और शहद समभाग कर दाद, खाज तथा खुजलीवाले स्थान पर लेप करने से कुछ ही दिनों में त्वचा के ये विकार मिट जाते हैं।

सोने से पूर्व इसका 1 चम्मच चूर्ण 3 चम्मच शहद में मिलाकर मुँह की खीलों पर अच्छी तरह से मसलें। सुबह चने का आटा अथवा उबटन लगाकर गरम पानी से चेहरा साफ कर लें। इससे खील-मुँहासे मिटते हैं।

बालों का झड़नाः दालचीनी का चूर्ण, शहद और गरम औलिव्ह तेल 1-1 चम्मच लेकर मिश्रित करें और उसे बालों की जड़ों में धीरे-धीरे मालिश करें। पाँचट मिनट के बाद सिर को पानी से धो लें। इस प्रयोग से बालों का झड़ना कम हो जाता है।

सावधानीः दालचीनी उष्ण-तीक्ष्ण तथा रक्त का उत्क्लेश करने वाली है अर्थात रक्त में पित्त की मात्रा बढ़ाने वाली। इसके अधिक सेवन से शरीर में गर्मी उत्पन्न होती है। अतः गरमी के दिनों में इसका लगातार सेवन न करें। इसके अत्यधिक उपयोग से नपुंसकता आती है।

सेवफल

सेवफल भोजन पचाता है, खुद भी जल्दी पचता है। वात-वित्त से होने वाले रोगों का भी शमन करता है। दाँत और मसूढ़ों में मजबूती लाता है। अग्नि पर सेंककर खाने से पेट के सभी रोगों का शमन करता है। भोजन बंद करके दिन में सेब ही खाना शुरु कर दें तो पेट व दाँत की बीमारियों एवं कमजोरी में लाभ होता है।

साँईं श्री लीलाशाहजी महाराज उपचार केन्द्र, जहाँगीरपुरा, वरियाव रोड, सूरत।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जनवरी 2001, पृष्ठ संख्या 28-30, अंक 97

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मनोनिग्रह की महिमा


एक मनोवैज्ञानिक मीमांसा

पूज्यपाद संत श्री आसारामजी बापू

लोग कहते हैं कि यह प्रगति का युग है लेकिन वास्तव में यह भारी अवनति का युग है। आज के जवानों के साथ बड़ा अन्याय हो रहा है। चारों ओर से उन पर विकारों को भड़काने वाले आक्रमण होते रहते हैं।

एक तो वैसे ही पशु-प्रवृत्तियाँ यौन उच्छृंखलता की ओर प्रोत्साहित करती हैं, सामाजिक परिस्थितियाँ भी उसी ओर आकर्षण बढ़ाती हैं…. इस पर उस प्रवृत्तियों को वैज्ञानिक समर्थन मिलने लगे और संयम को हानिकारक बताया जाने लगे…. कुछ तथाकथित आचार्य भी, फ्रायड जैसे नास्तिक अधूरे मनोवैज्ञानिक के व्यभिचार-शास्त्र का आधार देकर ʹसंभोग से समाधिʹ का उपदेश देने लगे तब तो ईश्वर ही ब्रह्मचर्य और दाम्पत्यजीवन की पवित्रता का रक्षक है।

सेक्स को ऊर्ध्वगामी बनाकर जो उल्लास, प्रसन्नता, प्रमोद और आनंद मिलता है, योगशास्त्र में उसकी बड़ी प्रशंसा की गई है और उस सुख को काम सुख से सदैव बढ़कर बताया गया है। यौनाकर्षण तो क्षणिक सुख की प्रेरणा देता है। यौनाकर्षण से आंशिक सुख भले ही मिल जाता है लेकिन बाद में शरीर और आत्मा की दुर्गति होती है। मनुष्य के विचार और क्रिया कलाप सब अधोगामी होते चले जाते हैं। व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन में उपद्रव खड़े हो जाते हैं।

आँकड़े बताते हैं कि आज पाश्चात्य देशों में यौन सदाचार की कितनी दुर्गति हुई है। इस दुर्गति के परिणामस्वरूप वहाँ के व्यक्तिगत जीवन में रोग इतने बढ़े हैं कि अमेरिका से तीन गुनी ज्यादा बस्ती भारत में होने पर भी भारत से 10 गुनी ज्यादा दवाइयाँ अमेरिका में खर्च होती हैं। मानसिक रोग इतने बढ़े हैं कि हर दस अमेरिकन में एक को मानसिक रोग होता है। दुर्वासनाएँ इतनी बढ़ी हैं कि हर वर्ष में 20 लाख कन्याएँ विवाह के पूर्व ही गर्भवती हो जाती हैं। मुक्त साहचर्य (Free Sex) के हिमायती होने के कारण शादी के पहले वहाँ प्रायः हर व्यक्ति जातीय संबंध बनाने लगता है। इसी की वजह से 65 प्रतिशत शादियाँ तलाक में बदल जाती हैं और मनुष्य के लिए प्रकृति के निर्धारित संयम का उपवास करने के कारण प्रकृति ने उनको जातीय रोगों का शिकार बना रखा है। उऩमें मुख्यतः एड्स की बीमारी दिन दुनी-रात चौगुनी फैलती जा रही है। वहाँ के पारिवारिक जीवन में क्रोध, कलह, असंतोष और संताप एवं सामाजिक जीवन में अशांति, उच्छृंखलता, उद्दंडता और शत्रुता का महाभयानक वातावरण छा गया है। विश्व की 4 प्रतिशत जनसंख्या अमेरिका में है। उसके उपयोग के लिए विश्व की 40 प्रतिशत साधन सामग्री (जैसे कि कार, टी.वी., एयरकंडिशन्ड घर आदि) जुटा रखी है फिर भी अपराधवृत्ति इतनी बढ़ी है कि हर 10 सेकंड में एक सेंधमारी होती है, हर लाख व्यक्तियों में से 425 व्यक्ति कारागार में सजा भोग रहे हैं जबकि भारत में हर लाख व्यक्ति में से 23 व्यक्ति जेल में रहते हैं। 1992 के वर्ष में अमेरिका में कुल 1 करोड़ 40 लाख अपराध पुलिस रेकार्ड पर दर्ज किये गये हैं।

इन तथ्यों का मूल कारण यही है कि पाश्चात्य लोगों ने फ्रायड के व्यभिचारशास्त्र का अनुकरण किया। मनोविज्ञानी फ्रायड ने कहा कि काम-वासना की अतृप्त इच्छाएँ ही मनोविकारों को उत्पन्न करती हैं और उस अपराध से प्रतिभा कुण्ठित होती है। मानसिक ही नहीं, शारीरिक स्वास्थ्य पर भी बुरा असर पड़ता है और व्यक्तित्व दब जाता है। उन्मुक्त कामसेवन की वकालत करते हुए उस पर लगे प्रतिबन्धों को हानिकारक बताया। उसका अनुकरण करने वाले पश्चिमी देशों में तो उल्टे ही परिणाम देखने को मिले।

इससे यह स्पष्ट होता है कि काम को संयत न किया जायेगा तो मनुष्य पशु से भी बदतर हो जायेगा। पूर्व के देशों में लोग नैतिक और धार्मिक मूल्यों के कारण मानसिक रोगों से, शारीरिक रोगों से और सामाजिक अव्यवस्था से उतने पीड़ित नहीं हैं जितने पाश्चात्य देशों के लोग पीड़ित हैं। अतः पाश्चात्य अंधानुकरण से बचना होगा। फ्रायड के उक्त प्रतिपादन से यौन-सदाचार पर बुरा प्रभाव पड़ा है और लोगों का जितना-जितना विश्वास फ्रायड के प्रतिपादन पर जमा है उतना ही उतना असंयम और व्यभिचार को प्रोत्साहन मिला है। सुशिक्षित वर्ग में इस तथाकथित मनोविज्ञान के आधार पर यह मान्यता जड़ जमाती जा रही है किः “कामेच्छा की पूर्ति आवश्यक है। उसे स्वच्छन्द उपभोग का अवसर मिलना चाहिए। संयम से शारीरिक और मानसिक हानि होती है।” इस प्रतिपादन का कुप्रभाव नर-नारी के बीच पावन संबंधों की समाज व्यवस्था, सुव्यवस्था एवं पवित्रता पर पड़ रहा है। दाम्पात्य जीवन में यदि कुछ अतृप्ति रह जाती है  व्यक्ति उसे बाहर पूरा करने में भय, लज्जा, संकोच का अनुभव नहीं करता वरन् उस उद्धत पाशवी आचरण को शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य की दृष्टि से आवश्यक मानता है। यह व्यभिचार का खुला समर्थन है। दाम्पत्य मर्यादाओं को फिर कैसे स्थिर रखा जा सकेगा ? अविवाहित या विधुर यदि व्यभिचार पर प्रवृत्त होते हैं तो उन्हें किस तर्क से समझाया जा सकेगा ? फिर जो छेड़छाड़ और गुण्डागर्दी की अश्लील शर्मनाक घटनाएँ आये दिन होती रही हैं उन्हें अवांछनीय या अनावश्यक कैसे ठहराया जा सकेगा ? फ्रायड का शास्त्र दूसरे शब्दों में व्यभिचारशास्त्र ही है जिसे मनोविज्ञान में दार्शनिक मान्यता देकर समाज-व्यवस्था पर कुठाराघात किया जा रहा है। मनोविज्ञानियों के प्रतिपादनों को देखते हुए फ्रायड के काम-स्वेच्छाचार का प्रतिपादन बहुत ही बचकाना और एकांगी प्रतीत होता है। फिर भी खेद इसी बात का है कि ऐसे अधूरे और अवांछनीय निष्कर्षों को अग्रिम पंक्ति में बिठाने की ऐसी भूल की जा रही है जिसका परिणाम मानव समाज का भविष्य अन्धकारमय ही बना सकता है।

यह फ्रायड जैसे कामुकता के समर्थक दार्शनिकों की ही देन है जिसने पाश्चात्य देशों को मनोविज्ञान के नाम पर बहुत प्रभावित किया है और वहीं से वह आँधी अब इस देश में भी बढ़ती आ रही है। अतः इस देश की भी अमेरिका जैसी अवदशा हो, उसके पहले सावधान होना पड़ेगा। यहाँ के कुछ अविचारी दार्शनिक भी फ्रायड के आधार पर ʹसंभोग से समाधिʹ का उपदेश देने लगे, जिससे युवा पीढ़ी गुमराह हुई है। फ्रायड ने  तो केवल मनोवैज्ञानिक मान्यता देकर व्यभिचारशास्त्र बनाया लेकिन तथाकथित दार्शनिक ने ʹसंभोग से समाधिʹ द्वारा व्यभिचार को आध्यात्मिक मान्यता देकर धार्मिक लोगों को भी भ्रष्ट किया। ʹसंभोग से समाधिʹ नहीं होती, सत्यानाश होता है। संयम से ही समाधि होती है। इस भारतीय मनोविज्ञान को अब पाश्चात्य मनोविज्ञानी भी स्वीकार करने लगे हैं। भारतीय मनोविज्ञानी पतंजलि के सिद्धान्तों पर चलने वाले हजारों योगसिद्ध महापुरुष इस देश में हुए हैं, अभी भी हैं और आगे भी होते रहेंगे जबकि संभोग से समाधि के मार्ग पर कोई योगसिद्ध महापुरुष हुआ हो ऐसा हमने तो नहीं सुना। उस मार्ग पर चलने वाले पागल हुए हैं। ऐसे कई नमूने हमने देखे हैं। वेदकालीन महापुरुषों के मनोविज्ञान के आधार पर रचे गये नैतिक और धार्मिक आदर्शों पर टिकी हुई भारतीय संस्कृति लाखों वर्षों के बाद भी जीवित हैं जबकि भोगवादी कई संस्कृतियाँ इस धरातल पर प्रकट हुई और भोगवाद के प्रभाव से नष्ट भी हो गईं। आजकल की पश्चिमी सभ्यता अभी 300 वर्ष पुरानी भी नहीं हुई और भोगवादी सिद्धान्तों के कारण विनाश के कगार पर जा पहुँची है। इस प्रकार परिणामों को देखते हुए भी बुद्धिमान व्यक्ति को संयम की आधारशिला पर खड़े भारतीय मनोविज्ञान को जीवन में लाना पड़ेगा, अन्यथा सर्वनाश होकर ही रहेगा।

पाश्चात्य मनोविज्ञान पिछले 300 वर्षों से ही प्रकाशित हुआ है जबकि भारत का मनोविज्ञान ईसा के पूर्व 2000 वर्ष पहले भी पूर्ण विकसित हो चुका था। भारतीय मनोविज्ञान की तुलना में पाश्चात्य मनोविज्ञान तुच्छ प्रतीत होता है। शरीर रचना शास्त्र (Anatomy) और जीव विज्ञान (Physiology) के आधार पर पाश्चात्य मनोविज्ञान खड़ा है। प्रोफेसर सिग्मंड फ्रायड ने चेतातंत्र के भ्रूणशास्त्र का अभ्यास किया था। बाद में प्रोफेसर ब्रुअर (जो हिस्टीरिया और अन्य मानसिक रोगियों का अभ्यास करते थे) के साथ अध्ययन किया। फिर उऩ्होंने अवचेतन मन में झाँकने की (Psychoanalysis) पद्धति का आविष्कार किया। मनोविश्लेषण तो किया पर मानसिक रोगियों का मनोविश्लेषण किया और उस अध्ययन से प्राप्त निष्कर्षों को सभी मनुष्यों पर लागू करने की भारी गलती की।

फ्रायड ने अपनी तराजू पर सारी दुनिया को तौलने की गलती की है। उसका अपना जीवन क्रम कुछ ऐसे ही बेतुके क्रम से विकसित हुआ। उसकी माता अमेलिया बड़ी खूबसूरत थी। उसने योकोव  के साथ अपना दूसरा विवाह किया था। जब फ्रायड जन्मा तब वह 21 वर्ष की थी। बच्चे को वह बहुत प्यार करती थी। सम्भव है कुछ समझ आने पर उसके रूप में फ्रायड की यौनाकांक्षा भड़की हो और उसने माँ के प्यार को प्रणय माना हो। वह बाल्यकाल से ही उद्दण्ड और ईर्ष्यालु था।

एक दिन वह माता-पिता के सोने के कमरे में घुस गया और उन दोनों को विचित्र परिस्थिति में डालकर हड़बड़ा दिया। हो सकता है उसे इस स्थिति में ईर्ष्या उत्पन्न हुई हो। वह जब सात साल का था तब एक दिन बाप की ओर मुँह बनाकर चिढ़ाने लगा। बाप ने उसे डाँटा और कहा कि यह छोकरा जिद्दी और निकम्मा बनता जाता है। ये घटनाएँ फ्रायड ने स्वयं लिखी हैं। इन घटनाओं के आधार पर फ्रायड कहता हैः “पुरुष बचपन से ही ईडिपस काम्पलेक्स में यौन-आकांक्षा अथवा यौन-ईर्ष्या से ग्रसित रहता है। लड़का माँ के प्रति यौनांकाक्षा से प्रेरित रहता है, लड़की बाप के प्रति आकर्षित होती है जिसे इलेक्ट्रा काम्पलेक्स नाम दिया। तीन वर्ष की आयु से ही बच्चा अपनी माँ के साथ यौन संबंध स्थापित करने के लिए लालायित रहता है। एकाध साल के बाद जब उसे पता चलता है कि उसकी माँ के साथ तो बाप का वैसा संबंध पहले से ही है अतः उसके मन में बाप के प्रति ईर्ष्या और घृणा जाग पड़ती है। यह विद्वेष उसकी अवचेतना में आजीवन बना रहता है। इसी प्रकार लड़की अपने बाप के प्रति सोचती है और माँ से ईर्ष्या करती है।”

फ्रायड कहता हैः “इस मानसिक अवरोध के कारण मनुष्य की गति रूक जाती है। ईडिपस काम्पलेक्स उसके सामने तरह तरह के अवरोध खड़े करता है। यह स्थिति अपवाद नहीं है वरन् साधारणतया प्रायः यही होता है।

यह कितना घृणित और हास्यास्पद प्रतिपादन है ! छोटा बच्चा यौनाकांक्षा से पीड़ित होगा सो भी अपनी माँ के साथ ? पशु-पक्षियों के शरीर में भी वासना तब उठती है जब उनके शरीर प्रजनन के योग्य सुदृढ़ हो जाते हैं। लेकिन मनुष्य के बालक को यह वृत्ति इतनी छोटी आयु में ही कैसे पैदा हो जाती है ? और माँ के साथ वैसी तृप्ति करने की उसकी शारीरिक-मानसिक स्थिति भी नहीं होती। फिर तीन वर्ष के बालक को काम-प्रयोग और उनमें माँ-बाप के संलग्न होने की जानकारी कहाँ से हो जाती है ? फिर वह कैसे समझ लेता है कि उसे बाप से ईर्ष्या करनी चाहिए ?

बच्चे द्वारा माँ का दूध पीने को  ऐसे मनोविज्ञानियों ने रतिसुख के समकक्ष बताया है। यदि इस स्तनपान को रतिसुख गिना जाय  आयु बढ़ने के साथ-साथ वह उत्कण्ठा भी प्रबल होती जानी चाहिए और व्यस्क होने तक बालक को माता का दूध ही पीते रहना चाहिए। यह किस प्रकार संभव है ?

…..तो ऐसे बेतुके प्रतिपादन हैं जिसके लिए भर्त्सना ही की जानी चाहिए।

ब्रह्मचर्य़ और इन्द्रिय निग्रह की महिमा सनातन धर्म ने ही गाई है ऐसी बात नहीं है। इस्लाम, ईसाइयत, जैन, सिक्ख एवं तमाम धर्मग्रन्थों ने भी संयम को अत्यंत महत्त्वपूर्ण बताया है। कुछ लोग मानते हैं कि ब्रह्मचर्य  केवल योगियों, साधु-संतों के लिए है लेकिन भोगवादी पाश्चात्य देशों की अवदशा देखकर यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि हर मनुष्य यदि मनुष्यता से दिव्यता की ओर बढ़ना चाहता है तब तो उसे संयम का सहारा लेना ही पड़ेगा, लेकिन जो साधना करना नहीं चाहता वह भी यदि मनुष्य से पशु बनना न चाहता हो, पशु से पिशाच बनना न चाहता हो तो भी उसे संयम का अवलंबन लेना ही पड़ेगा। जो मनुष्य शारीरिक स्वास्थ्य, मानसिक प्रसन्नता और बौद्धिक सामर्थ्य बनाये रखना चाहते हों, ऐसे संसारी मनुष्यों के लिए भी ʹयौवन सुरक्षाʹ पुस्तक पढ़ना अत्यन्त आवश्यक है।

जो लोग मानव समाज को पशुता में गिरने से बचाना चाहते हों, भावी पीढ़ी का जीवन पिशाच होने से बचाना चाहते हैं, इस देश को एडस जैसी घातक बीमारियों से ग्रस्त होने से रोकना चाहते हैं, स्वस्थ समाज का निर्माण करना चाहते हैं उन सबका यह नैतिक कर्तव्य है कि वे हमारी गुमराह युवा पीढ़ी को ʹयौनव सुरक्षाʹ जैसी पुस्तिका पढ़ायें। विद्यार्थियों में ऐसी पुस्तिका बाँटने से इस देश के जवानों को गुमराह होने से बचा सकते हैं। अतः ʹयौवन सुरक्षाʹ आप भी पढ़ें एवं औरों को भी पढ़ायें। आप यदि साधना करते हैं, ध्यान भजन करते हैं तब तो ʹयौवन सुरक्षाʹ के द्वारा आप दिव्यता प्राप्त कर सकते हैं। यदि आप साधना न भी करें  भी ʹयौवन सुरक्षाʹ के द्वारा शारीरिक स्वास्थ्य, मानसिक प्रसन्नता और बौद्धिक योग्यता का विकास कर सकते हैं…. अपने जीवन को पशुता से बचा सकते हैं और मानव समाज को पिशाची समाज बनने से रोक सकते हैं।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अप्रैल 1997, पृष्ठ संख्या 7,8,9,10,26 अंक 52

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