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Sharir Swasthya

बलसंवर्धक शीत ऋतु


(22 अक्तूबर 2012 से 17 फरवरी 2013 तक)

महर्षि कश्यप ने कहा हैः

न च आहारसमं किंचित् भैषज्यं उपलभ्यते।

देश, काल, प्रकृति, मात्रा व जठराग्नि के अनुसार लिये गये आहार के समान कोई औषधि नहीं है। केवल सम्यक् आहार विहार से व्यक्ति उत्तम स्वास्थ्य व दीर्घ आयु की प्राप्ति कर सकता है।

प्रदीप्त जठराग्नि के कारण शीत ऋतु पौष्टिक व बलवर्धक आहार सेवन के लिए अनुकूल होती है। इन दिनों में उपवास, अल्प व रूखा आहार सप्तधातु तथा बल का ह्रास करता है।

शीतकाल में सेवन योग्य पुष्टिदायी व्यंजन

गाजर का हलवाः गाजर में लौह तत्त्व व विटामिन ʹएʹ काफी मात्रा में पाये जाते हैं। यह वायुशामक, हृदय व मस्तिष्क की नस-नाड़ियों के लिए बलप्रद, रक्तवर्धक व नेत्रों के लिए लाभदायी है।

विधिः गाजर के भीतर का पीला भाग हटा के उसे कद्दूकस कर घी में सेंक लें। आधी मात्रा में मिश्री मिलाकर धीमी आँच पर पकायें। तैयार होने पर इलायची, मगजकरी के बीज व थोड़ी सी खसखस  डाल दें। (दूध का उपयोग न करें।)

कद्दू के बीज की बर्फीः काजु में जैसे मौलिक व पुष्टिदायी तत्त्व पाये जाते हैं, वैसे ही कद्दू के बीजों में भी होते हैं। बीज की गिरी को घी में सेंक के समभाग चीनी मिला के बर्फी या छोटे-छोटे लड्डू बना लें। एक दो लड्डू सुबह चबा-चबाकर खायें। विशेष रूप से बालकों के लिए यह स्वादिष्ट, बल व बुद्धिवर्धक खुराक है।

खजूर की पुष्टिदायी गोलियाँ- सिंघाड़े के आटे को घी में सेंक लें। आटे के समभाग खजूर को मिक्सी में पीसकर उसमें मिला लें। हलका सा सेंक कर बेर के आकार की गोलियाँ बना लें। 2-4 गोलियाँ सुबह चूसकर खायें, थोड़ी देर बाद दूध पियें। इससे अतिशीघ्रता से रक्त की वृद्धि होती है। उत्साह, प्रसन्नता व वर्ण में निखार आता है। गर्भिणी माताएँ छठे महीने से यह प्रयोग शुरु करें। इससे गर्भ का पोषण व प्रसव के बाद दूध में वृद्धि होगी। माताएँ बालकों को हानिकारक चॉकलेट्स की जगह ये पुष्टिदायी गोलियाँ  खिलायें।

वीर्यवर्धक प्रयोगः 4-5 खजूर रात को पानी में भिगो के रखें। सुबह 1 चम्मच मक्खन, 1 इलायची व थोड़ा सा जायफल पानी में घिसकर उसमें मिला के खाली पेट लें। यह वीर्यवर्धक प्रयोग है।

मेथी की सुखड़ीः मेथीदाना हड्डियों व जोड़ों को मजबूत बनाता है। मेथी का आटा, पुराना गुड़ व घी समान भाग लें। आटा घी में सेंक के पुराना गुड़ व थोड़ी सोंठ मिलाकर सुखड़ी (बर्फी) बना लें। यह उत्तम वायुशामक योग हाथ-पैर, कमर व जोड़ों के दर्द, सायटिका तथा दुग्धपान कराने वाली माताओं व प्रौढ़ व्यक्तियों के लिए विशेष लाभदायी है।

चन्द्रशूर की खीरः चन्द्रशूर (हालों) में प्रचंड मात्रा में लौह, फॉस्फोरस व कैल्शियम पाया जाता है। 12 वर्ष से ऊपर के बालकों को इसकी खीर बनाकर सुबह खाली पेट 40 दिन तक खिलाने से कद बढ़ता है। माताओं को दूध बढ़ाने के लिए यह खीर खिलाने का परम्परागत रिवाज है। इससे कमर का दर्द, सायटिका व पुराने गठिया में भी फायदा होता है।

सूचनाः पौष्टिक पदार्थों का सेवन सुबह खाली पेट अपनी पाचनशक्ति के अनुसार करने से पोषक तत्त्वों का अवशोषण ठीक से होता है। उनका सम्यक पाचन होने पर ही भोजन करना चाहिए।

नारी कल्याण पाकः

यह पाक युवतियाँ, गर्भिणी, नवप्रसूता माताएँ तथा महिलाएँ-सभी के लिए लाभदायी है।

लाभः यह बल व रक्तवर्धक, प्रजनन अंगों को सशक्त बनाने वाला, गर्भपोषक, गर्भस्थापक (गर्भ को स्थिर पुष्ट करने वाला) श्रमहारक (श्रम से होने वाली थकावट को मिटाने वाला) व उत्तम पित्तशामक है। एक दो माह तक इसका सेवन करने से श्वेतप्रदर (ल्यूकोरिया), अत्यधिक मासिक रक्तस्राव व उसके कारण होने वाले कमरदर्द, रक्त की कमी, कमजोरी, निस्तेजता आदि दूर होकर शक्ति व स्फूर्ति आती है। जिन माताओं को बार-बार गर्भपात होता हो उनके लिए यह विशेष हितकर है। सगर्भावस्था में छठे महीने से पाक का सेवन शुरु करने से बालक हृष्ट-पुषअट होता है, दूध भी खुलकर आता है।

धातु की दुर्बलता में पुरुष भी इसका उपयोग कर सकते हैं।

सामग्रीः सिंघाड़े का आटा, गेहूँ का आटा व देशी घी प्रत्येक 250 ग्राम, खजूर 100 ग्राम, बबूल का पिसा हुआ गोंद 100 ग्राम, पिसी मिश्री 500 ग्राम।

विधिः घी को गर्म कर गोंद को घी में भून लें। फिर उसमें सिंघाड़े व गेहूँ का आटा मिलाकर धीमी आँच पर सेंके। जब मंद सुगंध आने लगे तब पिसा हुआ खजूर व मिश्री मिला दें। पाक बनने पर थाली में फैलाकर छोटे-छोटे टुकड़ों में काटकर रखें।

सेवन विधिः 2 टुकड़े (लगभग 20 ग्राम) सुबह-शाम खायें। ऊपर से दूध पी सकते हैं।

सावधानीः खट्टे, मिर्च-मसालेदार व तले हुए तथा ब्रेड-बिस्कुट आदि बासी पदार्थ न खायें।

संधिशूलहर पाक

लाभः उत्तम वायुनाशक व हड्डियों को मजबूत करने वाली मेथी, दोषों का पाचन करने वाली सोंठ व जठराग्नि को प्रदीप्त करने वाले द्रव्यों से बना यह पाक जोड़ों के दर्द, गृध्रसी (सायटिका), गठिया, गर्दन का दर्द (सर्वायकल स्पोंडिलोसिस), कमरदर्द तथा वायु के कारण होने वाली हाथ-पैरों की ऐंठन, सुन्नता, जकड़न आदि में अतीव गुणकारी है। सर्दियों में 40-60 दिन तक इसका सेवन कर सकते हैं। बल व पुष्टि के लिए निरोगी व्यक्ति भी इसका लाभ ले सकते हैं। प्रसूता माताओं के लिए भी यह खूब लाभदायी है। इससे गर्भाशय की शुद्धि व दूध में वृद्धि होती है।

सामग्रीः मेथी का आटा व सोंठ का चूर्ण प्रत्येक 80 ग्राम, देशी घी 150 ग्राम, मिश्री 650 ग्राम। प्रक्षेप द्रव्य- पीपर, सोंठ, पीपरामूल, चित्रक, जीरा, धनिया, अजवायन, कलौंजी, सौंफ, जायफल, दालचीनी, तेजपत्र एवं नागरमोथ प्रत्येक का चूर्ण 10-10 ग्राम व काली मिर्च का चूर्ण 15 ग्राम।

विधिः मिश्री की एक तार की चाशनी बना लें। सोंठ को घी में धीमी आँच पर सेंक लें। जब उसका रंग सुनहरा लाल हो जाय, तब मेथी का आटा व चाशनी मिलाकर अच्छे से हिलायें। नीचे उतारकर प्रक्षेप द्रव्य मिला दें।

सेवन विधिः 15-20 ग्राम पाक सुबह गुनगुने पानी के साथ लें।

सूचनाः जोड़ों के दर्द में दही, टमाटर आदि खट्टे पदार्थ, आलू, राजमाँ, उड़द, मटर व तले हुए, पचने में भारी पदार्थ न खायें।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, नवम्बर 2012, पृष्ठ संख्या 30,31 अंक 239

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मेरे स्वास्थ्य की कुंजी आप भी ले लो – पूज्य बापू जी


(विश्वात्मा पूज्य संत श्री आशारामजी बापू केवल भारत ही नहीं अपितु समस्त विश्व के कल्याण में रत रहते हैं। एक-एक दिन में सैंकड़ों-हजारों किलोमीटर देशाटन करके लोक-कल्याणार्थ वर्षभर में 200 से अधिक विभिन्न स्थानों में सत्संग-कार्यक्रम सफलतापूर्वक करना एक विलक्षण आध्यात्मिक विश्व-कीर्तिमान ही है। व्यक्ति एक राज्य से दूसरे राज्य में लम्बा सफर तय करके आता है तो थका-माँदा दिखने लगता है अथवा हवामान बदलने के कारण कभी बीमार भी हो जाता है। परंतु पूज्य बापू जी 72 वर्ष की आयु में भी ब्रह्मज्ञान के सत्संगवश एक ही दिन में 3-3 राज्यों से 4 से 5 स्थानों तक की यात्रा कर लेते हैं फिर भी स्वस्थ, तंदुरुस्त रहते हैं और हँसते मुस्कराते हुए, लोगों के कष्ट, पीड़ा, दुःख, बीमारी दूर करते हैं। ऐसे ओलिया बापूजी की स्वस्थता का राज क्या है ? इसे जानने की सभी को उत्सुकता रहती है। पूज्य बापू जी का जीवन तो एक खुली किताब है। आपश्री को जिससे भी लाभ होता है, उसे सबके सामने सत्संग में बता ही देते हैं। पूज्य बापू जी अपने स्वास्थ्य की कुंजियाँ खुद ही बता रहे हैं-)

“मेरे स्वस्थ रहने की कुंजी है। मैं आपको वह कुंजी बता देता हूँ। प्रतिदिन हम लगभग एक किलो भोजन करते हैं, दो किलो पानी पीते हैं और 21600 श्वास लेते हैं। 1600 लीटर हवा लेते और छोड़ते हैं, उसमें से हम 10 किलो खुराक की शक्ति हासिल करते हैं। एक किलो भोजन से जो मिलता है उससे 10 गुना ज्यादा हम श्वासोच्छवास से लेते हैं। ये बातें मैं शास्त्रों से सुनीं।

मैं क्या करता हूँ, गाय के गोबर और चंदन से बनी गौ-चंदन धूपबत्ती जलाता हूँ, फिर उसमें एरंड या नारियल का तेल अथवा देशी गाय के शुद्ध घी की बूँदें डालता रहता हूँ और कमरा बंद करके अपना नियम भी करता रहता हूँ। पहने हुए कपड़े उतारकर बस एक कच्छा पहनता हूँ और बाकी सब कपड़े हटा देता हूँ। मैं आसन-प्राणायाम करता हूँ तो रोमकूपों और श्वास के द्वारा धूपबत्ती से उत्पन्न शक्तिशाली प्राणवायु लेता हूँ। श्वास रोककर 11 दंड-बैठक करता हूँ, इससे मेरे को हृदयाघात (हार्ट-अटैक) नहीं होगा, उच्च या निम्न रक्तचाप नहीं होगा। श्वास रोककर 11 दंड-बैठक करने से पूरे शरीर की नस-नाड़ियों की बिल्कुल घुटाई-सफाई हो जाती है। फिर वज्रासन में बैठकर श्वास बाहर रोक देता हूँ और करीब 20 बार पेट को अंदर नाभि की ओर खींचता हूँ (अग्निसार क्रिया)। इसके बाद पाँच मिनट सर्वांगासन करता हूँ। फिर 5-6 मिनट पादपश्चिमोत्तानासन करता हूँ। उसके बाद सूर्य की किरणें मिलें इस प्रकार धूप में घूमता हूँ।

कभी-कभी अगर दिन को देर से खाया है या पेट थोड़ा भारी है अथवा यात्रा बहुत की है और थकान है तो रात को कुछ खाये बिना ही जल्दी सो जाता हूँ तो जो खाने-पीने की गड़बड़ी है अथवा थकान है, वह सब उपवास से ठीक हो जाती है। उपवास रखने से जीवनीशक्ति रोग और थकान को ठीक कर देती है।

लंघनं परं औषधम्।

मैं यह इसलिए बता रहा हूँ कि तुम भी उपवास का फायदा ले लो। फिर कभी शरीर ढीला-ढाला होता है तो सुबह ग्वारपाठे का रस पी लेता हूँ और कभी देखता हूँ ग्वारपाठे के रस की अपेक्षा 1 गिलास गुनगुने पानी में 25 तुलसी के पत्तों का रस और 1 नींबू ठीक रहेगा तो वह पी लेता हूँ। ऐसा करके पेट को और मस्तक को टनाटन रखता हूँ तो बाकी सब टनाटन हो जाता है। ग्वारपाठे से 220 से भी अधिक रोग मिटते हैं।

सूर्य की किरणों में प्राणायाम करो-लम्बे श्वास लो और रोको, स्थलबस्ती करो तो 132 प्रकार की बीमारियाँ ऐसे ही मिटती हैं। लोग ताकत के लिए खूब बादाम खाते हैं लेकिन बेवकूफी है। बादाम, काजू या पिस्ता आदि अधिक नहीं खाने चाहिए। भिगोकर खाने से वे सुपाच्य बनते हैं और एक बादाम चबा-चबाकर उसे प्रवाही बनाकर पी लो तो 10 बादाम खाने की ताकत आती है। मैं महीने में 15-20 दिन एक बादाम तो चबा के ले ही लेता हूँ। पेशाब रुककर आना, ज्यादा आना अथवा रोक न पाना-ये तकलीफें बड़ी उम्र में होती हैं लेकिन इस प्रकार से एक बादाम चबाने वाले को नहीं होंगी। बड़ी उम्र में व्यक्ति को बहरापन हो जाता है। तो सिर में जो तेल डालते हैं वही तेल मैं कान में दो-दो बूँद, चार-चार बूँद डालता रहता हूँ। फिर लेटकर गाय के घी का नस्य लेता हूँ, जिससे दिमाग मस्त रहता है, सिरदर्द आदि की तकलीफें नहीं हो सकतीं, ज्ञानतंतु भी हृष्ट-पुष्ट रहते हैं, जवानी बरकरार रहती है।

यह सब इसलिए बता रहा हूँ क्योंकि जो बड़े-बड़े अधिकारी हैं, वे लोग मेरे शिष्यों से पूछते हैं कि बापूजी क्या खाते हैं ?

अरे, लाला-लालियो ! खाने से सब कुछ नहीं होता। समझने से सब कुछ होता है। कितनी ही भारी चीज खाओ, उससे आपकी तबीयत बढ़िया होगी ऐसी बात नहीं है। पहले खाया हुआ पच जाय फिर दूसरा खाओ। खाने पर खाया तो सत्यानाश होगा। उस समय तो खा लेते हैं, बाद में शरीर भारी रहता है। ऐसी गलती तो कभी-कभी मैं भी करता हूँ। तो फिर मैं उपवास कर लेता हूँ और सुबह आसन-वासन करता हूँ ताकि पहले का खाया हुआ बिल्कुल पच जाय।

रात को देर से नहीं खाना चाहिए। मैं रात को भोजन नहीं करता हूँ। कभी 6 महीने में एकाध बार खाना खाया होगा, नहीं तो नहीं। रात को दूध ही पी लेता हूँ लेकिन 9 बजे के बाद लेता हूँ तो थोड़ा कम कर देता हूँ। ज्यों सूर्य अस्त होता है, त्यों हमारी जठराग्नि मंद होती जाती है। स्वस्थ रहना है तो सूर्यास्त के पहले रात्रि का भोजन कर लेना चाहिए। नहीं कर पाओ तो 7-8 बजे तक कर लेना चाहिए लेकिन ज्यों देर होती है त्यों भोजन सादा-हलका लो।

गर्मियों में पाचन कमजोर रहता है। उन दिनों में दालें, राजमाँ खाने वाला पक्का बीमार मिलेगा। गर्मी में मूँग की छिलके वाली दाल, वह भी 100 ग्राम तो 1 किलो पानी हो, उबाल-उबालकर 1100 ग्राम में से 1 किलो दाल बचे तो वह सुपाच्य है। बाकी तो मोटी दाल से शरीर भारी रहेगा।

कुछ समय अपने अंतरात्मा में शांत बैठा करो। दो मिनट भी निःसंकल्प बैठते हो तो बड़ी शक्ति प्राप्त होती है। मैं रात्रि को सोते समय भी थोड़ा सत्संग सुनते-सुनते विश्राम में चला जाता हूँ, निःसंकल्प होता हूँ। सुबह उठता हूँ तब भी रात्रि की ध्यानावस्था में शांत रहता हूँ। इससे मेरा आध्यात्मिक खजाना भी भरपूर रहता है और शरीर भी स्वस्थ रहता है। मेरे को छुपाने की आदत नहीं है, खुली किताब है। इन कुंजियों को अपनाकर आप भी शरीर स्वस्थ रखो और अपने मन-बुद्धि को परमात्मा में लगाकर इसी जन्म में निहाल-खुशहाल हो जाओ।”

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अक्तूबर 2012, पृष्ठ संख्या 14,15 अंक 238

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फलों द्वारा स्वास्थ्य रक्षा


शरद ऋतु में स्वभाविक रूप से प्रकुपित पित्त के शमनार्थ प्रकृति में मधुर व शीतल फल परिपक्व होने लगते हैं। फलों में शरीर के सर्वांगीण विकास के लिए आवश्यक जीवनसत्त्व (विटामिन्स) व खनिज द्रव्यों के साथ रोगनिवारक औषधि-तत्त्व भी प्रचुर मात्रा में पाये जाते हैं।

आँवला

यह व्याधि व वार्धक्य को दूर रखने वाला, रक्त वीर्य व नेत्रज्योतिवर्धक तथा त्रिदोषशामक श्रेष्ठ रसायन है।

निम्नलिखित सभी प्रयोगों में आँवला रस की मात्राः 15 से 20 मि.ली. (बालकः 5 से 10 मि.ली.)

इन प्रयोगों में कलमी आँवलों की अपेक्षा देशी आँवलों का उपयोग ज्यादा लाभदायी है।

धातुपुष्टिकर योगः आँवले के रस में 10-15 ग्राम देशी घी व 2 ग्राम अश्वगंधा चूर्ण मिलाकर लेने से शुक्रधातु पुष्ट होती है।

ओजस्वी योगः आँवले के रस में 15 ग्राम गाय का घी व 10 ग्राम शहद मिलाकर सेवन करने से ओज, तेज, बुद्धि व नेत्रज्योति की वृद्धि होती है। शरीर हृष्ट-पुष्ट होता है।

हृद्ययोगः आँवले के रस में 10 ग्राम पुदीने का, 5-5 ग्राम अदरक व लहसुन का रस मिलाकर लेना हृदयरोगों में बहुत लाभकारी है। इससे कोलस्ट्रॉल भी नियंत्रित होता है।

रक्तपित्तशामक योगः आँवले के रस में पेठे का रस समभाग मिलाकर सुबह-शाम पीने से नाक, मुँह, योनि, गुदा आदि के द्वारा होने वाला रक्तस्राव रुक जाता है।

दाहशामक योगः आँवले व हरे धनिये के समभाग रस में मिश्री मिलाकर दिन में 1 से 2 बार लेने से दाह व जलन शांत हो जाती है।

मिश्रीयुक्त आँवला रस उत्तम पित्तशामक तथा श्वेतप्रदर में लाभदायी है।

आँवला व ताजी हल्दी के रस का सम्मिश्रण स्वप्नदोष, मधुमेह व त्वचा विकारों में हितकर है।

आँवले के रस में 2 ग्राम जीरा चूर्ण व मिश्री अम्लपित्त (एसिडिटी) नाशक है।

संतरा

यह सुपाच्य, क्षुधा व उत्साहवर्धक तथा तृप्तिदायी है।

निम्नलिखित सभी प्रयोगों में संतरे के रस की मात्राः 50 से 100 मि.ली.

संतरे व नींबू का रस 10 मि.ली. हृदय की दुर्बलता व दोष मिटाने वाला है। दिन में 2 बार लें।

संतरे के रस में उतना ही नारियल पानी पेशाब की रूकावट दूर कर उसे स्वच्छ व खुल के लाने वाला है।

शहदसंयुक्त संतरे का रस हृदयरोगजन्य सीने के दर्द, जकड़न व धड़कन बढ़ने में लाभदायी है।

संतरे के रस के साथ स्वादानुसार पुदीना, अदरक व नींबू का रस पेट के विकारों (उलटी, अरूचि, उदरवायु, दर्द व कब्ज आदि) में विशेष लाभकारी है।

संतरे का रस व 10 ग्राम सत्तू अत्यधिक मासिक स्राव व उसके कारण उत्पन्न दुर्बलता में लाभदायी है। सगर्भावस्था में इसका नियमित सेवन करने से प्रसव सुलभ हो जाता है।

अंगूर

ये शीघ्र शक्ति व स्फूर्तिदायी, पाचन संस्थान को सबल बनाने वाले, पित्तशामक व रक्तवर्धक हैं।

कुछ दिनों तक केवल अंगूर के रस पर ही रहने से पित्तजन्य अनेक रोग जैसे – जलन, अम्लपित्त, मुँह व आँतों के छाले (अल्सर), सिरदर्द तथा कब्ज दूर हो जाते हैं।

निम्नलिखित प्रयोगों में रस की मात्राः 50 से 100 मि.ली.

अंगूर व सेवफल का समभाग रस अनिद्रा में लाभदायी है।

अंगूर व मोसम्बी का समभाग रस मासिक धर्म में असह्य पीड़ा, निम्न रक्ताचाप, रक्त की अल्पता व दुर्बलता में लाभदायी है।

अनार

यह हृदय के लिए बलदायी, मन को तृप्त व उल्लसित करने वाला तथा पित्तजन्य रोगों में पथ्यकर है।

रस की मात्राः 50 से 100 मि.ली.

इसके अतिरिक्त इन दिनों में पुष्ट होने वाले फल सिंघाड़ा, अनन्नासा, सीताफल, सफेद पेठा आदि स्वास्थ्य-संवर्धनार्थ सेवनीय हैं।

सावधानीः सूर्यास्त के बाद, भोजनोपरांत कफजन्य विकार, त्वचा रोग व सूजन में फलों का सेवन नहीं करना चाहिए।

सेवफल का शरबत-एक पौष्टिक पेय

लाभः यह स्वादिष्ट, शक्तिवर्धक और सुपाच्य है। इसे सभी उम्र के लोग वर्षभर ले सकते हैं। यह हृदय को बल देता है, शरीर को पुष्ट व सुडौल बनाता है। वीर्य की वृद्धि करता है। अतिसार और उलटी में तुरंत लाभ करता है। दिमाग की कमजोरी व अवसाद (डिप्रेशन) को दूर कर उसे तरोताजा रखता है। महिलाओं के लिए, विशेषकर गर्भवती महिलाओं और एक साल से बड़ी उम्रवाले बच्चों के लिए बहुत गुणकारी है।

घटकः सेवफल का ताजा रस एक लीटर और मिश्री 650 ग्राम।

विधिः सेवफल के रस में मिश्री मिलाकर एक तार की पक्की चाशनी बना लें। ठंडा करके काँच की शीशी में भरकर रखें।

इस शरबत का 10-12 दिन के अंदर उपयोग कर लेना चाहिए।

मात्राः सुबह-शाम 25-50 ग्राम शरबत पानी में मिलाकर लें।

भोजन से दिव्यता कैसे बढ़ायें ?

आहार के लिए यह ज्ञान अत्यावश्यक है कि क्या खायें, कब खायें, कैसे खायें और क्यों खायें ? इन चारों प्रश्नों के उत्तर स्मरण रखने चाहिए।

“क्या खायें ?”

“सतोगुणी, अहिंसात्मक विधि से प्राप्त खाद्य पदार्थों का ही सेवन करो।”

“कब खायें ?”

“अच्छी तरह भूख लगे तभी खाओ।”

“कैसे खायें ?”

“दाँतों से खूब चबा-चबाकर, मन लगा के,  ईश्वर का दिया हुआ प्रसाद समझ के, प्रेमपूर्वक शांत चित्त से खाओ।”

“किसलिए खायें ?”

“शरीर में शक्ति बनी रहे, जिससे कि सेवा हो सके इसलिए खाओ और दूसरों की प्रसन्नता के लिए खाओ परंतु अधिक अमर्यादित विधि से न खाओ। किसी को रूलाकर न खाओ। अशांतचित्त होकर भीतर-ही-भीतर स्वयं रोते हुए भी न खाओ। किसी भूखे के सामने उसे बिना दिये भी न खाओ। शुद्ध, एकांत स्थान में भगवान का स्मरण करते हुए भोजन करो। अन्याय से, हिंसात्मक विधि से उपार्जित धान्य भी न लो। जहाँ पर धर्मात्मा प्रेमी भक्त, सज्जन न मिलें वहाँ प्राणरक्षामात्र के लिए आहार करो।”

परिणामदर्शी ज्ञानियों का कथन है कि प्राणांतकाल में जिस प्रकार का अन्न, जिस कुल का, जिस प्रकार की  प्रकृतिवाले दाता का अन्न उदर में रहता है, उसी गुण, धर्म, स्वभाव वाले कुल में उस प्राणी का जन्म होता है।

जिस प्रकार शरीरशुद्धि हेतु सदाचार, धनशुद्धि हेतु दान, मनःशुद्धि के लिए ईश्वर-स्मरण आवश्यक है, उसी प्रकार तन-मन-धन की शुद्धि के लिए व्रत-उपवास भी आवश्यक है और व्रत-उपवास की यथोचित्त जानकारी भी आवश्यक है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अक्तूबर 2012, पृष्ठ संख्या 31,32,33 अंक 238

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