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Sharir Swasthya

वसंत ऋतु विशेष


( 18 फरवरी से 19 अप्रैल)

आहार में सावधानीः

गुर्वम्लस्निग्धमधुरं दिवास्वप्नं च वर्जयेत्।

‘वसंत ऋतु में पचने में भारी, खट्टे, स्निग्ध व मधुर पदार्थों के सेवन व दिन में शयन नहीं करना चाहिए।’ (चरक संहिता, सूत्रस्थानम् 6.23)

वसंत में कफ बढ़ जाता है व जठराग्नि मंद हो जाती है, इसलिए खोया (मावा), मिठाई, बलवर्धक पाक, सूखे मेवे, दही, खट्टे फल, अधिक तेल व घी वाले पदार्थ, मिश्री, चीनी, गुड़ व उनसे बने पदार्थ प्रायः नहीं खाने चाहिए। दिन में सोना भी कफ बढ़ाने वाला है, अतः त्याग दें।

इन दिनों में शीघ्र पचने वाला, अल्प तेल व घी में बने, तीखे, कड़वे, कसैले, उष्ण पदार्थों का सेवन करना चाहिए। अदरक, सोंठ, काली मिर्च, दालचीनी, हींग, मेथी, अजवायन, करेला, बिना बीज के कोमल बेंगन, पुनर्नवा, मूली, सूरन, सहजन, पुराने गेहूँ व जौ, चना आदि हितकर हैं।

व्यायाम की विशेषताः

वसंत ऋतु में कफ की अधिकता के कारण शरीर में भारीपन, कठिनता, शीतलता आती है। कभी आलस्य भी आता है, भूख कम लगती है। योगासन, सूर्य नमस्कार, टहलने, दौड़ने व कसरत करने से शरीर में गर्मी उत्पन्न होती है, जिससे कफ पिघलता है। शरीर में मृदुता, हलकापन व स्फूर्ति आती है और भूख भी खुलकर लगती है। इसलिए कहा गया हैः

वसन्ते भ्रमणं पथ्यम्। वसंत ऋतु में खूब पैदल चलना चाहिए।

उपवास की आवश्यकताः

लंघनं कफशमनम्।

उपवास से कफ शांत हो जाता है। वसंत ऋतु में सप्ताह अथवा 15 दिन में एक बार सम्पूर्ण उपवास रखने से कफजन्य रोगों से रक्षा होती है। उपवास के दिन केवल सोंठ डालकर उबाला हुआ पानी पियें।

कुछ खास प्रयोगः

2 से 3 ग्राम हरड़ चूर्ण में समभाग शहद मिलाकर सुबह खाली पेट लेने से ‘रसायन’ के लाभ प्राप्त होते हैं।

श्री चरकाचार्यजी के अनुसार वसंत में सुखोष्ण जल (गुनगुना पानी) पीना चाहिए तथा शरीर पर उबटन लगाना चाहिए। गेहूँ, जौ, चावल, चना, मूँग, उड़द व तिल के समभाग मिश्रण से बना ‘सप्तधान्य उबटन’ स्वास्थ्यवर्धक व मंगलकारक है।

श्री वाग्भट्टाचार्यजी के अनुसार इन दिनों में नागरमोथ डालकर उबाला हुआ पानी पीना चाहिए।

कफशामक पदार्थों में शहद सर्वोत्कृष्ट है। सुबह गुनगुने पानी में शहद मिलाकर पीना हितावह है।

तुलसी व गोमूत्र का सेवन हितकर है।

भोजन से पूर्व अदरक में सेंधा नमक व नींबू मिलाकर लेना भूखवर्धक है।

गोबर के कंडे जलाकर गूगल का धूप करना, कपूर जलाना, चंदन, कपूर व केसर का तिलक करना, आँखों में अंजन लगाना, नाक व कान में गुनगुना तिल का तेल डालना – ये वसंत ऋतु के स्वास्थ्य-रक्षक विशेष उपक्रम हैं।

नया अनाज कफवर्धक व पचने में भारी होता है, अतः पुराने जौ, गेहूँ, चावल आदि का उपयोग करें। सेंककर फिर उपयोग में लाने से अनाज पचने में अधिक हलके हो जाते हैं।

3-4 सूर्यभेदी प्राणायाम करने से व रात को बायीं करवट लेटकर सोने से सूर्यनाड़ी सक्रिय होती है, इससे कफ शीघ्र ही नष्ट हो जाता है।

सावधानीः

कफ से उत्पन्न होने वाले रोग दीर्घकाल तक रहने वाले होते हैं। इसलिए कफ बढ़ते ही उसे तुरंत बाहर निकाल देना चाहिए। इसके लिए गजकरणी, जलनेति का प्रयोग करें। (देखें, आश्रम से प्रकाशित पुस्तक ‘योगासन’ पृ.43-44) अनुभवी वैद्यों द्वारा वमन-कर्म करवाना भी हितकर है।

अंग्रेजी दवाइयाँ कफ को शरीर के अंदर ही सुखा देती है। ऐसा सूखा एवं दूषित कफ भविष्य में टी.बी., दमा, कैंसर जैसे गम्भीर रोग उत्पन्न कर सकता है, अतः इनसे स्वयं बचें व औरों को बचायें।

अपने हृदय को बनायें सक्षम

मन हृदय के आश्रय से रहता है। मन के भावों का गहरा परिणाम हृदय पर होता है। मानसिक तनाव, चिंता व अति व्यग्रता हृदयरोगों के प्रमुख कारणों में से एक है। चिंता व तनावरहित जीवन का अमोघ उपाय हैः ईश्वर-प्रणिधान (ईश्वर-आराधना)।

गुरू व ईश्वर पर जितनी अधिक श्रद्धा, जीवन उतना ही अधिक निश्चिंत व निर्भार होता है। श्रद्धापूर्वक की गयी प्रार्थना मानसिक शांति लाती है। इससे हृदय की नसों में ढीलापन(Relaxation) आता है। ध्यान की गहराइयों में हृदय को बड़ी विश्रांति मिलती है। शवासन व रात्रि-विश्राम से पूर्व प्रार्थना का नियम हृदय को आराम देने में खूब सहायक है।

प्राणवायु का मुख्य स्थान हृदय है। प्राणायाम के नियमित अभ्यास से प्राण-उदान-अपान आदि की गतियाँ नियंत्रित हो जाती हैं। इससे हृदय की क्रियाओं का नियमन होता है। वायु की अनियंत्रित गति हृदयाघात (हार्ट अटैक) का अवश्यम्भावी कारण है।

शुभ चिंतन व सत्कर्म (परहित के लिए किये गये कर्म) से रक्त में एस्पिरिन की मात्रा बढ़ती है, जिससे हृदयस्थ रक्तवाहिनियों में अवरोध (Blockage, Coronary Artery Disease) होने की सम्भावना नहीं रहती।

आयुर्वेदोक्त हृद्य-पदार्थ (Cardic Tonics) जैसे – आम, अनार, कागजी व बिजौरा नींबू, कोकम, आँवला व देशी बेर रक्त का प्रसादन व मन को उल्लसित कर हृदय को सक्षम बनाते हैं। गाय का घी, मक्खन व दूध ओज को बढ़ाकर हृदय का पोषण करते हैं। गेहूँ, खजूर, कटहल, शतावरी, अश्वगंधा हृदय की मांसपेशियों को पुष्ट करते हैं। अर्जुन वृक्ष की छाल व लिंडीपीपर हृदय की शिथिलता दूर करते हैं। लहसुन व सोंठ वायु का शमन कर हृद्य कार्य करते हैं। इसके अतिरिक्त गंगाजल, नारियल जल, चंदन, गुलाब केसर, नागरबेल के पत्ते, सेब, सुवर्ण आदि हृदय के लिए विशेष हितकर हैं। गले में सोने की माला (चेन, लाकेट) व कनिष्ठिका (हाथ की सबसे छोटी उँगली) में सोने की अँगूठी पहनने से हृदय को बल मिलता है। सुवर्ण-सिद्ध जल भी लाभदायी है। यह जल बनाने के लिए पानी में शुद्ध सोने के गहने डाल के उसे उबालकर लगभग आधा करें।

सुबह खुली हवा में पैदल चलने का व्यायाम हृदय को स्वस्थ रखता है।

भारत में विशेषतः पुरुष-वर्ग में हृदय रोगियों की संख्या सर्वाधिक है। भारतीय संस्कृति कि अवहेलना व पाश्चात्यों का अंधानुकरण इसका मुख्य कारण है।

शास्त्रनिर्दिष्ट प्राकृतिक जीवनशैली को अपनाना यह निरामय जीवन की गुरूचाबी है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, फरवरी 2011, अंक 218, पृष्ठ संख्या 28,29

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शिशिर ऋतु में विशेष लाभदायीः तिल


(शिशिर ऋतुः 21 दिसम्बर से 17 फरवरी तक)

शिशिर ऋतु में वातावरण में शीतलता व रूक्षता बढ़ जाती है। आगे आने वाली वसंत व ग्रीष्म ऋतुओं में यह रूक्षता क्रमशः तीव्र व तीव्रतम हो जाती है। यह सूर्य के उत्तरायण का काल है इसमें शरीर का बल धीरे धीरे घटता जाता है।

तिल अपनी स्निग्धता से शरीर के सभी अवयवों को मुलायम रखता है, शरीर को गर्मी  बल प्रदान करता है। अतः भारतीय संस्कृति में उत्तरायण के पर्व पर तिल के सेवन का विधान है।

तिल सभी अंग-प्रत्यंगों विशेषतः अस्थि, संधि, त्वचा, केश व दाँतों को मजबूत बनाता है। यह मेध्य अर्थात बुद्धिवर्धक भी है। सफेद, लाल  काले तिल इन तीन प्रकार के तिलों में काले तिल वीर्यवर्धक व सर्वोत्तम हैं। सभी प्रकार के तेलों में काले तिल का तेल श्रेष्ठ है। यह उत्तम वायुशामक है। इससे की गयी मालिश मजबूती व स्फूर्ति लाती है। शिशिर ऋतु में मालिश विशेष लाभदायी है।

तिल में कैल्शियम व विटामिन ‘ए’ प्रचुर मात्रा में पाये जाते हैं। बादाम की अपेक्षा तिल में छः गुना से भी अधिक कैल्शियम है। यह हड्डियों को मजबूत बनाता है। तिल के छिलकों में निहित ऑक्जेलिक एसिड इस कैल्शियम के अवशोषण (absorption) में बाधा उत्पन्न करता है। अतः छिलके हटाकर तिल का उपयोग करने से लाभ अधिक होते हैं। तिल को रात भर दूध में भिगोकर सुबह रगड़ने से छिलके उतर जाते हैं। फिर धोकर छाया में सुखाकर रखें। इसे आयुर्वेद ने ‘लुंचित तिल’ कहा है। लुंचित तिल पचने में हलके होते हैं, अधिक गर्मी भी नहीं करते।

श्रेष्ठ आयुर्वेदाचार्यों श्री चरक, वाग्भट, चक्रदत्त आदि के द्वारा निर्दिष्ट तिल के प्रयोगः

काले तिल चबाकर खाने व शीतल जल पीने से शरीर की पर्याप्त पुष्टि हो जाती है। दाँत मृत्युपर्यन्त दृढ़ बने रहते हैं।

एक भाग सोंठ चूर्ण में दस भाग तिल का चूर्ण मिलाकर 5 से 10 ग्राम मिश्रण सुबह शाम लेने से जोड़ों के दर्द में राहत मिलती है।

तिल का तेल पीने से अति स्थूल (मोटे) व्यक्तियों का वजन घटने लगता है व कृश (पतले) व्यक्तियों का वजन बढ़ने लगता है। यह कार्य तेल के द्वारा सप्तधातुओं के प्राकृत निर्माण से होता है।

तैलपान विधिः सुबह 20 से 50 मि.ली. गुनगुना तेल पीकर,गुनगुना पानी पियें। बाद में जब तक खुलकर भूख न लगे तब तक कुछ न खायें।

अत्यन्त प्यास लगती हो तो तिल की खली को सिरके में पीसकर समग्र शरीर पर लेप करें।

वार्धक्यजन्य हड्डियों की कमजोरी  उससे होने वाले दर्द में दर्दवाले स्थान पर 15 मिनट तक तिल के तेल की धारा करें।

पैर में फटने या सूई चुभने जैसी पीड़ा हो तो तिल के तेल से मालिश कर रात को गर्म पानी से सेंक करें।

पेट मे वायु के कारण दर्द हो रहा हो तो तिल को पीसकर, गोला बनाकर पेट पर घुमायें।

वातजनित रोगों में तिल में पुराना गुड़ मिलाकर खायें।

एक भाग गोखरू चूर्ण में दस भाग तिल का चूर्ण मिलाके 5 से 10 ग्राम मिश्रण बकरी के दूध में उबाल कर, मिश्री मिला के पीने से षढंता∕नपुंसकता (Impotency) नष्ट होती है।

काले तिल के चूर्ण में मक्खन मिलाकर खाने से रक्तार्श (खूनी बवासीर) नष्ट हो जाती है।

तिल की मात्राः 10 से 25 ग्राम।

विशेषः देश, काल, ऋतु, प्रकृति, आयु आदि के अनुसार मात्रा बदलती है। उष्ण प्रकृति के व्यक्ति, गर्भिणी स्त्रियाँ तिल का सेवन अल्प मात्रा में करें। अधिक मासिक-स्राव में तिल न खायें।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जनवरी 2011, पृष्ठ संख्या 29, अंक 217

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शीत ऋतु में लाभदायीः जीर्ण व्याधिनिवारक प्रयोग


कुछ रोग ऐसे होते हैं जो शरीर में दीर्घकाल तक रहकर शरीर को दुर्बल व क्षीण कर देते हैं। सर्दियों में त्रिदोष स्वाभाविकक रूप से सम अवस्था में आने लगते हैं। जठराग्नि भी प्रदीप्त होती है। इस समय युक्तिपूर्वक की गयी औषधि योजना जीर्ण व्याधि तथा तदजन्य दुर्बलता को नष्ट करने में सक्षम होती है। ऐसे अनुभूत प्रयोग यहाँ पर प्रस्तुत हैं-

जीर्ण शिरः शूल (पुराना सिर दर्द)-

इसके मुख्यतः दो कारण हैं- एक पित्त की अधिकता व दूसरा कब्ज। इसमें दीर्घकाल तक सतत दर्द रहता है अथवा महीने-दो महीने या इससे अधिक समय पर सिरदर्द का दौरा सा पड़ता है। इसके निवारण के लिए 500 ग्राम बादाम दरदरा कूट लें। 100 ग्राम घी में धीमी आँच पर सेंक लें। 750 ग्राम मिश्री की गाढ़ी, लच्छेदार चाशनी बनाकर उसमें यह बादाम तथा जावंत्री, जायफल, इलायची, तेजपत्र का चूर्ण प्रत्येक 3-3 ग्राम व 5 ग्राम प्रवालपिष्टी मिलाकर अच्छी तरह घोंट लें। थाली में जमाकर छोटे-छोटे टुकड़े काटकर सुरक्षित रख लें। 10 से 20 ग्राम सुबह दूध अथवा पानी के साथ लें। (पाचनशक्ति उत्तम हो तो शाम को पुनः ले सकते हैं।) खट्टे, तीखे, तले हुए व पचने में भारी पदार्थों का सेवन न करें।

बादाम अपने स्निग्ध व मृदु-विरेचक गुणों से पित्त व संचित मल को बाहर निकाल कर सिरदर्द को जड़ से मिटा देता है। साथ में मस्तिष्क, नेत्र व हृदय को बल प्रदान करता है।

अमेरिकन बादाम जिसका तेल, सत्त्व निकला हुआ हो वह नहीं, मामरी बादाम अथवा देशी बादाम भी अपने हाथ से गिरी निकाल से इस्तेमाल करो तो लाभदायक है। अमेरिकन बादाम का तेल गर्मी दे के निकाल देते हैं।

बौद्धिक काम करने वालों के लिए तथा शुक्रधातु की क्षीणता व स्नायुओं की दुर्बलता में भी यह बादामपाक अतीव लाभकारी है। स्वस्थ व्यक्तियों के लिए सर्दियों में सेवन करने योग्य यह एक उत्तम पुष्टिदायी पाक है।

जीर्ण वायुविकार, अस्थिविकार, दमा एवं पुरानी खाँसीः सबसे अधिक रोग प्रकुपित वायु के कारण उत्पन्न होते हैं। उनका स्वरूप भी गम्भीर व पीड़ाकारक होता है। ‘वृद्धजीवकीयं तंत्रम्’ में कश्यप ऋषि ने कहा है-

सर्वष्वनिलरोगिषु लशुनान्युपयोजयेत्।

मुच्यते व्याधिभिः क्षिप्रं वपुश्चाधिकमाप्नुते।।

‘सभी प्रकार के वातरोगों में लहसुन का उपयोग करना चाहिए। इससे रोगी शीघ्र ही रोगमुक्त हो जाता है तथा उसके शरीर की वृद्धि होती है।’

काश्यप संहिता, कल्पस्थान, लशुनकल्प

कश्यप ऋषि के अनुसार लहसुन सेवन का उत्तम समय पौष व माघ महीना (दिनांक 22 दिसम्बर से 18 फरवरी 2011 तक) है।

प्रयोग विधिः 200 ग्राम लहसुन छीलकर पीस लें। 4 लीटर दूध में ये लहसुन व 50 ग्राम गाय का घी मिलाकर दूध गाढ़ा होने तक उबालें। फिर इसमें 400 ग्राम मिश्री, 400 ग्राम गाय का घी तथा सोंठ, काली मिर्च, पीपर, दालचीनी, इलायची, तमालपात्र, नागकेशर, पीपरामूल, वायविडंग, अजवायन, लौंग, च्यवक, चित्रक, हल्दी, दारूहल्दी, पुष्करमूल, रास्ना, देवदार, पुनर्नवा, गोखरू, अश्वगंधा, शतावरी, विधारा, नीम, सोआ व कौंचा के बीज का चूर्ण प्रत्येक 3-3 ग्राम मिलाकर धीमी आँच पर हिलाते रहें। मिश्रण में से घी छूटने लग जाय, गाढ़ा मावा बन जाय तब ठंडा करके इसे काँच की बरनी में भरकर रखें।

10 से 20 ग्राम यह मिश्रण सुबह गाय के दूध के साथ लें (पाचनशक्ति उत्तम हो तो शाम को पुनः ले सकते हैं।

भोजन में मूली, अधिक तेल व घी तथा खट्टे पदार्थों का सेवन न करें। स्नान व पीने के लिए गुनगुने पानी का प्रयोग करें।

इससे 80 प्रकार के वात रोग जैसे – पक्षाघात (लकवा), अर्दित (मुँह का लकवा), गृध्रसी (सायटिका), जोड़ों का दर्द, हाथ पैरों में सुन्नता अथवा जकड़न, कम्पन, दर्द, गर्दन व कमर का दर्द, स्पांडिलोसिस आदि तथा दमा, पुरानी खाँसी, अस्थिच्युत (डिसलोकेशन), अस्थिभग्न (फ्रेक्चर) एवं अन्य अस्थिरोग दूर होते हैं। इसका सेवन माघ माह के अंत तक कर सकते हैं। व्याधि अधिक गम्भीर हो तो वैद्यकीय सलाह से एक वर्ष तक भी ले सकते हैं। लकवाग्रस्त लोगों तक भी इसकी खबर पहुँचायें।

वर्षों तक किये गये अंग्रेजी उपचार जहाँ निष्फल हुए हैं, उन वात विकारों में यह लहसुन प्रयोग रोगनिवारक सिद्ध हुआ है। साथ में सूर्यस्नान व प्राणायाम अवश्य करें।

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सर्दियों में खजूर खाओ, सेहत बनाओ !

खजूर मधुर, शीतल, पौष्टिक व सेवन करने के बाद तुरंत शक्ति-स्फूर्ति देने वाला है। यह रक्त, मांस व वीर्य की वृद्धि करता है। हृदय व मस्तिष्क को शक्ति देता है। वात-पित्त व कफ इन तीनों दोषों का शामक है। यह मल व मूत्र को साफ लाता है। खजूर में कार्बोहाईड्रेटस, प्रोटीन्स, कैल्शियम, पौटैशियम, लौह, मैग्नेशियम, फास्फोरस आदि प्रचुर मात्रा में पाये जाते हैं।

खजूर के उपयोग

मस्तिष्क व हृदय की कमजोरीः रात को खजूर भिगोकर सुबह दूध या घी के साथ खाने से मस्तिष्क व हृदय की पेशियों को ताकत मिलती है। विशेषतः रक्त की कमी के कारण होने वाली हृदय की धड़कन व एकाग्रता की कमी में यह प्रयोग लाभदायी है।

मलावरोधः रात को भिगोकर सुबह दूध के साथ लेने से पेट साफ हो जाता है।

कृशताः खजूर में शर्करा, वसा (फैट) व प्रोटीन्स विपुल मात्रा में पाये जाते हैं। इसके नियमित सेवन से मांस की वृद्धि होकर शरीर पुष्ट हो जाता है।

रक्ताल्पताः खजूर रक्त को बढ़ाकर त्वचा में निखार लाता है।

शुक्राल्पताः खजूर उत्तम वीर्यवर्धक है। गाय के घी अथवा बकरी के दूध के साथ लेने से शुक्राणुओं की वृद्धि होती है। इसके अतिरिक्त अधिक मासिक स्राव, क्षयरोग, खाँसी, भ्रम(चक्कर), कमर व हाथ पैरों का दर्द एवं सुन्नता तथा थायराइड संबंधी रोगों में भी यह लाभदायी है।

5 से 7 खजूर अच्छी तरह धोकर रात को भिगोकर सुबह खायें। बच्चों के लिए 2-4 खजूर पर्याप्त हैं। दूध या घी में मिलाकर खाना विशेष लाभदायी है।

होली के बाद खजूर खाना हितकारी नहीं है।

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शक्तिदायक नारियल

नारियल शीतल, स्निग्ध, बलदायी, शरीर को मोटा करने वाला तथा वायु व पित्त को शांत करने वाला है। सूखा नारियल वीर्यवर्धक है। इसमें कार्बोहाइड्रेटस, प्रोटीन्स, वसा, कैल्शियम, पोटैशियम, सोडियम, लौह, विटामिन ‘सी’ आदि प्रचुर मात्रा में पाये जाते हैं।

इन गुणों के कारण नारियल आंतरिक गर्मी, अम्लपित्त (एसिडिटी), आमाशय व्रण(अल्सर), क्षयरोग(टी.बी.), दुर्बलता, कृशता व वीर्य की अल्पता में लाभदायी है। यह पचने में भारी होता है इसलिए मात्र 10 से 20 ग्राम की मात्रा में खूब चबा-चबाकर खायें। इसकी बर्फी या चटनी बनाकर अथवा सब्जी में मिलाकर भी खा सकते हैं। नारियल बालक व गर्भवती माताओं के लिए विशेष पोषक तत्त्वों की पूर्ति कर देता है।

पौष्टिक चबैनाः छुहारा, सूखा नारियल व मिश्री के छोटे-छोटे टुकड़े कर मिलाकर रख लें। टॉफी-चाकलेट के स्थान पर बच्चों को यह पौष्टिक चबैना दें। इससे दाँत, हड्डियाँ मजबूत बनेंगे व बुद्धि का भी विकास होगा।

सूचनाः अष्टमी के दिन नारियल खाने से बुद्धि का नाश होता है।

(ब्रह्म वैवर्त पुराण)

स्रोतः ऋषि प्रसाद, दिसम्बर 2010, पृष्ठ संख्या 30,31 अंक 216

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