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Sharir Swasthya

शीत ऋतु का सूखा मेवाः अंजीर


अञ्जीर की लाल, काली, सफेद और पीली ये चार प्रकार की जातियाँ पायी जाती हैं। इसके कच्चे फलों की सब्जी बनती है। पके अंजीर का मुरब्बा बनता है। अधिक मात्रा में अंजीर खाने से यकृत(Liver) एवं जठर को नुकसान होता है। बादाम खाने से अञ्जीर के दोषों का शमन होता है।

गुण-धर्मः पके, ताजे अञ्जीर गुण में शीतल, स्वाद में मधुर, स्वादिष्ट एवं पचने में भारी होते हैं। ये वायु एवं पित्तदोष का शमन करते हैं एवं रक्त की वृद्धि करते हैं। ये रस एवं विपाक में मधुर एवं शीतवीर्य होते हैं। भारी होने के कारण कफ एवं आमवात के रोगों की वृद्धि करते हैं एवं मंदाग्नि करते हैं। ये कृमि, हृदयपीड़ा, रक्त-पित्त, दाह एवं रक्तविकारनाशक हैं। ठंडे होने के कारण नकसीर फूटने में, पित्त रोगों में एवं मस्तक के रोगों में विशेष लाभप्रद होते हैं।

सूखे अंजीर में उपरोक्त गुणों के अलावा शरीर को स्निग्ध करने, वायु की गति को ठीक करने एवं श्वास रोग का नाश करने के गुण भी विद्यमान होते हैं।

सभी सूखे मेवों में देह को सबसे ज्यादा पोषण देने वाला मेवा अंजीर है। इसके अलावा यह देह की कांति तथा सौन्दर्य बढ़ाने वाला है, पसीना उत्पन्न करता है एवं गरमी का शमन करता है।

अंजीर को बादाम एवं पिस्ता के साथ खाने से बुद्धि बढ़ती है और अखरोट के साथ खाने से विष-विकार दूर होते हैं।

आधुनिक विज्ञत्रान के मतानुसार अंजीर बालकों की कब्जियत मिटाने के लिए विशेष उपयोगी है। कब्जियत के कारण जब मल आँतों में सड़ने लगता है, तब उसके जहरीले तत्त्व रक्त में मिल जाते हैं और रक्तवाही धमनियों में रूकावट डालते हैं जिससे शरीर के सभी अंगों में रक्त नहीं पहुँचता। इसके फलस्वरूप शरीर कमजोर हो जाता है एवं दिमाग, नेत्र, हृदय, जठर, बड़ी आँत आदि अंगों में रोग उत्पन्न हो जाते हैं। शरीर दुबला-पतला होकर जवानी में ही वृद्धत्व नज़र आने लगता है। ऐसी स्थिति में अंजीर का उपयोग अत्यंत लाभदायी होता है। यह आँतों की शुद्धि करके रक्त बढ़ाता है एवं रक्त परिभ्रमण को सामान्य बनाता है।

किसी बालक ने काँच, पत्थर अथवा ऐसी अन्य कोई अखाद्य ठोस वस्तु निगल ली हो तो उसे रोज एक से दो अंजीर खिलायें। इससे वह वस्तु मल के साथ बाहर निकल जायेगी। अंजीर चबाकर खाना चाहिए।

अंजीर में विटामिन ʹएʹ पाया जाता है। इस कारण यह आँख के प्राकृतिक गीलेपन को बनाये रखता है।

औषधि प्रयोग

रक्तशुद्धि के लिएः 3-4 पके हुए अंजीर को छीलकर आमने-सामने दो चीरे लगा दें और उसमें मिश्री का चूर्ण भर दें एवं रात्रि को खुले आकाश में ओस से तर  होने के लिए कहीं रख दें। प्रातःकाल उसका सेवन करें। इस प्रयोग से रक्त की गर्मी नष्ट होगी एवं रक्त शुद्ध होगा।

रक्तवृद्धिः 4 अंजीर एवं 11 सूखी काली द्राक्ष को 100 से 200 मि.ली. गाय के दूध में उबालें। एक उबाल आने पर वह दूध पी लें एवं अंजीर तथा द्राक्ष को चबाकर खा जायें। इससे कब्जियत दूर होती है, आँतों को बल मिलता है, भूख बढ़ती है एवं रक्त शुद्ध होता है। एक से दो महीने तक यह प्रयोग करें।

रक्तस्रावः शरीर के किसी भी भाग से रक्तस्राव होता हो तो 2 से 6 अंजीर को 50 मि.ली. पानी में भिगोकर पीस लें। इसके बाद उसमें 20 ग्राम दुर्वा घास का रस एवं 10 ग्राम मिश्री मिलाकर सुबह शाम पियें। ज्यादा रक्तस्राव हो तो खस एवं धनिया के पाउडर को पानी में पीसकर ललाट पर एवं हाथ-पैर के तलुओं में लेप करें। इससे लाभ होता है।

मंदाग्नि एवं उदररोगः जिनकी पाचनशक्ति मंद हो, दूध न पचता हो उन्हें 2 से 4 अंजीर रात्रि में पानी में भिगोकर सुबह चबाकर खाना चाहिए एवं वह पानी पी  लेना चाहिए।

कब्जियतः प्रतिदिन 5 से 6 अंजीर को उसके टुकड़े करके 250 मि.ली. पानी में भिगो दें। सुबह उस पानी को उबालकर आधा कर दें और पी जायें। पीने के बाद अंजीर चबाकर खायें तो थोड़े ही दिनों में कब्जियत दूर होकर पाचनशक्ति बलवान होगी। बच्चों के लिए 1 से 3 अंजीर पर्याप्त हैं।

बवासीरः 2 से 4 अंजीर रात को पानी में भिगोकर सुबह खायें और सुबह भिगोकर शाम को खायें। इस प्रकार प्रतिदिन करने से खूनी बवासीर में लाभ होता है। अथवा, अंजीर, काली द्राक्ष (सूखी), हरड़ एवं मिश्री को समान मात्रा में लेकर उसे कूटकर सुपारी जितनी बड़ी गोली बना लें। प्रतिदिन सुबह-शाम एक-एक गोली का सेवन करने से भी लाभ होता है।

बहुमूत्रताः जिन्हें बार-बार ज्यादा मात्रा में ठंडी एवं सफेद रंग की पेशाब आती हो, कंठ सूखता हो, शरीर दुर्बल होती जा रही हो तो रोज प्रातःकाल 2 से 4 अंजीर खाने के बाद ऊपर से 10 से 15 ग्राम काला तिल चबा कर खायें। इससे आराम मिलता है।

मूत्रकृच्छता(मूत्राल्पता)- 1 या 2 अंजीर में 1 या 2 ग्राम कलमी सोडा मिलाकर प्रतिदिन सुबह खाने से मूत्राल्पता में लाभ होता है।

श्वास (गर्मी का दमा)- 6 ग्राम अंजीर एवं 3 ग्राम गोरख इमली का चूर्ण सुबह शाम खाने से इसमें लाभ होता है। श्वास के साथ खाँसी भी हो तो उसमें 2 ग्राम जीरे का चूर्ण मिलाकर लेने से ज्यादा लाभ होगा।

शीत ऋतु में देहपुष्टि हेतु अंजीरपाक

50 ग्राम सूखे अंजीर लेकर उसके 6-8 छोटे टुकड़े कर लें। 500 ग्राम देशी घी गर्म करके उसमें अंजीर के वे टुकड़े डालकर 200 ग्राम मिश्री का चूर्ण मिला दें। इसके पश्चात उसमें बड़ी इलायची 5 ग्राम, चारोली, बलदाणा एवं पिस्ता 10-10 ग्राम तथा 20 ग्राम बादाम के छोटे-छोटे टुकड़ों को ठीक ढंग से मिश्रित कर काँच की बर्नी में भर लें। अंजीर के टुकड़े घी में डुबे रहने चाहिए। घी कम लगे तो उसमें और ज्यादा घी डाल सकते हैं।

यह मिश्रण आठ दिन तक बर्नी में पड़े रहने से अंजीरपाक तैयार हो जाता है। इस अंजीरपाक को प्रतिदिन सुबह 10 से 20 ग्राम की मात्रा में खाली पेट खायें। शीत ऋतु में शक्ति संचय के लिए यह अत्यंत पौष्टिक पाक है। यह अशक्त एवं कमजोर व्यक्ति का रक्त बढ़ाकर धातु को पुष्ट करता है।

अश्वगंधा

अश्वगंधा एक बलवर्धक व पुष्टिदायक श्रेष्ठ रसायन है। यह मधुर व स्निग्ध होने के कारण  वात का शमन करने वाली एवं रस, रक्त आदि सप्त धातुओं का पोषण करने वाली है। इससे विशेषतः मांस व शुक्रधातु की वृद्धि होती है।

इसमें कैल्शियम व लौह तत्त्व भी प्रचुर मात्रा में होते हैं। अतः कुपोषण के कारण बालकों में होने वाले सूखा रोग, मांसपेशियों व बुढ़ापे की कमजोरी, थकान, रोगों के बाद की कृशता आदि में यह अत्यंत उपयुक्त औषधि है। इसके निरन्तर उपयोग से शरीर का समग्र रूप से शोधन होता है एवं जीवनी शक्ति बढ़ती है। नित्य प्रातः 1 से 3 ग्राम चूर्ण दूध में मिलाकर लेने से शरीर में लाल रक्तकणों की वृद्धि होती है।

कुपोषण के कारण बालकों में होने वाले सूखा रोग में यह अत्यन्त लाभदायी औषधि है। इसका 1 से 3 ग्राम चूर्ण एक माह तक दूध, घी या पानी के साथ लेने से बालक का शरीर उसी प्रकार पुष्ट हो जाता है जैसे वर्षा होने पर फसल लहलहा उठते हैं।

क्षयरोग व पक्षाघात में अन्य औषधियों के साथ बल्य के रूप में इसे गोघृत और मिश्री के साथ लिया जा सकता है। अश्वगंधा अत्यंत वाजीकारक अर्थात् शुक्रधातु की त्वरित वृद्धि करने वाला रसायन है। इसके 2 ग्राम चूर्ण को घी व मिश्री के साथ लेने से शुक्राणुओं की वृद्धि होती है एवं वीर्यदोष दूर होते हैं।

एक ग्राम चूर्ण दूध व मिश्री के साथ लेने पर नींद अच्छी आती है। मानसिक या शारीरिक थकान के कारण नींद न आने पर इसका उपयोग किया जा सकता है।

अश्वगंधा, ब्राह्मी तथा जटामांसी समान मात्रा में मिलाकर इसका 1 से 3 ग्राम चूर्ण शहद के साथ लेने से उच्च रक्तचाप कम होने लगता है। इस प्रयोग से नींद भी अच्छी आती है। आहार में नमक कम लें।

गर्भाधारण के बाद चौथे, पाँचवें तथा छठें महीने में अश्वगंधा और शतावरी का एक-एक चम्मच चूर्ण समान मात्रा में मिलाकर सुबह-शाम गाय के दूध के साथ लेने से बालक का पोषण अच्छी तरह से होता है। प्रसूति के बाद भी वह प्रयोग चालू रखें। इससे बालक के पोषणार्थ आवश्यक कैल्शियम एवं लौह तत्त्व की पूर्ति होती है।

सभी लोग इस पौष्टिक वनस्पति का फायदा ले सकते हैं। हजारों-लाखों रूपयों की विदेशी औषधियाँ शरीर को उतना निर्दोष फायदा नहीं पहुँचातीं, उतना पोषण नहीं देतीं, जितना पोषण अश्वगंधा देती है। अश्वगंधा कम दाम पर सबी साधकों तक पहुँच सके ऐसी आज्ञा बापू जी ने औषध निर्माण केन्द्र व समितियों को दी है। बाजार में यह 28 रूपये का 80 ग्राम मिलता है लेकिन अपना औषध निर्माण केन्द्र 20 रूपये में 100 ग्राम देता है। यह अश्वगंधा बल-वीर्यवर्धक है, तमाम गुणों से युक्त है। मेथीपाक अथवा अन्य किसी भी पाक में डालकर इसका उपयोग कर सकते हैं।

सर्दी के लिए पौष्टिक किसी भी एक कि.ग्रा. पाक में 50 से 100 ग्राम अश्वगंधा डाल सकते हैं। इससे उस पाक की पौष्टिकता में कई गुना वृद्धि हो जायेगी।

(साँईं श्री लीलाशाह जी उपचार केन्द्र, जहाँगीरपुरा, वरियाव रोड, सूरत)

क्या आप जानते हैं साबूदाने की असलियत को ?

आमतौर पर साबूदाना शाकाहारी कहा जाता है तथा व्रत-उपवास में इसका काफी प्रयोग होता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि साबूदाना शाकाहार होने पर भी पवित्र नहीं है ?

यह सच है कि साबूदाना (Tapioca) ʹकसावाʹ के गूदे से बनाया जाता है परन्तु इसकी निर्माणविधि इतनी अपवित्र है कि इसे शाकाहार एवं स्वास्थ्यप्रद नहीं कहा जा सकता।

साबूदाना बनाने के लिए सबसे पहले कसावा को खुले मैदान में बनी कुण्डियों में डाला जाता है तथा रसायनों की सहायता से उन्हें लम्बे समय तक सड़ाया जाता है। इस प्रकार सड़ने से तैयार हुआ गूदा महीनों तक खुले आसमान के नीचे पड़ा रहता है। रात में कुण्डियों को गर्मी देने के लिए उनके आस-पास बड़े-बड़े बल्ब जलाये जाते हैं। इससे बल्ब के आसपास उड़ने वाले कई छोटे-छोटे जहरीले जीव भी इन कुण्डियों में गिरकर मर जाते हैं।

दूसरी ओर इस गूदे में पानी डाला जाता है जिससे उसमें सफेद रंग के करोड़ों लम्बे कृमि पैदा हो जाते हैं। इसके बाद उस गूदे को मजदूरों के पैरों के रौंदया जाता है। इस प्रक्रिया में गूदे में गिर हुए कीट पतंग तथा सफेद कृमि भी उसी में समा जाते हैं। यह प्रक्रिया कई बार दोहरायी जाती है।

इसके बाद कई मशीनों में डाला जाता है और मोती जैसे चमकीले दाने बनाकर साबूदाना का नाम-रूप दिया जाता है परन्तु इस चमक में अपवित्रता छिपी होती है जो सभी को नहीं दिखायी देती।

(संकलित)

स्रोतः ऋषि प्रसाद, नवम्बर 2000, पृष्ठ संख्या 27-30 अंक 95

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आँवला


आयुर्वेद के मतानुसार, आँवले थोड़े खट्टे, कसैले, मीठे, ठंडे, हल्के, त्रिदोष (वात-पित-कफ) का नाश करने वाले, रक्तशुद्धि करने वाले, रुचिकर, मूत्रल, पौष्टिक, वीर्यवर्धक, केशवर्धक, टूटी अस्थि जोड़ने में सहायक, कांतिवर्धक, नेत्रज्योतिवर्धक, गर्मीनाशक एवं दाँतों को मजबूती प्रदान करने वाले होते हैं।

आँवले वातरक्त, रक्तप्रदर, बवासीर, दाह, अजीर्ण, श्वास, खांसी, दस्त, पीलिया एवं क्षय जैसे रोगों में लाभप्रद होते हैं। आँवले के सेवन से आयु, स्मृति, कांति एवं बल बढ़ता है, हृदय एवं मस्तिष्क को शक्ति मिलती है, आँखों का तेज बढ़ता है और बालों की जड़ मजबूत होकर बाल काले होते हैं।

औषधि प्रयोगः

श्वेत प्रदरः 3 से 5 ग्राम चूर्ण को मिश्री तथा दूध की मलाई के साथ प्रतिदिन दो बार लेने से अथवा इस चूर्ण को शहद के साथ चाटने से श्वेत प्रदर ठीक होता है।

सिरदर्दः आँवले के 3 से 5 ग्राम चूर्ण को घी एवं मिश्री के साथ लेने से पित्त तथा वायु दोष से उत्पन्न सिरदर्द में राहत मिलती है।

प्रमेह(धातुक्षय) आँवले के रस में ताजी हल्दी का रस अथवा हल्दी का पाउडर व शहद मिलाकर सुबह-शाम पियें अथवा आँवले एवं हल्दी का चूर्ण रोज सुबह-शाम शहद अथवा पानी के साथ लें। इससे प्रमेह मिटता है। पेशाब के साथ धातु जाना बंद होता है।

वीर्यवृद्धि के लिएः आँवले के रस में घी तथा मिश्री मिलाकर रोज पीने से वीर्यवृद्धि होती है।

कब्जियतः गर्मी के कारण हुई कब्जियत में आँवले का चूर्ण घी एवं मिश्री के साथ चाटें अथवा त्रिफला (हरड़, बहेड़ा, आँवला) चूर्ण आधे से एक चम्मच रोज रात्रि को पानी के साथ लें। इससे कब्जियत दूर होती है।

अत्यधिक पसीना आने परः हाथ पैर में अत्यधिक पसीना आता हो तो प्रतिदिन आँवले के 20 से 30 मि.ली. रस में मिश्री डालकर पियें अथवा त्रिफला चूर्ण लें। आहार में गर्म वस्तुओं का सेवन न करें।

दाँत की मजबूतीः आँवले के चूर्ण को पानी में उबालकर उस पानी से कुल्ले करने से दाँत मजबूत एवं स्वच्छ होते हैं।

आँवला एक उत्तम औषधि है। जब ताजे आँवले मिलते हों, तब इनका सेवन सबके लिए लाभप्रद है। ताजे आँवले का सेवन हमें कई रोगों से बचाता है। आँवले का चूर्ण, मुरब्बा तथा च्यवनप्राश वर्ष भर उपयोग किया जा सकता है।

(साँईं श्री लीलाशाह जी उपचार केन्द्र, जहाँगीरपुरा, वरियाव रोड, सूरत)

गोघृत

गोघृत सब स्नेहों में सबसे उत्तम माना जाता है। गाय का घी स्निग्ध, गुरु, शीत गुणों से युक्त होता है तथा यह संस्कारों से अन्य औषध द्रव्यों के गुणों का अनुवर्तन करता है। स्निग्ध होने के कारण वात को शांत करता है, शीतवीर्य होने से पित्त को नष्ट करता है और अपने समान गुणवाले कफदोष को कफघ्न औषधियों के संस्कार द्वारा  नष्ट करता है। गोघृत रसधातु, शुक्रधातु और ओज के लिए हितकारी होता है। यह दाह को शांत करता है, शरीर को कोमल करता है और स्वर एवं वर्ण को प्रसन्न करता है। गोघृत से स्मरणशक्ति और धारणाशक्ति बढ़ती है, इन्द्रियाँ बलवान होती हैं तथा अग्नि प्रदीप्त होती है।

शरद ऋतु में स्वस्थ मनुष्य को घृत का सेवन करना चाहिए क्योंकि इस ऋतु में स्वाभाविक रूप से पित्त का प्रकोप होता है। ʹपित्तघ्नं घृतम्ʹ के अनुसार गोघृत पित्त और पित्तजन्य विकारों को दूर करने के लिए श्रेष्ठ माना गया है। समग्र भारत की दृष्टि से 16 सितम्बर से 14 नवम्बर तक शरद ऋतु मानी जा सकती है।

पित्तजन्य विकारों के लिए शरद ऋतु में घृत का सेवन सुबह या दोपहर में करना चाहिए। घृत पीने के बाद गरम जल पीना चाहिए। गरम जल के कारण घृत सारे स्त्रोतों में फैलकर अपना कार्य करने में समर्थ होता है।

अनेक रोगों में गाय का घी अन्य औषध द्रव्यों के साथ मिलाकर दिया जाता है। घी के द्वारा औषध का गुण शरीर में शीघ्र ही प्रसारित होता है एवं औषध के गुणों का विशेष रूप से विकास होता है। अनेक रोगों में औषधद्रव्यों से सिद्ध घृत का उपयोग भी किया जाता है जैसे, त्रिफला घृत, अश्वगंधा घृत आदि।

गाय का घी अन्य औषधद्रव्यो से संस्कारित कराने की विधि इस प्रकार हैः

औषधद्रव्य का स्वरस अथवा कल्क 50 ग्राम लें। उसमें गाय का घी 200 ग्राम और पानी 800 ग्राम डालकर उसे धीमी आँच पर उबलने दें। जब सारा पानी जल जाय और घी कल्क से अलग एवं स्वच्छ दिखने लगे तब घी को उतारकर छान लें और उसे एक बोतल में भरकर रख लें।

सावधानीः शहद और गाय के घी का समान मात्रा में सेवन विषतुल्य होता है। अतः इनका प्रयोग विषम मात्रा में ही करना चाहिए।

अत्यन्त शीत काल में या कफप्रधान प्रकृति के मनुष्यों द्वारा घृत का सेवन रात्रि में किया गया तो यह आफरा, अरुचि, उदरशूल और  पाण्डु रोग को उत्पन्न करता है। अतः ऐसी स्थिति में दिन ही घृतपान करना चाहिए। जिन लोगों के शरीर में कफ और मेद बढ़ा हो, जो नित्य मंदाग्नि से पीड़ित हों, अन्न में अरुचि हो, सर्दी, उदररोग, आमदोष से पीड़ित हों ऐसे व्यक्तियों को उन दिनों में घृत का सेवन नहीं करना चाहिए।

औषधि प्रयोगः

गर्भपातः सगर्भावस्था में अशोक चूर्ण को घी के साथ लेने पर गर्भपात से रक्षा होती है।

वीर्यदोषः अश्वगंधा चूर्ण घी और मिश्री में मिलाकर देने से  अथवा आँवले का रस घी के साथ देने से वीर्य की वृद्धि तथा शुद्धि होती है। शुक्रनाश में इलायची और हींग 200 से 300 मि.ग्रा. घी के साथ देने से लाभ होता है।

(धन्वन्तरि आरोग्य केन्द्र, साबरमती अमदावाद)

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अक्तूबर 2000, पृष्ठ संख्या 29, 30 अंक 94

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करेला


वर्षा ऋतु में करेले बहुतायत से पाये जाते हैं। डायबिटीज, बुखार, आमवात एवं लिवर के मरीजों के लिए अत्यंत उपयोगी करेला सस्ती एवं लोकप्रिय सब्जी है।

आयुर्वेद के मतानुसार करेले पचने में हल्के, रूक्ष, स्वाद में कड़वे, पकने पर तीखे एवं उष्णवीर्य होते हैं। करेला रूचिकर, भूखवर्धक, पाचक, पित्तसारक, मूत्रल, कृमिहर, उत्तेजक, ज्वरनाशक, रक्तशोधक, सूजन मिटाने वाला, व्रण मिटाने वाला, दाहनाशक, आँखों के लिए हितकर, वेदना मिटाने वाला, मासिकधर्म का उत्पत्तिकर्ता, दूध शुद्ध करने वाला, मेद (चर्बी), गुल्म (गाँठ), प्लीहा (तिल्ली), शूल, प्रमेह, पाण्डु, पित्तदोष एवं रक्तविकार को मिटाने वाला है। करेले कफ प्रकृतिवालों के लिए अधिक गुणकारी हैं। खाँसी, श्वास एवं पीलिया में भी लाभदायक हैं। करेले के पत्तों का ज्यादा मात्रा में लिया गया रस वमन-विरेचन करवाता है जिससे पित्त का नाश होता है।

बुखार, सूजन, आमवात, वातरक्त, यकृत या प्लीहावृद्धि एवं त्वचा के रोगों में करेले की सब्जी लाभदायक होती है। चेचक-खसरे के प्रभाव से बचने के लिए भी प्रतिदिन करेले की सब्जी का सेवन करना लाभप्रद है। इसके अलावा अजीर्ण, मधुप्रमेह, शूल, कर्णरोग, शिरोरोग एवं कफ के रोगों आदि में मरीज की प्रकृति के अनुसार एवं दोष का विचार करके करेले की सब्जी देना लाभप्रद है।

अपने यहाँ करेले की सब्जी बनाते समय उसके ऊपरी हरे छिलके उतार लिये जाते हैं ताकि कड़वाहट कम हो जाये। फिर उसे काटकर, उसमें नमक मिलाकर, उसे निचोड़कर उसका कड़वा रस निकाल लिया जाता है और तब उसकी सब्जी बनायी जाती है। ऐसा करने से करेले के गुण बहुत कम हो जाते हैं। इसकी अपेक्षा कड़वाहट निकाने बिना, पानी डाले बिना, मात्र तेल में बघारकर (तड़का देकर अथवा छौंककर) बनायी गयी करेले की सब्जी परम पथ्य है। करेले के मौसम में इनका अधिक-से-अधिक उपयोग करके आरोग्य की रक्षा करनी चाहिए।

विशेषः करेले अधिक खाने से यदि उल्टी या दस्त हुए हों तो उसके इलाज के तौर पर घी-भात मिश्री खानी चाहिए। करेले का रस पीने की मात्रा 100 ग्राम तक की है। करेले की सब्जी 50 से 150 ग्राम तक की मात्रा में खायी जा सकती है। करेले के फल, पत्ते, जड़ आदि सभी भाग औषधि के रूप में उपयोगी हैं।

औषध-प्रयोग

मलेरिया (विषम) तावः करेले के 3,4 पत्तों को काली मिर्च के 3 दानों के साथ पीसकर दें तथा पत्तों का रस शरीर पर लगायें। इससे लाभ होता है।

बालक की उलटीः करेले के 1 से 3 बीजों को एक-दो काली मिर्च के साथ पीसकर बालक को पिलाने से उलटी बंद हो जाती है।

मधुप्रमेह (डायबिटीज)- कोमल करेले के टुकड़े काटकर, उन्हें छाया में सुखाकर बारीक पीसकर उनमें दसवाँ भाग काली मिर्च मिलाकर सुबह-शाम पानी के साथ 5 से 10 ग्राम की मात्रा में प्रतिदिन लेने से मूत्रमार्ग से जाने वाली शक्कर में लाभ होता है। कोमल करेले का रस भी लाभकारक है।

यकृत (लिवर) वृद्धिः करेले का रस 20 ग्राम, राई का चूर्ण 5 ग्राम, सैंधव नमक 3 ग्राम। इन सबको मिलाकर सुबह खाली पेट पीने से यकृतवृद्धि, आहार के अपचन एवं बारंबार शौच की प्रवृत्ति में लाभ होता है।

तलुओं में जलनः पैर के तलुओं में होने वाली जलन में करेले का रस घिसने से लाभ होता है।

बालकों का अफाराः बच्चों के पेट के अफारे में करेले के पत्तों के पाव या आधा चम्मच रस में चुटकी भर हल्दी का चूर्ण मिलाकर पिलाने से बालक को उलटी हो जायेगी एवं पेट की वायु तथा अफारे में लाभ होगा।

हरस (मसे)- करेले के 10 से 20 ग्राम रस में 5 से 10 ग्राम मिश्री रोज पिलाने से लाभ होता है।

मूत्राल्पताः जिनको पेशाब खुलकर न आता हो, उन्हें करेले अथवा उनके पत्तों के 30 से 50 ग्राम रस में आधा ग्राम हींग डालकर पिलाने से लाभ होता है। अथवा करेले के 30 ग्राम रस में दही का 15 ग्राम पानी मिलाकर पिलाना चाहिए। ऊपर से 50 से 60 ग्राम छाछ पिलायें। ऐसा 3 दिन करें। फिर तीन दिन यह प्रयोग बंद कर दें एवं फिर से दूसरे 6 दिन तक लगातार करें तो लाभ होता है।

इस प्रयोग के दौरान छाछ एवं खिचड़ी ही खायें।

अम्लपित्तः करेले एवं उसके पत्ते के 5 से 10 ग्राम चूर्ण में मिश्री मिलाकर घी अथवा पानी के साथ लेने से लाभ होता है।

वीर्यदोषः करेले का रस 50 ग्राम, नागरबेल के पत्तों का रस 25 ग्राम, चन्दन चूर्ण 10 ग्राम. गिलोय का चूर्ण 10 ग्राम, असगंध (अश्वगंधा) का चूर्ण 10 ग्राम, शतावरी का चूर्ण 10 ग्राम, गोखरू का चूर्ण 10 ग्राम एव मिश्री 100 ग्राम लें। पहले करेले एवं नागरबेल के पान के रस को गर्म करें। फिर बाकी की सभी दवाओं के चूर्ण में उसे डालकर घिस लें एवं आधे-आधे ग्राम की गोलियाँ बनाएँ। सुबह में दूध पीते समय खाली पेट पाँच गोलियाँ लें। 21 दिन के प्रयोग से पुरुष की वीर्यधातु में वृद्धि होती है एवं शरीर में ताकत बढ़ती है।

सूजनः करेले को पीसकर सूजनवाले अंग पर उसका लेप करने से सूजन उतर जाती है। गले की सूजन में करेले की लुगदी को गरम करके लेप करें।

कृमिः पेट में कृमि हो जाने पर करेले के रस में चुटकी भर हींग डालकर पीने से लाभ होता है।

जलने परः आग से जले हुए घाव पर करेले का रस लगाने से लाभ होता है।

रतौंधीः करेले के पत्तों के रस में लेंडपीपर घिसकर आँखों में आँजने से लाभ होता है।

पाण्डुरोग (रक्ताल्पता) करेले के पत्तों का 2-2 चम्मच रस सुबह-शाम देने से पाण्डुरोग में लाभ होता है।

सावधानी

जिन्हें आँव की तकलीफ हो, पाचनशक्ति कमजोर हो, दस्त में रक्त आता हो, बार-बार मुँह में छाले पड़ते हों, जो दुर्बल प्रकृति के हों उन्हें करेले का सेवन नहीं करना चाहिए। ग्रीष्म ऋतु में, पित्त प्रकोप की ऋतु कार्तिक मास में करेले का सेवन नहीं करना चाहिए।

कार्तिक में करेला खाय, मरे नहीं तो मर्ज आय।

करेले के सेवन के 3 घण्टे बाद दूध, घी, मक्खन जैसे पोषक खाद्य पदार्थों का सेवन करना चाहिए।

वर्षा ऋतु मे तुलसी लगाएँ…. रोग भगाएँ

तुलसी एक सर्वपरिचित वनस्पति है। किसी भी स्थान पर उगने वाली तुलसी का भारतीय धर्म एवं संस्कृति में महत्त्वपूर्ण स्थान है। मात्र भारत में नहीं वरन् विश्व के अऩेक अन्य देशों में भी तुलसी को पूजनीय एवं शुभ माना जाता है।

प्रदूषित वायु के शुद्धीकरण में तुलसी का योगदान सर्वाधिक है। तिरूपति के एस.वी.विश्वविद्यालय में किये गये एक अध्ययन के अनुसार तुलसी का पौधा उच्छवास में स्फूर्तिप्रद ओजोनवायु छोड़ता है जिसमें ऑक्सीजन के दो के स्थान पर तीन परमाणु होते हैं।

यदि तुलसीवन के साथ प्राकृतिक चिकित्सा की कुछ पद्धतियाँ जोड़ दी जाएँ तो प्राणघातक और दुःसाध्य रोगों को भी निर्मूल करने में ऐसी सफलताएँ मिल सकती हैं जो प्रसिद्ध डॉक्टरों व सर्जनों को भी नहीं मिल सकतीं।

इस प्रकार तुलसी बहुत ही महत्त्वपूर्ण वनस्पति है। हमें चाहिए कि हम लोग तुलसी का पूर्ण लाभ लें। अपने घर के ऐसे स्थान में जायें जहाँ सूर्य का निरन्तर प्रकाश उपलब्ध हो तुलसी के पौधे अवश्य लगाने चाहिए। तुलसी के पौधे लगाने अथवा बीजारोपण के लिए वर्षाकाल का समय उपयुक्त माना गया है। अतः इस वर्षाकाल में अपने घरों में तुलसी के पौधे लगाकर अपने घर को प्रदूषण तथा अनेक प्रकार की बीमारियों से बचायें तथा पास-पड़ोस के लोगों को भी इस कार्य हेतु प्रोत्साहित करें।

नोटः अपने निकटवर्ती संत श्री आसाराम जी आश्रम से पर्यावरण की शुद्धि हेतु तुलसी के पौधे व बीज निःशुल्क प्राप्त किये जा सकते हैं।

साँईं श्री लीलाशाहजी उपचार केन्द्र, संत श्री आसारामजी आश्रम,

जहाँगीरपुरा, वरियाव रोड, सूरत।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जुलाई 2000, पृष्ठ संख्या 30, अंक 91

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