Tag Archives: Prerak Prasang

Prerak Prasang

दिव्य दृष्टि


पूज्य बापू जी के सत्संग-प्रवचन से

भगवान श्रीरामचन्द्रजी अरण्य में विश्राम कर रहे थे और लखन भैया तीर-कमान लेकर चौकी कर रहे थे । निषादराज ने श्रीरामजी की यह स्थिति देखकर कैकेयी को कोसना शुरु कियाः “यह कैकेयी, इसे जरा भी ख्याल नहीं आया ! सुख के दिवस थे प्रभु जी के और धरती पर शयन कर रहे हैं ! राजाधिराज महाराज दशरथनंदन राजदरबार में बैठते । पूर्ण यौवन, पूर्ण सौंदर्य, पूर्ण ज्ञान, पूर्ण प्रेम, पूर्ण प्रकाश, पूर्ण जीवन के धनी श्रीराम जी को धकेल दिया जंगल में, कैकेयी की कैसी कुमति हो गयी !”

लखन भैया के सामने कैकेयी को उसने कोसा । निषादराज ने सोचा कि ‘लक्ष्मणजी मेरी व्यथा को समझेंगे और वे भी कैकेयी को कोसेंगे’ लेकिन लखन लाला ऐन्द्रिक जीवन में बहने वाले पाशवी जीवन से ऊँचे थे । वे मानवीय जीवन के सुख-दुःखों के थपेड़ों से भी कुछ ऊँचे उठे हुए थे । उन्होंने कहाः “तुम कैकेयी मैया को क्यों कोसते हो ?

काहु न कोउ सुख दुःख कर दाता ।

कोई किसी को सुख-दुःख देने वाला नहीं है ।”

जो बोलता है फलाने ने दुःख दिया, फलाने ने दुःख दिया, वह कुछ नहीं जानता है, अक्ल मारी हुई है उसकी । कुछ लोगों ने करोड़ों रूपये खर्च करके बापू का कुप्रचार कराया और यदि मैं बोलता कि ‘इन्होंने कुप्रचार करके मुझे दुःखी किया, हाय ! दुःखी किया’ तो मैं सचमुच ‘दुःख मेकर’ (दुःख बनाने वाला) हो जाता । वे कुप्रचार वाले कुप्रचार करते रहे और हम अपनी मस्ती में रहे तो मेरे पास तो सत्संगियों की भीड़ और बढ़ गयी । यह नियति होगी ।

निषादराज बोलता हैः “यह अच्छा नहीं हुआ ।” और लखन भैया कहते हैं कि “कोई किसी के सुख-दुःख का दाता नहीं होता है, सबका अपना-अपना प्रारब्ध होता है, अपना-अपना सोच-विचार होता है, इसी से लोग सुखी-दुःखी होते हैं । तुम कैकेयी अम्बा को मत कोसो ।”

निषादराज कहता है “क्या श्रीरामचन्द्रजी अपना कोई प्रारब्ध, अपने किसी पाप का फल भोग रहे हैं ? आपका क्या कहना है ?”

लक्ष्मण जी कहते हैं- “श्रीराम जी दुःख नहीं भोग रहे हैं, दुःखी तो आप हो रहे हैं । श्रीराम जी तो जानते हैं कि यह नियति है, यह लीला है । सुख-दुःख, लाभ-हानि, जीवन-मरण ये सब खिलवाड़ हैं, मैं शाश्वत तत्त्व हूँ और रोम-रोम में रम रहा हूँ, अनंत ब्रह्माण्डों में रम रहा हूँ । यह तो नरलीला करने के लिए यहाँ राम रूप से प्रकट हुआ हूँ । श्रीराम जी प्रारब्ध का फल नहीं भोग रहे हैं । श्रीराम जी तो गुणातीत हैं, देशातीत हैं, कालातीत हैं और प्रारब्ध से भी अतीत हैं । महापुरुष प्रारब्ध का फल नहीं भोगते, वे प्रारब्ध को बाधित कर देते हैं । प्रारब्ध होता है शरीर का, मुझे क्या प्रारब्ध ! यश-अपयश शरीर का होता है, बीमारी-तन्दुरुस्ती शरीर को होती है, मेरा क्या ! हम हैं अपने आप, हर परिस्थिति को जानने वाले उसके बाप ! ऐसा तो सब ज्ञानवान जानते हैं फिर श्रीरामचन्द्र जी तो ज्ञानियों में शिरोमणि हैं । वे कहाँ दुःख भोग रहे हैं ! दुःख तो निषादराज आप बना रहे हैं ।”

अब ध्यान देना, इस कथा से आप कौनसा नजरिया (दृष्टि) लेंगे ? कैकेयी कुटिल रही, स्वार्थी रही और अपने बेटे के पक्ष में वरदान लिया, यह अनुचित किया – ऐसा समझकर आप अगर अनुचित किया – ऐसा समझकर आप अगर अनुचित से बचना चाहते हैं तो इस पक्ष को स्वीकार करके अपने अंतःकरण को गलतियों से, कुटिलता से बचा लें तो अच्छी बात है । अगर, कैकेयी में प्रेम था और राम जी के दैवी कार्य में कैकेयी ने त्याग और बलिदान का परिचय दिया है, इतनी निंदा सुनने के बाद भी, लोग क्या-क्या बोलेंगे, यह समझने के बाद भी कैकेयी ने यह किया है ऐसा आप मानते हैं तो कैकेयी के इस त्याग, प्रेम को याद करके अंतःकरण में सद्भाव को स्वीकार करिये । कैकेयी को कोसकर आप अपना दिल मत बिगाड़िये अथवा कैकेयी ने श्रीराम जी को वनवास दिया, अच्छा किया और हम भी ऐसा ही आचरण करें – ऐसा सोचकर अपने दिल में कुटिलता को मत लाइये । जिससे आपका दिल, दिलबर के ज्ञान से, दिलबर के प्रेम से, दिलबर की समता से, परम मधुरता से भरे, वही नजरिया आपके लिए ठीक रहेगा, सही रहेगा, बढ़िया रहेगा ।

कोई भाभी, कोई देवरानी, कोई जेठानी, कोई सास या बहू अऩुचित करती है तो आप यह अनुचित है ऐसा समझकर अपने जीवन में उस अनुचित को न आने दें, तब तक तो ठीक है लेकिन ‘यह अनुचित करती है, यह निगुरी ऐसी है, वैसी है…’ – ऐसा करके आप उन पर दोषारोपण करके अपने दिल को बिगाड़ने की गलती करते हैं तो आप पशुता में चले जायेंगे । यदि सामने वाली सास-बहू, देवरानी-जेठानी सहनशक्तिवाली है तो उसका सद्गुण लेकर आप समता लाइये । किसी में कोई सद्गुण है तो वह स्वीकारिये और किसी में दुर्गुण है तो उससे अपने को बचाइये । ऐसा करके आप अपने अंतःकरण का विकास कीजिये । न किसी का दोष देखिये और न किसी को दोषी मानकर आरोप करिये और न किसी की आदत के गुलाम बनिये ।

किसी के दोष देखकर आप मन में खटाई लायेंगे तो आपका अंतःकरण खराब होगा लेकिन दोष दिखने पर आप उन दोषों से बचेंगे और उसको भी निर्दोष बनाने हेतु सद्भावना करेंगे तो आप अपने अंतःकरण का निर्माण कर रहे हैं । संसार तो गुण-दोषों से भरा है, अच्छाई-बुराई से भरा है । आप किसी की अच्छाई देखकर उत्साहित हो जाइये, आनंदित होइये और बुराई दिखने पर अपने को उन बुराइयों से बचाकर अपने अंतःकरण का निर्माण करिये और गहराई में देखिये कि यही अच्छाई-बुराई के ताने-बाने संसार को चलाते हैं, वास्तव में तत्त्वस्वरूप भगवान सच्चिदानंद हैं, मैं उन्हीं में शांत हो रहा हूँ । जहाँ-जहाँ मन जाय, उसे घुमा-फिराकर छल, छिद्र, कपट से रहित, गुण-दोष के आकर्षण से रहित अपने भगवत्स्वभाव में विश्रांति दिलाइये, विवेक जगाइये कि ‘मैं कौन हूँ ?’ अपने को ऐसा पूछकर शांत होते जाइये ।

आप पुरुषार्थ करके अपनी मति को ऐसा बनाइये कि आपको लगे कि भगवान पूर्णरूप से मेरे ही हैं ।  के दस बेटे होते हैं, हर बेटे को माँ पूर्णरूप से अपनी लगती है, ऐसे ही भगवान हमको पूरे-के-पूरे अपने लगने चाहिए । ऐसा नहीं कि भगवान बापू जी के हैं, आपके नहीं हैं । जितने बापू जी के हैं उतने-के-उतने आपके हैं ।

‘ऋग्वेद’ कहता हैः मन्दा कृणुध्वं धिय आ तनुध्वम् । तुम अपनी बुद्धि को तीक्ष्ण बनाओ और कर्म करो ।’ (10,101,2) और कर्म में ऐसी कुशलता लाओ कि कर्म तो हो लेकिन कर्म के फल की लोलुपता नहीं हो और कर्म में कर्तृत्व अभिमान भी नहीं हो । कर्म प्रारब्ध-प्रवाह से होता रहे और आप कर्म को कर्मयोग बनाकर नैष्कर्म्य सिद्धि प्राप्त करके भगवान में विश्राम पाओ, भगवान में प्रीति बढ़ाओ, ब्रह्मस्वभाव में जगो, ब्राह्मी स्थिति बनाओ ।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अप्रैल 2009, पृष्ठ संख्या 4,5 अंक 196

ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ

तेरी मर्जी पूरण हो


पूज्य बापूजी के सत्संग-प्रवचन से

आत्मा अचल है, परमात्मा अचल है । तुम अचल से मिलो । तुम तिनके की नाईं अपने को कितना बहा रहे हो – जरा सा मनचाहा नहीं हुआ तो अशांति…. जरा विकार को पोषण नहीं मिला तो अशांति…. जरा सा अहं को पोषण नहीं मिला तो अशांति, दुःख…. जरा सा किसी नौकर ने सलाम नहीं मारा तो अशांति… जरा किसी ने तुम्हारी ‘हाँ’ में ‘हाँ’ नहीं भरी तो अशांति…. छोटी-छोटी बात में तुम कितने छोटे हो जाते हो !

तुम जैसा चिंतन करते हो वैसा तुम्हारा चित्त हो जाता है ।  इसलिए कृपा करके तुम भगवद्चिंतन करो । सुबह उठो और स्मरण करो कि ‘मेरे हृदय में भगवान है । बाहर घूमूँगा लेकिन उसी की सत्ता से । बार-बार उसी में आऊँगा ।’ श्वासोच्छवास में अजपा गायत्री को जपो । नामदान के वक्त जो युक्तियाँ बतायी थीं, उनका अभ्यास करो । व्यवहार के हरेक घंटे में 2-5 मिनट आत्मविश्रांति का अभ्यास करो ।

भगवान श्रीकृष्ण ने गीता (8.8) में कहा हैः

अभ्यासयोगयुक्तेन चेतसा नान्यगामिना ।

परमं पुरुषं दिव्यं याति पार्थानुचिन्तयन् ।।

‘हे पार्थ ! यह नियम है कि परमेश्वर के ध्यान के अभ्यासरूप योग से युक्त, दूसरी और न जाने वाले चित्त से निरंतर चिंतन करता हुआ मनुष्य परम प्रकाशरूप दिव्य पुरुष को अर्थात् परमेश्वर को ही प्राप्त होता है ।’

अभ्यास को योग में बदल दो । तुम्हारा चित्त अन्यगामी मत होने दो, चित्तवृत्ति अन्य-अन्य व्यक्तियों में जायेगी, अन्य-अन्य व्यवहार में जायेगी लेकिन अन्य-अन्य की गहराई में जो भगवान छुपा है वह अनन्य है, बार-बार उसी का स्मरण करो ।

टयूबलाइट अलग है, पंखा अलग है, मोटर पंप अलग है, फ्रिज अलग है लेकिन है तो सबसे बिजली की सत्ता, ऐसे ही सबमें मेरा प्रभु है । मित्र के रूप में भी तू है, पिता के रूप में भी तू है, माता के रूप में भी तू है । बोलेः ‘पिता के रूप में भी भगवान है तो वह भगवान बोलता है सत्संग में मत जाओ तो फिर हम सत्संग में जायें कि नहीं जायें ? उसकी मर्जी पूर्ण करें कि नहीं करें ?’

एक महिला ने रामसुखदासजी महाराज से पूछा कि ‘हमारे ससुर में भी तो ब्रह्म है, भगवान है । ससुर जी कहते हैं कि कथा में मत जाओ तो हम कथा में आयें कि नहीं आयें ? अगर कथा में नहीं आते तो सत्संग नहीं मिलता, मन पवित्र नहीं रहता, संसार में जाता है । अगर कथा में आते हैं तो ससुररूपी भगवान की आज्ञा का उल्लंघन होता है ।

ससुररूपी भगवान नहीं रोकता है, ससुररूपी मोह रोकता है, ससुररूपी अहंकार रोकता है । पितारूपी भगवान नहीं रोकता है, पितारूपी अहंकार रोकता है । पिरता के रूप में जो अहं है वह ‘ना’ बोलता है । ईश्वर सत्संग में जाने को ‘ना’ कभी नहीं बोलता । तो सास की, ससुर की, माँ की, बाप की इस प्रकार की आज्ञा कैसी है ? मोहयुक्त है ।

तुमने सुना है कि सबमें भगवान है और भगवान की मर्जी पूर्ण हो तो पत्नी कहेगीः ‘चलो पिक्चर में, मेरे में भी तो भगवान है, मेरी बात मान लो ।’ शराबी कहेगाः ‘मेरे में भी भगवान है, पी लो प्याली ।’ जुआरी कहेगाः ‘मेरे में भी भगवान है, जरा खेल लो मेरे साथ चौसर, ताश ।’

नहीं ! सबमें भगवान है अर्थात् मेरा (अंतर्यामी) भगवान है । हजारों जुआरी खेल रहे हैं, खेलने दो उनको । चलो, हम उसी अंतर्यामी के साथ खेलते हैं । ऐसा करके हमको अंतर्मुख होना है । निगुरो लोगों की हाँ में हाँ करके अपनी साधना नहीं बिगाड़नी है । मोह में आये हुए कुटुम्बियों की हाँ में हाँ करके अपने को खपा नहीं देना है । उस ईश्वर की हाँ में हाँ का अर्थ है – आप जो नहीं चाहते वह हो रहा है …. समझो आप अपमान नहीं चाहते और हो रहा है तो उसकी हाँ में हाँ करो तो अपमान की समस्या खत्म हो जायेगी । आप चाहते हैं कि ऐसा खाने को मिले, ऐसा रहने को मिले और वह नहीं हो रहा है तो चलो, जैसी उसकी मर्जी ! – ऐसा करके आत्मसंतोष कर आत्मसुख में जाना है । ऐसा नहीं कि जुआरियों के साथ चल दिये, गँजेड़ियों के साथ चल दिये, फिल्म में चल दिये ।

विकारों की मर्जी पूर्ण न हो, ईश्वर की मर्जी पूर्ण हो, बस । अहंकार की मर्जी पूरी न हो, वासना वाले दोस्तों की मर्जी पूरी न हो लेकिन उनकी गहराई में जो मेरा परमात्मा है उसकी मर्जी पूर्ण हो । बस, इतना ही तो करना है ! दिखता इतना है लेकिन इसमें सब कुछ आ जाता है । श्वासोच्छवास की साधना शुरु करो, उससे अंतरात्मा का सुख शुरु हो जायेगा । आत्मविश्रांति…. ॐ आनंद…

कई लोग ध्यान करते हैं न, तो अपेक्षा रखते हैं कि ध्यान ऐसा लगना  चाहिए… अरे, ऐसा लगना चाहिए, वैसा दिखना चाहिए…. – इससे तो फिर  नहीं होगा । ध्यान में बैठो तो तेरी मर्जी पूरण हो प्रभु तेरी जय हो ।….’ शुरु हो गया बस, चिंतन हो गया, आराम हो गया ! निःसंकल्प होते जाओ…. ‘श्री नारायण स्तुति (आश्रम से प्रकाशित एक पुस्तक) पढ़ते जाओ, निःसंकल्प होते जाओ… श्री नारायण स्तुति पढ़ी और गोता मारा… इससे जल्दी भगवत्सुख, दिव्य सुख शुरु हो जायेगा ।

शरीर से जो कुछ कर्म करते हो उस अंतर्यामी की प्रसन्नता के लिए करो । विकार को पोसने के लिए नहीं, अहंकार को पोसने के लिए नहीं, ईश्वर की प्रसन्नता के लिए काम करो तो वह तुम्हारी सच्ची सेवा हो जायेगी । ‘फलाना भाई, फलाना भाई’ – ऐसा करके लोग तुम्हारे से काम लेना चाहते हैं तो तुम अंदर सावधान रहो कि इस शरीर का नाम करने के लिए हम सेवा कर रहे हैं या शरीर में छुपे हुए परमात्मा अथवा गुरु को साक्षी रखकर हम सेवा कर रहे हैं ? केवल सावधानी बरतो तो तुम्हारी सेवा में चार चाँद लग जायेंगे !

जो वाहवाही के लिए सेवा करते हैं उनका स्वभाव उद्धत हो जाता है, गंदा हो जाता है । वे कुत्तों की नाईं आपस में लड़त-झगड़ते रहते हैं लेकिन भगवान की प्रसन्नता के लिए, गुरु की प्रसन्नता के लिए जो सेवा करते हैं उनका स्वभाव बड़ा मधुर हो जाता है ।

शास्त्र, ईश्वर तथा गुरु को स्वीकृति दे दो और अहं को अस्वीकृति दे दो, कल्याण हो जायेगा । तुम स्वीकृति दे दोः ‘वाह ! तेरी मर्जी ! तेरी मर्जी पूरण हो !’ भगवान की मर्जी अगर पूर्ण करने लग गये तो भगवान पूर्ण हैं, पूर्ण तो पूर्ण ही चाहेगा । ऐसे ही भगवान ज्ञानस्वरूप हैं, आनंदस्वरूप हैं, मुक्तस्वरूप हैं तो उनकी मर्जी पूर्ण होने दो, तुम्हारे बाप का जाता क्या है ! हम स्वीकृति नहीं देते हैं, अपनी मर्जी अड़ाते हैं तभी परेशान होते हैं । तेरी मर्जी पूरण हो ! अपना नया कोई संकल्प न करो, अपनी नयी कोई पकड़ न रखो, ईश्वर की मर्जी पूर्ण होगी तो ईश्वर तुमको ईश्वर बना देगा, ब्रह्म तुमको ब्रह्म बना देगा क्योंकि तुम उसके सनातन अंश हो ।

बेवकूफी यह होती है कि हम ईश्वर को भी बोलते हैं कि मेरी मर्जी से करः ‘हे भगवान ! बेटा हो जाय । इतने साल के अंदर हो जाय और ऐसा हो जाय….।’ मानो उसको कोई अक्ल ही नहीं है । तू भगवान के पास गया कि नौकर के पास गया रे ! यह असावधानी है । ‘हे भगवान ! जरा ऐसा हो जाय, मौसम अच्छा हो जाय ।’ अरे ! वह जो करता है ठीक है, उसकी मौज है ! ‘मौसम ऐसा है वैसा है…. तू ऐसा कर दे, वैसा कर दे….।’ नहीं, तेरी मर्जी पूर्ण हो !’ तो मौसम आपको परेशान नहीं करेगा । आप स्वीकृति दे दो, बस । कोई दो गालियाँ देता है तो ‘आहा ! गालियाँ दिलाकर अपमान कराके तू मेरा अहंकार मिटाता है । ॐॐ… तेरी मर्जी पूरण हो !’ – ऐसा मन ही मन कहो तुम्हारी साधना हो जायेगी यार ! ‘बहुत गर्मी हो रही है… हाय रे ! गर्मी हो रही है….’ ऐसा करोगे तो गर्मी सतायेगी । जिसको बारिश का मजा लेना है उसको गर्मी भी सहनी पड़ती है । बारिश के लिए गर्मी भी जरूरी है । सर्दी पचाने के लिए भी गर्मी जरूरी है और गर्मी पचाने के लिए सर्दी जरूरी है । मान पचाने के लिए अपमान जरूरी है । जीवन को पचाने के लिए मृत्यु जरूरी है । वाह ! जो जरूरी है सब तूने किया । तेरी मर्जी पूरण हो ! बस इतना ही तो मंत्र है ! और कोई बड़ा नहीं है और गुप्त भी नहीं है बाबा ! आनंद ही आनंद है !

हर रोज खुशी, हम दम खुशी, हर हाल खुशी ।

जब आशिक मस्त प्रभु का हुआ, तो फिर क्या दिलगीरी बाबा ।।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, फरवरी 2009, पृष्ठ संख्या 12-14 अंक 194

ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ

 

पार्वती जी की परीक्षा


पूज्य बापू जी के सत्संग-प्रवचन से

पार्वती जी ने भगवान शंकर को पाने के लिए तप किया । शिवजी प्रकट हुए और दर्शन दिये । शिवजी ने पार्वती के साथ विवाह करना स्वीकार कर लिया । शिवजी अंतर्धान हो गये । इतने में थोड़ी दूर किसी तालाब में एक ग्राह ने किसी बच्चे को पकड़ा । बच्चा चिल्लाता हो ऐसी आवाज आयी । पार्वती जी ने गौर से सुन तो वह बच्चा बड़ी दयनीय स्थिति में चिल्ला रहा थाः “मुझे बचाओ…. मेरा कोई नहीं है…. मुझे बचाओ….!”

बच्चा चीख रहा है, आक्रांत कर रहा है । पार्वती जी का हृदय द्रवीभूत हो गया । पार्वती जी वहाँ गयीं । देखती हैं तो एक सुकुमार बालक है और उसका पैर ग्राह ने पकड़ रखा है । ग्राह उसे घसीटता हुए ले जा रहा है ।

बालक कहता हैः “मेरा दुनिया में कोई नहीं । मेरी न माता है, न पिता है, न मित्र है, मेरा कोई नहीं । मुझे बचाओ !”

पार्वती जी कहती हैं- “हे ग्राह ! हे मगरमच्छ ! इस बच्चे को छोड़ दे ।”

मगर ने कहाः “दिन के छठे भाग में जो मुझे प्राप्त हो, उसको मुझे अपना आहार समझकर स्वीकार करना है ऐसी मेरी नियति है और ब्रह्मा जी ने दिन के छठे भाग में यह बालक मेरे पास भेजा है । अब मैं क्यों छोड़ूँ ?”

पार्वती जीः “हे ग्राह ! तू इसे छोड़ दे । इसके बदले में तुझे जो चाहिए वह ले ले ।”

ग्राह ने कहाः “तुमने जो तप करके शिवजी को प्रसन्न किया और वरदान माँगा, उस तप का फल देती है तो मैं इस बच्चे को छोड़ सकता हूँ, अन्यथा नहीं ।”

पार्वती जी ने कहाः “यह क्या बात कर रहे हो ! इस जन्म का ही नहीं अपितु कई जन्मों के तप का फल मैं तुझे अर्पण करने को तैयार हूँ लेकिन तू इस बच्चे को छोड़ दे ।”

ग्राह कहता हैः “सोच लो, आवेश में आकर संकल्प मत करो ।”

पार्वती जी बोलीं- “मैंने सोच लिया ।”

ग्राह ने पार्वती जी से तपदान का संकल्प करवाया । तपश्चर्या का दान मिलते ही ग्राह का तन तेज से चमक उठा । बच्चे को छोड़कर ग्राह ने कहाः “पार्वती ! तुम्हारे तप के प्रभाव से मेरा शरीर कितना सुंदर हो गया है ! मानो मैं तेजपुंज हो गया हूँ । तुमने अपने सारे जीवन की कमाई एक छोटे से बालक को बचाने में लगा दी !”

पार्वती जी ने कहाः “ग्राह ! तप तो मैं दुबारा कर सकती हूँ लेकिन बालक को तू निगल जाता तो ऐसा निर्दोष बालक फिर कैसे आता ?”

देखते-देखते वह बालक अंतर्धान हो गया । ग्राह भी अंतर्धान हो गया । पार्वती जी ने सोचा कि ‘मैंने तप का दान कर दिया, अब फिर से तप करूँ ।’ पार्वती जी फिर  से तप करने बैठीं । ज्यों ही थोड़ा सा ध्यान किया, त्यों ही भगवान सदाशिव फिर से प्रकट होकर बोलेः “पार्वती ! अब क्यों तप करती हो ?”

पार्वती जी बोलीं- “प्रभु ! मैंने तप का दान कर दिया है ।”

शिवजी बोलेः “पार्वती ! ग्राह के रूप में मैं ही था और बालक के रूप में भी मैं ही था । तुम्हारा चित्त प्राणीमात्र में आत्मीयता का एहसास करता है या नहीं, यह परीक्षा करने के लिए मैंने लीला की थी । अनेक रूपों में दिखने वाला मैं एक-का-एक हूँ । मैं अनेक शरीरों में, शरीरों से न्यारा अशरीरी आत्मा हूँ । प्राणीमात्र में आत्मीयता का तुम्हारा भाव धन्य है !”

स्रोतः ऋषि प्रसाद, फरवरी 2009, पृष्ठ संख्या 8 अंक 194

ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ