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Prerak Prasang

धनवानों की दयनीय स्थिति


संत श्री आसाराम जी बापू के सत्संग-प्रवचन से

भगवान बुद्ध कहते थेः ‘हे भिक्षुको ! अनन्त जन्मों में तुमने जो आँसू बहाये वे अगर इकट्ठे कर दिये जायें तो वे सरोवर को भी मात कर दें। यह बड़ा पर्वत दिख रहा है, उसके आगे यदि तुम्हारे सभी जन्मों की हड्डियाँ एकत्रित की जायें तो यह पर्वत भी छोटा-सा लगेगा। तुम इतने जन्म ले चुके हो।’

और इन जन्मों के पीछे प्रयत्न क्या है ? दुःखों को हटाना और सुखों को पाना। सुबह से शाम तक, जीवन से मौत तक, जन्म से जन्मांतर तक, युग से युगांतर तक सभी जीवों की यही कोशिश है कि ऐसा सुख मिले जो कभी मिटे नहीं। यदि किसी को कहें- ‘भगवान करे दो दिन के लिए आप सुखी हो जाओ, फिर मुसीबत आये।’ तो वह व्यक्ति कहेगाः

“अरे, बापू जी ! ऐसा न कहिये।”

“अच्छा, दस साल के लिए आप सुखी हो जाओ, बाद में कष्ट आये।”

“ना-ना।”

“जियो तब तक सुखी रहो, बाद में नरक मिले।”

“ना, ना…. नहीं चाहते। दुःख नहीं चाहते।”

प्राणिमात्र सुखाय प्रवृत्ति…. प्राणिमात्र सुख के लिए प्रवृत्ति करता  है। आप यह सिद्धान्त समझ लो कि सभी सदा सुख चाहते हैं। मिट न जाय – ऐसा सुख चाहते हैं क्योंकि सभी का मूल उद्गम स्थान वह सच्चिदानंद, शाश्वत, अमिट आत्मा है। जब तक उसमें पूरी स्थिति नहीं हुई तब तक कितना भी कुछ कर लो, पूर्ण तृप्ति नहीं होती।

कभी न छूटे पिंड दुःखों से जिसे ब्रह्म का ज्ञान नहीं।

इस आत्मा के ज्ञान में विश्रान्ति पाने की व्यवस्था को प्रभु-भजन कह दो, अल्लाह की बंदगी कह दो, गॉड की प्रेयर कह दो, साधना कह दो, ये सब एक ही है। सारी साधना, सारी प्रार्थना, सारी सेवा, सारे कर्मों के पीछे उद्देश्य यही है कि हम सुखी हो जायें।

‘हमारा नाम हो जाय।’ तो क्या दुःख चाहते हो नाम से ? ना, सुखी हो जायें। ‘हमारा स्वास्थ्य अच्छा रहे।’ तो क्या स्वास्थ्य से दुःख चाहते हो ? ना, सुखी हो जायें। ‘हमको कुछ नहीं चाहिए, हम मर जायें।’ तो किसलिए ? सुखी होने के लिए।

चोर चोरी करता है तो उद्देश्य सुख होता है। साहूकार साहूकारी करता है तो उद्देश्य सुख होता है। लेकिन ये कर्म क्षणिक परिणाम देने वाले हैं, दुःखरूपी वृक्ष के मूल को काटे बिना दुःख का अंत नहीं होता। डालियाँ कितनी भी काटो, पत्ते कितने भी तोड़ो लेकिन जब तक दुःखरूपी वृक्ष की अज्ञानरूपी जड़ है तब तक दुःखरूपी वृक्ष का अंत नहीं होता। फिर चाहे कितने जन्म बीत जायें….। कई जन्मों तक प्रयत्न करते-करते व्यक्ति थक जाते हैं, निराश हो जाते हैं, बुरी तरह दुःखी हो जाते हैं।

कुछ वर्ष पहले अमेरिका के आठ व्यक्तियों की सूची बनायी गयी, जो पूरी दुनिया में सबसे अधिक धनाढ्य थे, करोड़पति नहीं अरबोंपति-खरबोंपति थे। 25 साल के बाद उनकी क्या स्थिति है ? इसकी जाँच हुई। जाँच कमेटी ने बतायाः

दुनिया की सबसे बड़ी स्टील कम्पनी के मालिक अमेरिका का चार्ल्स श्काब कंगाल होकर मर गया।

दुनिया की सबसे बड़ी गैस कम्पनी के अध्यक्ष हॉवर्ड हब्सन पागल हो गये।

एक बहुत बड़े व्यापारी आर्थर कटन दिवालिया होकर मर गया।

न्यूयार्क स्टॉक एक्स्चेंज के अध्यक्ष रिचर्ड व्हीटनी को जेल जाना पड़ा।

अमेरिका के राष्ट्रपति के कैबिनेट सदस्य अल्बर्ट फाल को जेल से इसलिए छोड़ दिया गया ताकि वे अपने जीवन के अंतिम दिन घर पर बिता सकें।

वॉल स्ट्रीट की सबसे बड़े सट्टेबाज जेसी लिवरमोर ने आत्महत्या कर ली।

संसार के सबसे बड़े एकाधिकार बाजार के अध्यक्ष लीयोन फ्रेजर ने भी आत्महत्या कर ली।

ऐसे ही जो पच्चीस साल पहले के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, अध्यक्ष रहे होंगे उनकी अभी स्थिति क्या होगी ?

क्या करिये क्या जोड़िये, थोड़े जीवन काज।

छोड़ी-छोड़ी सब जात हैं, देह गेह धनराज।।

25 वर्ष पहले जो धनाढ्यों की सूची में थे, 25 साल बाद उनकी स्थिति क्या रही ॐ धन के ऊँचे शिखरों ने भी उन्हें पूरी संतुष्टि, पूरी तृप्ति और पूरी प्रीति नहीं दी।

कितनी भी सम्पत्ति हो, मृत्यु के समय न चाहते हुए भी बैंक के गुप्त खाते दूसरे को बताने पड़ते हैं, छिपाकर रखी हुई सम्पत्ति किसी को बता कर जाना पड़ता है, नहीं तो, प्रेत होकर भटकना पड़ता है।

मुसोलिनी सन् 1942 की लड़ाई में बुरी तरह हार गया। किसी तरह जान बचा कर स्विटज़रलैंड की प्रेयसी के साथ ट्रक में छुपकर इटली से स्विटज़रलैंड की तरफ भागा। लेकिन रास्ते में पकड़ा गया। धड़…. धड़… धड़….. गोलियाँ चलीं। दोनों मारे गये और दोनों की लाश वापिस लायी गयी। जूतों के हार पड़े, बुरी तरह उनका अंतिम संस्कार हुआ।

लेकिन हीरे जवाहरात और विदेशी करेंसी से भरी ट्रक… लाख नहीं, करोड़ नहीं, अरब नहीं, खरब के मूल्य की वह ट्रक कहाँ गयी ? कई जाँच समितियाँ बैठीं, कई सरकारें आयीं और नाक रगड़कर बैठ गयीं। आज तक उसका पता नहीं चला…. 1942 से 2001, कुल 59 वर्ष हो गये।

जाँच समिति ने देखा कि गाड़ी खाली कैसे हो गयी ? क्या पुलिस के केवल दो जवान पूरी गाड़ी हड़प कर गये ? नहीं, वे भी वहाँ मरे हुए पाये गये। ट्रक ड्राइवर भी मरा हुआ।

इस मामले की जाँच कराने हेतु कमेटियों की नियुक्ति करते गये। कमेटियों पे कमेटियाँ विफल होती गयीं। उसके वरिष्ठ अधिकारियों में कोई पागल हो जाता था तो कोई अपने-आप बाथरूम  में फाँसी लगाकर आत्महत्या कर लेता….1,2,3,…. करते-करते 72  वरिष्ठ अधिकारी मर गये।

एक बार मध्यरात्रि को एक वरिष्ठ अधिकारी ने देखाः ‘मुसोलिनी घूम रहा है !’

अधिकारी ने कहाः “अरे, मुसोलिन तू यहाँ ?”

मुसोलिनी का प्रेत हँसाः “हा, हा, हा….. मेरा शरीर मर गया लेकिन मेरी वासना नहीं मरी है। मैं संपत्ति सम्भालूँगा, तुम क्या करोगे ?”

72 अधिकारियों की बलि ले ली और वह मुसोलिनी अभी भी प्रेत होकर भटकता होगा या नहीं, वह मुझे पता नहीं है। लेकिन उस सम्पत्ति का अभी तक पता नहीं चला।

जो बाहर से संतुष्ट होना चाहते हैं, बाहर से तृप्त होना चाहते हैं, वे कैसे भी क्रूर कर्म करें लेकिन अतृप्त ही रह जाते हैं।

अमेरिका के अखबारों से पता चलता है कि अभी भी व्हाईट हाऊस में कभी-कभी अब्राहम लिंकन की प्रेतात्मा दिखाई देती है। मानवतावादी लिंकन ऊँची योग्यता के धनी तो थे परंतु ऊँचे-में  ऊँचा आत्मा-परमात्मा के साक्षात्कार का रास्ता पकड़ा होता तो वे भी कृष्ण, बुद्ध, कबीर की नाँईं आत्मानुभव पाते।

ऐ गाफिल ! न समझा था, मिला था तन रतन तुझको।

मिलाया खाक में तूने, ऐ सजन ! क्या कहूँ तुझको ?

अपनी वजूदी हस्ती में, तू इतना भूल मस्ताना….

करना था किया वो न, लगी उलटी लगन तुझको।

जो करना था, जहाँ पूर्ण संतुष्टि थी, पूर्ण तृप्ति थी वहाँ तू न गया।

पूर्ण संतुष्ट तो केवल वे ही हैं जिन्होंने अपने स्वरूप को जान लिया है, जिन्होंने आत्मरति, आत्मप्रीति और आत्मसंतुष्टि को पा लिया है। और यह मिलती है सत्संग से, संत-शरण से जाने से, संतों द्वारा बताये गये मार्ग का अनुशरण करने से….

स्रोतः ऋषि प्रसाद, फरवरी 2002, पृष्ठ संख्या 13,14 अंक 110

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संत को सताने का परिणाम


महाराष्ट्र में तुकाराम जी महाराज बड़े उच्च कोटि के संत थे। उनका नौनिहाल लोहगाँव में था। इससे वहाँ उनका आना जाना लगा रहता था। लोहगाँव के लोग भी उन्हें बहुत चाहते थे। वहाँ उनके कीर्तन में आस-पास के गाँवों के लोग भी आते थे।

उनकी वाहवाही और यश देखकर शिवबा कासर उनसे जलता था। नेतागिरी का भी उसे घमंड था कि क्या रखा है बाबा के पास ?

किसी ने शिवबा से कहाः “तुम उनके लिए इतना-इतना बोलते हो किन्तु वे तो तुम्हारी कभी भी निन्दा नहीं करते। तुम एक बार तो उनके पास चलो।”

शिवबा ने कहाः “मैं क्यों जाऊँ उस ढोंगी के पास ? वह सारा दिन ‘विट्ठला-विट्ठला’ करता है। खुद का समय खराब करता है और दूसरों का समय भी खराब करता है।”

लोगों के बहुत कहने पर एक दिन शिवबा कासर कीर्तन-सत्संग में आ ही गया। दूसरे दिन भी गया। तीसरे दिन ले जाने वालों को मेहनत नहीं करनी पड़ी, वह अपने-आप बड़ी प्रसन्नता से आ गया।

लोगों ने शिवबा से कहाः “आज तक तो तुम विरोध करते थे। अब यहाँ खुद क्यों आये हो ?”

शिवबा कासर ने कहाः “यहाँ मुझे बहुत शांति मिलती है, बहुत अच्छा लगता है। यही तो जीवन का सार है। अभी तक केवल नेतागिरी करके तो मैंने अपने-आपको ही ठगा था।”

नेतागिरी से जो आनंद मिलता है उससे तो अनंतगुना आनंद भक्तों को मिलता है। छल-कपट, धोखाधड़ी से जो मिलता है उसकी अपेक्षा तो ईमानदारी से बहुत अधिक मिलता है।

कैसी है सत्संग की महिमा ! शिवबा कासर, जो अपराधी वृत्ति का व्यक्ति था, तुकाराम जी के सान्निध्य से भक्त बन गया।

शिवबा कासर की पत्नी अपने पति में आये इस परिवर्तन से बहुत घबरा गयी। वह सोचने लगी कि ‘जो पति पहले मुझ पर लट्टू होते थे, वे अब मेरे सामने देखते तक नहीं हैं। मुझे ही बोलते हैं कि संयम करो। अपनी आयु ऐसे ही नष्ट मत करो। वे तो अब विट्टल-विट्ठल भजते हुए आँखें मूँदकर बैठे रहते हैं। बड़े भगत बन गये हैं और मुझे भी भक्ति करने के लिए कहते हैं। यह सारा काम उसी बाबा का है।’ उसने मन ही मन तुकाराम जी से इस बात का बदला लेने का ठान लिया।

एक दिन शिवबा कासर ने तुकाराम जी से प्रार्थना कीः ‘आप मेरे घर पर कीर्तन सत्संग के लिए पधारें।’

तुकाराम जी ने प्रार्थना स्वीकार कर ली और वे शिवबा कासर के घर पधारे। शिवबा कासर की पत्नी को तो मानों अवसर मिल गया।

सर्दी के दिन थे। प्रातःकाल जब तुकाराम जी महाराज स्नान के लिए बैठे तो उस महिला ने उबलता हुआ पानी तुकाराम जी की पीठ पर डाल दिया।

तुकाराम जी बोल पड़े- “अरे, यह क्या किया ?”

महिला- “महाराज ! सर्दी है इसलिए गर्म पानी डाला है।”

तुकाराम जी महाराज ने उस महिला से कुछ नहीं कहा किन्तु गर्म पानी से हुई व्यथा का वर्णन करते हुए तुकाराम जी ने भगवान से प्रार्थना की-

“सारा शरीर जलने लगा है, शरीर में जैसे दावानल धधक रहा है। हरे राम ! हरे नारायण ! शरीर कांति जल उठी, रोम-रोम जलने लगा, ऐसा होलिकादहन सहन नहीं होता, बुझाये नहीं बुझता। शरीर फटकर जैसे दो टुकड़े हो रहा है। मेरे माता-पिता केशव ! दौड़ आओ, मेरे हृदय को क्या देखते हो ? जल लेकर वेग से दौड़े आओ। यहाँ और किसी की कुछ नहीं चलेगी। तुका कहता है, तुम मेरी जननी हो, ऐसा संकट पड़ने पर तुम्हारे सिवाय और कौन बचा सकता है ?”

तुकाराम जी ने तो महिला से कुछ नहीं कहा किन्तु परमेश्वर से न रहा गया। उबलते पानी का तपेला उड़ेला तो तुकाराम जी की पीठ पर और फफोले पड़े उस कुलटा की पीठ पर।

संत शरण जो जन पड़े सो जन उबरनहार।

संत की निंदा नानका बहुरि-बहुरि अवतार।।

जो संत की शरण जाता है उसका उद्धार हो जाता है। जो संत के निंदकों की बातें सुनता है और संत की निंदा करने लग जाता है वह बार-बार जन्मता और मरता रहता है। उसके मन की शान्ति, बुद्धि की समता नष्ट हो जाती है।

कबीरा निंदक ना मिलो पापी मिलो हजार।

एक निंदक के माथे पर लाख पापिन को भार।।

वो निंदक लाख पापियों के भार से भवसागर में डूब मरता है।

शिवबा कासर पत्नी को ठीक कराने के लिए सारे इलाज करते-कराते थक गया। आखिर किसी सज्जन ने सलाह दी कि ‘जिन महापुरुष को सताने के कारण भगवान का कोप हुआ है अब उन्हीं महापुरुष की शरण में  जाओ। तभी काम बनेगा।’

आखिर मरता क्या न करता ? शिवबा कासर की पत्नी तैयार हुई। उस सज्जन ने बताया- “आप पुनः तुकाराम जी के चरणों में जाओ। उनको शीतल जल से स्नान कराओ और स्नान किये हुए पानी से जो मिट्टी गीली हो, उसे उठा लेना। वही मिट्टी अपनी पत्नी के शरीर पर लगाना तो भगवान की कृपा हो जायेगी।”

शिवबा कासर ने ऐसा ही किया। इससे उसकी पत्नी के फफोले ठीक हो गये।

शिवबा कासर की पत्नी का हृदय पश्चाताप से भर उठा। वह फूट-फूटकर खूब रोयी और तुकाराम जी के श्रीचरणों में गिरकर उनसे क्षमायाचना की। फिर उसका शेष जीवन विट्ठल के भजन में ही बीता।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मार्च 2002, पृष्ठ संख्या 19,20 अंक 111

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शिवाजी की दयालुता


शिवाजी जयंतीः 19 फरवरी 2002

संत श्री आसाराम जी बापू के सत्संग-प्रवचन से

छत्रपति शिवाजी समर्थ रामदासजी के श्रीचरणों में जाते थे। दरबारी के बेटे शिवाजी ने समर्थ की कृपा से मुट्ठीभर मराठों को लेकर तोरण का किला जीत लिया। इसके अलावा उन्होंने की मुगलों को भी हराया। मुगलों की नाक में दम ला दिया था शिवाजी ने…

औरंगजेब ने देखा कि शिवाजी को वश करना बड़ा मुश्किल है। यह बड़ा प्राणबलवाला व्यक्ति है। अतः औरंगजेब ने युक्ति से काम लेते हुए समझौता करने के बहाने शिवाजी को बुलाया।

शिवाजी ने भी सोचा कि युद्ध की अपेक्षा मित्रता से जीना अच्छा है। दोस्ती का हाथ सदा साथ…. शिवाजी ने अपने बेटे शंभाजी और सेनापति तानाजी तथा अन्य सहायकों को साथ लेकर दिल्ली गये।

समझौते के बहाने दिल्ली बुलाकर औरंगजेब ने शिवाजी को जेल में बन्द कर दिया। शिवाजी ने देखा कि ‘औरंगजेब ने धोखे से हमें जेल में डाल दिया है लेकिन इसमें चिंता की कोई बात नहीं।’ वे गुरुकृपा से, युक्ति से जेल से फरार हो गये।

रात्रि को शिवाजी रास्ता तय करते और दिन को कहीं छिपकर रहते। चलते-चलते जंगल के कंटकीले रास्तों को पार करते-करते एक रात्रि को आगरा के पास सुलतानपुर के जंगल में पहुँचे। रात्रि को पानी पीने के लिए गये तो एक शेर ने उन पर हमला कर दिया। शिवाजी बिना हथियार के शेर से जूझे एवं शेर को मार तो गिराया लेकिन शेर के पंजे ऐसे गहरे लगे कि शिवाजी के शरीर के कई अंगों से मांस बाहर निकल आया।

पीड़ित शिवाजी का इलाज बस्ती में ही हो सकता था। अतः उन्हें बस्ती की शरण लेनी पड़ी। पास की बस्ती में वे विनायक ब्राह्मण के घर रहे। वह ब्राह्मण बड़ा गरीब था। उसकी गरीबी देखकर शिवाजी ने अपने साथियों को वहाँ से रवाना कर दिया और अकेले ही उसके घर में रहे।

एक दिन विनायक ब्राह्मण ने शिवाजी को भोजन करा दिया लेकिन स्वयं भोजन नहीं किया। शिवाजी ने पूछाः “आपने भोजन क्यों नहीं किया ?”

विनायक ब्राह्मण पहले तो टालता रहा लेकिन बार-बार पूछने पर कहाः “मैं गरीब ब्राह्मण हूँ। आज मुझे भिक्षा में इतना ही मिला था कि अतिथि को खिला पाता। मैं घर से दुःखी होकर इधर एकांत में रह रहा था और आपकी सेवा मिल गयी।”

शिवाजी का हृदय पसीज उठा। उनको हुआ कि ‘महाराष्ट्र में होता तो इसे हीरे-मोती से तौल देता। लेकिन यह महाराष्ट्र आयेगा नहीं और भेजूँगा तो इसके हाथ पहुँचेगा भी नहीं क्या पता ? अगर मिल भी गया तो विनायक ब्राह्मण चुप नहीं बैठेगा और औरंगजेब इसको सतायेगा। चलो, मैं चिट्ठी ही लिख देता हूँ।’

शिवाजी ने चिट्ठी लिखी और विनायक ब्राह्मण को कहाः “आप इसे सुलतान के सूबेदार को दे आयें।”

सूबेदार को चिट्ठी मिली उसमें लिखा थाः ‘अगर शिवाजी की कोई खबर देगा तो उसे दो हजार रुपये इनाम मिलेगा – औरंगजेब का ऐसा ढँढेरा है। तू दो हजार रुपये ले आओ। शिवाजी विनायक ब्राह्मण के घर पर मिल जायेगा। ऐ सूबेदार के बच्चे ! अगर खाली हाथ मुझे पकड़ने आया तो तुम्हारी ऐसी की तैसी कर दूँगा।’

शिवाजी का हौसला कितना बुलंद रहा होगा ! जेल से भाग निकले हैं, शेर के दो-दो पंजे लगे हुए हैं… विपत्ति में पड़कर विनायक ब्राह्मण के यहाँ रहना पड़ रहा है… उसके यहाँ भोजन कर रहे हैं तो उसका कैसा बदला चुका रहे हैं !

सूबेदार बीस पठानों के साथ दो हजार रुपये की थैली लेकर पहुँचा और थैली देकर शिवाजी को गिरफ्तार कर लिया।

अतिथि को गिरफ्तार देखकर ब्राह्मण सिर पटक-पटककर रोने लगा। ताना जी उसके पड़ोस में छिपकर रहते थे। ब्राह्मण का रुदन सुनकर वहाँ आये तो देखा कि ‘सूबेदार शिवाजी को बंदी बनाकर ले जा रहा था।’।

ताना जी ने विनायक ब्राह्मण से सारी बात जान ली। विनायक ब्राह्मण ताना जी से कहता हैः

“आप यह दो हजार रुपये की थैली ले लो। मुझे फाँसी पर चढ़ा दो लेकिन मेरे अतिथि को बचा लो। मेरे घर से एक मुसलमान मेरे हिन्दू भाई को बंदी बनाकर ले गया। यह मैं कैसे सह सकता हूँ ?”

ताना जीः “ना, ना। मैं यह अधर्म नहीं करूँगा लेकिन आपको पता है कि अतिथि कौन था ?”

विनायकः “नाम तो नहीं बताया था। उन्होंने बात को गुप्त रखने का वचन लिया था तो मैं कैसे पूछता कि अतिथि कौन है ? लेकिन अतिथि मेरे देश का था, हिन्दू था।”

ताना जी ने कहाः “आप अपना हौसला बुलंद रखें घबराये नहीं और भावुकता में भी न बहें। वे अतिथि थे – महाराष्ट्र के छत्रपति शिवाजी।”

यह सुनकर ब्राह्मण के तो होश ही उड़ गये ! वह मूर्छित होकर गिर पड़ा। ताना जी ने पानी छिड़कर कर उसकी मूर्छा दूर की। उसको सांत्वना दी और हिम्मत बँधाई।

भाव के साथ विचार और श्रद्धा का होना अत्यंत जरूरी है। जिसके पास केवल विचार है और श्रद्धा नहीं है वह मनुष्य कहलाने के लायक ही नहीं है और जिसके पास श्रद्धा है, भाव है और विचार का आश्रय नहीं लेता है वह भाव के बहाव में ही बह जाता है।

विनायक ब्राह्मण कहता हैः “कुछ भी करो लेकिन शिवाजी को बचाओ।”

ताना जीः “सब ठीक हो जायेगा। आप चिंता न करें।”

ताना जी दो हजार रुपये लेकर चल दिये। सारी जानकारी एकत्रित कर ली कि सूबेदार शिवाजी को औरंगजेब के पास किस रास्ते से ले जायेगा और साथ में कितने पठान होंगे।

ताना जी को युक्ति सूझ गयी। उन्होंने पचास लड़ाकू स्वभाव के व्यक्तियों को पगार पर रख लिया। उन पचास व्यक्तियों में जोश भरकर उन्हें तैयार किया और जिस रास्ते से शिवाजी को ले जाने वाले थे, उस रास्ते में सब छिप गये।

ज्यों ही सुलतान शिवाजी को लेकर वहाँ से निकला, त्यों ही ताना जी ने पचास व्यक्तियों समेत उस पर धावा बोल दिया। ताना जी ने सुलतान समेत पच्चीस पठानों को यमपुरी पहुँचा दिया और शिवाजी को महाराष्ट्र ले गये।

कैसा व्यक्तित्व था, भारत के उस छत्रपति का ! अपनी सुरक्षा के लिए विनायक ब्राह्मण के घर रहे लेकिन देखा कि मेरे कारण ब्राह्मण को भूखा रहना पड़ा तो अपनी जान तक को जोखिम में डाल दिया ! ऐसे व्यक्ति ही इतिहास में अमर हो पाते हैं जो मानवीय संवेदना और सत्शास्त्रों की सूझ-बूझ से सम्पन्न हैं।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, फरवरी 2002, पृष्ठ संख्या 19,20 अंक 110

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