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Prerak Prasang

महापुरुषों की युक्ति


संत श्री आशाराम जी बापू के सत्संग-प्रवचन से

संसारियों को कई गुत्थियों का हल नहीं मिल पाता। यदि मिल भी जाता है तो एक को राजी करने में दूसरे को नाराज करना पड़ता है एवं नाराज हुए व्यक्ति के कोप का भाजन बनना पड़ता है। जबकि ज्ञानियों के लिए उन गुत्थियों को हल करना आसान होता है। ज्ञानी महापुरुष ऐसी दक्षता से गुत्थी सुलझा देते हैं कि किसी भी पक्ष को खराब न लगे। इसीलिए देवर्षि नारद की बातें देव-दानव दोनों मानते थे।

ऐसी ही एक घटना मेरे गुरुदेव के साथ परदेश में घटी थीः एयरपोर्ट पर गुरुदेव को लेने के लिए  बड़ी-बड़ी हस्तियाँ आयी थीं। कई लोग अपनी बड़ी लग्जरी गाड़ी में गुरुदेव को बैठाने के लिए उत्सुक थे। एक-दो आगेवानों के कहने से और सब तो मान गये लेकिन दो भक्त हठ पर उतर गये – “गुरुदेव बैठेंगे तो मेरी ही गाड़ी में।” मामला जटिल हो गया। दोनों में से एक भी टस से मस होने को तैयार न था। इन दोनों भक्तों की जिद्द अऩ्य भक्तों के लिए सिरदर्द का कारण बन गयी।

एक ने कहाः  “यदि पूज्य गुरुदेव मेरी गाड़ी  में नहीं बैठेंगे तो मैं गाड़ी के नीचे सो जाऊँगा।”

दूसरे ने कहाः “पूज्य गुरुदेव मेरी गाड़ी में नहीं बैठेंगे तो  मैं जीवित नहीं रहूँगा।”

ऐसी परिस्थिति में ‘क्या करें, क्या न करें ?’ यह किसी की समझ में नहीं आ रहा था। दोनों बड़ी हस्तियाँ थी, अहं की साइज भी बड़ी थी। दोनों में से किसी को भी बुरा न लगे – ऐसा सभी भक्त चाहते थे। इस बहाने भी ब्रह्मज्ञानी महापुरुष का सान्निध्य मिले तो अच्छा है – ऐसी उदात्त भावना से उऩ्होंने हल ढूँढने का प्रयास किया किन्तु असफलता  मिली।

इतने में तो मेरे गुरुदेव का प्लेन एयरपोर्ट पर आ गया। पूज्य गुरुदेव बाहर आये, तब समिति वालों ने पूज्य गुरुदेव का भव्य स्वागत करके खूब  नम्रता से परिस्थिति से अवगत कराया एवं पूछाः “बापू जी ! अब क्या करें।”

ब्रह्मवेत्ता महापुरुष कभी-कभी ही परदेश पधारते हैं। अतः स्वाभाविक है कि प्रत्येक व्यक्ति निकट का सान्निध्य प्राप्त करने का प्रयत्न करे। प्रेम से प्रयत्न करना अलग बात है एवं नासमझ की तरह जिद्द करना अलग बात है। संत तो प्रेम से वश हो जाते हैं जबकि जिद्द के साथ नासमझी उपरामता ले आती है। लोगों ने कहाः

“दोनों के पास एक-दूसरे से टक्कर ले – ऐसी गाड़ियाँ हैं एवं निवास हैं। बहुत समझाया पर मानते नहीं हैं। हमारी गाड़ी में बैठकर हमारे घर आयें – ऐसी जिद्द लेकर बैठे हैं। अब आप ही इसका हल बताने की कृपा करें। हम तो परेशान हो गये हैं।”

पूज्य गुरुदेव बड़ी सरलता एवं सहजता से बोलेः “भाई ! इसमें परेशान होने जैसी बात ही कहाँ है ? सीधी बात है और सरल हल है। जिसकी गाड़ी में बैठूँगा उसके घर नहीं जाऊँगा और जिसके घर जाऊँगा उसकी गाड़ी में नहीं बैठूँगा। अब निश्चय कर लो।”

इस जटिल गुत्थी का हल गुरुदेव ने चुटकी बजाते ही कर दिया कि ‘एक की गाड़ी दूसरे का घर।’

दोनों पूज्य गुरुदेव के आगे हाथ जोड़कर खड़े रह गयेः “गुरुदेव ! आप जिस गाड़ी में बैठना चाहते हैं उसी में बैठें। आपकी मर्जी के अनुसार ही होने दें।”

थोड़ी देर पहले को हठ पर उतरे थे परन्तु संत के व्यवहार कुशलतापूर्ण हल से दोनों ने जिद्द छोड़कर निर्णय भी संत की मर्जी पर ही छोड़ दिया !

प्राणीमात्र के परम हितैषी संतजनों द्वारा सदैव सर्व का हित ही होता है। ब्रह्मज्ञानी ते कछु बुरा न भया।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, सितम्बर 2001, पृष्ठ संख्या 19, 20 अंक 105

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निष्काम कर्म की महिमा


संत श्री आशाराम जी बापू के सत्संग-प्रवचन से

अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः।

स संन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः।।

‘जो पुरुष कर्मफल का आश्रय न लेकर करने योग्य कर्म करता है, वह संन्यासी था योगी है केवल अग्नि का त्याग करने वाला संन्यासी नहीं है तथा केवल क्रियाओं का त्याग करने वाला योगी नहीं है।’ (गीताः 6.1)

केवल क्रियाओं का त्याग करने वाला योगी नहीं है और केवल अग्नि का त्याग करने वाला संन्यासी नहीं है वरन् कर्मफल की इच्छा का त्याग करके जो करने योग्य कर्म करता है, सुख लेने की बुद्धि से नहीं, सुख देने की  बुद्धि से कर्म करता है, वही वास्तव में संन्यासी और योगी है।

जो बाहर से भीतर आये, उसे बोलते हैं आहार। जो भीतर से बाहर जाये उसे बोलते हैं आनन्दद। जो भीतर से बाहर आये उसे बोलते हैं सुख। जो भीतर से बाहर आये उसे बोलते हैं ज्ञान।

जब सुख देने की बुद्धि से कर्तव्य कर्म करोगे, शास्त्रोक्त कर्म करोगे तो अपने अंतःकरण में शुद्ध सुख उत्पन्न होगा। आसक्ति रहित कर्म करोगे तो भीतर से आनन्द प्रगट होगा, भीतर से ही ज्ञान प्रगट होगा। आसक्तिरहित कर्म ही संन्यास और योग का फल दे देंगे।

मनुस्मृति में कहा गया हैः

यत्कर्मं कुर्वयोsस्य स्यात्परितोषोsन्तरात्मनः।

तत् प्रत्येनन कुर्वीत विपरीतं तु वर्जयेत्।।

‘जो कर्म करने से अपने मन में तृप्ति और संतोष का अनुभव हो, वह कर्म प्रयत्नपूर्वक करना चाहिए। जिस कर्म को करने के बाद अन्तरात्मा धिक्कारे, ग्लानि हो, घृणा हो-वह कर्म प्रयत्नपूर्वक छोड़ना चाहिए।’ (मनुः 4-161)

जिन कर्मों से आत्मसुख की प्राप्ति हो, आत्मसंतोष हो, अंतरात्मा की तृप्ति हो, अऩ्तरात्मा का सुख उभरता हो, वे कर्म प्रयत्नपूर्वक करने चाहिए। जो कर्म शास्त्रोक्त हों, संत-अनुमोदित हों और अपने अन्तरात्मा में सुख का माधुर्य का, धन्यवाद का अहसास कराते हों, ये कर्म प्रयत्नपूर्वक करने चाहिए। जो कर्म शास्त्र, संत एवं अन्तरात्मा द्वारा इन्कार किये गये हों उन कर्मों को प्रयत्नपूर्वक त्यागना चाहिए।

कर्म तो करो लेकिन कर्म की आसक्ति का, कर्म के फल का त्याग करोगे तो बुद्धि स्वच्छ और सात्त्विक होगी। स्वच्छ बुद्धि में परमात्म-विषयक जिज्ञासा होगी, फिर तो संन्यासी और योगी को जो आत्मा-परमात्मा का अनुभव होता है वही तुमको होगा और तुम मुक्तात्मा हो जाओगे।

परमेश्वर तत्त्व का ज्ञान पाना हो तो आसक्ति-रहित कर्म करके अपने को खोजें। कर्म करने से पूर्व, कर्म करते वक्त और कर्म पूरे हो जायें उस वक्त जो सबको देखनेवाला सत्-चित्-आनन्द स्वरूप परमात्मा है वही मेरा आत्मा है’ ऐसा चिन्तन करने से बहुत लाभ होता है।

जब हम साधना करने बैठते हैं तब लगता है कि सारा जगत सपना है और चैतन्य आत्मा अपना है लेकिन कर्म करते समय हमारा मन और इन्द्रियाँ आसक्ति करके हमें पुनः संसार में भटका देते हैं। इसीलिए मनु महाराज ने कहा हैः “जिन कर्मों को करने से अपने मन में तृप्ति और संतोष का अनुभव हो, वे कर्म प्रयत्नपूर्वक करने चाहिए।”

संन्यासी को आदेश है कि अग्नि को नहीं छुए, बनी-बनायी भिक्षा ग्रहण करे। अग्नि को नहीं छुआ, बनी-बनायी भिक्षा ग्रहण की और संन्यासी के कपड़े पहने लिए लेकिन यदि मन में इच्छा वासना है तो संन्यास सिद्ध नहीं होता। इससे तो कर्म करे लेकिन इच्छा वासनाएँ छोड़ दे तो अन्तरात्मा का सुख प्रगट होता है। इसीलिए आसक्तिरहित कर्म करने वाले को संन्यासी कहा है।

एक वृद्ध व्यक्ति अंधेरी रात में चौराहे पर लालटेन लेकर खड़ा था। उसका भाव था कि लोगों को अँधेरे में कष्ट न हो।

किसी ने पूछाः “बाबा ! लोगों को रोशनी मिलने से तुम्हें क्या लाभ हो रहा है ?”

वृद्धः “लोगों को तो मैं बाहर से रोशनी दे रहा हूँ लेकिन मुझे यह फायदा है कि मेरा अन्तरात्मा संतुष्ट हो रहा है।”

जो गति योगी को, संन्यासी को मिलती है वही निष्काम करने वाले को मिलती है।

एक बार ज्ञानेश्वर महाराज सुबह  सुबह नदी तट पर घूमने निकले तो देखा कि एक लड़का नदी में गोते खा रहा है और पास में ही एक संन्यासी आँखें बंद करके बैठा है। ज्ञानेश्वर महाराज तुरन्त नदी में कूदे, उस डूबते हुए लड़के को बाहर निकाला फिर संन्यासी को पुकारा ?

“ओ संन्यासी महाराज !”

संन्यासी ने आँखें खोलीं तो ज्ञानेश्वरजी बोलेः “क्या आपका ध्यान लगता है ?”

संन्यासीः “ध्यान तो नहीं लगता है, मन इधर-उधर भागता है।”

“यह लड़का डूब रहा था, क्या आपको दिखाई नहीं दिया ?”

“देखा तो था लेकिन मैं ध्यान कर रहा था।”

ज्ञानेश्वरः “फिर आप ध्यान में कैसे सफल हो सकते हो ? ईश्वर ने आपको किसी की सेवा करने का मौका दिया था। वह आपका कर्तव्य भी था। यदि आप उस कर्तव्य का पालन करते तो ध्यान में भी मन लगता।

ईश्वर की सृष्टि, ईश्वर का बगीचा बिगड़ रहा है और आप बगीचे का आनंद लेना चाहते हो ? बगीचे का आनंद लेना है तो बगीचे को सँवारना भी पड़ता है।”

परहित के कार्य, शास्त्र-संत अनुमोदित कार्य, आसक्तिरहित कार्य मानव की योग्यताओं को विकसित करके उसे परमात्म ज्ञान, परमात्म ध्यान के योग्य बनाते हैं।

जिनके नाम से रघुकुल चला एवं आगे चलकर जिनके कुल में भगवान श्रीराम प्रगट हुए, वे राजा रघु किशोर थे, तब की बात हैः एक दिन वे अपने पिता के साथ वन में स्थित गुरुवर वसिष्ठ के आश्रम में गये। उस समय ब्रह्मर्षि वसिष्ठजी महाराज अपने ब्रह्मचारियों को समझा रहे थेः “जिसने तन से अगर तप नहीं किया तो उसे भोग भी नहीं मिल सकता, मोक्ष की तो बात ही क्या है ? भोग के लिए भी तप चाहिए और मोक्ष के लिए भी तप चाहिए। इसलिए इस तन से तप करना चाहिए।

किशोर रघु के मन में प्रश्न उठा किः ‘संन्यासी और योगी भोग सुख का त्याग करके तप करते हैं सुख के लिए तप नहीं करते। गुरुवर कहते हैं कि भोग के लिए भी तप करना चाहिए ?’ किशोर रघु ने विनयपूर्वक प्रश्न कियाः “गुरुदेव ! सुख भोग के लिए भी तप करना चाहिए, यह मुझे समझ में नहीं आ रही है। बताने की कृपा करें।

गुरुदेवः “शरीर तभी भोग को भोग सकेगा, जब स्वस्थ होगा और स्वस्थ तभी रहेगा जब परिश्रम करेगा। तैयार सुविधाएँ मिलें और पका हुआ भोजन मिले तो वह कितने दिन भोग सकेगा ?”

एक होता है यत्नतः तप करना जो तपस्वी के लिए है, संन्यासी के लिए है, योगी के लिए है दूसरा है सहज तप। जो ईश्वर के रास्ते जाते हैं उन्हें यत्नतः तप नहीं करना है वरन् ईश्वर के रास्ते आने वाली कठिनाइयों को हँसते-हँसते सह लें, जो भी कष्ट और मुसीबतें आयें उऩ्हें हँसते-हँसते गुजरने दें और अपने मन को ईश्वर के जप ध्यान में लगाये रखें, आसक्तिरहित कर्म में लगाये रखें, उनका वही तप हो जाता है।

तपस्वी प्रयत्नपूर्वक तप करता है तो तप में कर्त्तापन रहता है लेकिन जो स्वाभाविक सुख-दुःख आते हैं उनमें सम बुद्धि रखता है, उसे कर्त्तापन का बोझ नहीं लगता। कभी बीमार हो जाओ तो ऐसा नहीं होना चाहिए किः ‘हाय  मैं बीमार हूँ, दुःखी हूँ, ठीक हो जाऊँ।’ ऐसा करने से शायद तुम ठीक तो हो जाओ, दुःख तो मिटेगा लेकिन वह तप नहीं होगा। इसकी जगह बिमारी में भी चिन्तन करें कि- ‘मैं बीमार नहीं हूँ, यह शरीर का तप हो रहा है… मेरे कर्म कट रहे हैं…’ इस भावना से बिमारी के कष्ट को सहते हुए उसे निवृत्त करने का यत्न करें। इससे कर्म भी कटेंगे, तपस्या भी होगी और आरोग्यता भी प्राप्त हो जायेगी। आपका मन जैसा दृढ़ संकल्प करता है, उसी प्रकार की आपको मदद मिलती है।

जब आसक्ति होगी तो स्वार्थयुक्त कर्म करने में रूचि होगी लेकिन कर्म निःस्वार्थ हों, परहित के हों, शास्त्र-संत अनुमोदित हों-इस प्रकार की समझ होगी तो श्रीकृष्ण कहते हैं- ‘आसक्तिरहित कर्म करने वाला संन्यासी है, योगी है।’

एक आदमी ने सोचा किः ‘500 रूपये दान करने हैं।’ वह किसी महाराज के पास गया और बोलाः “महाराज ! ये 500 रूपये ले लीजिये।”

महाराजः “हम त्यागी हैं रूपयों को स्पर्श नहीं करते।”

व्यक्तिः “आप नहीं छूते लेकिन मुझे तो दान करना है।”

महाराजः “किसी और को दे दो।”

वह आदमी गया सिनेमा थियेटर की ओर 100 टिकटें सिनेमा की लेकर बाँट दीं। क्या यह दान हुआ ? यह तो लोगों की और भी खाना खराबी हुई। लोगों के तन-मन की हानि का कार्य हुआ।

दूसरे का दुःख निवृत्त हो, दूसरे का अज्ञान निवृत्त हो इस प्रकार का दान करना योग्य है। जिसका पेट पहले से ही भरा है, उसको रोटी का दान करना व्यर्थ है। अगर दान करना है तो भूखे को रोटी का दान करना चाहिए। प्यासे को पानी पिलाना चाहिए। राह भूले हुए को पानी की आवश्यकता नहीं है, उसे रास्ता दिखाना ही आपका कर्तव्य है।

भूखे को भोजन कराना एवं प्यासे को  पानी पिलाना सत्कर्म है लेकिन अशांत के लिए भोजन-पानी की आवश्यकता नहीं, अशांत के लिए तो शांति के वचन चाहिए। ऐसे ही अभक्त को भक्ति मिले, अज्ञानी को ज्ञान मिले, निगुरा सगुरा हो जाये और सगुरा साक्षात्कार की तरफ चले, ऐसा प्रयास योग्य कर्म है।

ये योग्यकर्म भी आसक्तिरहित होकर करें। ऐसों के लिए श्रीकृष्ण कहते हैं- “जो पुरुष कर्मफल का आश्रय न लेकर करने योग्य कर्म करता है, वह संन्यासी तथा योगी है।”

अतः आप अपने जीवन में जहाँ भी हों, व्यवहार में संन्यास और योग को प्रविष्ट करें। भीतर पावन रस का झरना खोलें। सदैव याद रखें-संसार में आसक्ति करने और पच मरने के लिए आपका जन्म नहीं हुआ है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जुलाई 2001, पृष्ठ संख्या 10-13, अंक 103

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शब्द की चोट


शब्दों का बड़ा भारी असर होता है। दिन रात अज्ञानता के शब्द सुनते रहने से अज्ञान दृढ़ हो जाता है, विकारों के शब्द सुनते रहने से मन विकारी बन जाता है, निंदा के शब्द सुनते रहने से चित्त संशयवाला बन जाता है, प्रशंसा के शब्द सुनते रहने से चित्त में अहंभाव आ जाता है। परमात्मस्वरूप के शब्द सुनकर चित्त देर सबेर आत्मा-परमात्मा में भी जाग जाता है।

‘अंधे की औलाद अंधी….’ द्रौपदी के इन शब्दों ने ही महाभारत का युद्ध करवा दिया।  ये शब्द ही दुर्योधन को चुभ गये और समय पाकर भरी सभा में द्रौपदी को निर्वस्त्र करने का प्रयास इन्हीं शब्दों ने करवाया।

हाड़  मांस की देह मम, वा में इतनी प्रीति।

या ते आधी जो राम प्रति, अवश मिटे भव भीति।।

रत्नावली के इन्ही शब्दों ने अपने पति को संत तुलसीदास बना दिया।

ध्रुव को अपनी सौतेली माँ के शब्द लग गये और वह चल पड़ा तो अटल पदवी पाने में समर्थ हो गया, महान हो गया।

ऋषभदेव मुनि के शब्दों ने सम्राट भरत को योगी भरत बना दियाः

गुरुर्न स स्यात्स्वजनो न स स्यात् पिता न स स्याज्जननी न सा स्यात्।

दैवं न तत्स्यान्न पतिश्च स स्यान्न मोचयेद्यः समुपेतमृत्युम्।।

‘जो अपने प्रिय संबंधी को भगवदभक्ति का उपदेश देकर मृत्यु की फाँसी से नहीं छुड़ाता, वह गुरु गुरु नहीं है, स्वजन स्वजन नहीं है, पिता पिता नहीं है, माता माता नहीं, इष्टदेव इष्टदेव नहीं है और पति पति नहीं है।’ (श्रीमद् भागवत 5.518)

अजनाबखण्ड के एकछत्र सम्राट भरत जिनके नाम से हमारे देश का नाम ‘भारत’ पड़ा, अपने पिता के इन दो शब्दों को याद रखते हुए चल पड़े तो वे योगी भरत बन गये।

एक बार ऋषभदेव मुनि यात्रा करते-करते अयोध्या पहुँचे। वहाँ पंडितों-साधुओं ने उनका खूब सम्मान किया क्योंकि वे राजा होने के साथ-साथ महाराज भी थे। भोग के सम्राट अब योग के सम्राट थे। किसी ने कहा किः “जैसे, ऋषभदेव मुक्तात्मा हैं वैसे ही उनके सपूत भी मुक्तात्मा बनेंगे।”

तब दूसरे ने कहाः “यह कैसे हो सकता है ? वे तो पूरे अजनाबखण्ड के राजा बन बैठे हैं। उनके जीवन में त्याग, तपस्या, एकांत, मौन, ध्यान-साधना आदि कहाँ हैं ? तुम कैसी बातें कर रहे हो ?”

अयोध्या के पंडितों में वाद-विवाद चल पड़ा। दो पक्ष हो गये। एक पक्ष कहने लगा किः “हाँ, वे योग के सम्राट बन सकते हैं क्योंकि विचारवान हैं।” जबकि दूसरा दल कहने लगा किः “यह कैसे हो सकता है ? वे तो राज्य के दलदल में पड़े हैं।”

बात ऋषभदेव जी के पास पहुँची, तब उन्होंने कहाः “हाँ, भरत मुक्तात्मा होगा। मेरा पुत्र है इसलिए नहीं कहता हूँ।”

तब पंडितों ने निवेदन किया किः “आपके पुत्र हैं इसलिए नहीं, फिर भी वे मुक्तात्मा होंगे, इसका क्या कारण है ?”

तब ऋषभदेव जी बोलेः “भरत के अन्दर विवेक है। उसने पुरोहितों से कह रखा है कि ‘तुम लोग राजाधिराज महाराज ! आपकी जय हो….’ ऐसा मत बोला करो। आप मेरा हित चाहते हो तो केवल इन्हीं दो शब्दों से मेरा अभिवादन करोः ‘वर्धते भयं….. वर्धते भयं…. भय बढ़ रहा है… भय बढ़ रहा है…..’ यही मुझे सुनाया करो। अर्थात् ज्यों-ज्यों दिन बीत रहे हैं, त्यों-त्यों के दिन नजदीक आ रहे हैं। इतना आप कहा करो।

इस प्रकार का  विवेक है भरत के पास, इसलिए वह संसार के दलदल में नहीं फँसेगा। मौत आकर गला दबोचे उसके पहले भरत अमरता की तरफ चल पड़ेगा।”

हुआ भी ऐसा ही। सम्राट आगे चलकर योगी भरत हो गये।

आप भी अपने घर की दीवार पर ये शब्द लिख दोः ‘आखिर कब तक ?’

‘इतना मिला…. इतना पाया…. फिर क्या ? आखिर कब तक ?’

पंडित जवाहर लाल नेहरू और उनकी बेटी श्रीमती इंदिरा गाँधी जिनके चरणों में मस्तक नवाते थे, उन आनंदमयी माँ को सत्संग सुनाने की योग्यता खेत की रखवाली करने वाले शांतनु में कैसे आ गयी ?

शांतनु के पिता पुरोहिती का कार्य करते थे और थोड़ी बहुत खेतीबाड़ी भी करते थे। दिन में उनके पिता और दादा खेत की रखवाली करते और शाम को वे स्वयं चक्कर लगाते।

खेत में रोज एक बकरा घुस जाता। वह मजबूत और कुशल था कि खेत बिगाड़ कर चला जाता और हाथ में नहीं आता था। एक दिन सात साल का शांतनु सुबह-सुबह हाथ में चाकू लेकर यह सोचकर खेत में कहीं छुप गया किः ‘यह बकरे का बच्चा मेरा खेत खा जाता है। आज इसका पेट फाड़ डालूँगा।’

इतने में उसी गाँव का एक पंडित वहाँ से गुजरा। उसकी नजर शांतनु पर पड़ी तो पूछाः “हे ब्राह्मणपुत्र शांतनु ! इस प्रकार छुपकर क्यों बैठे हो ? क्या बात है ?”

पहली बार पूछने पर उसने जवाब नहीं दिया। तब उस पंडित ने आग्रहपूर्वक दो तीन बार यही बात पूछी। शांतनु के हाथ से चाकू गिर पड़ा और उसने सारी बात सच-सच बता दी।

पंडितः “शांतनु ! यह काम तुम्हारे योग्य नहीं है, तुम्हारे लायक नहीं है। तुम ब्राह्मण हो। बकरे को चाकू मारना तो कसाई का काम है।”

‘यह तुम्हारे योग्य नहीं है….’ ये शब्द सुनकर शांतनु के जीवन ने करवट बदली और वही शांतनु ‘स्वामी अखण्डानन्द सरस्वती’ के नाम से प्रसिद्ध हुए।

कितना सामर्थ्य छुपा है शब्दों में ! किताबें पढ़कर, लकीर के फकीर होकर अथवा अनपढ़ होकर भी क्या करोगे ? न अधिक ऐहिक पढ़ाई अच्छी है न अनपढ़ रहना अच्छा है। अच्छे में अच्छा तो परमात्मदेव का ज्ञान है, परमात्मप्रीति है, परमात्मरस है, वही सार है।

न निर्धन होने में सार है, न धनवान होने में सार है। महिला होने में भी सार नहीं। मूर्ख होने में भी सार नहीं, विद्वान होने में भी सार नहीं। बहुत जीने में भी सार नहीं, जल्दी मरने में भी सार नहीं। यक्ष-गंधर्व होने में भी सार नहीं और देवता होने में भी सार नहीं। वशिष्ठजी महाराज कहते हैं किः “हे राम जी ! मैं चौदह भुवनों में घूमा। अतल, वितल, तलातल, रसातल, पाताल एव भूर्लोक, भुवर्लोक, जनलोक आदि में भी घूम आया किन्तु कहीं भी सार नहीं। केवल एक जगह पर ही सार दिखा। जहाँ संत का मन ठहरता है उस आत्मा में सार है, उस परमात्मा में सार है।”

अतः उसी का नाम-स्मरण करो, उसी के शब्द सुनो, उसी की ओर ले जाने वाले शब्द बोलो-सोचो और उसी की शांति, आनंद पाने का पुनः पुनः अभ्यास करो।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जून 2001, पृष्ठ संख्या 15-16, अंक 102

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