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Prerak Prasang

सुरक्षित नाव


संत श्री आसाराम जी बापू के सत्संग-प्रवचन से

एक बार मदालसा के छोटे पुत्र ने अपनी माँ से प्रश्न कियाः

“हे कल्याणयी पुण्यशीला माता ! मेरे सभी बड़े भाइयों को आपने उपदेश देकर जंगल में घोर तपस्या करने एवं कठिन जीवन बिताने के लिए प्रेरित किया ? आप तो माँ हैं। उन्हें भजन ही करना था तो वे आराम से महल में रहकर भी तो भजन कर सकते थे। हमारे पास बहुत सा राज वैभव है। उन्हें अलग से महल दे देते, नियमित भोजन मिलता, छोटा सा बाग बगीचा होता, भजन करने सब सुविधाएँ हो सकती थीं। वे भी साधना करना चाहते थे और आप भी चाहती थीं कि वे साधना करें। फिर भी उन्होंने घर क्यों छोड़ा ?”

तब उस देवी ने कहाः “पुत्र ! अगर किसी नदी को पार करना हो तो नाव की जरूरत पड़ती है। मान लो, एक सजी-धजी नाव सब सुविधाओं से युक्त हो किन्तु उसमें छिद्र हो तथा दूसरी नाव देखने में एकदम साधारण हो, किन्तु छिद्ररहित हो तो यात्री किस नाव से नदी पर कर सकेगा ? सुविधायुक्त छिद्रवाली नाव से अथवा छिद्ररहित कम सुविधाओंवाली नाव से ?”

पुत्रः “बेशक छिद्र रहित नाव से।”

मदालसाः “ऐसे ही भोग विलास में रहकर सुख-सुविधाओं के बीच रहकर भजन करना, छिद्रवाली नाव में बैठकर यात्रा करने जैसा है, जबकि एकांत में, आश्रम में रहकर भजन करना – यह सुरक्षित नाव में बैठकर यात्रा करने जैसा है। इसीलिए मैंने उन्हें वन में भेजा।”

जो लोग सोचते हैं कि ʹअभी नहीं वरन् ʹरिटायरमेन्टʹ के बाद हम आराम से भजन करेंगे… बेटे-बेटी की शादी के बाद आराम से भजन करेंगे….ʹ उनकी यह आराम से भजन करने की बात आखिर तक बात ही रह जाती है, उनका आराम हराम हो जाता है। फिर वे निराश होकर मर जाते हैं। अतः अभी से भजन करना शुरु कर दो। आराम से भजन नहीं, वरन् प्रभु के लिए भजन करो। ईश्वर के लिए भजन करो। आज संसार के चिन्तन की जगह परमात्मचिंतन करो, उसी में मशगूल रहो और अपने अंतःकरण को उन्नत करो तो बाकी का काम तो आपके थोड़े से प्रयास से ही आराम से हो जायेगा और शाश्वत आराम आपको अपने ही रामस्वरूप में, आत्मस्वरूप में मिलेगा। भोग-विलास और प्रमाद आपको खोखला बना देगा, अतः अपने ब्रह्म-परमात्मा में आराम पाओ।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, फरवरी 2000, पृष्ठ संख्या 23,24 अंक 86

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दान का रहस्य


संत श्री आसारामजी बापू के सत्संग-प्रवचन

स्नान-दान आदि पुण्य कर्म हैं किन्तु दान करते समय दाता अगर आनंदित नहीं हुआ, उसके भीतर शुभ का भाव उदित नहीं हुआ तो दान का सुखद फल नहीं मिलता। जो दान जबरदस्ती करवाया गया हो, झिझकते हुए किया गया हो, दबास से कराया गया हो-स्वर्ग में भी उसका कोई सुखद फल नहीं मिलता।

कोई नेता आकर किसी सेठ से कहेः “अरे भाई ! दान करो।”

सेठ कहेः “लिखो, दो हजार।”

“नहीं नहीं, सेठ ! आपका तो 11 हजार लिखेंगे।”

सेठ का मन में होता है कि ʹयह नेता तो जरा ऐसा ही। अगर पाँच नहीं दूँगा तो कहीँ आयकरवालों से छापा न मरवा दे !ʹ अतः वह बोलता हैः “साहब ! ऐसा करें कि दो नहीं, पाँच हजार लिख लें।”

सेठ बाहर से तो पाँच की उदारता दिखाता है किन्तु भीतर से सुखी नहीं होता। उसे दान भाव का एहसास नहीं होता, वरन् ऐसा होता है कि ʹचलो, मुसीबत टली।ʹ

जब दान अपनी ओर से दिया जाता है जैसे किसी दरिद्र को उसकी आवश्यकता की वस्तु का दान दे दिया, किसी रोगी को औषधि का दान दे दिया, किसी थके-हरे, निराश व्यक्ति को सान्त्वना का दान दे दिया, अभक्त को भगवान की भक्ति का दान दिलवा दिया…. तब ऐसे दान का भी यदि अंतःकरण में आनंद आता है तो ठीक, अन्यथा ऐसे दान का भी ज्यादा महत्त्व नहीं है।

इस प्रकार दान का भी अपना एक रहस्य है। इस संदर्भ में शास्त्रों में एक प्रसंग आता हैः

एक बार देवर्षि नारद महीसागर संगम में स्नान हेतु पधारें। उसी समय वहाँ बहुत से ऋषि-मुनि भी आ पहुँचे। नारदजी ने उनसे पूछाः “महात्माओं ! आप लोग कहाँ से पधारे हैं ?”

उन्होंने बतायाः “मुने ! हम लोग सौराष्ट्र देश में रहते हैं, जहाँ के राजा धर्मवर्मा हैं। एक बार राजा धर्मवर्मा ने दान के तत्त्व को समझने के लिए बहुत वर्षों तक तपस्या की। तब आकाशवाणी ने उन्हें निम्नांकित श्लोक सुनायाः

द्विहेतुः षडधिष्ठानं षडंगं च द्विपाकयुक्।

चतुष्प्रकारं त्रिविधं त्रिनाशं दानमुच्यते।।

ʹदान के दो हेतु, छः अधिष्ठान, छः अंग, दो फल, चार प्रकार, तीन भेद एवं तीन विनाश साधन हैं।ʹ

यह श्लोक कहकर आकाशवाणी मौन हो गयी। राजा के पूछने पर भी आकाशवाणी ने उसका अर्थ नहीं बतलाया तब राजा ने ढिंढोरा पिटवाकर यह घोषणा करवायी किः ʹजो इस श्लोक की ठीक-ठीक व्याख्या करेगा, उसे मैं सात लाख गौएँ, उतनी ही स्वर्णमुद्राएँ तथा सात गाँव दूँगा।ʹ हम सब वहीं से आ रहे हैं। श्लोक का अर्थ दुर्बोध होने से कोई उसकी व्याख्या नहीं कर सकता है।”

नारदजी यह सुनकर बड़े प्रसन्न हुए। वे एक वृद्ध ब्राह्मण का रूप लेकर धर्मवर्मा के पास पहुँचे एवं बोलेः

“राजन ! मुझसे उस श्लोक की व्याख्या सुनिये एवं उसके बदले में जो देने के लिए ढिंढोरा पिटवाया है, उसकी सत्यता प्रमाणित कीजिये।”

राजाः “ब्राह्मण ! ऐसी बात तो बहुत-से ब्राह्मण कह चुके किन्तु किसी ने भी उसका वास्तविक अर्थ नहीं बताया। दान के दो हेतु कौन-से हैं ? छः अधिष्ठान एवं छः अंग  कौन से हैं ? दो फल, चार प्रकार, तीन भेद एवं तीन विनाश-साधन कौन-से हैं ? इन सात प्रश्नों के उत्तर यदि आप ठीक-ठीक बतला सकें तो मैं आपको सात लाख गौएँ, सात लाख स्वर्णमुद्राएँ एवं सात गाँव दूँगा।”

ब्राह्मण वेशधारी नारदजी बोलेः “राजन् ! दान के दो हेतु हैं – सामर्थ्य और श्रद्धा। श्रद्धा है और धन नहीं है तो क्या दान दिया जा सकता है ? ऐसे ही सामर्थ्य है पर श्रद्धा नहीं है, तब भी दान नहीं दिया जा सकता।

धर्म, अर्थ, काम, लज्जा, हर्ष और भय-ये दान के छः अधिष्ठान कहे जाते हैं। जो दान सत्पात्र को, सत्प्रवृत्ति के लिए भगवान का समझकर दिया जाये-वह दान उत्तम है। उससे धर्म लाभ होता है।

जो दान इस भाव से दिया जाये कि यहाँ देंगे तो वहाँ (परलोक में) मिलेगाʹ – यह अर्थयुक्त दान है।

कोई कामना पूर्ण हुई और दान कर दिया-यह कामयुक्त दान है। जैसे ʹमेरा इतना काम हो जाये तो मैं बूंदी के सवा मन लड्डू चढ़ाऊँगा।ʹ जिस दान में यह भाव हो कि ʹकई लोग कर रहे हैं। हम कुछ नहीं देंगे तो ठीक नहीं। चलो, कुछ दे देवें।ʹ यह लज्जायुक्त दान है। यदि दान नहीं देंगे तो पता नहीं, यह हमारा अहित न कर दें – इस भाव से जो दान दिया जाता है, वह भययुक्त दान है।

किसी भाट-चारण ने प्रशंसा कर दी और हर्षित होकर उसे कुछ दे दिया – इस प्रकार दान हर्षयुक्त दान कहलाता है।

इस प्रकार धर्म, अर्थ, काम, लज्जा, भय और हर्ष – ये दान के छः अधिष्ठान हैं। इन्हीं के कारण दान होता है।

दान के छः अंग हैं-1. दाता अर्थात् दान करने वाला। 2.  प्रतिगृहता अर्थात् दान लेने वाला। 3. शुद्धि अर्थात् अपनी शुद्ध कमाई का। कसाई, वेश्या आदि का धन अशुद्ध माना जाता है। 4. धर्मयुक्त देय वस्तु अर्थात् पवित्र वस्तु। 5. देश अर्थात् पवित्र स्थान। 6. काल अर्थात् पवित्र समय।

इहलोक एवं परलोक – दान के ये दो फल हैं।

ध्रुव, त्रिक, काम्य और नैमित्तिक – ये दान के चार प्रकार हैं। कुआँ-पोखरा खुदवाना, बगीचा लगाना आदि जो सबके काम आये वह ध्रुव है।

नित्य दान ही त्रिक है। संतान, विजय, स्त्री आदिविषयक इच्छापूर्ति के लिए दिया गया दान काम्य है। ग्रहण-सक्रान्ति आदि पुण्य अवसरों पर दिया गया दान नैमित्तिक  है।

उत्तम, मध्यम, कनिष्ठ – ये दान के तीन भेद हैं।

दान देकर पछताना, कुपात्र को दान देना, बिना श्रद्धा के दान देना अर्थात् पश्चाताप, कुपात्र और अश्रद्धा – ये दान के तीन नाशक हैं।

राजन ! इस प्रकार मैंने तुम्हें तुम्हारे सात प्रश्नों के जवाब के रूप में दान का माहात्म्य सुना दिया।”

प्रश्नों के समुचित उत्तर पाकर धर्मवर्मा अत्यन्त चकित हुआ एवं बोलाः “जिस प्रश्न को बड़े-बड़े विद्वान तक न सुलझा पाये, उन्हें आपने बड़ी सरलता से बता दिया। वृद्ध ब्राह्मण के वेश में छुपे हुए आप कौन हैं ? कृपा आप अपने असली स्वरूप में प्रगट होइए।”

तब देवर्षि नारद अपने असली स्वरूप में आकर बोलेः “मैं देवर्षि नारद हूँ। मृत्युलोक के ब्राह्मण तुम्हें जवाब नहीं दे सके इसीलिए बूढ़े ब्राह्मण का रूप बनाकर मैं स्वयं उत्तर देने आया।”

राजा ! मेरा अहोभाग्य ! अब आप ये सात लाख गौएँ, सात लाख मुद्राएँ एवं सात गाँव लेने की कृपा कीजिये।”

देवर्षि नारदः “ठीक है। तुम्हारा संकल्प मैं ले लेता हूँ। अभी इन चीजों को मैं तुम्हारे पास ही धरोहर के रूप में छोड़ रहा हूँ। आवश्यकता पड़ने पर ले लूँगा।

ऐसा कहकर नारद जी रैवतक पर्वत पर चले गये और विचारने लगे कि मैंने भूमि, गौएँ एवं स्वर्णमुद्राएँ पा लीं, पर अब योग्य ब्राह्मण कहाँ मिले जिसे मैं ये सब दान दे सकूँ ? यह सोचकर उन्होंने बारह प्रश्न बनाये और उन्हें ही गाते हुए वे ऋषियों के आश्रमों पर विचरने लगे। नारदजी उन प्रश्नों को पूछते हुए सारी पृथ्वी घूम आये, पर कहीं उन प्रश्नों का समाधान न हुआ। योग्य ब्राह्मण न मिलने के कारण नारदजी बड़े दुःखी हुए और हिमालय पर्वत पर एकान्त में बैठकर विचारने लगे। सोचते-सोचते अकस्मात् उनके ध्यान में आया कि ʹमैं कलापग्राम तो गया ही नहीं। वहाँ 84 हजार विद्वान ब्राह्मण नित्य तपस्या करते हैं। सूर्य-चन्द्र वंश एवं सदब्राह्मणों के पुनः प्रवर्त्तक देवापि और मरूत वहीं रहते हैं।ʹ यों विचारकर वे आकाशमार्ग से कलापग्राम पहुँचे। वहाँ उन्होंने बड़े तेजस्वी, विद्वान एवं कर्मनिष्ठ ब्राह्मणों को देखा। उन्हें देखकर नारदजी बड़े प्रसन्न हुए। ब्राह्मण जहाँ बैठे शास्त्र-चर्चा कर रहे थे, वहाँ जाकर नारदजी ने कहाः “आप लोग यह क्या काँव-काँव कर रहे हैं ? यदि कुछ समझने की शक्ति है तो मेरे कठिन प्रश्नों का समाधान कीजिये।”

यह सुनकर ब्राह्मण बड़े अचंभे में पड़ गये और बोलेः “वाह ! सुनाओ तो जरा अपने प्रश्नों को।”

नारदजी ने कहाः “मेरे बारह प्रश्न इस प्रकार हैं- 1 मातृका क्या और कितनी हैं ? 2 . पच्चीस वस्तुओं से बना अदभुत गृह क्या है ? 3. अनेक रूपोंवाली स्त्री को एक रूपवाली बनाने की कला का ज्ञान किसको है ? 4. संसार में विचित्र कथा की रचना कौन जानता है ? 5. समुद्र में बड़ा ग्राह कौन है ? 6. आठ प्रकार के ब्राह्मण कौन हैं ? 7. चार युगों के आरम्भ दिन कौन से हैं ? 8. चौदह मन्वन्तरों का आरम्भ किस दिन हुआ ? 9. सूर्यनारायण रथ पर पहले-पहल किस दिन बैठे ? 10. काले साँप की तरह प्राणियों का उद्वेजक कौन है ? 11. इस घोर संसार में सबसे बड़ा चतुर कौन है ? 12. दो मार्ग कौन-से हैं ?”

नारदजी के प्रश्नों को सुनकर वे मुनि कहने लगेः “मुने ! आपके ये प्रश्न तो बालकों के प्रश्न जैसे हैं। आप यहाँ जिसे सबसे छोटा एवं मूर्ख समझते हों, उसी से पूछिये। वही इनका उत्तर दे देगा।”

अब नारदजी बड़े विस्मय में पड़ गये ! उन्होंने एक बालक से, जिसका नाम सुतनु था, ये प्रश्न पूछेः सुतनु ने कहाः “इन बालोचित प्रश्नों के उत्तर में मेरा मन नहीं लगता। फिर भी आपने मुझे सबसे छोटा एवं मूर्ख समझा है, इसलिए कहना पड़ता है। आपके प्रश्नों के उत्तर क्रमशः इस प्रकार हैं-

1.अ,आ,इ,ई…..वगैरह बावन अक्षर ही मातृका हैं। 2. पच्चीस तत्त्वों से बना हुआ गृह यह शरीर ही है। 3. बुद्धि ही अनेक रूपों वाली स्त्री है। जब इसके साथ धर्म का संयोग होता है तब यह एकरूपा हो जाती है। 4. विचित्र रचनायुक्त कथन करना पण्डित ही जानते हैं। 5. इस संसारसागर में लोभ ही महाग्राह है। 6. मात्र, ब्राह्मण, श्रोत्रिय, अनूचान, भ्रूण, ऋषिकल्प, ऋषि और मुनि – ये आठ प्रकार के ब्राह्मण हैं। इनमें जो केवल ब्राह्मणकुल में उत्पन्न हैं और संस्कार आदि से हीन हैं, वह ʹमात्रʹ हैं। कामनारहित होकर सदाचारी, वेदोक्त कर्मकाण्डी ब्राह्मण ʹब्राह्मणʹ कहा जाता है। वेद-वेदांगों का पूर्ण ज्ञान प्राप्त कर षट्कर्मपरायण ब्राह्मण ʹश्रोत्रियʹ है। वेद का पूर्ण तत्त्वज्ञ, शुद्धात्मा, केवल शिष्यों को अध्यापन कराने वाला ब्राह्मण ʹअनूचानʹ है। यज्ञावशिष्ट भोजी पूर्वोक्त अनूचान ही ʹभ्रूणʹ है। लौकिक, वैदिक समस्त ज्ञान से परिपूर्ण, जितेन्द्रिय ब्राह्मण ʹऋषिकल्पʹ है। ऊर्ध्वरेता, निःसंशय, शापानुग्रह-सक्षम, सत्यसन्ध ब्राह्मण ʹऋषिʹ है। सदा ध्यानस्थ, मृत्तिका और सुवर्ण में तुल्य दृष्टिवाला ब्राह्मण ʹमुनिʹ है।

अब सातवें प्रश्न का उत्तर सुनिये। कार्तिक शुक्ल नवमी को सतयुग का, वैशाख शुक्ल तृतिया को त्रेता का, माघ कृष्ण अमावस्या को द्वापर का और भाद्रपद कृष्ण त्रयोदशी को कलियुग का आरंभ हुआ। अतः उक्त तिथियाँ युगादि कही जाती हैं।

8.आश्विन शुक्ल नवमी, कार्तिक शुक्ल द्वादशी, चैत्र शुक्ल तृतिया, भाद्रपद शुक्ल तृतिया, फाल्गुन कृष्ण अमावस्या, पौष शुक्ल एकादशी, आषाढ़ शुक्ल दशमी, माघ शुक्ल सप्तमी, श्रावण कृष्ण अष्टमी, आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा और ज्येष्ठ की पूर्णिमा – ये स्वायम्भुव आदि चौदह मन्वन्तरों की आदि तिथियाँ हैं।

9.माघ शुक्ल सप्तमी को पहले-पहल भगवान सूर्य रथ पर सवार हुए थे। 10. सदा माँगने वाला ही उद्वेजक है। 11. पूर्ण चतुर या दक्ष वही है, जो मनुष्य जन्म का मूल्य समझकर इससे अपना पूर्ण निःश्रेयसादि सिद्ध कर लेता है। 12. ʹअर्चिʹ और ʹधूमʹ ये दो मार्ग हैं। अर्चि मार्ग से जाने वालों को मोक्ष होता है और धूममार्ग से जाने वालों को पुनः लौटना पड़ता है।

इन उत्तरों को सुनकर नारदजी बड़े प्रसन्न हुए और उस बालक को धर्मवर्मा से प्राप्त अपनी भूमि, सात लाख गौएँ आदि सब दान कर दिया।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, नवम्बर 1999, पृष्ठ संख्या 13-16, अंक 83

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सौ अश्वमेध यज्ञों का फल


संत श्री आसारामजी बापू के सत्संग-प्रवचन से

एक महात्मा गंगा किनारे घूम रहे थे। एक दिन उन्होंने संकल्प कियाः ʹआज किसी से भी भिक्षा नहीं माँगूगा। जब मैं परमात्मा का हो गया, संन्यासी हो गया तो फिर अन्य किसी से क्या माँगना ? जब तक परमात्मा स्वयं आकर भोजन के लिए न पूछेगा तब तक किसी से न लूँगा।ʹ यह संकल्प करके, नहा-धोकर वे गंगा-तट पर बैठ गये।

सुबह बीती… दोपहर हुई…. एक दो बज गये… भूख भी लगी किन्तु श्रद्धा के बल से वे बैठे रहे। उन्हें सुबह से वहीं बैठा हुआ देखकर किसी सदगृहस्थ ने पूछाः

“बाबा ! भोजन करेंगे ?”

“नहीं।”

“मेरे साथ चलेंगे ?”

“नहीं।”

गृहस्थ अपने घर गया लेकिन भोजन करने को मन नहीं माना। वह अपनी पत्नी से बोलाः “बाहर एक महात्मा भूखे बैठे हैं। हम कैसे खा सकते हैं ?” यह सुनकर पत्नी ने भी नहीं खाया। इतने में स्कूल से उनकी बेटी घर आ गयी। थोड़ी देर बाद उनका बेटा भी आ गया। दोनों को भूख लगी थी किन्तु वस्तुस्थिति जानकर वे भी भूखे रहे।

सब मिलकर उन संन्यासी के पास गये और बोलेः “चलिए महात्मन् ! भोजन ग्रहण कर लीजिए।”

महात्मा ने सोचा कि एक नहीं तो दूसरा व्यक्ति आकर तंग करेगा। अतः वे बोलेः “मेरे भोजन के बाद मुझे जिस घर से सौ अश्वमेध यज्ञों की दक्षिणा मिलेगी, उसी घर का भोजन करूँगा।”

घर आकर नन्हीं बालिका पूजा-कक्ष में बैठी एवं परमात्मा से प्रार्थना करने लगी। शुद्ध हृदय से, आर्त भाव से की गयी प्रार्थना तो प्रभु सुनते ही हैं। अतः उसके हृदय में भी परमात्म-प्रेरणा हुई।

वह पूजा-कक्ष से बाहर आयी। अपने भाई के हाथ में पानी का लोटा दिया एवं स्वयं भोजन की थाली सजाकर, दूसरी थाली से ढँककर भाई को छिड़कता हुआ जा रहा था। पानी के छिड़कने से शुद्ध बने हुए मार्ग पर वह पीछे-पीछे चल रही थी। आखिर में बच्ची ने जाकर संन्यासी के चरणों में थाल रखा एवं भोजन करने की प्रार्थना कीः “महाराज ! आप भोजन कीजिये। आप दक्षिणा के रूप में सौ अश्वमेध यज्ञों का फल चाहते हैं न ? वह हम आपको दे देंगे।”

संन्यासीः “तुमने, तुम्हारे पिता एवं दादा ने एक भी अश्वमेध यज्ञ नहीं किया होगा फिर तुम सौ अश्वमेध यज्ञों का फल कैसे दे सकती हो ?”

बच्चीः “महाराज ! आप भोजन कीजिए। सौ अश्वमेध यज्ञों का फल हम आपको अर्पण करते हैं।  शास्त्रों में लिखा है किः ʹभगवान के सच्चे भक्त जहाँ रहते हैं, वहाँ पर एक-एक कदम चलकर जाने से एक-एक अश्वमेध यज्ञ का फल होता है।ʹ महाराज ! आप जहाँ बैठे हैं, वहाँ से हमारा घर 200-300 कदम दूर है। इस प्रकार हमें इतने अश्वमेध यज्ञों का फल मिला। इनमें से सौ अश्वमेध यज्ञों का फल हम आपके चरणों में अर्पित करते हैं, बाकी हमारे भाग्य में रहेगा।”

उस बालिका की तर्कयुक्त एवं अंतःप्रेरित बात सुनकर संन्यासी ने उस बच्ची को धन्यवाद देते हुए भोजन स्वीकार कर लिया।

कैसे हैं वे सबके अंतर्यामी प्रेरक परमेश्वर ! भक्त अपने संकल्प के कारण कहीं भूखा न रह जाये, यह सोचकर उन्होंने ठीक व्यवस्था कर ही दी। यदि कोई उनको पाने के लिए दृढ़तापूर्वक संकल्प करके चलता है तो उसके योगक्षेम का वहन वे सर्वेश्वर स्वयं करते हैं।

श्रीमद् भगवदगीता में उन्होंने कहा भी है किः

अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।

तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्।।

ʹजो अनन्य प्रेमी भक्तजन मुझ परमेश्वर को निरन्तर चिन्तन करते हुए निष्कामभाव से भजते हैं, उऩ नित्य-निरन्तर मेरा चिन्तन करने वाले पुरुषों का योगक्षेम मैं स्वयं  वहन करता हूँ।ʹ (गीताः 9.22)

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अगस्त 1999, पृष्ठ संख्या 22,23 अंक 80

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