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Prerak Prasang

सत्शिष्य के लक्षण


पूज्यपाद संत श्री आसारामजी बापू

सत्शिष्य के लक्षण बताते हुए कहा है किः

अमानमत्सरो दक्षो निर्ममो दृढ़सौहृदः।

असत्वरोर्थजिज्ञासुः अनसूयुः अमोघवाक्।।

ʹसत्शिष्य मान और मत्सर से रहित, अपने कार्य में दक्ष, ममतारहित, गुरु में दृढ़ प्रीति करने वाला, निश्चल चित्त वाला, परमार्थ का जिज्ञासु और ईर्ष्यारहित एवं सत्यवादी होता है।ʹ

इस प्रकार के नवगुणों से जो सुसज्जित होता है ऐसा सत्शिष्य सदगुरु के थोड़े से उपदेश मात्र से आत्म-साक्षात्कार करके जीवन्मुक्त पद में आरूढ़ हो जाता है।

ऐसे पद को पाये हुए ब्रह्मवेत्ता महापुरुष का सान्निध्य साधक के लिए नितांत आवश्यक। साधक को ब्रह्मवेत्ता महापुरुष का सान्निध्य मिल भी जाये, लेकिन उसमें यदि इन नवगुणों का अभाव है तो उसे ऐहिक लाभ जरूर होता है, किन्तु आत्म-साक्षात्कार के लाभ से वह वंचित रह जाता है।

अमानित्व, ईर्ष्या का अभाव तथा मत्सर का अभाव-इन सदगुणों के समावेश से साधक तमाम दोषों से बच जाता है एवं साधक का तन और मन आत्म-विश्रांति पाने के काबिल हो जाता है।

सत्शिष्यों का यह स्वभाव होता हैः वे आप अमानी रहते हैं और दूसरों को मान देते हैं। जैसे भगवान राम स्वयं अमानी रहकर दूसरों को मान देते थे।

साधक को क्या करना चाहिए ? वह अपनी बराबरी के लोगों को देखकर न ईर्ष्या करे, न अपने से छोटों को देखकर अहंकार करे और न ही अपने से बड़ों के सामने कुंठित हो, वरन् सबको गुरु का कृपापात्र समझकर, सबसे आदरपूर्ण व्यवहार करे, प्रेमपूर्ण व्यवहार करे। ऐसा करने से साधक धीरे-धीरे मान, मत्सर एवं ईर्ष्यारहित होने लगता है। खुद को मान मिले ऐसी इच्छा रखने पर मान नहीं मिलता है तो सुखाभास होता है एवं नश्वर मान की इच्छा और बढ़ती है। इस प्रकार मान की इच्छा मनुष्य को गुलाम बनाती है जबकि मान की इच्छा से रहित होने से मनुष्य स्वतंत्र बनता है। इसलिए साधक को हमेशा मानरहित बनने की कोशिश करनी चाहिए। जैसे मछली जाल में फँसती है तो छटपटाती है, ऐसे ही जब साधक प्रशंसकों के बीच में आये तब उसका मन छटपटाना चाहिए। जैसे, लुटेरों के बीच आ जाने पर सज्जन आदमी जल्दी से वहाँ से खिसकने की कोशिश करता है ऐसे ही साधक की प्रशंसकों, प्रलोभनों एवं विषयों से बचने की कोशिश करनी चाहिए।

जो तमोगुणी व्यक्ति होता है वह चाहता है कि ʹमुझे सब मान दें और मेरे पैरों तले सारी दुनिया रहे।ʹ जो रजोगुणी व्यक्ति होता है वह कहता है कि ʹहम दूसरों को मान देंगे तो वे भी हमें मान देंगे।ʹ ये दोनों प्रकार के लोग प्रत्यक्ष या परोक्षरूप से कोशिश करते हैं अपना मान बढ़ाने की ही। मान पाने के लिए वे संबंधों के तंतु जोड़ते ही रहते हैं और इससे इतना बहिर्मुख हो जाते हैं कि जिससे संबंध जोड़ना चाहिए उस अंतर्यामी परमेश्वर के लिए उनको फुरसत ही नहीं मिलती और आखिर में अपमानित होकर जगत से चले जाते हैं। ऐसा न हो इसलिए साधक को हमेशा याद रखना चाहिए कि चाहे कितना भी मान मिल जाये लेकिन मिलता तो है इस नश्वर शरीर को ही और शरीर को अंत में जलाना ही है तो फिर उसके लिए क्यों परेशान होना ?

संतों ने ठीक ही कहा हैः

मान पुड़ी है जहर की, खाये सो मर जाये।

चाह उसी की राखता, वह भी अति दुःख पाये।।

एक बार बुद्ध के चरणों में एक अपरिचित युवक आ गिरा और दंडवत प्रणाम करने लगा।

बुद्धः “अरे, अरे, यह क्या कर रहे हो ? तुम क्या चाहते हो ? मैं तो तुम्हें जानता तक नहीं।”

युवकः “भन्ते ! खड़े रहकर तो बहुत देख चुका। आज तक अपने पैरों पर खड़ा होता रहा इसलिए अहंकार भी साथ में खड़ा ही रहा और सिवाय दुःख के कुछ नहीं मिला। अतः आज मैं आपके श्रीचरणों में लेटकर विश्रांति पाना चाहता हूँ।”

अपने भिक्षुकों की ओर देखकर बुद्ध बोलेः “तुम सब रोज मुझे गुरु मानकर प्रणाम करते हो लेकिन कोई अपना अहं न मिटा पाया और यह अनजान युवक आज पहली बार में ही एक संत-फकीर के नाते मेरे सामने झुकते-झुकते अपने अहं को मिटाते हुए, बाहर की आकृति का अवलंबन करते हुए अंदर निराकार की शांति में डूब रहा है।”

इस घटना का यही आशय समझना है कि सच्चे संतों की शरण में जाकर साधक को अपना अहंकार विसर्जित कर देना चाहिए। ऐसा नहीं कि रास्ते जाते जहाँ-तहाँ आप लम्बे लेट जाएँ।

अमानमत्सरो दक्षो…..

साधक को चाहिए कि वह अपने कार्य में दक्ष हो। अपना कार्य क्या है ? अपना कार्य है कि प्रकृति के गुण-दोष से बचकर आत्मा में जगना और इस कार्य में दक्ष रहना  अर्थात् डटे रहना, लगे रहना। उस निमित्त जो भी सेवाकार्य करना पड़े उसमें दक्ष रहो। लापरवाही, उपेक्षा या बेवकूफी से कार्य से विफल नहीं होना चाहिए, दक्ष रहना चाहिए। जैसे, ग्राहक कितना भी दाम म करवाने को कहे, फिर भी लोभी व्यापारी दलील करते हुए अधिक-से-अधिक मुनाफा कमाने की कोशिश करता है, ऐसे ही ईश्वर-प्राप्ति के मार्ग में अपने चित्त को चलित करने के लिए कितनी ही प्रतिकूल परिस्थितियाँ आ जायें, फिर भी साधक को अपने परम लक्ष्य में डटे रहना चाहिए। सुख आये या दुःख, मान हो या अपमान, सबको देखते जाओ…. मन के विचारों को, प्राणों की गति को देखने की कला में दक्ष हो जाओ।

नौकरी कर रहे हो तो उसमें पूरे उत्साह से लग जाओ, विद्यार्थी हो तो उमंग के साथ पढ़ो, लेकिन व्यावहारिक दक्षता के साथ-साथ आध्यात्मिक दक्षता भी जीवन में होनी चाहिए। साधक को सदैव आत्मज्ञान की ओर आगे बढ़ना चाहिए। कार्यों को इतना नहीं बढ़ाना चाहिए कि आत्मचिंतन का समय ही न मिले। संबंधों को इतना नहीं बढ़ाना चाहिए कि, जिससे संबंध जोड़े जाते हैं उसी का पता न चले।

एकनाथ जी महाराज ने कहा है कि रात्रि के पहले प्रहर और आखिरी प्रहर में आत्म चिंतन करना चाहिए। कार्य के प्रारम्भ में और अंत में आत्मविचार करना चाहिए। दक्ष वह है जो जीवन में इच्छा उठे और पूरी हो जाये तब अपने आप से ही प्रश्न करे किः “आखिर इच्छापूर्ति से क्या मिलता है ?” ऐसा करने से इच्छानिवृत्ति के उच्च सिंहासन पर आसीन होने वाले दक्ष महापुरुष की नाई निर्वासनिक नारायण में प्रतिष्ठित हो जायेगा।

अगला सदगुण है ममतारहित होना। देह में अहंता और देह के संबंधियों में ममता होती है। जो मनुष्य अपने संबंधों के पीछे जितनी ममता रखता है, उतना ही उसके परिवार वाले उसको दुःख के दिन दिखा देते हैं। अतः साधक को देह एवं देह के संबंधों से ममतारहित बनना चाहिए।

आगे बात आती है-गुरु में दृढ़ प्रीति करने की। मनुष्य क्या करता है ? वास्तविक प्रेमरस को समझे बिना संसार के नश्वर पदार्थों में प्रेम का रस चखने जाता हूँ और अंत में हताशा, निराशा एवं पश्चाताप की खाई में गिर पड़ता है। इतने से भी छुटकारा नहीं मिलता। चौरासी लाख जन्मों की यातनाएँ सहने के लिए उसे बाध्य होना पड़ता है। शुद्ध प्रेम तो उसे कहते हैं जो भगवान और गुरु से किया जाता है। उनमें दृढ़ प्रीति करने वाला साधक आध्यात्मिकता के शिखर पर शीघ्र ही पहुँच जाता है। जितना अधिक प्रेम, उतना अधिक समर्पण और जितना अधिक समर्पण, उतना ही अधिक लाभ।

कबीर जी ने कहा हैः

प्रेम न खेतों उपजे, प्रेम न हाट बिकाय।

राजा चहो प्रजा चहो, शीश दिये ले जाय।।

शरीर की आसक्ति और अहंता जितनी मिट जाती है, उतना ही स्वभाव प्रेमपूर्ण बनता जाता है। इसीलिए छोटा-सा बच्चा, जो निर्दोष होता है, हमें बहुत प्यारा लगता है क्योंकि उसमें देहासक्ति नहीं होती। अतः शरीर की अहंता एवं आसक्ति छोड़कर गुरु में, प्रभु में दृढ़ प्रीति करने से अंतःकरण शुद्ध होता है। ʹविचारसागरʹ ग्रन्थ में भी आता है कि “गुरु में दृढ़ प्रीति करने से मन का मैल तो दूर होता ही है, साथ ही उनका उपदेश भी शीघ्र असर करने लगता है, जिससे मनुष्य की अविद्या और अज्ञान भी शीघ्र नष्ट हो जाता है।”

इस प्रकार गुरु में जितनी-जितनी निष्ठा बढ़ती जाती है, जितना-जितना सत्संग पचता जाता है उतना-उतना ही चित्त निर्मल व निश्चिंत होता जाता है।

इस प्रकार परमार्थ पाने की जिज्ञासा बढ़ती जाती है, जीवन में पवित्रता, सात्त्विकता, सच्चाई आदि गुण प्रगट होते जाते हैं और साधक ईर्ष्यारहित हो जाता है।

जिस साधक का जीवन  सत्य से युक्त, मान, मत्सर, ममता एवं ईर्ष्या से रहित होता है, जो गुरु में दृढ़ प्रीति वाला, कार्य में दक्ष एवं निश्चलचित्त होता है, परमार्थ का जिज्ञासु होता है – ऐसा नव गुणों से सुसज्ज साधक शीघ्र ही गुरुकृपा का अधिकारी होकर जीवन्मुक्ति के विलक्षण आनंद का अनुभव कर लेता है अर्थात् परमात्म-साक्षात्कार कर लेता है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जुलाई 1999, पृष्ठ संख्या 6-9, अंक 79

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निंदा से कोढ़ नाश ! – पूज्यपाद संत श्री आसारामजी बापू


मृत्यु के भय से तो मृत्यु तो बढ़िया है और बदनामी के भय से बदनामी अच्छी है। ʹबदʹ होना बुरा नहीं है।

इक्ष्वाकु कुल के राजा को कोढ़ की बीमारी हो गयी। दिन का चैन और रात की नींद हराम हो गयी। सारे हकीम और वैद्य अपना-अपना इलाज आजमाकर थक चुके थे। आखिर वह राजा गुरु वशिष्ठजी के श्रीचरणों में पहुँचा और बोलाः

“गुरुदेव ! आज आपके निकट मैं स्वार्थ की बात लेकर आया हूँ। प्रभु ! शांति के लिए नहीं, वरन् शरीर का रोग मिटाने के लिए आया हूँ। इस कोढ़ के इलाज में कोई भी औषधि काम नहीं कर रही है। इसने मुझे धन-वैभव एवं सारी सुविधाओं के बीच रहते हुए भी अत्यंत दुःखी कर दिया है। गुरुदेव इसका क्या कारण है ?”

वशिष्ठजी महाराज ने तनिक अपने स्वस्वरूप में गोता लगाया और समझ गये कि इसके पूर्वकाल का दुष्कृत्य अभी फल देने के लिए तत्पर हुआ है।

कभी पूर्वकाल का सुकृत फल देने को तत्पर होता है। पूर्वकाल का सात्त्विक सुकृत जब फल देने को तत्पर होता है तब संतों के यहाँ जाने की रूचि होती है। राजस सुकृत फल देता है तो भोग-वैभव मिलता है और तामस सुकृत फल देता है तो ऐशो आराम की ओर, शराब कबाब की ओर ले जाता है।

जरूरी नहीं कि पाप का फल ही दुःख होता है। कभी-कभी पुण्य का फल भी दुःख होता है। पुण्य का फल दुःख ? हाँ…. कुछ ऐसे पुण्य किये हैं कि जिसका फल दुःख हो रहा है। दुःख क्यों हो रहा है ? क्योंकि आपकी समय शक्ति संसार के इन खिलौनों में बरबाद न हो जाये। अतः प्रकृति इन खिलौनों की, सांसारिक विषयरूपी खिलौनों की प्राप्ति में विक्षेप डालकर आपकों संत और परमात्मा की शरण पहुँचाना चाहती है, इसीलिए दुःख देती है।

कुछ लोग विवेक से संसार-वैभव का आकर्षण छोड़कर संतों की शरण में पहुँच जाते हैं तो कुछ लोगों को सुकृत के बल से उस सुख-वैभव में विक्षेप डालकर उसकी नश्वरता का बोध करवाकर संतों की शरण में पहुँचा देती है प्रकृति।

वशिष्ठजी महाराज बोलेः “हे राजन ! तुम्हारा पूर्वकृत दुष्कृत्य ही अभी कोढ़ के रूप में प्रगट हुआ है।”

राजाः “गुरुदेव ! मैं कुछ समझ नहीं पा रहा हूँ।” तब वशिष्ठजी ने कहाः ठीक है मैं तुम्हें दिखा देता हूँ।” वशिष्ठजी ने राजा की आँखों पर संकल्प करके हाथ रख दिया, फिर पूछाः “राजन ! क्या दिख रहा है ?”

राजाः “गुरुजी ! दो पहाड़ दिख रहे हैं। उनमें से एक पहाड़ तो सुवर्णकाय है और दूसरा काला कलूट एवं गंदगी के ढेर जैसा दिख रहा है।”

वशिष्ठजीः “राजन ! ठीक दिख रहा है। पहला जो चमक रहा है, वह तुम्हारे शुभ सुकृत हैं और दूसरा जो दिख रहा है गंदगी के ढेर जैसा, यह तुम्हारा पाप है। राज्य और यश तुम्हारे सुकृत का फल है लेकिन अनिद्रा और कोढ़ की बीमारी ये तुम्हारे पूर्वजन्मों के दुष्कृत्यों के फल हैं।”

राजाः “गुरुदेव ! इसका उपाय क्या है ?” वशिष्ठजीः “इस गंदगी के ढेर को तुम खा सकते हो क्या ?”

राजाः “गुरुदेव ! यह तो संभव नहीं है।” वशिष्ठजीः “तो जब तक यह ढेर रहेगा, तब तक तुम्हारा यह दुःख भी बना रहेगा।”

राजाः “इस ढेर को खत्म करने का कोई दूसरा उपाय बताइये, गुरुदेव !”

वशिष्ठजीः “तुम ऐसा किया करो कि अपनी भाभी के महल के प्रांगण में अपना खाट बिछवाओ और रोज शाम को ऐसे ढंग से वहाँ जाकर रहो ताकि  लोगों के मन में ऐसा हो कि ʹभाभी के साथ राजा का नाजायज संबंध है।ʹ लोगों को तुम दोनों का रिश्ता गलत प्रतीत हो। तुम गलत नहीं हो और गलती करोगे भी नही किन्तु लोगों को ʹतुम गलत होʹ ऐसी प्रतीति कराओ।”

राजाः “गुरुदेव ! मेरी भाभी ! वे तो माँ के समान हैं !! मैं वहाँ इस ढंग से जाकर बिस्तर लगाऊँ कि लोग मुझे गलत समझें !! गुरुदेव ! इससे तो मरना श्रेष्ठ है।”

वशिष्ठजीः “बेटा ! बद होना बुरा है किन्तु बदनाम होना बुरा नहीं है। तुम्हारे इस दुष्कृत्य को नष्ट करने का सबसे सुगम उपाय मुझे यही लगता है।”

आखिर हाँ-ना करते-करते राजा सहमत हुआ और उसने गुरुआज्ञा को शिरोधार्य किया।

सैनिक को जब अपने सेनापति का कोई आदेश मिलता है तो अपनी जान की परवाह किये बिना ही वह उस आदेश का पालन करता है। जो चार पैसे कमाता है, वह सैनिक भी आदेश मानकर अपनी जान दे देता है तो जिसको परमात्मतत्त्व पाना है, वह अपने गुरु का आदेश मानकर उऩ्हें अपना अहं दे दे तो इसमें उसका घाटा क्या है ?

तू मुझे तेरा उर-आँगन दे दे, मैं अमृत की वर्षा कर दूँ।

तू मुझे तेरा अहं दे दे, मैं परमात्मा का रस भर दूँ।।

राजा को तीन दिन हो गये अपनी भाभी के प्रांगण में बिस्तर बिछाए हुए, उसका तीन हिस्सा कोढ़ गायब हो गया और एक दो घण्टे की नींद भी आने लगी। राजा प्रसन्न होकर पहुँचा अपने गुरुदेव के श्रीचरणों में एवं प्रणाम करता हुआ बोलाः “गुरुदेव ! बिना औषधि के ही तीन हिस्सा कोढ़ गायब हो गया ! थोड़ी-थोड़ी नींद भी आने लगी है।”

गुरुदेव ने पुनः संकल्प करके राजा की आँखों पर हाथ रखा तो राजा क्या देखता है कि गंदगी का ढेर जो काला पहाड़ था वह तीन हिस्सा गायब हो चुका है।

फिर गुरुदेव बोलेः “चार दिन और यही प्रयोग करो।”

राजा ने चार दिन पुनः वही प्रयोग किया तो पूरा कोढ़ मिट गया, केवल एक नन्हीं सी फुँसी बच गयी। तब राजा ने कहाः “गुरुदेव ! पूरा कोढ़ मिट गया है और अब तो नींद भी बढ़िया आती है लेकिन एक छोटी सी फुँसी बच गयी है और इसमें जरा सी खुजलाहट होती रहती है।”

तब गुरुदेव ने कहाः “राजन् ! अगर मैं भी थोड़ी निंदा कर दूँ तो यह मिट जायेगी। लेकिन मैं जानता हूँ कि तुम निर्दोष हो। अतः निंदा करके मैं अपने सिर पर पाप क्यों चढ़ाऊँ ? इसे अब तुम ही भोग लो।”

निर्दोष व्यक्ति की जब बदनामी होती है तब भगत लोग, सीधे-सादे लोग घबरा जाते हैं। “बापू ! हमने किसी का कुछ नहीं बिगाड़ा फिर भी पड़ोसी लोग हमारे साथ ऐसा-ऐसा दुर्व्यवहार करते हैं….”

अरे भाई ! तुम्हारे चेहरे पर खुशी या  प्रसन्नता देखकर कोई ऐसा वैसा सोचता या बदनामी करता है तो तुम घबराओ मत। ऐसे अवसर पर इक्ष्वाकु कुल के राजा की इस कथा को याद कर लिया करो। कभी-कभी तुम्हारा धन-वैभव एवं यश देखकर अथवा किसी संत महापुरुष का तुम पर प्रेम है-यह देखकर कोई जलता है। तुम तो उसे जलाने का प्रयत्न नहीं करते हो, अतः इसमें तुम्हारा दोष नहीं है।

जब बिजली चमकती है तब बिजली का कोई इरादा नहीं होता कि हम गधी को परेशान करें। बिजली को तो पता तक नहीं होता कि गधी परेशान हो रही है लेकिन जब बिजली चमकती है तो गधी दुलत्ती मारती है। हालाँकि बिजली को वह दुलत्ती लगती भी नहीं है। इसी प्रकार जब तुम्हारे जीवन में चमक आये और किसी की बुद्धि दुलत्ती मारने लगे अर्थात् निंदा करने लगे तो तुम चिंता क्यों करते हो ? तुम तो टिके रहो अपनी गरिमा में, अपनी महिमा में।

स्वामी रामतीर्थ कहते थेः “अपने सिद्धान्तों के लिए अपने प्राण न्योछावर करने की अपेक्षा जीवित रहकर अपने सिद्धान्तों के विरोधियों से टक्कर लेना श्रेष्ठ है।”

एकांत में बैठकर समाधि करने से जो फायदा होता है, वही फायदा, वही आनंद और वही सामर्थ्य, संसार में ईश्वर को साक्षी रखकर दैवी कार्य करते-करते व्यक्ति पा सकता है। योगी को गिरि-गुफा में बैठकर निर्विकल्प समाधि से, ध्यान करने से जो उपलब्धियाँ होती हैं वे ही उपलब्धियाँ उऩ्हें भी मिल जाती हैं जो संसार में सुख बाँटने की दृष्टि से काम करते हैं और कभी-कभार संतों के चरणों में बैठकर अपनी बुद्धि को बुद्धिदाता का ज्ञान पाने में लगा देते हैं।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जून 1999, पृष्ठ संख्या 23-25, अंक 78

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भक्ति के दुःखों की निवृत्ति


पूज्यपाद संत श्री आसारामजी बापू

ʹश्रीमद् भागवत माहात्म्यम्ʹ के प्रथम अध्यायच में कथा आती हैः

एक बार नारदजी विचरण करते-करते भगवान श्रीकृष्ण की लीलास्थली वृंदावन में जा पहुँचे।  वहाँ पर उन्होंने देखा कि एक युवती के पास दो वृद्ध पुरुष अचेत से पड़े हुए हैं और वह युवती कभी उन्हें होश में लाने का प्रयत्न करती है तो कभी उनके आगे रो पड़ती है। उस युवती के चारों ओर सैंकड़ों स्त्रियाँ घेरकर बैठी हैं जिनमें से कोई तो उसे पंखा झल रही हैं और कोई उसे ढाढस बँधाने का प्रयत्न कर रही हैं। इतने में उस युवती की नजर नारदजी पर पड़ी और वह खड़ी होकर नारदजी से बोलीः

भो भोः साधो क्षणं तिष्ठ मच्चिन्तामपि नाशय।

दर्शनं तव लोकस्य सर्वथाघहरं परम्।।

बहुधा तव वाक्येन दुःखशांतिर्भविष्यति।

यदा भाग्यं भवेद् भूरि भवतो दर्शनं तदा।।

(श्रीमद् भागवतमाहात्म्यः अ. 1 श्लोक 42-43)

“हे महात्मा जी ! क्षणभर ठहर जाइये और मेरी चिंता को भी नष्ट कर दीजिये। आपका दर्शन तो संसार के सभी पापों को सर्वथा नष्ट कर देने वाला है।

आपके वचनों से मेरे दुःख की भी बहुत कुछ शांति हो जाएगी। मनुष्य का जो जब बड़ा भाग्य होता है, तभी आपके दर्शन हुआ करते हैं।”

नारदजी ने पूछाः “तुम कौन हो ?”

युवतीः “मेरा नाम भक्ति है। द्रविड़ देश में मैं उत्पन्न हुई, कर्नाटक में बढ़ी, महाराष्ट्र में सम्मानित हुई और गुजरात में अंग-भंग हुई। अब वृंदावन में आकर मैं थोड़ी पुष्ट हुई हूँ लेकिन यहाँ आकर मेरे दोनों पुत्र ज्ञान और वैराग्य कलियुग के प्रभाव से वृद्ध होकर मूर्च्छित हो गये हैं। होना तो यह चाहिए कि माँ बूढ़ी हो और बेटे जवान, लेकिन यह तो उलटा हो गया है। बेटे वृद्ध होकर मूर्च्छित पड़े हैं। कई उपाय करने पर भी इनकी मूर्च्छा नहीं टूटती। महाराज ! आपके दर्शन से मेरे हृदय के ताप मिट रहे हैं। आप कुछ देर और ठहरिये।”

संत के दर्शन से पातक नष्ट होते हैं और पातक नष्ट होने से हृदय का ताप निवृत्त होता है। नानकजी ने भी कहा हैः

संतशरण जो जन पड़े, सो जन उधरणहार।

संत की निंदा नानका, बहुरि-बहुरि अवतार।।

नानक जी ने यह भी कहा हैः

बड़भागी ते जन जगमाहीं, सदा-सदा हरि के गुन गाहीं।

राम नाम जो करहिं विचार, ते धनवन्ता गने संसार।।

भक्ति रो रही है और हमें यही सीख दे रही है कि अगर भक्ति करनी है तो ज्ञान और वैराग्य को जागृत रखो। तुम जिसकी भक्ति करते हो, उस परमेश्वर के स्वरूप का ज्ञान ही न होगा तो तुम किसकी भक्ति करोगे ?ʹ भगवान क्या है ? आत्मा क्या है ? परमेश्वर क्या है ? मुक्ति कैसे होती है ? वह परमात्मा हमारी आत्मा है तो मिले कैसे ? जगत की उत्पत्ति कैसे हुई ? बदलने वाले जगत को भी जो देख रहा है, वह अबदल तत्त्व क्या है ?ʹ ऐसा ज्ञान चाहिए और सुख-दुःख व संसार के राग-द्वेष की निवृत्ति के लिए वैराग्य होना चाहिए। अगर जीवन में भक्ति के साथ ज्ञान-वैराग्य नहीं होंगे तो भक्ति रोती रहेगी।

भगत जगत को ठगत है, भगत को ठगे न कोई।

एक बार जो भगत ठगे, अखण्ड यज्ञफल होई।।

भक्त का मतलब बुद्ध नहीं, आलसी नहीं, प्रमादी नहीं…. जिसका मन  आत्मा परमात्मा में निमग्न रहता हो, उसका नाम है भक्त। नानक जी भक्तशिरोमणि थे। प्रह्लाद, मीरा, कबीरजी आदि भी भक्तशिरोमणि थे।

भक्ति नारदजी से प्रार्थना करती हैः “महाराज ! आप मेरे दुःखों को निवृत्त कीजिये।”

तब नारदजी ने शपथ लीः “यदि मैंने तुम्हारे पुत्रों का जागृत न किया और तुझे घर-घर में, हृदय-हृदय में स्थापित न किया तो मैं भगवान का भक्त नहीं।”

देखो, सच्चे भगवद् भक्तों का कैसा निश्चय होता है ! कितनी हिम्मत होती है ! कितना सामर्थ्य होता है उनके संकल्प में ! एक सामान्य आदमी भी अगर दृढ़ संकल्प करता है कि ʹमुझे यह शुभ कर्म करना हैʹ तो ईश्वर की सत्ता उसे सहयोग देती ही है और देर-सबेर वह उसे दैवी कार्य में सफल होकर ही रहता है। जिस कार्य से बहुतों का हित होता है, मंगल होता है उस कार्य को करने का विचार यदि एक साधारण व्यक्ति भी अपने मन में ठान लेता है, तो हजारों-लाखों व्यक्ति देर सबेर उसके साथ सहयोग करने के लिए जुड़ जाते हैं।

भक्त यह सदैव याद रखे किः “मैं अकेला नहीं हूँ। सच्चिदानंद परमात्मा हमेशा मेरे साथ है। मेरे साथ उस परमेश्वर की सत्ता विद्यमान है। मैं अकेला नहीं हूँ। अनन्त-अनंत शक्तियाँ मेरे साथ हैं।ʹ

एक साधारण-सी लड़की भी यदि सत्कर्म करने की कोई बात ठान लेती है तो  परिस्थितियाँ उसके अनुकूल होने के लिए बाध्य हो जाती हैं।

बुद्ध के जमाने में एक बार श्रावस्ती नगरी में अकाल पड़ा। अकाल भी ऐसा कि बालक, बूढ़े एवं कमजोर आदमी अन्न के अभाव में मरने लगे। सेठों ने अपनी तिजोरियों को ताले लगा दिये राज्यसत्ता ने भी हाथ ऊँचे कर दिये।

यह सब देखकर बुद्ध को बहुत दुःख हुआ। संत-हृदय चुप कैसे रह सकता है ? ʹमुट्ठीभर अन्न के अभाव में लोग रोज मर रहे हैं और सेठों की तिजोरियाँ खुलती नहीं। धनवानों का धन यदि ऐसे अकाल के समय काम नहीं आया तो फिर वह धन किस काम का ?ʹ

बुद्ध ने श्रावस्ती के धनवान लोगों की एक सभा बुलायी। करूणा से भरे हुए बुद्ध ने अपनी करुणायी वाणी में सेठों से कहाः “इस अकाल समय में आप सभी को कुछ सेवाकार्य करना चाहिए ताकि अन्न के अभाव में मर रहे लोगों को बचाया जा सके।”

….लेकिन करूणा से भरा हुआ, प्राणिमात्र के हित की भावना से छलकता हुआ बुद्ध का यह उपदेश भी उन लोभी सेठों के चित्त पर कोई असर नहीं कर रहा था। बुद्ध ने चारों ओर नज़र डालकर कहाः “भाइयों ! कुछ कहो।” यह सुनकर वे लोभी सेठ, धन के गुलाम सेठ एक-दूसरे की ओर देखने लगे। उनमें से एक ने कहाः “महाराज ! पूरे राज्य में दुर्भिक्ष पड़ा है। हमारी तिजोरी कितने आदमियों को खिलायेगी ? यह किसी एक आदमी का काम नहीं है। यह तो राज्य का काम है।”

दूसरा बोलाः “राज्य का धन भी समाप्त जायेगा तब क्या करेंगे ? यह तो ईश्वर का काम है ईश्वर का। हम तो केवल प्रार्थना करें किः “हे भगवान ! अपने बंदों को अब तुम्हीं बचाओ।ʹ इसके अलावा हम कर ही क्या सकते हैं ?”

ऐसा कहते-कहते सब सेठ वहाँ से एक-एक करके खिसकने लगे। इतने में ही एक धनवान सेठ की कन्या सुप्रिया की आँखों से आँसू बहने लगे। बुद्ध की सभा में निराशा नृत्य करे, उसके पहले ही उसने एक आशा की किरण जगा दी। उसने कहाः “भन्ते ! जो अन्न के अभाव में मर रहे हैं, अन्न के मोहताज उन गरीबों को, उन देशवासियों को मैं खिलाऊँगी। भन्ते ! आप आशीर्वाद दें कि मैं इस कार्य में सफल हो सकूँ।”

लोग हक्के-बक्के रह गये ! ʹयह लड़की ! सुप्रिया !!ʹ वे  बोलेः “तू क्या खिलायेगी ? तेरा सेठ पिता तुझे पैसे नहीं देगा तो तो तू क्या करेगी ?”

सुप्रियाः “मेरे पिताजी पैसे नहीं देंगे तो कोई बात नहीं। मैं अपने हाथ में भिक्षापात्र उठाऊँगी और घर-घर भीख माँगकर भी अपने देशवासियों के मुँह में रोटी का टुकड़ा डालूँगी… उनके आँसू पोंछूंगी।”

दृढ़ निश्चय से भरी हुई उस लड़की की बात सुनकर बुद्ध के मन को संतोष हुआ। बुद्ध की आँखें चमक उठीं और करूणामयी दृष्टि बरसाते हुए वे बोल उठेः “धन्य, धन्य ! तेरे माता-पिता भी धन्य हैं। तू लोगों की भूख अवश्य मिटा सकेगी। तू देशवासियों के प्राण अवश्य बचा सकेगी।”

लोग व्यंग्य कसने लगे किः “जैसी पगली लड़की, वैसा पगला बाबा…ʹ

जैसे महात्मा गाँधी ने भी कहा था किः “अंग्रेजों ! भारत छोड़ो।” यह उदघोष करने वाले महात्मा गाँधी अकेले थे। अतः लोगों ने उनकी खूब मजाक उड़ायी और वायसराय ने तो उन्हें पागल ही कह दिया था। पूरी ब्रिटिश सरकार के आगे एक मोहनदास करमचंद गाँधी बोलता है कि ʹअंग्रेजों ! भारत छोड़ो।ʹ लेकिन शुभ संकल्प में बड़ी ताकत होती है। जितना स्वार्थरहित संकल्प होता है, उतनी ही परमात्मा की सत्ता उसके साथ जुड़ जाती है।

तुम्हारे पास चाहे कुछ भी हो, मुट्ठीभर अन्न हो या जरा सा समय हो अथवा कम योग्यता हो लेकिन यदि ईश्वर के नाते तुम उसे सत्कर्म में लगा देते हो तो वह अथाह-अगाध हो जाता है।

सुप्रिया ने दृढ़ संकल्प कर लिया था, अतः दूसरे दिन सुबह होते ही उसने अपने हाथ में एक भिक्षापात्र उठाया और अपने माता-पिता से बोलीः “मेरे हिस्से की रोटी तो आप मुझे देते ही हैं, अतः कम-से-कम वे ही रोटियाँ मुझे भिक्षा में दे दीजिये।” लड़की का दृढ़ निश्चय देखकर पिता की आँखों में आँसू आ गये। माँ का हृदय भर आया। उन्होंने थोड़ी ज्यादा भिक्षा दे दी। आठ-दस लोग भोजन कर सकें इतनी भिक्षा दे दी। सुप्रिया वहाँ से चल पड़ी और दूसरे द्वारों पर गयी। सुप्रिया को भिक्षा माँगते हुए देखकर अब सेठों का हृदय पिघलने लगा किः ʹजो हमें करना चाहिए था, वह कार्य यह एक नन्हीं सी बालिका कर रही है ! धिक्कार है हमारे लोभ को और धिक्कार है हमारे ऐसे वैभव को, जो मानव जाति के काम न आये !ʹ

तन मन धन से कीजिये, निशिदिन पर उपकार।

यह सदभाव उनके मन में जाग उठा और सब सेठ लग गये अकाल राहत कार्य में। श्रावस्ती का अकाल दूर हो गया। लाखों-लाखों जीवों को जीवनदान मिला एक सुप्रिया के संकल्प मात्र से।

एक शुभ संकल्प करो और उसमें डट जाओ।

इसी प्रकार दृढ़ निश्चय के साथ नारदजी भक्ति के दुःखनिवारणार्थ भ्रमण करने निकल पड़े। जब वे विशालापुरी से गुजरे तो उनकी भेंट सनकादि ऋषियों से हुई। सनकादि ऋषियों ने पूछाः “नारद ! उदास पुरुषों की नाईं तुम जल्दी जल्दी कहाँ जा रहे हो ?”

नारदः “भगवन ! मैं काशी, मथुरा, रंगक्षेत्र, रामेश्वरम्, द्वारिका, हरिद्वार आदि क्षेत्रों में गया किन्तु कहीं भी, किसी भी तीर्थ में शांति देने वाले महापुरुषों के दर्शन मुझे नहीं हुए। कलियुग के मित्र अधर्म ने तीर्थों को भी बिगाड़ दिया है। धूर्त लोग तीर्थों एवं मंदिरों पर अधिकार करने लग गये हैं। जीवन को शांति मिले, ऐसी कोई जगह न दिखी। भूमण्डल पर घूमते-घूमते, पुष्कर और  प्रयाग में घूमते-घूमते मैं वृन्दावन आया जहाँ मुझे एक युवती अपने दो वृद्ध एवं मूर्च्छित पुत्रों ज्ञान और वैराग्य के पास बैठकर विलाप करती हुई दिखी, जो चारों ओर से अपनी सखियों से घिरी हुई थी। उऩका नाम भक्ति है। प्रभो ! “मैंने शपथ ली है कि उस भक्ति के दुःख को दूर करूँगा और उसके पुत्रों, ज्ञान-वैराग्य को जागृत करूँगा। मैंने कई मंत्रोच्चारण किये, वेद-पाठ किया, कई बार उन्हें जगाया लेकिन वे पुनः मूर्च्छित हो जाते थे। फिर आकाशवाणी हुई किः “हे नारद ! तुम उद्योग करो, तब तुम सफल होगे।ʹ किन्तु महाराज ! मैं कौन-सा उद्योग करूँ ? आकाशवाणी ने कुछ स्पष्ट नहीं बताया। ज्ञान-वैराग्य को जागृत करने के तरीके जानने के लिए मैं मठों, मंदिरों एवं आश्रमों आदि में घूमा लेकिन उसका उपाय कोई नहीं बता सका।”

तब सनकादि ऋषियों ने कहाः “भक्ति का दुःख दूर करने का एक ही उपाय है कि कलियुग के दोषों को दूर करने वाली भगवत्कथा सुनायी जाये, तभी ज्ञान और वैराग्य पुष्ट हो सकेंगे।”

अतः जो लोग भक्ति का रसपान करना चाहते हैं, उन्हें इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि कलियुग के दोषों को दूर करने के लिए भगवत्कथा सुनें जिससे ज्ञान-वैराग्य पुष्ट हो सकें। सनकादि ऋषियों ने आगे कहाः “श्रीमद् भागवत का पारायण किया जाय। उसके शब्द सुनने से ही ज्ञान और वैराग्य को बड़ा बल मिलेगा। इससे उऩका कष्ट मिट जायेगा अर्थात् उनकी मूर्च्छा टूट जायेगी और साथ ही भक्ति भी पुष्ट होगी। जैसे सिंह की गर्जना सुनकर भेड़िये भाग जाते हैं, उसी प्रकार श्रीमद् भागवत की अनुगूँज से कलियुग के सारे दोष नष्ट हो जायेंगे। तब प्रेमरस प्रवाहित करने वाली भक्ति ज्ञान और वैराग्य को साथ में लेकर प्रत्येक घर और व्यक्ति के हृदय में क्रीड़ा करेगी।”

सनकादि ऋषियों की आज्ञा को शिरोधार्य करके देवर्षि नारद ने हरिद्वार में गंगातट पर ʹश्रीमद् भागवतʹ कथा का आयोजन किया जिसके फलस्वरूप ज्ञान-वैराग्य जाग उठे एवं भक्ति पुष्ट हो गयी। इतनी महत्ता है ʹश्रीमद् भागवतʹ के कथामृत का पान करने की ! तभी तो ʹश्रीमद् भागवत माहात्म्य के विषय में स्वयं भगवान ने अपने श्रीमुख से ब्रह्मजी को कहा हैः

श्रीमद् भागवतं पुण्यमायुरारोग्य पुष्टिदम्।

पठनाच्छ्रवणाद्वापि सर्वपापैः प्रमुच्यते।।

ʹयह पावन पुराण ʹश्रीमद् भागवतʹ आयु, आरोग्यता और पुष्टि देने वाला है। इसका पाठ अथवा श्रवण करने मनुष्य सब पापों से मुक्त हो जाता है।ʹ

इस पवित्र पुराण का पाठ स्वयं करें या पवित्र, सात्त्विक, व्यसनमुक्त, संत-हृदय वक्ता के मुख से सुनें।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मई 1999, पृष्ठ संख्या 7-11, अंक 77

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