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Prerak Prasang

कर खिजमत फकीरों की….


पूज्यपाद संत श्री आसारामजी बापू

दो राजकुमार थे। बड़ा भाई राज्य के मोह में पड़ गया लेकिन छोटा भाई सच्ची आजादी पाने के लिए  सच्चे सदगुरु की खोज में निकल गया और उसने खोजते-खोजते ऐसे सत्यस्वरूप का साक्षात्कार किये हुए सच्चे सदगुरु को पा भी लिया। नानक और कबीर जैसे महापुरुष को पाकर, उनके बताये मार्ग अनुसार साधना करके उसने अपने शुद्ध बुद्ध स्वरूप का ज्ञान पा लिया। फिर वह घूमते घामते अपने भाई के नगर में पहुँचा और नगर के बाहर नदी के किनारे अपनी झोंपड़ी बाँधकर रहने लगा। उसका जगमगाता आनंद, हारे-थके को सांत्वना देने का स्वभाव, भगवद् प्रेम में पावन करने वाली उसकी शैली, दिल में मनुष्यमात्र के उद्धार का पवित्र भाव, परिस्थितियों में सम रहने की उसकी समर्थ मति, उस बहादुर को, संत बने भाई को अब छुपा कैसे रहने देती ?

सच्चा बहादुर वह नहीं जो किसी को पछाड़ देता है। सच्चा बहादुर तो वही है जिसने भीतर के विकारों पर विजय पाकर अपने निर्विकारी नारायणस्वरूप का साक्षात्कार किया है। उस ब्रह्म-परमात्मा को अपना स्वरूप जानने वाला सचमुच में बहादुर है, महावीर है। जैसे नानकजी महावीर हैं, महान् वीर हैं। बड़े-बड़े वीर भी जिनके चरणों में शीश झुकाकर अपना भाग्य बना लें, ब्रह्मज्ञानी ऐसे महान वीर होते हैं। वह महावीर भी प्रजा का प्रेमपात्र बन गया।

आत्मा में रमण करने वाले संत किसी मत, पंथ, मजहब का पोषण या विरोध नहीं करते वरन् वे  मानव के अंदर छुपे हुए रब को, आनंद को और माधुर्य को जगाने की कला जानते हैं।

मुझे वेद, पुराण, कुरान से क्या ?

मुझे प्रेम का पाठ पढ़ा दे कोई।।

मुझे मंदिर मस्जिद जाना नहीं।

मुझे दिल के मंदिर में पहुँचा दे कोई।।

जहाँ ऊँच और नीच का भेद नहीं।

जहाँ जात और पाँत की बात नहीं।।

न हो मंदिर, मस्जिद, चर्च जहाँ।

न हो पूजा नमाज में फर्क जहाँ।।

बस प्रेम ही प्रेम की सृष्टि मिले।

अब नाव को ले चलो खेके वहाँ।।

ऐसे कुछ पवित्र जिज्ञासु उस फकीर के पास पहुँच जाते थे, जो भूतपूर्व युवराज था।

धीरे-धीरे राज-दरबार तक उस फकीर की प्रशंसा पहुँची। जासूसों ने जाँच करके राजा को खबर दीः “ये महाराज कोई और नहीं किंतु आपके ही सगे भाई हैं।” राजा के अहंकार को ठेस लगीः “मेरा भाई ! और झोंपड़े में रहे ? भिक्षा माँगकर खाये ?”

एक दिन राजा सुबह-सुबह छिपे वेश में आकर अपने भाई को समझाने लगाः “मैं इतनी आजाद जिंदगी जी रहा हूँ और एक तू है कि रोटी का टुकड़ा माँगने लगता है ? मैं महलों में रहता हूँ और तू झोंपड़े में गुजारा कर रहा है ? तू क्यों बर्बादी की आग में जल रहा है ? चल मेरे साथ। मैं तुझे मंत्रीपद दे दूँगा। मेरी आज्ञा में रहेगा  मैं तुझे खुश रखूँगा। देख ! मैं कितना आजाद हूँ। सब लोग मेरी बात मानते हैं।”

बुद्धिमान छोटे भाई ने कहाः “भैया ! अहंकार को पोसना आजादी नहीं है। कुर्सी को पाकर, गद्दी को पाकर अपने को बड़ा माना तो तुमने अपने असली बड़प्पन को दबा दिया। यह बड़प्पन तुम्हारा नहीं, कुर्सी का हुआ। यदि धन को पाकर अपने को बड़ा माना तो तुमने अपने बड़प्पन को दबाकर धन को बड़प्पन दिया। सत्ता, धन, रूप-लावण्य अथवा शरीर का बड़प्पन मानना यह तो असली बड़प्पन का घात करना है। तुमने इन चीजों को बड़ा कर दिया और अपने को दबा दिया, फिर अपने को आजाद मानते हो ?”

लेकिन राजगद्दी के नशे में चूर भाई ने कहाः “छोड़ ये बातें। आखिर तू मेरा छोटा भाई है।”

ऐसे ही मेरा भाई भी मुझे कहता था किः “सुधर जा। मैं तुझे हिस्सा देता हूँ। तू आराम से, मौज से रह। दो भाई तो हैं – एक ही पिता के दो बेटे हैं और तू एक कमरे में रात तो बारह-बारह बजे तक बैठा रहता है ! दुकान पर पैर नहीं रखता ! अब तो सुधर जा।” गुरु प्रसाद पाकर सात साल  तपस्या के बाद जब हम अहमदाबाद पहुँचे, तब भी भाई ने पहला वचन यही कहाः “सात साल तू चला गया, फिर भी जो कमाई हुई है उसका आधा हिस्सा मैं तेरे को देता हूँ। अभी भी तू सुधर जा। मेरे साथ चल दुकान पर।”

मैंने कहाः “हम तो बिगड़ गये।”

सुनो मेरे भाइयो ! सुनो मेरे मितवा !

कबीरो बिगड़ गयो रे…

दही संग दूध बिगड़यो, मक्खन रूप भयो रे….

पारस संग भाई ! लोहा बिगड़यो, कंचर रूप भयो रे…..

संतन संग दास कबीरो बिगड़यो

संत कबीर भयो रे, कबीरो बिगड़ गयो रे….

दुनियादार जिस भक्त को बिगड़ा समझते हैं, वास्तव में वह ऐहिक सृष्टि में तो बिगड़ा दिखता है परंतु यदि उसका दिव्य सृष्टि में प्रवेश हुआ है और वह दिव्य सृष्टि में भी न रुके तो उस ब्रह्म-परमात्मा में शांति पा लेता है। बुद्धिमत्ता यही है कि सच्ची आजादी पाये हुए ऐसे महापुरुषों की चरणरज सिर पर लगाकर अपना भाग्य बना लें। यही आजादी का सच्चा स्वरूप है। लेकिन वह राजा अपने राजसी नशे में था।

बड़े भाई ने छोटे भाई से कहाः “मैं इतना आजाद हूँ…. मेरी बात सब लोग मानते हैं और तू झोंपड़ी में जिंदगी बसर कर रहा है ! तू मेरी बात क्यों नहीं मानता है ?”

“सब तुम्हारी बात मानते हैं ?”

“हाँ, मानते हैं। मैं चाहे जो मँगा सकता हूँ। मेरी हुकूमत सब पर चलती है।”

उस वक्त छोटा भाई गुदड़ी सी रहा था। उसने सिलाई करते-करते सुई-धागा उठाकर नदीं में फेंक दिया और बोलाः “सब लोग तुम्हारी बात मानते हैं तो जरा सुई धागा नदी से निकलवा दो।”

राजाः “यह तो नहीं हो सकता।”

“जब तुम्हारे हुक्म से एक छोटी सी सुई भी नदीं में से नहीं निकल सकती तो तुम किस बात के सम्राट हो ? किस बात के राजा हो ?”

बड़े भाई ने कहाः “तो क्या तुम्हारी बात सब मानते हैं ?”

तब छोटे भाई ने योगशक्ति का उपयोग किया। थोड़ी ही देर में एक मछली मुँह में सुई-धागा लटकाते हुए वहाँ तैरने लगी। छोटे भाई ने धागा पकड़कर सुई दिखाई और बोलाः “देख, अब तू आजाद है कि मैं आजाद हूँ ? तू ही सोच। फिर भी तू अपने को आजाद समझता है और मुझे बर्बाद समझता है तो…..

तेरी आजादियाँ सदके सदके।

मेरी बर्बादियाँ सदके सदके।।

मैं बर्बादे तमन्ना हूँ।

मुझे बर्बाद रहने दो।।

मेरी वासनाएँ बर्बाद हो गयीं, मेरा अहंकार बर्बाद हो गया, मेरी चिंता बर्बाद हो गयी, मेरा बँधन बर्बाद हो गया। सचमुच में मेरी जो बर्बादी है उसे मैं प्यार करता हूँ और तेरी जो आजादी है, उसे मैं दुआ करता हूँ। तू वहाँ भला है और मुझे यहीं रहने दो, अपनी मौज में।”

जिसने तीन मिनट के लिए भी, एक बार अपने आत्मा-परमात्मा का सुख पा लिया, उसके आगे इन्द्रदेव तक हाथ जोड़कर अपना भाग्य बनाने को उत्सुक होते हैं तो एक सामान्य मछली की तो बात ही क्या है ? अगर पाना हो उस आत्मा-परमात्मा के सुख को तो पहुँच जाओ किसी ब्रह्मवेत्ता के द्वार पर… और उनके दैवी कार्य व सेवा-सत्संग से बना लो अपना भाग्य। किसी ने ठीक ही कहा हैः

अगर है शौक मिलने का,

 तो कर खिजमत फकीरों की।

यह जौहर नहीं मिलता,

अमीरों के खजाने में।।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मार्च 1997, पृष्ठ संख्या 21,22,23 अंक 51

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स्वावलंबी बनो


पूज्यपाद संत श्री आसारामजी बापू

हमारी दिव्य संस्कृति भूलकर हम विदेशी कल्चर के चक्कर में फँस गए हैं। लॉर्ड मैकाले की कूटनीति ने भारत की शक्ति को क्षीण कर दिया है।

लॉर्ड मैकाले जब भारत देश में घूमा तब उसने देखा कि भारत के संतों के पास ऐसी यौगिक विद्याएँ हैं, ऐसा मंत्रविज्ञान है, ऐसी योग शक्तियाँ हैं कि यदि भारत का एक नौजवान भी संतों से प्रेरणा पाकर उनके बताये हुए पदचिन्हों पर चल पड़ा तो ब्रिटिश शासन को उखाड़ कर फेंक देने में सक्षम हो जायेगा।

इसलिए लॉर्ड मैकाले ने सर्वप्रथम संस्कृत विद्यालयों और गुरुकुलों को बंद करवाया और अंग्रेजी स्कूलें शुरु करवायीं। हमारे गृहउद्योग बंद करवाये और शुरू करवायी फैक्टरियाँ।

पहले लोग स्वावलंबी थे, स्वाधीन होकर जीते थे, उन्हें पराधीन बना दिया गया, नौकर बना दिया गया। धीरे-धीरे करके विदेशी आधुनिक माल भारत में बेचना शुरु कर दिया जिससे लोग अपने काम का आधार यंत्रों पर रखने लगे और प्रजा आलसी, भौतिकवादी बनती गई। इसका फायदा उठाकर ब्रिटिश हम पर शासन करने में सफल हो गये।

एक दिन एक राजकुमार घोड़े पर सवार होकर घूमने निकला था। उसे बचपन से ही भारतीय संस्कृति के पूर्ण संस्कार मिले थे। नगर से गुजरते वक्त अचानक राजकुमार के हाथों से चाबुक गिर पड़ा। राजकुमार स्वयं घोड़े से नीचे उतरा और चाबुक लेकर पुनः घोड़े पर सवार हो गया। यह देखकर राह पर गुजरते लोगों ने कहाः “मालिक ! आप तो राजकुमार हो। एक चाबुक के लिए आप स्वयं घोड़े पर से नीचे उतरे ! हमें हुक्म दे देते…”

राजकुमारः “जरा-जरा काम में यदि दूसरों का मुँह ताकने की आदत पड़ जायेगी तो हम आलसी, पराधीन बन जाएँगे और आलसी पराधीन मनुष्य जीवन में क्या प्रगति कर सकता है ? अभी तो मैं जवान हूँ। मेरे में काम करने की शक्ति है। मुझे स्वावलंबी बनकर दूसरे लोगों की सेवा करनी चाहिए न कि सेवा लेनी चाहिए। यदि आपसे चाबुक उठवाता तो सेवा लेने का बोझा मेरे सिर पर चढ़ता।”

हे भारत के नौजवानों ! दृढ़ संकल्प करो किः “हम स्वावलंबी बनेंगे।ʹʹ नौकरों तथा यंत्रों पर कब तक आधार रखोगे ? हे भारत की नारी ! अपनी गरिमा को भूलकर यांत्रिक युग से प्रभावित न हो। श्रीरामचन्द्रजी की माता कौशल्यादेवी इतने सारे दास-दासियों के होते हुए भी स्वयं अपने हाथों से अपने पुत्रों के लिए पवित्र भोजन बनाती थीं। तुम भी अपने कर्त्तव्यों से च्युत मत हो। किसी ने सच ही कहा हैः

स्वावलंबन की एक झलक पर।

न्यौछावर कुबेर का कोष।।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, फरवरी 1997, पृष्ठ संख्या 24, अंक 50

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पयाहारी बाबा


पूज्यपाद संत श्री आसारामजी बापू

दुनियादार जहाँ सिर पटकते हैं।

वहाँ आशिक कदम रखते हैं।।

भोगी जिस संसार के पीछे आँखें मूंदकर अँधी दौड़ लगाता है, वह संसार उसका कभी नहीं होता। संसार उसे सुख तो नहीं देता वरन् देता है मुसीबतें, जिम्मेदारियाँ, तनाव और अशांति। जबकि योगी, भक्त या सेवक सेव्य को प्रसन्न करने के लिए संसार की सेवा करता है। वह संसार से कुछ चाहता नहीं है फिर भी उसे बिना माँगे ही बहुत कुछ मिल जाता है।

भोगी चाहता है यश और मान, फिर भी उसे इतना नहीं मिलता जबकि योगी नहीं चाहता है फिर भी उसे अथाह मान, अथाह प्रेम और अथाह आनंद मिलता है। दुनियादार जिस यश, मान और सुख को चाहते हैं – योगी सेवक उसकी परवाह तक नहीं करता वरन् यश, मान और सुख उसके पीछे पड़ता है।

हनुमानजी के पीछे क्या यश-मान नहीं पड़ा ? अभी तक हनुमानजी का यश है, मान है और अभी तक हनुमानजी को करोड़ों लोग प्रेम करते हैं और रावण….? रावण चाहता था यश-मान, लेकिन फिर भी हर साल आग लगा दी जाती है उसके पुतले को। रावण भोगवाद का प्रतीक है और हनुमानजी, श्रीरामजी और श्रीकृष्ण योगवाद के प्रणेता हैं।

एक बार पृथ्वीराज चौहाण सुप्रसिद्ध ʹभक्तमालʹ के रचयिता नाभाजी महाराज के शिष्य पयाहारी बाबा के चरणों में प्रणाम करने गये और बोलेः

“बाबा ! आप चलिए, मैं आपको द्वारिकाधीश की यात्रा करवाकर आऊँ।”

बाबा मुस्कराये। रात्रि को जब पृथ्वीराज चौहाण शयन कर रहे थे तब बाबा उनके बंद शयनखंड में प्रकट हुए और बोलेः

“पृथ्वीराज ! तू मुझे द्वारिकाधीश के दर्शन करवाने के लिए ले जाना चाहता है ? मैं तुझे यहीं द्वारिकाधीश के दर्शन करवा देता हूँ।”

बाबा ने पृथ्वीराज के नेत्रों पर हाथ रखा और थोड़ी ही देर में बोलेः

“खोल आँखें। क्या दिख रहा है ?”

पृथ्वीराज देखते हैं तो साक्षात् द्वारिकाधीश ! वे गिर पड़े पयाहारी बाबा के चरणों में।

पयाहारी बाबा श्रीरामजी को अपना इष्ट मानते थे। एक बार जयपुर के निकट गलता में अपनी गुफा में बैठे थे तब एक शेर आया और बाबा को हुआः

ʹयह शेर आकर द्वार पर खड़ा है, अतिथि के रूप में आया है और खुराक चाहता है। यह अतिथि रोटी-सब्जी तो खायेगा नहीं। इसे तो माँस की जरूरत है। अब क्या करें ?ʹ

पयाहारी बाबा ने उठाया चाकू और अपनी जाँघ का माँस काटकर रख दिया शेर के सामने। अतिथि देवो भव। द्वार पर अतिथि आया है तो उसकी भूख-प्यास मिटाना अपना कर्त्तव्य है। यह भारतीय संस्कृति है।

शेर तो माँस खाकर चल दिया किन्तु श्रीरामजी से रहा न गया। भगवान श्रीराम साकार रूप में प्रगट हो गये। पयाहारी बाबा ने श्रीराम का स्तवन किया और श्रीराम ने प्रेम से पयाहारी बाबा का आलिंगन किया। भगवान के संकल्प से पयाहारी बाबा की जाँघ पूर्ववत् हो गयी और चित्त श्रीरामदर्शन से पुलकित हो उठा।

दुनिया जिन श्रीराम के दर्शन करने के लिए तड़पती है, वे ही श्रीराम अतिथिधर्म के प्रति निष्ठा देखकर सेवक के दीदार के लिए आ गये। सेवा में कितनी शक्ति है ! दुनिया तो सेव्य को चाहती है और सेव्य सेवक को चाहता है।

जो सुख सेवा से मिलता है, जो सुख निष्कामता से मिलता है वह सुख डॉलरों से कहाँ ? वह सुख दुनिया के भोगों में कहाँ ? प्राणीमात्र में बसे परमात्मा के नाते कर्म करने से जिस शांति, सुख और सच्चे जीवन का छोर मिलता है वह दूसरों का शोषण करने की बेवकूफी में कहाँ ? दूसरों का शोषण करने वालों को फिर सुख के लिए शराब-कबाब और कुकर्मों की शरण लेनी पड़ती है।

निष्काम कर्म करने में जिन्हें मजा नहीं आता वे बेचारे कामना-कामना के चक्कर में चौरासी के चक्कर में चलते ही रहते हैं।

एक दिन में 1440 मिनट का समय है हमारे पास। उसमें से कम-से-कम 20-20 मिनट सुबह, दोपहर, शाम तो निकालें निष्काम होने के लिए ! 24 घण्टों में से 1 घण्टे ही सही, निष्काम भाव से ईश्वर का भजन करें… आज तो भजन भी दुकानदारी हो गया है। ʹइतनी माला करें, जप-ध्यान करें तो जरा प्रॉब्लेम् न आयें…. नौकरी अच्छी चले…. छोकरे अच्छे रहें…।ʹ जप-ध्यान से भी यदि नश्वर ही चाहा तो फिर शाश्वत के लिए कब समय निकालोगे ? ईश्वर के लिए ईश्वर का भजन करना चाहिए।

महाभारत में एक बात आती है कि पाँच पाण्डवों सहित द्रौपदी जब वन में विचरण कर रही थी तब एक शाम को युधिष्ठिर महाराज पर्वतों की हारमाला की ओर निहारते हुए, शान्ति एवं आनंद का अनुभव करते हुए प्रसन्नमुख नजर आ रहे थे। द्रौपदी के मन में आयाः ʹमहाराज युधिष्ठिर संध्या करते हैं, ध्यान-भजन करते हैं, भगवान का सुमिरण-चिंतन करते हैं फिर भी हम दुःखी हैं….. वन में दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं और दुष्ट दुर्योधन को कोई कष्ट नहीं ?ʹ अतः उसने महाराज युधिष्ठिर से पूछाः

“महाराज ! आप भजन कर रहे हैं, धर्म का अनुष्ठान कर रहे हैं, सच्चाई से चल रहे हैं और दुःख भोग रहे हैं जबकि वह दुष्ट दुर्योधन कपट करके, जुआ खेलकर भी सुखी है। यह कैसी बात है ? आप भजन करते हैं तो भगवान से क्यों नहीं कहते कि हमें न्याय मिले ?”

युधिष्ठिर महाराज ने बड़ा गजब का जवाब दिया है जो भारतीय संस्कृति के गौरव का एक ज्वलंत उदाहरण है। युधिष्ठिर ने कहाः “द्रौपदी ! उसके पास कपट से वैभव और सुख है। वैभव और सुख बाहर से दिखता है किन्तु वह भीतर से सुखी नहीं, वरन् अशांत है। जबकि हमारे पास बाहर की सुविधाएँ नहीं हैं फिर भी हमारे चित्त का सुख नहीं मिटता। मैं भजन इसलिए नहीं करता हूँ कि मुझे सुविधाएँ मिलें अथवा मेरे शत्रु का नाश हो जाए वरन् मैं भजन के लिए भजन करता हूँ। उस सुखस्वरूप, आनंदस्वरूप, चैतन्यघन से क्या माँगना ?”

भजन के लिए भजन तभी होगा जब भगवान से कुछ न माँगा जाये। ʹजो आयेगा देखा जायेगा…. जो आयेगा सह लेंगे… जो आयेगा गुजर जायेगा…ʹ इस भाव से भजन करें तभी भगवान के लिए भजन होगा अन्यथा, ʹयह हो जाये… वह हो जाये….ʹ इस भाव से किया गया भजन भगवान के लिए नहीं होगा। भगवान से कुछ माँगने के लिए भजन करना तो भगवान को नौकर बनाने के लिए भजन करना है।

भजन प्रेमपूर्वक किया जाय अहोभाव से किया जाये, भगवान को अपना और अपने को भगवान का मानकर भजन किया जाये, निष्काम होकर किया जाये तभी भजन, भजन के लिए होगा अन्यथा मात्र दुकानदारी ही रह जायेगा।

अतः सावधान ! समय बहुत कम है। भजन ही करें व्यापार नहीं, दुकानदारी नहीं। कहीं यह अनमोल मनुष्य जन्म यूँ ही व्यर्थ न बीत जाए….

पयाहारी बाबा एक बार घूमते-घामते जयमल के राज्य में आये। उस समय जयमल खड़े-खड़े अपना महल बनवा रहा था। महल बनवाने में पानी की जरूरत पड़ती है। पानी भरने वाला एक पखाली पाड़े पर तालाब से पानी ले जाता  था।

पयाहारी बाबा तालाब के किनारे जा बैठे थे। उऩ्हें पता चला कि यह राजा का पखाली है अतः उन्होंने कहाः

“तुम्हारे राजा से कहना कि साधु आये हैं। उनके लिए पावभर दूध सुबह और पावभर दूध शाम को यहाँ भेज दिया करें।”

जयमल को पता ही न था कि संत-सेवा की महिमा का, अतः पखाली के कहने पर जयमल के अहं को चोट लगी। वह ठहाका मारकर हँसा।

अहंकार कहीं झुकना नहीं चाहता, अहंकार मजाक उड़ाना चाहता है। यह सुविदित सत्य है कि आप जो देते हो वही पाते हो। आप जो चाहते हो वह दो तो वह अनंत गुना होकर आपको मिलता है। आप अपमान चाहते हो तो दूसरों का अपमान करो। फिर आप देखोगे कि ʹहोलसेलʹ में आपको अपमान मिल रहा है। अगर आप धोखा चाहते हो तो दूसरों को धोखा दो। आपको खूब धोखा मिलेगा। अगर आप अशांति चाहते हो तो दूसरों को अशांति पहुँचाओ। आपको खूब अशांति मिलेगी। आप अशांति दोगे किसी को और मिलेगी किसी और से, किन्तु मिलेगी जरूर।

ईश्वर के केवल दो ही हाथ नहीं हैं। आप किसी व्यक्ति की सेवा करते हो तो जरूरी नहीं है कि वही व्यक्ति उन्हीं हाथों से तुम्हारी सेवा का बदला दे। भगवान के अनंत-अनंत हाथ हैं, अनंत-अनंत हृदय हैं। अनंत-अनंत हृदयों के द्वारा यह सेवा कर देता है। आप जो देते हैं, वह अनंतगुना पाते हैं।

सूरत में एक संत-महापुरुष किसी भक्त के अतिथि हुए थे जिसके यहाँ दो-चार भैंसें बँधी थीं। एक और भैंस का दूध रखा हुआ था, जिसे देखकर संत ने पूछाः

“वह क्या है ?”

भक्तः “भैंस का दूध है।”

संतः “लाओ।”

भक्त ने बड़े प्रेम से दूध दिया और संत प्रेम से वहीं पर दूध छींटने लगे। भक्त की तो श्रद्धा थी अतः उसने कुछ नहीं कहा किन्तु बेटों को हुआ कि ʹसाधु बाबा के चक्कर में आकर पिता ने पूरा दूध छिंटवा दिया ! यह कोई रीत है ?ʹ

पिता बोलाः “तुम लोगों को कुछ समझ में नहीं आयेगा, जाने दो। क्या हुआ ? 10-12 सेर दूध ही तो गया ! वह भी गुरु जी की सेवा में ही तो लगा है !”

दूसरे-तीसरे दिन भी संत ने दूध लेकर छींट दिया। बेटे परेशान हो गये तब भक्त ने हाथ जोड़कर श्रद्धा-भक्तिपूर्वक संत से पूछाः “गुरु जी ! यह क्या कर रहे हैं ?”

संतः “दूध बोता हूँ।”

वे महापुरुष तो चल दिये लेकिन वहाँ भैंसे खड़ी करने पर इतना दूध आता कि समय पाकर वही जगर ʹभैंसों का तबेलाʹ नाम से प्रसिद्ध हो गयी।

जब जड़ वस्तु फेंकते हो तो वह अनंतगुनी होकर आती है तो चेतन विचार फेंकने पर भी अनंतगुने होकर आयेंगे ही, इसमें कोई सन्देह नहीं है।

शक्कर खिला शक्कर मिले।

टक्कर खिला टक्कर मिले।।

यह कलजुग नहीं करजुग है।

इक हाथ ले इक हाथ दे।।

जो औरों को डाले चक्कर में।

वह खुद भी चक्कर खाता है।।

औरों को देता शक्कर जो।

वह खुद भी शक्कर पाता है।।

….किन्तु जयमल को तो इन सब बातों का पता ही नहीं था। अतः वह हँसकर अपने मंत्री से बोलाः “आजकल साधु-बाबाओं का दिमाग भी आसमान में है। राजा को कहलाकर भेजा कि पावभर दूध सुबह-शाम भेजना !” फिर पखाली से  बोलाः

“पखाली ! महाराज को बोलना की पाड़ा दुहकर जितना भी दूध निकले वह रोज ले लिया करें…. जयमल ने ऐसा कहा है।”

पखाली ने जाकर राजा का संदेश सुना दिया पयाहारी बाबा को। पयाहारी बाबा आ गये अपनी यौगिक मस्ती में। संकल्प करके पखाली के पाड़े पर पानी छींटा, हाथ घुमाया और वह पाड़ा भैंस बन गया। उसके थन दूध से भर गये। वह देखकर पखाली बाबा के चरणों में गिर पड़ा।

पखाली पानी भरकर पाड़े को ले जाने लगा तो उसके थनों से दूध टपक रहा था। वह रास्ते चलते लोगों को भी यह चमत्कार बताने लगाः “देखो देखो… बाबा ने यह कैसा जादू कर दिया !”

जब जयमल ने देखा तो उसे हुआ कि ʹधत् तेरे की ! लोगों का शोषण करके फिर हम मजा लेना चाहते हैं किन्तु इनका तो संकल्प मात्र ही प्रकृति में परिवर्तन कर देता है !ʹ

जयमल आया और पयाहारी बाबा के चरणों में गिरता हुआ बोलाः

“महाराज ! क्षमा करें। यह सब कैसे होता है, बताने की कृपा करें।”

पयाहारी बाबाः “हरि अनंत हैं। हरि की शक्ति अनंत है। वही अनंत शक्तिमान ब्रह्माण्डनायक हरि तेरा अन्तरात्मा बनकर बैठा है, मूर्ख ! इस महल को बना-बनाकर फिर छोड़कर मरेगा। इससे तू हृदय के महल को बना ताकि तेरा परलोक सुधर जाये। इन परिस्थितियों का सुख तू कब तक लेगा ? चापलूसों की खुशामद का सुख तू कब तक लेगा ? मूर्ख ! तू दिखता तो बाहर से राजा है किन्तु भीतर से महाकंगाल है…”

जयमल का हृदय बदल गया। पुनः चरणों में गिरकर बोलाः “फिर सुख कैसे मिलेगा ?”

पयाहारी बाबाः “जो सुखस्वरूप श्रीहरि हैं उनकी पूजा उपासना और भजन करना सीख।”

जयमन ने प्रार्थना करके थोड़ी बहुत पूजा की विधि सीख ली और अपने महल के ऊपर एक सुन्दर कक्ष बनवाया। जयमल ने श्रीहरि का पूजाकक्ष सात्त्विक ढंग से सजाया और उसमें ऐसी सीढ़ी रखी जिससे केवल वही जा सके। बाद में सीढ़ी उठाकर रख दी जाये। अपने सेवकों को सख्त आदेश दे दिया कि ʹउसके सिवाय यदि कोई उस सीढ़ी का उपयोग करके ऊपर के कक्ष में जायेगा तो उसे कठोर दंड दिया जायेगा।ʹ

उस कक्ष में भगवान श्रीकृष्ण की मूर्ति की प्राणप्रतिष्ठा करके जयमल रोज उसकी पूजा करता और गुरुमंत्र का जप करता। इस प्रकार दिन बीत चले।

एक दिन जयमल थका हुआ था अतः रात्रि में जल्दी से नीचे के कमरे में आकर सो गया। तब उसकी पत्नी को हुआः ʹदेखा जाये, ऊपर क्या है ? ये रोज आकर पूजा करते हैं, भोग चढ़ाते हैं और सबको प्रसाद बाँटते हैं। आजकल बड़े भक्त हो गये हैं तो किस प्रकार सेवा-पूजा करते हैं ?ʹ

पत्नी ने धीरे-से सीढ़ी उठाकर रखी और धीरे-धीरे कमरे में गयी। वहाँ जाकर क्या देखती है कि जयमल जिनकी रोज पूजा करते हैं वे ही ठाकुर जी एक तेजोमय पुरुष के रूप में शैया पर विश्रान्ति कर रहे हैं ! जयमल की पत्नी दंग रह गयी कि ʹमैं क्या देख रही हूँ !ʹ

उसका शरीर पुलकित हो उठा, हृदय रोमांचित और आनंद-माधुर्य से परिपूर्ण हो उठा तथा नेत्रों से प्रेमाश्रु बरस पड़े। वह ज्यादा वहाँ न रह सकी क्योंकि जयमल के स्वभाव से अच्छी तरह परिचित थी। अतः श्रीहरि को प्रणाम करके धीरे-धीरे सीढ़ी उतरने लगी। ज्यों ही आखिरी सीढ़ी से जरा जोर से कूदी त्यों ही गहनों की आवाज सुनकर जयमल की नींद टूट गयी। सीढ़ी लगी देखकर वह पत्नी को डाँटने लगाः “क्यों गयी थी ऊपर ?!”

तब पत्नी ने कहाः “चाहे आप मुझे प्राणदण्ड दे दें किन्तु अब मुझे कोई डर नहीं है।”

जयमलः “तुम्हें मेरे से डर नहीं लगता ?”

पत्नीः “जब डरती थी तब डरती थी किन्तु आज मुझे डर नहीं लग रहा है। पतिदेव ! मैं आपकी अवज्ञा करके चुपके से ऊपर गयी और वहाँ क्या देखा कि जिनकी आप पूजा करते हैं वे ही भगवान मानो साकार होकर आपके पूजाकक्ष की शैया पर शयन कर रहे हैं…”

जयमल को पत्नी के हाव-भाव और मुखमुद्रा देखकर हुआ कि सचमुच ही इसने साकार विग्रह के दर्शन किये हैं। अतः वह तुरंत सीढ़ी से चढ़कर पूजाकक्ष में गया किन्तु उसे कुछ भी दिखाई न पड़ा। वहाँ ठाकुर जी को न पाकर भी उसे उस शैया को प्रणाम किया और कहाः “प्रभु ! अभी मेरे चित्त में दोष हैं। मेरे कषाय अभी परिपक्व नहीं हुए हैं। मैंने अनेकों का शोषण किया है और विलासी जीवन जिया है इसीलिए मेरा भक्तियोग सफल नहीं हुआ। फिर भी गुरुकृपा से आप आते तो हो। पत्नी का निर्दोष हृदय है अतः उसे दीदार दिया। देर सवेर आप मुझे भी दर्शन दोगे ही। अगर नहीं भी दिया तब भी यह मानकर प्रसन्नता आ रही है कि मेरी पूजा आप तक पहुँच तो रही है…..”

आप जो  देते हो वह जरूर उस अन्तर्यामी ईश्वर तक पहुँचता ही है। इसमें संदेह मत करो कि ʹपहुँचता है कि नहीं पहुँचता….ʹ जब आपकी देखने की आँखें खुल जायेंगी तब आपको दिखेगा भी सही।

किसी के लिए आप कुभाव करें और जब वह व्यक्ति मिले तब आप देखें कि वह आपसे कैसा व्यवहार करता है। किसी के लिए आप सदभाव भेजें फिर उसके मिलने पर आप देखें कि वह आपसे कैसा व्यवहार करता है।

भारत कर्मभूमि है। मुक्ति का द्वार है यह देश। उत्तम कर्म एवं सत्संगति, महापुरुषों का सान्निध्य एवं उपदेश मनुष्य को मुक्तिधाम तक ले जा सकता है। शास्त्र कहते हैं।

ʹआसक्ति कभी जीर्ण होने वाली नहीं है किन्तु वही आसक्ति संत महापुरुषों के चरणों में और उनके वचनों में हो जाये, स्वामी लीलाशाह बापू के श्रीचरणों और वचनों में हो जाये, भगवान वेदव्यास जी के श्रीचरणों एवं कथनों में हो जाये तो वही आसक्ति मुक्ति देने वाली है।

डिस्को में, वाइन में, क्लब में स्त्री-पुरुषों के नाचगान में आसक्ति करके तो बरबादी ही होती है, पायमाली ही होती है लेकिन भगवान में और भगवान के प्यारे संतों के वचनों में आसक्ति करने से मुक्ति और भुक्ति दोनों दासियाँ बन जाती हैं…..

स्रोतः ऋषि प्रसाद, फरवरी 1997, पृष्ठ संख्या 12,13,14,15,16,6 अंक 50

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