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Prerak Prasang

Rishi Prasad 270 Jun 2015

मूर्ख व बुद्धिमान की पहचान


सुकरात से उनके एक शिष्य ने विनम्रता से पूछाः “मूर्ख और बुद्धिमान की क्या पहचान है ?”
तत्वज्ञानी महात्मा सुकरात बोलेः “जो ठोकर खाने के बाद अपने अनुभव से भी लाभ न उठाये और ठोकरें ही खाता रहे वह है मूर्ख और जो दूसरों के अनुभवों व महापुरुषों की सीख से लाभ उठा के ठोकर खाने से पहले ही सँभल जाय तथा कर्तव्य को और अच्छे ढंग से सम्पन्न करे वह है बुद्धिमान।”
यदि सचमुच बुद्धिमान बनना है तो कर्तव्य क्या है यह भी समझना होगा। बापू जी के सत्संग में इसका रहस्योद्घाटन होता हैः “वास्तविक कर्तव्य है अपने ब्रह्मस्वरूप को जानना, मरणधर्मा शरीर में अमरत्व को जानना। हे मानव ! लौकिक कर्तव्य तो निभाओ परंतु इन कर्तव्यों को निभाते-निभाते अपने सुखस्वरूप का ज्ञान पाने का जो वास्तविक कर्तव्य है, उसके लिए भी प्रतिदिन अवश्य समय निकालो। चालू व्यवहार में ही बीच-बीच में यह विचार करो कि आखिर यह कब तक ? विषय विलास से वैराग्य हो और भगवद्-रस, भगवद्-ज्ञान, भगवद्-आनंद में रुचि हो जाय यही कर्म का वास्तविक फल है। यही वास्तविक कर्तव्य है।”
स्रोतः ऋषि प्रसाद, जून 2015, पृष्ठ संख्या 25, अंक 270
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Rishi Prasad 269 May 2015

ब्रह्मनिष्ठों के ब्रह्मसंकल्प से होते अद्भुत परिवर्तन


एक बार सरदार वल्लभभाई पटेल ने डॉ. राजेन्द्र प्रसाद को यह जानने के लिए भेजा कि ‘श्री रमण महर्षि स्वतंत्रता संग्राम हेतु क्या कर रहे हैं ?’
राजेन्द्र बाबू ने निवेदन कियाः “महर्षि जी ! लोग बोलते हैं कि गांधी जी इतना काम कर रहे हैं और आप यहीं बैठे हैं !”
रमण महर्षिः “तो हम नहीं कर रहे हैं क्या ? संकल्प से भी काम होते हैं।”
पूज्य बापू जी कहते हैं- “जो निःसंकल्प महापुरुष हैं, उनके संकल्प में भी बड़ी ताकत होती है। मौन रहकर मौन में टिकते हैं और संकल्प द्वारा क्रिया से ज्यादा मंगल करते हैं। लेकिन आजकल समझ का स्तर इतना नीचे आ गया कि वाणी का भी उपयोग करना पड़ता है।”
रमण महर्षि की तरह स्वामी विवेकानंद, स्वामी रामतीर्थ, साँईं श्री लीलाशाह जी महाराज, योगी अरविंद आदि कई नामी-अनामी महापुरुषों के संकल्पबल व चन्द्रशेखर आजाद, भगतसिंह, रामप्रसाद बिस्मिल आदि देशभक्तों की कुर्बानियों तथा महात्मा गाँधी, सुभाषचन्द्र बोस, सरदार पटेल, पं. मदनमोहन मालवीय आदि के अथक प्रयासों के फलस्वरूप 15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र हुआ।
परंतु सैंकड़ों वर्षों की गुलामी के कारण मानसिक गुलामी दूर नहीं हुई। इस मिली हुई बाह्य आजादी को बनाये रखने तथा मानसिक गुलामी से मुक्त करके भारत को पुनः विश्वगुरु पद पर आसीन करने के लिए ब्रह्मज्ञानी महापुरुष पूज्य बापू जी अनेक कष्ट सहते हुए भी पिछले 50 वर्षों से सतत प्रयत्नरत हैं। वासुदेवः सर्वमिति की दृष्टि से सम्पन्न पूज्य बापू जी के वैदिक सत्संग तथा मानव उत्थान के कई दैवी कार्यों द्वारा देश में एकता, अखंडता, सद्भाव, संयम, सदाचार आदि से समाज में सुख शांति व सम्पन्नता आयी है। बापू जी ने हम सबको सांस्कृतिक पुनर्जागरण द्वारा सच्ची आजादी, आत्मिक आजादी की ओर अग्रसर किया है। इतना ही नहीं, बापू जी अपने ब्रह्मसंकल्प द्वारा कारगिल युद्ध में ऐतिहासिक सफलता दिलाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका थी।
26 जून 1999 को अहमदाबाद आश्रम में गुरुपूर्णिमा का शिविर चल रहा था। उधर भारतीय सेना कारगिल में पाकिस्तानी घुसपैठियों से लोहा ले रही थी। पूज्य बापू जी को सूचना मिली कि घुसपैठी ‘टाइगर हिल’ की चोटियों पर बैठे हैं, जिससे हमारे भारतीय सैनिकों को ज्यादा खतरा है। देश की रक्षार्थ अपने प्राणों की बाजी लगाने को तत्पर भारतीय वीरों के लिए पूज्य श्री का हृदय पिघल गया।
दोपहर की संध्या में साधकों को कारगिल की स्थिति से अवगत कराते हुए पूज्य श्री ने कहाः “तुम्हारा संकल्प घुसपैठियों को ठीक कर सकता है।” पूरा सत्संग पंडाल पूज्य बापू जी तथा साधकों की ॐकार की तुमुल ध्वनि से गूँज उठा। पूज्यश्री ने जोशभरी वाणी में कहाः “तुम्हारा ॐ का गुंजन वहाँ (कारगिल में) काम करेगा। ये संकल्प के बम बाहर के बमों से ज्यादा काम करेंगे। कारगिल के आसपास के इलाके में घुसपैठियों का सफाया…. यश भले किसी को भी मिले, काम अपने देश का हो…”
कारगिल के दस्तावेज इस बात के साक्षी हैं कि 27 जून के बाद टाइगर हिल पर दिन प्रतिदिन अधिक सफलता मिलनी प्रारम्भ हुई और 4 जुलाई को टाइगर हिल पर भारतीय सेना ने राष्ट्रीय ध्वज फहराया।
स्रोतः ऋषि प्रसाद, मई 2015, पृष्ठ संख्या 26, अंक 269
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Rishi Prasad 269 May 2015

प्रार्थना की अथाह शक्ति


सच्चे हृदय की पुकार को वह हृदयस्थ परमेश्वर जरूर सुनता है, फिर पुकार चाहे किसी मानव ने की हो या किसी प्राणी की हो। गज की पुकार को सुनकर स्वयं प्रभु ही ग्राह से उसकी रक्षा करने के लिए वैकुण्ठ से दौड़ पड़े थे, यह तो सभी जानते हैं।
एक कथा आती है, एक पपीहा पेड़ पर बैठा था। वहाँ उसे बैठा देखकर एक शिकारी ने धनुष पर बाण चढ़ाया। आकाश से एक बाज पक्षी भी उस पपीहे को ताक रहा था। अब पपीहा क्या करता ?
कोई और चारा न देखकर पपीहे ने प्रभु से प्रार्थना की- “हे प्रभु ! तू सर्वसमर्थ है। इधर शिकारी है, उधर बाज है। अब तेरे सिवा मेरा कोई नहीं। हे प्रभु ! तू ही रक्षा कर….’
जब अपने बल का अभिमान छूट जाता है और भगवान की समर्थता हृदय में सुदृढ़ होती है तो की हुई प्रार्थना भगवान स्वीकार कर लेते हैं। एक ही प्रार्थना 9 बार की जाय तो उनमें से एक बार तो जरूर फल जाती है। प्रार्थना में शब्द कैसे हैं उसका महत्त्व नहीं है, आर्तभाव से प्रार्थना करके शांत हो जायें।
पपीहा प्रार्थना में तल्लीन हो गया। वृक्ष के पास बिल में से एक साँप निकला। उसने शिकारी को दंश मारा। शिकारी का निशाना हिल गया। हाथ में से बाण छूटा और आकाश में जो बाज मँडरा रहा था, उसे जाकर लगा। शिकारी के बाण से बाज मर गया और साँप के काटने से शिकारी मर गया। पपीहा बच गया।
इस सृष्टि का कोई मालिक नहीं है – ऐसी बात नहीं है। यह सृष्टि समर्थ संचालक की सत्ता से चलती है।
1970 की घटना अमेरिका के विज्ञान जगत में चिरस्मरणीय रहेगी।
अमेरिका ने 11 अप्रैल, 1970 को अपोलो-13 नामक अंतरिक्षयान चन्द्रमा पर भेजा। 2 दिन बाद पृथ्वी से 2 लाख मील की दूरी पर, चन्द्रमा पर पहुँचने के पहले ही उसके प्रथम यूनिट (कमांड मोड्यूल) की ऑक्सीजन की टंकी में अचानक विस्फोट हुआ, जिससे उस यूनिट में ऑक्सीजन खत्म हो गयी और विद्युत आपूर्ति बंद हो गयी।
उस यूनिट के तीनों अंतरिक्षयात्री कमांड मोड्यूल यूनिट की सब प्रणालियाँ बंद कर एक्वेरियस (ल्युनार मोड्यूल) यूनिट में चले गये। परन्तु पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र में प्रविष्ट होकर पुनः पृथ्वी पर वापस लौटने में उसका सफल उपयोग कर पाने की सम्भावनाएँ कम थीं। साथ ही ल्युनार मोड्यूल यूनिट दो व्यक्तियों को दो दिन तक सँभालने की क्षमता के हिसाब से बनाया गया था। परन्तु यहाँ उसे 4 दिन तक 3 लोगों को सँभालना था। और इतने लम्बे समय तक का भोजन पानी का संग्रह भी नहीं बचा था। इसके अतिरिक्त इस यूनिट के अंदर बर्फ की तरह जमा दे ऐसा ठंडा वातावरण एवं अत्यधिक कार्बन डाइऑक्साइड थी। जीवन बचने की सम्भावनाएँ बहुत कम थीं।
इस विकट परिस्थिति में सब निःसहाय हो गये। कोई मानवीय ताकत अंतरिक्षयात्रियों को सहायता पहुँचा सके यह सम्भव नहीं था।
देशवासियों ने प्रार्थना की। अंतरिक्षयात्रियों ने ईश्वर के भरोसे पर एक साहस किया। चन्द्र पर अवरोहण करने के लिए ल्युनार मोड्यूल यूनिट के जिस इंजन का उपयोग करना था, उसकी गति एवं दिशा बदलकर अपोलो-13 पृथ्वी की ओर मोड़ दिया। और आश्चर्य ! तमाम जीवनघातक जोखिमों से पार होकर अंतरिक्षयान ने सही सलामत 17 अप्रैल 1970 के दिन प्रशांत महासागर में सफल अवरोहण किया।
उन अंतरिक्ष वैज्ञानिकों ने बाद में सभी देशवासियों को समाचार पत्र के द्वारा कहाः ‘ऐसी कठिन परिस्थिति में सुरक्षित लौटने के लिए आप सभी ने हमारे लिए प्रार्थना की, इसके लिए आप सभी को हृदयपूर्वक धन्यवाद है।’
वह परमात्मा कैसा समर्थ है ! वह कर्तुं अकर्तुं अन्यथा कर्तुं समर्थः…. है। असम्भव भी उसके लिए सम्भव है। सृष्टि में चाहे कितनी भी उथल-पुथल मच जाये लेकिन जब वह अदृश्य सत्ता किसी की रक्षा करना चाहती है तो वातावरण में कैसी भी व्यवस्था करके उसकी रक्षा कर देती है। ऐसे तो कई उदाहरण हैं।
कितना बल है प्रार्थना में ! कितना बल है उस अदृश्य सत्ता में ! अदृश्य सत्ता कहो, अव्यक्त परमात्मा कहो, एक ही बात है लेकिन वह है जरूर। उसी अव्यक्त, अदृश्य सत्ता का साक्षात्कार करना यही मानव जीवन का अंतिम लक्ष्य है।
स्रोतः ऋषि प्रसाद, मई 2015, पृष्ठ संख्या 15,19 अंक 269
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