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Prerak Prasang

वास्तविक भोजन


एक बार देवर्षि नारद जी विचरण करते हुए सूर्यलोक में पहुँचे। भगवान सूर्य ने उनका अर्घ्य पाद्य से पूजन किया।

सूर्यदेव ने पूछाः “नारदजी ! अभी आप कहाँ से आ रहे हैं ?”

नारदजीः “महीसागर संगम तीर्थ पर जो महीनगर बसा है, वहाँ के ब्राह्मणों के बीच सत्संग करके आ रहा हूँ।”

सूर्यनारायणः “वहाँ के लोग कैसे हैं ?”

नारदजीः “जो अपने मित्र हैं, परिजन हैं, मिलने वाले हैं उनकी प्रशंसा बड़ों के आगे नहीं करनी चाहिए। वे तो सत्संगी हैं, भगवान की भक्ति करने वाले हैं तो उनमें दोष तो हैं नहीं, निंदा के पात्र भी नहीं हैं तो मैं उनके लिए क्या बोलूँ ? आप स्वयं उनको दर्शन दीजिए अथवा उनकी परीक्षा लीजये।”

इस प्रकार की चर्चा करके नारदजी तो विदा हो गये। भगवान सूर्य के चित्त में महीसागरसंगम तट निवासी उन संयमी साधकों को देखने की इच्छा हुई।

भगवान सूर्य ने एक तेजस्वी ब्राह्मण का रूप बना लिया और उस नगर के ब्राह्मणों की कसौटी करने धरती पर आये। उन ब्राह्मणों ने देखा कि ‘कोई वृद्ध पुरुष आ रहा है।’ अतिथि-सत्कार के नियम के अनुसार उनको बहुमान देते हुए “पधारो-पधारो” कह के यज्ञ मंडप में, अपनी साधना की जगह में उचित जगह पर आसन दिया व अर्घ्य-पाद्य आदि से उनका पूजन किया।

ब्राह्मणों ने पूछाः “आप भोजन में क्या लेंगे ? आप फलाहारी हैं कि दुग्धाहारी, स्वयंपाकी हैं कि हमारे हाथ का भोजन स्वीकार कर लेंगे ?”

व्यवहार में जो स्नेह है, अहोभाव है वह चित्त को पावन करता है क्योंकि सभी व्यक्तियों में वही ईश्वर छुपा हुआ है। व्यवहार में जो खिन्नता है, उद्विग्नता है, अपमानितता है वह लौटकर अपने पास ही आती है। धन दान, स्वर्ण दान, गौदान से भी बड़ा है मान का दान। दूसरे का अपमान करने वाला पापियों के लोक में जाता है। इसलिए कहा गया है – अतिथिदेवो भव। मान से, स्नेह से, अहोभावपूर्वक मिलने जुलने से चित्त तुरंत ही पवित्र होता है और अभद्र  व्यवहार करने से चित्त उद्विग्न होता है।

ब्राह्मण वेशधारी भगवान सूर्य ने कहाः “एक होता है प्राकृत भोजन और दूसरा होता है परम भोजन (वास्तविक भोजन)। प्राकृत भोजन की मुझे आवश्यकता नहीं है, मुझे तो वास्तविक भोजन करा दो।” ब्राह्मणों ने एक दूसरे की तरफ देखा, तब उन ब्राह्मणों के अग्रणी हारीत मुनि ने अपने 8 वर्ष के पुत्र कमठ से कहाः

“बेटा ! प्राकृत भोजन तो जिस शरीर को जला दिया जाता है उसको पोषण देता है। इस प्राकृत भोजन की इनको आवश्यकता नहीं है, इनको वास्तविक भोजन की आवश्यकता है। मृत्यु जिसकी तरफ झाँक भी नहीं सकती, ये ऐसा भोजन करना चाहते हैं। सत्संग देकर, अलौकिक आत्मज्ञान का भोजन देकर क्या तुम इनकी भूख मिटा सकते हो ?”

“पिता जी ! आप लोगों की कृपा होगी तो ब्राह्मणदेव जरूर तृप्त हो जायेंगे। आप अपना नित्यकर्म कीजिये। ब्राह्मण तृप्त होंगे, मुझे भरोसा है।”

कमठ ने नम्रतापूर्वक कहाः “प्रकृति आदि 24 तत्वों से बने इस शरीर को जो तृप्त करता है वह प्राकृत भोजन कहलाता है। प्राकृत भोजन मीठा, खट्टा, खारा, कड़वा, कषाय तथा तीखा – इन छः प्रकार के रसों वाला पाँच भेदों वाला होता है – भक्ष्य (जो खाया जा सके), भोज्य, पेय (पीने योग्य तरल वस्तु जैसे पानी दूध), लेह्य (जो पदार्थ चाटकर खाया जा सके) तथा चोष्य (चूसने योग्य)। दूसरा भोजन वह है जो आत्मा को तृप्त करे। आत्मा ही परम है अतः उसे तृप्त करने वाला भोजन वास्तविक (परम) भोजन है।”

8 वर्ष के छोटे बालक के मुख से ऐसी महत्वपूर्ण बात सुनकर ब्राह्मण वेशधारी भगवान सूर्यदेव मन ही मन बड़े प्रसन्न हुए और पूछाः “जीव कैसे उत्पन्न होता है ?”

कमठ ने कहाः “ब्रह्मण ! जीव के जन्म लेने में तीन प्रकार के कर्म कारण होते हैं – सात्विक, राजस और तामस। जो सात्विक कर्म करते हैं उनका स्वभाव सात्विक होने लगता है और सात्विक स्वभाव वाले स्वर्ग आदि ऊँचे लोकों में जाते हैं। वहाँ सुख भोगते हैं, फिर बाद में अच्छे कुल में मनुष्यरूप में आ जाते हैं। उनमें मैत्री, करूणा, मुदिता, उदारता और सत्य की खोज की थोड़ी बहुत जिज्ञासा रहती है।

राजसी कर्म करने वाले का स्वभाव राजसी हो जाता है। उनमें काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मात्सर्य के अंश होते हैं। वे रजस में तो प्रायः रहते ही हैं पर कभी उनका सत्व की तरफ झुकाव होता है तो कभी तमस की तरफ झुकाव होता है। वे सुख-दुःख की खिचड़ी खाते भी रहते हैं और पकाते भी रहते हैं। वे जब मरते हैं तो फिर इस लोक में साधारण घऱ में जन्म लेते हैं और फिर जैसा संग मिलता है, वैसा उनका स्वभाव और समझ बन जाती है, वैसा ही उनको जगत दिखने लगता है।

जो मन को छूट दे देते हैं, नीचे के केन्द्रों में अधिक जीते हैं वे तामसी स्वभाव के लोग जीवन के दिन ऐसे ही बरबाद कर देते हैं। तमोगुणी (पापी) लोग पहले नरक में जाकर नाना प्रकार के कष्ट भोगते हैं फिर वृक्ष आदि अधम योनियों को प्राप्त होते हैं। कई  वर्षों तक वे दुःख भोगते हैं, आँधी-तूफान सहते हैं। इसके बाद ऐसे अभागे लोग कीड़े-मकोड़े, पशु-पक्षी आदि होते हुए अंत में फिर मनुष्य योनि में आते हैं लेकन वे दुर्बुद्धि होते हैं।

मनुष्य अपने-आपका मित्र भी है और शत्रु भी। अगर तमस व रजस को दबाकर सत्वगुण में नहीं जाता और सत्व से परे गुणातीत नहीं होता तो उसको कोई बचा नहीं सकता। अगर गुणातीत हो जाय तो उसको कोई गिरा नहीं सकता, कोई मार नहीं सकता। वहाँ तो मौत की भी मौत हो जाती है। वह अकाल पुरुष हो जाता है।”

कमठ ने इस प्रकार का तत्व निरूपण किया तो ब्राह्मण वेशधारी भगवान सूर्यनारायण चित्त में बड़े प्रसन्न हुए कि ‘नारदजी के सत्संग कोयहाँ के लोगों ने पचाया है।’ सूर्यनारायण ने अपना परिचय देकर उनसे वरदान माँगने को कहा। यह जानकर ब्राह्मणों को अत्यन्त आनंद हुआ कि साक्षात् भुवनभास्कर अपने यहाँ पधारे हैं। उन्होंने अर्घ्य देकर उनका पूजन किया और  वरदान माँगा कि “हे प्रभु ! आप हमारे इस स्थान का कभी त्याग न करें।”

भगवान सूर्य ने कहाः “तथास्तु ! मैं यहाँ ‘जयादित्य’ नाम से सदा निवास करूँगा।”

कमठ ने सूर्य भगवान की स्तुति की तो सूर्य भगवान प्रसन्न होकर बोलेः “वत्स ! तुमने मुझे पूर्ण संतुष्ट किया है, अतः तुम्हें वर देता हूँ कि इस पृथ्वी पर तुम सर्वज्ञ होकर मोक्ष को प्राप्त कर लोगे।”

आठ वर्ष का बालक पवित्र माहौल में जन्मता है, रहता है तो आत्मसाक्षात्कार को उपलब्ध हो जाता है। उसकी वाणी सुनकर भुवनभास्कर भी तृप्त हो जाते हैं। बच्चे-बच्चियाँ बुरे चलचित्र देखकर बुराई की तरफ चल पड़ते हैं। अमेरिका में एक किशोर ने 7 सहपाठियों को गोली से उड़ा दिया। कहीं 3 को उड़ा दिया। पूछने पर पता चला कि चलचित्रों का असर, फिल्मों का असर ! अतः बच्चे-बच्चियों को गंदे दृश्यों और गलत संग से, किस्से कहानियों से बचाकर ऊँचे साधन हेतु प्रोत्साहित करके ऊँचे आदमी बनाओ।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, नवम्बर 2014, पृष्ठ संख्या 8, अंक 263

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भारतीय संस्कृति की महानता का राज


आपको यह खबर होनी चाहिए कि भारत विश्वभर में पूजने लायक कैसे हुआ ?

यहाँ बड़े-बड़े चक्रवर्ती राजा हो गये, पवित्र नदियाँ हैं इसलिए भारत  विश्व का गुरु है, ऐसी बात नहीं है। यहाँ बड़े-बड़े महाँपुरुष प्रकट हुए हैं इसलिए भारत विश्व का गुरु है।

एक बार राष्ट्रपति डॉ. राधाकृष्णन् विदेश गये। वे एक दार्शनिक थे। वहाँ लोगों ने उन्हें वहाँ के सभी आविष्कार दिखाये और कहाः “देखिये, हम लोगों ने कितना विकास किया है ! कम्पयूटर में प्रोग्राम बना दिया है तो वह रोबोट काम कर रहा है। पनडुब्बी बनायी जो पानी के अन्दर चलती है।”

राधाकृष्णन ने कहाः “ठीक है, लेकिन अभी तुमको बहुत कुछ जानना बाकी है। तुमने मछली की नाईं पनडुब्बी में घूमना सीख लिया, जहाज आदि में पक्षी की नाईं उड़ना भी सीख लिया है और गधे की नाईं रोबोट काम कर रहे वह भी कर लिया लेकिन इनके पीछे जिसकी सत्ता है, उस ईश्वर को जानने के लिए अभी तुम्हें भारत के आत्मवेत्ताओं से ज्ञान लेना पड़ेगा।

तुम तो भीतर से बाहर आने की विद्या में आगे बढ़ते दिखते हो लेकिन बाहर से भीतर आना पड़ेगा। उसके बिना शाश्वत सुख-चैन नहीं है।”

विषयों से इन्द्रियों में जाओ, इन्द्रियों से मन में आओ, मन से बुद्धि में आओ, बुद्धि से स्व में आओ तब विश्रांति मिलेगी। झख मार के रात को स्व में आते हो। वहाँ तो तमोगुण होता है, जरा आराम मिलता है, विश्रांति मिलती है तभी दूसरे दिन काम करने लायक होते हैं। अगर स्व में नहीं आये तो जीने में नालायक हो जायें। नींद नहीं आये तो फिर देखो क्या हाल होता है ! नींद आती है तो पुष्टि कौन देता है ? वही सच्चिदानंद चिद्घन चैतन्य परमात्मा !

यहाँ महापुरुष परमात्म प्रेम का दरिया छलकाते हैं। उस प्रेम के दरिया में बच्चा भी नाचे तो बाप भी नाचे, सेठ भी नाचे तो नौकर भी नाचे, अमीर भी नाचे तो गरीब भी नाचे। उनका प्रेम सागर छलकता है तो दुःखी लोग अपने दुःख भूलकर आनंदित, आह्लादित और शांत हो जाते हैं। यही कारण है कि सत्संग में बहुत दूर दूर से लोग आते हैं। यह सारा का सारा साम्राज्य प्रेम देवता का है। किसी व्यक्ति में, मंत्र-तंत्र में, टोने-टोटके वाले, धागेवाले में वह ताकत नहीं होती कि ऐसे समझदार, दिमागवाले लोगों, भक्तों, सेठों को भी बाँध सके।

मैं एक बार अजमेर (राजस्थान) गया था। वहाँ ऋषि दयानन्द उद्यान में मेरा निवास था। बगीचे में टहलने गया तो वहाँ एक सेवानिवृत्त डीएसपी मुझे देखकर खुश हो गये। बोलेः “बाबा जी ! कहाँ से आये ?” वे प्रेमवश थोड़े भावावेश में आ गये। मेरे साथ जो साधक था, उसने कहाः “साँईं ! आपके पास कोई जादू है ? देखो बगीचे में कोई भी आदमी देखता है तो वह आपके पीछे पागल हो जाता है !” फिर मैं जितने दिन वहाँ रहा, वे सत्संग में आते रहे। एक बार अहमदाबाद आकर गये। फिर 20 दिन भी उनसे रहा न गया और 20 दिन बाद दुबारा आये।

उन पर कोई निर्देश जारी करे कि ‘जो संत बगीचे में मिले थे उनके आश्रम में तुमको जाना पड़ेगा, नहीं तो तुम्हारी पेंशन बंद कर देंगे।’ तो वे उसको अदालत में ले जायेंगे। पुलिस कमिश्नर कहे कि ‘आप (सेवानिवृत्त डीएसपी) राजस्थान से अहमदाबाद के पुलिस कमिश्नर के पास महीने में दो बार सलाम करने जाया करो, नहीं तो आपकी पेंशन बंद करेंगे।’ तो वे कमिश्नर को घऱ बैठाने का रास्ता खोजेंगे।

खैर, वे एक डीएसपी ही नहीं, ब्रह्माँण्ड का कोई भी सात्विक हृदयवाला होगा, जिसके पास श्रद्धा-प्रेम की केवल एक बूँद भी होगी, उसको कुछ न कुछ मिल जायेगा और वह भूलेगा नहीं। भले ही शरीर से यहाँ न आ सके कभी, पर मन से तो छटपटायेगा कि ‘पता नहीं कब जा पाऊँगा !’

टोने-टोटके के बल से रिद्धि-सिद्धि के बल से आदमी वश नहीं होता। आदमी को वश करना हो तो मैं आपको वशीकरण मंत्र बता देता हूँ। तुलसीदास जी ने कहा है, ‘वशीकरण मंत्र प्रेम को’। पूरा प्रेम तो आत्मा में है। तुम जितने गहरे जाओगे, जितने अपने अहंकार को, अपने अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय कोष को भूलते जाओगे उतने आनंदस्वरूप में एक हो जाओगे। जब तुम आनंदस्वरूप में एक होओगे तो ये कोष भी पवित्र हो जायेंगे। इन शरीरों के भीतर जो द्रष्टा है वह जब आँखों से निहारेगा तो तुम्हारी आँखों से न जाने कैसा जादू टपकेगा ! बोलोगे तो तुम्हारी वाणी में न जाने कितना माधुर्य होगा !! जो थियेटर में या इधर-उधर प्रेम दिखाया जाता है, वह केवल धोखा है। सिनेमावालों के पास प्रेम नहीं, वे तो प्रेम का नाम लेकर मोह का जगत उत्पन्न करते हैं।

जो लोग संत कबीर जी पर प्रबंध (थीसिस) लिखते हैं, वे डॉक्टर हो जाते हैं, पीएचडी. हो जाते हैं। उनको बढ़िया नौकरी मिल जाती है। वेतन मिल जाता है, पदोन्नति मिल जाती है लेकिन कबीर जी स्कूल में आ जायें तो उनको क्लर्क की नौकरी नहीं मिलेगी क्योंकि क्लर्क की नौकरी के लिए जितनी पढ़ाई चाहिए उतनी कबीर जी ने नहीं की थी। लेकिन वे प्रेम का एक ऐसा अमृत पढ़े थे कि आज कबीर जी प्रोफेसरों के दिलो-दिमाग में राज्य कर रहे हैं।

उस समय कबीर जी की कद्र नहीं हुई थी। बुद्धिशाली लोगों को कद्र नहीं हुई पर पागलों के पास तो तब भी कद्र थी। कबीर जी के लिए भी कुछ लोग पागल थे तभी तो समाज में उनके विचार फैल गये। गुरु नानक जी की, संत कबीर जी की टूटी-फूटी भाषा है, व्याकरण की कोई व्यवस्था नहीं लेकिन विश्व पर राज्य कर रही है। मेरे पूज्यपाद भगवान लीलाशाह जी महाराज की टूटी फूटी भाषा मेरे पर राज्य कर रही है और मेरे द्वारा न जाने कितनों पर राज्य कर रही है ! न उनके पास सत्ता थी, न डंडा था, न नोटें थीं। उनको हस्ताक्षर करने में कुछ मिनट लगते थे। फिर भी बड़े-बड़े विद्वानों का हृदय उनके आगे झुक जाता है, सिर झुक जाता है। हम उनकी याद करके अपना हृदय पवित्र करते हैं। उनका शरीर नहीं है फिर भी उनकी याद में अपना हृदय पवित्र करने के सौभाग्य की एक घड़ी मिल जाती है। वाह मेरे साँईं लीलाशाहजी ! देखो, हृदय कैसा शीतल होता है। वाह ! वाह !! हृदय में पवित्र भाव उठेगा। वाह गुरू वाह ! वाह साँईं वाह !!

भारत में ऐसे अगणित महापुरुष हुए हैं तथा आज भी हैं जो दिखते तो साधारण हैं परंतु जब अपनी मौज में आते हैं तो प्रकृति में भी उथल-पुथल हो जाती है। आत्मसामर्थ्य के धनी ऐसे महापुरुषों के कारण ही चारों ओर से शत्रुओं से घिरी होने पर भी हमारी सनातन संस्कृति आज भी अपनी चमक बिखेर रही है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, नवम्बर 2014, पृष्ठ संख्या 4,5 अंक 263

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योगःकर्मसु कौशलम्


एक सम्पन्न घराने के इकलौते बालक को पढ़ने का शौक तो था ही, साथ ही लालटेन की रोशनी में चलने का भी बड़ा शौक था। पढ़ने के लिए वह दूसरे गाँव में जाता था। छुट्टी होने के बाद जानबूझकर खेल-कूद में समय बिताता। जब अँधेरा हो जाता तो लालटेन जलाकर घर वापस लौटता था।

एक दिन घर पहुँचने पर उसे पता चला कि लालटेन की ढिबरी (केरोसीन की टंकी का ढक्कन) रास्ते में कहीं गिर गयी है। दूसरे दिन रविवार था। बालक को बेचैनी होने लगी कि ‘आखिर मुझसे ऐसी भूल हुई कैसे ? मैं छोटी सी ढिबरी नहीं सम्भाल पाया !’

बाह्य दृष्टि से देखें तो उसके जैसे सम्पन्न परिवार के बालक के लिए लालटेन की ढिबरी खो जाना कोई बड़ी बात नहीं थी। एक लालटेन बिना ढिबरी की हो गयी तो उसके पिता उसे ढिबरी तो क्या दूसरी नयी लालटेन ही खरीदकर दे सकते थे किंतु बालक के मन में अपनी कार्यकुशलता में कमी का बड़ा भारी दुःख था।

अगला सारा दिन, सारी रात बेचैनी में बीती। सोमवार आया। बालक घर के दरवाजे से ही जमीन पर आँखें गड़ा-गड़ाकर ढिबरी खोजते हुए पाठशाला के रास्ते निकल पड़ा। छोटी सी चीज थी, दो दिन बीत गये थे। रास्ते में पड़ी चीज किसी को दिख गयी हो तो उसने उठा भी ली हो, यह भी हो सकता था। इस प्रकार ढिबरी के मिलने की सम्भावना तो  बहुत कम थी परंतु बालक के मन में अपने से प्रमाद हो जाने की पीड़ा तथा अपनी उस छोटी से छोटी अकार्यकुशलता को मिटाने का चाव बड़ा प्रबल था। चलते-चलते विद्यालय पहुँचने से पहले ढिबरी मिल गयी। बालक को बड़ी प्रसन्नता हुई। आगे चलकर यही बालक ‘स्वामी शरणानंदजी’ के नाम से विख्यात हुआ।

सत्य ही है यदि किसी को एक गिलास पानी पिलाना नहीं आता है तो ध्यान करना भी नहीं आयेगा। छोटे से छोटा काम करने में जो असावधानी करता है वह करने की आसक्ति से मुक्त नहीं हो सकता। और आसक्तिरहित हुए बिना योगवित् होना सम्भव नहीं है। ‘गीता’ में भगवान कहते हैं-

योगः कर्मसु कौशलम्।

पूज्य बापू जी भी यही समझाते हैं कि “जो भी कार्य करें, उसे पूरे मनोयोग से, दिल लगाकर करें। किसी भी काम को आलस्य या लापरवाही से बिगड़ने न दें। जो कर्म को पूरे मनोयोग से करता है उसका आत्मविकास होता है, उसकी योग्यताओं का विकास होता है। उठो…जागो…..दूर करो लापरवाही को और तत्परता एवं कुशलतापूर्वक छलाँग मारो। फिर तो पाओगे कि सफलता तुम्हारा ही इंतजार कर रही है।”

आश्रम के सत्साहित्य ‘पुरुषार्थ परम देव, जीवन रसायन, निर्भय नाद’ आदि का प्रतिदिन अमृतपान करने व उनमें लिखे वचनों पर अमल करने से सजगता, कार्यकुशलता, हिम्मत, साहस और ईश्वर व महापुरुषों की असीम कृपा के भण्डार स्वतः ही खुल जाते हैं।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अगस्त 2014, पृष्ठ संख्या 11, अंक 260

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