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Prerak Prasang

पापी का जूता, पापी के ही सर, संयम सात्त्विक धैर्य का देखो असर – पूज्य बापू जी


धृति अर्थात् धैर्य के तीन प्रकार हैं-तामसी धृति, राजसी धृति और सात्त्विक धृति। जो पापी, अपराधी, चोर, डकैत होते हैं वे भी धैर्य रख के अपने कर्म को अंजाम देने में सफल हो जाते हैं, यह ʹतामसी धृतिʹ है।

जो राजसी व्यक्ति हैं वे भी ठंडी-गर्मी सह के, धन-सत्ता बढ़ा के, अहंकार पोसकर गद्दी, कुर्सी के लिए धैर्य रखते हैं, यह ʹराजसी धैर्यʹ है।

तीसरे होते हैं सात्त्विक धैर्यवान। वे परमात्मा में विश्रांति पाने के लिए चल पड़ते हैं। साधन-भजन, परोपकार करते हैं, मान-अपमान आता है तो धैर्य रखते हैं। सफलता-विफलता में विह्वल होकर अपने आत्मा-परमात्मा को पाने का उद्देश्य नहीं छोड़ते और कठिनाइयों से भी डरते नहीं हैं, अपने उद्देश्य में डट जाते हैं।

बाल या यौवन काल में जिनके जीवन में सत्संग आ जाता है, उनके जीवन में भगवान की धृतिशक्ति सात्त्विक रूप में चमकती। जिसके जीवन में यह सात्त्विक धृति आती है, उसकी प्रज्ञा ठीक काम करने लगती है। वह छोटे से छोटा, लाचार से लाचार अकेला व्यक्ति तो क्या कन्या भी महानता का इतिहास रच डालती है।

सात्त्विक धृति के धनी व्यक्ति के ऊपर कैसी भी आफतें आ जायें, वह अपनी वर्तमान अवस्था में ही ऊपर उठता है। ʹमेरा भाग्य ऐसा है अथवा बाद में ऐसा होगाʹ , नहीं… अभी से ही। उद्यम, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति और पराक्रम का धृतिपूर्वक सदुपयोग करके छोटे से छोटे व्यक्ति भी महान हो गये, जैसे – शबरी भीलन।

जिस मनुष्य के जीवन में सात्त्विक धृति है, यदि वह ठान ले ते इतिहास का देदीप्यमान मार्गदर्शक बन सकता है, फिर वह चाहे कोई बेचारी अबला कन्या क्यों न हो, बड़े-बड़े तीसमारखाँओं को दिन में तारे दिखा सकती है।

आज सोनगढ़ इलाके का ʹवावʹ गाँव कन्या सोनबा की धृति की गवाही दे रहा है। सोनबा के पिता का नाम था मोकल सिंह। भावनगर जिले में सोनगढ़ के नजदीक एक छोटा सा गाँव था। सेंदरड़ा। एक दिन वह साहसी कन्या कहीं जा रही थी। उसे घुड़सवारी का शौक था। उसने देखा कि सामने से यवन सैनिकों का टोला आ रहा है और सूबेदार मेरे पर बुरी नजर डालता हुआ नजदीक आ रहा है। उस युवती ने आँखें अँगारे उगलें ऐसे ढंग से उसके सामने देखा लेकिन वह भी तो सूबेदार था, जूनागढ़ का सर्वेसर्वा !

सूबेदार ने कहाः “अरे सुन्दरी ! तेरे जैसी सुंदरी तो मेरी बेगम बनने के काबिल है। आ, तू मेरे महल में रहने के काबिल है।”

ऐसी गंदी-गंदी बातें सुनायीं कि सोनबा का खून खौलने लगा। उसने कहाः “हे दुर्बुद्धि दुष्ट ! सँभल के बात कर। तेरे दिन पूरे होने को हैं इसलिए तू मेरे ऊपर बुरी नजर डाल रहा है। तेरी आँखें निकाल के कौवों को दे दूँगी। तेरे साथ सेना है लेकिन मेरे साथ गुरु के वचन हैं। उद्यम, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति, पराक्रम – ये छः सदगुण जिसके पास होते हैं, उस पर कदम-कदम पर परमात्मा कृपा बरसाता है। अगर तू अपनी जान बचाना चाहता है तो यह बकवास बंद कर, तू अपने रास्ते जा और मैं अपने रास्ते जा रही हूँ।”

“अरे बिहिश्त की परी ! तेरे जैसी सुंदरी और वीरांगना को हम अपनी खास पटरानी बनायेंगे। तुम अब हमारे हाथ से नहीं जा सकती चिड़िया ! सैनिको ! घेर लो इस सुन्दरी को।”

सोनबा ने देखा कि ये सैनिक मुझे घेरेंगे और यह दुष्ट मनचाहा आचरण करके मुझे जूनागढ़ ले जाना चाहेगा… हम्ઽઽઽ…. ૐ….. ૐ…. ૐ…. घोड़ी को ऐड़ी मारी। घोड़ी घूमती गयी और तलवार एक दो सैनिकों गिरा दिया। दूसरे सैनिक पकड़ने की कोशिश तो कर रहे थे लेकिन डर के मारे नजदीक नहीं आर रहे थे। घोड़ी उछाल मारते हुए सैनिकों के बीच में से भाग गयी लेकिन सोनबा जानती थी कि सूबेदार मेरा पीछा करेगा। उसने जाकर अपने पिता को बताया।

मोकल सिंह ने सारी बात समझकर अपने प्रजाजनों से कहाः “क्षत्रिय की कन्या पर अत्याचार, पूरी क्षत्रिय जाति का अपमान है। वह सूबेदार सेना लेकर आयेगा और हमारी छोटी सी रियासत को कुचलने की कोशिश करेगा लेकिन प्राण कुर्बान करके भी कन्या की धर्मरक्षा करना हमारा कर्तव्य है।”

“हाँ, हमारा कर्तव्य है।” सभी ने एक स्वर में कहा और लड़ने का निर्णय किया।

गाँव वालों ने रास्ते पर काँटों की बाड़ कर दी परंतु छोटी-सी रियासत को कुचलना सूबेदार के लिए क्या बड़ी बात थी ! रणभेरी बजा दी। हाथी ने सब इधर-उधर कर दिया। उसकी सेना ने पूरे गाँव को घेर लिया। खन… खन…. खन…. तलवारें चलने लगीं। सूबेदार के सैनिक कटने लगे।

आखिर सूबेदार ने कहाः “ये मनोबल से मजबूत हैं। गोलियाँ चलाओ। इनके पास बंदूकों की व्यवस्था नहीं है। तलवार और बंदूक की लड़ाई में तो बंदूक ही जीतेगी।” धड़-धड़-धड़ सेंदरड़ा गाँव के मुट्ठीभर सैनिक बलि चढ़ते देख सोनबा ने पिता जी से कहाः “पिता जी ! आप संधि का झंडा फहराइये।”

“संधि ! वह दुष्ट आकर तुझे ले जायेगा।”

“पिता श्री ! मैं आपकी कन्या हूँ। आप जरा भी संदेह नहीं रखिये। अपने कुल की प्रतिष्ठा को हानि पहुँचे ऐसा मैं कभी नहीं करूँगी। इस समय उनके पास बंदूकें हैं और हमारी सेना के पास बंदूकें नहीं हैं। इस समय बल से शत्रुओं के साथ हम नहीं जीत पायेंगे, बुद्धि से जीतना पड़ेगा।”

शास्त्र कहते हैं – उद्यम, साहस, धैर्य तो हो लेकिन बुद्धि का उपयोग भी हो। ये तीन सदगुण हैं और बुद्धि नहीं है तो मारे जायेंगे। सोनबा ने पिता के कान में कुछ बात कह दी।

पिता ने झंडा दिखाया कि हम आपसे लड़ना नहीं चाहते। सूबेदार ने देखा कि जब ये डर गये हैं और संधि करना चाहते हैं तो कोई हर्ज नहीं है। वह  बोलाः “मुझे तो बस वह सुंदरी चाहिए।”

सोनबा के पिता ने कहाः “तुमने इस छोटी सी बात के लिए नरसंहार करवाया ! तुम बोलते तो हम तुम्हारे जैसे सूबेदार के साथ अपनी बेटी का रिश्ता खुशी-खुशी कर देते। अब हमारी कन्या का विवाह तो हम तुमसे ही करेंगे लेकिन हमारे रीति-रिवाज के हिसाब से। अभी सिंहस्थ का साल है। इस सिहंस्थ में अगर विवाह करेंगे तो कन्या विधवा होकर लौटेगी। सिंहस्थ के बाद धूमधाम से विवाह करेंगे।”

सूबेदारः “अच्छी बात है।”

वह मूर्ख खुश हो गया।

मोकल सिंह ने कहाः “देखो सूबेदार जी ! हमारी रीति रिवाज के अनुसार कन्या को सुमुहूर्त चढ़ाना चाहिए।”

सुमुहूर्त मतलब क्या ?”

क्या है सुमुहूर्त का राज ? सोनबा ने पिता के कान में कौन सी बात कही ? क्या सूबेदार सोनबा से विवाह कर सका ? जानने के लिए इंतजार कीजिये अगले अंक का।)

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अप्रैल 2013, पृष्ठ संख्या 27,28, अंक 244

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मोकल सिंह ने कहाः “वर पक्ष की ओर से कन्या को हीरे मोती के गहने तथा कीमती कपड़े आदि भेजने का रिवाज है। इसको हमारे यहाँ सुमूहूर्त कहते है।”

सूबेदारः “हमको क्या कमी है ! जूनागढ़ जाकर सब भेज देंगे। अभी तो ये नकद दस हजार सोने की मोहरें रख लो।” और फिर सूबेदार चल पड़ा जूनागढ़।

जिस जगह सूबेदार के साथ भिडंत हुई थी वहाँ सोनबा अपने कुटुम्बी लोगों को लेकर गयी और बोलीः “हमें यहाँ बावड़ी खुदवानी है। मनुष्यों और गाय-भैंसों के लिए पानी की किल्लत है।” बावड़ी का काम शुरु हुआ।

कुछ दिन बीते। एक राजपूत चिट्ठी लेकर सूबेदार के पास पहुँचा। चिट्ठी में लिखा था कि ʹकुंवरी साहेबा तीर्थयात्रा को जा रही हैं। तीर्थयात्रा में सखियाँ, सहेलियाँ भी जायेंगी, 20 हजार सोना-मोहरें दे दो।ʹ

“अरे, 20 क्या 25 हजार ले जाओ। ऐसी वीरांगना मिलेगी मुझे !”

25 हजार सोना-मोहरें दे दीं मूर्ख ने।

सोनबा ने पहले की 10 हजार और अब की 25 हजार सोने की मोहरें सूबेदार की मौत के लिए बावड़ी खुदवाने में लगा दी, जिसमें नीचे तलघर बनवाया। उसकी बनावट ऐसी थी कि ऊपर से पानी की बावड़ी दिखे लेकिन नीचे पूरा गाँव आ जाय ताकि सेंदरड़ा गाँव के लोग गुप्त रूप से रह सकें और कभी शत्रु आये तो उसे पता भी नहीं चले की कहाँ से कौन निकलकर आया। सोनबा ने बड़ी चतुराई से ऐसी बावड़ी खुदवायी क्योंकि उसके पास गुरुमंत्र था, ध्यान था। सुबह उठती तो ललाट पर भ्रूमध्य में ध्यान करती तो उसको अंतरात्मा की ऐसी प्रेरणा मिलती रही कि बड़े-बड़े साजिशकर्ता भी ठोकर खा गये।

जब वर्ष पूरा होने को आया तब सूबेदार ने कहलवाया कि अब शादी के लिए तैयारी कोर। मोकल सिंह ने कुछ टेढ़ी-मेढ़ी बात सुना दी कि ʹसोनबा से शादी करना माना कब्र में जाना है।ʹ

“हं….. मेरे लिए छोटे से गाँव का मुखिया ऐसा बोल जाये !….” सूबेदार ने सेना तैयार की और सेंदरड़ा गाँव के नजदीक आकर पड़ाव डाला। “एक बार संधि कर चुके हो, क्या फिर से मौत के घाट उतरना चाहते हो ? हा…. हा…. हा….”

धैर्य तो है इसके पास लेकिन तामसी धैर्य है। रात को शराब पी, मांस खाया और सोचने लगा कि ʹसुबह इन पर अपन सफल हो जायेंगे…ʹ राजसी धृति है। ʹऔर चाहिए, और चाहिए….ʹ – लगे रहते हैं लोभी लोग। ये दोनों धृतियाँ व्यक्ति को डुबाती हैं।

श्रीकृष्ण कहते हैं सात्त्विक धृति चाहिए। ईश्वर के रास्ते दृढ़ता से चलो। चाहे कितने विघ्न आयें लेकिन अपने कर्तव्य को, अपने धर्म को, जप-अनुष्ठान को मत छोड़ो, अपने गुरु के ज्ञान को न छोड़ो। यह सात्त्विक धृति है।

सोनबा में सात्त्विक धृति थी और उस सूबेदार में तामसी और राजसी धृति थी कि ʹअभी  तो धैर्य रखें, सुबह होते ही इनका कचूमर बना देंगे और सुंदरी को बलपूर्वक ले चलेंगे।ʹ

सूबेदार ने हुक्म दियाः “चारों तरफ ऐसा कड़ा पहरा लगाओ की आदमी तो क्या एक चिड़िया भी बाहर न निकल सके।”

मध्यरात्रि को जवानों का एक टोला आया चमचमाती तलवारों के साथ और सूबेदार के कई सैनिकों की मुंडियाँ धड़ से अलग करके गायब हो गया। यवन सैनिकों ने खोजा तो कोई मिले नहीं !

ʹचारों तरफ मेरी सेना… इतना कड़ा पहरा…. देखते ही गोली मारो का आदेश… फिर भी इतने सारे जवान कहाँ से आये और गये कहाँ !!”

उनको पता ही नहीं कि जहाँ ठहरा है वही तलघर से आये और तलघर में चले गये। नशेबाजों को क्या पता चले !

सुबह हुई। सूबेदार ने चढ़ाई कर दी। सेंदरड़ा गाँव को घेर लिया। हाथी की टक्कर से दरवाजा टूटा। घुसे अंदर, तो क्या देखते हैं कि लोग हैं ही नहीं !

“सेंदरड़ा के लोग कहाँ गये ? दरवाजे बंद करके छुप गये क्या ? दरवाजे तोड़ो !”

घर-घर के दरवाजे तोड़े तो सारे घर खाली ! पूरा सेंदरड़ा खाली !! सूबेदारः “लगता है डर के मारे भाग गये। मुखिया के घर में जाओ। उस सुंदरी को तो ले चलेंगे।”

न सुंदरी मिली न सुंदरा मिला…. धक्के खाते-खाते निराश होकर अपने पड़ाव पर आये। छावनी में आकर देखा तो दुश्मन अचानक हल्ला करके भाग गया है। कई सैनिक मारे गये हैं, कई घायल  अवस्था में पड़े हैं। सोचने लगे, ʹक्या कारण है ? बंदूकें हमारे पास, उनके पास कोई बंदूक नहीं फिर भी हम मौत के घाट उतार दिये जा रहे हैं। हम उपाय खोजेंगे धीरज से।ʹ

उपाय तो खोज रहे हैं लेकिन तामसी बुद्धि से। प्याली पी, सोये…. नींद तो क्या आनी थी, मौत आनी थी। सोनबा और सैनिक तलघर से निकले और धाड़-धाड़ हमला कर दिया। वे तो शराबी थे। वे बंदूकें सँभालें उसके पहले सोनबा ने उनको सँभला दिया…. किसी को भाला तो किसी की तलवार की नोंक। एक अकेली सोनबा और मुट्ठीभर सैनिक !

सोनबा सूबेदार के तम्बू में घुस आयी और गरज पड़ीः “तुझे सोनबा चाहिए थी न ? मैं  गयी हूँ मूर्ख !” और भाला सीधा उसकी छाती में घुसेड़ दिया। किसकी ? जो सोनबा को अपनी बेगम बनाना चाहता था। बाकी के सैनिक जान बचाकर भाग गये।

भावनगर जिले के सोनगड़ के पास सेंदरड़ा गाँव के नजदीक सोनबा ने जो बावड़ी खुदवायी थी, वहाँ बसा गाँव आज भी उस संयमी, सदाचारिणी, वीर कन्या की यशोगाथा की खबर दे रहा है। उस कन्या के सत्संग, साहस, धैर्य, गुरुभक्ति और संयमी जीवन की खबर दे रहा है। वह आजीवन ब्रह्मचारिणी रही। जैसे मीरा ने परमेश्वर को वर बनाया, ऐसे ही उस कन्या ने परब्रह्म परमात्मा को ही वर बनाया।

एक कन्या में कितनी शक्ति छुपी है ! इतना बड़ा सूबेदार, इतने सारे सैनिक, इतनी सारी बंदूकें… ये बेचारे छोटी-मोटी लाठियों तलवारों से उनका मुकाबला क्या करें ! सोनबा ने युक्ति खोजी और गुरुकृपा से उसे सूझ गयी। दुष्ट को कैसे धैर्यपूर्वक यमपुरी में पहुँचाया जाता है और अपने आत्मा को परमात्मा में कैसे पहुँचाया जाता है, इसकी सीख सोनबा ने सदगुरु से पा ली थी। सोनबा अपने को शरीर नहीं मानती थी। शरीर पंचभौतिक है, इसको स्वस्थ रखो, संयमी रखो लेकिन भीतर से जानो कि ʹशरीर की बीमारी मेरी बीमारी नहीं है। मन का दुःख मेरा दुःख नहीं है, चित्त की चिंता मेरी चिंता नहीं है। संसार सपना है, उसको चलाने वाला चैतन्य परमात्मा अपना है। ૐ…..ૐ…..ૐ…..

इस कथा से भगवान की यह बात स्पष्ट समझ में आ सकती है की तामसी और राजसी धैर्यवाला तुच्छ चीजों के लिए धैर्य धारण करता है। ऐसे तो बगुला भी मछली के शिकार के लिए धैर्यवान दिखता है अथवा तो कोई प्रेमी, प्रेमिका को फँसाने के लिए धैर्यपूर्वक लगा रहता है, प्रेमिका प्रेमी को उल्लू बनाने के लिए लगी रहती है लेकिन ये सारे धैर्य तुच्छ हैं। जो अपने आत्मा-परमात्मा के स्वभाव को पाने के लिए धैर्यवान होकर लग जाता है, उसका धैर्य सात्त्विक है। वह सात्त्विक धैर्यवान व्यक्ति अपने जीवनदाता के सुख, शांति, माधुर्य और सामर्थ्य को पा लेता है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद मई 2013, पृष्ठ संख्या 23,24 अंक 245

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भावबल की शक्ति – पूज्य बापू जी


रामचन्द्र मुखर्जी की सुपुत्री शारदा देवी का बाल्यकाल में ही विवाह हो गया था। वह 5 वर्ष की थी और 23 साल के दुल्हा थे रामकृष्ण परमहंस। शारदा थोड़े दिन ससुराल रहकर फिर 17 साल मायके रही। लोग उसके पति के लिए कुछ-का-कुछ सुनाते थे कि ʹवे पागल हैं, कभी हँसते हैं, कभी रोते हैं, कभी क्या करते हैं !ʹ लोग नहीं समझते थे तो उनको पागल कहते थे लेकिन शारदा देवी मानती थी कि मेरे पति उच्चकोटि के संत हैं।

शारदा देवी 22 साल की हो गयी। जब गंगा स्नान के मौके पर लोग कलकत्ता जा रहे थे तो इस देवी ने कहाः “मैं भी अपने प्राणनाथ के, माँ के दर्शन करने दक्षिणेश्वर जाऊँगी।”

पैदल का जमाना था। शारदा को उन यात्रियों के साथ 60 मील की यात्रा में कीचड़-काँटेवाली जगह से पसार होना था। तेलो-भेलो जंगल बीच में था। वह जंगल इतना भयंकर और खूँखार डाकुओं से आतंकग्रस्त था कि कोई अकेले जाने की हिम्मत नहीं करता था। पूरे झुंड के झुंड लोग जाते और फिर भी लुटे जाते, बलात्कार होते, क्या-क्या होता ! बागदी डाकू खूँखार ऐसे की एक सेर अन्न या एक कपड़े के लिए किसी की गर्दन काट दें अथवा कोई स्त्री जँच गयी तो दिन-दहाड़े दुष्कर्म कर डालें।

शारदा लोगों के ताने सुन-सुनकर थोड़ी अस्वस्थ अवस्था में धीरे-धीरे चल रही थी, उसके पाँव में मोच भी आ गयी थी। साथ में जो लोग थे उन्होंने कहाः “ऐसे चलोगी तो रात को इस जंगल में हमारी जान जायेगी। यहाँ डाकू लोग शराब पीकर बड़ी बेरहमी से लूटते हैं।”

शारदा ने कहाः “मुझ अकेली के कारण आप सबका जान-माल कष्ट में न पड़े, आप लोग निकल जाओ।”

मरते क्या न करते, उसको छोड़कर वे लोग निकल गये। सूर्य ढल गया था। अँधेरे में दिखे भी क्या और थकी हुई ! जोरों की बारिश, आँधी आयी। पेड़ का सहारा लेकर बैठ गयी। इतने में खूँखार डकैत शिकार खोजते-खोजते पहुँच गये और चारों तरफ से घेर लिया। पूछाः “तुम्हारे साथ कोई नहीं है ?”

शारदा ने सब कुछ सच-सच बता दिया और पास में जो कुछ कपड़े पैसे थे, उनके सामने रख दिये। मुखिया ने पूछाः “तू कौन है और अकेली किधर जा रही है ?”

शारदा बोलीः “पिता जी ! क्या आपने मुझे पहचाना नहीं है ? मैं आपकी बेटी शारदा हूँ और आपके जमाई दक्षिणेश्वर के काली मंदिर में पुजारी हैं, उनके पास जा रही हूँ। और मैं अकेली कहाँ हूँ, मेरे पिता जी और ये मेरे भाई तो मेरे साथ हैं।”

मुखिया के चेहरे के भाव बदल गये। साथी डकैत भी पानी-पानी हो गये।

मुखिया बोलाः “हम लोग पापी हैं, तुम हमको पिता और भाई बोलती हो ?”

“नहीं, आप पापी नहीं हो, मेरी काली माँ की संतानें हो। गलती तो आपके मन में है पिता जी !”

भावविभोर होकर डकैतों का मुखिया बोलाः “बेटी ! आज की रात इस पापी पिता का घर पावन कर मेरी पुत्री !”

शारदाः “चलिये पिता जी !”

डकैतों की पत्नियाँ इकट्ठी हो गयीं और मुखिया की पत्नी ने शारदा को पलकों पर बिठा लिया। बोलीः “हम लोग छोटी जात के हैं। मैं गाँव की ब्राह्मणी को बुला लाती हूँ। तेरे लिए वे बनायेंगी भोजन।”

शारदाः “तुम मेरी माँ हो, तुम ही ब्राह्मणी हो। हम दोनों मिलकर भोजन बना लेती हैं।”

माँ पानी-पानी हो गयी। भोजन के बाद कुछ देर आराम करके शारदा बोलीः “पिताजी ! हमारे संग के लोग तारकेश्वर पहुँच गये होंगे और अब वे मेरी बाट देखते होंगे। आप कुछ भी करो, मुझे वहाँ पहुँचाओ।”

उन डकैतों ने डोली सजायी और उस सुंदर युवती को डोली में बिठाया। डाकू डोली उठाकर ले जा रहे हैं। ज्यों ही तारकेश्वर नजदीक आया त्यों ही उस डकैत पिता ने कहाः “बेटी ! अब हम उधर नहीं जा सकते हैं। हमको पकड़ने के लिए ब्रिटिश सरकार ने इनाम घोषित किया है।”

शारदाः “पिताजी ! आपने मेरी बहुत सेवा की है और मेरे इन भाइयों ने मुझे कंधे पर उठाया है। आज से डाकुओं के नाम में आप लोगों का नाम नहीं रहेगा। आपके जमाई काली माँ के भक्त हैं, आप भी गाँव में माँ काली की पूजा शुरु करो।”

शारदा सकुशल चली गयी और डकैतों ने तब से डाका डालना छोड़ दिया। वे खेती आदि करके जीवनयापन करने लगे। दुष्ट से दुष्ट व्यक्ति के अंदर भी अच्छाई छुपी है। आप अच्छाई को विकसित करो बस !

स्रोतः ऋषि प्रसाद, फरवरी 2013, पृष्ठ संख्या 29,30 अंक 242

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सत्संग के दो वचनों का कमाल – पूज्य बापू जी


जो अपने आपको विषय विकारों में, चिंताओं में, दुःखों में धकेलता है, वह अंधकूप में गिरता है और जो अपने आपको भगवत्प्रकाश में, भगवद्ज्ञान में, भगवत्शांति में, भगवन्माधुर्य में, भगवत्प्रेम में पहुँचाता है, वह वास्तव में मनुष्य जीवन का फल पाता है। मनुष्य जीवन में दो चीजें नितांत आवश्यक हैं – बुद्धि और श्रद्धा। बिना श्रद्धा के बुद्धि शुष्क, उद्दंड हो जायेगी, बम बनायेगी, लोगों का शोषण करके बड़ा बनने के रास्ते जायेगी।

बिंदुसार का पुत्र था सम्राट अशोक। उसको राज्य मिला तो राज्य का विस्तार, विस्तार, और विस्तार करते-करते उसने कलिंग देश, जिसको आज कालाहांडी (ओडिशा) बोलते हैं, उस पर चढ़ाई कर दी। लड़ाई करते-करते महीना-दो-महीना, एक वर्ष-दो वर्ष करते चार वर्ष बीत गये। दोनों पक्षों के लाखों-लाखों सैनिक मरे पर कोई नतीजा नहीं आ रहा था। अशोक चिंतित था, इतने में सेनापति दौड़ा-दौड़ा आया, बोलाः “महाराज की जय हो ! खुशखबर है, कलिंग देश का सम्राट युद्ध में मारा गया। अब हमारी जीत हुई है।”

जीत क्या हुई है, सदा के लिए हार हो गई। क्या यह खुशखबर है कि कोई मारा गया और हमें सम्पदा मिलेगी ! यह बुद्धिमानों का बुद्धिवाद है। जिनको जीवन का मूल्य पता नहीं वे वासनावान, अहंकारी इसे खुशखबरी मानते हैं। लोगों की हत्या करके, लोगों से कर (टैक्स) लेकर देश परदेश में खूब धन जमा करने का अवसर मिलेगा-यह खुशखबरी है ? दूसरों के बच्चे बिना दूध के, बिना आहार के, बिना पढ़ाई के बिना वस्त्रों के नंगे-भूखे घूम रहे हैं और आप बेईमानी करके, देश को शोषित करके देश-परदेश में पैसा जमा कर रहे हैं-यह बुद्धिमत्ता है ?

अन्धं तमः प्रविशन्ति…

(ईशावास्योपनिषद्-12)

उपनिषद कहती है वे अंधकार में फँस जाते हैं।

इस कथा के साथ सम्राट अशोक को सबके मंगल में लगाने वाली एक कन्या का इतिहास जुड़ा है। सेनापति बोलाः “परंतु चिंता की बात है कि अभी तक दुर्ग का द्वार खोलने में हम सफल नहीं हो पाये।”

अशोकः “कोई बात नहीं, कल सुबह हम स्वयं सेना की आगेवानी करेंगे और दुर्ग का द्वार खुलवा देंगे।”

सुबह अशोक और उसकी सेना दुर्ग के द्वार के पास पहुँची। सम्राट ने अपनी सेना को सम्बोधित कियाः “मगध के बहादुरो ! तुम्हारे अथक प्रयास से कलिंग देश का राजा मारा गया है। अब दुर्ग का द्वार खोलना है। आज मेरी आगेवानी में दुर्ग का द्वार खोला जायेगा।

अन्धं तमः प्रविशन्ति…

बाहर की सम्पदावाले का द्वार खोलना यह अंधकूप में गिरना है किंतु अपने हृदय का द्वार खोलकर हृदयेश्वर का ज्ञान पाना यह प्रकाशपुंज प्रकटाना है। जीवन में ज्ञान का, सजगता का, विवेक का प्रकाश हो और श्रद्धा हो। बिना विवेक की श्रद्धावाले को कोई भी फँसा देता है। ऐसे श्रद्धालुओं का शोषण होता रहता है। यह विवेक तुम्हें जगाता है। विवेक के बिना श्रद्धा अंधी होती है, कहीं-न-कहीं अनुचित स्थान पर फँसी रहती है और श्रद्धा के बिना विवेक उद्दंड होता है। मनमाना सफलता का मापदंड लेकर चल पड़ता है। उसी रास्ते था अशोक।

दुर्ग का द्वार खोलने के लिए सैनिकों को उत्साहित किया, रणभेरी, विजय का बिगुल बजवाया। अपने बल से द्वार खोलें उसके पहले अचानक द्वार खुल गया। अंदर से पद्मा नाम की राजकन्या घोड़े पर सवार होकर अपनी कई महिला सैनिकों के साथ गर्जना करती हुई निकली।

पद्मा बोलीः “सम्राट अशोक ! दुर्ग में प्रवेश करने का दुस्साहस न करो। जब तक हमारे शरीर में प्राण हैं, तब तक तुम दुर्ग में प्रवेश नहीं कर सकते। मेरे  पिता के हत्यारे ! अपने लाखों-लाखों सैनिकों को कुर्बान करके अहं पोसने वाले और हमारे लाखों सैनिकों की जान लेकर अपनी वासना की तृप्ति में लगे हुए अंधकूप में जाने वाले सम्राट ! सावधान !!”

धन कमा के, सत्ता कमा के, चीजें कमा के बड़ा बनने की जो अंध-परम्परा है, उसको कलिंग देश की एक कन्या ने ललकार दिया । सत्संगी कन्या ने कहाः “तुम्हारे पिता बिंदुसार का राज्य भी तुम नहीं ले जाओगे तो दूसरों का राज्य छीनकर क्या करोगे ? कई राजाओं को तुमने मौत के घाट उतारा। लाखों आदमी मारे गये। कितने सैनिकों के मासूम बच्चे रोते होंगे, कितने सैनिकों की माताएँ रोती होंगी, कितने सैनिकों की पत्नियाँ रोती होंगी…. तुमने कइयों को अनाथ बना दिया। यह राज्यसत्ता है कि अंधसत्ता है ? राजा तो प्रजा का पालक, मानवता का पालक होना चाहिए। राजा ही मानवता का विनाशी हो गया !”

अभी 700 करोड़ लोग हैं। हम मर-मर के सात बार मरें इतने बम तो तैयार है लेकिन फिर भी रात-दिन बम बनाये जा रहे हैं। दूसरों को मारकर, लूट-खसोटकर बड़ा बनना यह अंधकूप में गिरना है।

सासु ! बहू को तुम मत दबोचो। बहू ! तुम सासु को मत नीचा दिखाओ। जेठानी, देवरानी की निंदा करके अंधकूप में मत गिरो बेटी ! देवरानी ! जेठानी में दोष देखकर अंधकूप में मत गिरो। पड़ोसी-पड़ोसी एक दूसरे को नीचा दिखाकर अपना मन, जीवन अंधकूप में मत गिराओ। नित्य प्रकाश में रहो। वेद कहता है।

असतो मा सदगमय।

हम असत्य से बचकर सत्य की तरफ जायें। तो सत् क्या है, असत् क्या है-यह अंधकार में नहीं दिखेगा। इसीलिए वेद भगवान की प्रार्थना हैः तमसो मा ज्योतिर्गमय।

अंधकार से निकलकर हम प्रकाश में जियें।

“सम्राट ! तुम अंधकूप में स्वयं परेशान हो और अपनी प्रजा को भी परेशान कर रहे हो। प्रजा से कर नोचकर लोगों को मरवा रहे हो। तुम्हें शांति नहीं है। तुम अपने दिल पर हाथ रखो, क्या तुम्हारे जीवन में बरकत है ? है प्रसन्नता ? है शांति ? नाच-गान, ऐश आराम और मारकाट, लूट-खसोट, अधिकार-लोलुपता के अलावा तुम्हारी जिंदगी में कोई और चीज है ? तुम्हें द्वार में प्रवेश करने के पहले हमसे युद्ध करना होगा। तुमने मेरे पिता की हत्या की है, हमारे देशवासियों की हत्या की है। मैं तुमको नहीं छोड़ूँगी ! जब तक मैं जिंदा हूँ, तुम इस द्वार के अंदर नहीं जा सकते।”

अशोक बोलाः “तुम तो स्त्री जाति हो, स्त्री के ऊपर हथियार उठाना अधर्म है।”

“आज तक तुमने क्या धर्म किया है ? निर्दोष प्रजा को अपना अहं पोसने के लिए मरवाया। तुम क्या ले जाओगे साथ में ? राज्य में संतोष नहीं है। इनको मारा, उनको मारा…. अपनी लोभ-वासना को तो मारा नहीं, अपने अहंकार को, अपनी पाप की इच्छा को तो मारा नहीं, दूसरों को मारकर तुमने क्या किया ? तुम धर्म की बात करते हो ? तुमने क्या धर्म किया है ?”

सम्राट अशोक निरूत्तर हो गया। पद्मा का सारगर्भित सत्संग सुनकर अशोक ने सोचा कि “आज से मैं यह हिंसा का रास्ता, शोषण का रास्ता, अहं पोसने का रास्ता, विषय विकारों का रास्ता त्यागता हूँ और सत्संग की शरण जाऊँगा।”

अशोक ने हाथ में पकड़ी हुई तलवार फैंक दी और सिर नीचे करते हुए कहता हैः “कलिंगनरेश की कन्या ! मैं तुम्हारे पिता का हत्यारा हूँ और तुम्हारे कलिंग देश के लाखों लोगों का हत्यारा हूँ। मैं गुनहगार हूँ। यह सिर झुकाकर रखता हूँ तुम्हारे सामने, तुम अपनी चमचमाती तलवार से बदला ले सकती हो।”

तब भारत की कन्या कहती हैः “सम्राट ! निहत्थे पर वार करना हमारे धर्म में नहीं है। आप तलवार उठाइये और युद्ध करिये।”

अशोकः “नहीं, अब युद्ध नहीं होगा। तुमने मेरी आँखें खोल दीं। यह वासना है, अहंकार है कि मेरा राज्य और….. और बढ़े।”

पद्माः “तो हमने तुमको हृदयपूर्वक माफ किया, तुम्हारा मंगल हो।”

क्या एक प्रकाश में जीने वाली कन्या, सत्संग मे जीने वाली कन्या अशोक का हृदय बदलने में सफल नहीं हुई ?

अशोकः “अभी भी मुझे अशांति है। मुझे शांति कैसे मिली ?”

पद्माः “सम्राट ! युद्ध करने से, सत्ता बढ़ाने से शांति नहीं मिलती। निरपराध लोगों की हत्या करके अहं पोसने से भी कदापि शांति नहीं मिलती।”

“ठीक कहती हो राजकन्या !”

“अब अपने आत्मा की अशांति को, भीतर की लानत को मिटाना हो तो जाओ, जो सैनिक कराह रहे हैं उन्हें देखो।”

उधर रणभूमि में गये तो क्या देखते हैं कि हजारों-हजारों लाखें पड़ी हैं। हजारों-हजारों अधमरे होकर कराह-कराह रहे हैं…. किसी की भुजा कटी है तो किसी का पैर कटा है तो किसी को पेट में बाण लगे हैं। किसी की आँखें गयी हैं तो किसी का कुछ…. उस दृश्य को निहारता है अशोक। हृदय पानी-पानी हो गया कि ʹहे अज्ञान ! हे नासमझी !! तुझे धिक्कार है ! कितने लोगों की जानें, कितने लोगों का धन लेकर तू बड़ा बनना चाहता है !ʹ

साधु लोग घायलों की मरहमपट्टी कर रहे हैं, किसी को पानी पिला रहे हैं। ʹओ….हो ! मेरे एक अज्ञान के कारण कि मैं सम्राट अशोक हूँ और बड़ा बनूँ…… बड़ा बनने वाला शरीर तो मर जायेगा और मैंने इतने लोगों की जानें लीं ! ओ बाप रे ! मुझे शांति कौन देगा ?ʹ

अशोकः “हे साधु ! मेरे कर्मों ने मुझे अशांत किया है, मुझे शांति कैसे मिलेगी ?”

जो साधु-संत सेवा कर रहे ते वे बोलेः “अरे, शांति मिलेगी। निर्णय करो कि दूसरों को सताकर मैं सुखी होने की गलती  नहीं करूँगा।

अपने दुःख में रोने वाले….

काम आना सीख ले।।

किसी की जान लेना मत सीखो, किसी के काम आना सीखो। जो दूसरों के दुःख नहीं हरता, उसका दुःख मिटता नहीं और जो दूसरों को दुःखी करके सुखी होता है, उसका दुःख बढ़ जाता है। तुम्हारी वही दशा है।”

अशोकः “तो मैं क्या करूँ ?”

“सत्यं शरणं गच्छामि। आत्मा सत्य है, परमात्मा सत्य है, उसकी शरण आओ। शरीर मिथ्या है, अहंकार मिथ्या है, वासना मिथ्या है। बच्चे की बचपन की वासना अलग होती है। युवक को जवानी की वासना अलग होती है और अलग-अलग युवकों की अलग-अलग वासना होती है। वासना सत्य नहीं है। वासना के पहले जो वासना को जानता है, वासना पूर्ति के बाद जो वासना की पोल जानता है वह परमात्मा सत्य है। तुम परमात्मा की शरण क्यों नहीं जाते हो ? तुमसे वह दूर नहीं, दुर्लभ नहीं है, परे नहीं है, पराया नहीं है। दूर देशों पर हावी होकर, कत्लेआम करवाकर मैं बड़ा राजा हूँ…. लंकापति रावण की लंका नहीं बची तो सम्राट अशोक तुम्हारा यह नगर बचेगा क्या ? तुम्हारा शरीर बचेगा क्या ?”

“नहीं, अब मैं क्या करूँ ?”

“क्या करूँ ? अब सत्य की शरण चलो। किसी को दुःख न दो। किसी को बुरा न मानो, किसी का बुरा न चाहो, किसी का बुरा कर करो, सबकी भलाई सोचो। सम्राट अशोक ! तुम ऐतिहासिक पुरुष हो जाओगे।”

“जो आज्ञा महाराज !”

दूसरों को सताकर बड़ा बनने वाला अशोक पहले अहंकार की शरण था, सत्संग के दो वचन सुनकर कि ʹदूसरों में भी अपना आत्मा-परमात्मा हैʹ, सत्य की शरण गया। सम्राट अशोक ने प्रण कर लिया कि ʹअब मैं हथियार नहीं उठाऊँगा।ʹ फिर राज्य तो किया पर हथियार नहीं उठाया। आज भी सम्राट अशोक का अशोकचिह्न भारत सरकार के रूपयों पर है।

सत्संग ने क्या कमाल कर दिया ! कितना हत्यारा व्यक्ति और पद्मा के मुँह से सत्संग के दो वचन मिले, साधु के मुँह से सत्संग के दो वचन मिले तो लाखों लोगों की जान लेने वाला मानवीय संवेदनाविहीन अशोक लाखों के आँसू पोंछने वाला सम्राट अशोक हो गया, क्रूर सम्राट में से सज्जन सम्राट हो गया।

स्रोतः ऋषि प्रसाद नवम्बर 2012, पृष्ठ संख्या 7,8,9,10 अंक 239

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