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Prerak Prasang

भगवदीय अपराध की सजा


(पूज्य बापूजी की शिक्षाप्रद अमृतवाणी)

जब तक भगवान में प्रीति नहीं होती, तब तक भगवदरस का आस्वादन नहीं होता और व विकार पीछा नहीं छोड़ते।

अकबर की बहुत सारी बेगमें थीं। उनमें हिन्दुआनी बेगमें भी थीं। उनमें एक का नाम था जोधाबाई। एक दिन सुबह-सुबह यमुना जी में स्नान करने गयी तो वहाँ देखा कि एक बच्ची बेचारी पानी में डूब की रही है। उसे उठाने का उसका मन हुआ। उसने बच्ची को उठा लिया और अपने साथ ले आयी तथा उसका अपनी जाई की नाई पालन-पोषण करने लगी।

लड़की जब 11,12 साल की हुई तो एक दिन वह संदूक खोलकर कपड़े निकाल रही थी। जोधाबाई छुपकर देख  रही थी कि यह क्या करती है ? उसने एक साड़ी निकाली और पहन ली। जो दुल्हन का श्रृंगार होता है, उसने वह सारा किया और चुपके-से छत पर खड़ी हो गयी।

जब ग्वाले गाय चराकर लौटते हैं, वह समय था। एक दिन-दो दिन…. जोधाबाई ने जब देखा कि यह रोज सज-धजकर ऊपर खड़ी हो जाती है तो एक दिन उसने कन्या से पूछाः “बेटी ! तू यह क्या करती है ?”

पहले तो वह शरमा गयी, बताने से कतराने लगी। फिर जोधाबाई ने जब आग्रह किया तब उसने कहाः “मेरा पति गाय चराकर लौटता है।”

जोधाबाईः “कौन है तेरा पति ?”

“वह बंसीधर, घुँघराले बालों वाला यशोदा का लाल।”

जोधाबाई को लगा कि ʹयह पिछले जन्म में कोई भक्तानी रही होगी, जो भगवान को पतिरूप में मानती होगी। किसी कारण साधना में रूकावट आयी होगी और मर गयी होगी।ʹ

अकबर ने उसका रूप-सौंदर्य देख उस अपनी धर्म की कन्या के साथ विवाह करने का अथवा ज्यों ही उसे उसके साथ विवाह करने का अथवा ऐसे ही उसके साथ विकारी भोग भोगने का विचार आया, त्यों ही उसके शरीर में जलन पैदा हो गयी। ऐसी जलन, ऐसी अशांति की कई हकीमों के उपचार करने पर भी उसे आराम नहीं हुआ।

आखिर बीरबल से पूछाः “बीरबल ! क्या बात है कि मेरा रोग मिटता ही नहीं ?”

बीरबल तो जानता था उसकी आदत। उसे पता था कि धर्म की कन्या के प्रति बुरा विचार किया है।

बीरबल ने कहाः “आप संत सूरदासजी महाराज की शरण लो। वे आयें और उनके हृदय में जब भगवान के प्रति प्रार्थना अथवा संकल्प उठेगा तभी यह ठीक हो सकता है।”

यह भगवदीय अपराध है, भगवान की भक्तानी के प्रति…। उसको बोला नहीं लेकिन बीरबल ने गणित लगाया कि यह भगवदीय अपराध है तो भगवद्-जन ही उस भगवदीय अपराध की क्षणा दिला सकते हैं। बड़ी अनुनय विनय करके अकबर ने सूरदास जी को बुलाया और उनके हृदय में उसके प्रति सदभाव अथवा दया उपजे ऐसा व्यवहार किया तो सूरदास जी ने कृपा करके उसे रोग से, अशांति से बचा लिया।

सुख के लिए आदमी न करने जैसा काम भी करता है, फिर भी सुख टिकता नहीं है क्योंकि वह दुःखालय संसार से सुख लेता है। हम सुख को थामने के लिए और दुःख को भगाने के लिए दिन-रात लगे रहते हैं फिर भी वह सुख थमता नहीं, दुःख भागता नही। दुःखी आदमी का दुःख तब तक जीवित रहता है जब तक उसकी संसार से सुख लेने की भूल जीवित है।

अब आपको क्या करना है ? अकबर जैसा राजवैभव मिल जाये फिर भी विकारी सुख भोगने की गंदी आदत जीव की जाती नहीं। इसलिए अपनी पत्नी हो तो भी विषय-विकारों से बचें। भगवत्सुमिरन, भगवदध्यान, भगवदविश्रान्ति में पूर्णता पानी चाहिए। भगवत्सुख कई वर्षों के बाद मिलेगा ऐसा नहीं है। ऐसा सोचो कि ʹभगवान अभी मेरे हैं, चैतन्य हैं, सुखस्वरूप हैं। वे सच्चिदानन्द हैं। मुझसे दूर नहीं है।ʹ

भगवान को कई लोगों ने कठिन कर दिया कि ʹवे वैकुण्ठ में है। इतने साल जप करेंगे, इतनी तपस्या करेंगे तब वे मिलेंगे।ʹ वास्तव में अकुंठित हृदय ही वैकुंठ है, विश्वेश्वर की प्रीतिवाला हृदय ही वैकुंठ है।

अरे, अभी नहीं हैं बाद में मिलेंगे तो चले भी जायेंगे। वे अभी मौजूद हैं। ʹअभी सत्स्वरूप हैं, चेतनस्वरूप हैं, आनंदस्वरूप हैं और अभी मेरे आत्मा हैंʹ – इसका अनुभव करने के लिए थोड़ी भूख जगायें, बस। ʹमुझे अपने आत्मा-परमात्मा का अनुभव करना है….ʹ आपमें यह भूख जग गयी तो भगवान आपके अंदर से आऩंदस्वरूप में प्रकटेंगे। सत्स्वभाव में, ज्ञानस्वभाव में आपके हैं, ऐसा महसूस करायेंगे।

यह बात दिमाग से बिलकुल निकाल दो कि हम इतनी तपस्या करेंगे फिर भगवान मिलेंगे। नहीं, भगवान बिछुड़ ही नहीं सकते। भगवान की आकृति आती है – जाती है लेकिन उनका जो चिदघन अस्तित्व है, वह सर्वत्र व्यापक है। हवा के कारण पानी में तरंगे आयीं, बुलबुले आये, झाग आया और ये सब मिट भी गये, बाकी पानी तो अभी भी है सरोवर में। ऐसे ही चिंतन करें कि ʹसत्-चित्-आनंदस्वरूप परमात्मा अभी हैं। वे मेरे को छोड़ नहीं सकते, मैं उनको नहीं छोड़ सकता। परमात्मा मुझे अपने से अलग नहीं कर सकते। मैं उनका हूँ, वे मेरे हैं। ૐ….. ૐ…. ૐ…..

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मई 2012, अंक 233, पृष्ठ संख्या 16,17

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ऐसी निष्ठा कि मंत्र हुआ साकार


सन् 1501 में विजय नगर राज्य के बाड़ ग्राम(वर्तमान में कर्नाटक के हवेरी जिले का एक गाँव) में जागीरदार वीरप्पा व उनकी पत्नी बच्चम्मा के यहाँ एक बालक का जन्म हुआ। उसका नाम रखा गया कनक। इनकी जाति कुरुब (भेड़-बकरी चराने वाले) थी। बचपन में ही इनके पिता का स्वर्गवास हो गया। बड़े होने पर पिता की जागीरदार इन्होंने सँभाल ली। एक बार भूमि शोधन करते समय कनक को भूमिगत अपार धनराशि मिली। उसके बाद इनका नाम कनकनायक पड़ा। इन्होंने उस धन से कागीनेले गाँव में भगवान केशव का भव्य देवालय बनवाया।

एक रात स्वप्न में कनकनायक को भगवान ने कहाः “कनका ! तू मेरी शरण में आ जा !”

स्वप्न में ही वे बोलेः “शरण ? भीख माँग कर जीने के लिए मैं क्यों दास बनूँ ? मैं तो राजा बनना चाहता हूँ।”

कुछ समय बाद उनकी पत्न और माँ की मृत्यु हो गयी। एक दिन पुनः भगवान स्वप्न में आकर बोलेः “कनका ! मेरी बात भूल गया ?”

“जागीरदारी छोड़कर भिक्षा माँगकर क्यों खाऊँ ?”

“जागीरदारी गयी तो ?”

“बकरी चराऊँगा।”

“बकरी चराने को तैयार है, मेरा बनने को नहीं ?”

“अઽઽઽ…..ʹ कनक की नींद टूट गयी। सोचा, ʹयह क्या मुसीबत है ! भगवान क्यों मेरे पीछे पड़े हैं ! पिता मर गये, पत्नी मर गयी, माँ मर गयी, अब हरि का दास बनकर भीख माँगना बाकी रहा क्या !”

कुछ समय बाद उस क्षेत्र में घमासान युद्ध हुआ। उसमें कनक का पूरा शरीर बाणों से छलनी हो गया। ऐसी विषम परिस्थिति में उऩ्हें अब एक ही सहारा जान पड़ा। वे ʹकेशव…. केशव….ʹ पुकारते हुए बेहोश हो गये। शत्रु उन्हें मरा हुआ समझ छोड़ के चले गये।

भगवान मनुष्यरूप में आये और कनक को जगाया। कनक ने पूछाः “आप कौन हैं ?”

भगवान बोलेः “क्या कनका ! इतनी जल्दी मुझे भूल गया ? इस तरह युद्ध करके लाशों के बीच गिरने में सुख है या मेरा बनने में सुख है, बताओ ?”

“अभी मेरे पूरे शरीर में बहुत दर्द हो रहा है, ठीक होने पर आपको बता दूँगा।”

“मैं अभी ठीक कर देता हूँ।”

भगवान का स्पर्श होते ही कनक का सारा दर्द दूर होकर शरीर पुलकित हो गया। वे बोलेः “प्रभु ! आप इतनी परीक्षा क्यों ले रहे हैं  ? मैं आपका बना तो जैसा बोलूँगा वैसा आप करोगे ?”

“हाँ करूँगा।”

“तो ठीक है, मैं जब भी स्मरण करूँ आप दर्शन देना और अभी अपना असली रूप दिखाइये।”

भगवान ने अपना मनोहर चतुर्भुज रूप का दर्शन कराया, जिसे देखकर कनक की भाव समाधि लग गयी और वे वहीं मौन, शांत अवस्था में बैठे रहे। अब तन तो वही था किंतु मन परिवर्तित हो गया, जीवन ने करवट ली। कनक नामक शरीर में स्थित वैराग्यरूपी असली कनक अपनी पूर्ण कांति के साथ देदीप्यमान हो रहा था। जब उन्होंने होश सँभाला तो घर आये और अपना सारा काम काज दूसरों को सौंप दिया। ʹकेशव.. केशव…..ʹ की पुकार गाँव की गलियों में गूँज उठी औऱ थोड़े समय में लोगों ने देखा कि भगवान केशव के मंदिर में कनक अपने आँसुओं से प्रभु का चरणाभिषेक कर रहे हैं।

कनक के कल्याण का जिम्मा अब उनके प्रभु ने उठा लिया था। जब भगवान अपने भक्त का परम कल्याण करना चाहते हैं तो सदगुरुरूप में उसके जीवन में प्रवेश करते हैं, साथ ही भक्त को अपना पता भी बता देते हैं।

मध्यरात्रि हुई। कनक ने स्वप्न देखा। भगवान स्नेहभरी दृष्टि से उनकी ओर देखते हुए कह रहे थेः “कनका ! तू मुझे हमेशा अपने पास देखना चाहता है न ! तो मैं तुम्हारे जीवन में ब्रह्मज्ञान सदगुरु के रूप में प्रवेश करूँगा। अब तू देर न कर, श्रीव्यासराय जी से दीक्षा ले ले। जब गुरु उपदेश से तू मुझे तत्त्वरूप से जान लेगा तो मैं तुझसे बिछुड़ ही नहीं सकता। फिर तू अत्यन्त प्यारा हो जायेगा।”

कनक गुरु व्यासराय जी को ढूँढने के लिए निकल पड़े। उस समय व्यासराय जी मदनपल्ली प्रांत (आन्ध्र प्रदेश) में एक बड़ा तालाब बनवा रहे थे। तालाब के सामन स्थित बड़े पत्थरों को कैसे हटायें, ऐसा सोच रहे थे कि इतने में कनक वहाँ पहुँच गये और उन्हें प्रणाम किया।

व्यासराय जी ने पूछाः “तुम कौन हो ?”

“जी कनक, बकरी चराने वाला।”

“क्यों आये हो ?”

“गुरुदेव ! आपसे मंत्र-उपदेश लेने आया हूँ।”

“बकरी चराने वाले को क्या मंत्र देना ? ʹभैंसाʹ मंत्र !”

मरुभूमि में प्यास के मारे भटकते पथिक को जल का स्रोत मिल गया। सूखते तालाब में छटपटाती मछली को महासागर मिल गया। कनक का मन मयूर झूम उठाः ʹमिल गया गुरुमंत्र !ʹ उन्होंने बड़े प्रेमभाव से गुरु जी को प्रणाम किया और आज्ञा लेकर निर्जन स्थान में एक पेड़ के नीचे बैठ के ʹभैंसा-भैंसाʹ जपने लगे। उनकी गुरु निष्ठा और निर्दोष, सात्त्विक श्रद्धा से भगवान यमराज का वाहन भैंसा सामने प्रकट होकर गम्भीर आवाज में बोलाः “क्या चाहिए ?”

कनक ने उसे ले जाकर व्यासराय जी के सामने खड़ा कर दिया। निवेदन कियाः “गुरुदेव ! आपका मंत्र प्रकट रूप धारण कर चुका है। इसका क्या करूँ ?”

व्यासराय जीः साधो ! साधो !! निष्ठा इसी का नाम है। तुममे शिष्य बनने के लक्षण हैं। अब इस विशालकाय भैंसे से तालाब के सामने में जो बड़े बड़े पत्थर हैं, उनको हटवा दो !”

कनक ने गुरु आज्ञा शिरोधार्य कर उस भैंसे से कार्य पूर्ण कराया। कनक की निष्ठा देखकर व्यासरायजी का हृदय छलक उठा और उन्हें विधिवत् मंत्रदीक्षा दे के अपना शिष्य स्वीकार कर लिया। उस दिन से कनक का नाम कनकदास। कनकदासजी कर्नाटक के सुविख्यात संतों में से एक हैं। इनके कीर्तन कर्नाटक में अत्यन्त लोकप्रिय हैं। ये कीर्तन हरिभक्ति से ओतप्रोत होने के साथ ही इनमें आध्यात्मिक गहराई भी झलकती है। आप  लिखते हैं-

साधु संग कोट्टु, निन्न पादभजनेयित्तु।

एन्न भेदमाडि नोडदिरू, अधोक्षज।।

ʹहे अधोक्षज (विष्णु जी) ! साधु का संग और अपने चरणों का स्मरण देना। आप मुझे भेदबुद्धि से मत देखना (मुझे नजरअंदाज न करना)।ʹ

ज्ञान भक्ति कोट्टु, निन्न ध्यानदिल्ल इट्टु।

सदा हीन बुद्धी बिडिसु मुन्न, जनार्दन।।

ʹहे जनार्दन ! मुझे ज्ञान, भक्ति दीजिये। मुझे आपके ध्यान में तल्लीन रखिये। हमेशा के लिए मेरी हीन बुद्धि दूर कीजिये।ʹ

पुट्टिसलु बेड मुन्दे पुट्टिसिदके पालिसिन्नु।

इष्टु मात्र बेडिकोम्बे, श्री कृष्णने।।

ʹहे श्रीकृष्ण ! अब आगे जन्म नहीं देना। मुझे पैदा किया है तो मेरा पालन कीजिये, केवल इतनी ही प्रार्थना करता हूँ।ʹ

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जून 2012, अंक 234, पृष्ठ संख्या 14,15

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हरि ब्यापक सर्वत्र समानाः…..


(पूज्य बापू जी की ज्ञानमयी अमृतवाणी)

गुजरात में नारायण प्रसाद नाम के एक वकील रहते थे। वकील होने के बावजूद भी उन्हें भगवान की भक्ति अच्छी लगती थी। नदी में स्नान करके गायत्री मंत्र का जप करते, फिर कोर्ट कचहरी का काम करते। कोर्ट-कचहरी में जाकर खड़े हो जाते तो कैसा भी केस हो, निर्दोष व्यक्ति को तो हँसते-हँसते छुड़ा देते थे, उनकी बुद्धि ऐसी विलक्षण थी।

एक बार एक आदमी को किसी ने झूठे आरोप में फँसा दिया था। निचली कोर्ट ने उसको मृत्युदंड की सजा सुना दी। अब वह केस नारायण प्रसाद के पास आया।

ये भाई तो नदी पर स्नान करने गये और स्नान कर वहीं गायत्री मंत्र का जप करने बैठ गये। जप करते-करते ध्यानस्थ हो गये। ध्यान से उठे तो ऐसा लगा कि शाम के पाँच बज गये। ध्यान से उठे तो सोचा कि ʹआज तो महत्त्वपूर्ण केस था। मृत्युदंड मिल हुए अपराधी का आज आखिरी फैसले का दिन था। पैरवी करके आखिरी फैसला करना था। यह क्या हो गया !ʹ

जल्दी-जल्दी घर पहुँचे। देखा तो उनके मुवक्किल के परिवार वाले भी बधाई दे रहे हैं, दूसरे वकील भी बधाई देने आये हैं। उनका अपना सहायक वकील और मुंशी सब धन्यवाद देने आये हैं। बोलने लगेः “नारायण प्रसाद जी ! आपने तो गजब कर दिया ! उस मृत्युदंड वाले को आपने हँसते-खेलते ऐसे छुड़ा दिया कि हम कल्पना भी नहीं कर सकते थे। हम आपको बधाई देते हैं।

नारायण प्रसाद ने गम्भीरता से उनका धन्यवाद स्वीकार कर लिया। उनको तो पता था ʹमैं कोर्ट में गया ही नहीं हूँ।ʹ

संध्या करके जो कुछ जलपान करना था किया, थोड़ा टहलकर फिर शय़नखंड में गये। सोचते रहे कि ʹभगवान ने मेरा रूप कैसे बना लिया होगा ?ʹ इसके विषय में सूक्ष्म चिंतन किया। विचार करते-करते नारायण प्रसाद को हुआ कि ʹमुझे आज केस के लिए कोर्ट में जाना था, मुझे पता था और मुझे पता रहे उसके पहले मेरे अंतर्यामी जानते थे। मन में जो भाव आते हैं, उन सारे भावों को समझने वाले भावग्रही जनार्दनः हैं। जहाँ से भाव उठता है वहाँ तो वे ठाकुरजी बैठे हैं।

ʹथोड़ा ध्यान करके जाऊँगाʹ, यह मेरा संकल्प मेरे अंतर्यामी ने जान लिया। वह मेरा अंतरात्मा ही नाराय़ण प्रसाद वकील बन के, केस जिताकर मुझे यश देता है। यह प्रभु की क्या लीला है ! यह सब क्या व्यवस्था है !ʹ – यह विचार करते-करते सो गये।

थोड़ी नींद ली, इतने में उनके कानों में ʹनारायण….. नारायण…. नारायण…. ʹ की आवाज सुनायी दी और वे अचानक उठकर बैठ गये। उन्हें लगा कि ʹयह आवाज तो मेरे घर के प्रवेशद्वार से अंदर आ रही है।ʹ कौन होंगे ?

दरवाजा खोला तो देखा कि एक लँगोटधारी महापुरुष खड़े हैं। वे आदेश के स्वर में बोलेः “अरे नारायण ! कब तक सोता रहेगा, खड़ा हो जा।” वे उन महापुरुष के नजदीक आकर खड़े हो गये। वे घर से बाहर निकले। नारायण प्रसाद उनके पीछे-पीछे चलने लगे। कुछ दूर जाने पर बोलेः “अरे, जेब में क्या रखा है ? लोहे का टुकड़ा जेब में रखा है क्या ?”

देखा कि जेब में तिजोरी की चाबियाँ हैं। उन्होंने चाबियाँ वहीं रास्ते में फेंक दीं। आगे बाबा, और पीछे नारायण प्रसाद। जाते-जाते एकांत में नारायण प्रसाद को बाबाजी ने ज्ञान दिया कि ʹवे परमात्मा विभु-व्याप्त हैं। वे यदि अंतरात्मा रूप में नहीं मिले तो बाहर नहीं मिलते हैं। यह उन्हीं आत्मदेव की लीला है। वे ही आत्मदेव तुम्हारा रूप बनाकर केस जीतकर आये हैं। उन परमेश्वर को पा लो, बाकी सब झंझट है।ʹ

लँगोटधारी बाबा थे नित्यानंद महाराज। एक तो वज्रेश्वरी के मुक्तानंद जी के गुरु नित्यानंद जी हो गये, ये दूसरे थे। इंदौर से करीब 70 किलोमीटर दूर धार में इनका आश्रम है, मैं देखकर आया हूँ।

नित्यानंद जी बड़े बाप जी के नाम से प्रसिद्ध थे। नित्यानंद बाबा नारायण प्रसाद को इतना स्नेह करने लगे कि लोग नारायण प्रसाद को छोटे बाप जी बोलने लगे।

छोटे बापजी मानते थे कि ʹवास्तव में तत्त्वरूप से गुरु का आत्मा नित्य, व्यापक, विभु, चैतन्य है और मैं भी वही हूँ।ʹ बड़े बाप जी भी मानते थे कि ʹनारायण प्रसाद का शरीर और मेरा शरीर भिन्न दिखता है लेकिन चिदानंद आकाश दोनों में एकस्वरूप है।ʹ

एक बार उत्तराखंड से कुछ संत नित्यानंद महाराज के दर्शन-सत्संग के लिए धार शहर में स्थित आश्रम में आये थे। नारायण प्रसाद आश्रम की सारी व्यवस्था सँभालते थे। उन्हें लगा कि बड़े बाप जी सबसे ज्यादा महत्त्व नारायण प्रसाद को देते हैं। विदाई के समय नित्यानंद बाबा ने कहाः “चलो, संत लोग आज विदाई ले रहे हैं तो हम आपके साथ बैठकर फोटो निकलवायेंगे।” आग्रह किया तो सब संत राजी हो गये।

फोटोग्राफर ने फोटो लिये। जब फोटो खींचे गये उसमें नारायण प्रसाद को शामिल नहीं किया। लेकिन जब फोटो को प्रिंट किया तो नारायण प्रसाद का फोटो बाबा के हृदय में दिखायी दे रहा था ! फोटोग्राफर दंग रह गया कि ʹयह कैसे ! किसी के हृदय में किसी का फोटो आ जाये !”

बोलेः “बाबा ! यह क्या है ?”

बड़े बाप जी बोलेः “मैं क्या करूँ ? इसको कितना दूर रखूँ, यह तो मेरे हृदय में समा के बैठ गया है।” तो मन में जिसकी तीव्र भावना होती है, वह हृदय में भी दिखायी देता है। नारायण प्रसाद की तीव्र प्रीति, भावना थी तो फोटो में बाबा जी के हृदय में नारायण प्रसाद आ गये।

हमारे कई साधकों के हृदय में ૐकार मंत्र की, हरि ૐ मंत्र की महत्ता है तो बैंगन काटते हैं तो ૐकार दिखता है, रोटी बनाते हैं तो उस पर ૐकार उभरता है। आपकी भगवान के प्रति जैसी तीव्र भावना होती है वैसा उसका सीधा असर पड़ता है और दिखायी भी देता है।

नित्यानंद बाबा नारायण प्रसाद से बोलते थे कि ʹनारायण भी तत्त्वरूप से आत्मदेव हैंʹ तो उनहे हृदय में आकृतिवाले नारायण प्रसाद दिखायी दिये।

बाबा के जीवन में बहुत सारी आध्यात्मिक चमत्कारिक घटनाएँ घटीं लेकिन बड़े-में-बड़ा चमत्कार यह है कि बाबा इन सब चमत्कारों को ऐहिक मानते थे और सारे चमत्कार जिस सत्ता से होते हैं, उस आत्मा-परमात्मा को ʹमैंʹ रूप में जानते थे।

तो ध्यान-भजन करने से आपका पेशा बिगड़ता नहीं बल्कि आपकी बुद्धि में भगवान की विलक्षण लक्षण वाली शक्ति आती है। आप लोग भी इन महापुरुषों की जीवनलीलाओं से, घटनाओँ से अपने जीवन में यह दृढ़ करो कि-

हरि व्यापक सर्वत्र समाना।

प्रेम में प्रगट होहिं मैं जाना।।

(श्रीरामचरित. बा.कां. 184.3)

भगवान व्यापक हैं उनके लिए जिनके हृदय में प्रीति होती है, उनके हृदय में वे प्रकट होते हैं।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मई 2012, अंक 233, पृष्ठ संख्या 12,13

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