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Tatva Gyan

पाओ अपने आपको…..


पूज्यपाद संतश्री आसारामजी बापू

सूर्य का स्वभाव है प्रकाश देना, चन्द्र का स्वभाव है शीतलता देना, माँ का स्वभाव है बच्चों को पोसना। ऐसे ही भगवान का और भगवान को पाये हुए महापुरुषों का स्वभाव है दूसरों का कल्याण करना। जो भी सामने आ जाए उसका कल्याण किये बिना वे नहीं रह सकते हैं।

जोगी मछन्दरनाथ ऐसे ही महापुरुष थे। एक बार जोगी मछन्दरनाथ किसी नगर में गये। वहाँ के लोगों ने मछन्दरनाथ को बतायाः

“इस नगर के राजा अपना राज्य अपने बेटों को सौंपकर जंगल में चले गये हैं। वहीं पर रहते हैं। जब भूख लगती है तब नगर में मधुकरी करने आते हैं। भिक्षा में जो भी रूखा-सूखा टुकड़ा मिलता है वह खा लेते हैं। कौपीन पहनकर रहते हैं। किसी के सामने आँख उठाकर देखते भी नहीं हैं तो बात करने का तो सवाल ही नहीं उठता है। बड़े तपस्वी हैं, महात्यागी हैं…”

एक दिन जब वह राजा नगर में आया और भिक्षा में जो कुछ मिला वह लेकर वापस जाने लगा तब मछन्दरनाथ ने जान-बूझ कर उसे जरा-सा धक्का मार दिया।

वह बोलाः “अरे ! आप मुझे धक्का देकर मेरी परीक्षा लेना चाहते हैं ? परन्तु ऐसी हरकतें करके भी आप मुझे गुस्सा नहीं दिला सकते।”

मछन्दरनाथ ने कुछ जवाब नहीं दिया। पाँच-पच्चीस कदम आगे चलकर उन्होंने फिर से से उस त्यागी राजा को कोहनी मारी। उसका भिक्षापात्र गिरते-गिरते बच गया।

उस राजा ने पुनः कहाः

“आप क्या समझते हैं ? आपके ऐसे कृत्यों से परेशान होकर मैं गुस्सा हो जाऊँगा ? नहीं, यह नहीं होगा। महाराज ! तब करने के लिए मैंने राज-पाट छोड़ दिया है, वस्त्राभूषण छोड़ दिये हैं, सगे संबंधियों को भी छोड़ दिया है। अब मेरे पास क्या है जो आप मुझसे छीनना चाहते हैं ? मेरे पास कुछ नहीं हैं। मैं महात्यागी हूँ।”

तब मछन्दरनाथ ने कहाः

“अभी बहुत कुछ त्याग करना बाकी है।”

“अरे महाराज ! मेरे पास तो कुछ नहीं है। केवल यह कौपीन है। आप कहें तो उसका भी त्याग कर दिखाऊँ।”

मछन्दरनाथः “मैं कौपीन का त्याग करने के लिए तो नहीं कहता हूँ लेकिन तुम अगर कौपीन का त्याग कर भी दो तब भी बहुत कुछ त्याग करना बाकी रह जायेगा।”

राजा को मछन्दरनाथ की बात समझ में न आयी। तब उन दयालु महापुरुष ने अपनी करूणा-कृपा बरसाते हुए कहाः

“अभी बहुत कुछ त्याग करना बाकी है। अभी स्थूल और सूक्ष्म शरीर में से तुम्हारी अहंता नहीं छूटी है। तुम कहते होः “मैंने राजपाट, वस्त्रालंकार, सगे-संबंधियों को त्याग दिया।ʹ परंतु जब तुम इस धरती पर आये थे तब साथ में क्या लेकर आये थे ? वास्तव में तुम्हारा था ही क्या जो तुमने त्याग दिया ? राज्य तो तुम्हारे आऩे से पहले भी था और जब तुमने उसे त्याग दिया ऐसा मानते हो तब भी राज्य तो वहीं पर है। तुम इस संसार में अकेले आये हो और जाओगे भी अकेले, तब तुम जिनका (अपने सगे-संबंधियों का) त्याग करने की बात कर रहे हो उनका तो त्याग हो ही जायेगा। तुम्हारे पास तुम्हारा अपना क्या था जिसे तुमने त्याग दिया है ? माता-पिता के रज-वीर्य से तुम्हारे शरीर का जन्म हुआ और पहले किये हुए पुण्यों के प्रभाव से तुम्हें राज्य मिला। अब त्याग करना बाकी है अपना अहंकार। ʹमैं त्यागी हूँ…. मैंने राजपाट का त्याग करने वाला मैं कौन हूँ ?ʹ इसे जरा खोजो। ʹमैं कैसा हूँ ?ʹ इसे जानो। उसके लिए तुम महापुरुषों की शरण में जाओ, सत्संग सुनो और विचार करो। तब ही तुम अपने-आपको जान पाओगे।”

पचास साल तक भले ही मन्दिर-मस्जिद में जाते रहो, पूजा पाठ करते रहो, आरती करते रहो लेकिन मंदिर के वे देव भी तुम्हें आत्मानुभव नहीं करा सकते। जब तक आत्मज्ञान का सत्संग नहीं मिलता है, आत्मज्ञानी गुरु की कृपा हजम नहीं होती है तब तक आत्मानुभव नहीं हो सकता। भीतर के देव का अनुभव करने के लिए सदगुरु की शरण में जाना ही पड़ता है।

सदगुरु के वचनों को आदरपूर्वक सुनकर उस पर अमल करने से सदियों से भटकता हुआ चित्त वश में होता है, अपने-आप में स्थिर होता है। चित्त को स्थिर करने के लिए एक यह भी उपाय है कि किसी एकांत स्थान में या तो अपने कमरे के कोने में बैठकर आँखों के सामने अपने इष्टदेव का या गुरुदेव का चित्र रखो। उससे तीन-चार फीट दूर बैठकर आँख की पलकें न गिरें उस तरह चित्र को एकटक निहारते रहो। बाद में आँखें बंद कर के गुरु के या इष्ट के चित्र को भ्रूमध्य में निहारो। इस प्रकार का प्रयोग हररोज पाँच मिनट के लिए भी करोगे तो मन की शक्ति बढ़ेगी और बलवान मन को जहाँ लगाना चाहोगे वहाँ लगेगा।

हम कहाँ हैं ? बाजार में हैं कि खेत में, घर में हैं कि दुकान में, उसका महत्त्व नहीं है परंतु हमारा मन कहाँ हैं, हमारे मन में समझ कैसी है उसका महत्त्व है। अगर हम सुख में आकर्षित और दुःख में अशांत हो जाते हैं तो हम स्वर्ग में होते हुए भी नरक बना लेते हैं।

संसार की चीज-वस्तुएँ कितनी भी हों, उससे मन की शांति नहीं मिलती है। अनेकों सुविधाएँ होने के बावजूद भी यदि मन में शांति नहीं है तो वे सुविधाएँ किस काम की ? जिसके पास बाहर  की सुविधाएँ भले नहीं हों लेकिन मन में यदि शांति और आनंद हो तो वह वास्तव में सुखी है और भीतर की शांति पाने का सब से सरल उपाय यह है कि न दुःख से भागो न सुख में चिपको, वरन् सुख और दुःख आते जाते रहते हैं। सुख जाता है तो दुःख दे जाता है और दुःख जाता है तो सुख दे जाता है।

एक भाई किसी महाराज के पास गये और कहने लगेः

“महाराज ! इस जिंदगी में मैंने दुःख-ही-दुःख देखे हैं।”

महाराज ने पूछाः “कितने दुःख देखे हैं ?”

उसने कहाः “कितने दुःख गिनाऊँ ? मैंने बहुत दुःख देखे हैं।”

महाराज ने कहाः “तूने सुख देखा ही न हो तो ʹबहुत दुःखʹ कैसे कह सकता है ? थोड़ा सुख भी मिला होगा तभी तो ʹबहुत दुःख मिलाʹ – ऐसा कह सकता है। केवल दुःख ही दुःख होता तो बहुत या थोड़ा हो नहीं सकतात। सुख भी आया और गया, दुःख भी आया और गया। ये तो आने जाने वाले मेहमान हुए। तू तो वही का वही रहा उसे देखने वाला साक्षी।”

जैसे, हाईवे पर यदि तुम्हारा बंगला हो तो रोड़ पर से बस, टैक्सी, ऑटोरिक्शा, साईकिल, स्कूटर, कार आदि गुजरते हैं। कभी बारात भी गुजरती है और कभी अर्थी लेकर श्मशान में जाने वाले लोग भी गुजरते हैं। उन सबको अपने बंगले में बैठकर तुम देखते रहो तो ठीक है लेकिन जो आये और उसके साथ चलने लग जाओगे, बारात को देखकर नाचने लगो या अर्थी को देखकर रोने लगो तो बंगले में शांतिपूर्वक कैसे बैठ सकोगे ? ऐसे ही अपने मनरूपी हाईवे पर सुख-दुःख की वृत्तियाँ, मान-अपमान के प्रसंग आदि आते जाते रहते हैं। जब हम आत्मारूपी घर को छोड़कर उन वृत्तियों के साथ एक होकर मन को दौड़ाते रहते हैं तो परेशान हो जाते हैं परंतु यदि आत्मारूपी बंगले में बैठकर सुख-दुःख, मान-अपमान को केवल देखते रहें तो आनंद ही आनंद है।

जैसे सागर की उछलती तरंगों की गहराई में शांत उदधि है और उस शांत उदधि के आधार पर ही तरंगे उछलती हैं। ऐसी कोई तरंग नहीं है जो सागर से अलग होकर सड़क पर दौड़ सके। ऐसे ही अपने मन की तरंगें भी शांत आत्मा के आधार पर ही उठती हैं। ऐसा कोई मन नहीं है जो चैतन्य के आधार के बिना संकल्प-विकल्प कर सके। परमात्मा के इतने निकट होते हुए भी मानव दुःखी, चिंतित और भयभीत रहता है। क्यों ? क्योंकि आने-जाने परिस्थितियों को सत्य मानकर उनके साथ वह एक हो जाता है।

जब हम दरिया किनारे घूमने जाते हैं, तब उछलती तरंगें देखने का मजा आता है किन्तु वह मजा तभी तक आता है जब तक किनारे पर खड़ा रहकर उसे देखते रहें। अगर किनारा छोड़कर तरंगों के साथ घुलमिल जायें तो तरंग देखने का मजा तो क्या आयेगा लेकिन तरंगें ही हमको घसीटकर गहरे पानी में डुबा देंगी। ऐसे ही जीवन में सुख-दुःख की तरंगें, मान-अपमान की तरंगें, तंदुरुस्ती और बीमारी की तरंगे आती जाती रहती हैं। अगर आप अपने आप में स्थित रहकर आत्मारूपी किनारे पर खड़े होकर तरंगों को देखते रहोगे तो मजा आएगा परंतु उनके साथ एक हो जाओगे तो वे तुम्हें बहा ले जायेंगी। सुख-दुःख की, मान-अपमान की तरंगें आती और जाती हैं लेकिन उनको देखने वाले तुम वही के वही रहते हो। वही तुम आत्मा हो, चैतन्य हो और आत्मा सदा एकरस है, अबदल है। शरीर और संसार बदलता रहता है। बचपन गया तो जवानी आती है और जवानी चली जाये तो बुढ़ापा आता है। संसार की परिस्थितियाँ भी बदलती रहती हैं लेकिन इऩ सब बदलाहट को देखने वाला जो साक्षी है, वह नहीं बदलता है, वही आत्मा है। जो सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति और लय का साक्षी है, महाप्रलय भी हो जाये फिर भी जिसका बाल भी बांका नहीं होता है वही आत्मा है… वही परमात्मा है।

जो सुख-दुःख में, मान-अपमान में सम रहकर अपने आप में स्थित रहते हैं वे देर सबेर आत्मा का साक्षात्कार कर लेते हैं। उनको फिर कुछ करना बाकी नहीं रहता है। वे भगवदरूप हो जाते हैं। ऐसे महापुरुष ईश्वर से कभी जुदा नहीं होते।

आप भी यदि ईश्वर के मार्ग पर आगे बढ़ना चाहते हो तो मिथ्या शरीर और संसार को सत्य मानने का भ्रम मिटाना पड़ेगा। यह भ्रम दूर होगा तभी आप सदा के दुःखों से मुक्त हो सकोगे। जैसे स्वप्न के पदार्थों को लेकर कोई जाग नहीं सकता, ऐसे ही जगत की सत्यता को पकड़कर कोई जगदीश्वर का साक्षात्कार नहीं कर सकता और संसार को सत्य मानने का वह भ्रम सदगुरु की करूणा कृपा के बिना नहीं मिटता।

सदगुरु मेरा शूरमा करे शब्द की चोट।

मारे गोला प्रेम का हरे भरम की कोट।।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, फरवरी 1997, पृष्ठ संख्या 7,8,9,23 अंक 50

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शाश्वत स्थान की प्राप्ति


पूज्यपाद संत श्री आसारामजी बापू

तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत।

तत्प्रसादात्परां शांतिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्।।

ʹहे भारत ! तू सर्व भाव से उस परमेश्वर की ही शरण में जा। उसकी कृपा से तू परम शान्ति और शाश्वत स्थान प्राप्त करेगा।ʹ (भगवद् गीताः 18.62)

देह शाश्वत नहीं है अर्थात् सदा रहने वाली नहीं है, देह से मिलने वाली खुशियाँ शाश्वत नहीं हैं, देह को मिलने वाले पद शाश्वत नहीं हैं लेकिन देह का जो आधार है, देह में रहने वाला जो विदेही चैतन्य आत्मा है, वह शाश्वत है और वही परम शान्ति का धाम है।

आज तक जिस किसी को ज्ञान मिला है, प्रेम मिला है, आनंद मिला है, निर्दोष सुख मिला है वह उस शाश्वत चैतन्य के भण्डार से ही मिला है। वही आत्मपद है, सबका असली स्वरूप है। उस सोઽहम् स्वभाव की पवित्रता, शांति, समता, करूणा, प्रेम, आनंद आदि अनादि काल से निखरते आये हैं, निखर रहे हैं और निखरते ही रहेंगे। बुद्धिमानों की बुद्धि, सत्ताधीशों की सत्ता संभालने की कला, धनवानों की धन संभालने की और बढ़ाने की अक्ल, शूरवीरों का शौर्य, तेजस्वियों का तेज, सुन्दरियों का सौन्दर्य एवं सज्जनों की सज्जनता इसी शाश्वत पिटारी से आती है, फिर भी जरा-सी भी कम नहीं होती है। वह शाश्वत चैतन्य परमात्मा अपना आत्मारूप बनकर सदा हमारे साथ है। भगवान कहते हैं-

ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः।

ʹइस देह में यह जीवात्मा मेरा ही सनातन अंश है।ʹ

हम जितने-जितने उस पूर्ण परमेश्वर में, अपनी आत्मा में तल्लीन होते जाएँगे, उतने-उतने पावन होते जाएँगे, निश्चिंत होते जाएँगे, आनंदित होते जाएँगे…

हम नाश होने वाली देह को ʹमैंʹ मानकर सदा रहने वाले चैतन्य आत्मा की अवहेलना करते हैं, इसलिए परेशानियों के पोटले सिर पर उठाने पड़ते हैं। जबकि उस परमेश्वर की शरण में जाने से आत्मस्वभाव में तल्लीन होने से परेशानियाँ दूर हो जाती हैं और परम शांति मिलती है, इसीलिए भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं- तमेव शरणं गच्छ। ʹउस परमात्मा की शरण में जा।ʹ

जो कुछ हो जाये उसमें उस परमात्मा की मर्जी मानो। ʹमान देने वाले में भी तू। मित्र में भी तू और शत्रु में भी तू। अनुकूल परिस्थिति देने वाला भी तू और प्रतिकूलता पैदा करने वाला भी तू। तन्दुरुस्ती में भी तू और रोग में भी तू….ʹ इस प्रकार हर वक्त, हर जगह उस प्रियतम प्रभु को देखोगे तो कोई भी तुम्हें परेशान नहीं कर पायेगा। भेद बुद्धि से दिखाई देनेवाले अलग-अलग नाम रूपों को सच्चा मानने से दुःख, चिंता, अशांति, खिंचाव-तनाव व खूनखराबा होता है जबकि अभेद बुद्धि से ʹसबमें एक ही परमेश्वर की सत्ता, स्फूर्ति, चेतना चमक रही हैʹ ऐसा भाव रखकर व्यवहार करने से ओज-तेज, पवित्रता, आनंद और शांति बढ़ती है।

जो उस परमेश्वर को पाने के लिए अर्थात् अपने आत्मस्वरूप को जानने के लिए प्रयत्न करते हैं, जो अपनी उन्नति चाहते हैं। ऐसे साधकों की, भक्तों की तीन अवस्थाएँ होती हैं-

तस्यैवाहम्। मैं उसका हूँ।

तवैवाहम्। मैं तेरा हूँ।

त्वमेवाहम्। मैं तू ही हूँ।

जैसे किसी लड़की की मँगनी होती है तब वह लड़की मानती हैः ʹमैं उसकी हूँʹ। जब नयी-नयी शादी होती है तब बोलती हैः ʹमैं तेरी हूँ।ʹ फिर पति के घर में रहने लगती है और पुरानी हो जाती है तब कोई आकर उसे पूछेः

“गोविन्दभाई हैं ?”

“वे तो नहीं हैं लेकिन बात क्या है ?”

“मुझे एक चीज चाहिए थी।”

“हाँ, हाँ, ले जाओ। मैं और वे एक ही तो हैं। इसमें क्या पूछना ?”

भक्त की स्थिति भी ऐसी है। ʹमैं उसका हूँʹ माने मँगनी हो गयी। ʹमैं तेरा हूँʹ माने शादी हो गयी। ʹमैं और तू एक ही हैंʹ माना संबंध दृढ़ हो गया, पक्का काम हो गया। जीवात्मा-परमात्मा की शादी के ये लक्षण हैं।

मँगनी के पहले तो लड़की पिता के घर को अपना मानती है। पति के घर का, ससुरालवालों के घर के संबंध का पता ही नहीं होता है। जब मँगनी होती है तब कहती हैः ʹउनका घर है, ससुरालवालों का घर है। फिर नयी-नयी शादी होती है तब ʹमेरे पति का घर हैʹ ऐसा मानती है। जब घर में रहते हुए पुरानी हो जाती है तब ʹहमारा घर हैʹ ऐसा कहने लगती है।

भावो हि विद्यते देवो। जैसा भाव होता है वैसा दिखता है। भाव बदलते हैं तो वही की वही परिस्थिति बदली हुई मालूम पड़ती है। अपना अहंभाव बदल जाय, ʹमैंʹ पना बदल जाय तो ममभाव ʹमेराʹ पना बदल जाता है। अहंता बदलने से ही ममता बदल जाती है। अपनी अहंता को ईश्वर में लगा दो तो ʹमैं भगवान का हूँʹ यह भाव जगेगा और भगवान में प्रीति हो जायेगी तब लगेगा ʹभगवान मेरे हैं।ʹ दृढ़तापूर्वक भगवान से अपनापन मान लोगे तो हृदय में भक्ति की रसधारा बहने लगेगी।

भक्ति की प्रारंभिक दशा में भक्त भगवान को अपने से कहीं दूर मानता है, वह परमेश्वर की चर्चा अन्य पुरुष में करता हैः ʹमैं उसका हूँ।ʹ तस्यैवाहम्।

इस भाव का भी पूर्णरूप से अनुभव कर लिया जाय तो हृदय मधुरता से छलक जायेगा। ʹमैं उसका हूँ तो मेरा जो कुछ है वह भी मेरे प्रभु का है….।ʹ ऐसा भक्त सुबह उठता है तबसे लेकर रात को सोने तक जो कुछ काम करता है उसको अपने प्रिय प्रभु का आदेश समझकर ही करता है। वह अपने घर, सगे-संबंधी, मित्र आदि को भी ईश्वर का समझता है या तो ईश्वर की कृपा से सब मिला है ऐसा मानता है। उससे उसे परम आनंद मिलता है।

जब प्रारंभिक दशा से कुछ उन्नत होता है और ईश्वर से निकटता का अनुभव करता है, तब वह कहता है ʹमैं तेरा हूँ।ʹ इस भाव से ईश्वर को अपने समीप मानता है। पहली दशा मधुर और प्यारी है किंतु यह दशा उससे भी प्यारी और रूचिकर है।

जब भक्ति की पराकाष्ठा आती है, उन्नति की अंतिम अवस्था आती है तब वह ईश्वर को अपना स्वरूप जान लेता है। उस अवस्था में वह कहता है त्वमेवाहम्। ʹमैं तू ही हूँ।ʹ फिर वह भक्त और ईश्वर दो अलग नहीं रहते हैं। दोनों एक हो जाते हैं। ईश्वर का सच्चा प्रेमी ईश्वर में मिल जाता है तो जान लेता हैः ʹमैं वह हूँ। मैं तू हूँ तू मैं है। तू और मैं एक हैं।ʹ यानी जीव ब्रह्म की एकता का अनुभव हो जाता है। यही ज्ञान की उच्चतम अवस्था है। यही मनुष्य जीवन का लक्ष्य है। जो बाहर भीतर सच्चे हैं, वे शुद्ध बुद्धि से इस निश्चय पर पहुँच जाने के बाद निदिध्यासन द्वारा इस निश्चय का अनुभव कर लेते हैं, दिव्य आनंद को पा लेते हैं, वे स्वयं ब्रह्मरूप हो जाते हैं, वे इसी जीवन में मुक्त हो जाते हैं अतः जीवन्मुक्त कहलाते हैं।

ऐसी जीवन्मुक्ति पाना ही हमारे जीवन का लक्ष्य होना चाहिए। देह को ʹमैंʹ मानते रहोगे और देह के संबंधों को मेरा मानते रहोगे तो काम नहीं चलेगा। ʹमैं गोविंदभाई….. मैं मोहनभाई…. ये मेरे बेटे-बेटियाँ…. यह मेरी पत्नी… यह मेरी दुकान… यह मेरा मकान….ʹ ऐसी बातों में उलझकर जीवन पूरा कर देने वाले तो कई लोग इस संसार में आ-आकर चले गये।

आप भी अगर ज्ञान का विचार नहीं करोगे तो अपने सच्चे स्वरूप को नहीं पहचान पाओगे। जो अपनी अहंता को शरीर ओर शरीर के संबंधों से हटाकर भगवान में लगा देता है, वही देर-सबेर भगवत्स्वरूप को उपलब्ध हो जाता है।

भाव बदलने से ही आधा काम बन जाता है। बाकी का काम ज्ञानसयुक्त जीवन जीने से पूरा हो जाता है। भाव किसी साधन से नहीं बदलता है वरन् ज्ञान से बदलता है।

जैसे, किसी बकरे के गले में फँदा पड़ा हो और आप उसे स्नानादि कराके उसके आगे धूप-दीप करो, पूजा करो, आरती उतारो, मेवा-मिठाई का प्रसाद रखो, फिर भी उससे बंधन नहीं कटेगा लेकिन फँदा कैसा है ? यह देखकर उसे काटने का उपाय सोचो और फँदा काट दो तब काम बनेगा।

ऐसे ही जीवरूपी बकरे के गले में अज्ञान का जो फँदा पड़ा है उसे जरा समझ लो और सत्संग से सेवा से, विवेक-वैराग्य से, विचाररूपी कैंची से काट दो तो मुक्त हो जाओगे। फिर चाहे प्रवृत्ति करो चाहे निवृत्ति लेकिन रहोगे निजानंद में। तब आपको किसी का भय नहीं रहेगा। फिर चाहे मौत भी आ जाय तो मौत के भी आप दृष्टा बन जाओगे। यह मुक्तिपद है ही ऐसा कि जिसे पाकर फिर इस जन्म-मरण के चक्कर में वापस नहीं आना पड़ता।

श्रीकृष्ण कहते हैं-

न तद् भासयते सूर्यो न शशांको न पावकः।

यद् गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम।।

ʹजिस परम पद को प्राप्त होकर मनुष्य लौटकर संसार में नहीं आते, उस स्वयं प्रकाश परम पद को न सूर्य प्रकाशित कर सकता है, न चन्द्रमा और न अग्नि ही, वही मेरा परमधाम है।ʹ (भगवद् गीताः 15.6)

परमात्मा के उस परमधाम को पाने के लिए श्रीकृष्ण कहते हैं- तमेव शरणं गच्छ। तू सर्वभाव से उस परमात्मा की शरण में जा, जो अंतर्यामी आत्मा के रूप में सदा तेरे साथ है। जो अनन्य भाव से उसकी शरण में जाता है वह भी उसी रूप हो जाता है। उसे सबमें अपना-आपा नजर आता है।

दुर्बल में भी ʹमैंʹ और बलवान की गहराई में भी ʹमैंʹ…. शत्रु में भी ʹमैंʹ और मित्र में भी ʹमैंʹ ही नजर आया तो फिर अहंकार, राग-द्वेष, ईर्ष्या, भय आदि के लिए स्थान ही कहाँ बचेगा ?

समं पश्यन्हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम्।

न हिनस्त्यात्मनात्मानं ततो याति परां गतिम्।।

ʹजो पुरुष सबमें समभाव से स्थित परमेश्वर को समान देखता हुआ अपने द्वारा अपने को नष्ट नहीं करता, अर्थात् राग-द्वेष आदि विकारों के वश नहीं होता है इससे वह परम गति को प्राप्त होता है। (भगवद् गीताः 13.28)

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जनवरी 1997, पृष्ठ संख्या 3,4,5 अंक 49

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निरावरण तत्त्व की महिमा


पूज्यपाद संत श्री आसारामजी बापू

तत्त्वदृष्टि से जीव और ईश्वर एक है, फिर भी भिन्नता दिखती है। क्यों ? क्योंकि जब शुद्ध चैतन्य में स्फुरण हुआ तब अपने स्वरूप को भूलकर जो स्फुरण के साथ एक हो गया, वह जीव हो गया परन्तु स्फुरण होते हुए भी जो अपने स्वरूप को नहीं भूले, अपने को स्फुरण से अलग जानकर अपने स्वभाव में डटे रहे, वे ईश्वर कोटि के हो गये। जैसे, जगदम्बा हैं, श्रीराम हैं, शिवजी हैं।

अब प्रश्न उठता है कि स्फुरण के साथ अपने को एक मान लेने वाले कैसे जीता है ? जैसे किसी आदमी ने थोड़ी-सी दारू पी है, लेकिन सजग है और बड़े मजे से बातचीत करता है किन्तु दूसरे ने ज्यादा दारू पी है, वह लड़खड़ाता है। जो खड़ा है, बातचीत कर रहा है, वह तो खानदानी माना जायेगा लेकिन जो लड़खड़ाता है वह शराबी माना जायेगा। लड़ख़ड़ाने वाले को गिरने के भय से बचने के लिए बिना लड़खड़ाने वाले का सहारा चाहिए। इस तरह लड़खड़ाने वाला हो गया पराधीन और जो नहीं लड़खड़ाया है वह हो गया उसका स्वामी।

ऐसे ही शुद्ध चैतन्य में स्फुरण हुआ, उस स्फुरण को जो पचा गये वे ईश्वर कोटि के हो गये। उन्हें निरावरण भी कहते हैं। जो स्फुरण के साथ बढ़ गये, अपने को भूलकर लड़खड़ाने लगे वे जीव हो गये। उन्हें सावरण कहते हैं। जो सावरण हैं वे प्रकृति के आधीन जीते हैं परन्तु निरावरण हैं वे माया को वश में करके जीते हैं। माया को वश करके जीनेवाले चैतन्य को ईश्वर कहते हैं। अविद्या के वश होकर जीने वाले चैतन्य को जीव कहते हैं क्योंकि उसे जीने की इच्छा हुई और देह को ʹमैंʹ मानने लगा।

ईश्वर का चिन्मयवपु वास्तविक ʹमैंʹ होता है। जहाँ से स्फुरण उठता है वह वास्तविक ʹमैंʹ है। जितने भी उच्च कोटि के महापुरुष हो गये, वे भी जन्म लेते हैं तब तो सावरण होते हैं लेकिन स्फुरण का ज्ञान पाकर अपने चिन्मयवपु में ʹमैंʹ पना दृढ़ कर लेते हैं तो निरावरण हो जाते हैं,  ईश्वरस्वरूप हो जाते हैं। उन्हें हम ब्रह्मस्वरूप कहते हैं। ऐसे ब्रह्मस्वरूप महापुरुष हमें युक्ति-प्रयुक्ति से, विधि-विधान से निरावरण होने का उपाय बताते हैं, ज्ञान देते हैं। गुरु के रूप में हम उनकी पूजा करते हैं। यदि ईश्वर और गुरु दोनों आकर खड़े हो जायें तो…..

कबीर जी कहते हैं-

गुरु गोविन्द दोऊ खड़े किसके लागूँ पाय।

बलिहारी गुरु आपने जिन गोविंद दिया दिखाय।।

हम पहले गुरु को पूजेंगे, क्योंकि गुरु ने ही हमें अपने निरावरण तत्त्व का ज्ञान दिया है।

ईश्वरो गुरुरात्मेति मूर्तिभेदे विभागिनः।

ʹईश्वर और गुरु की आकृति दो दिखती हैं, वास्तव में दोनों अलग नहीं हैं।ʹ

पुराणों में आता है कि किसी ने पुत्र की अभिलाषा से तप किया। उसके तप से भगवान प्रसन्न हुए और वरदान माँगने के लिए कहा। तपस्वी ने पुत्र की अभिलाषा व्यक्त की। एवमस्तु कहकर भगवान अन्तर्धान हो गये। समय पाकर उनके घर पुत्र का जन्म हुआ।

जो महापुरुष निरावरण पद को प्राप्त हो जाते हैं वे ईश्वर कोटि के हो जाते हैं। वे महापुरुष मौज में आकर कह दें कि ʹऐसा हो जायेगाʹ तो वह हो जाता है। यह निरावरण तत्त्व में स्थिति की सामर्थ्य है।

जैसे पावर-हाऊस की बिजली का सप्लाई तो वही का वही है, लेकिन उसका उपयोग जहाँ होता है वह साधन जितना बढ़िया होगा उतना ही कार्य अच्छा होगा। ईश्वर का संकल्प जहाँ से स्फुरित होता है वही चैतन्य आपका भी है। आपका संकल्प भी वहीं से स्फुरित होता है। ईश्वर के साधन बढ़िया हैं और आपके अंतःकरण और इन्द्रियाँ रूपी साधन घटिया हैं। है तो वही चैतन्य, फिर भी उसका सामर्थ्य सीमित रहता है। जब आपकी निरावरण स्वरूप में स्थिति होती है, तब उसकी सत्ता-सामर्थ्य है को जान पाते हैं क्योंकि आप भी वही चैतन्य रूप हो जाते हैं। अभी भी आप वही रूप हैं मगर जानते नहीं हैं न ! नश्वर संसार के नाम और रूप में आसक्त होकर उसमें उलझ गये हैं।

नाम और रूप का आधार तो एक ही है। तत्त्वज्ञान के अभाव में भेद दिखता है। वास्तव में भेद नहीं है। जीव और ईश्वर भी कहने भर को दो हैं। वास्तव में दो नहीं हैं।

भगवान परम कृपालु हैं

किसी ने मुझसे प्रश्न कियाः

“यदि भगवान सबका भला ही चाहते हैं तो किसी व्यक्ति के चोरी करने पर उसके हाथ में लकवा कर दें ताकि फिर कोई चोर ही न बनें। यदि ऐसा चमत्कार कर दें कि किसी के झूठ बोलने पर उसकी जीभ कट जाय – तो आगे से कोई झूठ ही न बोल पाये। हमारी बहन पर किसी पड़ोसी के लड़के की बुरी नजर हो तो उस लड़के को ही अंधा बना डालें ताकि दूसरे किसी की ऐसा करने की हिम्मत ही न हो। भगवान यदि अपनी शक्ति को इस प्रकार का ʹमहाप्रसादʹ देने में लगायें तो इतने सारे पुलिस, सिपाही, थाने और कोर्ट-कचहरी आदि की आवश्यकता ही न रहे और सारी झंझटें खत्म हो जायें तथा संसार सुखमय, शांतिमय बन जाये।”

सवाल तो बढ़िया लग रहा है लेकिन ऐहिक ज्ञान के संदर्भ में बढ़िया लग रहा है। कोई झूठ बोले और उसकी जीभ कट जाये, बुरी नजर से देखे और अंधा हो जाये, यदि ऐसा होने लगे तो मनुष्य का विकास रूक जायेगा। आपके कपड़े खराब हो जाते हैं तो क्या आप उन्हें फेंक डालते हो ? नहीं, वरन् आप उसे अच्छे-से-धोकर साफ-सुथरा बनाने की कोशिश करते हो। आपका बेटा कोई गलत काम करता है तो क्या आप उसे घर से बाहर निकाल देते हो ? नहीं, घर से बाहर निकाल देना यह समस्या का हल नहीं है। आप उसे शांति से, प्रेम से समझाकर, आगे से ऐसी गलती न करने का सिखाकर, अच्छे जीवन की ओर प्रोत्साहित करके उसे सुधारने का प्रयास करते हो, विकसित करने का प्रयास करते हो।

चार दिन की जिन्दगानी में भी आप अपने बेटे के विकास के लिए इतने दयालु बनते हो। यदि आपका पुत्र चोरी करता है तो ʹलकवा हो जायेʹ – आप सोच भी नहीं सकते हो, यदि आपका पुत्र किसी लड़की की ओर बुरी नज़र से देखने का अपराध करता है तो आपको उसकी आँखें फोड़ डालने की इच्छा नहीं होती है वरन् आप उसे समझाकर, टोककर, डाँट फटकारकर, मारकर, ʹदूसरी बार ऐसी गलती न होʹ ऐसी चेतावनी जरूर देते हो। फिर भी यदि वह जीवनभर अपराध ही करता रहे तब भी आपको उसके लिए लकवा होने या अंधे हो जाने का विचार हरगिज नहीं आयेगा।

जो पहले आपका न था, मरने के बाद आपका न रहेगा, उस पुत्र के लिए आप इतने उदारहृदयी बनते हो तो जो सदियों से हमारा पिता है, उस परम पिता परमेश्वर के हृदय में हमारे लिए कितनी करूणा होगी ? यदि भगवान इतने कठोर दिल के बन जायें तो मनुष्य के गिरने के बाद सँभलने की योग्यता का विकास नहीं होगा। सिपाहियों को काम नहीं मिलेगा, न्यायधीशों को अपराधी नहीं मिलेंगे तो संसार सुखद नहीं, अपितु भोगप्रधान बन जायेगा।

भगवान तो सदैव हमें बुरे कर्मों से बचाने के लिए हमारे हृदय में अंतर्यामी अवतार लेकर प्रगट होते रहते हैं। यदि हम बुरे कर्म करके सफलता प्राप्त करते हैं और हमारे मित्र हमारी वाहवाही करते हैं फिर भी हमें हृदय में शांति, संतोष और सुख नहीं मिलता है। तब हमें बाह्य रूप से सजा देने के बजाय परम कृपालु परमेश्वर हमारे हृदय में ही अंतर्यामी अवतार लेकर हमें टोकता है, बुरे कर्मों से बचाकर हमें सुधारने की कोशिश करता है। इसी प्रकार जब हम सत्कर्म करते हैं, तब टोकने वाले टोकते हैं फिर भी हमें आंतरिक खुशी मिलती है, हमारा अंतरात्मा, अंतर्यामी परमात्मा हमें धन्यवाद देता है।

हमें सजग रखने के लिए इतना कुछ करने पर भी यदि हम गलत मार्ग पर ही आगे बढ़ते रहते हैं तो अंत में भी वह परम कृपालु परमात्मा निराश न होकर, इस जन्म में तो क्या दूसरा जन्म देकर भी हमें ऊपर उठने का मौका देता है। वह परमात्मा कितना उदार है ! कितना कृपालु है ! वास्तव में तो वही प्राणिमात्र का परम सुहृद एवं अकारण हित करने वाला परम मित्र है। उसी की शरण में रहने में आनंद है…. उसी की स्मृति में आनंद है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जनवरी 1997, पृष्ठ संख्या 15,16,17 अंक 49

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