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Tatva Gyan

भगवत्प्राप्ति की लालसा और व्यवहार में असंगता


पूज्यपाद संत श्री आसारामजी बापू

भगवत्प्राप्ति के बिना जीवन व्यर्थ है क्योंकि जिस शरीर को खिलाया-पिलाया, जिन इन्द्रियों को चखाया, सुँघाया, सुनाया-वे सब एक दिन जल जाने वाली हैं। शरीर एवं इन्द्रियों के भोगों को भोगते-भोगते तो कई भोगी मर गये, कई जिन्दगियाँ  पूरी हो गयीं, कई सदियाँ बीत गयीं किन्तु भोगों से पूर्ण तृप्ति किसी को भी कहाँ मिली ?

आरंभ में तो भोग अमृत जैसे सुखदायी लगते हैं किन्तु अन्त में उनका परिणाम विष से भी बदतर होता है। विष तो केवल एक बार मारता है लेकिन विकारों का, भोगों का विष तो चौरासी लाख जन्मों तक मारता रहता है। शरीर जरूर बूढ़ा हो जाता है किन्तु वासना कभी बूढ़ी नहीं होती।

विवेक के बिना वासना निवृत्त नहीं होती और बिना सत्संग के विवेक नहीं आता और बिना भगवत्कृपा के सत्संग नहीं मिलता। इसलिए जीवन में भगवत्प्राप्ति की दिशा में प्रथम सोपान है विवेक। किस्से कहानियाँ तो मिल जाती हैं लेकिन सत्य का संग कराने वाला, सत्यस्वरूप ईश्वर में विश्रान्ति दिलाने वाला सत्संग नहीं मिलता।

सब दुःखों की निवृत्ति और परम शान्ति की प्राप्ति-इसी का नाम है मुक्ति। सभी मुक्ति चाहते हैं, बँधन कोई नहीं चाहता। जैसे – चिड़िया व तोता बँधन नहीं चाहते वैसे ही तुम भी बँधन नहीं चाहते क्योंकि तुम्हारा मूल स्वभाव ही निर्बंध है। स्वभाव तो निर्बंध है लेकिन अविद्या के संस्कार से हम बँधन की आदत में पड़ जाते हैं।

तोते को प्रारम्भ में जब कैद किया जाता है तो उसे अच्छा नहीं लगता। किन्तु पिंजरे में रहते-रहते उसे कैद में रहने की आदत पड़ जाती है। जब एक बार उसे पिंजरे से मुक्त कर दिया जाये और वह उड़कर गगनगामी हो जाये तो फिर वह पुनः पिंजरे में नहीं आता।

जब तक तोता पिंजरे में है तब तक तो बँधन है ही, फिर पिंजरा चाहे लोहे का हो चाहे सोने का। लोहे का पिंजरे में पड़े तोते को देखकर सोने के पिंजरे वाला तोता भले अपने को भाग्यशाली मान ले, लेकिन है तो वह बँधन में ही। इसी प्रकार गरीब लेकिन अमीर भी बेचारा न जाने कितने-कितने बँधनों से बँधा है ! बँधन कैसा भी हो, आखिरकार वह तो पीड़ादायी ही।

पूर्ण सुख है तो केवल निर्बंधता में ही और निर्बंध होने के लिए दो बातों को समझना जरूरी हैः

निर्बंध होने की लालसा तीव्र कर लें, मुक्त होने की, शाश्वत सुखी होने की लालसा तीव्र कर लें।

व्यवहार में असंग होते जायें। असंगता का अभ्यास बढ़ाते जायें।

शाश्वत सुख हमारा स्वभाव है। क्षणिक सुख इन्द्रियों एवं विषयों की भ्रान्ति है। तुलसीदासजी ने कहाः

बिनु रघुवीर पद जिय की जरनि न जाई।

रघुवीर पद कहो या आत्मपद कह दो – उसे पाये बिना जिय की जलन नहीं जाती है। उस रघुवीर पद को पाने के लिए लालसा बढ़ाते जायें।

दूसरी बात यह है कि व्यवहार का संग अपने में थोपे नहीं। ज्यों-ज्यों व्यवहार में असंग होते जायेंगे, त्यों-त्यों भगवत्प्राप्ति में सफल होते जायेंगे। व्यवहार में असंगता आत्मविश्रान्ति देगी। व्यवहार में असंगता से विकारों एवं परिस्थितियों का प्रभाव नहीं पड़ेगा, मन और बुद्धि स्वच्छ और शांत रहेंगे। स्वच्छ और शांत मन-बुद्धि परमात्मा में विश्रान्ति पाने की सुविधा रहेगी। व्यवहार की असंता से जो चित्त की शांति मिलती है वह प्रसाद की जननी है, सच्चे सुख की जननी है, मुक्ति की जननी है।

जैसे नाविक नाव को ले जाता है और नाव नाविक को ले भागती है ऐसे ही असंगता से मन-बुद्धि को शांत होने का अवसर मिलेगा और मन-बुद्धि के शांत होने पर उनके दोष दूर होने लगेंगे। इन्द्रियगत आकर्षण, विकारों के आकर्षण दूर होने लगेंगे। यदि इऩ्द्रिय-आकर्षणों से दूर होने लगें तो फिर शांति सहज ही मिलने लगेंगी क्योंकि शांति तो हमारा स्वभाव है, मुक्ति निर्बंधता तो हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है।

भगवत्प्राप्ति की लालसा बढ़ा दें। भगवत्प्राप्ति की लालसा से की गयी भक्ति ईमानदारी की भक्ति होती है और संसार-प्राप्ति के लिए की गयी भक्ति बेईमानी की भक्ति होती है। भगवत्प्राप्ति की श्रद्धा सात्त्विक श्रद्धा होती है। भगवत्प्राप्ति के बिना की जो श्रद्धा होती है वह श्रद्धा  राजसी और तामसी श्रद्धा होती है।

तामसी श्रद्धावाला ʹअपना बिगड़े तो बिगड़े किन्तु दूसरे का भी थोड़ा बिगाड़ करो… अभिचार मंत्र से मरवाओ दूसरे को…..ʹ ऐसा सोचता है। अगर ऐसा ही होता तो जिन गुण्डों ने दूसरों की हत्या कर दी वे सुखी होने चाहिए लेकिन उनके दुःख नहीं मिटते वरन् और बढ़ जाते हैं। जैसे – शराबी लोग शराब पीते हैं दुःख मिटाने के लिए। शराब पीने से थोड़ी देर ज्ञानतंतु निस्तेज हो जाते हैं और व्यक्ति चेतना शून्य हो जाता है लेकिन बाद में उसका दुःख और दुगुना हो जाता है। इसी प्रकार सांसारिक वासनापूर्ति से तृप्ति नहीं होती। क्षणिक तृप्ति होती हुई दिखती है किन्तु फिर ज्यादा बढ़ जाती है। आत्मपद पाये बिना सदा के लिए सारे दुःख किसी के भी नहीं मिटते, सारी वासनाएँ नहीं मिटतीं।

…..और आत्मपद पाने के लिए इन दोनों बातों को ठीक से व्यवहार में ले आना चाहिएः एक तो भगवत्प्राप्ति की तीव्र लालसा और दूसरी व्यवहार में असंगता। कश्मीर में ललिता नाम की लड़की की शादी बचपन में ही हो गयी। एक दिन वह ससुराल में नदी के किनारे पर पानी भरने के लिए घड़ा माँज रही थी, तब उसकी सखियों ने कहाः

“कल तो ललिता के घर श्राद्ध है इसीलिए आज वह बात नहीं कर रही है कि कहीं खीर न खिलानी पड़े….”

ललिताः “अरे ! मैं तुम्हें क्या खीर खिलाऊँगी ? मुझे भी नहीं मिलेगी।”

सखीः “क्यों ? तुझे क्यों नहीं मिलेगी ?”

ललिताः “मेरी सासुजी जब मुझे भोजन देती है न, तब कटोरे में पत्थर रखकर फिर ऊपर भात रखकर देती है ताकि मेरे ससुर को लगे कि बहुत भात देती है। जब वह भरपेट खाना ही नहीं देती तो खीर क्या देगी ? जब मुझे ही नहीं मिलेगी तो तुम्हें कैसे खिला पाऊँगी ?”

पास में ही ललिता के ससुर जी नहा रहे थे। उन्होंने सारी बात सुन ली। ललिता घूँघट डाले थी अतः उसे अपने ससुरजी की उपस्थिति का जरा भी ख्याल नहीं था। ससुर को हुआ कि यह तो जुल्म है। नहाने के बाद जैसे ही वे घर पहुँचे, उन्होंने अपनी पत्नी को डाँटा। पत्नी ने समझा कि बहुरानी ने ससुर से मेरी शिकायत कर दी है। वह और ज्यादा चिढ़ गयी। फिर तो उसने अपने बेटे के कान भरने भी शुरु कर दिये किः ʹयह तो डायन है… ऐसी है… वैसी है….ʹ माँ की बात सुनकर अब तो ललिता का पति भी उससे डरने लगा। धीरे-धीरे ससुर भी अपनी पत्नी की बातों में ही आ गये और पहले तो केवल सास जुल्म करती थी किन्तु अब तो जुल्म करने वाले तीन हो गये। ललिता एकदम अकेली पड़ गयी। माता-पिता की ओर से भी कोई सहयोग नहीं था। किन्तु ललिता भगवान शिव एवं माँ पार्वती को अपने माता-पिता मानती थी।

जब उस पर जुल्म बढ़ते गये तो वह भगवान शिव एवं पार्वती के आगे आँसू बहाकर, अपनी व्यथा सुनाकर अपने दिल को कुछ हल्का कर लिया करती थीः “प्रभु ! मैं जैसी-तैसी हूँ किन्तु तुम्हारी हूँ। तुम्हीं मेरे माता-पिता, सास-ससुर, बंध-सखा सभी हो….ʹ वास्तव में तो सभी के सब रिश्ते नाते वे ही हैं किन्तु जो इस बात को मान लेते हैं उनका काम बन जाता है। फिर चाहे विवेक से मान लें या ललिता की तरह ठोकर खाकर मान लें लेकिन मानने में कल्याण निहित है।

धीरे-धीरे भगवान गौरीशंकर में ललिता की प्रीति बढ़ती गयी। जब वह प्रीतिपूर्वक भजने लगी तो उसे शांति एवं आनंद भी मिलने लगा और ʹजिय जरनिʹ चली जाने लगी। सासु का जुल्म अब उसके लिए वरदान बन गया। कभी-कभी कुटुंबियों की रोक-टोक भक्त के लिए वरदान का रूप भी ले लेती है। दुःख ही परम सुख के द्वार तक पहुँचने की सीढ़ी बन जाता है। इसलिए व्यवहार में चित्त की समता बनाये रखना बड़ा हितकर होता है।

अब तो ललिता को भगवान के ध्यान-भजन एवं उनसे मन ही मन बात करने का चस्का-सा लग गया। ज्यों-ज्यों भगवद-भजन में उसकी प्रीती बढ़ती गयी त्यों-त्यों उसकी सास का क्रोध भी बढ़ता गया। वह जमाना नहीं था तलाक लेने का… मैं तो कहता हूँ कि दुःख पड़ने पर तलाक लेने की जगह दुःखहारी श्रीहरि की शरण ले लेना हजारगुना अच्छा है। तलाक लेने के बाद दूसरा पति किया तो पता नहीं वह कैसा निकले ? फिर उसे भी तलाक दो, तीसरा करो…. इससे तो अच्छा है विघ्न-बाधा आयें तो भगवान की शरण चले जायें और सुख-सुविधाएँ मिलें तो उसे भी भगवान की कृपा मानकर, भगवान को धन्यवाद देते हुए भगवान की शरण स्वीकार लें।

तमेव शरणं गच्छ सर्वभावने भारत।

तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्।।

ʹहे भारत ! सब प्रकार से उस परमेश्वर की ही अनन्य शरण की प्राप्ति हो। उस परमात्मा की कृपा से ही परम शान्ति को और सनातन परम धाम को प्राप्त होगा।ʹ (श्रीमद् भगवद् गीताः 18.62)

भोग में शाश्वत सुख, शाश्वत आनंद, शाश्वत मुक्ति और शाश्वत जीवन नहीं है। भोगी का तो नश्वर जीवन है। देख देखकर या तो आँख थक जायेगी या देखने की चीज बदल जायेगी या तो देखने वाला थक जायेगा। चख चखकर या तो जीभ थक जायेगी या तो वस्तु खत्म हो जायेगी या खाने की रूचि टूट जायेगी। इसी प्रकार अन्य इन्द्रियों का भी समझना चाहिए। त्रिपुटी के मेल से, वस्तु, इन्द्रिय और मन की तदाकारता से जो सुख मिलता है वह सुखाभास है, हर्ष है। वह मनुष्य को बँधन में डालने वाला है और परमात्मा का जो सुख है, वह स्वतः सिद्ध है और नित्य स्वभाव में जगाने वाला, मुक्त करने वाला है।

इधर सास की प्रताड़ना बढ़ती गयी और उधर ललिता का भगवदभाव। एक दिन सास खूब क्रोधित हो गयी और ललिता के साथ बुरी तरह व्यवहार हुआ। अक्सर जितनी विघ्न-बाधाएँ आती हैं उतनी ही अधिक ईमानदारी से मनुष्य परमात्मा की शरण में जाता है। क्योंकि उस समय परमात्मा के प्रति सर्वस्व समर्पण होता है, उस पर पूर्णतः श्रद्धा होती है। ललिता पहुँच गयी अपने माता-पिता के पास अर्थात् भगवान शिव और माता पार्वत के चरणों में और आँसूओं की धारा बहाते हुए प्रार्थना करने लगीः “हे मेरे प्रभु ! मेरा तो कोई नहीं है। पिता तो बचपन में ही गुजर गये। माँ गरीब है और सास भी ऐसी… बिल्कुल अनाथ हूँ।

इतने में अंदर से आवाज आयीः ʹʹविश्व का नाथ जीवित है पगली ! तो तू अनाथ कैसे ?ʹʹ

“हे नाथ ! मैं तुझसे कैसे मिलूँ ?”

“मैं तेरे से दूर नहीं हूँ तो फिर तू क्या मिलेगी ? केवल जगत की लालसा छोड़ दे और मुझे पाने की लालसा बढ़ा दे। व्यवहार के संग का आग्रह छोड़ दे। तू जब पैदा हुई थी तब अकेली थी, जब मरेगी तब भी अकेली रहेगी और अभी भी अकेली बैठी है। तू अकेली होकर शांत होती जा तो मैं तुझसे दूर नहीं और तू मुझसे दूर नहीं।” इस प्रकार अन्तर्यामी की प्रेरणा से उसके दुःखी जीवन को सहारा मिल गया।

भक्तों के जीवन में कई बार इस प्रकार अन्तःप्रेरणा के अनेक शुद्ध भाव उत्पन्न होते हैं। ललिता को भी उसके अन्तर्यामी शिव प्रेरणा कर रहे थे किः “तू डर मत। चिन्ता मत कर। तू अनाथ नहीं है…”

एक रात्रि को उसी भाव में ललिता टाट का लिबास पहनकर घर से निकल पड़ी। स्त्री शरीर है अतः शरीर को देखकर किसी के मन में विकार न उठे इसलिए टाट का लिबास। चलती-चलती जहाँ सुबह में बाजार आया, वहीं एक कोने में ललिता बैठ गयी। ध्यान करते-करते कुछ योग्यता विकसित हो चुकी थी। दो ठीकरे लेकर वह भजन गाने लगी और उसकी आवाज में ऐसा माधुर्य और आकर्षण आ गया था कि भजन सुनकर लोग उसके आगे कुछ डाल जाते और उसी से वह अपना पेट भर लेती। वह गाती थी आत्मसंतोष के लिए लेकिन लोगों को संतोष मिलने लगा। ऐसा करते-करते ललिता में से लल्लेश्वरी देवी होकर भक्तों के हृदय में छा गयी। कहते हैं कि एक बार संत कबीर भी उसके दर्शन के लिए गये थे। यह आत्मदेव है ही ऐसा कि आप किसी भी भाव से उसके निकट जाओ, आपकी योग्यताओं को निखार देता है, महानता की यात्रा करा देता है।

कहाँ तो एक अनाथ कन्या ललिता, जिसे खाने के लिए भरपेट चावल भी नहीं मिलते थे और अब उसके द्वारा सैंकड़ों के पेट भरने लगे। आज भी उसके नाम की अनेक संस्थाएँ चल रही हैं।

…..तो ये दो बातें- एक तो भगवत्प्राप्ति की लालसा और दूसरी व्यवहार में असंगता। इन दोनों बातों को बढ़ाते जायें। यदि एक भी बढ़ायें तो दूसरी अपने-आप बढ़ेगी। यदि भगवत्प्राप्ति की लालसा को बढ़ायें तो व्यवहार में असंगता अपने-आप बढ़ने लगेगी और यदि व्यवहार में असंगता बढ़ाते जायेंगे तो भगवत्प्राप्ति की लालसा अपने-आप बढ़ने लगेगी। भगवान में, भगवत्प्राप्त महापुरुषों में श्रद्धा, भक्ति और प्रीति भगवत्प्राप्ति की लालसा और व्यवहार की असंगता को बढ़ाने में मदद करती है। अतः खोज लें किसी ऐसे महापुरुष को और आप भी लग जायें इन दोनों बातों में…. भगवत्प्राप्ति की लालसा और व्यवहार में असंगता बढ़ाने में….

हरि ૐ…. ૐ…. शान्ति… शान्ति…. शान्ति….

स्रोतः ऋषि प्रसाद, दिसम्बर 2012, पृष्ठ संख्या 3,4,5,6 अंक 48

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शास्त्र-महिमा – पूज्यपाद संत श्री आसारामजी बापू


 

ʹगुरु ग्रंथ साहिबʹ में आता है किः

साधु ते होवहि न कारज हानि।

साधु से कार्य की हानि नहीं होती। साधु किसको कहते हैं ?

सत्पुरुख पिछानिया सत्गुरु ता का नाम।

तिसके संग सिख उदरियै नानक गुण गान।।

जिन्होंने उस सत्यस्वरूप को जाना है, सत्यस्वरूप में जिनकी मति विश्रान्ति पाती है वे जो बोलते हैं वह मत नहीं माना जाता, वरन् शास्त्र माना जाता है।

नानक बोले सहज सुभाऊ।

अपने अनुभव की बात संत तुकारामजी ने भी कही है। महाराष्ट के सुप्रसिद्ध संत तुकाराम ! निंदक भले उन्हें गधे पर बिठाकर उनकी बदनामी करें लेकिन समझदारों ने उऩ्हें नवाजा है। छत्रपति शिवाजी ने उनकी पूजा की है। सज्जनों ने, साधकों ने गुरुओं की पूजा की, उनका ज्ञान पाया और निंदकों ने उनके लिए न जाने कौन-कौन सी मुसीबतें खड़ी कीं। गुरुतेगबहादुर को धधकती धूप में, तपे हे तवे पर बैठाया गया। क्या वे इतने अपराधी थे ? नहीं। अपराधी लोगों को महापुरुष अपराधी दिखते हैं।

अपराधी का अपराध निवृत्त करने के लिए क्रूरतापूर्ण दण्ड देने से उसका अपराध निवृत्त नहीं होता लेकिन अपराधी की स्थिति समझकर उसके निरपराध नारायण स्वभाव को जगाने से वह निरपराधी होता है। सदग्रंथ व्यक्ति को निरपराध तत्त्व में जगाते हैं। यदि दण्ड देने से, बेंत मारने से जगत के अपराध समाप्त हो जाते तो अभी पुलिस की जरूरत नहीं पड़ती, कारावासों की जरूरत नहीं पड़ती। जहाँ निरपराध तत्त्व है उस तत्त्व का प्रसाद, उस तत्त्व की रूचि, उस तत्त्व का ज्ञान और उस तत्त्व का आनंद दिलाया जाय तो अपराधी से अपराधी व्यक्ति निरपराध हो जायेगा।

जहाँ कोयला है वहाँ हीरा भी तो प्रगट हो सकता है। जहाँ अपराध है वहाँ निरपराध नारायण भी तो छुपा है। इसलिए कृपा करके अपने बच्चे-बच्चियों के अपराध को बार-बार दुहराकर उन्हें गहरे अपराधी कभी न बनाइएगा। वरन् उनके अंदर जो भी निरपराध चेष्टा है उसकी प्रशंसा कीजिएगा ताकि उनको अपराधी प्रवृत्ति करने का अवसर ही न मिले। अपराधी के प्रति इस ढंग से पेश न आयें कि ʹतूने यह किया…. तूने यह गलती की…. तू अपराधी है….ʹ उसे कहो किः ʹऐसी जो गलती करते हैं उनके बुरे हाल होते हैं। तू ऐसी गलती करने के योग्य नहीं है। तूने जान-बूझकर यह गलत काम नहीं किया, तुझसे हो गया। तू मेरा बेटा है।ʹ इस प्रकार के सहानुभूतिपूर्ण वाक्यों से उसे सुधारने का प्रयास करें।

ऐसी सब व्यवस्था हमारे सदग्रंथों में है और वे सदग्रंथ किसी मत-पंथ की नहीं, अपितु प्राणीमात्र के हित की बात करते हैं।

बालक जब पैदा होता था, दाई बच्चे को बाप की गोद में रख देती थी। तब बाप नवजात शिशु के कान में बोलता थाः अश्मा भव। परशु भव।

आश्चर्य होगा यह जानकर कि अपने नवजात कोमल शिशु को पिता कहताः ʹतू पत्थर बन। तू चट्टान बन। तू कुल्हाड़ा बन….।ʹ

वेद भी कहते हैं कि पिता को ऐसा बोलना चाहिएः ʹअब तू कोमल शिशु संसार में आ रहा है तो संसार के कई सुख-दुःख के थपेड़े लगेंगे, कई आरोप लगेंगे। जैसे, दरिया के किनारे छोटी-मोटी बालू होती है, तिनखे होते हैं तो बह जाते हैं, लुढ़क जाते हैं जबकि चट्टान होती है तो थपेड़ों से टकराती रहती हैं और अपने अस्तित्त्व को बरकरार रखती है। इसी प्रकार हे पुत्र ! तू मजबूत बनना। अश्मा भव। तू दृढ़ बनना। इस संसार में कई थपेड़े लगेंगे, मेरे लाल ! परशु भव। तू कुल्हाड़ा बनना। विघ्न-बाधाओं, मुसीबतों-आकर्षणों को, पाप और ताप को काटने वाला हे वीर ! तू कुल्हाड़ा बनना। तू डरना मत। कायर मत बनना। दीन-दुःखियों का सहायक बनना। वह बल किस काम का जो दीन-दुःखियों के, सज्जन-सदाचारियों एवं संत महापुरुषों की सेवा में न लगे ?ʹ

अंत में पिता बोलता हैः हिरण्यमस्तुम् भवः। तू स्वर्ण की नाईं चमकना, मेरे लाल ! तू एक कोने में जंगली फूल की तरह खिलकर मुरझाना मत, वरन् तू गुलाब होकर महक तुझे जमाना जाने।ʹ

मेरे गुरुदेव ने एक बार गुलाब का फूल मुझे दिखाया और बोलेः

“देख, यह क्या है ?”

मैं- “गुरुदेव ! यह गुलाब का फूल है।”

गुरुदेवः “इसको किराने की दुकान पर ले जा और चावल पर, मूँग पर, धनिया, काजू, किसमिस, बदाम, अखरोट आदि पर रख, सैंकड़ों-सैंकड़ों चीजों पर रख, फिर सूँघ तो सुगंध किसकी आयेगी ?”

गुरुदेवः “बस, एक बात मान ले। तू गुलाब होकर महक तुझे जमाना जाने।

आप भी अपने पुत्रों को इसी प्रकार महकाने का प्रयास करें। कैसा दिव्य ज्ञान है हमारे महापुरुषों का ! कितनी महानता और उदारता है उनमें !

सन् 1661 में गुरु अर्जुनदेव ने गुरुग्रंथ साहिब संपन्न करवाया। उन्होंने यह ग्रंथ तो संपन्न करवाया लेकिन इतना बढ़िया ग्रंथ बनने से सब लोग खुश हो जायें यह संभव नहीं है।

जो गुरुद्रोही थे, निंदक थे उन्हें बढ़िया मौका मिल गया कुप्रचार करने का। भाई बुढा के द्वारा उस ʹग्रंथ साहिबʹ की सेवा सुश्रुषा का काम होता था। ʹग्रंथ साहिबʹ के वचन सुनकर समझदार तो संतुष्ट होते थे लेकिन जो गुरु के निंदक थे, संत के निंदक थे, धर्म के विरोधी थे, गुरुओं की करुणा-कृपा को दुकानदारी समझकर बदनामी करने में जो अपने को चतुर मानते थे ऐसे लोगों ने देखा कि यह अच्छा अवसर है। अतः उन्होंने अकबर को जाकर शिकायत की कि अर्जुनदेव ने एक ऐसा ग्रंथ बनाया है जिसमें मुसलमानों की निंदा है। वे अपने पंथ की स्थापना करना चाहते हैं।

ʹगुरु ग्रंथ साहिबʹ कोई मत नहीं है। वह तो वेदों का अमृत है। मत मति से निकलते हैं। यदि अर्जुनदेव अपनी मति से मुसलमानों के खिलाफ कुछ लिख डालते तो हम मानते कि वह मत है। किन्तु उन्होंने मति के अनुसार नहीं लिखा वरन् वेद और उपनिषदों का, पुराणों का प्रसाद उसमें लिखा है।

निंदकों के द्वारा कान भरे जाने पर अकबर ने फरमान जारी कियाः “अर्जुनदेव ने जो ग्रंथ बनवाया है उसे शाही दरबार में पेश किया जाये और हमारे सामने पढ़ा जाये।”

अर्जुनदेव के आदमी ग्रंथ लेकर दरबार में पहुँचे। अकबर बोलाः

“पढ़ो मेरे सामने यह ग्रंथ। देखूँ तो सही इसमें क्या लिखा है।”

ʹगुरु ग्रंथ साहिबʹ खोला गया। अकबर बोलाः “बीच का पन्ना पढ़ो।”

पन्ना क्या था ? वहाँ तो हीरा-मोती चमक रहे थे ! पन्ने में लिखा थाः

कोई बोले राम राम कोई कोई खुदाई।

कोई बोले सूफिया कोई अल्लाही।।

कारण करण करीम किरणधारी रहीम।

कोई नहावे तीरथ कोई हज जाई।।

कोई करे पूजा कोई सिर नवाई।

कोई  पढ़े वेद तो कोई किताई।।

कोई कहे तुर्की कोई कहे हिन्दू।

कोई बांचे बिस्तु कोई सिरजिन्दु।।

कह नानक जिन हुकुम पिछानिया।

प्रभु साहिब का तिन भेद जानिया।।

जिसने उस रब का, उस अकाल पुरुष का, उस चैतन्य का हुकुम पहचाना, उसी ने उस परमेश्वर का भेद जाना। बाहर से ये सारे मत-मतान्तर दिखते हैं तो कोई उसे कृष्ण कहता है तो कोई उसे करीम, कोई उसे राम कहता है तो कोई रहीम। कोई उसे तीर्थों में खोजता है तो कोई मंदिरों में और कोई उसे मस्जिदों में नवाजता है लेकिन जो उसके हुकुम को, उसकी सत्प्रेरणा को मानता है वही उस परब्रह्म परमात्मा को जानता है। यही ʹग्रंथ साहिबʹ की वाणी है।

आप जब सही करने लगते हैं, शास्त्रानुकूल करने लगते हैं तो भीतर से धन्यवाद छलकता है। इसको बोलते हैं अंतर्यामी अवतार। आपके हृदय में वह अकाल पुरुष अंतर्यामी रूप में अवतरित होता रहता है। हम अगर सात-सात गुफाओं में छुपकर भी बुरा कार्य करें, जहाँ हमें कोई भी न देख सके, वहाँ भी कोई देखने वाला होता है जो हमें कोसता है।

बल का हर्ता और बल का भर्ता वही परब्रह्म परमात्मा है। हम निःस्वार्थ कर्म करते हैं तो भीतर से हमारा बल बढ़ जाता है और हम उस रब के हुकुम की अवहेलना करके दूषित कर्म करते हैं तो हमारा बल कुंठित हो जाता है। यह सब भक्तों का अनुभव होगा।

कह नानक जिन हुकुम पिछानिया।

प्रभु साहिब का तिन भेद जानिया।।

अकबर ने कहाः “अच्छा, अब दूसरी जगह से पढ़ो।”

ऐसा करते-करते उसने अलग-अलग जगहों से पढ़वाया किन्तु कहीं भी कोई मत, मजहब और पंथ की बात नहीं थी। वहाँ तो थी जीवात्मा को परमात्मा का रंग लगाने की बात। अकबर भी दंग रह गया भारत के सदग्रंथ को सुनकर !

स्रोतः ऋषि प्रसाद, नवम्बर 1996, पृष्ठ संख्या 9,10,11 अंक 47

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परमात्मा प्राप्ति कैसे हो ? – पूज्यपाद संत श्री आसारामजी बापू


सर्व भूत-प्राणी एक ही परमात्मा में बसे हुए हैं और एक ही परमात्मा सब भूत-प्राणियों में है। जैसे, सारे घट आकाश में हैं और सब घटों में आकाश है, वैसे ही सब जीवों में आत्मा है और हर एक जीव आत्मा परमात्मा से ही अस्तित्त्व में है। दोनों में भिन्न कुछ भी नहीं, यह ज्ञान होना चाहिए।

हममें जीवनशक्ति जीवनदाता की ओर से ही आती है। बुद्धिमानों की बुद्धि, यशस्वियों का यश, तेजस्वियों का तेज, सौन्दर्यवानों का सौन्दर्य, वक्ताओं की वाणी और श्रोताओं की सुनने की जिज्ञासा-ये सब एकमात्र अंतर्यामी परमात्मा से ही प्रकट होता है।

तुलसीदासजी का श्रीरामचरितमानस, वेदव्यासजी का श्रीमदभागवत, शंकराचार्य जी का अद्वैतवाद और रामानुजाचार्य का विशिष्टाद्वैत का सिद्धान्त भी उसी सच्चिदानंद परमात्मा से ही प्रकट हुआ है। योगियों का योग, तपस्वियों का तप और भोगियों का भोग भी ईश्वर से ही सिद्ध होता है।

साहब तेरी साहबी घट घट रही समाय।

जैसे मेंहदी बीच में लाली रही छुपाय।।

लाली मेरे लाल की जित देखूँ उत लाल।

लाली देखन मैं गई मैं भी हो गई लाल।।

ऐसे चैतन्य परमात्मा की लाली देखने के लिए शरीर का अहंकार छोड़कर परमात्मा को ही समर्पित हो जाएँ। स्वामी रामतीर्थ कहते थेः

तुझको इतना मिटा कि,

तुझमें तू न रहे… द्वैत की बू न रहे।

मीराबाई भजन गाते-गाते गिरिधर गोपाल में इतनी खो जाती थी कि उन्होंने अपने देहाध्यास को ही मिटा दिया और अन्ततः सशरीर प्रभु में लीन हो गयीं। शबरी ने अपने गुरु वचनों में श्रद्धा की तो भगवान श्रीरामचन्द्र शबरी भीलनी के आँगन में आये और उसके जूठे बेर भी बड़े प्रेम से खाये।

कभी एकांत में बैठकर अपने श्वासोश्वास की गति को देखें और उस प्यारे को धन्यवाद देते जायें किः “तू ही इस शरीर में रहकर हृदय की धड़कनें चलाता है।ʹ कभी आसमान की ओर एकटक निहारें, चंद्रमा को एकटक निहारें और प्रभु को याद करें किः ʹमेरा प्यारा ही चंद्रमा में चमक कर औषधियाँ पुष्ट कर रहा है। उस सर्वसत्ताधीश की सत्ता से ही सब हो रहा है। जड़ और चेतन सबमें वही समाया है….ʹ ऐसा अनुभव करते जायें।

ईश्वरः सर्वभूतानां हृदेशेर्जुन तिष्ठति। ईश्वर तो सबके हृदय में एक समान है। हाँ, एक व्यक्ति के पास जो बल, बुद्धि या सौन्दर्य है वह शायद दूसरे व्यक्ति के पास नहीं भी हो सकता है परंतु जो परमात्मा महर्षि वशिष्ठ, संत ज्ञानेश्वर, मतंग ऋषि, बुद्ध, महावीर और मुहम्मद के हृदय में था, जो परमात्मा शबरी, मीरा, मदालसा और गार्गी के हृदय में था, वही-का-वही परमात्मा हमारे हृदय में भी है। जो अनुभव राजा जनक, कबीर जी अथवा नानक जी को हुआ है, वही अनुभव हमें भी हो सकता है। ऐहिक सुख-सुविधाओं का अनुभव भिन्न-भिन्न समय, परिस्थितिय और व्यक्ति के अनुसार भिन्न-भिन्न हो सकता है परंतु परमात्मप्राप्ति का अनुभव भिन्न-भिन्न नहीं होता।

संसार की चीजें अपूर्ण हैं इसलिए अपूर्ण प्रकृति के व्यक्ति और उऩका बल, बुद्धि, सत्ता, सौन्दर्य एक समान नहीं होते। परंतु ईश्वर तो सबके हृदय में पूर्ण है और वह सबको मिल सकता है लेकिन उसके लिए आवश्यकता है साधना, पुरुषार्थ और सत्संग की।

ईश्वरीय शक्ति प्राप्त करने के लिए हमारे शरीर में सात केन्द्र हैं। वे जितने अंश में विकसित होते हैं, उतना ही मनुष्य ऊँचा उठता है। कई लोग सोचते हैं कि ʹजो भाग्य में होगा, वही होगाʹ। मानो, हमारा भाग्य कोई आकाश-पाताल में से लिखकर भेजता हो। अगर किसी देव ने ही भाग्य बना दिया होता तो पुरुषार्थ का कोई प्रश्न ही नहीं रहता, सत्संग सुनने का यह सदग्रंथ पढ़ने का कोई सवाल ही नहीं उठता। ʹभाग्य में जो होगा, वह मिलेगा। भाग्य में होगा तो सुखी होंगे और भाग्य में मकान होगा तो मिलेगा। हमें कुछ करने की आवश्यकता नहीं है…ʹ यदि ऐसा ही हो तो घर बैठे-बैठे मकान लेकर देखो ? नहीं, मकान लेने के लिए प्रयत्न की आवश्यकता है। अरे ! खाना खाने के लिए भी प्रयत्न करना पड़ता है। सब्जी बाजार से लानी पड़ती है। फिर पकानी पड़ती है तब जाकर भोजन प्राप्त होता है। ऐसा नहीं कि ʹप्रारब्ध में आज भोजन होगा तो अपने-आप मिल जायेगा।ʹ यदि भोजन पाने के लिए भी पुरुषार्थ की जरूरत पड़ती है तो फिर अखिल ब्रह्माण्डनायक को पाने के लिए भी पुरुषार्थ परम आवश्यक है। इसलिए पुरुषार्थ करो और संतों का संग करो।

यह बात सच है कि पूर्व में की हुई प्रवृत्ति, विचार और कृति का फल हमारा आज का प्रारब्ध हो जाता है। किन्तु यह बात भी उतनी ही सच है कि पूर्व में किये हुए अशुभ कर्म को, अपने प्रारब्ध को आज के शुभ पुरुषार्थ के बल पर बदला जा सकता है। जैसे, कल का अजीर्ण आज के उपवास से मिटता है, कल का वैर आज की क्षमायाचना से मिटता है, कल का लिया हुआ कर्ज आज चुका देने से मिट जाता है, ठीक वैसे ही आज की हुई शुभ प्रवृत्ति से, आज के पुरुषार्थ से आनेवाले कल का प्रारब्ध बदला जा सकता है। इसलिए तुलसीदास जी ने लिखा है किः

करम प्रधान बिस्व करि राखा।

जो जस करइ सो तस फलु चाखा।।

रावण ने तप और अच्छे कर्म करके लंकाधीश का पद पाया लेकिन फिर दुष्कृत्य करके, माता सीता का हरण करके अपने सारे कुल का विनाश भी करवा दिया। उसके पूर्व के शुभ फल से उसे राज्य-वैभवरूपी शुभ फल मिला लेकिन अपने ही दुष्कर्म से पूर्व का पुण्य क्षीण होता गया और आखिर में उसे अपने दुष्कृत्य का दुष्फल भी भुगतना ही पड़ा। इसलिए मनुष्य को सदैव विवेकयुक्त पुरुषार्थ करना चाहिए और विवेकयुक्त पुरुषार्थ तभी हो सकता है जब हम शास्त्रीय वचनों के अनुसार चलें।

हमारे चित्त में हजारों जन्मों के संस्कार भरे हुए हैं। उन्हें बदलने की और मिटाने की योग्यता केवल मनुष्य जन्म में ही है। इस प्रकार मनुष्य जन्म अनंत जन्मों का आरंभ भी है और अंत भी। यदि शास्त्रानुसार जीवन नहीं जिया तो अशुभ कर्मों के कारण अनंत जन्मों तक मनुष्य भवबंधन में भटकता रहता है। अतः सत्शास्त्रानुसार पुरुषार्थ करके एवं प्रबल उत्साह रखकर हमें सत्कर्मों में लग जाना चाहिए, जिससे विघ्न डालने वाले पूर्वजन्म के अशुभ संस्कार हार जाएँ।

कुछ लोग ऐसा कहते हैं कि ʹजब सब प्राणियों को सत्ता देने वाला परमात्मा ही है तो अशुभ कर्म भी तो उसी की सत्ता से होते हैं।ʹ नहीं, हरगिज नहीं। यदि पाप और पुण्य करने की प्रेरणा ईश्वर ही देते तो पाप और पुण्य का फल भी ईश्वर को ही मिलना चाहिए, हमें नहीं।  परंतु ऐसा नहीं है। जैसे हमारे कर्म होते हैं उसी प्रकार के फल हमें भुगतने पड़ते हैं। गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं किः

 नादत्ते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभुः।

अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः।।

सर्वव्यापी परमेश्वर भी न किसी के पापकर्म को और न किसी के शुभ कर्म को ही ग्रहण करता है किन्तु अज्ञान के द्वारा ज्ञान ढका हुआ है, उसी से सब अज्ञानी मनुष्य मोहित हो रहे हैं। (गीताः 5.15)

भगवान कहते हैं कि में किसी को पुण्य या पाप की ओर नहीं ले जाता। अज्ञान से आवृत ज्ञान से मोहित होकर जीव जैसे-तैसे कर्म करके भवजाल में भटकता रहता है। वासनाओं का जैसा वेग होता है, कर्त्ताभाव से वैसे ही कर्म होते हैं और वैसा ही फल मिलता है।

ईश्वर पापकर्म का फल दुःख देकर, संसार से वैराग्य कराकर हमें शुद्ध करना चाहता है और पुण्यकर्म का फल सुख देकर सत्कृत्यों की ओर उत्साहित करना चाहता है। दोनों में ईश्वरीय कृपा सदैव हमारे साथ ही है।

मनुष्य जन्म देकर ईश्वर ने हमें कर्म करने की स्वतंत्रता दी है। अन्य चौरासी लाख योनियों में केवल कर्मफल भुगतने होते हैं जबकि मनुष्य जन्म  में कर्म भुगतने के अलावा नये कर्मों का सर्जन भी होता है। अतः ऐसे कर्म करें कि जिससे दुबारा जन्म न लेना पड़े।

निष्काम कर्म करने से अंतःकरण की शुद्धि होती है, अंतःकरण की शुद्धि से परमात्मप्राप्ति में सुगमता होती है, साथ ही,  ʹआत्मा क्या है ? परमात्मा क्या है ? आत्म-साक्षात्कार कैसे हो ? मुक्ति कैसे पाएँ ?ʹ ऐसे प्रश्न अंतःकरण में उठते हैं। जिज्ञासा होने से मनुष्य संतों के द्वार तक पहुँच सकता है और संतों के सत्संग से परमात्मज्ञान प्राप्त करके मुक्त भी हो सकता है।

जहाँ चाह वहाँ राह।

जीवन में कुछ चाहने योग्य, जानने योग्य हो तो वह है ब्रह्म-परमात्मा। जीव यदि ब्रह्म-परमात्मा को जान ले तो वह खुद ब्रह्ममय हो जाय और उसका बार बार माता के गर्भ में उल्टा लटकना सदा के लिए मिट जाए।

जन्मदुःखं जरादुःखं जायदुःखं पुनः पुनः।

अंतकाले महादुःखं तस्मात् जाग्रहि जाग्रहि।।

बाल्यावस्था में जीव को पराधीनता होती है। कोई खिलाये तब खाये, पिलाये तब पिये, कभी पेट में दर्द होता है तो बोल भी नहीं पाता ऐसा पराधीन जीवन होता है। जवानी में काम, क्रोध, लोभ जैसे दोष सताते हैं और बुढ़ापे में शरीर जर्जर हो जाता है, अशक्त हो जाता है, कान बहरे हो जाते हैं, आँखों की रोशनी कम हो जाती है। फिर भी जीव अपनी इच्छा, आकांक्षा, वासनाओं का त्याग नहीं करता और बार-बार कभी दो पैरवाली तो कभी चार पैरवाली माता के गर्भ में उल्टा लटककर असह्य दर्द सहता है। दुर्लभ मनुष्य जन्म मिलने पर भी जीव अज्ञानवश अपने को सुखी करने में ही जीवन गँवा देता है। आखिर में वृद्धावस्था आती है तब जीव सोचता है कि मृत्यु आये तब शांति, परंतु मरने में भी सच्ची शांति नहीं है। सच्ची शांति तो उस परमात्मपद में है जहाँ संतजन विश्रांति पाते हैं।

मरो मरो सब कोई कहे, मरना न जाने कोई।

एक बार ऐसा मरो कि फिर मरना न होई।।

एक बार संतों के चरणों में देहाध्यास छोड़कर ऐसे मरो कि फिर कभी मरना न पड़े। इस शरीर को ʹमैंʹ मानकर, ʹमैंने यह कियाʹ इस  भावना का जितना त्याग करते जाओगे उतने ही उन्नत होते जाओगे, दुःखों से मुक्त होते जाओगे। इसलिए यत्न करके, इस दुष्ट अहंकार का नाश करो। परमात्मा की सत्ता का अनुभव करते जाओ। फिर जैसे सूर्योदय होने से अंधकार नष्ट हो जाता है वैसे ही दृढ़ पुरुषार्थ से जिसके हृदय का अहंकार नष्ट हो गया है वह संसारसमुद्र से पार हो जाता है। इसलिए आज ही, इसी क्षण दृढ़ निश्चय करोः

न मैं हूँ न ही है और कुछ।

मुझसे जो है वह सब तू ही है।

सब कुछ ही है तुझसे।।

ʹमैंʹ, ʹमेरेपनेʹ का अहंकार निर्मूल होने से फिर केवल ʹवहʹ ही बचेगा और वही है परमात्मा-साक्षात्कार।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, नवम्बर 1996, पृष्ठ संख्या 3,4,5,6 अंक 47

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