उमा कहउँ मैं अनुभव अपना ।
सत्य हरि भजन जगत सब सपना।। ये
जगत सपना हैं.. बार-बार चिंतन करो ये सपना हैं। ये सपनाहैं।
जितना
सत्संग से लाभ होता हैं उतना एकांत में उपवास और व्रत करके तप करने से भी उतना लाभ
नहीं होता जितना सत्संग से होता हैं। जितना एकांत में जप-तप से लाभ होता हैं उतना
संसार में बड़े राज्य करने से लाभ नहीं होता हैं। संसार का वैभव संभालने और भोगने
में उतना लाभ नहीं होता जितना एकांत में जप-तप करने से लाभ होता है और जप-तप करने से
उतना लाभ नहीं होता जितना सत्संग से लाभ होता हैं और सत्संग में भी स्वरूप
अनुसंधान से जो लाभ होता हैं वो किसी से नहीं होता। इसीलिए बार-बार स्वरूप अनुसंधान
करता रहे। ॐ…
देखे
हुए, भोगे हुए में आस्था हटा दो। जो देखा, जो भोगा-
अच्छा भोगा, बुरा भोगा, अच्छा देखा,
बुरा देखा.. सब मार गोली। सब सपना हैं। न पीछे की बात याद करके, वो
बहुत बढ़िया जगह थी, ये ऐसा था, ये ऐसा
था, तो बढ़िया में, ऐसा में ये वृत्तियाँ उठती हैं, वृत्ति
व्याप्ति, फल व्याप्ति होते ही आप बाहर बिखर जाते हैं, अपने घर में नहीं आ सकते।
इकबाल
हुसैन पीठावाला के पास गया।
पीठावाला
माने शराब के पीठे होते थे,
दारू के अड्डों को पीठा बोलते हैं। दारू का पीठा होता हैं कि नही?
तो
महाराज। उसने पीया, खूब पीया और महाराज एकदम फुल्ल हो गया फुल्ल। फुल्ल समझते हो ना? नशे
में चूर। गालियाँ बकता हुआ, लालटेन को गालियाँ देता हुआ, सड़क को गालियाँ देता हुआ,
अपना घर खोजता-खोजता ठोकरें खाता-खाता महाराज बड़ी मुश्किल से कहीं थक के पड़ा और
दैवयोग से वही उसका घर था।
सुबह
हुई,
सूरज ऊगा। नशेड़ी जब उठता है तब सुबह हुआ उसका तो। ऐसा नहीं कि
ब्रह्मज्ञानियों का सुबह। नशेड़ी का सुबह, सुबह के नौ बजे।
सुबह
हुआ तो देखा कि वो पीठावाला का नौकर हाथ में लालटेन लिए आ रहा हैं। लालटेन तो यार
मेरा है, उसके हाथ में कैसे?
वह
नौकर आया, उसने कहा कि महाशय रात को आप लालटेन भूल गए थे और हमारा तोते का खाली पिंजड़ा
तुम लेकर आये लालटेन समझ कर।
घर
के बाहर जो फेंक दिया था वो पिंजड़ा तो पडा था ।
वो
पिंजड़ा तुम ले आये हमारा लालटेन समझकर। और वो समझता हैं मेरे हाथ में लालटेन हैं
और घर क्यों नहीं मिलता? लालटेन के बदले पिंजड़ा था।
ऐसे
ही अपनी वृत्ति जो हैं चैतन्य को नहीं देखती , वो लालटेन वृत्ति नही हैं।
संसार का पिंजड़ा बना दिया वृत्ति ने।
भटक मुआ भेदु बिना पावे कौन उपाय ।
खोजत-खोजत युग गये पाव कोस घर आय।।
कोई
कोई गरबा गाते हैं,
ये बजाते हैं-वो बजाते हैं लेकिन पिंजड़ा हाथ में रखते हैं। लालटेन
रखना चाहिए न? जाना चाहते हैं अपने घर में, सुखस्वरूप में लेकिन थककर बेचारे फिर वहीं। जब नशा उतरता हैं, जीवन की शाम होती हैं तब, अब तक क्या किया? अरे, कुछ
नहीं किया।
अरे,
ये आदमी तो पहले अंगूठाछाप था,बड़ा पढ-लिखकर विद्वान हो गया। बड़ा काम
कर लिया? अरे, कुछ नहीं किया।
ये
आदमी निर्धन था, अभी करोड़पति हैं, बड़ा काम कर लिया? कुछ नहीं, चिंता और
मुसीबत बढ़ाया और कुछ नहीं किया।
ये
आदमी को कोई नहीं जानता था अब लाखों आदमी इसको जानते हैं, बड़ा
नेता हो गया। अरे, कुछ नहीं किया, दो कौड़ी भी नहीं कमाई अपने लिये। हाय-हाय करके
शरीर के लिये और वही शरीर जलाकर जायेगा। क्या
किया?
मूर्ख
लोग भले ही कह
दे कि ये बड़ा विद्वान हैं, बड़ा सत्तावान हैं,
बड़ा धनवान हैं मूर्खों की नजर में लेकिन ब्रह्मवेत्ताओं की नजर,
शास्त्र की नजर, भगवान की नजर से देखो तो उसने
कुछ नहीं किया, समय गँवाया समय। उम्र गँवाई उसने और क्या किया?
मुसीबत मोल ली। ये सब इकट्ठा करने में जो समय खराब हुआ वो समय फिर
वापस नहीं मिलेगा उसको और इकट्ठा किया इधर ही छोड़ के जायेगा। क्या किया इसने? लेकिन आजकल समाज में बिल्कुल उल्टी चाल है। मकान-गाड़ी, वाह भाई वाह, इसने
तरक्की की। बस उल्टे मार्ग जाने वालों का पोषण हो रहा हैं। सच्ची बात सुनने वाले
भी नहीं मिलते, सुनाने वाले भी नहीं मिलते इसीलिए सब पच रहे
हैं अशांति की आग में। जगतनियंता ‘आत्मा’ अपने पास हैं और फिर भी संसारी दुःखी हैं तो उल्टी चीजों को पाने के लिए। सपने
के हाथी…
मन
बच्चा है इसको समझाना बड़ा… । युक्ति चाहिये।
एक
बार बीरबल आये दरबार में।
अकबर
ने कहा देर हो गई क्या बात हैं?
“हुजूर। बच्चा रो रहा था, उसको जरा शांत कर रहा
था।”
“बच्चे को शांत कराने में दोपहर कर दिया तुमने? कैसे
बीरबल हो।”
“हुजूर, बच्चे तो बच्चे होते हैं। राजहठ, स्त्रीहठ, योग हठ और बालहठ। जैसे राजा का हठ वैसे ही बच्चों का होता हैं महाराज।”
“बच्चों को रीझाना क्या बड़ी बात हैं?”
“बड़ी कठिन बात होती हैं।”
“बच्चे को रिझाना क्या हैं? यूँ (चुटकी में) पटा लो।”
“नही पटता महाराज। बच्चा हठ ले ले तो फिर। आप तो मेरे माई-बाप हैं मैं
बच्चा बन जाता हूँ।
“हाँ, तेरे को राजी कर देंगे।”
बीरबल
रोया-” पप्पा, पिताजी…”
अकबर-“अरे,
चाहिये क्या?”
बीरबल-“मेरे
को हाथी चाहिये।”
अकबर-“ले
आओ। हाथी लाकर खड़ा कर दो।”
राजा था, सक्षम था वो तो। हाथी लाकर खड़ा कर
दिया।
फिर
बीरबल ने रोना चालू कर दिया। ..”मेरेको देगड़ा ला दो।”
अकबर-“अरे, चलो एक देग मँगा दो।”
बीरबल-“हाथी देगड़े में डाल दो।”
अकबर-“कैसे? अरे, नही आयेगा।”
बच्चे का हठ और क्या? अकबर समझाने में लग गया।
अकबर बोले कि भाई मैं तो नहीं तेरे को मना सकूँगा। अब मैं बेटा बनता हूँ, तुम बाप बनो।”
बीरबल ने कहा ठीक है।
अकबर रोया।
बीरबल-“अब तो मेरे को पिता बनने का मौका मिला, बोलो बच्चे, क्या चाहिये?”
अकबर बोले-“हाथी चाहिये।”
बीरबल ने नौकर को बुलाया, कहा-“चार आने
के दो खिलौने वाले हाथी ले आ। एक नहीं दो ले आ।”
लाकर रख दिये- “ले बेटे हाथी।”
अकबर बोले-“देगड़ा चाहिये।”
बीरबल बोले-“लो।”
अकबर-“इसमें हाथी डाल दो।”
बीरबल-“एक डाल दूँ कि दोनों?”
अकबर-“दोनो रख दो।”
दोनों डाल दिये।
ऐसे ही मन बच्चा है। उसकी एक वृत्ति ऐसी उठी तो फिर वो क्या कर सकता
हैं। इसीलिए उसको ऐसे ही खिलौने दो जो आप उनको सेट कर सको। उसको ऐसा ही हाथी दो जो
देगड़े में रह सके। उसकी ऐसी ही पूर्ति करो जो तुम्हारे लगाम में रह सके, तुम्हारे कंट्रोल में रह सके। तुम अकबर जैसा करते हो लेकिन बीरबल जैसा
करना सीखो। मन बच्चा हैं, उसके कहने में ही चलोगे तो वो गड़बड़ कर देगा। उसको पटाने
में लगो ,उसके कहने में नहीं, उसको पटाने में। उसके कहने में
लगोगे तो मन भी अशांत रहेगा, बाप भी अशांत , बेटा भी अशांत
और उसको घुमाने में लगोगे तो बेटा भी खुश हो जायेगा, बाप भी
खुश हो जायेगा। देगड़े में हाथी डाल दें खिलौने के, बस ठीक हैं।
ऐसे ही मन की कुछ ऐसी-ऐसी आकांक्षाएँ होती हैं, ऐसी-ऐसी माँगे होती हैं जो माँग पूरी करते-करते जीवन पूरा हो जाताहै और उस
माँग से सुख मिला तो आदत बन जाती है और दुःख मिला तो उसका विरोध बन जाता है लेकिन
उस वक्त मन को फिर और कोई बहलावे की चीज दे दो, और कोई चिंतन
की चीज दे दो। हल्का चिंतन करता हो तो बढ़िया चिंतन दे दो। हल्का बहलाव करता हैं तो
बढ़िया बहलाव दे दो, नॉवेल पढ़ता हैं तो शास्त्र दे दो,
इधर उधर की बात करता हैं तो माला पकड़ा दो। वस्त्र अलंकार किसी का देखकर
आकर्षित होता हैं तो शरीर की नश्वरता का ख़्याल करो। किसी के अपमान को याद करके
जलता हैं तो जगत के स्वप्नत्व को याद करो। ऐसे, मन को ऐसे खिलौने दो जो आपको
परेशान न करें। अपन लोग उसमें लग जाते हैं, मन में आया ये कर दिया, मन में आया फैक्ट्री कर दिया, मन में आया ये कर दिया।
करते-करते फिर फँस जाओगे। संभालने की जवाबदारी बढ़ जायेगी। अंत में देखो तो कुछ
नहीं। जिंदगी उसी में पूरी हो गई। अननेसेसरी नीड (Unnecessary need) बिन जरूरी आवश्यकताएँ । इसीलिए कबीर ने कहा-
साँई ते इतना माँगिये जो नौ कोटि सुख समाय।
मैं भी भूखा न रहूँ, साधू भी भूखा न जाय।।
सियावर
रामचंद्र की जय। ऐसी अपनी आवश्यकता कम करो। बाकी का समय जप में, आत्मविचार
में , आत्मध्यान में, कभी-कभी एकांत
में, कभी सत्कर्म में, कभी सेवा में। अपनी व्यक्तिगत
आवश्यकता कम करो तो आप स्वतंत्र हो जायेंगे। अपने व्यक्तिगत
सुख-भोग की इच्छा कम रखो तो आपकी मन की चाल कम हो जाएगी। परहित में चित्त को,
समय को लगाओ, वृत्ति व्यापक हो जायेगी। परमात्मा के ध्यान में लगाओ, वृत्ति शुद्ध हो जायेगी । परमात्मा के तत्व में लगाओ, वृत्ति के बंधन से आप निवृत्त हो जायेंगे। भाई, सत्संग में तो हम आप
लोगों को कमी रखने की कोशिश नहीं करते।
वास्तव में इस जीव
का साथ तो सत के साथ है,
बाकी सब असत संग हैं, असत मान्यता हैं कि मेरे
ये साथी है.. मेरा जीवनसाथी हैं, मेरा जीवनसाथा है। सचमुच
में तो जीवनसाथी परमात्मा के सिवा और कोई हो ही नही सकता। वास्तविक जीवन तो परमात्मा
हैं। शरीर वास्तविक जीवन नहीं है तो वास्तविक जीवन का साथी कौन होगा? ये असत का संग जो घुस गया है अंदर उसको निकालें.. बढ़िया व्यवहार होगा।
दीए की रोशनी में जो व्यवहार होता है, धुँधला होता है और उसके बुझने
का डर होता हैं और बुझ ही जाता हैं तेल ना डालो तो। और तेल कब तक सींचते रहोगे?
दीया बुझता रहता है फिर जलता रहता है, बुझता
रहता है फिर जलता रहता है, ऐसे ही असत संग बनता रहता है, बिगड़ता रहता है, बनता रहता है बिगड़ता रहता है। सूरज
की रौशनी होते ही दीए के प्रभाव सब उसी में तिरोधाहित हो जाते है। ऐसे ही
आत्मसूर्य के प्रकाश में जीओ तो जीवत्व के सारे प्रभाव उसमें तिरोहित हो जाएँगे। ये
सब बल्ब अभी जोर मार रहे है, आहा! रौशनी दे रहे हैं, बेचारे दाता हैं लेकिन दो घण्टे के बाद देखो तो इनका
क्या हाल होता है! सूर्य की रोशनी आते ही देख लो सब नन्हे हो जाएँगे । ऐसे ही आत्मसूर्य
में नहीं जगे तब तक… अरे! कि.. ये तो दसवीं पढ़ता हैं मैं तो आठवी वाला हूँ,
दसवीं वाला बोलता है ये तो बी.ए है मैं तो दसवीं हूँ, बी.ए वाला बोलता हैं ये तो एम.डी. है मैं तो
केवल बी.ए. हूँ, इसके पास तो दो
मकान है, चार गाड़ियाँ है, मेरे पास तो खाली एक है लेकिन ज्ञानसूर्य उदय होने दो तो
जैसे सारे छोटे-मोटे बल्ब और दीए उसमें समा जाते है, ऐसे ही
तुम असत की आसक्ति छोड़कर सत्य के ज्ञान में आ जाओ तो तुमको लगेगा – सारे बी.ए
वाले, एम.डी वाले, दो
गाड़ी वाले, दस गाड़ी वाले, पच्चीस गाड़ी
वाले सारे मुझ चैतन्य में खेल रहे हैं! सोहम्… शिवोऽहं!
उस ईश्वर के प्रसाद से, ईश्वर के नाम भी ऋषियों ने गजब के रखे हैं!
ऐसे खोज लिए हैं कि उस नाम का प्रभाव अपने रक्त के कण पर पड़े, अपने मन पर पड़े, अपनी बूद्धि पर पड़े। गए दिन, यूरोप
में कुछ रिसर्च करने वालों ने क्या करा.. एक गायिका थी । उसने सामवेद की ऋचाओं का
अध्ययन किया था और उसने सुन रखा था भारतीय शास्त्रों से कि शब्द के पीछे आकृति
होती
हैं, शब्द के पीछे उसका प्रभाव होता है। भले
गलत शब्द बोलो, गंदा बोलो फिर भी
गाली का असर होता है। अभी मैं एक दो कटु गाली दूँ तो तुमको लगेगा अरे! बापू ऐसा बोलते
हैं? है तो झूठमूठ! है तो शब्द! दो शब्द मीठे बोले- कैसे हो
क्या हालचाल है? बहुत दिन के बाद आये, बड़ी कृपा किया दर्शन
दिया…। आप लोग बोलोगे- देखो बापू कितने अच्छे हैं और… अरे क्या गाँव-गाँव मे घूमते…
फिर इधर से सिर खपाने को आ गए सुबह सुबह, हट…। है तो शब्द ही लेकिन कैसा असर होता
है!
तो शब्द निकलते जहाँ से हैं वहाँ चैतन्य है और शब्द सुनकर जहाँ उसका
असर पड़ता है वो चैतन्य है! चैतन्य के स्पन्दन हैं इसीलिए उसका असर हो जाता हैं। …तो,
हैं तो तरंग मिथ्या, पानी ज्यों का त्यों लेकिन
जब तरंग होता हैं तो पानी का सही नमूना दिखता ही नही! ऐसे ही चित्त तरंगित होता
रहता हैं असत संग से, इसीलिए आत्मा का सही स्वरूप दिखता नहीं और आत्मा का सही
स्वरूप दिखता नहीं इसीलिए दुःख मिटता नहीं। दुःख मिटता नहीं, चिंता जाती नहीं, वासना मिटती नहीं तो सत का संग
करें, वासना मिटेगी। वासना मिटेगी तो दुःख जाएगा और
दुःख जाएगा तो सुख का लालच भी जाएगा, दुःख का भय भी जाएगा। सुख का लालच और दुःख का
भय, ये दोनों असत के संग से आते हैं।
असत संसार, मिथ्या शरीर को ‘मैं’ सच्चा मानते
हैं, मिथ्या भोग को सच्चा मानते हैं, मिथ्या
संबंध को सच्चा मानते हैं, असली सच्चे सबंध का ज्ञान नहीं। पूजा-पाठ भी करते हैं, नमाज
भी अदा कर लेते हैं, चर्चों में जाकर प्रार्थना भी करते हैं,
मंदिरों में जाकर पूजा भी करते हैं लेकिन असत के संग को त्यागने पर
ध्यान हम लोग नहीं देते, इसीलिए पूर्णता का अनुभव नहीं होता।
असत के संग का, असत के प्रभाव का पोल खोल दे,
ऐसा जब सत्संग मिलता हैं, असत के प्रभाव का पोल खोल दे ऐसा
जब हम दृढ़ता से लगते हैं तो फिर इस असत संसार में, असत संबंधों
में रहते हुए भी- असत आकर्षण, असत चिंता, असत भय, असत शोक आपके ऊपर असर नहीं करेगा क्योंकि आप
सत्य में खड़े हैं। जीरो बल्ब बुझ गया या पच्चीस का बुझ गयाया पचास का चालू हो गया या सौ का लाईट चालू हो गया
लेकिन आपको मध्यान्ह का सूर्य हैं तो उनका क्या फरक पड़ता हैं? चालू होवे चाहे बंद होवे, चाहे छोटा बने चाहे
बड़ा बने। ऐसे ही साक्षी सच्चिदानंद परमेश्वर तत्व का
ज्ञान देने वाले कोई विरले ब्रह्मज्ञानी गुरू होते हैं! उनमें जब दृढ श्रद्धा होती
हैं … । और श्रद्धा के बिना तो मनुष्य पशु से भी बदतर हैं ।
खाना पीना और
शारीरिक संभोग करना,
मुसीबत आए तो डर जाना, ये तो पशु भी करता हैं
लेकिन मनुष्य में एक खतरा और भी ज्यादा है, पशु करता हैं तो बेचारा निखालस करता
हैं, खुले मैदान करता हैं जो भी कुछ करता हैं। खाता-पीता हैं
तो खा लिया फिर संग्रह नही करता है उसे। उं… उं… उं… ओं… ओं… ओं… कर लिया
तो कर लिया लेकिन मनुष्य तो अच्छा करता है तो दुनिया-भर को दिखाता है और बुरा करता
हैं तो किसी को पता न चले। इतना पैसा है- किसी को पता न चले, क्या है-किसी को पता
न चले तो ये असत के ऊपर और असत वस्तुओं के लिए और अपने आत्मा को कमजोर करता जाता
हैं। इसके लिए मनुष्य के लिए झंझट ज्यादा हैं फिर भी मनुष्य श्रेष्ठ हैं क्योंकि
वो पशु-पक्षी जो हैं वो असत का संग त्यागने का सत्संग नही सुन सकते! असत के प्रभाव
को अपने मन से हटाने की विद्या वो नही समझ सकते हैं और मनुष्य समझ सकता हैं इसीलिए
मनुष्य श्रेष्ठ हैं।
कौआ पचास वर्ष से
जिस ढंग से जैसा घोंसला बनाता हैं ऐसे ही
बनाता रहता हैं सैकड़ों वर्षों से। गाय कभी गाली नहीं देती और कौआ कभी मुकदमा नहीं
लड़ता और दीवाल किसी की चोरी नहीं करती लेकिन जहाँ हैं वैसे के वैसे हैं। मनुष्य
गाली भी देता हैं,
केस-मुकदमा भी करता हैं, चोरी भी करता हैं,
झूठ भी बोलता हैं, क्या-क्या करता हैं फिर भी
अगर सत्संग मिल जाता हैं और वो मुड़ जाता हैं तो वाल्या लुटेरा में से वाल्मीकि
ऋषि हो जाता हैं, महामूर्ख में से महाकवि कालिदास प्रगट हो जाता हैं। ऐसा कौआ कोई हो
गया क्या? चिड़िया हो गई क्या? अगर कहीं
हुआ कागभूसंडीजी जैसा तो उन्होंने असत के संग का त्याग करने की बूद्धि पाई,
गुरुओं का सत्संग पाया।
तो अब आज के सत्संग में हम ये समझेंगे कि दुःख असत हैं! इसीलिए दुःख
आ जाए तो असत से डरो मत। सुख असत है। सुख मिले तो उसको चिपको मत। संबंध असत हैं, कोई
आता हैं तो एक सलाम, जाता है तो सौ सलाम और कभी दुनिया में नहीं आता तो हजार सलाम!
मुक्त हो गया।
“हाय रे मेरे पिता,
हाय रे मेरे पापा, हाय रे मेरी पत्नी, हाय रे मेरा पति” ऐसा करने की अपेक्षा जब उसकी याद आए तो कह दो कि
अब्बाजान तुम्हारा शरीर गया लेकिन तुम्हारा आत्मा अथवा तुम्हारे अंदर में जो खुदा
हैं जिसकी शक्ति से धड़कने चलती हैं उसी का तुम चिंतन करो। बेटे-बेटियों का क्या
होगा… अब्बाजान फिकर न करो और तुमको भले कब्र में पुर के आए लेकिन तुमको हम नही
पुर सकते, तुम्हारे शरीर को कब्र में पुरा है, कितनी भी बड़ी मजार
बना लेंगे ,अंदर में तो सडी हुई हड्डियाँ, मांस और गँदगी
होगी लेकिन तुम्हारी रूह, आत्मा अमर है, अपने परमात्मा को
जानो, अपने चैतन्य का चिंतन करो- फिकर न कर्तव्यम
अब्बाजान। कर्तव्यम जिकरे खुदा! खुदाताला प्रसादेन सर्वकार्यं फतेह भवेत्… जब
तुम खुद खुदा के चरणों में जाओगे, हमारे कार्य फतह हो
जाएँगे! ऐसा बोलो अपने अब्बाजान को या अपने जो भी गया उसको।
ऐसे ही मन को भी सिखाओ – फिकर न कर्तव्यम…फिकर न करो …
हे च फिकर मत कर्त्यव्यम, कर्त्यव्यम जिकरे खुदा… उस ईश्वरत्व का जिक्र करो।
ईश्वर कैसा है? ईश्वर साक्षी हैं! ईश्वर मेरा है, मैं ईश्वर का हूँ! ईश्वर ज्ञानस्वरूप हैं। वह रोम-रोम में रम रहा हैं, उसका चैतन्य स्वभाव है
इसीलिए वो चैतन्य रोम-रोम में रमनेवाला राम है।
गले में तो साँप
हैं,
भुजाओं में साँप, कमर में तो वाघंबर है, माला तो
मुंडों की, भभूत लगाई हुई शमशान की …ये भगवान शिव के दर्शन
से क्या पता चलता हैं? कि हाथों में, गले
में संसार रूपी सर्प हैं। अंग को जो रमाया है, किसी साधारण आदमी की भभूत नहीं,
जिन्होंने असत संग का त्याग करके देह को असत मानकर, मर गया तो मर
गया खाक हो गया तो हो गया और मैं अमर आत्मा हूँ ऐसा अनुभव किया , ऐसे महापुरुषों की राख शिवजी लगाते हैं अपने अंगों पर और “शिव”
बोलने मात्र से…
पार्वती ने कहा
अपने पिता को कि तुम उनको नीचा दिखाने के लिए यज्ञ कर रहे हो लेकिन तुम मूर्ख हो। जिस
भगवान शिव का स्मरण करने मात्र से आदमी निष्पाप होता हैं, ऐसे
शिव की महिमा तुम नही जानते। तुम व्यवहार में तो बड़े दक्ष हो, लोकपालों के भी अग्रणी हो, लेकिन परमार्थ में तुम
मूर्ख हो। जो व्यवहार की चीजें छूट जाएगी और जो शरीर मर जाएगा, जल जाएगा उसका मान-अपमान थोड़ा हो गया तो उसी में मरे जा रहे हो। शरीर पहले
नही था, बाद में नही रहेगा। बचपन भी पहले नही था,तो अभी नही हैं.. बीच में आ गया… इस जन्म के पहले बचपन कहाँ था? और अभी बचपन कहाँ हैं, जवानी हैं। कुछ समय के बाद जवानी कहॉं है, बुढापा
हैं। ऐसे ही मृत्यू भी एक पड़ाव हैं। मृत्यू कहाँ हैं? रूपांतर
हैं। तो हेच फिकर न कर्त्यव्यम…हाय रे हाय मैं बूढ़ा हो गया हूँ हाय रे
हाय मेरा यह हो गया फिकर न कर । जहाँ बुढ़ापे का असर नहीं हैं, जहाँ बीमारी का असर नहीं हैं, जहाँ दुःख का असर नहीं,
जहाँ सुख का असर नहीं,जहाँ मान का असर नहीं,जहाँ अपमान का असर नहीं, जहाँ मृत्यू का असर नहीं,
जहाँ इस नश्वर देह की कोई सत्यता ही नही हैं, उस
परमात्मा का जिक्र करो! वो शिवस्वरूप हैं , कल्याण स्वरूप
हैं। वो रोम-रोम में रम रहा हैं इसीलिए वो रामजी हैं। ये इसकी अष्टधा प्रकृति से
ही शरीर बना हैं।वह चैतन्य इसलिए जगदम्बा है । जगत की माँ हैं।
भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च।
अहङ्कार इतीयं मे
भिन्ना प्रकृतिरष्टधा।।गीता 7.4।।
इसीलिए श्रीकृष्ण आनंदित रहते हैं, निश्चिन्त
रहते हैं, निर्भिक रहते हैं, माधुर्यमय
रहते हैं ,विकारी
वातावरण में रहते हुए भी निर्विकार रहते हैं श्रीकृष्ण! उद्वेग के विचारों में
रहते हुए भी श्रीकृष्ण सदा बंसी बजाते रहते हैं , माधुर्य
छिड़कते रहते हैं ।अशांत आदमी क्या देगा? अशांति देगा । बेईमान
आदमी क्या देगा?बेईमानी देगा! चिंतित आदमी से बात करो तो वही
कचरा देगा! और कृष्ण को देखो सोचो सुनो पढ़ो तो वही देगा ज्ञानस्वरूप!
ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः।
जीव लोकों में, सब में मैं व्याप रहा हूँ।ये सनातन अंश हैं। किसीने
बोल दिया तेरा नाम प्रेमजी हैं, तेरा नाम फिरोज हैं, तेरा नाम मोहन हैं… तेरा नाम वो है, तेरा नाम कौशिक है, बस पक्का कर दिया..
लेकिन ये तो शरीरों के नाम है कमला, शांता,मंगला जो भी नाम रखते .. आजकल तो कैसे नाम रखते हैं टीनू, विकी, मीनू, बबलू…। नाम रखो
भगवतयाद आए! उड़नेवाले प्राणियों का नाम पक्षी रख दिया देखो भगवान की याद आए। चार
पैर वाले प्राणियों का नाम पशु रख दिया ताकि भगवान की याद आए। तो उसी का जिकर हो,
उसी का चिंतन हो , तो आदमी चिंताओं से मुक्त
हो जाएगा, भय से मुक्त हो जाएगा, आकर्षण
से मुक्त हो जाएगा, बेईमानी से मुक्त हो जाएगा, शोषण करने से मुक्त हो जाएगा और शोषित होने से मुक्त हो जाएगा, बुद्धि खुलेगी! अभी तो जरा-जरा बुद्धि हैं टिमटिमाती दीए जैसी लेकिन मध्यान्ह
का सूर्य तो सबको एक जैसा मिलता हैं! ऐसे ही जो ज्ञानी हो जाते हैं उनकी बुद्धि तो
बड़ी विलक्षण होती हैं। सूर्य को उदय करना हैं कि अब टिमटिमाते दीए में झोंके खाने
हैं मर्जी तुम्हारी हैं। बोले- “महाराज! हमारी मर्जी
हैं ज्ञान का सूर्योदय करने का। महाराज! देखो सूर्योदय भी नहीं हुआ। वहाँ तो इस
समय तो बेड टी होती हैं, यहाँ तो महाराज!ठिठुर रहे
हैं।”
अब बेड टी मिथ्या हैं, ठिठुरना भी मिथ्या हैं
लेकिन सत्यरूपी सूर्य के लिए जो कुछ करते हैं वो कम हैं और जो कुछ करते हैं वो
पूरा ज्यादा हैं क्योंकि भगवान के लिए कर रहे हैं…। जो कुछ करते हैं वो कम हैं और
जो कुछ करते हैं वो ज्यादा हैं? हाँ! उस ईश्वर के लिए जो भी
कुछ करते हैं वो कम हैं क्योंकि कहाँ तो जगत नियंता, कहाँ वह
सूर्य और कहाँ तुम्हारे दीए! कहाँ वो ब्रह्मा, विष्णु ,महेश का आधार। उसके लिए तुमने जरा जल्दी नहा लिया, जरा
जल्दी आ गए या चार दिन की शिविर भर ली.. । करोडों-करोड़ों जन्म ऐसे ही बर्बाद हुए
हैं तो इस जन्म में कई दिन बर्बाद हो गए, कई रातें बर्बाद हो
गई, कई सप्ताह और कई महीने , कई वर्ष
बर्बाद हो गए! तो उस परमेश्वर के लिए चार दिन निकाले तो बहुत थोड़े हैं और फिर जिसके
लिए निकाले हैं वो चार दिन थोड़े होते हुए भी बहुत हैं क्योंकि बड़े व्यक्ति को चार
रोटी ख़िला दो, अपने घर प्राइम मिनिस्टर आए चार रोटी ख़िला दी, पूरी ख़िला दी तो बहुत हैं! हैं कि नही? अरे! खाली
पानी भी पी लिया उसने प्राइम मिनिस्टर ने आकर, राष्ट्रपति ने
आकर तुम्हारे घर पे पानी भी पी लिया अथवा चार मिनट बैठ भी गया तो तुम्हारी इमेज बन
जाती हैं। ऐसे ही उस परब्रह्म परमात्मा में तुम आए, थोड़ा समय
दिया तो बहुत कम दिया फिर भी जिसके लिए दिया तो बहुत हो गया, संसार की नजर से देखें तो ये बहुत हो गया। मरते समय भी ये संस्कार याद आए
तो हजारों जन्म की मजदूरी मिट जाएगी! ऐसा ये परमात्म तत्व का ज्ञान हैं। शास्त्र
में तो यहाँ तक लिखा हैं कि घड़ी भर उस आत्मज्ञान का श्रवण करें और सत्रह निमेष
उसमें विश्रांति पाए तो बाजपेई यज्ञ करने का फल होता हैं । एक घड़ी उस आत्मज्ञान का श्रवण करके उसमें
विश्रांति पाए तो राजसूय यज्ञ करने का फल होता हैं! तो बहुत हो गया न? राजसूय यज्ञ करने में तो लाखों करोड़ों रुपए खर्च करो और फिर घोड़ा छोड़ो ,
उस घोड़े को कोई नहीं रोके, अजातशत्रु हैं आप
तो हो गया यज्ञ पूरा। रामजी के घोड़े को लव-कुश ने रोक लिया था और युधिष्ठिर के
घोड़े को भी रोक लिया ताकि इस बहाने अर्जुन के दर्शन होंगे और अर्जुन को छुड़ाने के
लिए प्यारा परमात्मा आ जाएगा कृष्ण। उतना ही
पुण्य कहा गया हैं इस सत्यस्वरूप ईश्वर का ज्ञान सुनकर उस आत्मा में विश्रांति पाने
से । बहुत हितकारी हैं! जैसे दुकानदार हैं न दिनभर में पाँच सौ का धंधा करता हैं,
उसकी एवरेज है 400-500-600 में घूमता हैं। और एक दिन सुबह-सुबह कोई
आ गया, शादी का सामान ले गया 1200 का धंधा हो गया, तो क्या दुकान बंद करके घर थोड़े ही जाएगा! और भी करेगा! ऐसे ही तुम्हारे बारह
महीने के पाप-ताप मिटाए ऐसी बोहनी हो गई तो क्या साधन भजन बंद कर दोगे क्या?
ये तो बोहनी हुई हैं, अभी तो ग्राहकी और भी
करना हैं!
हनुमान प्रसाद पोद्दार के यहाँ बहुत लोग सेवा करते थे, काम करते थे, नौकरी धंधा जो भी करते थे। तो कोई-कोई
चोरी भी करता था या कोई कामचोरी करता हैं, कोई कुछ भी करता
हैं। जब वह पकडा जाता था तो उसको बुलाते थे…भाई देखो! तुम चोर तो नहीं हो
…वास्तव में क्योंकि आत्मा तो सदा साहुकार हैं! कितना भी कोई आदमी
चोरी करता हैं उसको बोलो तू चोर हैं तू ऐसा हैं तो उसको पसंद नहीं पड़ेगा! लेकिन तू
तो सज्जन हैं, तू चैतन्य हैं, भाई तेरे
में गुण हैं ,तो अच्छा लगेगा। उसको अपना बनाकर वो सुधारते
थे। बोले- देखो! आप वैसे तो चोर नहीं लेकिन आप को थोड़ी जरूरत पड़ी होगी इसीलिए जरा
थोड़ा गलती हो गया। ये लो पाँच सौ रुपए। वो बोलते हैं चालीस रुपए चुराए लेकिन तुमने
चुराए नहीं, तुमको बहुत जरूरत थी इसीलिए जरा युक्ति से ले
लिए। ये पाँच सौ रुपए जेब में रखो और दुबारा दूसरों को कहने का मौका न मिले ,अपना दिल न बिगड़े आप ऐसी कोशिश करो!”
उस आदमी को ईश्वर का जिकर, परमात्मा के भाव से,
परमात्मा हैं उसमें इस भाव से उस आदमी को प्रेम से जब समझाते तो वो
आदमी फूट-फूट के रोता और उसकी गलती निकल जाती। या दूसरी कोई गलती करता तो- भाई!
देखो ! ये लोग बोलते हैं कि तुमने प्रेस में ये छाप काम में ये गलती किया, ये गलती है, अब अपने को ये गलती अच्छा तो नहीं लगता। ध्यान देना चाहिए
अपनी गलती हो गई हैं तो। दूसरों को आपकी गलती कभी दिखे नहीं ऐसे आप सतर्कता से काम
करो। ऐसा आप काम करो कि लगे कि फलाने आदमी ने काम किया। ऐसा करके उसको समझाते। पवित्र
दिल होते तो जल्दी मान जाते, नहीं तो मूरख तो ताड़न के
अधिकारी होते हैं!
तो अपने जीवन में असत के संग का आकर्षण छोड़ते जाएँ।असत के संग का
आकर्षण छूटते ही सत के सुख का रस आने लगेगा, सत का ज्ञान
विकसित होने लगेगा। ज्यों-ज्यों रात मिटती हैं त्यों-त्यों सुबह आने लगती हैं। ज्यों-ज्यों
रात्रि क्षीण होती जाती हैं त्यों-त्यों प्रकाश बढ़ता जाता हैं। रात्रि क्षीण हुई
पूरी तो प्रकाश पूरा! तो असत की आसक्ति बढ़ाने वाला जो संग हैं उसको दिन में कई बार
आपको झाड़ना पड़ेगा, धोना पड़ेगा। बहुमति क्या हैं कि असत के
संग की बहुमति हैं। देखो मेरो को ये मिल गया, फलाने ने ये
कमाया। मेरा भाई भी बेचारा दिन-भर उसीमें था और आकर मेरे को कहता कि -तुम यहाँ
आँखे मूँद के बैठे हो! फलाने लोगों ने इतना कमा लिया ,तुम
मेरेको छोड़ दिया, इधर आँखे बंद करके बैठे हो! वो देखो इतने
हो गए, अपन देखो यहीं के यहीं! तू बड़ा भगत, कर कसर से जीयो, भाव ज्यादा न लो, धंधा
बढ़ाओ नही, ये नही करो, वो नही करो.. ये
सब तेरी सीख सीख कर अपन तो वही के वही रह गए! और वो लोग कितना ऊपर चढ़ गए! “
अब जो ऊपर चढ़े उनका तो दीवाला भी निकला! और ये बेचारा रिदम से चलता
था तो अभीतक चलता ही रहा! मैंने तो सुना हैं कि वे लोग जो बोलते हैं हमने बहुत
कमाया, बहुत पा लिया वो लोग बेचारे असत वस्तुओं को इतना महत्व
देते हैं सत का तो दब गया- सुख शांति। जो पहले नहीं था बाद मे नहीं रहेगा उस पद को
पाकर अपने को बड़ा मानते हैं। जो पहले नहीं था बाद मे नहीं रहेगा उन डिग्रियों को
पाकर अपने को बड़ा मानते हैं तो शास्त्रकार तो कहते हैं उन्होंने असली बड़प्पन अपना
दबा दिया, असली बड़प्पन खो दिया। इसीलिए इन असत बड़प्पन को
अपने ऊपर थोप रहे हैं। तो जो थोप रहे हैं उन पर तो दया आती हैं लेकिन जिनपर नकली
असत ज्यादा थोपा हैं अौर उनको जो बड़ा मानते हैं, उन पर तो
ज्यादा दया आती हैं। जो असत वस्तुओं को अपने पर थोपकर अपने आप को खो बैठे हैं उनपर
तो दया आती ही हैं, लेकिन अपने आत्मसुख को खोए हुए को बड़ा
मानकर जो लोग उनसे प्रभावित और आकर्षित रहते हैं उनपर तो ज्यादा दया आती हैं। अगर
उनको हम बेवकूफ नहीं कहे तो हम खुद ही बेवकूफ हो जाते हैं। उनकी बेवकूफी को हम
बेवकूफी नहीं मानते तो हम खुद ही बेवकूफ हो जाते हैं। कर्तव्य है जिकर करना ईश्वर का
, कर्तव्य हैं मौत आये उसके पहले अमरता का स्वाद लेना ,
कर्तव्य हैं कि घड़ी में दुःख घड़ी में सुख आने वाले चित्त को बदलना,
ये हमारा कर्तव्य हैं! घड़ी-घड़ी बात में टेंशन , घड़ी-घड़ी बात में दुःख, घड़ी-घड़ी बात में मुसीबत,
घड़ी-घड़ी बात में फड़फड़ाता हैं दिल ! ये तो कर्तव्य हैं असली, ईश्वर
का जिक्र करना परमात्मा का, ब्रह्म का लेकिन उसकी ओर तो
ध्यान जाता ही नहीं, जो फिक्र बढ़ाये वो ही बातें सुनते हैं, जो
फिक्र बढ़ाये वो ही बातें करते हैं, जो फिक्र बढ़ाये वो ही
बातें सोचते हैं! और जो फिक्र-फिक्र में जीवन बर्बाद कर दे, ऐसे ही संग में रहते
हैं इसीलिए ईश्वर को पाना कठिन लग रहा हैं। वास्तव में ईश्वर पाना कठिन नहीं हैं लेकिन
जिनको कठिन नहीं लगता हैं ऐसों का संग, ऐसों के अनुभव के
अनुसार सोचना-विचारना नहीं हैं इसलिए कठिन लग रहा हैं। ईश्वर तो अपना जिगरी जान
हैं।
बड़े-बड़े महलों में रहने से आदमी बड़ा नहीं होता, बड़े भाषण करने से आदमी बड़ा नहीं होता अथवा आकाश में हेलीकॉप्टरों में, हवाई जहाजों में उड़ने से आदमी बड़ा नहीं होता, बड़े विचारों से आदमी बड़ा होता है। छोटे विचारों से आदमी छोटा होता है। ब्रह्म के विचार करो “मैं कौन हूँ? यह शरीर आखिर कब तक रहेगा? ये संबंध कब तक रहेंगे? मैं नित्य हूँ, ये अनित्य है। मैं एकरस हूँ, ये अवस्थाएँ बदलने वाली है। मन भी बदलता है, बुद्धि के निर्णय भी बदलते है, मैं अ-बदल हूँ, वह कौन हूँ? सत्संग में सुना है कि अ-बदल तो आत्मा है, तो मैं वही हूँ, ये बड़े विचार है। तो फिर अ-बदल में टिकने का अभ्यास करो, महान बन जाओगे! ऐसे महान, ज्ञानवान, अलग-अलग प्रारब्ध है, अलग-अलग अपनी मौज है। कई ऐसे ज्ञानवान है जो कंदराओं में बैठे है, समाधि कर लिया, स्वरूप को जानकर उसमें विश्रांति…। कई ऐसे है कि लीला करते है, उपदेश करते है। कई ऐसे है विनोद करके जीवन बिताते है, कई पागलों का वेश धरकर बैठे है। कई ऐसे ज्ञानवान है जो नित्य-नियम, जप-तप, कर्म करते है वैसे व्यवस्थित ताकि दूसरे लोग भी उधर की तरफ मुड़ जाएँ, कईयों का ऐसा स्वभाव होता है। कई ज्ञानवान अपने-अपने ढंग से बोध होने के बाद शेष जीवनयापन करते है लेकिन स्वरूप में जग गये, एक बार परमात्मा का दर्शन हो गया, ज्ञान हो गया फिर सारी प्रकृति, सारी परिस्थितियाँ उनके लिए खिलवाड़-मात्र हो जाती है, विनोद-मात्र हो जाती है।
आश्चर्यो त्रिभुवनजयी… श्रुति कहती है
वो आश्चर्यकारक है। बाले बालवतां यूवे युवा… बच्चों में बच्चों जैसा,
युवानों में युवाओं जैसा, गरीबों के साथ
गरीबों जैसा, अमीरों के साथ अमीरों जैसा लेकिन अंदर से समझता
है कि सब खेल है। अभ्यास करते है तो आत्मज्ञान होना कोई कठिन नहीं है। अभ्यास के
बल से ही तो मैं ‘ब्राह्मण’ हूँ, मैं ‘वैश्य’ हूँ, मैं ‘क्षत्रिय’ हूँ, मैं ‘जीव’ हूँ, मैं ‘फलाने का बेटा’ हूँ, मैं ‘फलाना भाई’ हूँ… ये
सुन-सुन के तो माना है। म्हारो नाम मंगुबा,
म्हारो नाम अमथालाल…म्हारो नाम मफतलाल… अब मफतलाल क्या.. बचपन
में पड़ा नाम मफतलाल सुन-सुन के पक्का हो गया। सौ आदमी सो रहे है, “ऐ मफतलाल!”
हाश… ये भी तो अभ्यास से ही पड़ा है, जो भी नाम पड़ा है, जो भी जिसका… ऐसे ही अपने
आत्मा में जगने का अभ्यास करो तो वही नाम… ॐ ॐ ॐ ॐ
दुराचार, अश्रद्धा या फाँका(अहंकार) ऐसा दुर्गुण
है कि उसमें सब योग्यता नाश हो जाती है। अहंकार जो है.. फाँका…ऐसा दुष्ट है कि
उसमें सब सदगुण नाश हो जाते है और श्रद्धा ऐसा सदगुण है कि उसमें सब दुर्गुण बह
जाते है। श्रद्धा भी तीन प्रकार की होती है। सात्विक, राजसी,
और तामसी। सात्विक श्रद्धा एक बार हो गई, नहीं
डिगेगी, उसमें ज्ञान बढ़ जाएगा। जो वचन सुनते ही गुरु के, जिसमे
श्रद्धा है, श्रद्धेय के वचन सुनके… समझो मेरी मेरे गुरूदेव में श्रद्धा है , सात्विक
श्रद्धा है तो उनके वचन सुनूँगा… बस! मैं अपने जीवन को ऐसे ढाल दूँगा; ये
सात्विक श्रद्धा ज्ञान पैदा कर देती है। सात्विक श्रद्धा जिसमें करेंगे उसके सब
गुण अपने में आ जाएँगे। भगवान विष्णु में श्रद्धा है, भगवान
विष्णु का जो सामर्थ्य है, जो अंतर्यामीपना है वो अपने में आ
जाएगा। भगवान विष्णु को अपने स्वरूप का बोध है, अपने को भी
होने लगेगा, ऐसा गुरू मिल जाएगा। सात्विक श्रद्धा जो है एक बार हो गई तो हो गई! ज्ञान
कराके छोड़ेगी। सात्विक श्रद्धा चाहे हजार मुसीबत आ जाए, हजार
प्रतिकूलता आ जाए, श्रद्धेय व्यक्ति का बाह्य आचरण नहीं देखती।
श्रद्धेय व्यक्ति के आदेश को… सात्विक श्रद्धा ऐसी है
कि जिसमें हम श्रद्धा करते है उसके दोष नहीं दिखेंगे, उनका ज्ञान हमको हजम होगा, उनके
प्रति फरियाद नहीं होगी। मेरी सात्विक श्रद्धा है जिसमें तो उसके प्रति मेरे दिल
में फरियाद नहीं होगी, जैसे सुदामा… सात्विक श्रद्धा थी। कृष्ण ने दुशाला छीन
लिया, नँगे पैर रवाना कर दिया, खाने को कुछ था नहीं, माँगने को आया, एक कौड़ी भी नहीं दी श्रीकृष्ण ने, जो दुशाला दिया था वह भी वापस ले लिया तब भी सुदामा कहता है कि आहा भगवान कितने दयालू हैं! साथ में पढ़े थे, मेरे
मित्र है, मेरे मित्र कितने दयालू है प्रभु! मैंने माँगा धन,
संपत्ति ,रोजी-रोटी लेकिन कहीं रोजी-रोटी के
मोह में फँस न जाऊँ इसलिए मेरेको कुछ नहीं दिया! कितनी
दया किया! बड़े अच्छे है! ये सात्विक श्रद्धा है। …और जब घर पहुँचते है तो सुशीला
सज-धजकर महारानी जैसी होकर आ रही है दासियों के साथ। पूछते है कि तू कैसे बदल गई
एकदम? झोपड़ी के जगह पर महल! सुशीला ने कहा तुमने वहाँ
प्रार्थना की और भगवान ने यहां ऋद्धि-सिद्धियों की सब लीला करके अमीरी में बदल दी!
बोले- प्रभू कितने दयालू है.. मेरा भक्त रोजी-रोटी की चिंता में कहीं भजन न भूल
जाए इसलिए ऐसा कर दिया। सब छीन लिया तभी भी वाह वाह..सात्विक श्रद्धा ऐसी है! वो
अपने ज्ञान का उपयोग करके सही अर्थ लगा देगी! राजसी श्रद्धा.. जबतक आपके अनुकूल
चला थोड़ा- बहुत ठीक चला थोड़ा पुचकार ये वो तो राजसी श्रद्धा टिकेगी नहीं। जहाँ
थोडा-सा उन्नीस-बीस हुआ कि.. मेरा क्या दोष है !!…ऐसे हिलेगी। तामसी श्रद्धा जो
है वो तो थोडा-सा उन्नीस-बीस हुआ ,विपरीत हो जाएगा ! दुश्मन
बन जाएगा श्रद्धेय का! कई लोग ऐसे होते है तामसी प्रकृति के कि भगवान शिव की पूजा
करेंगे, देखेंगे कि इच्छा पूरी नहीं हुई , शिवजी का फ़ोटो- वोटो फेंक देंगे।कई लोग देवी-देवताओं के फोटो रखते है,
पूजते है, फिर अपनी इच्छा के अनुसार उनका नहीं
हुआ तो वो देव को छोड़ के दूसरे देव को, दूसरे देव को छोड़ के
तीसरे देव को ..और सात्विक श्रद्धा है तो बस! लग गया तो लग गया! और उसको गुरू के
वचन भी ऐसे लगेंगे जैसे शुद्ध वस्त्र को केसर का रंग चढ़ता है। सात्विक श्रद्धा ऐसी
चीज है! अगर सात्विक श्रद्धा है तो स्वाभाविक होगा, और
स्वाभाविक नहीं होता है तो फिर ऐसा करने से सात्विक श्रद्धा हो जाएगी। ज्ञान का
साधन है कि पुण्य क्रिया करें, दूसरों को सुख पहुँचाएँ..
जैसे अपने शरीर को दुःख के समय दुःख होता है ऐसे ही दूसरों को दुःख न दे। जप, व्रत, नियम, शास्त्र-पठन,
सत्पुरुषों का सानिध्य, उनके वचनों में
विश्वास… ऐसा सब करने से सात्विक श्रद्धा होने लगती है। ये ब्रह्मविद्या का साधन
है आत्मज्ञान पाने का। जो आत्मज्ञान पा लिया उसके आगे तैंतीस करोड़ देवताओं का पद
कुछ नहीं! जिसने आत्मज्ञान पा लिया उसके आगे इंद्र का राज्य कुछ नहीं! जिसने
आत्मज्ञान पा लिया उसके आगे योग समाधि से हजार वर्ष के बनकर कोई बैठे है वो भी कुछ
नहीं! आत्मज्ञान एक ऐसी चीज है! हजारों वर्ष की समाधि करके बड़े योगी बैठे है लेकिन
आत्मज्ञान नहीं है तो कुछ नहीं! एक दिन वो फिर नीचे आ
जाएँगे! आत्मज्ञान हो गया, बेड़ा पार! तो ये आत्मज्ञान का
साधन है… संतों की संगति, सत्शास्त्रों का विचार। कभी कभी
लोग धैर्य छोड़ बैठते है।ईश्वर के रास्ते जो आदमी चलता है न …धैर्य न छोडे तो
पहुँच जावे, धैर्य छोड़ देते है…कि किसको साक्षात्कार हुआ?
इसको तो नहीं हुआ! इसको तो भी नहीं हुआ इसको भी नहीं हुआ! लेकिन
…जन्म-जन्म मुनि जतन करहि…जन्म-जन्म तक मुनि जतन करते थे ऐसे लोग आत्मज्ञान
पाकर धन्य धन्य हो जाते थे ! अपने को 4 दिन में, 2 साल में, 1 साल में …इतना
प्रयत्न नहीं तीव्र क्योंकि अभीतक कुछ नहीं हुआ! अभी तक
कुछ नहीं हुआ! तो कई लोग ऐसे होते है! अच्छा खाओ, पीओ,
मौज करो!
तो गुठली डालके, मिट्टी डालके,पानी पिलाके छोड़ देना चाहिए, कुछ समय जम जाए! अब
गुठली डालना क्या है? कि ब्रह्मज्ञान का सत्संग महापुरुषों
से सुनकर हृदय में रख देना चाहिए। सत्संग सुनके बंदर जैसा गुठली रखके मिट्टी डाला
और फिर निकाले तुरंत! गुठली डालके छोड़ देना चाहिए। ऐसे ही संस्कार डालके उसको रख
देना चाहिए संस्कार…संस्कार फिर खुले नहीं , जो सुना है
ज्ञान का संस्कार उसको जमाना चाहिए। फिर उसको पानी पिलाना चाहिए.. नित्य सत्संग
करते रहना ये पानी पिलाना है। सत्संग, सेवा, परोपकार ये उसको पानी पिलाना है ! गुठली में
से छोड होता है लेकिन जानवर खा जाए तो? आम नहीं मिलेगा ।
उसकी रक्षा करना ..रक्षा करना क्या है कि गधा खा न जावे, बकरी
उसको चर न जावे, भैंस उसको लपका न मार दे, ऊँट उसको पैर से कुचल न दे ..इसके लिए बाड़ करनी पड़ती है, जानवर आवे नहीं…. खेती में बाड़ करते है न! नहीं करो तो सफाया!
ऐसे ही यह ब्रह्मज्ञान की खेती में बाड़ करने के लिए – अहंकार तो नहीं
घुसता गधा? दुष्चरित्र विकार तो
नहीं घुसते?
पापाचरण तो नहीं घुसता ?नहीं तो ये पौधा खा
जाएँगे! उसकी रक्षा करनी पड़ती है। जैसे पौधे की रक्षा के लिए बाड़ है और जानवरों से बचाव है ,ऐसे ही इसमें खबरदारी की, विवेक की बाड़ बनानी पड़ती है
कि लोभ, मोह, विकार वाहवाही ये कहीं
हमारा पौधा उखेड़ तो नहीं देगी?
मान पुड़ी है जहर
की खाए सो मर जाये… कोई मान में गिरते है, कोई
काम में गिरते है, कोई लोभ में गिरते है, कोई मोह में गिरते है। तो ये सब जानवर है। जानवर जैसे पौधा खा लेता है ऐसे
ही ये विकार हमारा साधनारूपी पौधा चट कर देते है। …तो धैर्य होना चाहिए, धैर्य के साथ खबरदार। जिसकी सात्विक श्रद्धा होती है उसके अंदर ये गुण अपने
आप आ जाते है।
सात्विक श्रद्धा वाले को तो… एकनाथ लगा रहा तो लगा रहा, दिन-रात एक कर दिया बारह साल। जनार्दन स्वामी गृहस्थी है कि साधु है, वो नहीं
देखा। राजा के पास नौकरी करते है कि संन्यासी, वो नहीं देखा। बस मेरे गुरू है बात
पूरी हो गई।
एकनाथ को ऐसा साक्षात्कार हो गया! पूरणपुडा को ऐसा हो गया! डटे रहते
है। बार-बार गुठली निकाले? नहीं।
एक लड़का है वह मेहनत करता है, कमाता है, परिश्रम
करता है, धनवान बनता है। दूसरा ऐसा है कि सीधा पिता की गोद चला जाता है। पिता की
गोद चल गया, करोड़पति पिता है, किसी करोड़पति की गोद चला गया, बन
गया करोड़पति। ऐसे ही सत्संग क्या है?
कि भगवान की गोद में आदमी चला जाता है। परमात्मा के सत्संग से सहज
सुलभ है परमात्मप्राप्ति। सत्संग मिले तो
उसको फिर उन संस्कारों को जमने देना चाहिए। सत्संग जिनको नहीं मिलता उनके लिए जप, व्रत, तपस्या है। जिनको सत्संग मिलता है उनके लिए
तो स्वाध्याय। उन्ही विचारों में अपने को तल्लीन कर देना है। सखी सम्प्रदाय में भी
ऐसा मानते है। रामकृष्ण ने साधना की थी सखी सम्प्रदाय की। अपने को स्त्री मानना पड़ता
है और एक परमात्मा को ही पुरुष। कलकत्ता में चलता था सखी सम्प्रदाय। अभी भी कई
सन्यासी है। एक वृद्ध सन्यासी था वो छह महीना सखी भाव में रहता। चूड़ियाँ, साड़ी फर्स्ट क्लास, घूँघट- वूँगट निकाल गोपी बन जाते और छह महीना हरिद्वार में आकर ऋषिकेश में रहते थे। मैं उनको मिला था। कैसा
भी भाव है, भाव बना लो। हम देह नहीं है लेकिन देह का भाव बन गया है तो देह ही हम
दिखते है। अपना भाव बढ़िया बना लो। हम परमात्मा के हैं-परमात्मा हमारे हैं। परमात्मा
नित्य है तो हम भी नित्य हैं, परमात्मा सुखरूप है तो हम भी
सुखरुप हैं। परमात्मा आनंदस्वरूप है तो हम भी आनंदस्वरुप हैं।
ज्ञान के मार्ग में दो बातों से बचें तो ज्ञान हो जाता है जल्दी। एक
तो ज्ञान का अभिमान न आवे और दूसरा – निराश न होवे। निराश हो जाएगा तो भी चूक
जाएगा। अभिमान आ जाएगा तो भी चूक जाएगा। ज्ञान का अभिमान न आवे और दूसरा निराश न
होवे तो ज्ञान मार्ग में चल जाएगा । निराश न होवे माने लगा रहे। संन्यास लें कि नासाग्र
दृष्टि रखें… ये सब शुभ विचार है, अच्छी बात है.. नासाग्र
दृष्टि रखना ठीक है, आँखों से इधर-उधर और लोग दिखते है
संकल्प-विकल्प होते है, शक्ति बिखरती है..नासाग्र दृष्टि रखने
से दृष्टि की सुरक्षा होती है, मन की चँचलता कम हो जाती है। ब्रह्मचर्य
का पुस्तक पढ़ने से ब्रह्मचर्य की रक्षा होती है। स्त्रियाँ जो है पुरुषों के
संपर्क में ज्यादा न आवे तो उनके ब्रह्मचर्य की रक्षा होगी। पुरूष जो है स्त्रियों
के दर्शन-वर्शन में कम आवे, ब्रह्मचर्य की रक्षा होती है।
बिना ब्रह्मचर्य की रक्षा के ज्ञान हो भी नहीं सकता। ब्रह्मचर्य रखनेसे मनोबल बढ़ता
है, मन में स्थिरता आती है और जिसका ब्रह्मचर्य नहीं,
जीवन में कोई शक्ति नहीं, जवानी में तो पता नहीं चलेगा लेकिन ३०-३६ साल
की उमर में फिर ..जीवन की शक्ति नाश हो गई तो कोई सामने भी नहीं देखेगा।
ब्रह्मचर्य या संन्यास लो… संन्यास का मतलब है कर्म के फल की इच्छा छोड़ना। गीता
के छठे अध्याय के पहले श्लोक में है-.
अनाश्रितः कर्मफलं
कार्यं कर्म करोति यः।
स सन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः॥
संन्यास ले लिया अक्रिय हो गए, अग्नि को नहीं छूते, स्त्री को नहीं देखना है संन्यास लेने के बाद , पैसे को नहीं छूना है लेकिन मन के संकल्प नहीं छोड़े तो…? और सब छोड़ा तो भी क्या छोड़ा ? आशाओं को छोड़ना संन्यास है! जगत की तृष्णा, आशा छोड़ दिया तो संन्यास हो जाएगा। संन्यास तो हो गया, आशा छोडने से संन्यास हो जाता है। नासाग्र दृष्टि रखने से एकाग्रता में मदद होती है। ब्रह्मचर्य का पुस्तक पढने से, विचार करने से ब्रह्मचर्य की रक्षा होती है। ईश्वर प्राप्ति के लिए सरल उपाय है, बहुत सहज है। संसार में सुख आता है, चला जाता है। सुख आकर चला जाता है तो क्या छोड़कर जाता है? दुःख! सुख जब चला जाता है तो आपको क्या होता है? सुख होता है? सुख चला जाता है तो क्या रहता है? दुःख! सुख आता है तब सुख होता है, जाता है तो दुःख दे जाता है और दुःख जब आता है तो दुःख लगता है लेकिन दुःख चला जाता है तो सुख लगता है। …तो एक बार वो दुःख दे जाता है और एक बार वो दुःख देता है। एक बार वो सुख देता है एक बार वो सुख देता है, दुःख जाता है तो सुख छोड़ जाता है न? और सुख जब जाता है तो दुःख दे जाता है। बात समझ में आती है? दुःख जो है सुख छोड़ देता है और सुख जो है दुःख छोड़ के जाता है लेकिन ये दोनों आने-जाने वाले हुए। हम लोग चिपके हैं, सुख के साथ सुखी हो गये, दुःख के साथ दुःखी हो गये, इसीलिए हम साक्षात्कार से दूर हो गये। सुख आया उसको भी देखो, दुःख आया उसको भी देखो, अलग हो गए! हो गया ज्ञान ! जमा दो उसको! कल भी बताया था हमने अभी और बताऊँगा । शरीर अच्छा है चमड़ी ठीक है, आप खुजलाओ तो अच्छा नहीं लगेगा लेकिन जहाँ दाद है न, जहाँ चमड़ा खराब है, चमड़े की बीमारी है उधर खुजलाओ तो क्या होता है? सुख मिलता है और बाद में ज्यादा दुःख होता है। तो सुख कहाँ मिलता है? खुजलाने से सुख कहाँ मिलता है? …जहाँ खराबी है और वहीं दुःख होता है। ऐसे ही जिस अंतःकरण में खराबी है उसको संसार की चीजों में सुख मिलता है। खुजलाहट है संसार की चीज़ें और उतना ही दुःख मिलता है। इसीलिए सब दुःख में मरे जा रहे है। करते सब सुख के लिए है न? तो, अंतःकरण जिसका मलीन है उसको संसार में सुख मिलता है। जितना सुख मिलता है उससे दुगना दुःख हो जाता है, खुजलाते समय जितना सुख मिला उससे ज्यादा दुःख हुआ। ऐसे ही संसार के जो भी सुख है वो दुःख छोड़ के जाते है। ईश्वर की तरफ चलो तो पहले जरा सहन करना पड़ता है- तितिक्षा, मान- अपमान, ये वो , गुरू की घड़ाई, ये वो सब। पहले तो दुःख होता है। दुःख चला जाता है तो क्या छोड़कर जाता है? सुख! संसार में पहले सुख होता है और छोड़कर दुःख जाता है। और साधन के रास्ते पर पहले जरा कष्ट होता है लेकिन भविष्य में, बाद में क्या छोड़ जाता है? हम लोग ईश्वर के रास्ते चले थे, गुरुओं के चरणों में पहुँचे थे, जंगलों में रहे थे, तो पहले जरा दुःख को स्वीकार कर लिया, तो अभी वो दुःख क्या छोड़कर गया? सुख छोड़ा कि नहीं? और करते कि कोका कोला पीयो, लिमका पीयो, जरा सुख लो, पान का मसाला, तंबाखू डालो मुँह में… उस समय सुख लेते तो अभी क्या होता? वो सुख क्या छोड़कर जाता? दुःख! आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत॥ ये आगम, अपाई है, अनित्य है ये संसार के प्रसंग। उनको देखते जाओ, उनको सह लो, बह रहे है, बीत रहे है। जो बीत रहे है उसको देखने वाला नहीं बीतता- वो साक्षी आत्मा ‘मैं’ हूँ। ऐसा बार-बार चिंतन करने से, ऐसे संस्कारों को जमाने से ज्ञान हो जाता है। ये संस्कार फिर फूट निकलते है, अभी तो सुने है, जमेंगे तो फिर अंदर से फूट निकलेंगे, फिर वृक्ष होगा तो आत्मज्ञान का फल लगेगा। इसमें मेरे को ज्ञान हो रहा है कि नहीं हो रहा है ऐसी बार-बार शंका नहीं करना चाहिये और हमको नहीं होगा, ऐसे विचार नहीं करने चाहिये। साधक को सत्संग के द्वारा ऐसे ही मिल जाता है माल! गाय इतना परिश्रम करके घांस खाती है, पानी पीती है, खुराक खाती है, दूध बनता है और बछड़े को ऐसे ही पिला देती है। ऐसे ही संतों ने कितने और संतों का मुलाकात किया, संपर्क किया, शास्त्र विचार करे, गुरुओं की आज्ञा में रहे, गुरुओं की सेवा किया, क्या- क्या करके उन्होंने ब्रह्मविद्यारूपी अमृत अपने हृदय में प्रगट कर लिया। अब संतों ने तो परिश्रम करके वो बनाया लेकिन सत्संग में ऐसे ही मिल जाता है। सत्संग में समझो ईश्वर की गोद चला जाना है। सत्संग तो सुनते है, फिर कुछ रुकावटें आती है। क्यों आती है? कि सात्विक श्रद्धा नहीं है तो रुकावटें जोर पकड़ेंगी। राजस-तामस श्रद्धा है तो रुकावटें जोर पकड़ेंगी। सात्विक श्रद्धा है तो रुकावटों की ताकत नहीं ज्यादा टिकेगी, सात्विक श्रद्धा रुकावटों को उखाड़कर फेंक देगी।