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Tatva Gyan

कैसे होंगे हृदय के नारायण प्रकट ? पूज्य बापू जी


ज्ञाता-ज्ञान-ज्ञेय, द्रष्टा-दर्शन-दृश्य की त्रिपुटी से रहित पद में फतेह सिंह के गुरु महाराज क्षणभर के लिए गये और फतेह सिंह को कहाः “बेटा ! तुम परमात्मा, चैतन्य, सर्वेश्वर भगवान श्री नारायण के विषय में जानते तो हो लेकिन नारायण का रूप समझकर सामने वालों की सेवा करने में अभी तुम तत्पर नहीं हुए । नारायण अनेक रूपों में हैं यह बात तुमने सुन रखी है लेकिन यह सुनी हुई बात तुम्हारे अमल में नहीं आयी । बेटा ! जब यह बात अमल में आयेगी तब हृदय के नारायण प्रकट हो जायेंगे ।”

वह समझदार व्यक्ति था । उसने गुरु महाराज का आभार व्यक्त किया, हृदय से प्रणाम किया । चने, कोहरी (उबले हुए मसालायुक्त चने, मटर आदि) का खोमचा (टोकरा) सिर पर रख के अपने घर की ओर चल पड़ा । रास्ते में एक लकड़हारे को चक्कर आ गया, वह गिर पड़ा । खोमचे वाले ने खोमचा नीचे धर के उसको उठाया, पानी-वानी छाँटा, फिर अपने जो छोले-वोले थे वो खिलाये । उसकी घर की स्थिति जान ली और यथायोग्य मुट्ठी भर के उसको दे दिये रूपये पैसे । वह लकड़हारा तो गिरकर उठ गया लेकिन फतेह सिंह उठा नहीं ! वह लीन हो गया । उसका द्रष्टा (अहं-प्रत्यय), दर्शन एवं दृश्य आत्मदेव में लीन हो गये । ऐसी मस्ती आयी… आज तक जो सुन रखा था मानो, वह फूट निकला । बड़ा आनंद, चेहरे पर बड़ी रौनक, बड़ी प्रसन्नता, बड़ी सहजता… ।

दूसरे दिन गुरुचरणों में बैठ के सत्संग सुनता है तो मानो उसकी आँखें कह रही हैं कि ‘बस, सर्वोऽहं… आनंदोऽहं…. शुद्धोऽहं…. अनेक रूपों में मैं ही मैं हूँ । न मैं सेवा करता हूँ न मैं सेवा लेता हूँ । सेवा लेने वाले-करने वाले में, सबमें मेरी ही चेतना है। मायामित्रमिदं द्वैतम् । (यह द्वैत मायामात्र है) यह इन्द्रियों का आकर्षण धोखा है । ये मैं और तू की बातें, भेद की, अज्ञानता की बातें – इसी से फँसा है जीव, बाकी तो मेरे ज्ञानस्वरूप में कोई पुण्य-पाप नहीं, कोई कर्तव्य-अकर्तव्य नहीं, सोऽहं….

उसकी आँखों की तरंगे गुरु पढ़ गये, उसके चेहरे की रौनक गुरु देख गये, भाँप गये । बोलेः “क्या बात है फतेह सिंह ?”

“गुरु महाराज ! वाणी नहीं जाती । बस, ऐसी कृपा हुई आपकी, बात बन गयी ।”

“कैसे बात बनी ?”

“आज तक सुना था कि ‘हमारा वास्तविक स्वरूप शुद्ध है, हमारा कोई बेटा नहीं, कोई बाप नहीं, कोई पत्नी नहीं, अरे ! हमारा शरीर भी नहीं है । अगर है तो सबमें मैं ही हूँ । या तो मेरा कुछ नहीं या तो सब मैं ही हूँ – दोनों में से एक कोई भी बात बन जाय, जँच जाय ।’

महाराज जी ! कल रास्ते में एक लकड़हारा गिरा था बेहोश होकर । उसके रूप में जो मेरा स्वरूप था…. अब तक तो मैं खाली देह की, अपने देह से संबंधितों की सेवा करता था । अब पता चला कि यह तो संकीर्ण मति है । इतना तो चिड़िया भी करती है, अपने बच्चों को खिलाती है, कुत्ता भी अपने बच्चों को खिला लेता है । अब मेरा ज्ञान व्यवहार में आ गया, वृत्ति मेरी व्यापक हो गयी महाराज ! उस लकड़हारे पर तो मैंने पानी छिड़का, उसको छोले खिलाये, मुट्ठीभर पैसे दिये लेकिन महाराज ! पता चला कि रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्च । (सब प्राणियों का अंतरात्मा परब्रह्म एक होते हुए भी नाना रूपों में उन्हीं के जैसे रूपवाला (हो रहा है) और उनके बाहर भी है ।) धर्म का आचरण करके ही मेरा धर्म प्रकट हो गया । न पुण्यं न पापं न सौख्यं न दुःखं… चिदानंदरूपः शिवोऽहं शिवोऽहम् ।। मैं चिद्घन चैतन्य हूँ । संकीर्णता पाप है, उदारता पुण्य है लेकिन उदारता और संकीर्णता से भी परे जो पद है, उस परम पद में ऐसी आपकी कृपा से…. वहाँ वाणी नहीं जाती, बस !”

यह उसकी भाषा नहीं थी, सुना हुआ नहीं, उसकी अनुभूति बोल रही थी । गुरु जी प्रसन्न हुए, बोलेः “आज तू नारायणस्वरूप हो गया । अब तो स्वर्ग में या वैकुंठ में जाना भी तेरे लिए तुच्छ हो गया, छोटा हो गया । तू जहाँ कदम रखेगा वहाँ वैकुंठ हो जायेगा ।

वैकुंठ माने जिसकी बुद्धि कुंठित नहीं होती देह में, मन में, परिस्थिति में ।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, दिसम्बर 2018, पृष्ठ संख्या 24,25 अंक 312

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ब्रह्मज्ञान के अतिरिक्त साधन


शुद्ध अंतःकरण वाले मुमुक्षु के लिए ब्रह्मनिष्ठ सदगुरु के सान्निध्य में ब्रह्मविचार ही मोक्षप्राप्ति का साधन बताया गया है । अंतःकरण को शुद्ध करने के लिए सेवा-सत्कर्म महत्वपूर्ण साधन है । गुरुसेवा से अंतःकरण को शुद्ध किये बिना कितना भी ब्रह्मविचार कर ले, वह मोक्षप्राप्ति तो दूर, सामान्य दुःख-निवृत्ति के भी काम नहीं आता । अतः सेवा और ब्रह्मविचार अर्थात् सत्कर्म और सद्ज्ञान इन दोनों पंखों से ही परमानंदस्वरूप परम पद के महाकाश में उड़ान भरी जा सकती है ऐसा शास्त्रों का निर्णय है । इसलिए वेदांत में ब्रह्मज्ञान के अतिरिक्त साधनों की चार कक्षाएँ स्वीकार की गयी हैं-

  1. हमारे कर्मों का प्रभाव हमारे अंतःकरण पर पड़ता है । अतः कुछ साधन कर्म की शुद्धि के लिए हैं । उनको कर्म-शोधक साधन कहते हैं ।
  2. कुछ साधन पूर्वकृत कर्मों से उत्पन्न अंतःकरण में पड़े हुए राग-द्वेष की निवृत्ति के लिए होते हैं । इसलिए इन साधनों को करण-शोधक साधन कहते हैं ।
  3. वासना की न्यूनता अथवा शुद्धि होने पर भी बुद्धि में जो अपने, जगत के और ब्रह्म के बारे में अज्ञान, संशय और विपरीत ज्ञान भरा है, उसके शोधन हेतु हो साधन हैं वे पदार्थ-शोधक साधन कहलाते हैं ।
  4. अंत में पद-पदार्थ (महावाक्य के पद एवं उन पदों के अर्थ) का यथार्थ बोध होने पर भी जब तक अपनी पूर्णता के बोधक ‘तत्त्वमसि’ आदि महावाक्यजन्य अखंडार्थ-धी (आत्मा और ब्रह्म की एकता का बोध कराने वाली वृत्ति) का उदय नहीं होता, तब तक ब्रह्मात्मैक्य-बोध नहीं होता । अतः इस ब्रह्मात्मैक्य-बोधिनी वृत्ति को वेदांत में साक्षात् साधन कहा गया है ।

इसे आप बंदूक के दृष्टांत से समझ सकते हैं । नियम यह है कि ठीक निशाना लगाने के लिए चार बातें आवश्यक हैं- 1. बंदूक की नली साफ हो । 2. बंदूक में गोली भरी हो । 3. आँख, नली और लक्ष्य – तीनों एक सीध में कर लिये गये हों तथा उँगली बंदूक के घोड़े पर हो । 4. अंत में घोड़ा दबा दिया जाय । यहाँ बंदूक की नली साफ करना कर्म-शोधक साधन है, गोली भरना करण-शोधक साधन है, लक्ष्य की एकता करना पदार्थ-शोधक साधन है तथा घोड़ा दबा देना साक्षात् साधन है ।

इन चार साधनों के दूसरे नाम अधिक प्रचलित हैं । कर्म-शोधक साधन ‘परम्परा साधन’ कहलाते हैं, करण-शोधक साधन ‘बहिरंग-साधन’ कहलाते हैं और पदार्थ-शोधक साधन ‘अंतरंग-साधन’ कहलाते हैं । साक्षात् साधन तो साक्षात् हैं ही, वैसे कोई-कोई उसे ‘परम अंतरंग साधन’ भी कहते हैं । अब इनके बारे में थोड़ा-थोड़ा विचार करें ।

  1. परम्परा साधन (कर्म-शोधक साधन)- वस्तु और क्रिया के अऩुचित संबंध से होने वाले जो असाधन जीवन में आते हैं, जैसे चोरी, व्यभिचार, अनाचार आदि, उनकी निवृत्ति के लिए जो साधन परम्परा से चले आ रहे हैं, जैसे – अस्तेय (चोरी न करना), ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह आदि, वे परम्परा साधन कहलाते हैं । धर्म, उपासना और योग परम्परा साधन हैं ।

शारीरिक और ऐन्द्रियक संयम तथा यज्ञ-यागादिक कर्म धर्म कहलाते हैं । कर्तव्य-कर्म का नाम  धर्म है । परंतु धर्म का आधार एकमात्र शास्त्र ही है । शास्त्रविहित कर्म का नाम धर्म है और शस्त्र से अविहित (निषिद्ध, अनुचित) कर्म का नाम अधर्म है । धर्म का पालन अधर्म का नाशक है । धर्म हमारे कर्मों का नियंता है । वह हमारे जीवन को वासना-पथ से हटाकर मर्यादित भोग और संवैधानिक, सभ्य-सामाजिक आचरण के पथ पर आरूढ़ करता है । प्रत्येक समाज में प्रत्येक व्यक्ति के लिए एक अवश्य करणीय धर्म होता है । इस प्रकार अधर्म से निवृत्त करने के कारण और कर्म का शोधक होने के कारण धर्म वेदांत का परम्परा साधन है ।

धर्म के अंतर्गत उपासना सहकारी साधन भी है और स्वतंत्र परम्परा साधन भी है । उपासना से धर्म वृद्धि को प्राप्त होता है और धार्मिक व्यक्ति की उपासना में सहज रूचि होती है । उपासना से अंतःकरण में सत्त्वगुणी वासनाओं की वृद्धि होती है है तथा तमोगुणी-रजोगुणी वासनाओं में कमी होती है । वासनाओं की शुद्धि से कर्म भी सहज शुद्ध होता है । इसलिए धर्म के साथ उपासना भी वेदांत का परम्परा साधन है । किंतु धर्म की अपेक्षा उपासना अंतरंग है क्योंकि धर्म का आधार शरीर है तो उपासना का आधार मन है । योग (अष्टांग योगः यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि) भी एक विशिष्ट उपासना है अतः योग भी वेदांत का परम्परा साधन है । उपासना वासना को बाँधती है तो योग मन की चंचलता को दूर करता है किंतु उपासना की अपेक्षा योग अंतरंग है ।

धर्म में बहिर्मुख प्रवृत्ति, उपासना में अंतर्मुख प्रवृत्ति और योग में निवृत्ति रहती है । धर्म में स्पष्ट कर्ता, उपासना में गौण कर्ता और योग में अज्ञात कर्ता रहता है । अतः धर्म, उपासना और योग कर्तृसाध्य हैं तथा इनसे उत्पन्न होने वाला साध्य या स्थिति कर्मजन्य ही है, इसलिए उस साध्य या स्थिति का टूटना अनिवार्य है । अतः ब्रह्मज्ञान में धर्म, उपासना और योग केवल कर्म-शोधक साधन माने गये हैं । ये क्रियारूप होने से स्वयं बाहर होते हैं किंतु इनका फल भीतर अंतःकरण में होता है। (क्रमशः)

स्रोतः ऋषि प्रसाद, दिसम्बर 2018, पृष्ठ संख्या 22,23 अंक 312

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ब्रह्मज्ञान के अतिरिक्त साधन

(गतांक से आगे)

(2) बहिरंग साधन (करण-शोधक साधन)– विवेक, वैराग्य, षट्सम्पत्ति (शम, दम, तितिक्षा, उपरति, श्रद्धा तथा समाधान अर्थात् अपनी बुद्धि को समस्त बाह्य पदार्थों एवं विषयों से हटाकर केवल ब्रह्म में ही स्थिर करना ।) और मुमुक्षा – ये जो साधन चतुष्टय हैं वे बहिरंग साधन कहलाते हैं । परम्परा साधनों से तो ये अंतरंग हैं परंतु श्रवण-मनन-निदिध्यासन की अपेक्षा ये बहिरंग हैं। अतः इनकी गिनती बहिरंग साधनों में ही है । अंतःकरण में स्थित अविवेक, भोगासक्ति आदि दोषों को नष्ट करने के कारण साधन-चतुष्टय को करण-शोधक साधन माना जाता है । दोष जिस अंतःकरण में निवास करते हैं उस अंतःकरण की सफाई के लिए ही उसी में ये साधन होते हैं । इनमें बाह्य पदार्थ, क्रिया अथवा भावना नहीं है । ये निवृत्तिरूप हैं । निवृत्ति अपने अधिकरण (आश्रय) से भिन्न नहीं होती । फिर भी ये केवल अंतःकरण के ही शोधक हैं, सद्वस्तु अर्थात् ब्रह्म-तत्त्व के बोधक नहीं हैं । इसीलिए इनका नाम बहिरंग साधन है (आत्म से बाहरी) ।

  1. अंतरंग साधन (पदार्थ शोधक साधन)– वेदांत का गुरुमुख से श्रवण, तदनंतर उसका मनन और निदिध्यासन – ये अंतरंग साधन कहलाते हैं । ये ब्रह्म के स्वरूप को लक्ष्य करते हैं । वेदांत में पद के अर्थ का नाम पदार्थ है । जैसे ‘तत्त्वमसि’ एक वेदांत वाक्य है, जिसका अर्थ है ‘वह तू है ।’ इसमें तत् और त्वम् ये दो पद हैं । इनमें तत्-पदार्थ हैं जगत्कारण ईश्वर और त्वं पदार्थ है कर्ता, भोक्ता, संसारी परिच्छिन्न जीव । ‘असि’ पद इन दोनों पदार्थों की एकता को सूचित करता है । इस प्रकार गुरुमुख से प्रवाहित अमृतवाणी में, वेदांतों में जो उपर्युक्त दो पदार्थों की एकता का निश्चय है, उसे सुनना श्रवण कहलाता है । फिर जैसा सुना है उसके द्वारा अभेद-साधक और भेद-बाधक युक्तियों से ब्रह्म का चिंतन करना ‘मनन’ है । तदनंतर बुद्धिवृत्ति का निश्चय किये हुए अद्वैतार्थ में प्रवाह तथा विजातीय वृत्तियों का तिरस्कार, यह निदिध्यासन की परिपक्व अवस्था ही वेदांत की समाधि है । योग की समाधि या तो परम्परा साधन है अथवा षट्सम्पत्ति के अंतर्गत ‘समाधान’ की कक्षा में होने से बहिरंग साधन के अंतर्गत है ।

श्रवण, मनन और निदिध्यासन ज्ञान के साक्षात् साधन नहीं हैं । परंत ब्रह्म का लक्ष्य कराने के कारण ये अंतरंग साधन कहलाते हैं । ‘वेद का तात्पर्य अभेद ब्रह्म के प्रतिपादन में है या भेद के प्रतिपादन में ?’ – यह जो प्रमाण (वेद) के संबंध में संशय है वह श्रवण से दूर हो जाता है । ‘ब्रह्म का हमारे साथ जो संबंध है वह भेद का ही है, अभेद का नहीं हो सकता’ – यह जो बुद्धि में असम्भावना है, वह मनन से दूर होती है । वेद प्रमाण है ब्रह्म के विषय में । इसलिए वेद प्रमाण है और ब्रह्मात्मैक्य-बोध प्रमेय है । तो प्रमाणगत संशय श्रवण से दूर होता है और प्रमेयगत संशय मनन से दूर होता है । किंतु प्रमाणगत संशय और प्रमेयगत असम्भावना दूर हो जाने पर भी पूर्व-पूर्व के (अविद्याकालीन) अभ्यास के कारण देहादि जागतिक पदार्थों की सत्यता और ब्रह्म की अन्यता का भ्रम पुनः पुनः उपस्थित हो जाता है । इसको ‘विपर्यय’ या ‘विपरीत बुद्धि’ कहते हैं । बुद्धि का यह विपर्यय-दोष निदिध्यासन से दूर होता है । प्रतिबंधरहित साधक श्रवणमात्र से कृतकृत्य हो जाता है क्योंकि जहाँ वस्तु अपरोक्ष होती है वहाँ श्रवणमात्र से अपरोक्ष ज्ञान ही होता है । और जहाँ वस्तु परोक्ष होती है वहाँ श्रवण से परोक्ष ज्ञान ही होता है तथा वस्तु को प्राप्त करने के लिए अन्य साधन अपेक्षित होता है । ब्रह्म सदा अपरोक्ष है क्योंकि वह अपना आत्मा ही है । उसमें अविद्या न कभी थी, न है और न होगी । श्रवण से केवल प्रातीतिक अविद्या की निवृत्ति हो जाती है । हाँ, जिन साधकों में संशय-विपर्ययरूप प्रतिबंध शेष हैं उन्हें श्रवणमात्र से ज्ञान नहीं होता । उन्हें संशय की निवृत्ति के लिए मनन और विपर्यय की निवृत्ति के लिए निदिध्यासन की आवश्यकता रहती है । (क्रमशः)

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जनवरी 2019, पृष्ठ संख्या 22,23 अंक 313

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ब्रह्मज्ञान के अतिरिक्त साधन

  1. साक्षात् साधनः अपने-आपको अद्वितीय ब्रह्म न जानना ही अज्ञान है । इस अज्ञान की पूर्णतया निवृत्ति करने वाला जो ज्ञान है वही साक्षात् साधन है । यह सम्पूर्ण साधनों का फल है । आत्मा को ब्रह्म बताने वाले जो श्रुति के महावाक्य हैं1, जैसे – ‘तत्त्वमसि’ (वह तू है), ‘अहं ब्रह्मास्मि’ (मैं ब्रह्म हूँ), ‘प्रज्ञानं ब्रह्म’ (प्रज्ञान अर्थात् ज्ञाता-ज्ञान-ज्ञेय की त्रिपुटी से रहित ज्ञान या ज्ञानमात्र आत्मा ब्रह्म है), ‘अयमात्मा ब्रह्म’ (यह आत्मा ब्रह्म है), उनके अखंडार्थ को धारण करने वाली विकल्परहित जो बुद्धिवृत्ति है उसको ही ज्ञान का साक्षात् साधन कहा जाता है । इसी को ब्रह्माकार वृत्ति भी कहते हैं । यह वृत्ति अधिकारी मुमुक्षु को मात्र श्रवण से भी हो सकती है अथवा श्रवण, मनन, निदिध्यासन के परिपाक से भी हो सकती है । यह वृत्ति अज्ञानवृत्ति का नाश कर देती है और स्वयं अपने आश्रय स्वयंप्रकाश ब्रह्म के साथ अभिन्न हो जाती है ।

जो संस्कृत नहीं जानते उनके लिए ब्रह्मविद् गुरु द्वारा अपनी-अपनी बोली अथवा भाषा में बोले गये जो भी इन महावाक्यों के समानार्थक वाक्य हों, जिनसे अपनी पूर्णता का बोध होता हो, जिनमें आत्मा, परमात्मा और जगत का एकत्व प्रतिपादित होता हो, उन्हीं वाक्यों से जन्य प्रज्ञा साक्षात् साधन होगी2 । फिर भी कर्म, करण और पदार्थ का शोधन यथाविधि सम्पूर्ण तो अवश्य होना ही चाहिए ।

इस प्रकार परम्परा साधन तीन हैं- धर्म, उपासना और योग । इन तीनों को एक नाम से कह सकते हैं ‘निष्काम कर्म’ । बहिरंग साधन चार हैं- साधन चतुष्टय (विवेक, वैराग्य, षट्सम्पत्ति और मुमुक्षा) । अंतरंग साधन तीन हैं- श्रवण, मनन और निदिध्यासन । साक्षात् साधन एक हैः महावाक्यजन्य प्रज्ञा । अविद्यानिवृत्ति के ये कुल 9 साधन हैं । इनमें निष्काम कर्म और साधन-चतुष्टय का संबंध चित्तशुद्धि से है और शेष ज्ञान के वास्तविक साधन हैं । (समाप्त)

1.आत्मा और ब्रह्म की एकता के प्रतिपादक श्रुतिवाक्यों को ‘महावाक्य’ कहते हैं ।

  1. ब्रह्मरूप अहि ब्रह्मवित्, ताकी बानी बेद । भाषा अथवा संस्कृत, करत भेद-भ्रम छेद ।। (वेदांत-सद्ग्रंथ विचारसागरः 3.10)

स्रोतः ऋषि प्रसाद, फरवरी 2019, पृष्ठ संख्या 23, अंक 314

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साँप मर गया, नेवला वहीं रह गया !


आत्मा पर आवरण क्या है ? असलियत यह है कि आत्मा पर कोई आवरण नहीं है। वह तो नित्य-शुद्ध-बुद्ध-मुक्त ब्रह्म ही है। परंतु बहुत सारी बातें आपके मन में बिना सोचे-समझे बिठा दी गयी है, साँप को भगाने के लिए आपके मन में नेवला को लाकर बैठा दिया गया है।

पंचतंत्र की यह कहानी आपने सुनी होगी। एक पेड़ पर बहुत सी चिड़ियाँ रहती थीं। उस पेड़ के नीचे एक साँप रहता था। वह चिड़ियों के अंडे-बच्चे खा जाता था। चिड़ियों की पंचायत हुई। उन्होंने तय किया कि ‘साँप को मारने के लिए नेवला बुलाया जाय।’ नेवला आ गया। नेवले को देखकर साँप तो भाग गया किंतु नेवला वहीं रह गया। अब वही नेवला चिड़ियों के अंडे-बच्चों को खाने लगा। भक्षितोऽपि लशुने न शान्तो व्याधिः। एक तो लहसुन खाया और रोग भी नहीं मिटा ! नेवला तो आ गया पर अंडे-बच्चे बचे नहीं। इसी प्रकार देहाभिमान को छुड़ाने के लिए शास्त्रों ने बहुत सारे उपाय बताये परंतु एक गया, दूसरा आता रहा। रोग बढ़ता गया ज्यों-ज्यों दवा की !

श्रुति पुरान बहु कहेउ उपाई।

छूट न अधिक अधिक अरुझाई।। (श्रीरामचरित. उ.कां. 116.3)

आपको चाहिए था सुख। किसी ने कह दिया कि ‘विषय-उपार्जन करो तो भोग-सुख मिलेगा।’ अब विषयों का उपार्जन किया, भोग सुख तो मिला किंतु ‘मैं विषयी और विषयों का भोग करके सुखी होऊँगा’ यह संस्कार शेष रह गया। अब भोग सुख में भी होड़ लगी। प्रजा के भोग से कम सुखी, राजा के भोग से अधिक सुखी, इन्द्र के भोग से और अधिक सुखी ! न जाने किस अशुभ मुहूर्त में हमें भोक्ता बनाया गया और हम भोक्ता बन गये। इसी का नाम ‘पाप’ है। गाली देने का, किसी को मारने का, किसी का माल लेने का नाम ‘पाप’ है, यह तो आप जानते हो परंतु ‘हम भोगी हैं’ ऐसा अपने को मानने का नाम भी ‘पाप’ है – यह आपके दिमाग से निकल गया। ‘हम भोक्ता हैं’ – यह पराधीनता का पाप ही हमारा आवरण बन गया।

हमें नहीं मालूम कब अनजाने में हमने अपने-आपको कर्ता मान लिया। हम कर्म के पराधीन हो गये। ‘कर्म नहीं करेंगे तो हम बंधन से नहीं छूटेंगे’ – यह ग्रंथि बन गयी। और ज्यों-ज्यों बंधन से छूटने के लिए कर्म करते गये, त्यों-त्यों रेशम के कीड़े की तरह फँसते चले गये। यह अपने को कर्ता मानना ‘पाप’ है।

कर्तापन-भोक्तापन पाप है। अपने को जन्मने-मरने वाला मानना पाप है, जन्म-जन्मांतर में लोक-लोकांतर में भटकने वाला मानना पाप है। ‘यह पाप है, वह पाप है’ यह तो आपको सिखाया गया परंतु ‘मैं पापी हूँ।’ – यह मानना भी पाप है, यह नहीं सिखाया गया। पर्दे-पर-पर्दे पड़ते गये।

एक नासमझीरूपी सर्प को भगाने के लिए समझरूपी दूसरे नेवले को लाया गया, दूसरी नासमझी को हटाने के लिए तीसरी समझ और तीसरे सर्प को हटाने के लिए तीसरी समझ और तीसरे सर्प को हटाने के लिए चौथा नेवला आया परंतु हर बार साँप मर गया, नेवला वहीं रह गया। अरे ! आप न कर्ता हैं न भोक्ता हैं, न संसारी हैं न परिच्छिन्न हैं। आप टुकड़े नहीं हैं, कतरा नहीं हैं दरिया हैं, बिंदु नहीं हैं सिंधु हैं-

बिंदु में सिंधु समाहिं सुनि कोविद1 रचना करें।

हेरनहार2 हिरान3, रहिमन आपुनि आपमें4 ।।

1 विद्वान 2 खोजने वाला 3 खो गया 4 अपने-आप में।

आप कोई साधारण वस्तु नहीं हैं। परंतु आपने इस अपने-आपको परमानंदरुपी खजाने पर से अपना हक छोड़ दिया ! बड़ों (महापुरुषों) पर विश्वास नहीं किया, ज्ञान के लिए प्रयत्न नहीं किया, आवरण का भंग नहीं किया, इसको (परमानंदरूपी खजाने को) अपना-आपा नहीं समझा। केवल मुक्ति की चर्चा करने से मुक्ति नहीं मिलती।

आत्म-तत्त्व को समझाने के लिए कुछ अध्यारोप (वस्तु यानी ब्रह्म में अवस्तु यानी जड़ समूह (देह, मन आदि) का आरोप करना ‘अध्यारोप’ कहलाता है।) किये शास्त्र ने। उसी शास्त्र को हमने सच्चा समझ लिया। तब उसके अपवाद (अपवाद यानि अध्यारोप का निराकरण। जैसे – रस्सी में सर्प का ज्ञान यह अध्यारोप है और रस्सी के वास्तविक ज्ञान से उसका जो निराकरण हुआ यह अपवाद है।) के लिए शास्त्र बने। जितना-जितना अध्यारोप बढ़ता गया, अपवाद के शास्त्रों की संख्या भी बढ़ती गयी। परंतु ब्रह्मज्ञान में समझना यह है कि समस्त अध्यारोपों और उनके अपवादों का जो साक्षी-अधिष्ठान है, वह स्वयं ही है। इसलिए आप अपने पूरे सामर्थ्य, विवेक और बल का प्रयोग करके अपने इस अज्ञान-शत्रु का नाश कर डालिये।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, नवम्बर 2018, पृष्ठ संख्या 25,26 अंक 311

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