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Tatva Gyan

जैसी नजर, वैसे नजारे – पूज्य बापू जी


जगत तुम्हें आधिभौतिक दिखता है उसकी परवाह नहीं लेकिन देखने का नजरिया तुम आध्यात्मिक करो।

एक वैज्ञानिक को पीपल का पेड़ दिखा, वह बोलेगाः ʹपीपल का पेड़ है। इसकी लकड़ियों में ऐसा है – ऐसा है, यह गुण है, यह दोष है। इसके फर्नीचर से ऐसे-ऐसे फायदे होंगे या यह होगा। इसके धुएँ से यह हो रहा है, यह होगा।ʹ वैज्ञानिक ने पीपल को लकड़ी समझकर उसका उपयोग किया।

वैद्य को पीपल का पेड़ दिखेगा तो वह बोलेगा कि ʹइसमें पित्तशमन का सामर्थ्य है। इसके छोटे-छोटे पत्तों का – कोंपलों का मुरब्बा बनाकर रोज 10 ग्राम खायें तो कैसी भी गर्मी हो शांत हो जायेगी।ʹ वैद्य की दृष्टि है कि ʹपेड़ सात्त्विक है, इसमें अदभुत शक्तिवर्धक औषधीय गुण छुपे हैं।ʹ

भक्त पीपल को देखता है तो कहता हैः ʹये तो पीपल देवता हैं। इनमें आधिदैविक स्वभाव के आत्मा भी वास करते हैं। ये तो नारायण का अभिव्यक्ति हैं।ʹ वह पीपल के पेड़ को धागा बाँधेगा, उसके चारों तरफ घूमेगा।

ʹअच्युतानन्तगोविन्द नामोच्चारणभेषजात्।

नश्यन्ति सकला रोगा सत्यं सत्यं वदाम्यहम्।।ʹ

करेगा और शनि देवता का पूजनादि करेगा। लेकिन तत्त्ववेत्ता बोलेगा कि ʹपंचभूतों और अष्टधा प्रकृति में चमचम चमकने वाला वही मेरा चैतन्य है। अगर चैतन्य नहीं होता तो पृथ्वी से रस कैसे लेता ? फल कैसे लगते ? फूल कैसे खिलते ? और सात्त्विक हवाएँ कैसे बनतीं ? ब्रह्म पीपल का पेड़ बनकर अपने-आपको पोषित करता है।ʹ

वैज्ञानिक आधिभौतिक नजर से देखता है तो उसका उपयोग आधिभौतिक ही होता है। भक्त भगवदभाव से देखता है, नारायणरूप मानकर पीपल को फेरे फिरता है, जल चढ़ाता है।

हम जब बच्चे थे तो पीपल की जड़ों को हरि ૐ….ૐ…, तू ही ૐ….ૐ…. करके चम्पी करते थे। बड़ा आनंद आता था। घर से जाते तब भी वहाँ पूजा करते, आते तब भी उसी मस्ती में, आनंद में रहते। तो हमारे अंतःकरण का निर्माण हुआ।

भौतिकवादी को भौतिक फायदा होगा, आयुर्वेदवाले को औषधीय फायदा होगा, भगवदभाव वाले को अपना चित्त निर्माण होगा और तत्त्ववेत्ता अष्टधा प्रकृति के संगदोष से मुक्त अपने स्वरूप को ही देखेगा।

अब तुम कौन-सा नजरिया अपनाते हो उस पर तुम्हारा भविष्य है। किसी को लगेगा कि गुरु हमारे ब्रह्मा हैं, गुरु विष्णु हैं। किसी को लगेगा उपदेशक हैं। जिसका जैसा नजरिया होता है उस समय उसका चित्त भी वैसा ही बन जाता है और जैसा चित्त होता है वैसा ही दिखता है। इस प्रकार प्राणी-पदार्थों के प्रति अपना-अपना नजरिया है। अतः ऊँचा नजरिया करो, ऊँचे पद को पाओ।

जब तत्त्वज्ञान होता है तो समझते हैं कि ब्रह्म ही पीपलरूप होकर दिखाई देता है और ब्रह्म ही गंगा होकर बह रहा है। ब्रह्म ही सब रूपों में है। सब ब्रह्म ही ब्रह्म है। ब्रह्मवेत्ता की ब्रह्मदृष्टि है। भक्त की भगवददृष्टि है और भौतिकवादी की भौतिक दृष्टि है। जैसी दृष्टि होती है, अंतःकरण वैसा ही होता है। इसलिए अपना नजरिया ऊँचा कर लेना चाहिए। आध्यात्मिक अर्थघटन करो, नहीं तो भगवद-अर्थघटन करो।

आधिभौतिक उपयोग में भी आधिदैविक और आध्यात्मिक नजरिये से विशेष लाभ मिलेगा। जैसे – ʹहे नारायण ! हे  ब्रह्म ! आप औषधरूप में हो….ʹ मंगल ही मंगल हो जायेगा। ʹआप शत्रु के रूप में आये हो दोष और अहंकार मिटाने को, आप मित्र के रूप में हो हताशा निराशा मिटाने को। कीड़ी में नन्हें, हाथी में बड़े और महावत में भी आप ही आप हो। मुन्ना बनकर ऊँआँ…ऊँआँ… आप ही करते हो और माँ बनकर वात्सल्य देने वाले भी आप ही हो। चोरी करके भागने वाले में भी आपकी चेतना और पकड़ने वाले में भी आप ही आप ! जलचरों की हरकतों में आप ही आप और जलचरों को निहारने वाले भी आप ही आप ! गुरु बनकर मंगल नजरिया आप ही दे रहे हो और साधक बनकर सुन रहे भी आप ही आप !ʹ – यह परम नजरिया आपको अतिशीघ्र ही परब्रह्म परमात्मा के साथ एकरूप कर देगा। आपको शोक, मोह, राग, द्वेष, भय, चिन्ता, अहंकार, आवेग, अशांति से मुक्त करके अपनी महिमा में जगा देगा। ૐ….ૐ…. लगो लाले-लालियाँ, बेटे ! ऊँचे नजरिये में। ʹआईएएस कर लूँ, एम.डी. कर लूँ, पीएचडी कर लूँ, एमबीए कर लूँ, यह कर लूँ – वह कर लूँ…ʹ ये कर करके तो सभी ठगे जा रहे हैं। जो करना है करो लेकिन इस नजरिये को पहले दृढ़ कर लो।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, दिसम्बर 2012, पृष्ठ संख्या 11,12 अंक 240

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ज्ञान के बिना भोग नहीं – पूज्य बापू जी


ज्ञान के बिना भोग नहीं होता। जीभ पर स्वादिष्ट-सलोना व्यंजन आया लेकिन उसका ज्ञान होगा तभी मजा आयेगा। खट्टे खारे का ज्ञान होगा तभी उसका मजा आयेगा। यह हमारा हितैषी है, उसका ज्ञान होगा तब उसको देख के मजा आयेगा। बिना ज्ञान के भोग नहीं होता।

वास्तव में देखा जाय तो ज्ञानस्वरूप ईश्वर को ही हम भोग रहे हैं और ईश्वर से ही भोग रहे हैं। यहाँ भी ईश्वर की सत्ता है और इन्द्रियों के द्वारा ज्ञान में भी ईश्वर ही अनेक लीलाएँ करता है। जैसे – स्वप्नद्रष्टा आप ही रेलगाड़ी बन जाता है, आप ही यात्री बन जाता है, आप ही स्टेशन और जंक्शन बन जाता है और मुंबई का हलवा, नड़ियाद का गोटा (पकौड़ा) खा ले, भरूच की सींग खा ले… सपने में भरूच भी तू ही बन गया और नड़ियाद भी तू ही बन गया और नड़ियाद के गोटे भी तू ही बन गया और खाने वाला दूसरा आया क्या ? तू ही खाता है। जान गये बलमा, पहचान गये… गाड़ी आगे चली तो आबू की रबड़ी-पूड़ी… अजमेर का दूध मीठा… क्या-क्या देखते हैं ! एक ही स्वप्नद्रष्टा क्या-क्या बन जाता है ! क्या तेरी लीला है ! हे प्रभु ! हे देव ! हे ज्ञानस्वरूपा, चैतन्यस्वरूपा ! उसकी महिमा विचारते-विचारते चुप हो गये तो बस, ठहर गये। जैसे रात्रि को चुप हो जाते हैं न, तो थकान मिट जाती है, ऐसे ही उसके प्रेम में चुप हो गये तो जन्म-मरण की थकान का पर्दा खुल जाता है धड़ाक-धुम ! ब्राह्मी स्थिति आ जाती है।

ब्राह्मी स्थिति प्राप्त कर, कार्य रहे न शेष।

मोह कभी न ठग सके….

ऐसा नहीं कि मोह सुबह न ठग सके, मोह रात को न ठग सके, मोह अमावस्या को न ठग सके, कभी न ठग सके-

 मोह कभी न ठग सके, इच्छा नहीं लवलेश।।

पूर्ण गुरु किरपा मिली, पूर्ण गुरु का ज्ञान।

आसुमल से हो गये, साँईं आसाराम।।

मालूम पड़ने से ही भोग होता है और भोग से ही सुख होता है तो ज्ञान से ही मालूम पड़ेगा, ज्ञान से ही भोग होगा, ज्ञान से ही सुख होगा। जो हिन्दी भाषा कतई न जानता हो अथवा बहरा हो, निपट निराला….. वह सत्संग में बैठा हो तो उसको सुख नहीं मिलेगा, माहौल के आन्दोलनों का भले उसे पुण्य हो लेकिन जो ज्ञान से सुख होता है न, वह फल वस्तु, व्यक्ति से नहीं होता। कुर्सी मिल गयी तो वह फल नहीं है लेकिन कुर्सी के सुख का फल हृदय में आया, वही फल है। चीज वस्तु पड़ी है वह फल नहीं है लेकिन उससे हृदय में जो सुख-दुःख होता है वही फल है। जब हृदय से ही सुख और दुःख के फल का एहसास होता है तो हृदय को ही ऐसा बनाओ की भावनामय हो जाये। काहे को झंझट में पड़ो ! बड़ा सौदा कर लो।

बुद्धि में सत्य का ज्ञान, सत्य का प्रकाश, इन्द्रियों में सच्चरित्रता, मन में सदभाव लाओ और ईश्वर को अपना मानो। सौंप दो उसको, बस हो गया। ज्यादा झंझट में पड़ो ही मत ! तीसरी पढ़े तो पढ़े, नहीं तो नहीं जाना ! हम गये तो समय बिगाड़ा तीन साल, हरि ૐ…. ૐ…. ऐसा अथाह खजाना है। हमने 3 साल बिगाड़े तो कोई 18 साल, 21 साल बिगाड़ के इधर आये। ईश्वर के सिवाये न जाने कितने जन्म बिगड़ गये, हे हरि ! कितनी उपलब्धियाँ बिगड़ गयीं ! क्योंकि  आप शाश्वत हो और शरीर, वस्तु और उपलब्धियाँ ने नश्वर हैं। आप नित्य हो, शरीर, उपलब्धियाँ अनित्य हैं। आप सुखस्वरूप हो, ज्ञानस्वरूप हो, चैतन्यस्वरूप हो। उपलब्धियाँ तो सँभाल-सँभाल के थक जाओगे। बुद्धि में सत्य का निश्चय हो। सत्य एक परमात्मा है। चित्त में समता हो, मन में भगवान का प्रेम हो, अपनत्व हो, सदभाव हो और आचरण में पवित्रता हो, बस ! फिर तो मौज हो गयी मौज ! मुक्ति हो गयी… शोक, दुःख, जन्म-मरण से पार हो गये !

स्रोतः ऋषि प्रसाद, दिसम्बर 2012, पृष्ठ संख्या 20 अंक 240

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आत्मज्ञान ही सार, बाकी सब बल भार !


संत ज्ञानेश्वर जी पुण्यतिथिः 11 दिसम्बर 2012

संत ज्ञानेश्वर महाराज का जन्म भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि की मध्यरात्रि में हुआ था। यह परम पावन पर्वकाल श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का था। एक बार संत ज्ञानेश्वर जी, निवृत्तिनाथजी, सोपानदेवजी व मुक्ताबाई – ये चारों भाई बहन नेवासा (महाराष्ट्र) पहुँचे। वहाँ उन्हें एक महिला अपने पति के शव के पास रोती दिखाई दी। करुणावश संत ज्ञानेश्वर जी द्वारा मृतक का नाम पूछे जाने पर महिला ने बतायाः “सच्चिदानंद।” नाम सुनते ही ज्ञानेश्वरजी बोल उठेः “अरे ! सत्-चित्-आनंद की तो कभी मृत्यु हो ही नहीं सकती।” फिर उऩ्होंने मृतदेह पर अपना हाथ फेरा और चमत्कार हो गया ! वह मरा हुआ व्यक्ति जीवित हो उठा। वह व्यक्ति नवजीवन देने वाले, सच्चिदानंदस्वरूप में जगे उन महापुरुष के शरणागत हो गया। यही सच्चिदानंद आगे चलकर ज्ञानेश्वरजी के गीताभाष्य के लेखक ʹसच्चिदानंद बाबाʹ बने।

कुछ समय बीतने पर चारों संत नेवासा से आलंदी की यात्रा पर निकले। चलते-चलते वे पुणताम्बे गाँव में पहुँचे, जहाँ गोदावरी के तट पर कालवंचना करते हुए चांगदेव जी महासमाधि लगाकर बैठे थे। 1400 वर्ष की तपस्या के बल से वे महायोगी तो बन गये थे परंतु गुरु ज्ञान न होने के कारण अहंकार जोर मारता था। चांगदेवजी समाधी लगाते तो उनके चारों और मृतदेहें रखी जाती थीं और आसपास मृतकों के सगे-संबंधी बैठे रहते थे। चांगदेव जी समाधि से उठते तो पूछतेः “यहाँ कोई है क्या ?” तब आसमान से प्रेत-आत्माएँ ʹहम यहाँ हैंʹ कहकर अपने-अपने शरीर में पुनः प्रवेश कर जाती थीं और वे मृतशरीर पुनः जीवित हो उठते थे।

इन संतों को जब इस बात का पता चला तो ʹमृतदेहों के सगे-संबंधियों को चांगदेव जी की समाधि टूटने की राह देखकर परेशान क्यों होना पड़े !ʹ ऐसा सोचकर मुक्ताबाई ने कहाः “इन सभी मृतदेहों को एकत्र करो, मैं इन्हें जीवित कर देती हूँ।”

ऐसा ही किया गया। संत ज्ञानदेव जी से संजीवनी मंत्र लेकर मुक्ताबाई ने पास में पड़ी कुत्ते की लाश को सभी मृतदेहों के ऊपर घुमाकर दूर फेंक दिया। उसी क्षण वह कुत्ता जीवित होकर भाग गया तथा सभी मृतक भी एक साथ जीवित हो उठे। सभी लोग संतों की अनायास बरसी कृपा का गुणगान करने लगे। वहाँ से विदाई लेकर चारों भाई-बहन आगे की यात्रा पर निकल पड़े।

इधर चांगदेवजी ने समाधि से उठते ही वही प्रश्न पूछा पर कोई जवाब नहीं मिला। शिष्यों से सारा वृत्तान्त सुनते ही चांगदेवजी को तुरंत विचार आया की ʹपैंठण में भैंसे वेदमंत्र बुलाने वाले महान योगी बालक कहीं यही तो नहीं हैं !ʹ अतः दर्शन की उत्सुकतावश अंतर्दृष्टि से उन्होंने बालकों को आलंदी के रास्ते जाते देखा। पर पहले पत्र द्वारा सूचित करना आवश्यक समझकर वे पत्र लिखने बैठे परंतु विचलित हो गये कि यदि उनके नाम के आगे चिरंजीवि लिखूँ तो वे मुझसे ज्यादा सामर्थ्यवान हैं अतः उनका अपमान होगा। यदि ʹतीर्थरूपʹ आदि श्रेष्ठतासूचक विशेषण लिखूँ तो मैं 1400 वर्ष का और मैं ही स्वयं को छोटा दिखाकर उऩ्हें सम्मान दूँ, इससे मेरी इतने वर्षों की तपश्चर्या निरर्थक हो जायेगी। उनके अहंकार ने जोर पकड़ा, अंततः उन्होंने कोरा कागज ही अपने शिष्य को हाथों भेज दिया।

कोरा पत्र देखकर मुक्ताबाई ने कहाः “चांगदेवजी ने यह कोरा कागज हमें भेजा है ! 1400 वर्ष की तपस्या करके भी चांगदेव कोरे-के-कोरे ही रह गये ! लगता है इन योगिरीज ने जिस तरह काल को फँसाया है, उसी तरह अहंकार ने इन्हें फँसाया है।”

निवृत्तिनाथजी बोलेः “सदगुरु नहीं मिले इसीलिए इन्हें आत्मज्ञान नहीं हुआ और अहंकार भी नहीं गया। ज्ञानदेव ! आप इन्हें ऐसा पत्र लिखें कि इनके अंतःकरण में आत्मज्योत जग जाय और ʹमैंʹ व ʹतूʹ का भेद दूर हो जाये।”

संत ज्ञानेश्वर जी ने वैसा ही पत्र लिखा किंतु जैसे जल के बिना दरिया और दरिया बिन मोती नहीं हो सकता, ऐसे ही गुरुदेव के मुख से निःसृत ज्ञानगंगा के बिना सच्चा बोध और अऩुभवरूपी मोती भी प्रगट नहीं हो सकता। वही योगी चांगदेव के साथ हुआ। अहंकारवश वे सोचने लगे कि ज्ञानदेव जी को वे अपने योग के ऐश्वर्य से प्रभावित कर देंगे। उन्होंने एक शेर पर दृष्टि डाली और संकल्प किया तो वह पालतू कुत्ते की तरह पूँछ हिलाते हुए उनके चरण सूँघने लगा। फिर चांगदेवजी ने एक भयंकर विषैले साँप पर अपने योगबल का प्रयोग किया और उसे चाबुक की तरह हाथ में धारण कर शेर पर सवार हो गये। अपने शिष्य समुदाय को साथ लेकर वे ज्ञानेश्वर जी के मिलने आकाशमार्ग से निकल पड़े।

इधर चारों संत चबूतरे पर बैठे थे कि अचानक चांगदेवजी को इस प्रकार आते देख मुक्ताबाई ने कहाः “भैया ! इतने बड़े योगी हमसे इस तरह मिलने आ रहे हैं तो हमें भी उनसे मिलने क्या उसी प्रकार नहीं जाना चाहिए ?”

ज्ञानेश्वरजी बोलेः “ठीक है, तो हम इसी चबूतरे को ले चलते हैं।” और वे चबूतरे पर अपना हाथ घुमाते हुए बोलेः “चल, हे अचल ! तू हमें ले चल। मैंने तुझे चैतन्यता दी है।”

क्षणमात्र की देर किये बिना अचल चबूतरा चलने लगा। जब चांगदेवजी ने देखा कि चारों संत सहज भाव से चबूतरे पर सवार होकर मेरी ओर आ रहे हैं और अहंकार का चिह्नमात्र भी किसी के चेहरे पर नहीं है तो उनका सारा अहंकार नष्ट हो गया। चांगदेव शेर से नीचे उतरे और दिव्यकांति ज्ञानदेवजी के चरणों से लिपट गये। चौदह सौ सालों से वहन किया गया भार उतारने से चागंदेवजी निर्भार हो गये।

सदगुरु बिना की तपस्या से सिद्धियाँ तो मिल सकती हैं परंतु आत्मशांति, आत्मसंतुष्टि, आत्मज्ञान नहीं। ऐसी तपस्या से तो जीवत्व में उलझाने वालि सिद्धियों को पाने का अहंकार पुष्ट होता है और यह मनुष्य को वास्तविक शांति से दूर कर देता है। कितनी बार मौत को भी पीछे धकेलने वाले चांगदेवजी को 1400 साल की तपस्या करने के बाद यही अनुभव हुआ।

यह अहंकार ब्रह्मज्ञानी संतों की शरण गये बिना, उनसे ब्रह्मज्ञान का सत्संग पाये बिना जाता नहीं है। आत्मा में जगे महापुरुषों की बिनशर्ती शरणागति स्वीकार करने पर अहंकार का विसर्जन तथा परम विश्रान्ति, परम ज्ञान की प्राप्ति वे महापुरुष हँसते-खेलते करवा देते हैं, जिसके आगे 1400 वर्ष की तपस्या से प्राप्त सिद्धियाँ भी कोई महत्त्व नहीं रखतीं। ऐसे ब्रह्मज्ञानी संत ज्ञानेश्वर जी ने आलंदी में विक्रम संवत 1353 में मार्गशीर्ष कृष्ण त्रयोदशी के दिन जीवित समाधि ली।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, पृष्ठ संख्या 18,19, दिसम्बर 2012, अंक 240

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