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Tatva Gyan

सन्देह और स्वीकार


(पूज्य बापू जी के सत्संग-प्रवचन से)

एक बात आप समझ लेना कि संसार को जानना हो तो आपको संशय करना पड़ेगा – यह कैसे हुआ, वह कैसे हुआ ? और सत्य को जानना है तो आपको सदगुरुओं के वचन स्वीकार करने पड़ेंगे। संसार को जानना है तो संदेह चाहिए और सत्य को जानना है तो स्वीकार चाहिए।

अब तुम गये मंदिर में। भगवान बुद्ध की मूर्ति है तो भगवान समझकर तुमने प्रणाम किये। विष्णु की मूर्ति है तो…..

त्वमेव माता च पिता त्वमेव

त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव।

त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव

त्वमेव सर्वं मम देवदेव।।

ऐसी प्रार्थना की। ऐसा नहीं सोचोगे कि ‘ये तो कुछ बोलते नहीं, ये माता-पिता कैसे हो सकते हैं ? ये तो जयपुर से साढ़े आठ हजार रूपये के आये हुए हैं।’ ऐसा नहीं, वहाँ तुम्हें संदेह नहीं करना होगा। ‘ये भगवान हैं क्योंकि प्राण-प्रतिष्ठा की हुई है। ये भगवान हैं, इनसे मेरा मंगल होगा, इनसे मेरा कल्याण होगा।’ – यह आपको मानना पड़ेगा। गये अम्बाजी। ‘अम्बे मात की जय। लाखों आये, लाखों गये मेरी माँ, तेरे द्वारे ! तू दया करना। मेरे छोकरों को राजी रखना। मेरे छोकरे नहायें, धोयें, खायें, अभी तो बीमार पड़े हैं….’ अब वहाँ संदेह नहीं करेगा कि माता जी को पुजारी नहलाता है। वहाँ मान लेना है कि माता जी की कृपा से छोकरे नहाते-धोते हो जायेंगे, छोकरे ऐसे हो जायेंगे। तो धर्म में तुम्हें संदेह नहीं बल्कि स्वीकार करना पड़ता है। स्वीकार करते-करते तुम एक ऐसी जगह पर आते हो कि तुम्हारी अपनी पकड़-जकड़ नहीं रहती और तुम स्वीकृति दे देते हो। जब स्वीकृति दे देते हो तो ऐसी तुम्हारे में जो समझ है वह श्रद्धा का रूप ले लेती है। श्रद्धा लेकर तुम जब सदगुरू के पास पहुँचते हो तो फिर श्रद्धा के बल से तुम ऊँची तात्त्विक बातें भी मानने लग जाते हो। तुम जो आज तक देह को मैं मान रहे थे, यह भी तो पुतला है, इस देह को मैं मान बैठे थे, मन में जो आता था वह मेरा मान बैठते थे। आँखों से दिखता था तो तुम बोलते थे, ‘मैं देखता हूँ,’ कानों से सुनाई पड़ता था तो तुम बोलते थे, ‘मैं सुनता हूँ’, नाक से सूँघते थे तो तुम बोलते थे, ‘मैं सूँघता हूँ’…. वह जो तुम्हारा ‘मैं’ और ‘मेरा’ – मेरी नाक और मैं सूँघने वाला, मेरी आँख और मैं देखने वाला, मेरा कान और मैं सुनने वाला, मेरा पेट और मैं खाने वाला – यह जो तुम्हारी सदियों की मान्यता है, भ्रम है उसे सदगुरु हटा देंगे। अब श्रद्धा के बल से स्वीकार के रास्ते तुम चले हो तो गुरु समझायेंगे कि ‘यह तुम नहीं करते हो, तुम्हारे शरीर में आँखें और मन का मेल होकर दिखता है। कान और मन का मेल होकर सुनाई पड़ता है। इन सबको जो देखता है…. जो मन को देखता है, जो बुद्धि के निर्णय को देखता है वह आत्मा तू है – तत्त्वमसि , यह मान ले।’

जब तुम ये ऊँची बातें मानने लग जाते हो तो ऊँचे तत्त्व का साक्षात्कार हो जाता है, यह हुआ ज्ञानसहित विज्ञान।

मैं आत्मा हूँ। कैसे आत्मा हूँ ? ऐसा प्रश्न पूछ सकते हो पर तुम्हारे हृदय में यदि श्रद्धा है और स्वीकार करने की क्षमता है तो इस प्रश्न का उत्तर मिलेगा तो तुम्हारे हृदय में बैठेगा। नहीं तो प्रश्नों के उत्तर कितने भी मिलें, ऐसा कोई शब्द नहीं जिसका प्रत्यवाय (काट) न हो। ऐसा कोई प्रश्न का उत्तर नहीं है जिसका तर्क करके खंडन न हो। तो सत्य तर्क से सिद्ध नहीं होता, सारे तर्क जिससे सिद्ध होते हैं अथवा सारे तर्क पैदा होकर जिसमें लीन हो जाते हैं वह सत्यस्वरूप परमात्मा तर्कों का विषय नहीं और मान लेने का विषय नहीं अपितु सब विषय उसी से उत्पन्न होते हैं, उसी में लीन हो जाते हैं। इसमें जब श्रद्धा होती है, इसे स्वीकार करने की क्षमता होती है, ईश्वर में प्रीति होती है तो ईश्वर के समग्र स्वरूप को जान लेता है आदमी। नहीं तो क्या कि ईश्वर के एक-एक खंड को आदमी पकड़ लेता है। मेरा तो भगवान है – झूलेलाल। झूलेलाल ही भगवान है। तो ‘झुलेलाल-झुलेलाल’ करेंगे तो आनंद आयेगा और दूसरे किसी भगवान की जय कर दी तो मेरा आनंद गायब हो जायेगा। अथवा तो मेरा तो इष्ट है रामजी, अब रामजी की जय हुई तो ठीक और श्रीकृष्ण की जय हुई तो आनंद गायब ! जब राम तत्त्व को जाना, झुलेलाल-तत्त्व को जाना, कृष्ण-तत्त्व को जाना तो पता चलेगा कि सत्ता एक है, आकृतियाँ अनेक हैं। सत्ता एक है, रूप अनेक हैं। जैसे – तुम्हारे अंदर सत्ता एक है परंतु आँख देखती है उसके रूप अनेक हैं। अंदर सत्ता एक है किंतु कान सुनते हैं उनके शब्द अनेक हैं। गंध अनेक हैं पर सूँघने की सत्ता एक है। जैसे तुम्हारे शरीर में सत्ता एक है ऐसे सबके शरीरों में सत्ता एक है। मनुष्यों के शरीर में तो सत्ता एक हुई लेकिन उसी सत्ता से गाय की आँखें देखती हैं जिस सत्ता से तुम देखते हो, उस सत्ता से ही भैंस देखती है जिस सत्ता से तुम देखते हो। हाँ, भैंस की बुद्धि में और तुम्हारी बुद्धि में, गाय की बुद्धि में और भैंस की बुद्धि में फेर हो सकता है परंतु सत्ता में फेर नहीं होता। तो इस सत्ता का स्वरूप समझ में आ जाय….

इस प्रकार विशेष ज्ञान में विचित्रता होती है, सामान्य ज्ञान में विचित्रता नहीं होती है। सामान्य ज्ञान सर्वत्र सम है, एक जैसा है और वह सदा एकरस है। उस एकरस को जानकर साधक निर्द्वन्द्व हो जाता है, निःशंक हो जाता है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अगस्त 2010, पृष्ठ संख्या 24,25 अंक 212

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ज्ञान की दृष्टि बना लो


(ज्ञानसिन्धु पूज्य बापू जी की अमृतवाणी)

जान लिया कीचड़ में कोई सार नहीं, जान लिया तरंग बनकर किनारों से टकराने में सार नहीं, अब तो मुझे जलराशि में ही अच्छा लगता है। भीड़भाड़ में विकारी लोगों के बीच रहना अच्छा नहीं लगता। एकांत में या तो फिर भगवान की मस्ती में जीनेवाले मस् साधकों के बीच रहना अच्छा लगता है, बाकी फिर हमें और कहीं अच्छा नहीं लगता। अब इन्द्रियों के प्रदेश में ज्यादा जीना, घूमना अच्छा नहीं लगता। इन्द्रियातीत आत्मभाव में, आत्मज्ञान में ही सुख का अनुभव है। ‘आओ सेठ ! बैठो सेठ ! फलाना सेठ !’ – ऐसे लोगों के पास अब सेठपने का अहं को पोसने में मजा नहीं आता। अब तो मजा आता है कि मिट जायें….

मिल जाये कोई पीर फकीर, पहुँचा दे भवपार।

जीवन की शाम हो जाय उसके पहले अपने जीवनतत्त्व में विश्रांति मिल जाय बस ! अब ‘फलानी जगह का यह चेयरमैन है, फलाने का यह है….’ – यह सब देख लिया खिलवाड़। अपने को सता के देख लिया, खपा के देख लिया। अभी देखना बाकी है तो फिर जरा करके देख लो। अब तक तो करके देख लिया आजीवन। अनुभवी आदमी एक थप्पड़ से चेत जाता है, नहीं तो फिर दूसरा मिलता है, तीसरा मिलता है।

संसार में प्रकृति थप्पड़ मार-मार के भी तुम्हें परमेश्वर पद में पहुँचाना चाहती है। अगर समझ के पहुँचते हो तो आराम से तुम्हें खेलते-कूदते ले जाने के लिए वह प्रकृति देवी तैयार है। नहीं मानते हो, मोह ममता करते हो तो वह चीज छीन के थप्पड़ मार के भी तुमको जगाने के लिए उत्सुक रहती है वह महामाया, क्योंकि वह तो आखिर परमेश्वर की आह्लादिनी शक्ति ! कोई  तुम्हारे शत्रु की तो है नहीं। माया कहो, प्रकृति कहो, है तो परमेश्वर की आह्लादिनी शक्ति, है तो उसी का अभिन्न अंग ! जैसे जल की चाहे कैसी भी तरंगें हो सागर में, है तो जल का ही विवर्त। परिणाम नहीं विवर्त, परिणाम तो बदल जाता है, विवर्त नहीं बदलता। जैसे दही दूध का परिणाम है, ऐसे ही भगवान का परिणाम जगत नहीं है। भगवान का विवर्त है जगत। वस्तु में अपने मूल स्वभाव को छोड़े बिना ही अन्य वस्तु की प्रतीति होना यह विवर्त है। सीपी में रूपा दिखना रस्सी में साँप दिखना विवर्त है।

ताना बुनते हैं न सूत का, तो कपड़े के एक छेड़े से दूसरे छेड़े तक अनेक आड़े-सीधे, गोलाकार, चौरसाकार या लम्बचौरस, जो भी तानाबुनी है सब सूत ही सूत होता है। ऐसे ही जगत में जो भी कुछ तानाबुनी है, सब ब्रह्म ही ब्रह्म की है। फिर मृत्यु कहाँ है ? जन्म भी कहाँ है ? अपना कहाँ ? पराया कहाँ ?

एक जगह महात्मा गाँधी का सूत के कपड़े में सूत का बना हुआ चित्र देखा गया। अब महात्मा गाँधी की वह चप्पल भी सूत है तो हाथ में डंडा भी सूत है और आँख पर चश्मा भी सूत है, जो धोती पहनी है वह भी सूत है और जो हड्डियाँ दिख रही हैं वे भी सूत ही सूत हैं। ऐसे ही सब ब्रह्म ही ब्रह्म है।

खाँड का खिलौना राजा बना है और महाराजा ! ताज पहना है, रथ पर बैठा है। वाइसराय बना है, ट्रेन के प्रथम श्रेणी के डिब्बे में बैठा है, टोपा पहना है। अब महाराज ! टिकट चेकर भी बना है खाँड का। उस वाइसराय को थप्पड़ मारकर टोपा तोड़ दो और मुँह में डालो तो स्वाद खाँड का आयेगा और टिकट चेकर का टिकट माँगने का हाथ उठा के मुँह में डालो तो स्वाद खाँड का ही आयेगा। उन खिलौनों में से घोड़ा, गधा, कुत्ता, बिल्ला, ऊँट, हाथी, साहब-साहिबा…. कोई भी मुँह में डालो तो स्वाद खाँड का आयेगा। ऐसे ही ब्रह्मज्ञान की दृष्टि बना लो, फिर जहाँ भी दृष्टि जायेगी परमेश्वर का ही ब्रह्मानंद आयेगा। जिसको एक जगह अपना प्रियतम, प्रिय मिलता है तो कितना आनंदित होता है ! कभी-कभी अपना प्रिय मिलता है, अपनी प्रिय वस्तु मिलती है, प्रिय व्यक्ति मिलता है, प्रिय जगह मिलती है तो कितना सुखद लगता है ! ज्ञानी को तो सब जगह अपना परम प्रिय मिलता रहता है, इसलिए वे परमानंद में मस्त रहते हैं। ज्ञान से तो आपको सदा सर्वत्र प्रिय-ही-प्रिय मिलेगा, जबकि वस्तुओं में तो कभी प्रिय वस्तु मिली तो भी छूट जायेगी। प्रिय वस्तु भोगते-भोगते शरीर दुर्बल हो जायेगा, निराशा आ जायेगी लेकिन ज्ञान की दृष्टि जगी, प्रेम की सरिता बही तो आपको सर्वत्र अपना प्यारा ही प्यारा दिखेगा।

एक आदमी जो अपने-आपको विषय विकार विलास में, सम्पूर्ण शरीर के सुखों में खर्च रहा है वह भी गलत जगह पर है, गलत जगह पर उसके पैर पड़े हैं। भविष्य उसका दुःखद और अँधकारमय होगा। दूसरा आदमी वह है जो सब कुछ छोड़कर निर्जन जंगल में रहता है। अपने शरीर को सुखाता है, मन को तपाता है, ‘संसार खराब है, यह मायाजाल है…. यह ऐसा है, यह वैसा है…. इससे बचो’ – ऐसा करके जो बिल्कुल त्याग करता है, ज्ञानसहित नहीं लेकिन एक धारा में बहते हुए त्याग करता है, वह भी कहीं गलत रास्ते की यात्रा करता है। बुद्धिमान तो वह है जो सबमें सब होकर बैठा है उस सर्वाधिष्ठान पर दृष्टि डाले। मोह-ममता का त्याग, संकीर्णता का त्याग, अहंकार का त्याग, उद्वेग-आवेश का त्याग… और वह त्याग तब सिद्ध होगा जब ज्ञान की दृष्टि से देखोगे, संकीर्णता मिटेगी। परमात्मा की दृष्टि से देखोगे तो मोह-ममता मिटेगी और सर्वेश्वर के ज्ञान से पल्लवित, पावन होकर तुम्हारा हृदय और मस्तिष्क जब तालबद्ध होंगे, तब तुम सब कुछ देते, लेते, खाते महात्यागी और महाभोगी, महान एकांती और महान-महान प्रवृत्ति करने वाले – दोनों की अनुभूतियाँ एक साथ करोगे।

त्यागी एक अलग छोर पर है, भोगी दूसरे छोर पर है लेकिन बुद्धिमान, ज्ञानवान, सत्शिष्य और साधक त्याग और भोग दोनों को साधन बनाकर जिससे त्याग और भोग दिखते हैं उस परम पद में जग जाते हैं। त्याग भोग जाके नहीं, सो विद्वान अरोग। भोग का रोग भी नहीं और त्याग का आवेश भी नहीं, ऐसे जो ज्ञानी हैं वे विद्वान निरोग होते हैं। ‘मैं त्यागी हूँ’ – ऐसा भाव भी जिनको नहीं है, ‘मैं भोगी हूँ’ – ऐसा भाव भी जिनको नहीं है, जो भोग और त्याग दोनों को इन्द्रियों का खिलवाड़ समझते हैं, मन का फुरना समझते हैं और सर्वत्र व्याप्त अपने सर्वेश्वर की सत्ता को अपने से अभिन्न मानते हैं, ऐसे धीर ज्ञानी के जो सत्शिष्य होते हैं, वे हर हाल में हर स्थिति में सुखद अनुभव, सुखद दृष्टि पा लेते हैं।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अगस्त 2010, पृष्ठ संख्या 12,13 अंक 212

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नंगा होना तो कोई विरला जाने !


(पूज्य बापू जी के सत्संग-प्रवचन से)

गांधारी ने दुर्योधन को कहा किः “मैंने आँखों पर पट्टी बाँध रखी है। मेरा तप इतना है कि आँख पर से पट्टी खोलूँ तो जैसा चाहूँ वैसा हो जायेगा। बेटे ! तू सुबह एकदम नग्न होकर आ जाना। मैं तुझे वज्रकाय हो जायेगा, फिर तेरे को कोई मार नहीं सकेगा।”

गांधारी की तपस्या सब लोग जानते थे। पांडवों में सनसनी फैल गयी। ‘दुर्बुद्धि दुर्योधन वज्रकाय हो जायेगा, अमर हो जायेगा तो धरती पर अच्छे आदमी का रहना मुश्किल हो जायेगा ! क्या करें ?….’ इस प्रकार पांडव बड़े दुःखी, चिंतित थे। भगवान श्रीकृष्ण आये। पांडव बोलेः “गोविन्द ! क्या आपने सुना, गांधारी ने दुर्योधन को बुलाया है कि एकदम निर्वस्त्र होकर आ, मैं पट्टी खोलकर तुझे देखूँगी तो तू वज्रकाय हो जायेगा और तुझे कोई मार नहीं सकेगा।”

श्रीकृष्ण हँसे। पांडव बोलेः “माधव ! आपको तो सब विनोद लगता है।”

“अरे ! विनोद ही है। सारा प्रपंच ही विनोद है, सारी सृष्टि विनोदमात्र है। जैसे नाटिका में उग्र रूप, सामान्य रूप, स्नेहमय रूप दुष्टों का क्रूर रूप…. जो कुछ दिखाते हैं, वह सब दर्शक के विनोद के लिए होता है। ऐसे ही यह सारी सृष्टि ब्रह्म के विनोदमात्र के लिए है, इसमें ज्यादा चिंतित होने की जरूरत नहीं है।”

“लेकिन वह दुर्योधन नंगा होकर जायेगा….”

“अरे ! वह बेवकूफ नंगा होना जानता ही नहीं है। नंगा होना जानता तो बेड़ा पार हो जाता। उसने तो अपने ऊपर काम के, क्रोध के, लोभ के, अहंता के विचारों के कई आवरण लगा दिये हैं।”

दुर्योधन नंगा होना जानता ही नहीं है, नंगा होना तो महापुरुष जानते हैं। अन्नमय कोष मैं नहीं हूँ, प्राणमय कोष मैं नहीं हूँ, मनोमय कोष मैं नहीं हूँ, विज्ञानमय कोष मैं नहीं हूँ, आनंदमय कोष मैं नहीं हूँ, बचपन मैं नहीं हूँ, जवानी मैं नहीं हूँ, बुढ़ापा मैं नहीं हूँ, सुख मैं नहीं हूँ, दुःख मैं नहीं हूँ…. इन सबको जाननेवाला मैं चैतन्य आत्मा हूँ – यह है नंगा होना।

खुश फिरता नंगम-नंगा है, नैनों में बहती गंगा है।

जो आ जाये सो चंगा है, मुख रंग भरा मन रंगा है।।

देखो रमण महर्षि कितने नंगे थे ! एक बार एक पंडित ने महर्षि के पास आकर लोगों को प्रभावित करने के लिए कई प्रश्न पूछे। महर्षि ने उठाया डंडा और पंडित को भगाने लगे। भारत के भूतपूर्व प्रधानमंत्री मोरारजी भाई देसाई, विदेशी पत्रकार पॉल ब्रंटन जैसे जिनके चरणों में बैठते थे, ऐसे रमण महर्षि कितने नंगे ! कोई आवरण नहीं। लोग सोच भी नहीं सकते कि शांत आत्मा, ब्रह्म-स्वरूप, सबमें अद्वैत ब्रह्म देखने की पराकाष्ठा पर पहुँचे हुए रमण महर्षि को ऐसा भी क्रोध आता है !

अरे, क्रोधी तो अपने को जलाता है, वे महापुरुष तो क्रोध का भी उपयोग करते हैं। आ गया गुस्सा तो आ गया, किसी का अहित करने के लिए नहीं परंतु व्यवस्था सँभालने के लिए। देखो, महापुरुष कितने नंगम नंगे हैं ! कोई आवरण नहीं। तो दुर्योधन नंगा होना नहीं जानता और गांधारी पट्टी खोलना नहीं जानती। पट्टी खोलती है पर मोह-ममता चालू रखती है तो पट्टी क्या खोली ! अपनी वर्षों की तपस्या अपने रज से उत्पन्न एक जीव के पीछे नष्ट कर रही है ! मासिक धर्म के रक्त को पीकर जो शरीर बना है और अधर्म कर रहा है, उसके पीछे गांधारी अपनी तपस्या खत्म कर रही है। धर्म के पक्ष में निर्णय लेना चाहिए, वह तो ममता में निर्णय लेकर अपने पापी बेटे को दीर्घ जीवन देना चाहती है तो उसने पट्टी नहीं खोली, बेवकूफी की पट्टी बाँधे रखी।

लोग समझते हैं कि नंगा होने में क्या है, कपड़े उतार दिये तो हो गया नंगा ! अरे ! कपड़े उतारने से कोई नंगा होता है क्या ! वह तो बेशर्म आदमी है। अहं की चादरें पड़ी हैं, विकारों की चादरें पड़ी हैं, मान्यताओं की चादरें पड़ी हैं……। नंगा तो कोई भाग्यशाली हो। लोग फोटो में देखते हैं कि श्रीकृष्ण ने चीर हरण किया और गोपियों को नंगा किया। चित्रकार भी ऐसे ही चित्र बना देते हैं कि गोपियाँ बेचारी चिल्ला रही हैं और श्रीकृष्ण कपड़े ऊपर ले गये। यह बेवकूफी है। श्रीकृष्ण ने ग्वाल गोपियों को नंगा किया, मतलब ‘मैं गोपी हूँ, मैं ग्वाल हूँ, मैं अहीर हूँ, मैं फलाना हूँ…..’ इन मान्यताओं की परतें हटायीं।

पाँच शरीर होते हैं और हर शरीर में अपने-अपने विकार होते हैं। वही चादरें ओढ़कर जीव जी रहा है, नंगा होना जानता ही नहीं।

हम अमेरिका में स्वीमिंग पूल देखने गये थे। वह सब पुरुषों के शरीर पर कोई कपड़ा नहीं था, एकदम नंगे। ऐसे नंगा होने से तो पाप लगता है। शरीर को नंगा करना शास्त्रविरूद्ध है। स्नानागार में भी नंगा नहीं रहना चाहिए। कोई-न-कोई वस्त्र कटि पर होना चाहिए।

श्रीकृष्ण ने कहाः “गांधारी पट्टी खोलना नहीं जानती है और दुर्योधन नंगा होना नहीं जानता है। तुम चिंता क्यों करते हो ?”

“माधव ! लेकिन वह देख लेगी तो ?”

“अरे ! तुम देखो तो सही। वह किस रास्ते से जाता है, मैंने पता करके रखा है।”

दुर्योधन एकदम नंगधड़ंग होकर जा रहा था तो श्रीकृष्ण ने देख लिया। अब ढकने को कुछ था नहीं तो ऐसे ही बैठ गया। श्रीकृष्ण ने कहाः “अरे दुर्योधन ! तू इतना समझदार और ऐसे जा रहा है ! वह तेरी माँ है और तू इतनी बड़ी उम्र का है, मैं तो पुरुष हूँ, जब मेरे सामने तेरे को इतना संकोच होता है तो माँ के सामने जाने पर कैसा होगा ! कम-से-कम कटिवस्त्र तो पहन ले।”

दुर्योधन को लगा कि बात तो ठीक कहते हैं। उसने कटिवस्त्र (कमर से घुटने तक शरीर ढकने का वस्त्र) पहन लिया।

दुर्योधन गया गांधारी के पास और गांधारी ने संकल्प किया कि ‘दुर्योधन के शरीर पर जहाँ-जहाँ मेरी नजर पड़े, वे सभी अंग वज्रसमान हो जायें।’ सारी तपस्या दाँव पर लगा दी। पट्टी खोली तो देखती है कि दुर्योधन ने कटिवस्त्र पहना है। उसको देखकर बोलने लगीः “अरे अभागे ! यह क्या कर दिया तूने !”

श्रीकृष्ण ने भीम को कहाः “अब दुर्योधन को कहाँ मारने से मरेगा, वह उपाय समझ लें। इधर-उधर गदा मारने की जरूरत नहीं है कमर पर ही गदा मारना, गांधारी ने उसके मरने का रास्ता बता दिया है।”

गांधारी ईश्वर विधान को जानती तो थी, धर्म का उसे ज्ञान तो था लेकिन उसका धन मोहवश अधर्म की पीठ ठोंकता है। किसी भी व्यक्ति-वस्तु परिस्थिति में ममता हुई, आसक्ति हुई, मोह हुआ तो समझो की मरे ! इसलिए मोह-ममता नहीं होनी चाहिए और वह सदगुरु की कृपा बिना नहीं मिटती।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जुलाई 2010, पृष्ठ संख्या 23, 24 अंक 211

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