Tag Archives: Tatva Gyan

Tatva Gyan

अध्यात्मज्ञान का नित्य अभ्यास करें….


संत श्री आसाराम जी बापू के सत्संग-प्रवचन से

अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम्।

एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोऽन्यथा।।

‘अध्यात्मज्ञान में नित्य स्थिति और तत्त्वज्ञान के अर्थरूप परमात्मा को ही देखना-यह सब ज्ञान है और जो इससे विपरीत है, वह अज्ञान है- ऐसा कहा है।’ भगवद्गीताः 13.11

संसार में जितने भी दुःख हैं, सब आत्मा के अज्ञान के कारण हैं, अध्यात्मज्ञान की कमी के कारण हैं। अध्यात्मज्ञान का आदर न करना ही सब दुःखों का मूल है। अतः जो सदा के लिए सब दुःख मिटाना चाहता है, उन्नति की पराकाष्ठा पर पहुँचना चाहता है और अपना मानव-जीवन सफल करना चाहता है उसे नित्य, निरंतर अध्यात्मज्ञान में निमग्न रहना चाहिए।

समर्थ रामदासजी ने कहा है- ‘भैंस के सींग पर राई का दाना जितनी देर ठहर जाय, उतनी देर भी मन अगर अध्यात्मज्ञान से रहित हो जाता है तो पतन होने की सम्भावना रहती है।’

भगवान कहते हैं- अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं ……

अध्यात्मज्ञान और लौकिक ज्ञान में फर्क है। अध्यात्मज्ञान है अपने-आपका ज्ञान और लौकिक ज्ञान है इधर-उधर का ज्ञान। इधर-उधर का ज्ञान तो ढेर सारा है किन्तु अपने-आपके ज्ञान की कमी है, अपने-आपको पता नहीं है। शरीर के सभी अवयवों का ज्ञान डॉक्टरों को भले रखें, लोहे-लकड़ी, ईंट-चूने का ज्ञान भले इंजीनियर के पास हो, राजनीति का ज्ञान राजनेता भले रखें परन्तु जब तक अपने आपका ज्ञान नहीं है तब तक दुनियाभर का सब ज्ञान मिलने पर भी सच्चा सुख मिलना संभव नहीं, सच्चा जीवन जीना संभव नहीं।

अतः अध्यात्मज्ञान का नित्य अभ्यास करें। अध्यात्मज्ञान में नित्य, निरंतर रत रहें और सर्वत्र, सब की गहराई में जो सत्-चित्-आनंदस्वरूप परमात्मा है उसको देखने की सावधानी रखें। जैसे पंखा अलग है, टयूबलाइट अलग है, बल्ब अलग है, टी.वी. अलग है, फ्रिज अलग है, हीटर अलग है फिर भी तत्त्वरूप से सत्ता सबमें विद्युत की है, ऐसे ही गाय घोड़े आदि पशुओं में, पक्षियों में, मनुष्यों में, सबमें नेत्रों के द्वारा सुनने की सत्ता उस परमेश्वर की है, कानों के द्वारा सुनने की सत्ता उस परमेश्वर की है, नाक के द्वारा सूँघने की सत्ता भी उस सच्चिदानंद की है। उस सच्चिदानंदस्वरूप को सबमें देखने का नित्य अभ्यास करें। नित्य इस अध्यात्मज्ञान में स्थित रहें और तत्त्वज्ञान के अर्थरूप उस परमात्मा को सर्वत्र देखें। यही ज्ञान है, यही ज्ञान का सदुपयोग है और इसके विपरीत जो है वह अज्ञान है।

‘मैं और मेरा… तू और तेरा… यह अच्छा है… यह बुरा है… यह ब्राह्मण है… यह क्षत्रिय है… यह वैश्य है… यह शूद्र है….’ सबको भिन्न न मानकर इन सबकी गहराई में उस परमात्मा का ज्ञान रखना ही सार है, बाकी का सब व्यवहारिकता है। अध्यात्मज्ञान प्रगाढ़ होता है तो बुद्धि विशाल होती है और अल्प होता है तो बुद्धि संकीर्ण होती है। संकीर्ण मति में ही ‘मैं-मेरे… तू-तेरे…’ का भेद उत्पन्न होता है। जिसने ‘मेरे-तेरे’ के भेद को मिटाकर सर्वत्र एवं सदा स्थित सच्चिदानंदस्वरूप का ज्ञान प्राप्त कर लिया उसके लिए कौन अपना और कौन पराया ?

जो भगवान के पूर्ण भक्त हैं, जो तत्त्वज्ञान के अर्थरूप परमात्मा में नित्य रमण करते हैं वे महापुरुष ईश्वर के अभिन्नस्वरूप होते हैं। उनके हृदय में नित्य, निरंतर भगवद्स्मरण होता रहता है। उनके रोम-रोम से भगवद्भाव उभरता है। उनके चित्त में सच्चिदानंद परमात्मा के अनुभव की तरंगें निरंतर उभरती रहती हैं।

ऐसे महापुरुष बनने के लिए क्या करना चाहिए ?

श्री रामानुजाचार्य ने कुछ उपाय बताये हैं, जिनका आश्रय लेने से साधक सिद्ध बन सकता है। वे उपाय हैं।

विवेक- आत्मा अविनाशी है, जगत विनाशी है। देह हाड़-मांस का पिंजर है, आत्मा अमर है। शरीर के साथ आत्मा का कतई सम्बन्ध नहीं है और वह आत्मा ही परमात्मा है। इस प्रकार का तीव्र विवेक रखें।

विमुखता– जिन वस्तुओं, व्यसनों को ईश्वर-प्राप्ति के लिए त्याग दिया फिर उनकी ओर न देखें, उनसे विमुख हो जायें। घर का त्याग कर दिया तो फिर उस ओर मुड़-मुड़कर न देखें। व्यसन छोड़ दिये तो फिर दुबारा न करें। जैसे कोई वमन करता है तो वह पुनः उस वमन को चाटने नहीं जाता, ऐसे ही ईश्वर-प्राप्ति में जो विघ्न डालने वाले कर्म हैं उन्हें एक बार छोड़ दिया तो उन कर्मों को फिर दुबारा न करें।

अभ्यास– भगवान के नाम-जप का भगवान के ध्यान का, सत्संग में जो ज्ञान सुना है उसका नित्य, निरंतर अभ्यास करें।

कल्याण- जो अपना कल्याण चाहता है वह औरों का कल्याण करे। निष्काम भाव से औरों की सेवा करें।

भगवद्प्राप्तिजन्य क्रिया- जो कार्य तन से करें उनमें भी भगवद्प्राप्ति का भाव हो, जो विचार मन से करें उनमें भी भगवद्प्राप्ति का भाव हो और जो निश्चय बुद्धि से करें उन्हें भी भगवद्प्राप्ति के लिए करें।

अनवसाद- बहुत दुःखी न हों। कोई भी दुःखद घटना घट जाये तो उसे बार-बार याद करके दुःखी न हों।

अनुहर्षात्- किसी भी सुखद घटना में हर्ष से फूलें नहीं।

जो साधक इन सात उपायों को अपनाता है वह सिद्धि को प्राप्त हो जाता है।

है तो सबके चित्त में अनन्त ब्रह्माण्डनायक परमात्म की सत्ता और शक्ति किन्तु बाहर का, ‘मेरे-तेरे’ का चिन्तन करके चित्त अध्यात्मज्ञान से रहित होकर अज्ञान में भटकने लगता है और स्थूल हो जाता है। जैसे, पानी वाष्प के रूप में होता है तो उसको रोकना मुश्किल होता है लेकिन शीतगृह (Cold Storage) में रखो तो बर्फ बन जाता है, फिर उसे हटाना भी भारी पड़ता है। ऐसे ही मानव है तो सच्चिदानंदस्वरूप आत्मा लेकिन मन, बुद्धि और इन्द्रियों में, फिर धीरे-धीरे शरीर की स्थूलता में आ गया तो वह लाचार हो गया। वह अगर शरीर में रहते हुए भी चित्त का परमात्मा के चिंतन मनन में लगाये, सात्त्विक आहार विहार करे, जप ध्यान करे तो मन-बुद्धि धीरे-धीरे सूक्ष्म होने लगती है और साधक परम सूक्ष्म परमात्मा को पाने में सफल हो सकता है।

…किन्तु इस सब साधनों में भी सातत्य चाहिए। ऐसा नहीं कि जप-ध्यान तो किया किन्तु जैसा-तैसा खा-पी लिया, जहाँ तहाँ स्पर्श कर लिया, जैसा तैसा बोल दिया। इससे साधनों के पालन से जो धारणाशक्ति बनती है वह बिखर जाती है। इसमें ज्यादा समय चला जाता है। अतः सातत्य चाहिए। जो साधक लगातार सात दिन तक मौन मंदिर में रहते हैं, उन्हें जो लाभ होता है उसे वे जिंदगी भर याद रखते हैं क्योंकि वहाँ कोई दुःखद, भोगों में भटकाने वाला वातावरण नहीं होता अपितु सुखद परमात्मप्रेम में प्रवेश करने वाला पावन प्रभुमय वातावरण होता है, जिससे साधक को दिव्य अनुभव होते हैं।

यह दिव्यता और आनंद आपके ही भीतर छुपा हुआ है। ज्यों-ज्यों चित्त सूक्ष्म होता जाता है, पवित्र होता जाता है, त्यों-त्यों दिव्यता उभरने लगती है, निर्मलता का एहसास होने लगता है और,

निर्मल मन जन सो मोहि पावा….

जिसका मन निर्मल है, भाव निर्मल है, कर्म निर्मल है, उद्देश्य निर्मल है वह परम निर्मलस्वरूप परमात्मा को पाने में भी सफल हो जाता है।

जगत के भोग भोगना यह मलिन उद्देश्य है और परमात्मसुख पाना यह निर्मल उद्देश्य है। जगत के ‘तेरे-मेरे’ के ज्ञान को दिमाग में भरना यह तुच्छ उद्देश्य है और अंतःकरण में परमात्मज्ञान को भरना यह निर्मल उद्देश्य है। जगत के भोगों की आकांक्षा करना यह मलिन उद्देश्य है और जगदीश्वर की प्राप्ति की आकांक्षा करना यह निर्मल उद्देश्य है।

जिसके जीवन में इस प्रकार का विवेक होता है वह थोड़े ही समय में परमात्मसुख, परमात्म-सामर्थ्य और परमानंद पाकर सब दुःखों और कर्मबन्धनों से सदा के लिए छूट जाता है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मार्च 2002, पृष्ठ संख्या 2-4, अंक 111

ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ

 

उद्देश्य ऊँचा बनायें


(उच्च कोटि के साधकों के लिए)

संत श्री आशाराम जी के सत्संग प्रवचन से

धन जोबन का करे गुमान वह मूरख मंद अज्ञान।

धन, यौवन, पद, विद्या, चतुराई, प्रमाणपत्र का जो गुमान करता है वह मूर्ख है, अज्ञानी है। जब तक तू ब्रह्मवेत्ता की तराजू में सही नहीं उतरता तब तक जीवात्मा है और जीवात्मा तो जन्म-मृत्यु, जरा-व्याधि का खिलौना है। जब तक ब्रह्मवेत्ताओं के गढ़ में ईमानदारी, समर्पण भाव या सच्चाई से नहीं पहुँचा तब तक तू जन्म-मृत्यु-जरा-व्याधि का खिलौना है।

वशिष्ठ जी महाराज कहते हैं- “हे राम जी ! ज्ञानवान की भली प्रकार सेवा करनी चाहिए। उनका बड़ा उपकार है। वे संसार-सागर से तारते हैं। आत्मज्ञानी के वचनों का आदर करना चाहिए। आत्मज्ञानी के वचनों का अनादर करना मुक्तिफल का त्याग करना है। आत्मज्ञानी में एक भी गुण हो तो ले लेना चाहिए किंतु उनमें दोष नहीं देखना चाहिए।”

आत्मज्ञानी का अपना प्रारब्ध होता है मिलने-जुलने, लेने-देने, खाने पीने इत्यादि का…. कुछ लोग गुरु के आगे तो कुछ बात करते हैं और अंदर में होता है कुछ दूसरा…. तो ऐसे लोगों पर गुरुकृपा नहीं छलकती। उनका मन भी मलीन हो जाता है।

अतः साधक को चाहिए की ईमानदारी से अपना कर्तव्य  करे। ईमानदारी से सेवा करे। ईमानदारी और सच्चाई उसमें सत्य की जिज्ञासा पैदा कर देगी।

साँच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप।

जाके हिरदै साँच है, ताके हिरदै आप।।

जो ज्यादा चतुराई करते हैं, आलस करते हैं, कामचोर बनते हैं उनको भगवान के रास्ते जाने की रूचि नहीं होगी।

साधक होने का मतलब है अपनी इच्छाएँ,  वासनाएँ, आलस्य-प्रमाद और दुष्चरित्र का त्याग करके भगवान के लिए अपने अहं को मिटाकर भगवत्प्रीति बढ़ाने हेतु, एक ऊँचा उद्देश्य पाने के लिए पूरे प्रयत्न से लग जाना।

अगर उद्देश्य ऊँचा बनाया है तो उसमें विकल्प के लिए कोई स्थान नहीं है। हजारों जन्मों का काम एक ही जन्म में करना है, हजारों जन्मों के संस्कार इसी जन्म में मिटाने हैं, हजारों जन्मों की दुष्ट वासनाएँ इसी जन्म में नष्ट करनी है।

साधक को चाहिए कि तत्परता और ईमानदारी से सेवा करे। अगर वह ईमानदारी और सच्चाई से सेवा करेगा तो उसकी सेवा भी साधना बन जायेगी। जो तत्परता से सेवा करता है उसे किसके साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए-यह अपने आप ही आ जाता है। जैसे, अपनी दुकान अथवा घर का काम तत्परता से करते हैं उससे भी ज्यादा सेवा के स्थल पर तत्परता आ जाये तो समझो, ईमानदारी की सेवा है।

नौकरी कामधंधे से समय बचाकर सेवा मिल गयी तो सेवा करें, नहीं तो जप ध्यान करें। अपना समय व्यर्थ न गँवायें।

भगवान सत्यस्वरप हैं। जो सच्चाई से जीता है, सच्चाई से सेवा करता है और सच्चाई से ध्यान-भजन करता है, वही ईश्वर के मार्ग पर दृढ़ता से चल पाता है।

लोग अपने कपड़े बदल देते हैं, मकान बदल देते हैं, अपना व्यवसाय बदल देते हैं लेकिन अपना स्वभाव नहीं बदलते। स्वभाव ही मनुष्य को स्वर्ग में ले जाता है, उसमें देवत्व ला देता है, स्वभाव ही मनुष्यों को नरकों में ले जाता है, स्वभाव ही मनुष्य को कामी-क्रोधी-लोभी-मोही बना देता है, स्वभाव ही मनुष्य को दूसरे की निन्दा करने वाला बना देता है और अगर स्वभाव दिव्य हो जाये तो ब्रह्मज्ञान भी प्राप्त हो जाता है।

शरीर तो जैसे का तैसा ही होता है, शरीर को क्या बदलेंगे और आत्मा तो अबदल है, अतः स्वभाव को ही बदलना है। उद्धव ने कृष्ण से पूछाः “सबसे बड़ी बहादुरी, शौर्य क्या है ?”

श्रीकृष्ण ने कहाः “बाह्य शत्रुओं पर विजय, दुनिया की सारी सत्ता पर विजय यह बड़ा शौर्य नहीं है अपने स्वभाव पर विजय पाना ही सबसे बड़ी बहादुरी, शौर्य है। स्वभावो विजयं शौर्यं।” श्रीमद भागवत

अपने अंतःकरण को बदलना चाहिए। अंतःकरण में अगर भगवद् ज्ञान, भगवन्नामजप और भगवद् ध्यान होगा तो अंतःकरण पवित्र होगा और पवित्र अंतःकरण में ही भगवद् प्राप्ति की प्यास जग सकेगी। भगवद् प्राप्ति से मनुष्य सारे पाशों से, सारे बंधनों से सदा के लिए छूट जायेगा।

अतः अपना उद्देश्य् भगवत्प्राप्ति का बनायें। अपना उद्देश्य ऊँचा बनायें और उसकी प्राप्ति में ईमानदारी से लगें। सावधान और सतर्क रहें कि कहीं समय व्यर्थ तो नहीं जा रहा ? अपने परमात्मप्राप्ति के लक्ष्य को सदैव याद रखें और लक्ष्य की तरफ जाने वालों का संग करें। अपने से ऊँचों का संग करें। इससे उद्देश्य को पाने में सहायता मिलेगी।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जनवरी 2002, पृष्ठ संख्या 6,7 अंक 109

ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ

सर्वकला भरपूर, प्रभु !


(ईश्वर सदा है सर्वत्र है और सबमें है। उसी के कारण हमारा अस्तित्व है। इसी बात पर प्रकाश डालते हुए पूज्यश्री कह रहे हैं-)

कंकर, पत्थर और पहाड़ में ईश्वर के अस्तित्व की एक कला है – अस्तिपना। कंकर, पत्थर और पहाड़ों का चूरा करके बालू बना दो। बालू का भी चूरा कर दो फिर भी उसका अस्तित्व मौजूद रहता है। उसे भी हवा में फूँक मारकर उड़ा दो तो वह तुम्हारी आँखों से ओझल हो जाता है, लेकिन उसका कहीं-न-कहीं अस्तित्व तो रहता ही है।

परमेश्वर की दो कलाएँ प्रतीत होती हैं- अस्तिपना और भोजन ग्रहण करने की क्षमता। बीज है, पौधा है, पेड़ है…. बीज को बो दो तो पौधा है, पौधे को बड़ा करो तो पेड़ है, पेड़ को काट दो तो लकड़ी है, लकड़ी का फर्नीचर आदि बना दो तो कुर्सी आदि है, उसको जला दो तो कोयला है, कोयले को जला दो तो राख है, राख को कहीं डाल दो तो खाद है। उसका है पना नष्ट नहीं होता। पेड़ पौधों में अस्तिपना तो होता ही है, भोजन ग्रहण करने की कला भी होती है।

क्षुद्र जीव-जंतुओं में परमेश्वर की तीन कलाएँ विकसित होती हैं- है पना, भोजन ग्रहण करने की क्षमता और स्थानांतरण करने की शक्ति।

पशु-पक्षियों में इन क्षुद्र जंतुओं से अधिक भगवान की चार कलाएँ विकसित देखी जाती हैं। उपरोक्त तीन के अलावा चौथी है- अपने माता-पिता एवं घर-घरौंदे की पहचानने की क्षमता। हजार गौओं के बीच भी बछड़ा अपनी माँ को पहचान लेता है, लेकिन बछड़ा नया संबंध नहीं जोड़ सकता है। उपनिषदों का ज्ञान, शास्त्रों का पठन, गुरुमंत्र का रहस्य जानना इत्यादि पशुयोनि में समझना बड़ा असम्भव सा लगता है। हाँ, किसी की पाँचवीं कला विकसित हो जाये तो हो सकता है।

मनुष्यों में उपरोक्त चारों के अलावा पाँचवीं कला भी विकसित है कि वह नया संबंध जोड़ सकता है और उन संबंधों को जीवनभर अच्छी तरह से याद भी रख सकता है। बछड़ा माँ को पहचान लेता है लेकिन जवानी में माँ और अन्य रिश्तेदारों को रिश्तेदारों के रूप में नहीं  पहचानता है। कामविकार उत्पन्न होता है तो बछड़े को मानवीय मर्यादा जैसा ज्ञान नहीं रहता है लेकिन मनुष्य को संबंधों को पहचानने एवं नया संबंध स्थापित करने की पाँचवीं कला भी प्राप्त है।

मनुष्य अपनी असली संबंध परमात्मा के साथ है, इसे भी जान सकता है और भावना से भगवत्संबंध भी जोड़ सकता है। वह कई नये संबंध भी जोड़ सकता है, कई कल्पित संबंध तोड़ भी सकता है और परमात्मा के साथ अपने वास्तविक संबंध को पहचान सकता है। आत्मा का वास्तविक संबंध परमात्मा से है, इसको पहचानने की कला मनुष्य में है, मन से शाश्वत सच्चिदानंद से जुड़ने की कला मनुष्य में है।

यदि मनुष्य के जीवन में व्रत नियम है, एकादशी का व्रत करता है, जप-ध्यानादि करता है, संत महापुरुषों का सत्संग करता है तो धीरे-धीरे छठी, सातवीं आठवीं, नवमी कला विकसित करके दसों इन्द्रियों के आकर्षणों से पार परमात्म-अनुभव प्राप्त करके, दस कला का धनी हो जाता है, ब्रह्मवेत्ता-साक्षात्कारी पुरुष हो जाता है उसकी समता सर्वभूतहितरेता आदि पाँच कलाएँ और विकसित हो जाती हैं।

फिर भी यदि कोई और अधिक सामर्थ्य पाना चाहे तो योग-अभ्यास करके बाकी की छः कलाएँ भी प्राप्त कर सकता है। वेदों का पूर्ण ज्ञान, पूर्ण ऐश्वर्य, पूर्ण यश, मृतक को जीवनदान देने का सामर्थ्य आदि छः भागवीय कलाएँ भी वह विकसित कर सकता है।

ब्रह्मज्ञानियों के जीवन में 10 कलाएँ विकसित होती हैं। श्रीरामजी के जीवन में 12 कलाएँ विकसित थीं और श्रीकृष्ण के जीवन में 16 कलाएँ विकसित थीं।

आप श्रीकृष्ण की नाईं 16 कलाएँ विकसित न करो तो कोई हरकत नहीं, श्रीराम की नाईं 12 कलाएँ विकसित न करो तो भी चल जायेगा लेकिन राजा जनक और परीक्षित की नाईं, मदालसा और गार्गी की नाईं कम-से-कम 10 कलाएँ तो विकसित कर लो। जिसकी 10 कलाएँ विकसित हो जाती हैं, वह मुक्तात्मा हो जाता है, महात्मा हो जाता है।

अपने जीवन में सर्वकला भरपूर प्रभु को जान लेने से मानव को चिंताएँ, दुःख, मुसीबत, शोक, भय, विषय-विकार आदि परेशान नहीं कर सकते, लेकिन उसे इस बात का पता ही नहीं कि उसका जन्म उस सर्वकला भरपूर प्रभु को जानने के लिए हुआ है।

हमें मनुष्य रूप में जन्म इसीलिए मिला है कि हम इस विनाशी शरीर में रहते हुए भी अविनाशी आत्मा को जानकर जीते-जी मुक्ति का अनुभव कर सकें। इस नश्वर शरीर में रहकर भी जीवन्मुक्त होकर विचरण करते हुए उस शाश्वत के गीत गायें।

लेकिन मनुष्य का बड़े-में-बड़ा दुर्भाग्य है कि संसार के भोग-विलास में फँसकर, जगत के बाह्य आकर्षणों में फँसकर, विषय-विकार में उलझकर, मोह-माया और अहंकार में फँसकर भवसागर में गोते खा रहा है। उस सर्वकला भरपूर प्रभु को न जानने के कारण यह जीव बेचारा निराश होकर मर जाता है। नानक जी ने कहा हैः

सर्वकला भरपूर प्रभु बिरथा जाननहार।

जाके सुमिरन उगरिये नानक तिस बलिहार।।

व्यर्थ में संसार की बातें करने-सुनने से राग और द्वेष बढ़ते हैं तथा  अहंकारवश जीव अपनी योग्यताएँ कुंठित कर लेता है। मिथ्या जगत के व्यवहार में तथा पद-प्रतिष्ठा के अभिमान में अपने स्व को न जानकर यह जीव बाजी हार जाता है।

संसार के मिथ्या व्यवहार के अभिमान में पड़कर ही रावण, कंस, हिटलर, सिकंदर आदि अभिमानी और अहंकारियों ने जीवन की बाजी हारी, लेकिन भगवान श्रीराम, भगवान श्रीकृष्ण, बुद्ध, नानक, कबीर, शबरी, मीरा आदि ने अपने आत्मस्वरूप में जगकर जन्म-मरण के चक्र पर विजय पायी थी। वे लोग अपने-आपमें तो तृप्त रहे ही, साथ ही अपने सम्पर्क में आने वालों को भी तृप्त किया।

हमने आज तक ऐसा कहीं भी देखा या सुना नहीं है कि फलानी जगह पर रावण,कंस, हिटलर, सिकंदर के मंदिर हैं या उनके चित्र को लोग पूजते हैं। लेकिन भगवान श्रीराम के, श्रीकृष्ण के मंदिर सर्वत्र हैं, उनके तस्वीर की पूजा करने वाले तथा उनके भजन गाने वाले करोड़ों लोग आपको मिल जायेंगे।

बुद्ध, कबीर,नानक आदि को पूजने वाले तथा उनके गीत गाने वाले भी आपको कई मिल जायेंगे। थे तो वे भी हमारे जैसे मनुष्य शरीर में,लेकिन उन्होंने मानव-जीवन के लक्ष्य को जाना तथा उस दिशा में चल पड़े तो उस प्रभु को जानकर जीवन्मुक्त हो गये। नानक जी ने ठीक ही कहाः

सर्वकला भरपूर प्रभु बिरथा जाननहार।

जाके सुमिरन उगरिये नानक तिस बलिहार।।

जिस परमात्मा के सुमिरनमात्र से इस जीव का उद्धार हो जाता है, अंतःकरण पवित्र तथा निर्मल हो जाता है, भय और चिंताएँ दूर हो जाती हैं, रोगप्रतिकारक शक्ति का विकास हो जाता है तथा काम, क्रोध और लोभ नष्ट हो जाते हैं, ऐसे सर्वकला भरपूर परमात्मा पर मैं कुर्बान जाऊँ !

पृथ्वी पर सारे जीव-जंतु आदि की चेतनाशक्ति कहाँ से आती है ? फल-फूल में विटामिन पैदा करने की शक्ति कहाँ से आती है? जल में द्रवता तथा रस उत्पन्न करने की शक्ति कहाँ से आती है ? बच्चों के नाज़-नखरे, उनकी गंदगी, दुर्गन्ध को सहते हुए भी माता में उनके प्रति स्नेह एवं दुलार से सेवा करने की शक्ति कहाँ से आती है ? राजाओं में राज्य करने की समझ कहाँ से आती है ? और संतों में वक्तृत्व की तथा श्रोताओं में श्रोतृत्व की शक्ति कहाँ से आती है ? उसी सर्वकला भरपूर प्रभु से !

वह सर्वकला भरपूर प्रभु हमें भी कभी संसार से वैराग्य दिलाकर अपने ईश्वरीय मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करता है। कभी सत्संग का प्रेम-प्रसाद चखाकर कभी ध्यान-भजन-कीर्तन का रस चखाकर अपने परमात्मरस में डुबाना चाहता है।

वह कितना दयालु है, कितना उदार है कितना धैर्यवान है ! जो हमें येन केन प्रकारेण अपने आत्मस्वरूप का प्रभाव देकर अपने ही स्वरूप में जगाना चाहता है, हमें अपने स्वरूप का दान करना चाहता है।

जब वह अपने स्वरूप का दान करने के लिए तैयार बैठा है तो हम देरी क्यों करें? पहुँच जायें ऐसे किन्हीं संत-महापुरुषों के चरणों में, जिन्होंने उस सर्वकला भरपूर प्रभु के स्वरूप को जाना है… उनके बताये मार्ग के अनुसार चलकर हम भी उस प्रभु को जानने में समर्थ हो सकते हैं जो सर्वकला भरपूर हैं।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, दिसम्बर 2001, पृष्ठ संख्या 3-5, अंक 108

ૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐ