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Tatva Gyan

संतों का संग अमोघ होता है


संत श्री आसारामजी बापू के सत्संग-प्रवचन से

जब-जब हम ईश्वर एवं गुरु की ओर खिंचते हैं, आकर्षित होते हैं तब-तब मानों कोई-न-कोई सत्कर्म हमारा साथ देते हैं और जब-जब हम दुष्कर्मों की ओर धकेले जाते हैं तब-तब मानों हमारे इस जन्म अथवा पुनर्जन्म के दूषित संस्कार अपना प्रभाव छोड़ते हैं। अब देखना यह है कि हम किसकी ओर जाते हैं ? हम पाप की ओर झुकते हैं कि पुण्य की ओर ? संत की ओर झुकते हैं कि असंत की ओर ? जब तक आत्मज्ञान नहीं होता तब तक संग का रंग लगता रहता है। संग के प्रभाव से साधु असाधु बन जाता है एवं असाधु भी साधु हो जाता है।

किया हुआ भगवान का स्मरण कभी व्यर्थ नहीं जाता। किया हुआ ध्यान-भजन, किये हुए पुण्यकर्म हमें सत्कर्मों की ओर ले जाते हैं। इसी प्रकार किये हुए पापकर्म, हमारे अंदर के अनंत जन्मों के पाप-संस्कार हमें इस जन्म में दुष्कृत्य की ओर ले जाते हैं। फिर भी वे ईश्वर हमें कभी-न-कभी जगा देते हैं जिसके फलस्वरूप पाप के बाद हमें पश्चाताप होता है और वैराग्य आता है। उसी समय यदि हमें कोई सच्चे संत मिल जायें, किन्हीं सदगुरु का सान्निध्य मिल जाय तो फिर हो जाये बेड़ा पार।

स्वार्थ, अभिमान एवं वासना के कारण हमसे पाप तो खूब हो जाते हैं लेकिन संतों का संग हमें पकड़-पकड़कर, पाप में से खींचकर भगवान के ध्यान में ले जाता है। हजार-हजार असंतों का संग होता है, हजार-हजार झूठ बोलते हैं फिर भी एक बार का सत्संग दूसरी बार और दूसरी बार का सत्संग तीसरी बार सत्संग करा देता है। ऐसा करते-करते संतों का संग करने वाले एक दिन स्वयं संत के ईश्वरीय अनुभव को अपना अनुभव बना लेने में सफल हो जाते हैं।

…तो मानना पड़ेगा कि किया हुआ संग चाहे पुण्य का संग हो या पाप का, असंत का संग हो या संत का, उसका प्रभाव जरूर पड़ता है। फर्क केवल इतना होता है कि संत का संग गहरा असर करता है, अमोघ होता है जबकि असंत का संग छिछला असर करता है। पापियों के संग का रंग जल्दी लग जाता है लेकिन उसका असर गहरा नहीं होता है, जबकि संतों के संग का रंग जल्दी नहीं लगता और जब लगता है तो उसका असर गहरा होता है। पापी व्यक्ति इन्द्रियों में जीता है, भोगों में जीता है, उसके जीवन में कोई गहराई नहीं होती इसलिए उसके संग का रंग गहरा नहीं लगता। संत जीते हैं सूक्ष्म से सूक्ष्म परमात्मतत्त्व में और जो चीज जितनी सूक्ष्म होती है उसका असर उतना ही गहरा होता है। जैसे, पानी यदि जमीन पर गिरता है तो जमीन के अंदर चला जाता है क्योंकि जमीन की अपेक्षा वह सूक्ष्म होता है। वही पानी जमीन में गर्मी पाकर वाष्पीभूत हो जाये, फिर चाहे जमीन के ऊपर आर.सी.सी. बिछा दो तो भी पानी उसे लाँघकर उड़ जायेगा। ऐसे ही सत्संग व्यर्थ नहीं जाता क्योंकि संत अत्यंत सूक्ष्म परमात्मतत्त्व में जगे हुए होते हैं। हमारे घर की पहुँच हमारे गाँव तक होती है, गाँव की पहुँच राज्य तक होती है, राज्य की पहुँच राष्ट्र तक, राष्ट्र की पहुँच दूसरे राष्ट्र तक होती है किन्तु संतों की पहुँच… इस पृथ्वी को तो छोड़ो, ऐसी कई पृथ्वियों, कई सूर्य एवं उसके भी आगे अत्यन्त सूक्ष्म जो परमात्मा है, जो इन्द्रियातीत, लोकातीत, कालातीत है, जहाँ वाणी जा नहीं सकती, जहाँ से मन लौट आता है उस परमात्मपद, अविनाशी आत्म तक होती है। यदि हमें उनके संग का रंग लग जाये तो फिर हम किसी भी लोक-लोकान्तर में, देश-देशान्तर में हों या इस मृत्युलोक में हों, सत्संग के संस्कार हमें उन्नति की राह पर ले ही जायेंगे।

अपनी करनी से ही हम संतों के नजदीक या उनसे दूर चले जाते हैं। हमारे कुछ निष्कामता के, सेवाभाव के कर्म होते हैं तो हम भगवान और संतों के करीब जाते हैं। संत-महापुरुष हमें बाहर से कुछ न देते हुए दिखें किन्तु उनके सान्निध्य से हृदय में जो सुख मिलता है, जो शांति मिलती है, जो आनंद मिलता है, जो निर्भयता आती है वह सुख, वह शांति, वह आनंद विषयभोगों में कहाँ ?

एक युवक एक महान संत के पास जाता था। कुछ समय बाद उसकी शादी हो गई, बच्चे हुए। फिर वह बहुत सारे पाप करने लगा। एक दिन वह रोता हुआ अपने गुरु के पास आया और बोलाः “बाबाजी ! मेरे पास सब कुछ है-पुत्र है, पुत्री है, पत्नी है, धन है लेकिन मैं अशांत हो गया हूँ। शादी के पहले जब आता था तो जो आनंद व मस्ती रहती थी, वह अब नहीं है। लोगों की नजरों में तो लक्षाधिपति हो गया लेकिन बहुत बेचैनी रहती है बाबाजी !”

बाबाजीः “बेटा ! कुछ सत्कर्म करो। प्राप्त संपत्ति का उपयोग भोग में नहीं, अपितु सेवा और दान-पुण्य में करो। जीवन में सत्कृत्य कर करने से बाह्य वस्तुएँ पास में न रहने पर भी आनंद, चैन और सुख मिलता है और दुष्कृत्य करने से बाह्य ऐशो-आराम होने पर भी सुख-शांति नहीं मिलती है।”

हम सुखी हैं कि दुःखी हैं, पुण्य की ओर बढ़ रहे हैं कि पाप की ओर बढ़ रहे हैं-यह देखना हो और लंबे चौड़े नियमों एवं धर्मशास्त्रों को न समझ सकें तो इतना तो जरूर समझ सकेंगे कि हमारे हृदय में खुशी, आनंद और आत्मविश्वास बढ़ रहा है कि घट रहा है। पापकर्म हमारा मनोबल तोड़ता है। पापकर्म हमारी मन की शांति खा जायेगा, हमें वैराग्य से हटाकर भोग में रुचि करायेगा जबकि पुण्यकर्म हमारे मन की शांति बढ़ाता जायेगा, हमारी रुचि परमात्मा की ओर बढ़ाता जायेगा।

जो लोग स्नान-दान, पुण्यादि करते हैं, सत्कर्म करते हैं उनको संतों की संगति मिलती है। धीरे-धीरे संतों का संग होगा, पाप कटते जायेंगे और सत्संग में रूचि होने लगेगी। सत्संग करते-करते भीतर के केन्द्र खुलने लगेंगे, ध्यान लगने लगेगा।

हमें पता ही नहीं है कि एक बार के सत्संग से कितने पाप-ताप क्षीण होते हैं, अंतःकरण कितना शुद्ध हो जाता है और कितना ऊँचा उठ जाता है मनुष्य ! यह बाहर की आँखों से नहीं दिखता। जब ऊँचाई पर पहुँच जाते हैं तब पता चलता है कि कितना लाभ हुआ ! हजारों जन्मों के माता-पिता, पति-पत्नी आदि जो नहीं दे सके, वह हमको संत सान्निध्य से हँसते खेलते मिल जाता है। कोई-कोई ऐसे पुण्यात्मा होते हैं जिनको पूर्वजन्म के पुण्यों से इस जन्म में जल्दी गुरु मिल जाते हैं। फिर ब्रह्मज्ञानी संत का सान्निध्य भी मिल जाता है। ऐसा व्यक्ति तो थोड़े से ही वचनों से रँग जाता है। जो नया है वह धीरे-धीरे आगे बढता है। जिसके जितने पुण्य होते हैं, उस क्रम से वह प्रगति करता है।

जैसे वृक्ष तो बहुत हैं लेकिन चंदन के वृक्ष कहीं-कहीं पर ही होते हैहं। ऐसे ही मनुष्य तो बहुत हैं लेकिन ज्ञानी महापुरुष कहीं-कहीं पर ही होते हैं। ऐसे ज्ञानवानों के संग से हमारा चित्त शांत और पवित्र होता है एवं धीरे-धीरे उस चित्त में आत्मज्ञान का प्रवेश होता है और आत्मज्ञान पाकर मनुष्य मुक्त हो जाता है। जिस तरह अग्नि में लोहा डालने से लोहा अग्निरूप हो जाता है, उसी तरह संत-समागम से मनुष्य संतों की अनुभूति को अपनी अनुभूति बना सकता है। ईश्वर की राह पर चलते हुए संतों को जो अनुभव हुए हैं, जैसा चिन्तन करके उनको लाभ हुआ है ऐसे ही उनके अनुभवयुक्त वचनों को हम अपने चिंतन का विषय बनाकर इस राह की यात्रा करके अपना कल्याण कर सकते हैं।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अक्तूबर 1999, पृष्ठ संख्या 5-7 अंक 82

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मुक्ति कैसे पायें ?


संत श्री आसारामजी बापू के सत्संग-प्रवचन से

असमाधेरविक्षेपान्न मुमुक्षर्न चेतरः।

निश्चित्य कल्पितं पश्यन्ब्रह्मैवास्ते महाशयः।।

ʹज्ञानी पुरुष समाधिरहित होने के कारण मुमुक्षु नहीं है और विक्षेप (द्वैतभ्रम) के अभाव के कारण उसके विपरीत अर्थात् बद्ध भी नहीं है परंतु निश्चयपूर्वक इस सब जगत को कल्पित समझता हुआ ब्रह्मवत् स्थित रहता है।ʹ (अष्टावक्रगीताः 18.28)

अष्टावक्र मुनि कहते हैं कि ज्ञानी महापुरुष को न समाधि है, न विक्षेप है, न मुमुक्षा है। मुमुक्षा उसे प्राप्त होती है जिसे छूटना होता है। ज्ञानी को न छूटना है न बँधना है।

छूटने की चाह भी तो एक इच्छा है। हालाँकि धन की इच्छा, मान की इच्छा, नश्वर भोगों की इच्छा से तो भगवान की भक्ति की इच्छा अच्छी है। फिल्म देखने की इच्छा से तो भजन कीर्तन में जाने की इच्छा ठीक है लेकिन है तो इच्छा ही। फिल्म देखकर मनुष्य थोड़ा रजस-तमस का मजा लेता है तो कीर्तन करके थोड़ा सात्त्विक मजा लेता है लेकिन मजा जहाँ से आता है वहाँ तो उसकी अभी गति नहीं हुई है।

यह बात ठीक है कि अन्य इच्छाओं को मिटाने के लिए मुक्ति की इच्छा की जाये, किन्तु जब मनुष्य ऊँचा उठता है तो एक ऐसी घड़ी आती है कि मुक्ति की इच्छा भी उसे बाधक लगने लगती है। मुक्ति की इच्छा भी जब छूट जाती है तब मनुष्य परम पद पाने का मोक्ष पाने का अधिकारी बनता है।

मुक्ति की इच्छा भी तो भविष्य की इच्छा ही है और जो भविष्य में सुखी होने की इच्छा रखते हैं, भविष्य में भगवान से मिलने की इच्छा करते हैं वे तो मानों संसार की इच्छा को ही दृढ़ करते हैं। जो वर्त्तमान में ही इच्छाओं को छोड़ देते हैं, उनके हृदय में उसी समय परमात्म-प्रेम, परमात्म-रस छलकने लगता है।

मेरे गुरुदेव से किसी व्यक्ति ने प्रश्न किया किः “मुक्ति कैसे पायें ? संसार की इच्छाएँ कैसे छूटें ?”

गुरुदेव बोलेः “मान लो एक कुआँ है जिसमें काई हो जाने के कारण गंदगी हो गयी है। अब कोई पूछे कि ʹइस कुएँ का पानी तो काम नहीं आ सकता। इसको काम में कैसे लाया जाये ?ʹ

जवाब होगाः “मछलियाँ डाल दो।”

काई को तो मछलियाँ साफ कर देती हैं किन्तु धीरे-धीरे मछलियों का परिवार बढ़ जाता है। फिर कछुआ डाल दो। कछुआ धीरे मछलियों को साफ कर देगा। फिर कछुए को भी निकाल दो तो पानी निर्मल हो जायेगा।

ऐसे ही सुख लेने की इच्छाएँ हमें चंचल कर देती हैं, विक्षिप्त कर देती हैं। अतः उस विक्षेप को हटाने के लिए, चंचलता और आसक्ति को हटाने के लिए, सुख लेने की इच्छा हटाने के लिए सुख देने की इच्छा डाल दो तो संसार की विषय-विकारों रूपी काई को साफ करने में मदद मिलेगी और भीतरी सुख उभरने लगेगा।”

वैसे भी सुख लेने की इच्छा हमें वास्तव में दुःख ही देती हैं जबकि सुख देने की इच्छा से आनंद आने लगता है। सेवा लेने वाले को उतना आनंद नहीं आता जितना सेवा करने वाले को आता है। भोजन करने वाले को उतना आनंद नहीं आता, जितना भोजन कराने वाले को आता है। दान लेने वाले को उतना आनंद नहीं आता, जितना उत्साह से दान देने वाले को आता है। यह तो कईयों का अनुभव है।

सेवा करके सुखी होना यह आदर्श भोक्ता के लक्षण हैं जबकि सेवा लेकर सुखी होना यह बीमार भोक्ता के लक्षण हैं… लेकिन हैं दोनों भोक्ता ही। अभी परम शांति से वे दोनों दूर हैं। सेवा करते-करते अन्तःकरण की शुद्धि होने लगती है और उसमें लीन होने से शांति प्राप्त होती है। शांति दोषों की निवर्तक व प्रसाद की जननी है। वह परमात्मशांति ही सार है। परमात्मशांति जहाँ से प्रकट होती है उस परमात्मभाव में जाग जाना परम सार है।

फिर मनुष्य के मन में जिज्ञासा उठने लगती है कि ʹमैं कौन हूँ ? जगत क्या है ? भगवान कैसे हैं ? मुक्ति क्या है ?ʹ आदि। ऐसे प्रश्न जिसके हृदय में अपने-आप उठने लगे तो समझना चाहिए कि उसका भजन फलित हो रहा है। उसमें मोक्ष की आकांक्षा जाग उठती है। फिर साधक देखने लगता है कि ʹकौन सी इच्छा आयी ? इच्छा पूरी हुई तो क्या ?ʹ इस प्रकार उसकी सात्त्विक इच्छाएँ भी छूटने लगती हैं।

सब इच्छाओं को हटाते-हटाते अंत में मुक्ति की इच्छा आये या भगवद्-दर्शन की इच्छा आये तो उसको भी हटा दो। फिर देखो, कितनी शांति और कितना आनंद आपके हृदय में अपने-आप प्रगट होने लगता है ! फिर तो नानकजी की भाषा में आपकी ऐसी स्थिति हो जायेगी किः

भोग-जोग जाके नहीं, वैरी मीत समान।

कह नानक सुन रे मना, मुक्त ताहि ते जान।।

मलिन वासनाओं को हटाने के लिए शुद्ध वासनाओं की आवश्यकता होती है। जगत के आकर्षण और चिंतन से बचने के लिए भगवान के भजन-कीर्तन की, भगवद्-चिंतन की आवश्यकता है लेकिन जब आप वासनाओं को, इच्छाओं को महत्त्व देना बंद कर देते हो, मन से संबंध-विच्छेद कर लेते हो तो फिर शुभ वासनाओं की, शुभ इच्छाओं की भी कोई जरुरत नहीं रह जाती।

तुच्छ इच्छा वासनाओं का  प्रभाव आप पर तब तक ही रहता है जब तक आप सावधान नहीं रहते हो। आप सावधान हो गये तो फिर वासनाओं का प्रभाव भी नष्ट हो जायेगा। वासनाएँ आती हैं मन में और आप असावधान रहते हैं तो उनकी पूर्ति में लग जाते हैं। यदि आप सावधान हो गये तो आप उन्हें पूरी करने में नहीं लग जायेंगे, बल्कि थोड़ा विचार करेंगे। अतः इच्छाओं को मिटाने के लिए सतत् मन का निरीक्षण करते रहो। उसे तुच्छ विषय-विकारों की ओर जाने से रोकते रहो। जैसे पंखा घूमता है किन्तु यदि आप बटन बंद कर दें, विद्युत संपर्क काट दें तो उस पंखे का घूमना कब तक जारी रहेगा ? ऐसे ही आप मन का संबंध काट दोगे तो इच्छाएँ भी कोई प्रभाव नहीं रख सकेंगी।

आप जब मन को सत्ता देते हो तभी वासनाएँ आपको दबा देती हैं। मन को सत्ता देने से, स्वीकृति देने से ऐहिक जगत के नश्वर भोग आप पर हावी हो जाते हैं जबकि मन के द्रष्टा बनने पर आपकी जीत हो जाती है। इसीलिए अष्टावक्र मुनि कहते हैं-

ʹमहापुरुष लोग सारे जगत को कल्पित जानते हैं। उनको न समाधि है न विक्षेप है, न मुमुक्षा है न अन्य कुछ है। वे तो समस्त दृश्य जगत को निश्चित रूप से कल्पित जानकर ब्रह्म में स्थित हो जाते हैं।ʹ

यह जगत कल्पित है। जिस वक्त जैसी कल्पना होती है उस वक्त जगत वैसा ही लगता है। जिन्होंने थोड़ा सा भी सत्संग सुना है उनके मन पर दूसरे की कल्पना का अधिक प्रभाव नहीं पड़ता। …..और यदि वह अपनी कल्पना से आप पार हो जाये तो पूरे विश्व का भी उसके चित्त पर प्रभाव नहीं पड़ता है। वह ʹविश्वजितʹ कहलाता है।

ऐसा नहीं कि किसी की संस्था को देखकर कोई प्रभावित हो जाये कि हम भी ऐसी ही संस्था बनायें, किसी के सौन्दर्य को देखकर आप भी सुन्दर दिखना चाहे, किसी की गाड़ी देखकर खुद भी वैसी ही गाड़ी खरीदने की सोचने लगे। ना ना…. जैसे हर फूल अपनी जगह पर अपने ही ढंग से, सहज रूप से खिलता है, वैसे ही निर्वासनिक पद में आने पर आपसे सहज स्वाभाविक रूप से जो होगा वह बहुत अच्छा होगा। किसी के महल-बँगले, गाड़ी-वाड़ी, बगीचा देखकर वैसा ही बनाने या लेने की इच्छा हो गयी तो वह सब न मिलने पर मन में खटकेगा और मिल गया तो उतना सुख नहीं मिलेगा जितना निर्वासनिक होने पर मिलता है। उन भोगों से प्राप्त सुख तो क्षणिक होगा जबकि निर्वासनिक होने पर सुख का दरिया आपके भीतर ही लहरा उठेगा।

हकीकत में परम पद पाना कठिन नहीं है, लेकिन ये इच्छाएँ ही मनुष्य को जन्म-मरण के चक्र में घुमाती रहती हैं। हाँ, कई बार ऐसा भी होता है कि तुच्छ इच्छाओं की जगह कुछ अच्छी इच्छाएँ उठती हैं, परमात्म-प्राप्ति की भी इच्छा उठती है किन्तु है तो इच्छा ही। तुच्छ इच्छाएँ लोहे की जंजीर हैं तो ये अच्छी इच्छाएँ सोने की जंजीर हैं।ʹ अभी यहाँ ईश्वर नहीं हैं, हिमालय में जाऊँगा तब मिलेंगे….. अभी तो धन कमा लूँ फिर ʹडिपोजिटʹ रखकर पेंशन मँगाकर आराम से भजन करूँगा….ʹ यदि ऐसा सोचने लगे तो समझो आपने मुक्ति के द्वार बंद कर दिये। अतः इच्छाओं का त्याग करो।

इच्छाओं का त्याग करते-करते एक ऐसी ऊँची अवस्था आती है जहाँ समाधि की भी आवश्यकता नहीं पड़ती। रोग हो तब तक औषधि की आवश्यकता पड़ती है और रोग ही न रहे तो औषधि की कोई आवश्यकता ही नहीं है। ऐसे ही जिसकी वासनाएँ पूर्णतः निर्मूल हो गयीं, जिसने निर्वासनिक पद को पा लिया उसके लिए समाधि को भी आवश्यता नहीं रह जाती।

अष्टावक्रजी महाराज इसीलिए कहते हैं- “महाशय ज्ञानी को न समाधि है न विक्षेप है, न मुमुक्षा है न अन्य कुछ। समस्त दृश्य जगत को निश्चय ही कल्पित जानकर वह ब्रह्म में स्थित हुआ है।”

इसी बात को श्री भोलेबाबा ने ʹवेदान्त छन्दावलीʹ में इस प्रकार कहा हैः

करता समाधि है नहीं, जिसमें नहीं विक्षेप है।

नहीं मोक्ष ही है चाहता, रहता सदा निर्लेप है।।

विश्व कल्पित जानकर, नहीं चित्त को भटकाय है।

संलग्न रहता ब्रह्म में, सो धीर शोभा पाय है।।

जिसका महान् आशय है, उसे ʹमहाशयʹ कहा जाता है। महान् आशय है अपने जीवन तत्त्व को जानना। जो अपने ऊपर किसी भी प्रकार की इच्छा वासनाओं की रेखा न खींचे अथवा खींची हुई रेखा को जिसने हटा दिया है, वह ʹमहाशयʹ है। ऐसा महाशय ही समस्त दृश्य जगत को कल्पनामात्र मानकर ब्रह्मस्वरूप में स्थित होता है।

हे मानव ! तू भी उठ, जाग और समस्त इच्छा वासनाओं को त्यागकर एक बार निर्वासनिक पद पाकर तो देख ! फिर मनुष्य तो क्या, समस्त यक्ष, गंधर्व, किन्नर तेरे चरणों में सिर झुकाने को तैयार हो जायेंग… देवता भी तेरे दर्शन कर अपना भाग्य बनायेंगे…. ऐसा तू महिमावान् हो जायेगा।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अक्तूबर 1999, पृष्ठ संख्या 2-5, अंक 82

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भारतः ज्ञानपूर्ण गुलदस्ता


संत श्री आसारामजी बापू के सत्संग-प्रवचन से

भारत हमेशा ज्ञान का पुजारी रहा है। पुराणों में जो कहा गया है वही आपके सिर पर थोप दिया जाये, ऐसा भारतीय संस्कृति नहीं मानती है। भारतीय संस्कृति संस्थापक कोई पीर, पैगम्बर या कोई एक ऋषि नहीं हैं। अगर एक ही ऋषि ने भारतीय संस्कृति की स्थापना की होती या एक ही काल में सब ऋषि हो गये होते और उनके द्वारा यह संस्कृति अस्तित्त्व में आती तो ज्ञान की इतिश्री हो गयी होती, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

भारत में कई ऋषि-मुनि हो गये। अलग-अलग कालों में अलग-अलग ऋषि हुए। मनु महाराज कहते हैं- “अगर मेरा ज्ञान तर्कसंगत है और तुम्हारे हित का है तो उसका आदर करो, नहीं तो मत मानो।” श्रीकृष्ण ने अर्जुन को पूरी गीता सुना दी और फिर अर्जुन से कहाः यथेच्छसि तथा करु। जैसी तुम्हारी इच्छा हो अर्थात् शुद्ध मति और हृदय दोनों के तालमेल से जो तुम्हें अच्छा लगे, वह तुम करो।”

थोपने का काम भारतीय संस्कृति में नहीं है जबकि अन्य मजहबवाले कहते हैं- “जो लिखा है, बस उसे मान लो।” …लेकिन ज्ञान किसी चारदीवारी जेल की तरह किताबों में कैद नहीं हो सकता। ज्ञान नित्य नवीन होता है, नित्य नवीन रस देता है, नित्य नवीन प्रकाश देता है।

हमारा ज्ञान कहता है कि सबमें आपका अपना-आपा परमेश्वर ज्यों-का-त्यों है। इसलिए भारतवासी जिस किसी को अपना बनाने में सफल हो जाते हैं, जिस किसी देश में, जिस किसी भाषावाले लोगों में आसानी से घुल मिल जाते हैं। किसी देश में कोई मत चलता है, किसी देश में कोई धर्म चलता है लेकिन इस देश ने सबको स्वीकार किया, सबको अपने विचार कहने का मौका दिया। कणाद ऋषि कहते हैं कि “सृष्टि परमाणुओं से बनी है…ʹ उनको भी मौका मिला। बुद्धवादी बोलते हैं कि ʹक्षण-क्षण में सब नाश हो रहा है…ʹ – उनको भी मौका मिला। भगवदवादी बोलते हैं कि ʹसृष्टि ईश्वर का संकल्प है….ʹ उनको भी मौका दिया गया।

जैसे भिन्न-भिन्न फूलों से गुलदस्ते की शोभा बढ़ती है, ऐसे ही जिस देश में भिन्न-भिन्न मतांतर हैं वे उस देश की शोभा हैं, गरिमा हैं। विविधता के जगत में यह देश शाहनशाह है।

परदेश के लोग बोलते हैं- “क्या तुम्हारे यहाँ इतने भगवान हैं-भगवान शंकर, भगवान कृष्ण, भगवान राम ?”

उन लोगों को पता नहीं कि शंकराचार्य ने तो पाणिनी मुनि को भी भगवान कहा क्योंकि वे ज्ञान के उपासक थे। ज्ञान ही भगवान है। वे ज्ञान में रम गये थे, विद्या में रम गये थे। सरस्वती को भी यहाँ भगवती मानते हैं। भगवती को अंबा और दुर्गा के रूप में भी मानते हैं। यहाँ ʹसत्यं ज्ञानं अनंतं ब्रह्मʹ की पूजा होती है।

हमारा मन बहुआयामी है, विविधता पसंद करता है। दो मीटर कपड़ा खरीदना होता है तब भी चार दुकानों में घूमते हैं, दो चार डिजाइनें देखते हैं फिर खरीदते हैं। ….तो जिसको अपना सर्वस्व देकर पाना है उसे चाहे जो रूप पसंद आये, उसी रूप में भजें इसमें बुरा क्या है ? उस अनंत को पाने का एक ही पंथ और एक ही ग्रंथ होगा क्या ? अनेक रूपों में उसी की उपासना करते हैं और अऩेक ग्रंथों में उसी के ज्ञान का विवरण है। वेद भी हैं, उपनिषद् भी हैं, ब्रह्मसूत्र भी हैं, गीता भी है। और भी कई ग्रंथ हैं। दुनिया की 578 भाषाओं में श्रीमदभगवदगीता के अनुवाद हो चुके हैं। जिस समय के ग्रंथ में जो कहा गया हो, वह उस समय के लोगों के लिए उनक अपना रहा होगा। इस समय जो कहा जाय वह इस जमाने के लोग और कहने वाले की क्षमता के अनुसार होगा।

किसी ग्रंथ में लिखा होगा किः ʹब्रह्मचारी को नंगे पैर घूमना चाहिए। ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए। धरती पर सोना चाहिए।ʹ

आचार्य  विनोबा जी ने लिखा है किः “ऐसे ब्रह्मचर्य व्रत का पालन मैंने किया है। यह सब जब लिखा गया था, तब गुरुकुल नदी के किनारे होते थे। चारों ओर हरियाली होती थी, डामर की सड़कें नहीं थीं। इतनी भाग-दौड़ की जिन्दगी नहीं थी। अब की परिस्थिति कुछ और है। मैं नंगे पैर सड़कों पर घूमा किन्तु फायदा होने की जगह नुकसान हुआ। मेरी आँखों पर बहुत बुरा असर पड़ा। तब मुझे पता चला कि उस समय की परिस्थिति में और उस समय की परिस्थिति में क्या फर्क है।”

विनोबाजी ने अपनी गल्ती को स्वीकार करके ज्ञान के नवीन प्रकाश को स्वीकार किया।

जिस किसी मत, पंथ, विचार में जितनी सच्चाई होगी, व्यापकता होगी, जितना वह ʹबहुजनहिताय बहुजनसुखायʹ होगा उतना उसका प्रचार होगा, उतना वह टिकेगा।

लोगों को डर लगता है किः ʹहमारे मत-पंथ के लिए कुछ न कहो, लोगों की श्रद्धा टूट जाएगी…..ʹ

टी.बी. के मरीज को जरा-सी हवा लगे तो ʹबीमार हो जाऊँगा…ʹ ऐसा मरने का भय उसे सदा रहता है। ऐसे शव को लेकर घूमने की जररूत भी क्या है ? जरा से आँधी-तूफान जिसको गिरा देते हैं ऐसे वृक्ष को पहले से ही गिरा हुआ समझो।

ऐसे ही जिस मत या पंथ को विचार की कसौटी गिरा देती है वह तो पहले से ही खोखला है। जो मत या विचार किसी कसौटी पर खरा उतरता है वही सच्चा है। भारतीय संस्कृति ने इस बात को सदा स्वीकार किया है। ऐसे शुद्ध, बलिष्ठ, उन्नत विचारों का आदर करना चाहिए और ज्ञानपूर्वक जीवन जीना चाहिए। जो खुराक बच्चे के लिए बहुत उपयोगी है वह पहलवान के लिए व्यर्थ है और जो पहलवान के लिए हितकारी है वह बच्चे के लिए व्यर्थ है। प्रत्येक के लिए जो उचित हो, वैसा ही आहार-व्यवहार होना चाहिए। उसमें साधारण समझ का उपयोग करना चाहिए।

यस्य ज्ञानमयं तपः…..

ʹआस्तिक बनो। धर्म को साथ लो।ʹ इसका मतलब क्या ? केवल पूजा-कक्ष में बैठना ही धर्म नहीं है। यज्ञ की वेदी पर ही धर्म संपन्न नहीं होता है। युद्ध के मैदान में भी धर्म को साथ रखो, ज्ञान को साथ रखो, समझ को साथ रखो। उचित, अनुचित के विवेक को जागृत रखो। बाजार में व्यापार में भी ज्ञान को, समझ को साथ रखो। घर-परिवार में भी समझ को साथ रखो, ज्ञान का आदर करो। सोते-जागते, खाते-पीते, उठते-बैठते भी धर्म को, ज्ञान को साथ रखो, भगवान को साथ रखो। भगवान को मत भूलो, ज्ञान को मत भूलो।

ज्ञान का आदरच जितना भारत देश ने किया है, उतना और किसी ने नहीं किया है।

रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने ʹशांति निकेतनʹ की स्थापना की। दुनिया के सभी धर्मों के ऋषियों का, उनके ज्ञान का आदर किया। यहाँ एमर्सन और महात्मा थोरो जैसे पश्चिम के विचारकों के ज्ञान का भी आदर किया गया है और एकनाथ महाराज, तुकाराम महाराज, ऋषि दयानंद जी, नानक जी, कबीर जी लीलाशाहजी महाराज के ज्ञान का भी आदर किया गया है। चाहे आईन्स्टीन जैसे वैज्ञानिक हों, चाहे कोई प्रकृति प्रेमी हो या समाजसेवक हो, जो भी ʹबहुजनहिताय बहुजनसुखायʹ अपने को समर्पित कर देते हैं, ऐसे व्यक्तियों का सत्कार भारतवासियों ने किया है, चाहे वे देशी हों या विदेशी हों। भारत ने जितने अन्य मत-पंथ-मजहबों को गले लगाया है ऐसा और किसी देश ने नहीं किया है। कुछ देश तो ऐसे हैं जहाँ आप मंदिर नहीं बना सकते। उनको भी हम कहते हैं कि आप हमारे हैं क्योंकि हमारी संस्कृति ने हमें यही सिखाया है कि सबके मूल में वही एक ʹसत्यं ज्ञानं अनंतं ब्रह्मʹ है। हम सहिष्णु हैं, उदार हैं लेकिन सहिष्णुता और उदारता के नाम पर कायरता को पोषण देने वाले नहीं हैं। भगवान श्रीकृष्ण भी कहते हैं-

क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परंतप। (गीताः2.3)

ʹदुष्टों को तपाने वाले हे परंतप ! अपने हृदय की क्षुद्र दुर्बलता को त्यागकर उठो।ʹ

यह ज्ञान का आदर है। हमारा भारत परम गहन ज्ञान की नींव पर खड़ा है। भले अभी हम थोड़ा-बहुत इसे भूल गये हैं, लेकिन यह ज्ञान और इस ज्ञान के देने वाले गुरु अभी भी इस देश में हैं। यह ज्ञान नष्ट नहीं हुआ है। यह फिर से पनपेगा और भारत आध्यात्मिकता के शिखर पर पहुँचकर पुनः विश्व का गुरु बनेगा, बिल्कुल पक्की बात है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अक्तूबर 1999, पृष्ठ संख्या 11,12,13 अंक 82

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