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Anmol Yuktiyan

पर्यावरण घातक वृक्ष हटायें


आरोग्य, समृद्धि व पुण्य प्रदायक वृक्ष लगायें

विश्व पर्यावरण दिवसः 5 जून 2019

वास्तव में प्रकृति और आप एक दूसरे से जुड़े हैं । आप जो श्वास छोड़ते हैं वह वनस्पतियाँ लेती हैं और वनस्पतियाँ जो श्वास छोड़ती हैं वह आप लेते हैं । आपके भाई-बंधु हैं वनस्पतियाँ ।

हम एक दिन में लगभग 1-1.5 किलो भोजन करते हैं, 2-3 लीटर पानी पीते हैं लेकिन 21600 श्वास लेते हैं । उसमें 11 हजार लीटर हवा लेते छोड़ते हैं, जिससे हमें 10 किलो भोजन का बल मिलता है । अब यह वायु जितनी गंदी (प्रदूषित) होती है, उतना ही लोगों का (वायुरूपी) भोजन कमजोर होता है तो स्वास्थ्य भी कमजोर होता है । अब ‘गंदी वायु, गंदी वायु….’ कह के चिल्लायें इससे काम नहीं चलता । वायु को गंदा न होने दें तो वह अच्छी बात है । अतः नीम, पीपल, आँवला, तुलसी वटवृक्ष और दूसरे जो भी पेड़ हितकारी हैं वे लगाओ और हानिकारक पेड़-नीलगिरी, अंग्रेजी बबूल व गाजर-घास हटाओ ।

नीलगिरी करता जीवनी शक्ति का नाश

नीलगिरी (सफेदा) के पेड़ की बड़ी खतरनाक, हानिकारक हवा होती है । ये वायु को गंदा करते हैं, जीवनीशक्ति हरते हैं । पानी का स्तर नीचे गिराकर भूमि को बंजर बना देते हैं ।

लोगों को सलाह दी गयी कि ‘विदेशीयो को नीलगिरी का तेल चाहिए इसलिए नीलगिरी के पेड़ लगाओ, तुम्हारी आर्थिक स्थिति अच्छी हो जायेगी ।’ आर्थिक स्थिति तो अच्छी क्या हो, शारीरिक स्थिति का विनाश कर दिया नीलगिरी ने । नीलगिरी के पेड़ लगाओ नहीं और किसी के द्वारा लगवाओ नहीं ।

अंग्रेजी बबूल से होता हवामान खराब

दूसरा हानिकारक वृक्ष है अंग्रेजी बबूल । यह काँटेदार पेड़ हवामान को अशुद्ध करता है, पानी का स्तर नीचे गिरा देता है । बबूल का धुआँ भी नुकसानकारक है और इसका दर्शन भी ऐसा ही होता है । सड़कों पर जाते समय दोनों तरफ ये जंगली बबूल देखते तो मन उद्विग्न होता है जबकि पीपल को देखकर मन प्रसन्न होता है, आह्लादित होता है ।

गाजर-घास से होती भूमि बंजर

तीसरी हानिकारक वनस्पति है गाजर-घास । इसको किसान काँग्रेस भी बोलते हैं । इसे न गाय खाती है, न भैंस, न बकरी और न ही गधा खाता है । यह खेतों में ऐसे फैलती है जैसे सूखी घास में आग लग जाय । इससे हजारों एकड़ जमीन खराब हो गयी । इस घास को नष्ट करने के लिए लोगों को, अधिकारियों को, वन विभाग और सरकार को सतर्क रहना चाहिए ।

पर्यावरण की दृष्टि से बहुत उत्तम वृक्ष है, पीपल, बड़, नीम, तुलसी व आँवला । इनकी बड़ी भारी महिमा है हमारी सनातन संस्कृति में । अब विज्ञान ने भी समर्थन किया तो आधुनिक पढ़ाई से प्रभावित लोग जल्दी समझ जाते हैं, मान जाते हैं ।

पीपल से मिलती आरोग्यता, सात्त्विकता व होती बुद्धिवृद्धि

पीपल सात्त्विक वृक्ष है । पीपल देव की पूजा से लाभ होता है, उनकी सात्त्विक तरंगें मिलती हैं । हम भी बचपन में पीपल की पूजा करते थे । इसके पत्तों को छूकर आने वाली हवा चौबीसों घंटे आह्लाद और आरोग्य प्रदान करती है । बिना नहाये पीपल को स्पर्श करते हैं तो नहाने जितनी सात्त्विकता, सज्जनता चित्त में आ जाती है और नहा-धोकर अगर स्पर्श करते हैं तो दुगुनी आती है । बालकों के लिए पीपल का स्पर्श बुद्धिवर्धक है । बालकों को इसका विशेषरूप से लाभ लेना चाहिए । रविवार को पीपल का स्पर्श न करें । पीपल के वृक्ष से प्राप्त होने वाले ऋण आयन, धन ऊर्जा स्वास्थ्यप्रद हैं । अतः पीपल के पेड़ खूब लगाओ । अगर पीपल घर या सोसायटी की पश्चिम दिशा में हो तो अनेक गुना लाभकारी है । (क्रमशः)

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मई 2019, पृष्ठ संख्या 12,13 अंक 317

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मनोबल – बुद्धिबल विकसित करने के लिए….. – पूज्य बापू जी


कमजोर मन का, कमजोर हृदय का व्यक्ति हो या भोंदू से भोंदू (बुद्धु) अथवा कितना भी दब्बू विद्यार्थी हो, वह पीपल, तुलसी की परिक्रमा करे, उन्हें स्पर्श करे (रविवार को पीपल का स्पर्श करना वर्जित है) और वहाँ प्राणायाम करे । गहरा श्वास लेकर भगवन्नाम जपते हुए 1 मिनट अंदर रोके । फिर श्वास धीरे-धीरे छोड़ दे और स्वाभाविक 2-4 श्वास ले । फिर पूरा श्वास बाहर निकाल के 50 सेकंड बाहर रोके । दोनों मिलाकर एक प्राणायाम हुआ । ऐसे 4-5 प्राणायाम शुरु करे । धीरे-धीरे कुछ दिनों के अंतराल में 5-5 सेकंड श्वास रोकना बढ़ाता जाय । इस प्रकार 80-100 सेकंड श्वास भीतर रोके और 70-80 सेकंड बाहर रोके । इससे प्राणबल, मनोबल, बुद्धिबल व रोगप्रतिकारक बल बढ़ेगा ।

पीपल की परिक्रमा से हृदय के रोगियों को भी फायदा होता है । हम भी बचपन में पीपल को सींचते थे और थोड़ी प्रदक्षिणा करते थे । हम दब्बू नहीं हैं यह हमें भरोसा है । थोड़ा सा ही पढ़ते थे पर 100 में से 100 अंक लाते, कक्षा में प्रथम स्थान आता था । पढ़ के फिर चले जाते किसी शांत जगह पर और ध्यान में बैठ जाते थे ।

जिनको बुद्धि विकसित करनी हो, बुद्धि का काम जो करते हैं उनको प्याज, लहसुन और तामसी भोजन (बाजारू, बासी व जूठा भोजन, चाय, कॉफी, ब्रेड, फास्टफूड आदि) से बचना चाहिए । देर रात के भोजन से बचना चाहिए । सात्त्विक भोजन करने से बुद्धि और ज्ञानतंतु पुष्ट होते हैं और सुषुप्त ऊर्जा जागृत होती है ।

विद्यार्थी के जीवन में अगर सारस्वत्य मंत्र व साधक के जीवन में ईश्वरप्राप्ति का मंत्र और मार्गदर्शन मिल जाय किन्हीं परमात्म-अनुभूतिसम्पन्न महापुरुष द्वारा तो वह व्यक्ति तो धन्य हो जायेगा, शिवजी कहते हैं-

धन्या माता पिता धन्यो गोत्रं धन्यं कुलोद्भवः ।

धन्या च वसुधा देवि यत्र स्याद गुरुभक्तता ।।

उसके माता पिता, कुल-गोत्र भी धन्य हो जायेंगे, समग्र धरती माता धन्य हो जायेगी ।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अप्रैल 2019, पृष्ठ संख्या 18 अंक 316

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….और यह जीव मुक्त हो जाता है – पूज्य बापू जी


तुम्हारे जो प्राण चल रहे हैं उनको अगर तुमने साध लिया, प्राण-अपान की गति को सम करने की कला सीख ली तो तुम्हारे लिए स्वर्गीय सुख पाना, आत्मिक आनंद पाना, संसार में निर्दुःख जीना आसान हो जायेगा । वाहवाही होने पर भी निरहंकारी रहना आसान हो जायेगा । निंदा होने पर भी निर्दुःख रहना, स्तुति होने पर भी चित्त में आकर्षणरहित दशा रहना, चित्त की समता और आत्मिक साम्राज्य का अनुभव करना तुम्हारे लिए सरल बन जायेगा ।

एक दृष्टांत है । एक सम्राट को अपने वजीर पर गुस्सा आया और उसने वजीर को कैद की सज़ा सुना दी ।  उसे ऊपर मीनार पर छोड़ दिया और नीचे से सीढ़ी हटा दी ।

वजीर की स्त्री साध्वी थी । वह पतिव्रता स्त्री चुपचाप रात्रि को वहाँ आयी और पूछाः “मैं आपकी क्या मदद करूँ ?”

वजीरः “देख प्रिये ! तू अगर मुझे इस मीनार से जिंदा बचाना चाहती है तो कल रात्रि को रेशम का एक पतला सा धागा, थोड़ा मजबूत सूती धागा, नारियल की रस्सी, एक मोटा रस्सा, थोड़ा सा शहद और एक कीड़ा ले आना ।”

पत्नी को समझ में तो नहीं आया लेकिन पति-आज्ञा मानकर दूसरे दिन वह सामान ले आयी ।

पतिः “यह जो जन्तु है, इसकी मूँछों पर जरा सा शहद लगा दे और पीछे पतला धागा बाँध दे और ऊपर की ओर दिशा करके दीवार पर छोड़ दे ।”

पत्नी ने वैसा ही किया तो शहद की खुशबू-खुशबू में वह कीड़ा ऊपर की ओर चल पड़ा और मीनार के ऊपर पहँच गया ।

पतला धागा वजीर तक पहुँच गया । उसके सहारे सूती धागा खींच लिया । उसके सहारे नारियल की रस्सी खींच ली, फिर उससे रस्सा खींच लिया और रस्से से उतर के वजीर मुक्त हो गया । ऐसे ही हम अगर भवबंधन से पार होना चाहते हैं तो एक सुंदर उपाय हैः

दायें नथुने से श्वास लिया और बिना रोके बाये से छोड़ा फिर बायें से लेकर दायें से छोड़ा अर्थात् अनुलोम-विलोम प्राणायाम किये । ऐसा करने से नाड़ी शुद्धि होती है, जिससे शरीर तंदुरुस्त रहता है । लेकिन शरीर तंदुरुस्त रखना ही हमारा लक्ष्य नहीं है । अगर तंदुरुस्ती ही मानव जीवन का लक्ष्य होता तो पशु मानव से ज्यादा तंदुरुस्त मिलेंगे । वटवृक्ष 5-5 हजार वर्ष के दीर्घजीवी मिलेंगे । तन की तंदुरुस्ती के साथ मन की एकाग्रता भी अनिवार्य है और मन की एकाग्रता के साथ ‘एक तत्त्व’ का ज्ञान होना भी जरूरी है ।

त्रिकाल संध्या में 8-10 अनुलोम-विलोम प्राणायाम किये तो एकाध महीने में नाड़ियों का शोधन हो जाता है । वात-पित्त-कफ के दोषों से ही रोग होते हैं । आलस्य, उदासी आदि भी इन्हीं के कारण आते हैं । अगर नाड़ी शोधन प्राणायाम किये तो नाड़ी शुद्धि होगी और दोष मिटेंगे । यह समझो रेशम का धागा ले आना है । जीभ तालू में लगाओ तो आपके मस्तिष्क के दोनों भाग संतुलित होने लगते हैं और दृढ़ निष्ठा, सर्जनात्मक प्रवृत्ति व ठोस कार्य करने की क्षमताए आती हैं । यह मानो नारियल की रस्सी का हाथ लगना है । इससे मजबूत क्या ? कि दृढ़ विचार । यह मजबूत रस्सा है । फिर सद्गुरु  के वेदांत ज्ञान के दिव्य विचार से दिव्य तत्त्व में स्थिति हो जाती है और यह जीव मुक्त हो जाता है ।

तो हजार उपदेश हम सुना दें, युक्तियाँ और शास्त्रों आदि के उद्धरण देकर किसी सिद्धान्त को हम पुष्ट कर दें और आप स्वीकार कर लो लेकिन पूर्ण तत्त्व का, जीवनमुक्ति का साक्षात्कार तब तक नहीं होगा जब तक आपने अपने-आप पर कृपा नहीं की । और अपने आप कृपा करना यह है कि हृदय की उदारता, विशालता, प्राणीमात्र में अपने परमात्मा को निहारने की क्षमता विकसित करें और अखिल ब्रह्माण्ड में एक जो हरि है उस हरि तत्त्व में अपने देहाध्यास को, अपने तुच्छ ‘अहं-मम्’ को डुबा दें । और बिना साधन-भजन के, बिना विवेक विचार के यह सम्भव नहीं है । तो विवेक विचार करने की ज्ञानतंतुओं की क्षमता बढ़ाने के लिए भी प्रतिदिन आश्रम आकर अथवा जहाँ अनुकूल पड़े, जहाँ साधन ठीक से हो ऐसी जगह पर साधन-भजन, सत्संग-श्रवण आदि में समय बिताना चाहिए ।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अप्रैल 2019, पृष्ठ संख्या 6,7 अंक 316

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