Tag Archives: Vivek Vichar

आखिर यह भी तो नहीं रहेगा !


(पूज्य बापू जी की ज्ञानमयी अमृतवाणी)

एक फकीर यात्रा करने गया। रास्ते में किसी गाँव में रात पड़ी तो लोगों से बोलाः “रात पड़ी है, मुझे कहाँ ठहरना चाहिए ? है कोई यहाँ धर्मात्मा आदमी ?”

बोलेः “धर्मात्मा तो बहुत हैं, धनी भी बहुत हैं लेकिन एक शुक्रगुजार व्यक्ति है, उसको लोग ʹशाकिरʹ बोलते हैं। तुम उसके यहाँ चले जाओ।”

शाकिर के पास पहुँचा वह फकीर। शाकिर ने बड़ी आवभगत की और अहोभाव से जितनी भी सेवा हो सकती है, दो दिन तक की। फकीर जब यात्रा को आगे निकला तो शाकिर ने रास्ते में खाने के काम आये ऐसी कोई सूखी सब्जी, कुछ मीठी रोटियाँ तो कुछ चरपरी रोटियाँ, कुछ अचार, खजूर आदि-आदि बड़े प्रेम से उनको देकर विदाई दी।

फकीर ने कहाः “शाकिर ! जितने तुम धनी हो उतने नम्र भी हो और जितना नम्रता का सदगुण है उतना ही साधुसेवा का भी तुम्हारे पास भंडार है। अल्लाह करे तुम और भी बढ़ो !”

शाकिर हँसाः “यह भी तो कब तक ? नहीं रहेगा…..”

फकीर को थोड़ा-सा सोचने को विवश होना पड़ा लेकिन फिर याद आया, गुरुदेव ने कहा था कि ʹकोई कुछ गहरी बात कहे तो तुरंत वाद-विवाद में नहीं पड़ना, देखते रहना।ʹ फकीर आगे चला।

वह फकीर हज करने गया। जब दो साल के बाद लौटा तो देखा शाकिर का महल, इमारतें उसकी लम्बी-चौड़ी दुकानें व बाजार सब के सब गायब ! उसने किसी से पूछाः “यह कैसे हुआ  ?”

बोलेः “बाढ़ आयी थी, उसमें सब बह गया। अब वह शाकिर किसी हमदाद नाम के मुसलमान जमींदार के यहाँ काम करता है। भैंसें दुहता है, रचका (चारा) काटता है, ठंडी-ठंडी रात में खेत में पानी पिलाता है। उसकी दो बड़ी बच्चियाँ हैं। पहले तो शाकिर बड़ा धनी था, अब इस कंगले की बच्चियों को शादी की भी कहीं जमावट नहीं होती।”

फकीर ने सोचा, ʹजिसके घर मैंने आदर-सत्कार पाया, वह गरीब हो गया तो क्या है, मुझे जाना चाहिए।” हमदाद के नौकर शाकिर ने झोंपड़ी में उस फकीर के लिये चटाई, फटा टाट बिछा दिया, रूखी-सूखी रोटी दी। सुबह को वह साधु जाने को था, उसकी आँखों में आँसू थे। वह बोलाः “शाकिर ! अल्लाह ने क्या कर दिया !”

शाकिर हँसा और बोलाः “आपने सत्संग में सुना होगा कि कोई भी अवस्था सदा नहीं रहती। अमीरी थी उसको याद करके दुःखी क्यों होना और गरीबी है उसको सच्चा मानकर  परेशान क्यों होना ? यह भी तो चला जायेगा।”

शाकिर की आँखों में सन्तुष्टि थी, वाणी में मधुरता थी और हृदय में संतों के संग का प्रभाव था। फकीर सोचता है, “मैं तो बाहर से फकीर हूँ लेकिन यह गृहस्थ शाकिर सचमुच सत्संग के प्रभाव से, गुरुदीक्षा के प्रभाव से भीतर का फकीर है, भीतर का साधु है।ʹ

मैं चाहता हूँ अब से तुम भी भीतर के साधु हो जाओ। तुम इरादा करो।

डेढ़ दो साल के बाद फिर फकीर ने अपना रुख यात्रा का बनाया। देखता क्या है कि वह जमींदार शाकिर जो हमदाद के यहाँ तुच्छ मजदूरी करता था, जिसे रूखी रोटियाँ खानी पड़ती थीं, रात भी जगता और दिन में भी मजदूरी करता, वह अब जमींदारी को भी मात कर दे, ऐसा अमीर बन गया है। वार्तालाप से पता चला कि हमदाद को कोई संतान नहीं थी। उसकी जो लम्बी-चौड़ी जमींदारी थी वह शाकिर को दे गया और सोने का देग (पात्र), हीरे जवाहरात से भरा हुआ चरु जहाँ गड़ा था वह जगह भी बता दी। पहले की सम्पदा से अभी कई गुनी ज्यादा सम्पदा हो गयी। फकीर बोला कि “हद हो गयी शाकिर ! तुमने कहा था यह भी गुजर जायेगा। अच्छा है, गरीबी गुजर गयी डाकिनी ! अल्लाह करे तुम ऐसे ही बने रहो !”

शाकिर हँसाः “फकीर ! बड़े-बड़े अमीरों को, बादशाहों को जो कुछ मिला वह बीत गया तो मेरा कब तक रहेगा ?”

“क्या य़ह भी चला जायेगा ?”

“या तो यह चला जायेगा अथवा इसको मेरा मानने वाला चला जायेगा। कौन रहता है ! जहाँ संयोग है वहाँ वियोग है। तुमने सत्संग तो सुना होगा न ! मैंने संतों के वचन आत्मसात् किये हैं।”

हिन्दू धर्म के वेदांती संतों की ज्ञानधारा का ही हिस्सा (सत्संग, साहित्य) लेकर सूफीवाद बना है। तो सूफी संत, वेदांती संत एक ही बात कहते हैं- सब गुजरता है, उसको जानने वाला अंतरात्मा शाश्वत है। वही अल्लाह है, वही भगवान है, वही राम है, रहमान है।ʹ

फकीर आगे बढ़ा। यात्रा करके जब लौटा डेढ़ दो साल के बाद तो क्या देखता है, शाकिर का महल तो है लेकिन उसमें कबूतर ʹगुटर-गूँ, गुटर-गूँʹ कर रहे हैं।

कह रहा है आसमाँ यह समाँ कुछ भी नहीं।

रोती है शबनम कि नैरंगे जहाँ कुछ भी नहीं।।

जिनके महलों में हजारों रंग के जलते थे फानूस।

झाड़ उनकी कब्र पर है और निशाँ कुछ भी नहीं।।

शाकिर कब्रिस्तान में सोया है। महल खाली-खट्…. बेटियों की शादी हो गयी, बूढ़ी पत्नी कोने में पड़ी हैं। फकीर सोचता है, ʹअरे मनुष्य ! तू गर्व किस बात का करता है ?

मत कर रे भाया गरव गुमान, गुलाबी रंग उड़ी जावेलो।

मत कर रे भाया गरव गुमान, जवानीरो रंग उड़ी जावेलो।।

उड़ी जावेलो रे फीको पड़ी जावेलो, रे काले मर जावेलो,

पाछो नहीं आवेलो…. मत कर रे गरव….

धन रे दौलत थारा माल खजाना रे…. छोड़ी जावेलो रे पलमां उड़ी जावेलो।।

पाछो नहीं आवेलो… मत कर रे गरव…

क्यों इतराता है और क्यों परेशान होता है ! जिसके पास ज्यादा है वह भी नहीं टिकेगा। मेरे पास मुसीबत है वह भी नहीं टिकेगी। यह मुसीबत में है और मैं मौज में हूँ, लेकिन  न मौज रहेगी न मुसीबत रहेगी, उसको जानने वाला दिलबर दाता ही तो रहता है। इसको पक्का कर ले, मौज हो जायेगी मौज !

पूरे हैं वे मर्द जो हर हाल में खुश हैं।

मिला अगर माल तो  उस माल में खुश हैं।

हो गये बेहाल तो उसी हाल में खुश हैं।।

शाकिर ! तुमने जिंदगी का रहस्य जाना। धन्य है शाकिर तुम्हारा सत्संग ! धन्य है तुम्हारे सत्संगकर्ता सदगुरु !! शाकिर! मैं तो फकीर बना लेकिल असली फकीरी की तो तेरी जिंदगानी है। तेरी जिंदगानी में असली फकीरी झलकती है। अब मैं तेरी कब्र देखना चाहता हूँ शाकिर ! वहाँ पर जाऊँगा, दुआ माँगूगा, फूल चढ़ाऊँगा। गृहस्थ शाकिर, फकीरों को भी फकीरी का संदेश दे, ऐसे फकीर शाकिर की कब्र पर जाऊँगा।ʹ

वह फकीर शाकिर की कब्र पर गया. क्या देखता है कि कब्र पर लिखा है ʹआखिर यह भी तो नहीं रहेगा !ʹ फकीर ने सिर पीटा कि ʹहद हो गयी ! अमीरी नहीं रहेगी, चलो मान लिया। गरीबी नहीं रहेगी, चलो मान लिया। बीमारी नहीं रहेगी, मान लिया। तंदरूस्ती नहीं रहेगी, मान लिया। यह सब बदलता है लेकिन क्रब कहाँ चली जायेगी ?ʹ कब्र में पत्थर पर लिखवा दिया था, ʹआखिर यह भी तो नहीं रहेगा !ʹ फकीर फिर आगे बढ़ा यात्रा को। जब लौटने लगा तो सोचा, ʹजाते-जाते शाकिर की कब्र पर सिजदा करता हुआ जाता हूँ।ʹ देखा तो कब्रिस्तान ही नहीं है ! उसने लोगों से पूछाः “क्या हुआ, कब्र को कैसे पर (पंख) लग गये ?”

बोलेः “जलजला (भूकम्प) आया था, पूरा कब्रिस्तान गायब हो गया। अब उसी कब्रिस्तान पर बड़ी-बड़ी इमारतें खड़ी हैं।”

हे संसार ! तू एक क्षण भी बिना बदले नहीं रहता और हे नासमझ मनुष्य ! तू उसको स्थिर रखने में अपनी कई जिंदगियाँ तबाह कर चुका है। ʹमेरी जवानी बनी रहे, मेरा यश बना रहे, मेरी पदोन्नति बनी रहे, मेरा पद बना रहे….ʹ श्वास-श्वास में तू बिगड़ता जा रहा है, फिर तेरा क्या बना रहेगा भाई !

ऐ गाफिल ! न समझा था, मिला था तन रतन तुझको।

मिलाया खाक में तूने, हे सजन ! क्या कहूँ तुझको ?

अपनी वजूदी हस्ती में तू इतना भूल मस्ताना।

करना था किया वो न,

अपने आत्मा-परमात्मा को पाना था, वह नहीं किया।

लगी उलटी लगन तुझको।

जिसको छोड़ जाना है उसी के पीछे लगा रहा। उसी की परीक्षा पास की। उसी के पीछे ʹसर-सरʹ करके सर-खोपड़ी एक कर दी। और जिनको ʹसर-सरʹ कहता है, उनका न सिर रहा न पैर रहा। कौन सी निशा में तू सो रहा है ? संत तुलसीदास जी ने ऐसे लोगों को झकझोरा हैः

मोह निसाँ सबु सोवनिहारा। देखिअ सपन अनेक प्रसारा।।

(श्रीरामचरित. अयो.कां. 92.1)

ʹमैं विद्यार्थी हूँ। वह आयेगा मैं स्नातक हो जाँऊगा। वह दिन आयेगा जब बड़ी नौकरी पाऊँगा, आई ए एस बनूँगा, नहीं तो आई पी एस बनूँगा। मकान होगा, शादी होगी, गाड़ी होगी, सुखद दिन होंगे।ʹ अरे ! जब वे दिन आयेंगे तो जायेंगे भी। अभी नहीं हैं तो बाद में भी नहीं रहेंगे।

विश्वनियंता परमात्मा सत्स्वरूप, आनंदस्वरूप, शुद्ध-बुद्ध ब्रह्म तुम्हारा आत्मा होकर बैठा है औऱ तुम बीते हुए का शोक करके परेशान हो रहे हो, भविष्य का भय करके भयभीत हो रहे हो और वर्तमान में ʹयह चला न जायʹ ऐसा सोच के भयभीत होकर उसके पिट्ठू बन रहे हो। अरे, जो अवस्था आयेगी वह तो जायेगी। डरने की क्या जरूरत है ? फिर नया आयेगा। यह शरीर जायेगा तो नया मिलेगा, नहीं मिला तो मुक्ति हो जायेगी। ये बातें तुम नहीं जानते हो इसलिए खामखाह परेशान, खामखाह भयभीत, खामखाह शोकातुर, चिंतित और खामखाह बीमार हो रहे हो।

बन जाओ तुम भी शाकिर। तेरा भाणा मीठा लागे। इतना ही तो समझना है। अपमान हुआ, वाह-वाह ! मान हुआ, वाह-वाह ! जो कुछ आया, वाह-वाह ! बीत रहा है, बह रहा है, वाह-वाह ! ʹऐसा हुआ, ऐसा होना चाहिए….ʹ तू फिकर न कर, फरियाद न कर, ʹवाह-वाह !ʹ कर बस।

तेरे फूलों से भी प्यार, तेरे काँटों से भी प्यार।

चाहे सुख दे या दुःख, हमें दोनों हैं स्वीकार।।

क्योंकि देने वाला तू ही है। माँ के गर्भ में दूध की व्यवस्था तूने की थी। माँ की जेर के साथ हमारी नाभि जोड़ना तेरी कला-कुशलता है वाह ! वाह ! मेरे रब ! मेरे प्रभु ! मेरे प्यारे !…. बस यह सीख जाओ, मौज हो जायेगी। वर्तमान रसमय हुआ तो आपका भूतकाल रसमय और भविष्य भी आयेगा तो वर्तमान के रस में रसीला हो के आयेगा। बहुत मौज हो जायेगी।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अगस्त 2012, पृष्ठ संख्या 6,7,8 अंक 236

ૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐ

ʹसर्वभाषाविद्ʹ हैं भगवान


(पूज्य बापू जी की ज्ञानमयी अमृतवाणी)

बोलते हैं- ʹभगवान सर्वभाषाविद् हैं। भगवान सारी भाषाएँ जानते हैं।ʹ भाषाएँ तो मनुष्य-समाज ने बनायीं, तो क्या भगवान उनसे सीखने को आये ? नहीं। तो भगवान सर्वभाषाविद कैसे हुए ?

सारी भाषाएँ बोलने के लिए जहाँ से भाव उठते हैं, उसकी गहराई में भगवान हैं। उन सारे भावों को समझने वाले भावग्राही जनार्दन हैं। पहले भाव होता है फिर भाषा आती है, तो भावग्राही जनार्दनः। इसलिए बोलते हैं कि भगवान सर्वभाषाविद् हैं। आप किसी भी भाषा में बोलेंगे तो पहले आपके मन में भाव आयेगा, संकल्प उठेगा फिर बोलोगे। तो भाव जहाँ से उठता है वहाँ वे चैतन्य वपु (चैतन्य शरीर) ठाकुर जी बैठे हैं। उनकी सत्ता से ही तो सारे भाव उठ रहे हैं।

भगवान एक-एक भाषा सीखने नहीं गये कि तुम्हारी भाषा कैसे बोलते हैं। भगवान ʹसर्वभाषाविद्ʹ हैं, बिल्कुल सत्य बात है ! अपने-आप उन्हें सब भाषाएँ आ गयीं यह भी नहीं है। भाषाओं के मूल में बैठे हैं तो पता चल गया, बस ! तुम कितने भी मँजे हुए शब्द या सादे शब्द बोलो, वे अन्तर्यामी तुम्हारे भावों को जानते हैं। भावग्राही जनार्दनः।

भावे हि विद्यते देवस्तस्माद् भावं समाचरेत्।

(गरूड़ पुराण, प्रे. खं. ध. कां.37.13)

चर्चा चली कि ʹदेवता का विग्रह होता है कि नहीं ? देव का शरीर होता है कि नहीं ?ʹ चर्चा करते करते इस निर्णय पर पहुँचे की ʹदेव का शरीर होता ही नहीं, साकार विग्रह होता ही नहीं। भावग्राही जनार्दनः।ʹ तुम्हारे भाव से वह देव उत्पन्न होता है। तुम्हारे अन्तर्यामी चैतन्य में जिस देव की भावना हुई हो, वह देव वहाँ बाहर खड़ा हो जाता है। बाकी अमुक जगह अमुक आकृतिवाला देव है – ऐसा नहीं है। भयंकर आकृतिवाले दैत्य हैं – ऐसा नहीं है। भयंकर वृत्ति की आकृतियाँ बनायीं मनुष्य ने और सौम्य वृत्ति की आकृतियों बनायीं मनुष्य ने, फिर समझने के लिए यह देव है और यह दानव है, यह असुर है, यह राक्षस है – यह सभी व्यवस्था सँभले इसके लिए बनाया है। बाकी देवों का विग्रह नहीं होता। फिर भी सर्व देवों का देव विग्रहरहित होते हुए भी सभी विग्रहवालों के मन के भावों को जानता है।

बिनु पद चलइ सुनइ बिनु काना।

कर बिनु करम करइ बिधि नाना।।

आनन रहित सकल रस भोगी।

बिनु बानी बकता बड़ जोगी।।

(श्रीरामचरित. बा.कां.117.3)

पग नहीं फिर वह (ब्रह्म) सर्वत्र पहुँच सकता है। कान नहीं फिर भी सब सुनता है, हाथ नहीं पर सब कर लेता है, मन नहीं पर सभी के मन की गहराई में वही बैठा है मेरा प्यारा। उस प्रभु की यह अटपटी लीला है। यह लीला सत्संग द्वारा समझ में आये तो प्रभु हृदय में ही मिलता है। जिनको अपने दिल में दिलबर नहीं दिखता, वे बाहर के मंदिरों में और बाहर के भगवान में जिंदगी भर खोज-खोज के थक जायेंगे। जब तक हृदय मंदिर में नहीं आये तब तक भगवद्प्राप्ति नहीं हो सकती। अखा भगत ने कहाः

सजीवाए निर्जीवने घड्यो अने पछी कहे मने कंई दे।

अखो तमने ई पूछे के तमारी एक फूटी के बे ?

तुम तो सजीव आत्मदेव हो, तुम्हारे आत्मदेव की सत्ता से ही मंदिर की मूर्ति बनी। उसकी सत्ता से ही मंदिर के देव की पूजा हुई। फिर ʹहे देव ! मेरा यह कर दे, मेरा ऐसा कर दे-ऐसा कर दे।ʹ मंदिर का देव तो बेचारा संकल्प नहीं करता, वह बेचारा तो बोलता भी नहीं। तुम्हारी भावना से ही अंतर्यामी देव तुम्हारी  प्रार्थना स्वीकारता है और वह घटना घटती है।

भगवान व्यापक है, विभु हैं। जिनके हृदय में उनके लिए प्रीति होती है, उनके कार्य वे आप सँवारते हैं और उनके हृदय में प्रकट होते हैं। गुरूवाणी में आया हैः

संता के कारजि आपि खलोइअ।।

संतो, भक्तों के कार्य भगवान सँवार लेते हैं।

अयोध्या के कनक भवन मंदिर की सेवा में श्यामा नाम की एक घोड़ी थी। वह जब बूढ़ी हो गयी तो उसको पचासों मील दूर मंदिर के खेत में भेजना था। जब निर्णय हुआ कि ʹतू अब जायेगीʹ तो उसकी आँखों से आँसू आने लगे, घोड़ी ने चारा पानी छोड़ दिया। वह अयोध्या छोड़ के जाना नहीं चाहती थी। आखिर व्यवस्थापक ने रेल में बोगी बुक करायी और उसे बोगी में चढ़ाया, तो घोड़ी के आँसुओं ने चमत्कार  किया कि जाने वाली रेल से और सारे डिब्बे तो जुड़ गये लेकिन किसी कारण से वह घोड़ी वाला डिब्बा रह गया। घोड़ी फिर कनक भवन में लायी गई। व्यवस्थापकों ने कहा कि ʹयह इसके हृदय की प्रार्थना है। देखो, भगवान कैसे सुनते हैं !ʹ

बड़ौदा से 60 किलोमीटर दूर होगा मालसर। वहाँ लाल जी महाराज रहते थे। चतुर्मास के समय नर्मदाजी में नहाने गये। चतुर्मास में तो कई बार नर्मदाजी में बाढ़ की स्थिति होती है। वे किसी भँवर में फँस गये, तैरना जानते नहीं थे तो बोलेः “हे राઽઽઽम….!” और सीधे सो गये शवासन में, तो ऐसा लगा मानो नीचे से किसी ने हाथ दिया हो और उन्हें किनारे पर खड़ाकर दिया।

हरि ब्यापक सर्वत्र समाना।

प्रेम तें प्रगट होहिं मैं जाना।।

(श्रीरामचरित. बा.कां- 184.3)

जो भगवान को भाव से पुकारता है, प्रार्थना करता है, वह अपना पुरुषार्थ करे और पुरुषार्थ करते हुए हार जाय तब सच्चे हृदय से पुकारे तो भगवान उसी समय न जाने कैसी अदभुत लीला करके उसे बचा लेते हैं।

स्रोतः ऋषि प्रसाद,  जुलाई 2012, अंक 235, पृष्ठ संख्या 4,5

ૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐ

प्रतिकूलता में विशेष भगवत्कृपा


मनुष्य अनुकूलता तो चाहता है पर प्रतिकूलता नहीं चाहता – यह उसकी कायरता है। अनुकूलता को चाहना ही खास बंधन है, इसके सिवाय और कोई बंधन नहीं है। इस चाह को मिटाने के लिए ही भगवान बहुत प्यार और स्नेह से प्रतिकूलता भेजते हैं। यदि जीवन में प्रतिकूलता आये तो समझना चाहिए कि मेरे ऊपर भगवान की बहुत अधिक, दुनिया से निराली कृपा हो गयी है। प्रतिकूलता में कितना आनंद, शान्ति, प्रसन्नता है, क्या बतायें ! प्रतिकूलता मानो साक्षात् परमात्मा के रास्ते ले जाने वाली मधुमय मौसी है। भगवान ने कहा हैः

नित्यं च समचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु।

ʹप्रिय और अप्रिय की प्राप्ति में सदा ही चित्त का सम रहना (यह ज्ञान) है।ʹ (गीताः 13.9)

प्रतिकूलता आने पर प्रसन्न रहना – यह समता की जननी है। ʹगीताʹ में इस समता की बहुत प्रशंसा की गयी है।

भगवान विष्णु सर्वदेवों में श्रेष्ठ तभी हुए जब भृगुजी के द्वारा छाती पर लात मारी जाने पर भी वे नाराज नहीं हुए। वे तो भृगुजी के चरण दबाने लगे और बोलेः “भृगुजी ! मेरी छाती तो बहुत कठोर है और आपके चरण बहुत कोमल हैं, आपके चरणों में चोट आयी होगी।ʹ उन्हीं भगवान के हम अंश हैं – ममैवांशो जीवलोके…. (गीताः 15.7) उनके अंश होकर भी हम इस प्रकार छाती पर लात मारने वाले का हृदय से आदर नहीं कर सकते तो हम क्या भगवान के भक्त हैं ! प्रतिकूलता की प्राप्ति को स्वर्णिम अवसर मानना चाहिए और नृत्य करना चाहिए कि अहो ! भगवान की बड़ी भारी कृपा हो गयी। ऐसा कहने में संकोच होता है कि इस स्वर्णिम अवसर को प्रत्येक आदमी पहचानता नहीं। यदि किसी को कहें कि ʹतुम पहचानते नहीं होʹ तो उसका निरादर होता है। अगर ऐसा अवसर मिल जाय और उसकी पहचान हो जाय कि इसमें भगवान की बहुत विशेष कृपा है तो यह बड़े भारी लाभ की बात है।

गीता (2.64,65) में आया है कि जिसका अंतःकरण अपने वश में है ऐसा पुरुष राग-द्वेषरहित इन्द्रियों के द्वारा विषयों का सेवन करता हुआ अंतःकरण की प्रसन्नता को प्राप्त होता है और प्रसन्नता प्राप्त होने पर उसकी बुद्धि बहुत जल्दी परमात्मा में स्थिर हो जाती है।

जो प्रतिकूल से प्रतिकूल परिस्थिति में प्रसन्न रहे, उसकी बुद्धि परमात्मा में बहुत जल्दी स्थिर होगी। क्योंकि प्रतिकूलता में होने वाली प्रसन्नता समता की जननी है। अगर यह प्रसन्नता मिल जाय तो समझना चाहिए कि समता की तो माँ मिल गयी और परमात्म-तत्त्व की प्राप्ति की दादी या नानी मिल गयी।

प्रतिकूलता की प्राप्ति में भगवान की बड़ी विचित्र कृपा है, मुख्य कृपा है परंतु इसका अर्थ यह नहीं है कि आप प्रतिकूलता की चाहना करें। चाहना तो अनुकूलता और प्रतिकूलता – दोनों की ही नहीं करनी चाहिए, बल्कि भगवान जो परिस्थिति भेजें उसी में प्रसन्न रहना चाहिए। यदि भगवान प्रतिकूलता भेजें तो समझना चाहिए कि उनकी बड़ी कृपा है। ʹवाल्मीकि रामायणʹ के अरण्य कांड (37.2) में आया हैः

सुलभाः पुरुषा राजन् सततं प्रियवादिनः।

अप्रियस्य च पथ्यस्य वक्ता श्रोता च दुर्लभः।।

ʹसंसार में प्रिय वचन बोलने वाले पुरुष तो बहुत मिलेंगे पर जो अप्रिय होने पर भी हितकारी हो, ऐसी बात कहने और सुनने वाले दुर्लभ है।ʹ

एक मारवाड़ी कहावत हैः

सती देवे, संतोषी पावे।

जाकी वासना तीन लोक में जावे।।

भिक्षा देने वाली सती-साध्वी स्त्री हो और भिक्षा लेने वाला संतोषी हो तो उसकी सुगन्ध तीनों लोकों में फैलती है। ऐसे ही देने वाले भगवान हों और लेने वाला भक्त हो यानी भगवान विशेष कृपा करके प्रतिकूलता भेजें और भक्त उस प्रतिकूलता को स्वीकार करके मस्त हो जाय तो इसका असर संसारमात्र पर पड़ता है।

दुःख के समान उपकारी कोई नहीं है किंतु मुश्किल यह है कि दुःख का प्रत्युपकार कोई कर नहीं सकता। उसके तो हम ऋणी  ही बनी रहेंगे क्योंकि दुःख बेचारे की अमरता नहीं है। वह बेचारा सदा नहीं रहता, मर जाता है। उसका तर्पण नहीं कर सकते, श्राद्ध नहीं कर सकते। उसके तो ऋणी ही रहेंगे। इसलिए दुःख आने पर भगवान की बड़ी कृपा माननी चाहिए। छोटा-बड़ा जो दुःख आये, उस समय नृत्य करना चाहिए कि बहुत ठीक हुआ। इस तत्त्व को समझने वाले मनुष्य इतिहास में बहुत कम हुए हैं। माता कुंती इसे समझती थीं, इसलिए वे भगवान से वरदान माँगती हैं-

विपदः सन्तु नः शश्वत्तत्र जगदगुरो।

भवतो दर्शनं यत्स्यादपुनर्भवदर्शनम्।।

ʹजगदगुरो ! हमारे जीवन में सर्वदा पद-पद पर विपत्तियाँ आती रहें, क्योंकि विपत्तियों में ही निश्चित रूप से आपके दर्शन हुआ करते हैं और आपके दर्शन हो जाने पर फिर जन्म-मृत्यु के चक्कर में नहीं आना पड़ता।ʹ (श्रीमद भागवतः 1.8.25)

माता कुंती विपत्ति को अपना प्यारा संबंधी समझती हैं क्योंकि इससे भगवान के दर्शन होते हैं। अतः विपत्ति भगवद्दर्शन की माता हुई कि नहीं ? इसलिए दुःख आना मनुष्य के लिए बहुत आनंद की बात है। दुःख में प्रसन्न होना बहुत ऊँचा साधन है। इसके समान कोई साधन नहीं है।

यदि साधक परमात्म-तत्त्व की प्राप्ति चाहे तो वह सुख-दुःख से ऊँचा उठ जाय। ʹसुखदुःखे समे कृत्वा…..ʹ (गीताः 2.38) सुख की चाहना करते हैं पर सुख मिलता नहीं और दुःख की चाहना नहीं करते पर दुःख मिल जाता है। अतः दुःख की चाहना करने से दुःख नहीं मिलता यह तो कृपा से ही मिलता है। सुख में तो हमारी सम्मति रहती है पर दुःख में हमारी सम्मति नहीं रहती। जिसमें हमारी सम्मति, रूचि रहती है वह चीज अशुद्ध हो जाती है और जिसमें हमारी सम्मति, रूचि नहीं है वह चीज केवल भगवान की शुद्ध कृपा से मिलती है। जो हमारे साथ द्वेष रखता है, हमें दुःख देता है उसका उपकार हम कर नहीं सकते। हमारा उपकार वह स्वीकार नहीं करेगा। वह तो हमें दुःखी करके प्रसन्न हो जाता है। हमारे द्वारा बिना कोई चेष्टा कोई दूसरा प्रसन्न हो जाये तो कितने आनंद की बात है ! अतः सज्जनो ! आगे से मन पक्का विचार कर लेना चाहिए कि हमें हर हालत में प्रसन्न रहना है। चाहे अनुकूलता आये, चाहे प्रतिकूलता आये उसमें हमें प्रसन्न रहना है क्योंकि वह भगवान का भेजा हुआ कृपापूर्ण प्रसाद है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जुलाई 2012, अंक 235, पृष्ठ संख्या 14,15

ૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐ