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साधना के विघ्न


पूज्य बापू जी की पावन अमृतवाणी

साधना की कभी राह न छोड़, अगर आत्मतत्त्व को पाना है।

संयम की नौका पर चढ़, तुझे भवसागर तर जाना है।।

मत फँस प्यारे तू जीवन की, छोटी, सँकरी गलियों में।

एक लक्ष्य बनकर पहुँच वहाँ, जहाँ औरों को पहुँचाना है।।

आत्मदेव की साधना का मार्ग कहीं फूलों से बिछी राह है तो कहीं काँटों से लबरेज (पूर्णतः भरा हुआ) है लेकिन इन विघ्न-बाधाओं को पार करने की जिसने हिम्मत जुटायी है, वही अपने सत्यस्वरूप की मंजिल को प्राप्त कर पाया है।

इस पथ पर असफल वे ही होते हैं जिनमें श्रद्धा, संयम, तत्परता और विश्वास की कमी होती है और जिन्हें अपनी सर्वोच्च आवश्यकता का ज्ञान नहीं होता है अथवा जिनका कोई कुशल मार्गदर्शक के रूप में गुरु नहीं है। जीवन में यदि आत्मानुभूति-सम्पन्न किन्हीं ब्रह्मनिष्ठ सदगुरु का प्रत्यक्ष सान्निध्य अथवा मार्गदर्शन मिल जाय तो कहते हैं कि आधी यात्रा तो उसी दिन पूरी हो जाती है जब निजानंद की मस्ती में जगह हुए ऐसे ब्रह्मवेत्ता महापुरुष कृपाकटाक्ष करते हुए मंजिल पर पहुँचने की दीक्षा देते हैं। शेष आधी यात्रा साधक की दृढ़ता, तत्परता व श्रद्धा से पूर्ण हो जाती है।

अनेक साधक सद्गुरु के दिखलाये मार्ग पर अथवा उनके द्वारा प्रदत्त साधन पर संदेह कर फिसल जाते हैं और पुनः वहीं आ जाते हैं जहाँ से उन्होंने यात्रा शुरु की थी। अतः सद्गुरु व उनके बताये हुए साधन पर कभी संदेह नहीं करना चाहिए, साथ ही यह संशय भी नहीं रखना चाहिए कि वे कब, क्यों, कहाँ, किसके साथ, क्या और कैसा व्यवहार करते हैं। केवल आत्मकल्याण के उद्देश्य के विनम्रतापूर्वक उनके श्रीचरणों में रहना चाहिए।

साधक के लिए बड़े-में-बड़ा विघ्न है लोकैषणा (सम्मान, प्रसिद्धि की चाह)… और लोकैषणा साधक को भटका देती है। साधक जब तक परब्रह्म परमात्मा का पूर्ण रूप से साक्षात्कार न कर ले, तब तक उसे अपने सद्गुरु की मीठी छाया में, निगाह में बार-बार आना होता है और उनके आदेशानुसार ही यात्रा करनी होती है। वित्तैषणा, पुत्रैषणा आदि तो मनुष्य छोड़ सतका है लेकिन लोकैषणा बड़ा भारी विघ्न है। लोगों द्वारा की जाने वाली वाहवाही तो यहीं धरी रह जाती है पर आदमी मरता है तो संस्कारों के कारण बेचारे की जन्म-मरण की यात्रा बनी रहती है। इसलिए जब तक परब्रह्म परमात्मा में पूर्ण रूप से विश्रांति प्राप्त न हो तब तक साधक को कुछ बातों से बिल्कुल सावधान रहना चाहिए। अपनी साधना को वाहवाही के मूल्य पर नहीं बेचना चाहिए। अपनी साधना को यश, धन या मान के मूल्य पर कभी खर्च नहीं करना चाहिए। जब तक पूर्ण रूप से परमात्मप्रसाद की प्राप्ति न हो तब तक लोकैषणा से, भोगियों के संग से, क्रोधियों व कामियों के संग से अपने को बचाये रखें।

जो उन्नत किस्म के भगवद्भक्त है अथवा ईश्वर के आनंद में रमण करने वाले तत्त्ववेत्ता संत हैं, ऐसे महापुरुषों के सत्संग में आदरपूर्वक जावें…. दर्शक बनकर नहीं याचक बनकर, एक नन्हें-मुन्ने निर्दोष बालकर बनकर, तो साधक के दिल का खजाना भरता रहता है।

सो संगति जय जाय जिसमें कथा नहीं राम की।

बिन खेती के बाड़ किस काम की ?

वे नूर बेनूर भले जिनमें पिया की प्यास नहीं।।

जिनमें यार की खुमारी नहीं, ब्रह्मानंद की मस्ती नहीं, वे नूर बेनूर होते तो कोई हरकत नहीं। प्रसिद्धि होने पर साधक के इर्दगिर्द लोगों की भीड़ बढ़ेगी, जगत का संग लगेगा, परिग्रह बढ़ेगा और साधन लुट जायेगा। अतः अपने-आपको साधक बतलाकर प्रसिद्ध न करो, पुजवाने और मान की चाह भूलकर भी न करो। जिस साधक में यह चाह पैदा हो जाती है, वह कुछ ही दिनों में भगवत्प्राप्ति का साधक न रहकर मान-भोग का साधक बन जाता है। अतः लोकैषणा का विष के समान त्याग करना चाहिए।

ध्यान करने से सत्त्वगुण की वृद्धि होती है तो अत्यधिक आनंद आने लगता है। साक्षी भाव है, फिर भी एक रुकावट है। ‘मैं साक्षी हूँ, मैं आनंदस्वरूप हूँ, मैं आत्मा हूँ…..’ आरम्भ में ऐसा चिंतन ठीक है लेकिन बाद में यहीं रुकना ठीक नहीं। ‘मैं आत्मा हूँ, ये अनात्मा हैं, ये दुःखरूप हैं…’ इस परिच्छिन्नता के बने रहने तक परमानंद की प्राप्ति नहीं होती। सात्त्विक आनंद से भी पार जो ऊँची स्थिति है, वह प्राप्त नहीं होती। अतएव फिर उसके साथ योग करना पड़ता है कि ‘यह आनंदस्वरूप आत्मा वहाँ भी है और यहाँ भी है। मैं यहाँ केवल मेरी देह की इन चमड़े की दीवारों को ‘मैं’ मानता हूँ, अन्यथा मैं तो प्रत्येक स्थान पर आनंदस्वरूप हूँ।’

ऐसा निश्चय करके जब उस योगी को अभेद ज्ञान हो जाता है तो उसकी स्थिति अवर्णनीय होती है, लाबयान होती है, वह जीवन्मुक्त हो जाता है। वह जीवन्मुक्त महात्मा बाहर से तो हम जैसा ही दिखेगा, जिसकी जैसी दृष्टि, जैसी भावना होगी उसको वह वैसा दिखेगा लेकिन भीतर से देखो तो बस…. अनंत ब्रह्माण्डों में फैला हुआ जो चैतन्य वपु है, वही महात्माओं का अपना-आपा है, वही ब्रह्मज्ञानी का अपना आपा है। ॐ…. ॐ…. ॐ….

साधना के पथ में आलस्य, प्रमाद, अधैर्य, अपवित्रता, पुजवाने की इच्छा, परदोषदर्शन, निंदा, विलासिता, अनुचित अध्ययन, माता-पिता व गुरुजनों का तिरस्कार, शास्त्र व संतों के वचनों में अविश्वास, अभिमान, लक्ष्य की विस्मृति आदि प्रमुख दोष हैं। अतः साधक को इनसे सदैव परहेज रखना चाहिए व अपनी वृत्ति ईश्वर की ओर लगानी चाहिए। धनभागी है वे शिष्य जो तत्परता से ऐसी ऊँची स्थिति में लग जाते हैं ! साधना में जो रुकावटें हैं उन सबको उखाड़कर फेंकते जाओ। असम्भव कुछ नहीं, सब कुछ सम्भव है। धैर्य मत खोओ। उत्तम लक्ष्य का कभी त्याग न करो। शाबाश वीर ! शाबाश !!

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अक्तूबर 2011, पृष्ठ संख्या 8,9 अंक 226

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आत्मनिर्भर बनें


हाथी शेर अपेक्षा अधिक बलवान है । उसका शरीर बड़ा और भारी है फिर भी अकेला शेर दर्जनों हाथियों को मारने-भगाने में समर्थ होता है । शेर की ताकत का रहस्य क्या है ?

हाथी अपने शरीर पर भरोसा करता है, जबकि शेर अपनी शक्ति (प्राणबल) पर भरोसा करता है । हाथी झुण्ड बनाकर चलते हैं और जब विश्राम करते हैं तो एक हाथी को पहरेदार के रूप में नियुक्त करते हैं । उन्हें सदा यह डर लगा रहता कि कहीं शेर उन पर आक्रमण न कर दे ।

यदि हाथी को अपनी ताकत पर भरोसा हो तो वह कई शेरों को सूँड से उठाकर पटक सकता है, अपने पैरों से कुचल सकता है । परंतु बेचारे हाथी को अपने पर विश्वास नहीं होता, इसलिए उसमें सदा साहस का अभाव बना रहता है ।

स्वयं को नीच, अधम, दुःखी, पापी या अभागा नहीं मानना चाहिए । आप अपनी आंतरिक शक्ति पर पूर्ण विश्वास करें । स्वामी रामतीर्थ कहते हैं- ‘यदि कोई मुझसे एक शब्द में तत्त्वज्ञान पूछे तो मैं कहूँगा कि आत्मनिर्भरता या आत्मबोध । यह सत्य है, सर्वथा सत्य है कि जब आप स्वयं अपनी सहायता करते हैं तभी परमात्मा आपकी सहायता करता है ।’ दैव आपकी सहायता करने के लिए बाध्य है, लेकिन तब जब आप स्वयं पर निर्भर रहें । आप सभी सब कुछ पा सकते हैं । आपके लिए कुछ भी असम्भव नहीं है ।

एक बार दो सगे भाई मुकद्दमेबाजी के कारण न्यायाधीश के सम्मुख आये । उनमें से एक बहुत धनवान था जबकि दूसरा कंगाल । न्यायाधीश ने धनवान से प्रश्न कियाः “तुम इतने धनी हो तो तुम्हारा भाई निर्धन कैसे ?”

धनवान ने कहाः “पाँच वर्ष पहले हमें एक समान पैतृक सम्पत्ति प्राप्त हुई थी । मेरा भाई स्वयं को धनवान मानकर सुस्त हो गया । उसने सभी कार्य अपने नौकरों के सुपुर्द कर दिये । उसे जब भी कोई काम करना होता तो वह अपने नौकरों को बुलाकर कहताः ‘जाओ, यह काम करो, जाओ वह काम करो ।’ इस प्रकार वह सुख-आराम, विषय-विकारों में समय गँवाने लगा । इसके विपरीत मैं किसी सेवक पर निर्भर नहीं हुआ । मैं अपने काम अधिक-से-अधिक स्वयं करता रहा । यदि सेवक के सहयोग की आवश्यकता होती तो कहता थाः ‘आओ-आओ ! यह काम करने में मेरी मदद करो ।’

भाई सदा जाओ-जाओ कहता रहा और मैं आओ-आओ कहता रहा । इसलिए मेरे पास नौकर चाकर, इष्ट मित्र व धन सम्पत्ति आती गयी, जबकि मेरा भाई अपना सब गँवा बैठा ।”

जब हम दूसरों पर निर्भर हो जाते हैं तब कहते हैं- ‘जाओ-जाओ’ । इस प्रकार प्रत्येक वस्तु दूर चली जाती है व जब आत्मनिर्भर बनते हैं, तब संसार के सभी पदार्थ हमारी ओर खिंचे चले आते हैं ।

यदि आप अपने को निर्धन, तुच्छ जीव मानते हैं तो आप वही हो जायेंगे । इसके विपरीत यदि आप आत्मसम्मान की भावना से परिपूर्ण हैं तथा आत्मनिर्भर हैं तो आपको सम्मान, स्नेह, सफलता प्राप्त होती है । स्वयं को दीन-हीन, दुर्बल, भाग्यहीन कभी न समझें । आप जैसा सोचेंगे वैसे ही बन जायेंगे । सदगुरु-कृपा से स्वयं को नित्यमुक्त अविनाशी आत्मा जानेंगे तो मुक्त हो जायेंगे ।

जब तक आप बाह्य शक्तियों पर निर्भर रहेंगे, परावलम्बी रहेंगे तब तक आपके कार्यों का परिणाम असफलता ही रहेगा ।

सत्य में सदैव विश्वास रखें । जब आप हृदय में विराजमान ईश्वर पर भरोसा करते हुए शरीर को काम में नियुक्त कर देंगे तो आपकी सफलता निश्चित हो जायेगी । स्वयं पर विश्वास करें, स्वयं पर निर्भर होने की आदत डालें । फिर देखिये, सफलता कैसे नहीं मिलती !

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अक्तूबर 2011, पृष्ठ संख्या 27, 30 अंक 226

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जीवन में लाइये भगवद्-लालसा और जिज्ञासा


-पूज्य बापू जी

जेहि कें जेहि पर सत्य सनेहू ।

सो तेहि मिलन न कछु संदेहु ।। (श्री रामचरित. बा.कां. 258.3)

जिसको जिस पर सत्य स्नेह हो जाता है वह उसे मिलता है, इसमें कोई संदेह नहीं क्योंकि तुम्हारा मन सत्यस्वरूप आत्मदेव से स्फुरित होता है । सत्य प्रेम जिसके प्रति होगा उसकी अवस्था को आप प्राप्त कर सकते हैं । जीवन में चार बातें होती हैं – एक होती है शारीरिक आवश्यकता – भोजन, पानी, वस्त्र और आवास, दूसरी होती है इच्छा, तीसरी भगवद्-लालसा और चौथी जिज्ञासा । आवश्यकता तो सादे भोजन से भी पूरी हो जाती है, सादे पानी से भी पूरी हो जाती है लेकिन शराब पीनी है, कोल्डड्रिंक्स पीने हैं, यह है इच्छा । आवश्यकता है आँधी-तूफान से बचने के लिए घर बनाने की अथवा बाड़े में रहने की लेकिन ऐसा सुंदर घर हो, ऐसा टी.वी. हो, ऐसा फ्रिज हो, यह है इच्छा । इच्छा के पीछे लगने वाले व्यक्ति को नश्वर इच्छाएँ भोगों में नाश कर देती हैं ।

दुनिया में ऐसा कोई सुख-भोग, ऐश-आराम विलास नहीं है कि जिसके पीछे भोक्ता को बलिदान न देना पड़े, समय का शक्ति का, पुण्यों का । इसलिए बुद्धिमान अपने जीवन में उन्नति के लिए व्रत रखते हैं । व्रत से आदमी का संयम बढ़ता है, साहस बढ़ता है, सद्भाव बढ़ता है, संकल्पशक्ति बढ़ती है, श्रद्धा बढ़ती है और सत्य की प्राप्ति हो जाती है ।

व्रतेन दीक्षामाप्नोति दीक्ष्याप्नोति दक्षिणाम् ।

दक्षिणा श्रद्धामाप्नोति श्रद्धया सत्यमाप्यते ।।

‘व्रत से दीक्षा आती है, दक्षता से दृढ़ता आती है, दृढ़ता से श्रद्धा दृढ़ होती है श्रद्धा से सत्यस्वरूप की प्राप्ति होती है ।’ (यजुर्वेदः 19.30)

आवश्यकता पूरी करने के लिए मना नहीं है लेकिन इच्छा की दलदल में फँसने से बचें । जैसे हाथी कीचड़ में धँसता है तो फिर ज्यों-ज्यों पैर चलाता है त्यों-त्यों और धँसता जाता है, ऐसे ही इच्छाएँ करने वाला व्यक्ति भोगों की दलदल में फँस जाता है । बड़े राजा-महाराज थे लेकिन इच्छाओं के गुलाम होने के कारण मरने के बाद कोई गिरगिट बन गया, कोई साँप बन गया, कोई भूत बन गया, कोई पिशाच बन के भटकता है तो कोई गर्भ नहीं मिलता है तो नाली में भटकता रहता है । इच्छा के पीछे एक ज़िंदगी नहीं, हजारों-हजारों ज़िंदगियाँ बरबाद हो गयीं ।

जिसके जीवन में सत्संग नहीं है, उसके जीवन में इच्छाओं का कुसंग बहुत होता है । वस्तु मिले, व्यक्ति मिले, परिस्थिति मिले, यह मिले, वह मिले…. सब होते-होते आखिर संसार से आदमी थक जाता है । निराश होकर मर जाता है । तो आपके अंदर एक है आवश्यकता, वह आसानी से पूरी हो जाती है । दूसरी है इच्छा, जिसे पूरी करते-करते कई नीच योनियों में भटकना पड़ता है । तीसरी बहुत ऊँची चीज़ है आपके जीवन में – भगवद्-लालसा, भगवद्दर्शन की लालसा, भगवत्प्रीति की लालसा, भगवद्धाम की लालसा अर्थात् साकार भगवान की कृपा, दर्शन पाने अथवा उनके धाम में जाने की लालसा । आवश्यकता ऐहिक शरीर की है, इच्छा-वासना विकारों से जूझते-जूझते थकाने वाली है लेकिन भगवत्प्रीति की लालसा कल्याणकारी है ।

चौथी होती है ‘जिज्ञासा’ । भगवान क्या है ? यह सृष्टि क्या है ? हम क्या हैं ? आखिर तत्त्व को जानने की जो जिज्ञासा होती है वह सत्य में से प्रकट होती है । सत्य शाश्वत है तो उसकी जिज्ञासा शाश्वत तक ले जाती है ।

भगवान स्नेह-प्रधान, रक्षा करने वाले, हित करने वाले हैं । भगवान के भजन की, भगवान की कृपा की, भगवान के दर्शन की, भगवान के माधुर्य की लालसा होती है तो यह भी ऊँची बात है । लालसा भी ऊँची चीज़ है, जिज्ञासा तो परम ऊँची चीज़ है । आवश्यकता पूरी करना कोई अपराध नहीं, एक ही घाटे की चीज़ है जो है इच्छा । और उस इच्छा-इच्छा में, वासना में और वासना बढ़ाने वाले चलचित्रों, पिक्चरों में आज का जनसमू बेचारा अपने-आपको ऐसे होम रहा है जैसे ट्रैफिक की बत्ती पर पतंगे आकर स्वाहा होते हैं । ऐसे ही देश-विदेश में, विश्व में सब इच्छाओं के पीछे लगे हुए हैं ।

दूसरों का हक छीनना, दगा करना, बेईमानी करना, इनको बोलते हैं ‘प्लुत पाप’ । दिखने में तो अच्छा लगे लेकिन बाद में कठोर दुःख दे, उसको बोलते हैं प्लुत पाप । जैसे रावण के पास सोने की लंका हो गयी, मनचाही उड़ान भरने की सिद्धियाँ आ गयीं. यक्ष-गंधर्व वश हो गये, फिर भी इच्छा पूरी नहीं हुई । सीता जी के प्रति गलत भाव रखा तो रावण संसार से हार गया । इच्छा वाला व्यक्ति देर-सवेर संसार से हार जाता है और नीच गतियों में, नीच योनियों में जाता है ।

आवश्यकता पूरी कर दे और इच्छा की जगह पर भगवत्प्राप्ति की इच्छा कर दे, भगवद्-लालसा को बढ़ावा दे, भगवद्-जिज्ञासा को बढ़ावा दे दे तो छोटे-से-छोटा आदमी, बिल्कुल साधारण से साधारण व्यक्ति भी महान हो जाता है । जैसे कि जंगली काली-कलूट जातियों में भी कुरूप जाति शबर, नाक चपटी, आँखें अंदर, गाल बैठे हुए, जिसे कुरूपता की पराकाष्ठा बोलते हैं, उस शबर जाति की वह लड़की शबरी भीलन इच्छा की गुलाम बनती तो फिर जैसे उसकी उम्र की कई लड़कियाँ खप गयीं संसार में, वह भी खप जाती । लेकिन उसने अपनी आवश्यकतापूर्ति की । रूखा-सूखा खा के, ठंडा पानी पीकर, ठंडा दिमाग रख के भगवान की लालसा को बढ़ाया, मतंग ऋषि की सेवा में रही । और शबरी भीलन इतनी ऊँची उठी कि उसकी भगवद्-लालसा की पूर्ति साकार दर्शन से हुई और जिज्ञासा की पूर्ति हुई गुरु के ज्ञान से । भगवद्-तत्त्व, रामतत्त्व का साक्षात्कार भी हो गया था शबरी को ।

आत्मसाक्षात्कारी पुरुष भगवान के विग्रह में नहीं विलीन नहीं होते क्योंकि आत्मसाक्षात्कारी पुरुष अपने चिन्मय स्वभाव को जान लेते हैं । भक्त चिन्मय भगवान की भक्ति से, भाव से अपने शरीर को चिन्मय बना देते हैं । ज्ञानी का शरीर सामान्य व्यक्तियों की तरह रहेगा, दिखेगा लेकिन भक्त का शरीर अंत समय चिन्मय सत्ता में विलय भी हो सकता है, अंतर्धान भी हो सकता है ।

भक्त भगवान की चिन्मय सत्ता में, लालसा में इतना पवित्र हो जाता है कि उसको हर चीज़ में अपने भगवान की स्मृति का प्रभाव दिखाई देता है । संत कबीर जी ने सखूबाई की सराहना सुनी कि सखूबाई संत है । कितने भी कष्ट, मुसीबतें, पीड़ाएँ सास की तरफ से, ससुर की तरफ से, पति की तरफ से आयीं पर उसको ये पीड़ाएँ पीड़ाएँ नहीं लगतीं । भगवद्भक्ति की लालसा से वह बहुत ऊँचाई को पायी हुई थी । उस सखूबाई के दर्शन के लिए कबीर जी काशी से कराड (महाराष्ट्र) पहुँचे ।

कबीर जी ने देखा कि सखूबाई घर में तो हैं नहीं ! उन्होंने पूछाः “सखूबाई कहाँ गयी ?” बोलेः “कंडे बेचने गयी है ।” कबीर जी ने सोचा, ‘हद हो गयी ! हमने तो सुना था कि बड़ी भक्त है और यह तो कंडे बेचने जा रही है बाजार में ! चलो देखें कि कैसे कंडे बेचती है ।’

देखा कि एक माई के साथ उसकी लड़ाई हो रही है । बराबर भिड़ी हैं दोनों आमने-सामने । कबीर जी ने सिर पर हाथ रखा कि ‘सुनी-सुनायी बात के पीछे यहाँ तक आना पड़ा !’

कबीर जी ने पूछाः “जो दो-चार कंडों के लिए लड़ रही है, वही सखूबाई है ?”

बोलेः “हाँ ।”

कबीर जी ने कदम पीछे किये तो सखूबाई ने कहाः “कबीर जी ! कबीर जी !! रुकिये । आप तो काशी से आये हैं न ?”

कबीर जी बोलेः “बाई ! तू कैसे जान गयी ?”

वह बोलीः “महाराज ! आपके अंतरात्मा में जो है, वही यहाँ है न ! हमारा आपस में झगड़ा हो रहा है । आप तो संत आदमी हैं, हमारा न्याय करो ।”

कबीर जी ने कहाः “हद हो गयी ! मैं आया था दर्शन करने और मेरे को कैसे पता चले कि तुम्हारे कंडे कौन-से हैं ?”

सखूबाई बोलीः “महाराज ! बड़ा सरल उपाय है । कंडे को कान पर रखो, बारीकी से सुनो । और आप तो सुरता की साधना भी किये हुए हो । जिससे मेरे इष्टदेव की ध्वनि आती हो, वह कंडा मेरा है । जिससे ध्वनि न निकले, वह इसका ।”

कबीर जी ने देखा कि किसी-किसी कंडे से ध्वनि आ रही है । सामने वाली बाई दादागिरी करके इसके कंडे चुरा रही थी । सखूबाई का सिद्धांत ठीक है । जुल्म करना नहीं और जुल्म सहना नहीं ! सखूबाई से सत्संग करके कबीर जी बड़े प्रसन्न हुए ।

यह है भक्त की लालसा का प्रभाव ! लालसा में भगवान के चिंतन-चिंतन में भक्त के जीवन में विलक्षण प्रकट होने लगते हैं ।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अक्तूबर 2011, पृष्ठ संख्या 19-21 अंक 226

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