Tag Archives: Vivek Vichar

गुरु की आवश्यकता क्यों ?


बात दो टूक, पर है सच्ची !

स्वामी श्रीअखंडानंदजी सरस्वती

यूँ तो प्रत्येक ज्ञान में गुरु की अनिवार्य उपयोगिता है परंतु ब्रह्मज्ञान के लिए तो दूसरा कोई रास्ता ही नहीं है। गुरु के बिना उपासना-मार्ग के रहस्य मालूम नहीं होते और न उसकी अड़चनें दूर होती है। जो उपासना करना चाहता है, वह गुरु के बिना एक पग भी नहीं बढ़ सकता। गुरु के संतोष में ही शिष्य की पूर्णता है। एक दृष्टांत कहता हूँ – मेरे बचपन का एक मित्र था। हम दोनों वर्षों से मिले नहीं किंतु पत्र-व्यवहार चलता था। एक बार मैं उसके घर गया पर उसने पहचाना नहीं। मैंने अपना नाम नहीं बताया और उसके साथ खुला व्यवहार करने लगा। वह तो हैरान हो गया। इतने में किसी ने मेरा नाम ले दिया तो आकर गले से लिपट गया। अब देखो कि मैं उसके सामने प्रत्यक्ष था परंतु नेत्रों के सामने होना एक बात है और पहचानना दूसरी वस्तु है।

हमारा आत्मा जो ब्रह्म है, हमसे कहीं दूर नहीं है। सदा सोते-जागते, उठते-बैठते अपने साथ है। यह नित्य प्राप्त है। इसमें वियोग की सम्भावना नहीं है। परंतु ऐसे नित्य प्राप्त आत्मा को हम पहचान नहीं रहे हैं। यदि इसमें स्थित होने से इसकी पहचान होती तो सुषुप्ति में, समाधि में हो जाती। पास रहते हम इसे पहचान नहीं रहे हैं तो बताने वाले की आवश्यकता है। जब तक कोई बतायेगा नहीं कि ‘वह ब्रह्म तो तू ही है’ तब तक उसका ज्ञान नहीं होगा।

उस ब्रह्म को आत्मरूप से जानने के लिए साधन-सम्पन्न जिज्ञासु हाथ में समिधा लेकर श्रोत्रिय और ब्रह्मनिष्ठ सदगुरु की शरण में जाय।

सदगुरु प्राप्त हो जायें तब क्या करें ?

तब उनकी विनय से सेवा करें और उसके प्रति प्रेम करें। उनमें दोष बुद्धि न करें और उनके महत्त्व को हृदयंगम करके उनसे ही अपने कल्याण की आशा करें। इस प्रकार सेवा और भक्ति से सदगुरु को अपने अनुकूल बनायें।

जब तक हम सदगुरु को भगवान के रूप में नहीं देख पाते, उनसे प्रवाहित होने वाले भगवदज्ञान को स्वीकार नहीं करते और उनकी प्रत्येक क्रिया हमें लीला के रूप में नहीं मालूम होने लगती, तब तक गुरुकरण नहीं हुआ है, ऐसा समझना चाहिए। सदगुरु मानने के पश्चात उन्हें भगवान से नीचे कुछ भी समझना पतन का हेतु है। इस भगवदस्वरूप में वे ही एक हैं, जगत के और जितने भी गुरु हैं वे मेरे गुरु के लीलाविग्रह हैं। सर्वत्र उन्हीं का ज्ञान और उन्हीं का अनुग्रह प्रकट हो रहा है।

मंत्रदान के पश्चात गुरु की मनुष्यरूप में प्रतीती होना, यह तो शिष्य की कल्पना है। वास्तव में गुरु परमात्मा ही हैं। इन गुरु की शरण और इनके करकमलों की छत्रछाया पाकर शष्य धन्य-धन्य हो जाता है।

सदगुरु के प्रति शिष्य के हृदय में जितनी श्रद्धा, प्रेम और उनके महत्त्व का ज्ञान होता है, उसी के अनुसार उनसे शिष्य का व्यवहार होता है। जिह्वा पर ‘गुरू’ शब्द के आते ही शिष्य गदगद हो जाता है। गुरु का स्मरण कराने वाली वस्तु को देखकर लोट-पोट होने लगता है। गुरू सबसे श्रेष्ठ हैं, गुरु साक्षात् भगवान हैं, गुरु की पूजा ही भगवत्पूजा है। गुरु, गुरुमंत्र और इष्टदेवता ये तीन नहीं एक हैं। शिष्य अधिकारहीन होने पर भी यदि सदगुरू की शरण में पहुँच जाय तो वे उसे अधिकारी बना लेते हैं। पारस तो लोहे को ही सोना बनाता है अन्य धातु को नहीं, पर सदगुरू अधिकारहीन को भी अधिकारी बनाकर परम पद दे देते हैं।

जिस शरीर से सदगुरु की प्राप्ति हुई है, उस शरीर के प्रति अपनी कृतज्ञता कैसे प्रकट की जाय ?

उस शरीर को परमात्मा की, सदगुरु की सेवा में लगा दिया जाय – यही कृतज्ञता है। सेवा क्या है ? पाँव दबाने का नाम सेवा नही है, न पानी भरने का, उनके विचार में अपना विचार, उनके संकल्प में अपना संकल्प, उनकी पसंदगी में अपनी पसंदगी मिला देने का नाम सेवा है, यह सच्ची सेवा है। सेवा अपने मन की पसंद नहीं है, जिसकी सेवा की जाती है उसकी पसंद है। सदगुरु के प्रति अपने जीवन को समर्पित कर देना ही कृतज्ञता है और  यही भगवान की भी सेवा है।

गुरू और इष्ट एक ही हैं – यह बुद्धि कैसे हो ?

आत्मा और परमात्मा एकी है, ज्यों-ज्यों इस बुद्धि के निकट पहुँचते जायेंगे त्यों-त्यों गुरू और परमात्मा की एकता समझ में आती जायेगी। ईमानदारी से देखो कि आप कितनी गहराई के साथ शालग्राम की शिला को परमात्मा समझते हो।  जयपुर से या वृंदावन से गढ़ी हुई जो मूर्तियाँ निकलती हैं, उनको आप कितनी ईमानदारी, कितनी गहराई से साक्षात् भगवान समझते हैं। जब हम अपने आत्मा को सच्चाई और ईमानदारी से हड्डी, मांस के शरीर से अलग, क्रिया-प्रक्रिया से अलग, इच्छाओं एवं भिन्न-भिन्न विचारों से अलग और जाग्रत, स्वप्न, सुषप्ति से भी अलग जितनी सूक्ष्मता से समझेंगे, उतनी ही सूक्ष्मता में गुरु को समझेंगे। और जितनी सूक्ष्मता में अपने को और गुरु को समझेंगे, उतनी ही सूक्ष्मता में परमात्मा को समझेंगे।

संत ज्ञानेश्वरजी ने ‘ज्ञानेश्वरी गीता’ में आचार्योपासना की व्याख्या में कहा है- “आचार्य के ‘उप’ माने पास आसन लगाना। जहाँ तुम्हारे गुरु बैठते हैं वहाँ तुम बैठो। तुम्हारे गुरू ईश्वर से एकता का अनुभव करते हैं तो तुम भी वैसा ही अनुभव करो। जितनी गहराई में तुम्हारे गुरू बैठते हैं, उतनी ही गहराई में तुम भी अपना आसन लगाओ।”

बाहर जाकर ईश्वर के पास नहीं बैठा जाता है, बाहर से लौटकर भीतर, हृदय के भी हृदय में, अंतर्देश के भी अंतर्देश में, अपने-आपमें जब हम बैठते हैं, उतने ही हम गुरु के पास बैठते हैं। असल में गुरू और ईश्वर दो अलग-अलग अपने स्वार्थ के कारण ही मालूम पड़ते हैं। बात जरा दो टूक है, पर है सच्ची !

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जुलाई 2010, पृष्ठ संख्या 4, 5, 8 अंक 211

ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ

आरम्भ सँवारा तो सँवरता है जीवन


जीवन का आरम्भिक समय बहुत ही महत्त्वपूर्ण है। जीवन का पतन और उत्थान बाल्यावस्था के संस्कारों पर ही निर्भर है। बाल्यावस्था व युवावस्था से ही जो व्यक्ति सदगुणों का संग्राहक है, दयालु है, उदार है, कष्टसहिष्णु है, कर्तव्यपरायण तथा प्रेमी है, आगे चलकर वही समाज में एक अच्छा मानव हो सकता है। युवावस्था में ही जो नशीले पदार्थों का व्यसनी हो जाता है तथा जिसमें क्रोध, अभिमान, इन्द्रिय-लोलुपता की प्रधानता है एवं जो काम, क्रोध और रसना के स्वाद के वेग को नहीं रोक पाता, वही आगे चलकर समाज में मानवता को कलंकित करता है। सौभाग्यशाली युवक उसी को समझना चाहिए जो अपने जीवन में आरम्भ से ही सज्जन एवं साधु-महात्माओं के सुसंग से दैवी सम्पत्ति को बढ़ाता है और कुसंग से बचता है।

अपने कर्तव्यकर्मों में सावधान रहना, प्रसन्न रहना, उन्हें विधि के साथ पूर्ण करने का दृढ़ संकल्प लेना – यह सब सफलता का शुभ मुहूर्त है। इसके विपरीत अपने कर्तव्य में आरम्भ से आलस्य करना, खिन्न उदास रहकर बिना मन के कार्य आरम्भ करना – ये सफलता के पथ में अशुभ संकेत हैं, अपशकुन हैं।

सभी का यह अनुभव है कि जिस दिन प्रातः उठने में आलस्यवश देरी हो जाती है, उस दिन शौच, स्नान आदि नित्यकर्म समयानुसार नहीं होते, उस दिन सभी कार्यों में गड़बड़ी, अस्त-व्यस्तता रहती है और जिस दिन समय पर उठने में एवं नित्यनियम पूर्ण करने में आलस्य नहीं रहता, उस दिन सभी कार्य व्यवस्थित ढंग से पूरे होते हैं। वह दिन हँसता हुआ सा प्रतीत होता है।

जिसका आरम्भ सुन्दर, धर्म, नीति और मर्यादा से सुसंबद्ध होकर विधिवत चलता है, उसका भविष्य भला क्यों न सुंदर, पवित्र, सुखमय और मंगलमय होगा ? अवश्य होगा !

जिन व्यक्तियों के हृदय में आरम्भ से केवल शरीर की सुंदरता का तथा शरीर को सुंदर बनाने के लिए वस्त्राभूषणों का और वस्त्राभूषणों के लिए धन का महत्त्व प्रतीत होता है, वे जीवन को सुंदर नहीं बना पाते। ऐसे लोग वस्तुओं एवं व्यक्तियों की दासत में बँधे रहते हैं। यदि बाल्यावस्था एवं युवावस्था के आरम्भ में आलस्य, विलासित, दुर्व्यसन अथवा भोग-कामनाओं को स्थान मिल जाता है, तब उस जीवन का मध्य और अंत भी प्रायः अशुभ एवं असुंदर ही सिद्ध होता है।

मनुष्य का भविष्य प्रकाशपूर्ण होगा या अंधकारपूर्ण, इसका परिचय आरम्भ की गतिविधियों से ही मिल जाता है। आरम्भ में साथ लगा हुआ थोड़ा सा दोष, थोड़ा सा कोई दुर्व्यन, थोड़ी सी चोरी की आदत, थोड़ा झूठ बोलने का स्वभाव, थोड़ी सी कुटेव अथवा कोई भी अनुचित कुचेष्टा आगे चलकर थोड़ी न रह जायेगी। वह उसी प्रकार अपना बड़ा आकार धारण करेगी, जिस प्रकार आरम्भ में थोड़ी सी अग्नि की चिनगारी ईंधन का संयोग पाकर भयानक रूप धारण करती है।

यह समझने की बात है कि आरम्भ में जो कुछ थोड़ा दिखता है, वह आगे कभी थोड़ा नहीं रह जाता। वह चाहे थोड़ा सा दोष हो या साथ चलने वाली कोई थोड़ी सी भूल हो अथवा कोई थोड़ा गुण हो या सुंदर भाव अथवा सदविचार हो या दुर्विचार।

बुद्धिमान मनुष्य को चाहिए की सावधान होकर जो कुछ भी अशुभ, असुंदर, अपवित्र, अनावश्यक एवं अहितकर हो, उसे थोड़े से ही त्याग कर दे। जो थोड़े का त्याग नहीं कर सकता, वह अधिक का त्याग किस प्रकार करेगा ! अतः अधिक होने पर जिसका त्याग अति कष्टकर है उसका थोड़े से ही त्याग करना सुगम है।

जो प्रत्येक कार्य के आरम्भ में आवश्यक एवं हितकर का स्वीकार करना और अहितकर का त्याग करना जानता है, उसी का जीवन आगे चलकर सुंदर और पुण्यशाली होता है।

वैसे तो बाल्यावस्था और युवावस्था का आरम्भ अपने संरक्षकों अर्थात् माता-पिता, भाई, गुरुजनों के अधिकार में रहता है, फिर भी कुछ सयाने बालक अथवा युवक आरम्भ से ही अच्छी बुद्धि से युक्त होते हैं कि जिन्हें स्वयं ही अशुभ, असुंदर, अपवित्र बातों से घृणा होती है और शुभ, सुंदर, पवित्र बातों में अनायास ही प्रीति होती है।

माता-पिता, बड़े भ्राता तथा गुरु का कर्तव्य है कि वे अपनी संतान का आरम्भ से ही किसी प्रकार की अशुद्ध, असुंदर, अपवित्र बातों से संसर्ग न होने दें। बालकों के हृदय एवं मस्तिष्क में आरम्भ से विद्याध्ययन तथा बड़ों के प्रति शिष्टाचार, सदाचार, धर्म एवं ईश्वर का महत्त्व भरना चाहिए।

आरम्भ को सुंदर बनाना, कुसंग तथा कुसंस्कार से दूषित न होने देना, शुभ कर्मों में ही शक्ति का सदुपयोग करना, धर्मतत्त्व, ईश्वरतत्त्व को जानने की अभिलाषा को प्रबल बनाना – ये सौभाग्यवानों में ही देख जाते हैं।

मनुष्य की जीवनगति प्रकाश की ओर है या अंधकार की ओर – इसका ज्ञान दूरदर्शी एवं बुद्धिमान को आरम्भ के दर्शन से ही हो जाता है।

किसी प्रकार के आरम्भ को आलस्य और प्रमाद से बचाकर सुंदर संग से विधिवत् सँभालना ही भविष्य को सुंदर बनाना है।

प्रातःकाल नींद खुलते ही आरम्भ में ही उस परमात्मा का स्मरण कर लो, जिसकी सत्ता से तुम जी रहे हो और सब प्रकार की इच्छाओं की पूर्ति का रस ले रहे हो।

दिन में कार्य आरम्भ करने की विधि को, उसकी मर्यादित गति को और दिन भर के कार्यक्रम को समझ लो। स्मरण न रहे तो आरम्भ में ही सब कार्य लिख लो।

किसी से मिलो तो आरम्भ में सरल भाव से, प्रसन्नचित्त से, गम्भीरतापूर्वक, सुंदर शब्दों में बात करो अधिक बनावटीपन न आने दो और भद्दापन भी मिश्रित न होने दो। किसी से प्रीति का संबंध जोड़ो तो आरम्भ में ही अपनी चाह, अपना स्वभाव या त्रुटि उसके सामने रख दो, उसे आरम्भ में ही तैयार कर लो कि वह तुमसे यदि प्रेम करता है तो तुम्हारी त्रुटियों के साथ, भूलों के साथ, दोषों के साथ किस प्रकार निर्वाह करना होगा। उसे धोखा न दो ताकि विश्वासघात न हो।

जो कार्य आरम्भ करो, प्रारम्भ में ही उसकी पूर्ति के साधन जुटा लो, जो कुछ प्रतिकूलताएँ आ सकती हों, उनका सामना करने के लिए, अपने को सावधान करने के लिए जिन-जिन बातों की आवश्यकता पड़ती हो, उनको साथ लिये रहो। इससे साधन के सिद्ध होने में चूक नहीं होगी। यह तो हुई व्यवहार-जगत की बात, साधना-जगत में तो इससे भी अधिक सावधान रहने की आवश्यकता है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जुलाई 2010, पृष्ठ संख्या 25,26 अंक 211

ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ

स्वार्थ त्यागें, महान बनें – पूज्य बापू जी


मनुष्य को कभी भी स्वार्थ में आबद्ध नहीं होना चाहिए। व्यावहारिक वासनाओं को पोसने का स्वार्थ सुख का अभिलाषी है वह सच्ची सेवा नहीं कर सकता। जो संसारी वासनाओं का गुलाम है वह अपना ठीक से विकास नहीं कर सकता। जो अपने स्वार्थ का गुलाम है वह अपना कल्याण नहीं कर सकता। व्यक्तिगत स्वार्थ कुटुम्ब में कलह पैदा कर देगा, कुटुम्ब का स्वार्थ पड़ोस में कलह पैदा कर देगा, पड़ोस का स्वार्थ गाँव में कलह पैदा कर देगा, गाँव का स्वार्थ तहसील में कलह पैदा करेगा, तहसील का स्वार्थ जिले में कलह पैदा कर देगा, जिले का स्वार्थ राज्य में कलह पैदा कर देगा और राज्य प्रांतीयता का स्वार्थ राष्ट्र में कलह पैदा कर देगा, राष्ट्रीयता का स्वार्थ विश्व में कलह करेगा और वैश्विकता का स्वार्थ विश्वेश्वर के दूर पटक देगा। स्वार्थ में आकर मूर्खतावश जो कुप्रचार करते हैं, करवाते हैं मेरे दिल में उनके प्रति नफरत नहीं होती।

दूसरे लोग फोन पर फोन करते हैं ‘बापू जी की सहनशक्ति कैसी है ! इतना कुप्रचार, इतना जुल्म पर जुल्म हो रहा है और बापू जी को देखो तो कोई दुःख नहीं ! जब देखो मुस्कराते रहते हैं। हमको तो बड़ा दुःख होता है।’

बेटा ! तुम जहाँ बैठकर देखते हो वहाँ तुम ठीक हो लेकिन वास्तविकता कुछ और है। जो अखण्ड भारत को तोड़ना चाहते हैं उनकी मुरादें हैं कि हम आपस में लड़ें-भिड़ें, झगड़े परन्तु हमारा ज्ञान कहता है किः

जो हम आपस में न झगड़ते।

बने हुए क्यों खेल बिगड़ते।।

लोग यह मानते हैं कि संघर्ष के बिना विकास नहीं होता, संघर्ष के बिना अपनी चाही हुई चीज नहीं मिलती। भाई साहब ! विदेशी लोग तो ऐसी बड़ी भारी गलती में पड़े हैं कि लड़ाओ और राज करो (Divide and Rule)। हिन्दू हिन्दुओं को लड़ाओ, हिन्दूवादी सरकार को बदनाम करो, हिन्दू संस्थाओं को बदनाम करो। हिन्दुओँ को आपस में लड़ाकर उन पर राज करने की मुराद वालों ने, धर्मांतरण कराने वालों ने हिन्दू साधुओं और पुलिस के बीच में, हिन्दू संस्थाओं और मीडिया के बीच में एक खाई खड़ी कर दी। ये लोग सफल भी हो पाते हैं जब हम स्वार्थ के वशीभूत होकर आपस में लड़ने लग जाते हैं। हमें आपस में लड़ना नहीं चाहिए। लड़ाई-झगड़े से जो भी मिलेगा वह सुखद नहीं होगा और सात्त्विक ज्ञान, आत्मज्ञान, गीताज्ञान से जो मिलेगा वह कभी दुःखद नहीं होगा। संघर्ष से आपको कुछ मिल गया तो आप भोगी बन जाओगे, और अधिक संघर्ष करोगे, अपने से कमजोर लोगों का शोषण करने लग जाओगे।

संघर्ष से अपनी इच्छापूर्ति करो – यह स्वार्थियों की, संकीर्ण मानसिकतावालों की मान्यता बहुत छोटी जगह पर बैठकर होती है। वास्तव में संघर्ष करके अपनी इच्छापूर्ति करने के बाद भी दुःख नहीं मिटता, चिंता नहीं मिटती, विकार नहीं मिटते, अशांति नहीं मिटती। उस अशांति, विकार तथा बदले की भावना से मरने के बाद भी न जाने किस-किस रूप में एक-दूसरे से प्रतिशोध लेने के लिए न जाने किन किन योनियों में भटकते हैं, मारकाट करते रहते हैं, तपते-तपाते रहते हैं कुत्तों की नाईं।

स्वार्थी, नासमझ आपस में कुत्तों की नाईं लड़ मरते हैं परंतु समझदार मनुष्य तो बहुत ऊँचे ज्ञान के धनी होते हैं, दूरदृष्टिवाले होते हैं। लोग कहते हैं- ‘बापू के करोड़ो शिष्य हैं। बापू जी आज्ञा करें तो देश को हिला देंगे, यह कर देंगे – वह कर देंगे।’ मैंने कहाः ‘नहीं बाबा ! देश को हिलाओगे तो भी अपने की ही घाटा है।’

षड्यंत्रकारियों के बहकावे में आकर समझदारी की कमीवाले कुछ की कुछ साजिशें करते हैं। जो षड्यंत्र करके दूसरें का बुरा सोचता है, बुरा चाहता है, बुरा करता है उसका तो अपनी ही बुरा हो जाता है। आप किसी का बुरा चाहोगे तो पहले अपने दिल में बुराई लायेंगे, इससे कुछ-न-कुछ आपकी बुद्धि मारी जायेगी। बुद्धि मारी जाती है तब लाखों करोड़ों की नजरों में आदरणीय व्यक्ति के लिए भी हलकी भाषा बोलते है। फिर उनको लोगों की बददुआएँ मिलती हैं। शास्त्र में आता है कि

अपूज्या यत्र पूज्यन्ते पूजनीयो न पूज्यते।

त्रीणि तत्र भविष्यन्ति दारिद्रयं मरणं भयम्।।

(शिव पुराण, रूद्र. सती. 35.9)

जहाँ पूजनीय माता-पिता, सदगुरुओं का आदर नहीं होता और अपूजनीय लोगों का आदर-सत्कार होता है, वहाँ भय, दरिद्रता और मृत्यु का तांडव होने लगता है। गलत निर्णय होने लगते हैं। अशांति के कारण अकाल मृत्यु हो जाती है, हार्टअटैक आ जाता है, एक्सीडेंट होने लगते हैं। इसका प्रत्यक्ष दृष्टान्त है – अफगानिस्तान में महात्मा बुद्ध की मूर्तियाँ तोड़ी गयीं, महापुरुषों के प्रति नफरत जगायी गयी तो वहाँ कितना कितना कहर हो रहा है !

स्वार्थ आदमी को गुमराह कर देता है। वे लोग सचमुच मूर्ख हैं जो अपनी ही संस्कृति की जड़ों को काटने में लगे रहते हैं। ये फिर भटक जाते हैं, स्वार्थ में अंधे होकर किसी भी तरीके से पैसा इकट्ठा करने लग जाते हैं। ऐसे लोग मरने के बाद नीच योनियों में जाते हैं।

लोगों में सुख शांति का प्रसाद बाँटने वाले संतों-महापुरुषों के प्रति जिनको वैरभाव है, समझ लो उनकी तो तौबा है ! वे न जाने कुत्ता बनकर कितने जन्मों तक दुष्कर्मों का फल भोगेंगे, मेंढक बनेंगे। रामायण में आता हैः

हर गुर निंदक दादुर होई।

जन्म सहस्र पाव तन सोई।।

एक बार नही, हजार जन्मों तक उनको मेंढक बनना पड़ता है, फिर ऊँट बनते हैं, बैल बनते हैं। लोग बोलते हैं- ‘इनको दंड मिलना चाहिए।’ अरे ! आप हम क्या दंड देंगे ! वे स्वयं दंड ले रहे हैं। अशांति का दंड ले रहे हैं और कई जन्मों में दंड भोगने वाला मन बना रहे हैं। अब उनको हम आप क्या दंड देंगे।

बहुत गयी थोड़ी रही व्याकुल मन मत हो।

धीरज सबका मित्र है करी कमाई मत खो।।

अगर कोई शुभकामना करनी है तो दो-दो माला भगवन्नाम का जप कर लो। स्वार्थ में अँधे बनकर आपस में लड़ाकर मारने वाले इन षड्यंत्रकारियों से बचकर अपनी संस्कृति की रक्षा के लिए, सीमा पर तैनात प्रहरी की तरह सदैव सावधान रहो। अपनी दृष्टि को व्यापक बनाने का अभ्यास करो। महापुरुषों का सत्संग सुनो।

भगवदसुमरिन का, परिस्थितियों में सम रहने की सजगता का, परमात्म-विश्रान्ति का, आकाश में एकटक निहारने का, श्वासोच्छवास में सोऽहं जप द्वारा समाधि-सुख में जाने का आदरसहित अभ्यास करना। कभी-कभी एकांत में समय गुजारना, विचार करना कि इतना मिल गया आखिर क्या ? अपने को स्वार्थ से बचाना। स्वार्थरहित कार्य ईश्वर को कर्जदार बना देता है और स्वार्थसहित कार्य इन्सान को गद्दार बना देता है। निष्काम कर्म, संस्कृति की सेवा, भगवान का सुमिरन और एकांत में आत्मविचार करके आत्मा के आनंद में आने वाला महान हो जाता है।

ऋषि प्रसाद, जून 2010, पृष्ठ संख्या 12,13 अंक 210

ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ