Tag Archives: Vivek Vichar

सुख का विज्ञान


(पूज्य बापू जी के सत्संग-प्रवचन से)

प्राणिमात्र का एक ही उद्देश्य है कि हम सदा सुखी रहें, कभी दुःखी न हों। सुबह से शाम तक और जीवन से मौत तक प्राणी यही करता है – दुःख को हटाना और सुख को थामना। धन कमाते हैं तो भी सुख के लिए, धन खर्च करते हैं तो भी सुख के लिए। शादी करते हैं तो भी सुख के लिए और पत्नी को मायके भेजते हैं तो भी सुख के लिए। पत्नी के लिए हीरे जवाहरात ले आते हैं तो भी सुख के लिए और तलाक दे देते हैं तो भी सुख के लिए। प्राणिमात्र जो भी चेष्टा करता है वह सुख के लिए ही करता है, फिर भी देखा जाय तो आदमी दुःखी का दुःखी है क्योंकि जहाँ सुख है वहाँ उसने खोज नहीं की।

यदि किसी को कहें- भगवान करे दो दिन के लिए आप सुखी हो जाओ, फिर मुसीबत आये। तो वह व्यक्ति कहेगाः “अरे भैया ! ऐसा न कहिये।”

‘अच्छा, दस साल के लिए आप सुखी हो जाओ, बाद में कष्ट आये।’

‘नहीं, नहीं….।’

‘जियो तब तक सुखी रहो, बाद में नरक मिले।’

‘न-न…. नहीं चाहते। दुःख नहीं सदा सुख चाहते हैं।’

तो उद्देश्य है सदा सुख का परंतु इच्छा है नश्वर से सुख लेने की, क्षणिक सुखों के पीछे भागने की इसलिए ठोकर खाते हैं।

क्षणिक सुखों की इच्छा क्यों होती है ? क्योंकि क्षण-क्षण में बदलने वाले जगत की सत्यता खोपड़ी में घुस गयी है। नश्वर जगत की सत्यता चित्त में ऐसी मजबूती से घुस गयी है, नश्वर जगत को, नश्वर संबंधों को, नश्वर परिस्थितियों को इतना सत्य मानते हैं कि सत्य को समझने की योग्यता ही गायब कर देते हैं।

वास्तव मे हमारा उद्देश्य तो है शाश्वत सुख किंतु इच्छा होती है नश्वर सुख की, नश्वर वस्तुओं की। तो उद्देश्य और इच्छा जब तक विपरीत रहेंगे तब तक जीवन में ‘सोऽहं’ का संगीत न गूँज पायेगा। उद्देश्य और इच्छा में जब तक फासला होगा, तब तक दो नाव में पैर रखने वालों की हालत से हम गुजरते रहेंगे, दुःखी होते रहेंगे।

आप सुखप्राप्ति चाहते हैं, सदा सुखी रहना चाहते हैं, जो स्वाभाविक है। तुम्हारा उद्देश्य जो है न, वह स्वाभाविक है और इच्छा जो वह अज्ञान से उठती है।

जैसे ठीक जानकारी न होने से, ठीक वस्तु का बोध न होने से आदमी गलत रास्ते चला जाता है। दूरबीन से नक्षत्रों या चाँद को देखना हो और काँच साफ न हो तो ठीक से नहीं दिखता, ऐसे ही ठीक बोध न होने से, ठीक समझ न होने से ज्ञान की नजर खुलती नही। और जब तक ज्ञान की नजर खुलती नहीं तब तक सुख-दुःख सब हमारी उन्नति के लिए आते हैं, ऐसा दिखता नहीं।

ठीक देखने क लिए ठीक अंतःकरण चाहिए और ठीक अंतःकरण के लिए उच्च विवेक चाहिए।

संत तुलसी दास ने कहाः

बिन सतसंग विवेक न होई।

राम कृपा बिनु सुलभ न सोई।।

भगवान की कृपा से ही ऐसे विवेक के रास्ते मनुष्य चलता है और उसकी अनात्मा की आसक्ति धीरे-धीरे मिटती जाती है तथा आत्मा का ज्ञान, प्रीति, विश्रांति, आत्मतृप्ति, परमात्मतृप्ति की तरफ चलती रहती है।

आत्मतृप्तमानवस्य कार्यं न विद्यते।

विकारों की तरफ फिसले नहीं तो जल्दी से पूर्ण स्वभाव की प्राप्ति हो जाती है। शिवजी कहते हैं-

उमा राम सुभाउ जेहिं जाना।

ताहि भजनु तजि भाव न आना।।

श्रीरामचरित. सुं.कां.33.2

उस आत्मानंद का रस पाकर फिर वह विकारी रस में आसक्त नहीं होता यही जीवन्मुक्ति है, जीते जी मुक्ति ! दुःखों से, आकर्षणों से, प्रशंसा से, निंदा से मुक्त महापुरुष बन जाओ। अष्टावक्र जी कहते हैं- तस्य तुलना केन जायते ? ऐसे आत्मा-परमात्मा में जागे उस महापुरुष की तुलना किससे करोगे ? इंद्रदेव का सुख भी आत्मसुख के आगे तुच्छ हो जाता है।

‘अष्टावक्र गीता’ में आता हैः

यत्पदं प्रेप्सवो दीनाः शक्राद्याः सर्वदेवताः।

अहो तत्र स्थितो योगी न हर्षमुपगच्छति।।

जिस पद को पाये बिना इंद्रादि देवता भी दीन हो जाते है, उस आत्मपद को पाकर आत्मारामी महापुरुष न यश से फूलते हैं न अपयश में दुःखी, चिंतित, परेशान होते हैं, ऐसा ब्रह्मस्वभाव का सुख है।

तैसा अंम्रितु1 तैसी बिखु2 खाटी।

तैसा मानु तैसा अभिमानु।

हरख सोग3 जा कै नही बैरी मीत समान।

कहु नानक सुनि रे मना मुकति ताहि तै जान
1 अमृत, 2 विष, 3 हर्ष-शोक

ऐसा सत्संग का विवेक मुक्तात्मा, महात्मा बना देता है। क्षुद्र विषय-विकारी सुख से अपने को थोड़ा बचाते जाओ और निर्विकारी, शाश्वत सुख में बढ़ते जाओ, यही मनुष्य जीवन की उपलब्धि है। सदा रहने वाला सुख सदा रहने वाले अपने क्षेत्रज्ञ स्वरूप में ही है। पंचभौतिक शरीर, मन, बुद्धि, अहंकार यह अष्टधा प्रकृति का क्षेत्र है। भगवान कहते हैं-

भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च।

अहंकार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा।।

(भगवदगीताः 7.4)

भगवान कृपा करके अपना स्वभाव बता रहे हैं कि मैं इनसे भिन्न हूँ, अतः आप भी इनसे भिन्न हैं। पंचभौतिक शरीर, मन, बुद्धि और अहंकार बदलते हैं, आप अबदल हैं। आप आत्मा हो, शाश्वत हो, शरीर के मरने  के बाद भी आपकी मृत्यु नहीं होती, आप अजर-अमर हो नारायण ! आप अपनी अमरता में जागो, टिको। शाश्वत सुख आपका अपना-आपा है।

सुख शांति का भण्डार है, आत्मा परम आनन्द है।

क्यों भूलता है आपको ? तुझमें न कोई द्वन्द्व है।।

भगवान हमारे परम सुहृद हैं। उन परम सुहृद के उपदेश को सुनकर अगर जीव भीतर, अपने स्वरूप में जाग जाय तो सुख और दुःख की चोटों से परे परमानन्द का अनुभव करके जीते-जी मुक्त हो जायेगा। जीव जब तक परम सुख नहीं पा लेता तब तक नश्वर सुख की चाह बनी रहती है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मई 2010, पृष्ठ संख्या 10,11, अंक 209

ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ

 

जिसने सब दिया उसके लिये क्या किया ?


(पूज्य बापू जी का पावन अमृतवाणी)

मनुष्य जब माँ के गर्भ में होता है तो प्रार्थना करता है कि ‘हे प्रभु ! तू मुझे इस दुःखद स्थिति से बाहर निकाल ले, मैं तेरा भजन करूँगा। वक्त व्यर्थ नहीं बिताऊँगा, तेरा भजन करके अपना जीवन सार्थक करूँगा।’ यह वादा करके गर्भ से बाहर आता है। बाहर आते ही अपना वादा भूल जाता है और भगवान का भजन न करके सांसारिक कार्यों में इतना तो उलझ जाता है कि जिस प्रभु ने सब दिया, उसके सुमिरन के लिए भी वह समय नहीं निकाल पाता। इसी बात की याद दिलाते हुए संत कबीर जी ने कहा हैः

कबीर वा दिन याद कर, पग ऊपर तल सीस।

मृत मंडल में आयके, बिसरि गया जगदीस।।

क्या आपने कभी सोचा है कि हमने माँ के गर्भ से जन्म लिया, माँ दाल-रोटी खाती है सब्जी रोटी खाती है उसमें से हमारे लिए जिसने दूध बनाया, उसको हमने क्या दिया ? जिसने रहने को धरती दी और धरती से अन्न दे रहा है, उसका हमने बदला क्या चुकाया ? चौबीसों घण्टे जो हमारे प्राण चलाने के लिए वायु दे रहा है, उसके बदले में हमने क्या दिया ? जिस धरती पर हम रहते हैं, उसी पर गंदगी छोड़ते हैं, साफ पानी पीते हैं, गंदा करके निकालते रहते हैं, फिर भी जो शुद्ध पानी दिये जा रहा है उसको हमने बदले में क्या दिया ? जरा-सी लाइट जलाते हैं तो बिजली का बिल भरना पड़ता है, नहीं तो कनेक्शन कट जाता है। जिसके सूर्य की लाइट, चन्द्रमा की लाइट जन्म से लेकर अभी तको ले रहे हैं, उसे बदले में हमने क्या दिया ?

कुम्हार ईंट बनाता है लेकिन ईंट बनाने की सामग्री – मिट्टी, पानी, अग्नि कुम्हार ने नहीं बनायी। अग्नि, मिट्टी, पानी भी भगवान का, जिस धरती पर ईंट बनायी वह भी भगवान की और जिन हाथों से बनायी उनमें भी शक्ति भगवान की, फिर भी कुम्हार से ईंट लेते हो तो उसका पैसा देना पड़ता है। जरा सा दूध लेते हो तो पैसा देना पड़ता है। जिसकी घास है और गाय, भैंस आदि में जो दूध बनाता है, उस परमात्मा की करूणा, प्राणिमात्र के लिए सुहृदता कैसी सुखद है ! कैसा दयालु, कृपालु, हितैषी है वह !!

….तो जिसकी मिट्टी है, अग्नि है, पानी है, जो हमारे दिल की धड़कनें चला रहा है, आँखों को देखने की, कानों को सुनने की, मन को सोचने की, बुद्धि को निर्णय करने की शक्ति दे रहा है, निर्णय बदल जाते हैं फिर भी जो बदले हुए निर्णय को जानने का ज्ञान दे रहा है, वह परमात्मा हमारा है। मरने के बाद भी वह हमारे साथ रहता है, उसके लिए हमने क्या किया ? उसको हम कुछ नहीं दे सकते ? प्रीतिपूर्वक स्मरण करते करते प्रेममय नहीं हो सकते ? बेवफा, गुणचोर होने के बदले शुक्रगुजारी और स्नेहपूर्वक स्मरण क्या अधिक कल्याणकारी नहीं होगा ? हे बेवकूफ मानव ! हे गुणचोर मनवा !! सो क्यों बिसारा जिसने सब दिया ? जिसने गर्भ में रक्षा की, सब कुछ दिया, सब कुछ किया, भर जा धन्यवाद से, अहोभाव से उसके प्रीतिपूर्वक स्मरण में !

जिसका तू बंदा उसी का सँवारा।

दुनिया की लालच से साहिब बिसारा।।

न कीन्हीं इबादत न राखा ईमान।

न कीन्हीं बंदगी न लिया प्रभु का नाम।।

शर्मिंदा हो न कछु नेकी कमायी।

लानत का जामा पहना न जायी।।

करेगा जो गफलत तो खायेगा लात।

बेटी और बेटा रहेगा न साथ।।

दुनिया का दीवाना कहे मुल्क मेरा।

आयी मौत सिर पर न तेरा न मेरा।।

तो लग जाओ लाला ! लालियाँ !! भगवान के द्वार जब जाओगे तब पूछा जायेगा कि भजन करने का वादा करके गया था, क्या करके आया ? इतना-इतना जल, इतनी पृथ्वी, इतना माँ का दूध, इतनी वायु, इतना भोजन आदि सब कुछ मिला, बदले में तूने कितना भजन किया ? संतों का कितना संग किया, कितना सत्संग सुना ? संतों द्वारा बताये मार्ग पर कितना चला और दूसरों को चलने में कितनी मदद की ? भगवन्नाम का कितना जप-कीर्तन किया और दूसरे कितनों को इसकी महिमा बताकर जप-कीर्तन में लगाया ? गीता के ज्ञान से, संतों के अनुभव से सम्पन्न सत्साहित्य को कितनों तक पहुँचाया ? तो क्या जवाब दोगे ?

पैसा तो तुमने कमाया लेकिन भगवान भूख नहीं देते तो कैसे खाते ? भूख ईश्वर की चीज है। खाना तो तुमने खाया परंतु पचाने की शक्ति, भोजन में से खून बनाने की शक्ति ईश्वर की है। सोचो, बदले में तुमने ईश्वर को क्या दिया ?

कम-से-कम सुबह उठते समय, रात्रि को सोते समय प्रीतिपूर्वक भगवान से कह दोः ‘हे प्रभो ! आपको प्रणाम है। आप हमारे हैं। हे दाता ! कृपा करो, हमें अपनी प्रीति दो, भक्ति दो। हे प्रभो ! आपकी जय हो। हम आपके सूर्य का, हवा का, धरती का, जल का फायदा लेते हैं और धन्यवाद भी नहीं देते, फिर भी आप देते जाते हो। हे दाता ! यह आपकी दया है। प्रभु ! आपकी जय हो !’

प्रभु को बोलोः ‘प्रभु ! आप हमारे हो। हम चाहे आपको जाने चाहे न जानें, मानें चाहे नहीं माने फिर भी आप हमारी रक्षा करते हो। आप हमको सदबुद्धि देते हो। दुःख देकर संसार की आसक्ति मिटाते हो और सुख देकर संसार में सेवा का भाव सिखाते हो। अब तो हम आपकी भक्ति करेंगे।’

इस प्रकार भगवान के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते-करते भक्ति का रंग लग जायेगा। आपके दोनों हाथों में लड्डू हो जायेंगे, एक तो कृतघ्नता के दोष से बच जाओगे, दूसरा भगवान की भक्ति मिल जायेगी। भगवान की भक्ति मिली तो सब मिल गया।

अरे, व्यवहार में एक गिलास पानी देने वाले को भी धन्यवाद देते हैं तो जो सब कुछ दे रहा है, उसके प्रति यदि हम कृतज्ञ नहीं होंगे तो हम गुणचोर कहे जायेंगे। ‘रामायण’ में आता हैः

बड़ें भाग मानुष तनु पावा।

सुर दुर्लभ सब ग्रंथहि गावा।।

‘बड़े भाग्य से यह मनुष्य-शरीर मिला है। सब ग्रन्थों ने यही कहा है कि यह शरीर देवताओं को भी दुर्लभ है।’ (श्रीरामचरित. उ.कां. 42.4)

ऐसा अनुभव मानव-तन पाकर भगवान की भक्ति नहीं की तो क्या किया आपने ?

कथा-कीर्तन जा घर नहीं, संत नहीं मेहमान।

वा घर जमड़ा डेरा दीन्हा, सांझ पड़े समशान।।

जिस गाँव में पिछले पाँच-पचीस वर्षों से कथा कीर्तन, ब्रह्मज्ञानी महापुरुषों का सत्संग नही हुआ हो, उनका साहित्य नहीं पहुँचा हो उस गाँव के लोग पिशाचों जैसे खड़े-खड़े खाते हैं, खड़े-खड़े पीते है, लड़ते-झगड़ते हैं, टोना-टोटका करते हैं, भूत-पिशाच को मानते हैं, सट्टा, जुआ, शराब-कबाब में तबाह होते हैं, भगवान को भूलकर, मानव जीवन के उद्देश्य को भूलकर परेशान होते रहते हैं। जिन गाँवों में सत्संग नहीं होता, उन गाँवों के लोगों को इतनी अक्ल भी नहीं रहती कि हम बेवफा हो रहे हैं।

इसलिए हर घर में प्रतिदिन सत्संग, जप, ध्यान, सत्शास्त्रों का पठन, कथा-कीर्तन होना ही चाहिए।

कथा-कीर्तन जा घर भयो, संत भये मेहमान।

वा घर प्रभु वासा कीन्हा, वो घर वैकुंठ समान।।

जो लोग भगवान के नाम की दीक्षा लेते हैं, भगवान के नाम का जप, और ध्यान करते हैं, वे तो देर सवेर भगवान के चिंतन से भगवान के धाम में, स्वर्ग में अथवा ब्रह्मलोक में जाते हैं और जो उनसे भी तीव्र हैं वे तो यहीं ईश्वर का साक्षात्कार कर लेते हैं। अतः आप आज से ही कोई-न-कोई पवित्र संकल्प कर लें कि ‘जिस प्रभु ने हमको सब कुछ दिया उसकी प्रीति के लिए, उसको पाने के लिए सत्संग अवश्य सुनूँगा और कम-से-कम इतनी माला तो अवश्य ही करूँगा, प्रभु के चिन्तन में इतनी देर मौन रहूँगा, इतनी देर सेवाकार्य करूँगा। प्रभु के हर विधान को मंगलमय समझकर हर व्यक्ति-वस्तु परिस्थिति में उनका दीदार करूँगा।’

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मई 2010, पृष्ठ संख्या 2,3,7 अंक 209

ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ

आँखें खोलिये, समझदार बनिये


मैं विगत 10 वर्षों से मीडिया-जगत से जुड़ा हुआ हूँ। मैंने मीडिया की सच्चाई करीब से देखी है। पहले पत्रकारिता मिशन के रूप में हुआ करती थी, मगर आज यह पूरी तरह व्यवसाय बन चुकी है। आज समाचार बिकते हैं। मीडिया की स्वतन्त्रता का पत्रकार खुलकर दुरुपयोग कर रहे हैं। किसी भी बड़ी हस्ती पर आरोप लगाकर उसे बदनाम कर देना इनके दायें हाथ का खेल है। सच्चाई की तह तक जाना वे बेवकूफी समझते हैं। कुछ समय पूर्व संतशिरोमणि आसारामजी बापू पर चलायी गयी आरोपों की आँधी को हवा देने के बहुत ही घृणित कार्य को टी.वी. चैनलों व अखबारों ने बखूबी अंजाम दिया था। मामले की जाँच हुई, आरोपी पकड़े गये, सारे आरोप झूठे साबित हुए। उस समाचार को इन टी.वी. चैनलों व अखबारों ने दिखाने से परहेज कर लिया, क्यों ? क्या यही है इनकी निष्पक्षता ! जी नहीं, यही है आज के मीडिया के घिनौनी हकीकत। आज पूज्य बापू जी लोगों का कितना भला कर रहे हैं ! लोग उन्हें ईश्वर मानकर पूजा करते हैं, इसके पीछे क्या है ? ‘सबका मंगल, सबका भला’ की सुंदर भावना है, प्रेम है, उनकी रग-रग में सच्चाई और पवित्रता है। पूरे मीडिया-जगत को आज इन महापुरुष का सम्मान करना चाहिए तथा इनके सेवाकार्यों की विस्तृत रिपोर्ट दिखाकर प्रायश्चित भी करना चाहिए। मैं अखबारों के समाचार व टी.वी. चैनलों की बेबुनियाद न्यूज को सच मानने वाले लोगों को आगाह करता हूँ कि आँखें खोलिये, आप भी समझदार बनिये।

बी.आर. सिन्हा, प्रधान सम्पादक, टेंशन टाईम्स समाचार पत्र समूह, राजनांदगांव (छ.ग.)

सम्पर्कः 9407782731

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मई 2010, पृष्ठ संख्या 29, अंक 209

ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ