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साधना में बाधक एवं सहायक बातेंv


साधना में बाधकः

मान की चाह के गुलाम बनना।

अति बोलना।

यश की इच्छा से दिखावटी कार्य करना।

अति निद्रा अथवा अनिद्रा।

हिंसक स्वभाव – शरीर, मन, या वाणी से किसी को दुःख देना।

अति धन – वैभव और आडम्बर।

विकार बढ़ाने वाला, जागतिक आकर्षण बढ़ाने वाला विनोद।

क्रोध और द्वेष।

काम, आसक्ति।

आलस्य और शौकीनीपना।

साधना में सहायकः

मान की चाह मिटाना।

मौन रहना, शांत रहना।

अच्छे कार्य करके ईश्वर को अर्पण करना।

ठीक-ठीक नींद व ब्राह्ममुहूर्त में जागरण।

तीनों प्रकार की अहिंसा।

सहज, सादा जीवन।

भगवद् भाव बढ़ाने वाला विनोद।

आवश्यकता पड़ने पर क्रोध और द्वेष रहित गर्जना तथा साक्षिभाव की सावधानी।

भगवत्प्रतीति व संयम पूर्वक संसार में जीना।

तत्परता और सहजता।

तो आज से साधना में बाधक बातों का त्याग करके साधना में सहायक बातों का अवलम्बन लो और अपने लक्ष्य को पा लो।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अप्रैल 2010, पृष्ठ संख्या 5, अंक 208

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हे नर ! दीनता त्याग – पूज्य बापू जी


(श्री वल्लभाचार्य जयंतीः 10 अप्रैल)

गुरुकृपा ही केवलं शिष्यस्य परं मंगलम्।

मंगल तो अपनी तपस्या से और देवताओं की, बड़ों की कृपा से हो जाता है लेकिन परम मंगल तो सदगुरु से होता है। सदगुरु की कृपा से भगवान आपके शिष्य भी बन सकते हैं।

भक्तकवि सूरदास जी  भजन गाते थे। एक बार वे वल्लभाचार्य महाराज के पास आये तो वल्लभाचार्यजी महाराज के पास आये तो वल्लभाचार्य जी ने कहाः “भजन गाने में तो तुम्हारा नाम है, जरा भजन सुना दो।” तो सूरदास जी ने भजन अलापा। भगवान के भक्त तो थे ही, वे फालतू गीत नहीं गाते थे, भगवान के ही गीत गाते थे। मो सम कौन कुटिल खल कामी…. प्रभु मोरे औगुन चित न धरौ…. आदि भजन वे गाने लगे तो वल्लभाचार्य जी ने कहाः “क्या सूर होकर गिड़गिड़ा रहे हो ! यह केवल हाथाजोड़ी और दीनता-हीनता, पुकार-पुकार, पुकार…. ! क्या जिंदगी भर गिड़गिड़ाते ही रहोगे ? भगवान ने तुम्हें गुलाम या मोहताज बनने के लिए धरती पर जन्म दिया है क्या ? अरे, भगवद्-तत्त्व की महिमा समझो, दीनता को त्यागो। भगवान तुमसे दूर नहीं हैं, तुम भगवान से दूर नहीं हो। मिथ्या प्रपंच को लेकर कब तक गिड़गिड़ाते रहोगे ! भगवान ने तुमको गिड़गिड़ाने वाला याचक नहीं बनाया है। तुम भगवान के बाप बन सकते हो, उनके गुरु बन सकते हो। भगवान का दादागुरु भी बन गया मनुष्य !”

सूरदास जी को बात लग गयी और वल्लभाचार्य जी से दीक्षा लेकर उनके मार्गदर्शन में जब थोड़ी साधना की, तब सूरदास जी बोलते हैं- “भगवान तो मेरा बेटा लगता है।” और वे भगवान की पुत्ररूप में आराधना करने लगे। पूर्वार्ध में तो सूरदास जी विनयी भक्त थे और उनके भजनों में गिड़गिड़ाहट थी परंतु गुरु की दीक्षा के बाद उनके भजनों में भगवत्स्वरूप छलकने लगा। ऐसा प्रभावशाली व्यक्तित्व, ऐसी प्रभावशाली वाणी हो गयी कि लगता था जैसे भगवान ही बोल रहे हैं वे एक सुन्दरी के पीछे बावरे-से हो गये थे, फिर वैराग्य हुआ तो अपनी आँखें फोड़ लीं और सूरदास बन गये।

सांदीपनी अपने विद्यार्थीकाल में पढ़ने में तेज नहीं थे लेकिन गुरुभक्ति दृढ़ थी तो गुरु ने प्रसन्न होकर कहाः “बेटा ! तू तो मेरा शिष्य है लेकिन श्रीकृष्ण तेरे शिष्य बनेंगे।” तो गुरु ने श्रीकृष्ण को अपने शिष्य का शिष्य बना दिया न ! मनुष्य में यह ताकत है कि भगवान को अपने चेले का चेला बना दो। क्यों सारी जिंदगी गिड़गिड़ाते रहते हो ! सेठों की, नेताओं की, राजाओं की खुशामद कर-करके मरते रहते हो ! समर्थ रामदासजी को रिझाकर शिवाजी स्वयं स्वामी हो गये। पिताजी ने कहाः ‘बीजापुर नरेश को मत्था टेको।’ लेकिन शिवाजी ने नहीं टेका। समर्थ रामदास जी के यहाँ मत्था टेकने को किसी ने नहीं कहा पर शिवाजी ने मत्था टेका ! ऐसा टेका, ऐसा टेका कि बस, अब भी भारत के लोग शिवाजी को मत्था टेकते हैं।

लल्लू-पंजुओं के आगे खुशामद करते रहें, झुकते रहें, काहे को !

वह सर सह नहीं जो हर दर पे झुकता रहे।

और वह दर दर नहीं जहाँ सज्जनों का सर न झुके।।

ऐसा है ब्रह्मवेत्ता गुरु का दर, जहाँ सज्जनों का सर अपने-आप झुक जाता है। जो तैंतीस करोड़ देवताओं के स्वामी हैं, बारह मेघ जिनकी आज्ञा में चलते हैं ऐसे इन्द्रदेव भी आत्मसाक्षात्कारी गुरु को देखकर नतमस्तक हो जाते हैं।

एक बार मुझे गुरुजी बोलेः “गुलाब के फूल को किराने की दुकान पर ले जाओ और दाल, मूँग, मटर, चना, शक्कर, गुड़ सब पर रखो, फिर सूँघोगे तो सुगन्ध काहे की आयेगी ?”

मैंने कहाः “साँईं ! गुलाब की ही आयेगी।” तो गुरुजी ने मुझसे कहाः “तू गुलाब होकर महक…. तुझे जमाना जाने।” मेरे गुरुदेव के इन दो शब्दों ने कितने करोड़ लोगों का भला कर दिया !

नजरों से वे निहाल हो जाते हैं,

जो संतों की नजरों में आ जाते हैं।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मार्च 2010, पृष्ठ संख्या 7,8 अंक 207

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धर्मात्मा की ही कसौटियाँ क्यों ?


(पूज्य बापू जी के सत्संग प्रवचन से)

प्रायः भक्तों के जीवन में यह फरियाद बनी रहती है कि ‘हम तो भगवान की इतनी भक्ति करते हैं, रोज सत्संग करते हैं, निःस्वार्थ भाव से गरीबों की सेवा करते हैं, धर्म का यथोचित अनुष्ठान करते हैं फिर भी हम भक्तों की इतनी कसौटियाँ क्यों होती हैं ?’

बचपन में जब तुम विद्यालय में दाखिल हुए थे तो ‘क, ख, ग’ आदि का अक्षरज्ञान तुरंत ही हो गया था कि विघ्न बाधाएँ आयी थीं ? लकीरें सीधी खींचते थे कि कलम टेढ़ी-मेढ़ी हो जाती थी ? जब साईकिल चलाना सीखा था तब भी तुम एकदम सीखे थे क्या ? नहीं। कई बार गिरे, कई बार उठे। चालनगाड़ी को पकड़ा, किसी की उँगली पकड़ी तब चलने के काबिल बने और अब तो मेरे भैया ! तुम दौड़ में भाग ले सकते हो।

अब मेरा सवाल है कि जब तुम चलना सीखे तो विघ्न क्यों आये ? क्यों विद्यालय में परीक्षा के बहाने कसौटियाँ होती थीं ? तुम्हारा जवाब होगा कि ‘बापू जी ! हम कमजोर थे, अभ्यास ज्ञान नहीं था।’

ऐसे ही तुमने परमात्मा को पाने की दिशा में कदम रख दिया है। तुम अभी 30 वर्ष के, 50 वर्ष के छोटे बच्चे हो, तुम्हें इस जगत के मिथ्यात्व का पता नहीं है। ईश्वर के लिए अभी तुम्हारा प्रेम कमजोर है, नियम में सातत्य और दृढ़ता की जरूरत है। अहंकार-काम-क्रोध के तुम जन्मों के रोगी हो, इसीलिए तो तुम्हारी कसौटियाँ होती हैं और विघ्न आते हैं ताकि तुम मजबूत बन सको। साधक तो विघ्न-बाधाओं से खेलकर मजबूत होता है। कसौटियाँ इसलिए कि तुम प्रभु को प्यार करते हो और वे तुम्हें प्यार करते हैं। वे तुम्हारा परम कल्याण चाहते हैं। वे तुम्हें कसौटियों पर कसकर, तुम्हारा विवेक-वैराग्य जगाकर तुमसे नश्वर संसार की आसक्ति छुड़ाना चाहते हैं।

माता कुंती भगवान श्रीकृष्ण से प्रार्थना करती थीं-

विपदः सन्तु न यश्वत्तत्र जगदगुरो……

‘हे जगदगुरो ! हमारे जीवन में सर्वदा पद-पद पर विपत्तियाँ आती रहें क्योंकि विपत्तियों में ही निश्चित रूप से आपका चिंतन-स्मरण हुआ करता है और आपका चिन्तन-स्मरण होते रहने पर फिर जन्म-मृत्यु के चक्कर में नहीं आना पड़ता।’

एक बीज को वृक्ष बनने में कितने विघ्न आते हैं। कभी पानी मिला कभी नहीं, कभी आँधी आयी, कभी तूफान आया, कभी पशु-पक्षियों ने मुँह-चौंचें मारीं…. ये सब सहते हुए वृक्ष खड़े हैं। तुम भी कसौटियों को सहते हुए वृक्ष खड़े हैं। तुम भी कसौटियों को सहन करते हुए उन पर खरे उतरते हुए ईश्वर के लिए खड़े हो जाओ तो तुम ब्रह्म हो जाओगे। परमात्मा की प्राप्ति की दिशा में कसौटियाँ तो सचमुच कल्याण के परम सोपान हैं। जिसे तुम प्रतिकूलता कहते हो सचमुच वह वरदान है क्योंकि अनुकूलता में लापरवाही एवं विलास सबल होता है तथा संयम एवं विवेक दबता है और प्रतिकूलता में विवेक एवं संयम जगता है तथा लापरवाही एवं विलास दबता है। कसौटियों के समय घबराने से तुम दुर्बल हो जाते हो, तुम्हारा मनोबल क्षीण हो जाता है। हम लोग पुराणों की कथाएँ सुनते हैं। ध्रुव तप कर रहा था। असुर लोग डराने के लिए आये लेकिन ध्रुव डरा नहीं। सुर लोग विमान लेकर प्रलोभन देने के लिए आये लेकिन ध्रुव फिसला नहीं। वह विजेता हो गया। वे कहानियाँ हम सुनते हैं, सुना भी देते हैं लेकिन समझते नहीं कि ध्रुव जैसा बालक दुःख से घबराया नहीं और सुख में फिसला नहीं। उसने दोनों का सदुपयोग कर लिया तो ईश्वर उसके पास प्रकट हो गये।

हम क्या करते हैं ? जरा-सा दुःख पड़ता है तो दुःख देने वाले पर लांछन लगाते हैं, परिस्थितियों को दोष देते हैं अथवा अपने को पापी समझकर कोसते हैं। कुछ दुर्बुद्धि, महाकायर आत्महत्या भी कर लेते हैं। कुछ पवित्र होंगे तो किसी संत-महात्मा के पास जाकर दुःख से मुक्ति पाते हैं। यदि आप प्रतिकूल परिस्थितियों में संतो के द्वार जाते हैं तो समझ लीजिये कि आपको पुण्यमिश्रित पापकर्म का फल भोगना पड़ रहा है क्योंकि कसौटि के समय जब परमात्मा याद आता है तो डूबते को सहारा मिल जाता है। नहीं तो कोई शराब का सहारा लेता है तो कोई और किसी का…..मगर इससे न तो समस्या हल होती है और न ही शांति मिल पाती है क्योंकि जहाँ आग है वहाँ जाने से शीतलता कैसे महसूस हो सकती है ! तुम कसौटी के समय धैर्य खोकर पतन की खाई में गिर जाते हो और फिर फँसकर रह जाते हो।

जो गुरुओं के द्वार पर जाते हैं उनको कसौटियों से पार होने की कुंजियाँ सहज ही मिल जाती हैं। इससे उनके दोनों हाथों से लड्डू होते हैं। एक तो संत-सान्निध्य से हृदय की तपन शांत होती है, समस्या का हल मिलता है, साथ-ही-साथ जीवन की नयी दिशा भी मिलती है। तभी तो स्वामी रामतीर्थ कहते थेः “हे परमात्मा ! रोज नयी समस्या भेजना।”

आज आप इस गूढ़ रहस्य को यदि भलीभाँति समझ लेंगे तो आप हमेशा के लिए मुसीबतों से, कसौटियों से पार हो जायेंगे। बात है साधारण पर अगर शिरोधार्य कर लेंगे तो आपका काम बन जायेगा।

आपने देखा होगा कि जिस खूँटे के सहारे पशु को बाँधना होता है, उसे घर का मालिक हिलाकर देखता है कि उसे उखाड़कर कहीं पशु भाग तो नहीं जायेगा। फिर घर की मालकिन देखती है कि उचित जगह पर तो ठोका गया है या नहीं। फिर ग्वाला देखता है कि मजबूत है या नहीं। एक खूँटे को, जिसके सहारे पशु बाँधना है, इतने लोग देखते हैं, उसकी कसौटियाँ करते हैं तो जिस भक्त के सहारे समाज को बाँधना है, समाज से अज्ञान भगाना है उस भक्त की भगवान-सदगुरु यदि कसौटियाँ नहीं करेंगे तो भैया कैसे काम चलेगा ?

जिसे वो देना चाहता है उसी को आजमाता है।

खजाने रहमतों के इसी बहाने लुटाता है।।

जब एक बार सदगुरु की, भगवान की शरण आ गये तो फिर क्या घबराना ! जो शिष्य़ भी है और दुःखी भी है तो मानना चाहिए कि वह अर्धशिष्य है अथवा निगुरा है। जो शिष्य भी है और चिंतित भी है तो मानना चाहिए कि उसमें समर्पण का अभाव है। मैं भगवान का, मैं गुरु का तो चिंता मेरी कैसे ! चिंता भी भगवान की हो गयी, गुरु की हो गयी। हम भगवान के हो गये तो कसौटी, बेईज्जती हमारी कैसे ! अब तो भगवान को ही सब सँभालना है। जैसे आदमी कारखाने का कर्मचारी हो जाता है तो कारखाने को लाभ हानि जो भी हो, उसे तो वेतन मिलता ही है, ऐसे ही जब हम ईश्वर के हो गये तो हमारा शरीर ईश्वर का साधन हो गया। खेलने दो उस परमात्मा को तुम्हारे जीवनरूपी उद्यान में। बस, तुम तो अपनी ओर से पुरुषार्थ करते जाओ। जो तुम्हारे जिम्मे आये उसे तुम कर लो और जो ईश्वर के जिम्मे है वह उसे करने दो, फिर देखो तुम्हारा काम कैसे बन जाता है। वे लोग मूर्ख हैं जो भगवान को कोसते हैं और वे लोग धन्य हैं जो हर हाल में खुश रहकर अपने-आप में तृप्त रहते हैं। गरीबी है तो क्या ! खाने को, पहनने को नहीं है तो क्या ! यदि तुम्हारे दिल में गुरुओं के प्रति श्रद्धा है, उनके वचनों को आत्मसात् करने की लगन है तो तुम सचमुच बड़े ही भाग्यशाली हो। सच्चा भक्त भगवान से उनकी भक्ति के अलावा किसी और फल की कभी याचना नहीं करता।

जिसे वह इश्क देता है,

उसे और कुछ नहीं देता है।

जिसे वह इसके काबिल नहीं समझता,

उसे और सब कुछ देता है।।

‘श्री योगवासिष्ठ’ में आता है कि चिंतामणि के आगे जो चिंतन करो, वह चीज मिलती है परंतु सत्पुरुष के आगे जो चीज माँगोगे वह चीज वे नहीं देंगे, जिससे तुम्हारा हित होगा वही देंगे।

यदि तुम्हारी निष्ठा है, संयम है, सत्य का आचरण है, सेवा का सदगुण है तो वे सबसे पहले तुम्हारी कसौटी हो, ऐसी परिस्थितियाँ देंगे ताकि इन सदगुणों के सहारे तुम सत्यस्वरूप परमात्मा को पा लो, परमात्मा को पाने की तड़प बढ़ा दो क्योंकि वे तुम्हारे परम हितैषी हैं। सदगुरूओं का ज्ञान तुम्हें ऊपर उठाता है। परिस्थितियाँ हैं सरिता का प्रवाह, जो तुम्हें नीचे की ओर घसीटती हैं और सदगुरु ‘पम्पिंग स्टेशन’ है जो तुम्हें हरदम ऊपर उठाते हैं।

अज्ञानी के रूप में जन्म लेना कोई पाप नहीं। मूर्ख के रूप में पैदा होना कोई पाप नहीं पर  मूर्ख रहकर सुख-दुःख के थप्पड़ खाना और जीर्ण-शीर्ण होकर प्रभु से विमुख होकर मर जाना महापाप है।

मनुष्य जन्म मिला है, सदगुरु का सान्निध्य और परम तत्त्व का ज्ञान पाने का दुर्लभ मौका भी हाथ लगा है और सबसे बड़ी हर्ष की बात यह है कि तुममें श्रद्धा और समझ है, अब केवल उसके लिए तड़प, जिज्ञासा बढ़ा दो। दुःख, चिंता और परेशानियों से क्यों घबराते हो ! ये तो कसौटियाँ हैं जो आपको निखार कर चमकाना चाहती हैं। हिम्मत, साहस, संयम की तलवार से जीवनरूपी कुरूक्षेत्र में आगे बढ़ते जाओ…. तुम्हारी निश्चय ही विजय होगी, तुम दिग्विजयी होओगे, तत्त्व के अनुभवी होओगे, तुममें और भगवान में कोई फासला नहीं रहेगा। सदगुरू का अनुभव तुम्हारा अनुभव हो जाय, यही तुम्हारे सदगुरूओं का पवित्र प्रयास है।

तेरे दीदार के आशिक,

समझाये नहीं जाते हैं।

कदम रखते हैं तेरे द्वार पर,

तो लौटाये नहीं जाते हैं।।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मार्च 2010, पृष्ठ संख्या 4,5,6. अंक 207.

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